रविवार, 9 सितंबर 2018






करीब पच्चीस साल पहले, तारामंडल, मुंबई के निदेशक थे भौतिक वैज्ञानिक डॉक्टर सुब्रह्मण्यम। वैज्ञानिक थे पर जनेऊ पहनते थे। एक बार टाईम्स के पत्रकार ने उनसे पूछा… आप तो वैज्ञानिक हैं फिर ये जनेऊ क्यों और कैसे? जनेऊ क्यों पहनते हैं आप? उनका जवाब कालजयी था।
उन्होंने कहा…
“मैं खगोलविद हूं। आसमान देख रहे हैं, भौतिकी का वो हिस्सा है हमारा क्षेत्र, अनंत। भौतिक आकाश में ये जो तारे हैं, वो क्या हैं? मैं तारामंडल का निदेशक क्यों हूं?
विज्ञान, दरअसल भविष्य का अतीत है। जब भी मैं तारों भरा आकाश देखता हूं, तो मैं अतीत में देख रहा होता हूं। ये तारे… वक्त की अलग अलग समतल की परतों में हैं और वे परतें, उस वक्त की हैं; जब हमारे पुरखे इस दुनिया में थे। ये तारे मेरे पूर्वजों के वक्त के हैं, जो मुझे दिख अभी रहे हैं। इस तरह पूरा आकाश मुझको, मेरे पुरखों से, मेरे पीतरों से जोड़ता है।
उसी तरह ये जनेऊ भी मुझको मेरे पुरखो से जोड़ता है।
मेरे पूर्वजों के गुणसुत्रों से ही मेरा वजूद है। मैं जो दिखता हूं और जो मैं हूं उनके सूत्रों से। ये जनेऊ भी तो सूत्र ही है… उनके भौतिक और जैविक नहीं, उनके आध्यात्मिक और वैचारिक गुणों का सूत्र। उनके वचन, संकल्प, आचरण और जीवन मूल्यों का सूत्र… इसी से मैं वैज्ञानिक होकर भी जनेऊ पहनता हूं। कि वक्त में डोर में लिपटे, विचार धागे हैं ये, मेरे पुरखों के विचार के धागे।”
कमाल कहा उन्होंने
कभी गौर किया कि जनेऊ धागा क्यों है? उसके परवल और तानी की खास गिनती क्यों है? वे मूल्य हैं… जीवन के मूल्य, जीने के एक खास तरीके का वचन, एक रिवायत, एक संस्कार के सूत्र। धागे ही सूत्र होते हैं। और संसार सूत्रों से ही बंधा हुआ है… धागों से…
तो जनेऊ पहनने से अच्छा इसलिए लगता है कि आप फौरन अपने पूर्वजों के आदर्शों, वचनों और मूल्यों से, अपनी जड़ों से जुड़ जाते हैं। अनायास आपकी एक सांस्कृतिक पहचान स्थापित हो जाती है, जो सीधा आपको आपके पीतरों से जोड़ती है… अपनी जड़ों से जोड़ने वाला धागा है, सूत्र है… जनेऊ।
और जड़ से जुड़ते, हरियाली तो छाती ही है, एक गरिमाबोध, एक संबल, आत्मबल तो आता ही है भीतर। तंतुओं की शक्ति से ही संसार चलायमान है। भौतिकी यही करता है… वो उन्ही तंतुओं की पड़ताल करता है। और हमारे जीवन मूल्य भी तंतुओं के बूते ही हम तक स्थानांन्तरित है। जनेऊ उसी से गरिमा और गौरव भरते हैं तन और मन में कि वो तंतु हैं..
कभी यज्ञोपवीत संस्कार की विधि पर गौर कीजिए।
पहले मूंज की डोर होती है… फिर धागा होता है…
जनेऊ… खरीदे नहीं जाते थे… वे काते जाते थे… घर की मां, दादी यानि अनुभवी बुजुर्ग महिलाएं, तकली या चरखे पर जनेऊ कातती थीं। वे उसे मेड़ातीं (कई स्तरों पर फोल्ड, उमेंठन) करतीं थी। ये फोल्ड निर्धारित होते थे। परिवार की बुजुर्ग दादी, नानी, के हाथ से प्रेम और श्रद्धा बना जनेऊ… आशीर्वाद और मंगलकामनाओं से परिपूर्ण होता था। (बाद में ये बस पुरोहिताईन का काम रह गया। और अब तो वे भी बाजार से ही खरीदते हैं। बाजार ने सब बेच दिया। आशीर्वादों और मंगलकामनाओं तक का धंधा कर लिया।) खैर…
प्रेम से बने, मां के हाथ के पकवान का स्वाद क्यों होता है अदभुत? क्योंकि सूत्र होता है वहां, स्नेह सूत्र।
वैसा ही जनेऊ में भी होता था। जब भी बाबा, दादी से धोती मांगते होंगे… और दादी या मां; जिस श्रद्धा से धोती निकाल देती होंगी, वो आदर… एक गरिमापूर्ण रिश्ता स्थापित करता है। बिहार में धोतियां मोड़ी नहीं जातीं, उमेंठीं जाती हैं, रस्सियों की तरह। ऐंठन… उमेंठन… फिर वही सूत्र है… डीएनए भी उमेंठा ही हुआ है। ये जनेऊ में वही ऐंठन और उमेंठन है।
डीएनए की तरह, धोती और जनेऊ की ये उमेंठन भी अक्सर घर की स्त्रियों के हाथों ही दी गयीं होतीं थीं।
तो सूचनाएं सदैव उमेंठन के तरीके से ही बहती हैं। चाहे संस्कार की सूचना हो या संचार की सूचना। जनेऊ पीतरों से हम तक आने वाली सूचनाओं की उमेंठन है।
जनेऊ पहनने से इसीलिए एक गरिमाबोध होता है। वो सूत्र बंधन है… सदाचार के आचरण की वचनबद्धता। वो पीतरों के मूल्यों की रक्षा का संकल्प है।
जनेऊ हमें अपने पूरखों से जोड़ता है… इसी से उसे पहन खुद में आत्मविश्वास और सुरक्षा भाव आता है कि हम प्राचीन हैं… और लंबे अतीत के अभिभावकों की मंगल कामनाओं, आशीर्वचनों से आरक्षित और संरक्षित हैं।
वंदे मातरम जय गौ माता अजय कर्मयोगी

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018



भूमिगत जल, वृहत्संहिता 
[हमारी शिक्षा और व्यवस्था
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अंकल सैम छाती ठोक कर आपको बतायेंगे कि कैसे धरती फोड और आकाश फाड कर जो भी ज्ञान संभव है, उन्होंने हासिल किया है। ब‌डी बडी सेटेलाईट अब आसमान से नीचे आँख़ें गडाये  तकती रहती हैं और बताती हैं कि कहाँ कहाँ धरती के भीतर पानी मिलेगा। ठीक है कि विज्ञान जितना विकसित होगा, उसके आकलन उतने ही सटीक होंगे। तथापि यह विवेचना आवश्यक है कि जब आसमानी आँखें नहीं थी तब क्या धरती के भीतर झांकने की कोई कोशिश नहीं हुई? कूप-तडागों वाला भारत कब से यह जानता था कि धरती की भीतरी सतहों में कहाँ कहाँ जल उपलब्ध हो सकता है तथा कहाँ से और कैसे उसको बाहर निकाला जा सकता है? हमारी पाठ्यपुस्तकें इस विषय पर बहुत नीरस हैं तथा सीधे जल चक्र से आरम्भ होती हैं। कुल मिलाकर वही गोल गोल कि पानी से भाप निकलती है फिर बादल बन कर बरस जाती है। बरसो जितना जल हो बल हो, लेकिन मालूम तो हो कि पानी फिर जमीन के भीतर प्रवेश कैसे करता है, कहाँ छिपा बैठा रहता है और उसकी तलाश के मुख्यविन्दु क्या हो सकते हैं। हमने बडे बडे शब्द चुन लिये हैं जैसे जियोलॉजी, जियोमॉर्फोलॉजी और हाईड्रोलोजी जिनके समन्वयन से आज प्रयास किया जाता है कि जमीन के भीतर का ज्ञान हासिल हो। सगर्व यह सब मॉडर्न साईंस का हिस्सा और देन माना गया है। हमारी पाठ्यपुस्तकें तो ख़ुदा खैर करे छुईमुई का पौधा हैं कि  किसी ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ की समयावधि मध्यकाल से नीचे सरकी तो फिर अक्षरों का रंग भगवा मान लिया जाता है और मिथक मिथक का कोलाहल मचने लगता है। यही कारण है कि किसी स्कूल में पढने वाले किसी बच्चे को यह नहीं पता होगा कि ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी में वाराहमिहिर नाम का एक भारतीय गणितज्ञ और खगोल शास्त्री था जिसने जमीन के भीतर झांकने का प्रयास किया और भूमिगत जल को के कर अपने ग्रंथ वृहत्संहिता के उदकार्गल अध्याय में लगभग सवा सौ श्लोको के माध्यम से ऐसी जानकारियों को संकलित किया जो आज भी विज्ञान की दृष्टि में सिद्ध मानी जाती हैं।

बुतरस घाली एक समय संयुक्त राष्ट्र के महासचिव रहे थे जिन्होंने चिंता जाहिर करते हुई कहा था कि पानी के लिये लडा जायेगा तीसरा विश्वयुद्ध। अगर ऐसा ही है तो हमारी क्या तैयारी है? क्या एक सौ पच्चीस करोड की यह जनसंख्या जो कि निरंतर बढती जा रही है, वर्तमान में उपलब्ध जल-संसाधनों पर निर्भर रह सकेगी? आज हम भू-जल पर बहुत अधिक निर्भर हो गये हैं जिससे हालात यह कि पाताल सूखता जा रहा है। अब भी हम बडी बडी मशीनों को ले कर धरती की धडकन सुनने निकलते हैं और बार बार ऐसा होता है कि अनुमान धरे रह जाते हैं और गहरे-गहरे गड्ढे खोद कर भी भीतर बूंद भी नहीं मिलता। इसे संज्ञान में लेते हुए सोचिये कि पाँचवी-छठी सदी में कैसे वाराहमिहिर ने मृदा के रंग, वनस्पतियों, पत्थर और उसके प्रकार, क्षेत्र, देश आदि के अनुसार किस स्थान पर भूमिगत जल की उपलब्धिता हो सकती है, इसका विवरण प्रदान किया है। विज्ञान की भाषा में धरती की सतह के नीचे, चट्टानों के कणों के बीच के अंतरकाश या रन्ध्राकाश में मौजूद जल को भूमिगत जल कहते हैं। मीठे पानी के स्रोत के रूप में यह एक प्राकृतिक संसाधन है। जलभर (Aquifer) धरातल की सतह के नीचे चट्टानों का एक ऐसा संस्तर है जहाँ भूजल एकत्रित होता है और मनुष्य द्वारा नलकूपों से निकालने योग्य अनुकूल दशाओं में होता है। वृहत्संहिता न केवल भू-जल को पारिभाषित करती है अपितु जलभर के विभिन्न आयामों पर भी जानकारी उपलब्ध है।

वृहत्संहिता के उदकार्गल में भूजल सम्बंधित जो व्याख्या प्रस्तुत की गयी है उसपर संक्षिप्त दृष्टि डालते हैं। ग्रंथ कहता है - पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्त्तयैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः अर्थात - जिस प्रकार मानव शरीर में नाड़ियाँ होती हैं उसी प्रकार पृथ्वी में भी विभिन्न ऊँची-नीची शिराएँ होती हैं। एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्चयुतं नभस्तो वसुधाविशेषात्, नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परी यं क्षितितुल्यमेव अर्थात आकाश से बरसता सब जल स्वाद में एक सा होता है। परन्तु भूमि की विशेषता से वह अनेक वर्ण और स्वाद का हो जाता है। उसकी परीक्षा भू्मि के समान ही करनी चाहिए। अर्थात् जैसी भू्मि होगी वैसा जल भी होगा। यही नहीं यदि ऐसा स्थान है जहाँ पानी मिलने की संभावना न्यूनतम है तब हमारी तलाश कैसी होनी चाहिए इसे एक श्लोक से समझें कि - यदि वेतसोSम्बुरहिते देशे हस्तैस्त्रिभिस्ततः पश्चात्, सार्धे पुरुषे तोयं वहति शिरा पश्चिमा तत्र अर्थात जलहीन देश में वेदमजनूँ नामक पेड़ के पश्चिम में तीन हाथ दूर, डेढ़ पुरुष नीचे जल होता है। वहाँ पश्चिमी शिरा बहती है। 120 अँगुल का एक पुरुष है अर्थात जब एक पुरुष अपने हाथ ऊपर खड़े करे तब उसका सम्पूर्णता में अनुमापन। इसी अनुमाप पर उदकार्गल में बहुत सी गणनायें की गयी हैं। उदाहरण के लिये - चिह् नमपि चार्ध पुरुषे मंडूकः पाण्डूरोSथ मृत्पीता, पुटभेदकश्च तस्मिन् पाषाणो भवति तोपनधः अर्थात आधा पुरुष खोदने पर वहाँ श्वेत मेंढक निकलता है, फिर पीले रंग की मिट्टी होती है, उसके बाद परतदार पत्थर होता है जिसके नीचे पानी होता है।

पेड-पौधों और जीवजगत के व्यवहार का बहुत सूक्ष्म विवेचन ग्रंथ के इस अध्याय में किया गया है। यह श्लोक देखें कि - जम्बूवृक्षस्य प्राग्वल्मीको यदि भवेत्समीपस्थः, स्माद्दक्षिणपाशर्वे सलिलं पुरुषद्वये स्वादु अर्थात यदि जामुन के पेड़ से पूर्व दिशा में पास ही सर्प की बाँबी हो तो उस पेड़ से तीन हाथ दक्षिण में दो पुरुष नीचे मधुर जल होता है। ऐसा ही यह श्लोक देखें कि - भार्ङ्गी विवृता दन्ती शूकरपादीश्च लक्ष्मणा चैव, नवमालिका च हस्तद्वयेSम्बु याम्ये त्रिभिः पुरुषैः अर्थात भांरगी, निसोत दंती (दत्यूणी), सूकरपादी, लक्ष्मण, मालती वनस्पति जहाँ हो तो उनसे दो हाथ दक्षिण में तीन पुरुष नीचे पानी होता है। इसी तरह भू-विज्ञान की भी गहरी समझ वाराहमिहिर के शास्त्र से परिलक्षित होती है जब वे लिखते हैं - यत्र स्निग्धा निम्ना सवालुका सानुनादिनी वा स्यात्, तत्रर्धपञ्चमैर्वारि मानवैः पञ्चभिर्यदि वा अर्थात चिकनी नीची बालु रेत हो और पैर रखने से ध्वनि हो तो साढ़े चार या पाँच पुरुष नीचे पानी होता है। इसी तरह का याह उदाहरण देखें कि - मृन्नीलोत्पलवर्णा कापोता चैव दृश्यते तस्मिन्, हस्तेSजगन्धिमत्स्यो भवति पयोSल्पं च सक्षारम् अर्थात पहले नीलकमल सी, फिर कबूतर वर्ण की मिट्टी दिखाई देती है। इसके एक हाथ नीचे मछली निकलती है, उसमें चकोर जैसी दुर्गन्ध होती है, वहाँ थोड़ा और खारा पानी निकलता है। इतना ही नहीं कैसे पत्थर होंगे तो भूजल का स्तर क्या होगा जैसे उद्धरण भी प्राप्त होते हैं जैसे -  अहिराजः पुरुषेSस्मिन् धूम्रा धात्री कुलत्थवर्णोSश्मा, माहेन्द्री भवति शिरा वहति सफेनं सदा तोयम् अर्थात पहले पुरुष खोदने पर बड़ा सर्प, फिर धुएँ जैसी भूमि, फिर कुलथी के रंग के पत्थर के नीचे आव पूर्व की आती है, उसमे से सदैव झागदार पानी आता है।

पानी भी मिल गया तब कूप-तालाब आधि खोद कर उसका दोहन सुनिश्चित किया जाता है, ऐसे में भी वाराहमिहिर के पास अनेक समाधान हैं। वे खनन में हो रही कठिनाईयों और न टूटने वाले पत्थरों से निजात पाने का उपाय भी निर्धारित करते हैं और लिखते हैं कि - भेदं यदा नैति शिला तदानीं पालाशकाष्ठैः सह तिन्दुकानाम्, प्रज्वालयित्वानलमग्निवर्णा सुधाम्बुसिक्ता प्रविदारमेति अर्थात कूप आदि खोदने के समय शिला निकले और वह फूटे नहीं तो उस पर ढाक और तेंदु की लकड़ी जलाकर उसे लाल करके ऊपर चूने की कलों से मिला पानी छिड़कें तो वह शिला टूट जाती है। एक अन्य उदाहरण देखें कि - तोयं श्रृतं मोक्षकभस्मना वा यत्सप्तकृत्वः परिषेचनं तत्, कार्य शरक्षारयुतं शिलायाः प्रस्फोटनं वह्निवितापितायाः अर्थात
मरुवा पेड़ की भस्म मिलाकर पानी उबालकर उसमें शरका खार मिला कर फिर अग्नि से तपाई शिला के ऊपर सात बार वह पानी छिड़कने से वह शिला टूट जाती है। कूप निर्माण के पश्चात संरक्षण के लिये उल्लेख है कि  - द्वारं च न नैर्वाहिकमेकदेशे कार्य शिलासचितवारिमार्गम्, कोशस्थितं निर्विवरं कपाटं कृत्वा ततः पांसुभिरावपेत्तम् अर्थात जल निकलने के लिए एक ओर मार्ग रखना चाहिए जिसे पत्थरों से बाँधकर पक्का करवा दें। उस जलमार्ग का छिद्ररहित मजबूत काठ के तख्तों से ढँककर, ऊपर से मिट्टी दबा दें। प्राप्त भू-जल की शुद्धि के उपाय भी बताये गये हैं - अञ्जनमुस्तोशीरैः सराजकोशातकामलकचूणँ:, कतकफलसमायुक्तैर्योगः कूपे प्रदातव्यः अर्थात अंजन (सुरमा), मोथा, खस, बड़ी तुरई, आमल, कतक (निर्मली) आदि सबका चूर्ण कूप में डाल दें। इसी कडी में यह श्लोक भी देखें कि - कलुषं कटुकं लवणं विरसं सलिलं यदि वा शुभगन्धि भवेत्, तदनेन भवत्यमलं सूरसं सुसुगन्धिगुणैरपरैश्चयुतम् अर्थात यदि जल गंदा, कड़वा, खारा, बेस्वाद या दुर्गन्धित हो तो वह इस चूर्ण से निर्मल, मीठा, सुगंधित और अन्य कई गुणों वाला हो जाता है।

वाराहमिहिर ने भूमिगत जल पर जो शोध प्रस्तुत किया वह विज्ञान की दुनियाँ में अभी ध्यान या विवेचना प्राप्त नहीं कर सका है। हमारी हालत यह कि हम बहुत ऊँचा उड रहे हैं, हवाओं के रुख से हमें आसमान छूने का अहसास भी हो रहा है परंतु भान ही नहीं कि पतंग कबकी मांझे से कट कर अलग हो गयी है। मेरे इस आलेख का पूर्वाग्रह यह नहीं कि पाठ्यक्रम में वाराहमिहिर ही  पढाये जायें, अपितु यह है कि क्यों विद्यार्थियों को गर्व प्रदान नहीं किया जाये कि भू-विज्ञान और जल-विज्ञान के अनेक सिद्धांत भारतीयों ने प्रतिपादित किये हैं? प्रश्न तो बहुत से हैं कि विज्ञान के युग का दंभ भरने वाले समय के पास अब भी काले मेघा पानी दे के सिद्धांत पर आधारित खेती की दशा-दिशा ही है जबकि समाधान धूल भरे ताखों पर पडे झख मार रहे हैं।
संकलन संशोधन अजय कर्मयोगी
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गुरुवार, 6 सितंबर 2018




    





"सभी मित्रों को शिक्षक दिवस की  हार्दिक शुभकामना कैसे दूं" ------------------
लेकिन अफसोस ये दिन हम ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर मनाते हैं जो शिक्षक के नाम पर कलंक है,
जी हाँ सही सुना #सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक के नाम पर कलंक हैं ....
वैसे ही जैसे नेहरू #बालदिवस के लिए कंलक हैं।
इनके बहुत सारे कारनामे हैं लेकिन एक झूठ का - जाल बुनकर - गाँधी की तरह ही - इनको भी -समाज में "महान व्यक्ति" स्थापित कर दिया गया है। -----------------
इनका सबसे घिनौना काम कि इन्होंने अपने ही विद्यार्थी की लिखी पुस्तक अपने नाम से प्रकाशित करवाई थी ....
छात्र #जदुनाथ सिन्हा ने जब अपनी थीसिस जमा की ....
तो चैकिंग के लिए प्रोफेसर राधाकृष्णन के पास आई ....
और इन्होंने उसको अपने पास ही रख लिया,
तथा 2 साल बाद इंग्लैंड से हूबहू अपने नाम से #इंडियन_फिलॉसफी नाम देकर छपवा दिया .....
जिसके लिए इनको बहुत वाहवाही प्रशंसा और शौहरत मिली और ....
जदुनाथ ने जब कोर्ट में केस किया .....
तो उस गरीब को डरा धमका के चुप करवा दिया।
क्योंकि धूर्त और मक्कार लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लोगों को कैसे दबाया जाता है .....
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दूसरा घिनौना काम था इनका कि जब ये 1952 में रूस में राजदूत थे ....
तो इन्होंने नेताजी बोस से मुलाकात की थी....
और नेहरू से रिहाई की बात की ....
लेकिन नेहरू ने चुप रहने को कहा ....
और ये चुप हो गए .....
बदले में 1952 में ही भारत बुलाकर उपराष्ट्रपति का पद मिल गया।
बात यहीं खत्म न हुई .....
1954 में इनको #भारतरत्न भी दिया गया.....
बात यहाँ रुकने वाली कहाँ थी ....
क्योंकि नेहरू की मजबूरी बन गयी थी इनको खुश रखना .... क्योंकि नेहरू जानते थे देश नेताजी से कितना प्यार करता है .....
अगर देश को पता चल गया नेताजी जिंदा हैं रूस की जेल में ....
तो देश में भूचाल आ जायेगा लोग नेताजी को छुड़ाने के लिए जी जान लगा देंगे।
बात यहाँ  खत्म न हुई ....
इनको 1962 में राष्ट्रपति का पद भी मिला .....
और इस महत्वाकाँक्षी धूर्त व्यक्ति ने राष्ट्रपति बनते ही 1962 में अपने नाम से अपने ही जन्मदिन को #शिक्षकदिवस घोषित कर दिया।
इनकी एक और महानता ये भी रही .....
कि जब 1931 में अंग्रेज हमारे महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद को मार रहे थे ....
ताकि स्वतंत्रता संग्राम की दबा दिया जाए,
तो दूसरी ओर राधाकृष्णन को "सर" की उपाधि से नवाजा गया था .....
और उसी समय पता नहीं किस बेशर्मी से इन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी "सर" की उपाधि स्वीकार भी की थी। ---------------------
राधाकृष्णन जी ने बड़ी कुशलता  से वेदांत दर्शन की ऐसी व्याख्या की जो तत्कालीन ईसाइयों को भी अपने अनुकूल लगी .
उदाहरणार्थ उन्होंने चेतना के ५ स्तरों का निम्नानुसार वर्गीकरण किया :
१)The worshippers of the Absolute(ब्रह्म उपासक )
2)The worshippers of the personal God(जीसस पिता God के उपासक )
3)The worshippers of the incarnations like Rama, Kṛiṣhṇa, Buddha ( राम , कृष्ण , बुद्ध आदि अवतारों के उपासक )
4)Those who worship ancestors, deities and sages(पूर्वजों , ऋषियों एवं विविध देवताओं के उपासक :देवी माता , हनुमान जी आदि के उपासक )
5)The worshippers of the petty forces and spirits(प्रेतादिक उपासक )
अब इसमें चतुराई से ईसाइयत को सबसे ऊपर रख दिया गया है और उधर उन्हें वेदांती प्रचारित करने की भी पूरी युक्ति विद्यमान है ,केवल ब्रह्म नाम लेने से .
पर ब्रह्म का उपासक कोई समाज तो होता नहीं , ब्रह्म को जानने वाला तो ब्रह्ममय हो जाता है (ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति ).अतः यह तो अति विरल स्थिति है .
इस युक्ति श्रृंखला द्वारा ईसाइयत को सर्वोपरि रख दिया गया .
सामान्य शिक्षा प्राप्त हिन्दू ब्रह्म का नाम पढ़कर मगन होकर समझेंगे कि हाँ भाई , सर्वोच्च दशा तो वही है .
क्योंकि हिन्दू समाज अति परिपक्व समाज रहा है और वह मर्यादित रहा है अतः दर्शन के प्रसंग में राजनीति उसके लिए विषयांतर है पर ईसाई और मुसलमान तो धर्म दर्शन के नाम पर भी राजनीति ही करते हैं जिन्हें आधुनिक हिन्दू लोग गलत राज्य व्यवस्था द्वारा फैलाये गए अज्ञान के कारण नहीं समझते ...
ऐसे नियोजित छल से वेदांत की दुहाई देकर भारत में ईसाइयत को प्रतिष्ठा दी गयी है और इसमें मुख्य खेल तो विदेशी विद्वानों का था,  पर राधाकृष्णन जी उसके एक उपकरण बने .
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सर्वपल्ली गांवके एक मेधावी छात्र थे।उन्होंने ईसाइयोंके स्कूलऔर ईसाइयोंके ही कॉलेजमें पढ़ाईकी और उनके अधीन ही अध्यापक बने।
वे कभी कांग्रेस में नहीं गए।किसीअन्य ऐसे प्रयास से भीनहीं जुड़े।
वे कम्युनिस्ट और  ईसाइयों के सदा निकट रहे और अंग्रेजोंने उन्हें सदा अपना भरोसेमंद पाया।उनका बेटा गोपाल कट्टर नास्तिक और कम्युनिस्ट है।
उन्हें भारतीय  दर्शनका प्रकांड विद्वान प्रचारित किया गया।उनकी स्थापनाएं,:
1) पाश्चात्य जैन बौद्ध दर्शन वेदों से पहलेही भारतमें व्यापक था।
2) बादमें वेदका प्रचार हुआ।
3)वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीँ हैं,रचयिताओं के कथन हैं।
4)ईसाइयत औऱ वेदान्त का समन्वय होंना चाहिये।
Dr jadunath sinha
 जो राधाकृष्णन के स्टूडेंड थे, ने पीएचडी की थीसिस जमा की, वह लंबे समय लंबित रखी।
इस बीच वह copypaste राधाकृष्णन ने अपने नाम से पब्लिश किये और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की
जदुनाथ जो अपनी योग्यता से कलकत्ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अप्पोइन्ट हुए, ने राधाकृष्णनन पर मुकदमा कर दिया।
कैसल में follow-ups करने पर sir Ashutosh Mukharji के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी , जो कलकत्ता विश्वविद्यालय जे VC थे, राधाकृष्णन के मित्र, के दबाव में कोर्ट के बाहर समझौता करना पड़ा।
साक्ष्य
Roundtableindia. Co. In
 संशोधन संकलन  अजय कर्मयोगी
साभार नितिन भदौया रामेश्वर मिश्र

रविवार, 26 अगस्त 2018



ब्रह्मचर्य  - वीर्य रक्षण  - योग-साधना"।

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1. वीर्य  के  बारें  में  जानकारी  -

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है।
 40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है।
 एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है । जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है।

सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते है ।।
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2. वीर्य  को पानी  की  तरह   रोज बहा देने से नुकसान   -

शरीर के अन्दर विद्यमान ‘वीर्य’ ही जीवन शक्ति का भण्डार है।
शारीरिक एवं मानसिक दुराचर तथा प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक मैथुन से इसका क्षरण होता है। कामुक चिंतन से भी इसका नुकसान होता है।

मैथून के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है।
 रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है।  ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। खोखला होता जाता  है  इन्सान ।

स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के  प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है -
 1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना।
 २.  सविलास की क्रीड़ा करना।
 3. स्त्री के रुप यौवन की प्रशंसा करना।
 4. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना।
 5. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया।

    इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया  आदि इसमें शामिल है।
 शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगते हैं और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है।
 ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है। अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता।
    धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तानोत्पत्ति और बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है।

मैथुन क्रिया से होने वाले नुकसान निम्रानुसार है-
* शरीर की जीवनी शक्ति घट जाती है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
* आँखो की रोशनी कम हो जाती है।
* शारीरिक एवं मानसिक बल कमजोर हो जाता है।
* जिस तरह जीने के लिये ऑक्सीजन चाहिए वैसे ही ‘निरोग’ रहने के लिये ‘वीर्य’।
* ऑक्सीजन प्राणवायु है तो वीर्य जीवनी शक्ति है।
* अधिक मैथुन से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाता  है।
* चिंतन विकृत हो जाता है।

वीर्यक्षय से विशेषकर तरूणावस्था में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं - 

  चेहरे पर मुँहासे , नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखाएँ, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, दुर्बलता,  आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, शिरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्नदोष व मानसिक अशांति।

अगर ग्रुप  में  किसी  भाई  को ये समस्याएँ हैं  तो उपाय भी  लिख रहा हूँ  -

लेटकर श्वास बाहर निकालें और अश्विनी मुद्रा अर्थात् 30-35 बार गुदाद्वार का आकुंचन-प्रसरण श्वास रोककर करें।
ऐसे एक बार में 30-35 बार संकोचन विस्तरण करें। तीन चार बार श्वास रोकने में 100 से 120 बार हो जायेगा।
 यह ब्रह्मचर्य की रक्षा में खूब मदद करेगी। इससे व्यक्तित्व का विकास होगा ही,  व ये  रोग भी दूर होंगे समय के साथ ।।
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3. वीर्य  रक्षण  से  लाभ -

शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव,  कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है।
ऐसे  व्यक्ति  को जल्दी  से कोई  रोग नहीं  होता है  उसमें  रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है  ।

पहले के जमाने में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। और  उस वक्त में  यहाँ वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए  । 

भगवान बुद्ध  ने कहा है -  ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’

स्वामी रामतीर्थ  ने कहा है - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।

पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन होने पर योगी पश्चाताप करता है।

भगवान शंकर ने  कहा  है-
'इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान महिमा हुई है।'

कुछ  उपाय  -

ब्रह्मचर्य जीवन जीने के लिये सबसे पहले ‘मन’ का साधने की आवश्यकता है।
 भोजन पवित्र एवं सादा होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए।
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1.   प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएँ।
2.    तेज मिर्च मसालों से बचें। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन करें।
3.    सभी नशीले पदार्थों से बचें।
4.    गायत्री मन्त्र या अपने ईष्ट मन्त्र का जप व लेखन करें।
5.    नित्य ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करें।
6.    मन को खाली न छोड़ें किसी रचनात्मक कार्य व लक्ष्य से जोड़ रखें।
7.    नित्य योगाभ्यास करें। निम्न आसन व प्राणायाम अनिवार्यत: करें-
आसन-पश्चिमोत्तासन, सर्वांगासन, भद्रासन प्राणायाम- भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम विलोम।

जो हम खाना खाते हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है।खाना खाने के बाद रस बनता है जो कि नाडियों में चलता है।फिर बाद में खून बनता है।इस प्रकार से यह क्रम चलता है और अंत में वीर्य बनता है।
वीर्य में अनेक गुण होतें हैं।
 क्या आपने कभी यह सोचा है कि शेर इतना ताकतवर क्यों होता है?वह अपने जीवन में केवल एक बार बच्चॉ के लिये मैथुन करता है।जिस वजह से उसमें वीर्य बचा रहता है और वह इतना ताकतवर होता है।
 जो वीर्य इक्कठा होता है वह जरूरी नहीं है कि धारण क्षमता कम होने से वीर्य बाहर आ जायेगा।वीर्य जहाँ इक्कठा होता है वहाँ से वह नब्बे दिनों बाद पूरे शरीर में चला जाता है।
फिर उससे जो सुंदरता,शक्ति,रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि बढती हैं उसका कोई पारावार नहीं होता है।
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4.  पत्नी  का त्याग  नहीं  करना है -

ब्रह्मचर्य में स्त्री और पुरुष का कोई लेना देना ही नहीं है।
प्राचीन काल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे, ऋषि पत्नियां भी बहुत जागृत और ग्यानी होती थी। आत्मसाक्षात्कार का जितना अधिकार पुरुषो को था उतना ही स्त्रियों को भी था।
 ब्रह्मचर्य को पूर्ण गरिमा प्राचीन काल में ही मिली थी। मैंने एक कथा सुनी थी, एक ऋषि ने अपने पुत्र को दुसरे ऋषि के पास सन्देश लेकर भेजा था, पुत्र ने पिता से कहा की राह में एक नदी पड़ती है, कैसे पार करूँगा।
 ऋषि ने कहा जाकर नदी से कहना,अगर मेरे पिता ने एक पल भी ब्रह्मचर्य का व्रत ना त्यागा हो, स्वप्न में भी नहीं, तो हे नदी तू मुझे रास्ता दे दे।
कथा कहती है की नदी ने रास्ता दे दिया। कैसा विरोधाभास है, एक पुत्र का पिता और ब्रह्मचारी , कैसे ?
जाहिर  है  कि संभोग एक बार  सन्तानोपत्ति  के  लिए  किया गया था , आनंद के लिए  नहीं  ।
बुद्ध और महावीर के बाद हज़ारों युवक अपनी पत्नियों को घर को छोड़ कर भिक्षु बन गए , तब ब्रह्मचर्य का अर्थ सिर्फ स्त्री निषेध बन गया।

नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग के बिना सृष्टि का व्यवस्थाक्रम नहीं चल सकता।
 दोनों का मिलन कामतृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होता, वरन घर बसाने से लेकर व्यक्तियों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवित्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही सम्भव होता है।

अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों की, पाप-पतन की जड़ है।
इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
 इस सनक में लोग घर छोडक़र भागने में, स्त्री बच्चे को बिलखता छोडक़र भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े।

तंत्र के पथिको ने आज्ञा चक्र में अर्ध नारीश्वर की कल्पना की है, यह कल्पना नहीं यथार्थ है, विज्ञान भी स्वीकारता है, की, हर स्त्री में एक पुरुष विद्यमान है और हर पुरुष में एक स्त्री।

जब साधक या साधिका की चेतना आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है, जब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र का भेदन करती है तो काम ऊर्जा राम ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है, साधक जीव संज्ञा से शिव संज्ञा में प्रविष्ट हो जाता है।
 आज्ञा चक्र में पुरुष साधक को अपने भीतर की स्त्री का दर्शन होता है और स्त्री साधक को अपने भीतर के पुरुष का, जैसे ही यह दर्शन मिलता है, वैसे ही बाहर की स्त्री या पुरुष विलीन हो जाता है, खो जाता है।
 बाहर की स्त्री या पुरुष में रस ख़त्म हो जाता है, आप अपने भीतर के पुरुष या स्त्री को पा लेते हैं, और साथ ही आप आतंरिक या आध्यात्मिक सम्भोग के रहस्य को जान लेते हैं, जो पंचमकार का एक सूक्ष्म मकार है।
यह बिलकुल उसी तरह होता है , जैसे खेचरी मुद्रा में साधक ललना चक्र से टपकने वाली मदिरा का पान करके आनंद में रहता है। जैसे ही आपको भीतर का सौंदर्य मिलता है, बाहर का सौंदर्य खो जाता है ।
संसार की स्त्री या पुरुष में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है, कोई रस नहीं रह जाता है, यही वो घडी है, जब ब्रह्मचर्य आपके भीतर से प्रस्फूटित होता है. अब आप वो नहीं रहे आप रूपांतरित हो जाते हैं, यही वो जगह है जहाँ शिवत्व घटता है । 

5.  कमेन्टस  में   चर्चा   -

एक बात  ध्यान  रखना है  चर्चा  में  कि यहाँ  माता-बहने  भी  हैं  तो शब्दों  का ख्याल  रखना है  ,  कामुक या गंदे  शब्दों  से परहेज  करना है  जहां  तक हो सके ।

शादीशुदा व्यक्ति पूर्ण  ब्रह्मचर्य  ना रख सकें  तो भी  संयमित  जीवन  अवश्य  व्यतीत  करना चाहिए  ।

अगर कोई  कहता है  कि  यौन इच्छाओं  को दबाने  से नपुंसकता  आ जाएगी  या  दबाने  से अच्छा  है  भोग लो ,  तो  भाई  ऐसा  है  कि उपर  लिखी  दिनचर्या  अपनाओगे तो यौन इच्छाएँ  पैदा  ही  नहीं  होगी  ,
मन निर्मल  तो तन निर्मल  ।।

अगर  कोई  कहे  कि  संभोग    8-10  दिन  इतना ज्यादा  करो  कि घृणा  हो जाए , तो भाई  ऐसा  है  कि  नसें उभर आएंगी  , पीड़ा  भी  महसूस  करोगे , संभोग  से  मन उचट भी  जाएगा ,  परन्तु  .....
महिने 2-3   में  वीर्य  बनने पर ,  कामुक  साहित्य  , नेट पर अशलील चीजें  देखने पर , नारी  को गलत भावना  से देखने पर फिर  से काम वेग उठेगा , तुम फिर  बह जाओगे।

इसलिए  ये  सोचना  बिल्कुल  गलत होगा कि  8-10  दिन  जमकर करो तो घृणा  हो जाएगी  सदा के लिए । ।

साधना पर भी  प्रभाव  पडेगा  ,  जो व्यक्ति  कामुक है  ,  उसके  विचार  भी  वैसे  चलेंगे  ,  ज्यादा  वीर्य  नष्ट  करने  से  शरीर  में  शक्ति  का संचार कम होगा ,  वह  1 घण्टे  तक  ज्ञान मुद्रा  में  ही  नहीं  बैठ पाएगा  । अजय कर्मयोगी

रविवार, 12 अगस्त 2018



बाणस्तंभ’*
..................‘इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय हैं. इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता हैं, की हम आश्चर्य में पड जाते हैं. पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव हैं..?
......करीब डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था, इस पर विश्वास ही नहीं होता..!

गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती हैं. वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा हैं. १२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग हैं सोमनाथ..!.... एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द था की की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी. अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए. उसे लूटा गया. सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए. इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था.........

लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं हैं. सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर हैं. विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता हैं. और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी हैं. न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई हैं.

*इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) हैं. यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता हैं. यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन हैं.* लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता हैं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ हैं. उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा. यह एक दिशादर्शक स्तंभ हैं, जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण हैं. इस बाणस्तंभ पर लिखा हैं –

*‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत*
*अबाधित ज्योतिरमार्ग..’*

इसका अर्थ यह हुआ – ‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं हैं.’ अर्थात ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं हैं’.

*जब मैंने पहली बार इस स्तंभ को देखा और यह शिलालेख पढ़ा, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए. यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था........? कैसे संभव हैं..? ......और यदि यह सच हैं, तो सोचिये की हम कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर संजोये हुए हैं..!*

संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं. इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं की ‘सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता हैं’. क्या यह सच हैं..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो हैं, लेकिन उतना आसान नहीं.

गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता हैं, लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता हैं. वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं) नहीं आता हैं. अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता हैं.

किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता हैं. अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी को दक्षिणी धृव हैं, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहां से आया..? अच्छा, अगर ये मान भी लें की दक्षिण धृव ज्ञात था ...................... तो भी *सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता हैं, यह जबरदस्त निर्धारण किसने किया होगा ..? कैसे किया..?
.........सब कुछ अद्भुत ज्ञान था ..!!*

इसका अर्थ यह हैं की *‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल हैं, इसका ज्ञान था. इतना ही नहीं, पृथ्वी को दक्षिण धृव हैं (अर्थात उत्तर धृव भी हैं) यह भी ज्ञान था.* यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?

नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता हैं. अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते हैं. यह प्राचीन शास्त्र हैं. इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे. परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं हैं. हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता हैं. इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था. किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था. उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया हैं. इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था.

आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन १४९० के आसपास तैयार किया था. ऐसा माना जाता हैं, की कोलंबस ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था.

‘पृथ्वी गोल हैं’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था. ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था. ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था.

लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते हैं. इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर *आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडोंके अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया. आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया हैं. इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा हैं, जो नाममात्र हैं..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?*

सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नक्शा  शास्त्र अत्यंत विकसित था. नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे.

भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था. संपूर्ण दक्षिण एशिया  में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता हैं की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे. सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं. इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं.

सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता हैं की *दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं हैं, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?*

उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया हैं, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?

यह आज भी प्रश्न ही हैं..!

सोमवार, 23 जुलाई 2018

माओवादी और मिशनरीज की रोटी पर पलता अग्निवेश फर्जी गेरुआधारी है: वस्तुतः ईसाई है: वेटिकन का प्यादा है अग्निवेश।

सोनियाँ सरकार में बड़ी दलाली का काम वही कर सकता था जो रोमन कैथोलिक ईसाई हो। आपको पता होना चाहिए कि सोनियाँ काँग्रेस के शासनकाल में सबसे बड़े लायजनर्स में अग्निवेश की गिनती होती थी। अग्निवेश सत्ता के गलियारे के चमकते सितारे थे उन दिनों। अग्निवेश की कृपा प्राप्त हो जाने पर सोनियाँ सरकार में बड़े से बड़ा काम करा लेते थे लोग।

अग्निवेश का जन्म हुआ आंध्रप्रदेश में। पले बढ़े पढ़े छत्तीसगढ़ में और जीवन भर काम किया मिशनरीज और माओवाद के लिए। विनायक सेन जैसे दुर्दांत माओवादी को सोनियाँ सरकार के सहारे फाँसी से बचा लेने का चमत्कार कर दिखाया था अग्निवेश ने। आज तक भी विनायक सेन की गर्दन फाँसी के फंदे तक न पहुँच सका। यह सोनियाँ की शक्ति नहीं है यह चर्च की शक्ति का परिणाम है।

अग्निवेश एक संगठन चलाता है सर्व धर्म संसद। उस संगठन की जहाँ भी बैठक होती है वहाँ सर्व धर्म के नाम पर केवल चर्च का बोलबाला होता है। और सनातन धर्म का स्वयंभू प्रतिनिधि हर बार अग्निवेश ही होता है। अर्थात यह सर्व धर्म संसद केवल चर्च की संसद बनकर रह गया है। या यूँ कहें कि चर्च के हितों को ध्यान में रखकर ही यह संगठन बनाया गया है।

19 जून 2009 को G8 सम्मेलन से ठीक पहले रोम में सर्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। आयोजक अग्निवेश थे। चूँकि इस संगठन के सर्वेसर्वा अग्निवेश ही हैं। उस सम्मेलन से तीन दिन पहले सभी डेलीगेट्स भारी सुरक्षा व सुविधा के अंतर्गत भूकंप प्रभावित ला अकीला शहर में ले जाए गए। जहाँ वेटिकन के पादरियों द्वारा मृतकों के लिए सामूहिक प्रेयर का आयोजन हुआ। सारी व्यवस्था वेटिकन ने ही किया था। प्रेयर का आइडिया अग्निवेश का ही था। यदि तुम आर्य समाजी थे और सनातनी थे तो वहाँ वैदिक स्वस्तिवाचन व शांति पाठ भी करवा सकते थे। किन्तु चर्च का प्रेयर जिसको आनन्दित करता हो वह वैदिक शांति पाठ क्यों करेगा?

सर्व धर्म संसद का उद्घाटन संध्या 5 बजे रोम के प्रसिद्ध विला मडामा में हुआ। उद्घाटनकर्ता था कम्युनिटी ऑफ सेंट इडिगो का संस्थापक प्रोफेसर एंड्रिया रिकार्डी। एंड्रिया रिकार्डी चर्च के सम्बंध में ही पुस्तकें लिखता रहा है। इसी लेखन के कारण वह इतिहासकार कहा जाता है। चर्च के विश्वस्त लोगों में से एक वफादार है एंड्रिया रिकार्डी। वही व्यक्ति अग्निवेश के सर्व धर्म संसद का उद्घाटनकर्ता महापुरुष था। अग्निवेश के रिश्ते सम्बंधों को समझने के लिए यह लिंक महत्वपूर्ण है।

अपने वेटिकन के लिंक के कारण ही अग्निवेश लगातार हिन्दू धर्म के विविध तीर्थ, पर्व-उत्सवों और रीति नीति पर आक्रमण करता रहा है। अग्निवेश का माओवाद के साथ गहरा संबंध भी उसके हिन्दू विरोधी होने का एक प्रमुख कारण रहा है। अग्निवेश झारखंड और छत्तीसगढ़ के माओवादियों से बड़े निकट से जुड़ा रहा है। इन दोनों राज्यों के चर्च और मिशनरीज से भी अग्निवेश के बड़े गहरे संबंध रहे हैं। अग्निवेश इनके लिए अनेकों बार काम करता हुआ दिखाई देता है।

अभी की अग्निवेश की झारखंड यात्रा भी चर्च के लिए ही थी। अग्निवेश राँची के समीप खूँटी में वहाँ के सभी मिशनरीज के प्रमुख लोगों से मिलकर उनको साहस देने का काम किया। हीलिंग टच टू मिशनरीज। बच्चा बेचने वाली घटना में सिस्टर कोनसिलिया और सिस्टर मेरिडियन के पकड़े जाने और अपराध स्वीकार कर लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा मिशनरीज ऑफ चैरिटी के ठिकानों पर पड़े छापे के बाद मिशनरीज की चूलें हिल गई हैं।

भारत का कैथोलिक विशप थियोडोर मैशकरेनहैस इस छापे के तुरंत बाद दिल्ली से दौड़ते हुए राँची पहुँचा था। किंतु उसके वहाँ जाने और दलाली के तमाम प्रयत्न विफल रहे तब दलाल शिरोमणि अग्निवेश को थियोडोर मैशकरेनहैस ने खूंटी भेजा। पाकुड़ यात्रा लोगों को भ्रमित करने के लिए आयोजित किया गया था।
किन्तु कुछ नैजवानों के आक्रामक रवैये ने सारा भ्रम निवारण कर दीया पर इसकी संरचना इसने स्वयं तैयार किया था
  जी 8 सम्मेलन होने से पहले और बच्चे बेचने के आरोप में चर्च पर शिकंजा कसता जा रहा था इसके दोनों नन गिरफ्तार हो चुके थे जिसके लिए यह एक प्रमुख नाटक करना आवश्यक हो गया था यह वेटिकन का आदेश था

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018



आज हम अमेरिका और पश्चिमी देशों की नकल में अपने बच्चे को बर्बाद कर रहे हैं और पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था की तरफ भागे जा रहे हैं वही अमेरिका वायरल हुआ यह वीडियो  स्पष्ट  बताता है की अमेरिका के लोग भारत के उस पुरानी पनिशमेंट सिस्टम दंड व्यवस्था को कैसे अपना रहे हैं सुपरपावर ब्रेन योगा नाम से।
 हमारी बच्चों को पढ़ाने की लिए बच्चों के दंड की जो व्यवस्था थी  आज सारे अमेरिकी दंड भुगत भुगतने में अपने को गर्व महसूस करते हैं और इस दंड को लेने के लिए वह बकायदा  भुगतान भी करना पड़ता है और डॉक्टर का एक विधिवत प्रिस्क्रिप्शन भी है यह  लिंक में दिए गए वीडियो को देखने के बाद आप स्वयं अपना निर्णय स्वयं करें
 अजय कर्मयोगी
 https://youtu.be/5H1pRDWJOfo

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...