मंगलवार, 18 सितंबर 2018

बाजार की कोई भी डिब्बा बंद चीज में कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए जो वस्तु मिलाई जाती वह एक धीमा जहर जो खाने वालों की जान तक ले लेती है |डिब्बेपैक फलों के रस से बचोः
बंद डिब्बों का रस भूलकर भी उपयोग में न लें। उसमें बेन्जोइक एसिड होता है। यह एसिड तनिक भी कोमल चमड़ी का स्पर्श करे तो फफोले पड़ जाते हैं। और उसमें उपयोग में लाया जानेवाला सोडियम बेन्जोइक नामक रसायन यदि कुत्ता भी दो ग्राम के लगभग खा ले तो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। उपरोक्त रसायन फलों के रस, कन्फेक्शनरी, अमरूद, जेली, अचार आदि में प्रयुक्त होते हैं। उनका उपयोग मेहमानों के सत्कारार्थ या बच्चों को प्रसन्न करने के लिए कभी भूलकर भी न करें।

'फ्रेशफ्रूट' के लेबल में मिलती किसी भी बोतल या डिब्बे में ताजे फल अथवा उनका रस कभी नहीं होता। बाजार में बिकता ताजा 'ओरेन्ज' कभी भी संतरा-नारंगी का रस नहीं होता। उसमें चीनी, सैक्रीन और कृत्रिम रंग ही प्रयुक्त होते हैं जो आपके दाँतों और आँतड़ियों को हानि पहुँचा कर अंत में कैंसर को जन्म देते हैं। बंद डिब्बों में निहित फल या रस जो आप पीते हैं उन पर जो अत्याचार होते हैं वे जानने योग्य हैं। सर्वप्रथम तो बेचारे फल को उफनते गरम पानी में धोया जाता है। फिर पकाया जाता है। ऊपर का छिलका निकाल लिया जाता है। इसमें चाशनी डाली जाती है और रस ताजा रहे इसके लिए उसमें विविध रसायन (कैमीकल्स) डाले जाते हैं। उसमें कैल्शियम नाइट्रेट, एलम और मैग्नेशियम क्लोराइड उडेला जाता है जिसके कारण अँतड़ियों में छेद हो जाते हैं, किडनी को हानि पहुँचती है, मसूढ़े सूज जाते हैं। जो लोग पुलाव के लिए बाजार के बंद डिब्बों के मटर उपयोग में लेते हैं उन्हें हरे और ताजा रखने के लिए उनमें मैग्नेशियम क्लोराइड डाला जाता है। मक्की के दानों को ताजा रखने के लिए सल्फर डायोक्साइड नामक विषैला रसायन (कैमीकल) डाला जाता है। एरीथ्रोसिन नामक रसायन कोकटेल में प्रयुक्त होता है। टमाटर के रस में नाइट्रेटस डाला जाता है। शाकभाजी के डिब्बों को बंद करते समय शाकभाजी के फलों में जो नमक डाला जाता है वह साधारण नमक से 45 गुना अधिक हानिकारक होता है।

इसलिए अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और मेहमान-नवाजी के फैशन के लिए भी ऐसे बंद डिब्बों की शाकभाजी का उपयोग करके स्वास्थ्य को स्थायी जोखिम में न डालें।

सोमवार, 17 सितंबर 2018



  आज हमने शरीर का शोधन किया और   खेचरी मुद्रा का अभ्यास भी किया, जिसका एक छोटा सा वीडियो भी बनाया। योग ग्रन्थों में अनेक योग मुद्राओं का वर्णन है। इनमें से एक  मुद्रा है खेचरी। यह मुद्राओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसमें जीभ को मोड़कर, तालु के पीछे ,ऊपर की ओर स्थित विवर में जीभ के अग्र भाग को लगाया जाता है। हमारे ब्रह्मरन्ध्र से एक रस  24 घन्टे टपकता है जिसे अमृत भी कहा जाता है, जो हमारी नाभि में स्थित अग्नि में जाकर नष्ट हो जाता है।
खेचरी मुद्रा द्वारा इस रस का पान किया जाता है। जो योगी 6 महीने निरन्तर इस मुद्रा  का अभ्यास करता है, वह अपनी इच्छा से शरीर का त्याग करता है। किसी भी विष का प्रभाव उसके शरीर पर नहीं होता। हिंसक जानवर उसको हानि नहीं  पहुचाते। इससे रसानन्द समाधि का लाभ होता है, जो शीघ्र ही सहज समाधि में बदल  जाता है। अनेक विभूतियाँ ऐसे योगी को प्राप्त हो जाती हैं। चलते समय लगता है कि शरीर, जमीन से ऊपर चल रहा है अर्थात् शरीर बहुत हल्का हो जाता है। इस मुद्रा को करने के लिए अनेक गुरु छेदन का उपयोग करते हैं। छेदन में जिह्वा के नीचे स्थित  तन्तु को ब्लेड से हल्का सा काट देते हैं, इसके बाद चालन- दोहन  किया जाता है। छेदन की अपनी हानियाँ भी हैं। कुछ अन्य तरीके भी हैं  जिससे महीने में  ही खेचरी लग जाती है। जब योगी चाहे तब इस मुद्रा  की सहायता से बिन भोजन पानी के भी आराम से रह सकता है।  इस मुद्रा को करने के 2 से 3 घन्टे बाद तक भूख नहीं लगती। ग्रन्थों में  अनेक बातें इस सम्बन्ध में कही गयी हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं -------

●प्रथमं लवण पश्चात् क्षारं क्षीरोपमं ततः। द्राक्षारससमं पश्चात् सुधासारमयं ततः।       
                                     -   (योग रसायनम्)

खेचरी मुद्रा के समय उस रस का स्वाद पहले लवण जैसा, फिर क्षार जैसा, फिर दूध जैसा, फिर द्राक्षारस जैसा और तदुपरान्त अनुपम सुधा, रस-सा अनुभव होता है।

●आदौ लवण क्षारं च ततस्तिक्त कषायकम्। नवनीतं धृत क्षीर दधित क्रम धूनि च। द्राक्षा रसं च पीयूषं जप्यते रसनोदकम।
                              -------(  घरेण्डसंहिता)

खेचरी मुद्रा में जिव्हा को क्रमशः नमक, क्षार, तिक्त, कषाय, नवनीत, धृत, दूध, दही, द्राक्षारस, पीयूष, जल जैसे रसों की अनुभूति होती है।

●अमृतास्वादनाछेहो योगिनो दिव्यतामियात्।      जरारोगविनिर्मुक्तश्चिर जीवति भूतले ।।
                                    ---     (योग रसायनम्)

भावनात्मक अमृतोपम स्वाद मिलने पर योगी के शरीर में दिव्यता आ जाती है और वह रोग तथा जीर्णता से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है।

एक योग सूत्र में खेचरी मुद्रा से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख है-

●तालु मूलोर्ध्वभागे महज्ज्योति विद्यतें तर्द्दशनाद् अणिमादि सिद्धिः।

तालु के ऊर्ध्व भाग में महा ज्योति स्थित है, उसके दर्शन से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है।

ब्रह्मरन्ध्र साधना की खेचरी मुद्रा प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में शिव संहिता में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-

● ब्रह्मरंध्रे मनोदत्वा क्षणार्ध मदि तिष्ठति । सर्व पाप विनिर्युक्त स याति परमाँ गतिम्॥

अस्मिल्लीन मनोयस्य स योगी मयि लीयते। अणिमादि गुणान् भुक्तवा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः॥

एतद् रन्ध्रज्ञान मात्रेण मर्त्यः स्सारेऽस्मिन् बल्लभो के भवेत् सः। पपान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयेदद्भुतं वै॥

अर्थात्-ब्रह्मरन्ध्र में मन लगाकर खेचरी मुद्रा की साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।

●न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैव लस्यं प्रजायते। न च रोगो जरा मृत्युर्देव देहः स जायते॥
                                     -------     (घेरण्ड सहिंता )

खेचरी मुद्रा की निष्णात देव देह को मूर्च्छा, क्षुधा, तृष्णा, आलस्य, रोग, जरा, मृत्यु का भय नहीं रहता।

●लवण्यं च भवेद्गात्रे समाधि जयिते ध्रुवम।
कपाल वक्त्र संयोगे रसना रस माप्नुयात।

शरीर सौंदर्यवान बनता है। समाधि का आनन्द मिलता है। रसों की अनुभूति होती है। खेचरी मुद्रा का प्रकार श्रेयस्कर है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

धर्म के दस अंग या लक्षण धर्म ,मजहब या रिलिजन क्या एक ही है

   


क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?
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अब प्रश्न ये है कि #धर्म क्या है ?
"इति धारयति सः धर्मः" /
अर्थात जो धारण किया जाय वही धर्म है /
तो जिन #गुणों को जीवन मे धारण किया जाय , जो धर्म को परिभासित करते हैं , वे क्या हैं और उनके लक्षण क्या हैं ? तो धर्म के 10 लक्षण होते हैं जिनको धरण करने को ही धर्म कहते है /
क्या हैं वो 10 लक्षण
.धर्म के 10 लक्षण हैं यानि 10 अंग है । उनको जीवन में प्राप्त करना और उसको व्यक्ति के चरित्र का अंग बनाना यानि धारण करना ही धर्म है।
" धृति क्षमा दमोस्तेय च सौच इन्द्रियनिग्रह ।
धी विद्या सत्य अक्रोधम दसकं धर्म लक्षणं ।।
1. धृति = धैर्य
2. क्षमा = करने की क्षमता प्राप्त करना
3. दम = कर्मेंन्द्रियों का दमन
4. स्तेय = चोरी न करना
5. सौच = मनसा वाचा कर्मणा व् शरीर को स्वच्छ रखना
6.धी = बुद्धि विवेक
7. इन्द्रियनिग्रह = ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण
8. विद्या
9. सत्य
10. अक्रोधम = क्रोध पर नियंत्रण रखना।

ये तो हुवा धर्म । लेकिन आम भारतीय कहता है कि सारे धर्म एक ही शिक्षा देते हैं / तो क्या इसमे कोई सच्चाई है ? या ये भी #इसाइ #इस्लामिक और #वामपंथियों का बिछाया हुआ माया जाल है ?
तो क्या #धर्म #मजहब और #रिलिजन के एक ही मायने होते हैं ?? आइये समझते है , आधुनिक #विश्वामित्र_Rajiv Malhotra के ब्लॉग से कि आखिर इन तीनों मे फर्क क्या है ?
#धर्म और #Religion में क्या अंतर है।।
धर्म के अनेक अर्थ हैं जो इस बात पर निर्भर करता है कि किस सन्दर्भ में उसका प्रयोग किया जा रहा है।मोनियर - विलिएम की संस्कृत शब्दकोष के अनुसार इसके अनेक अर्थ हैं जिसमे conduct कर्तव्य अधिकार न्याय गुण नैतिकता ; धर्म के लक्षण , किसी नियम के तहत किया गया सद्कर्म । इसके और भी अर्थ सुझये गए हैं जैसे Law कानून या टोरा ( यहूदी) लोगो (ग्रीक) way / रास्ता (ईसाई) या यहाँ तक की ताओ (चीनी) ।
इनमे से कोई भी शब्द पूरी तरह से समर्थ नहीं है जो संस्कृत शब्द "धर्म" को सच्चे अर्थों में परिभाषित कर सके।पश्चिमी लेक्सिकन में धर्म का समानार्थी कोई शब्द ही नहीं है।

धर्म संस्कृत के धृ धातु से बना है जिसका अर्थ है " जो धारण करता हो ; या जिसके विना किसी वस्तु का कोई अस्तित्व संभव नहीं है। या जो ब्रम्हांड के harmony और स्टेबिलिटी को मेन्टेन रखता है। " धर्म के अंतर्गत कर्तव्य , नियमावली , सदशीलता गुड़ और नीतिशष्ट्र जैसे तमाम चीजों के प्राकृतिक और नैसर्गिक आचरण आते हैं । ब्रम्हांड के प्रत्येक इकाई का एक व्यक्तिगत धर्म होता है - एक इलेक्ट्रान, जिसका धर्म एक निश्चित दिशा में घूमना है , से लेकर बादल गैलक्सी पेड़ पौधे कीट पतंगे और मनुष्य सबका। मनुष्य के निर्जीव वस्तुओं के धर्म को समझने को ही हम भौतकी या फिजिक्स कहते हैं ।
ब्रिटिश उपनिवेशकारों ने रिलिजन के विचारों के आधार पर धर्म को समझने और समझाने (mapping) करने की कोशिस की जिससे वे भारतवासियों को समविसट कर सकें और उनको शासित कर सकें : उसके बाद भी धर्म की अवधारणा क्षदमवेशी (Elusive) ही रही।धर्म का रिलिजन में अनुवाद एक भ्रामक तथ्य है ; क्योंकि पश्चिमवासियों के अनुसार एक सच्चे रिलिजन के निम्नलिखित अनिवार्य अंग होते हैं :
(1) ये एक हु बहू परिभाषित ऐतिहासिक घटना पर आधारित God द्वारा प्रदत्त एक क़ानूनी किताब पर आधारित हैं ।
(2) एक ऐसी दैवीय शक्ति की प्रार्थना होनी चाहिए जो हमसे और ब्रम्हांड से अलग हो।
(3) किसी मानवीय संस्था से संचालित होनी चाहिए / जैसे चर्च :
(4) जिसमे औपचारिक सदस्य हों
(5) जो नियुक्त पुरोहित / पादरी द्वारा संचालित होना चाहिए।
(6) एक तयशुदा अनुष्ठानपन का ही पालन किया काना चाहिए।
लेकिन #धर्म किसी विशेष् स्वीकृत मत / मजहब या किसी विशेष पूजविधो से बंधा नहीं होता। किसी पश्चिम वासी के लिए "नास्तिक वृत्ति का ( Atheistic) religion " अपने आपमे एक विरोधाभाषी शब्द है। लेकिन बुद्धिज़्म जैनिज़्म और चार्वाक धर्म में किसी परंपरागत ईश्वर का कोई स्थान नहिं है ;कुछ हिन्दू विधाओं में तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही विवाद है ; और न ही किसी एकमात्र देवता की पूजा की जाती है , और व्यक्ति अपने इष्टदेवता का चयन करने को स्वतंत्र है।
#धर्म जीवन के हर पहलु के सामञ्जस्यपूर्ण पूर्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करता है ; जैसे अर्थ काम और मोक्ष।अतः रिलिजन धर्म के विस्तृत एवरूप का मात्र एक हिस्सा (subset) भर है।
रिलिजन सिर्फ मनुष्य मात्र पर लागू होता है ,पूरे ब्रम्हांड पर नहीं ; इलेक्ट्रान बन्दर पौधों और गैलक्सी का कोई रिलिजन नहीं है , जबकि इन सबका अपना अपना धर्म है चाहे वे उसका पालन निरुद्देश्य ही क्यों न करते हों ।
चूँकि मानवता का सार उसके देवत्व (divinity) में है ; इसलिए सब अपने #धर्म को व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर , बिना बाहरी हस्तक्षेप के या इतिहास का सहारा लिए बिना भी जान सकते हैं । पाश्चात्य religions में एकमात्र संगठित केंद्रीय सत्ता है जो ऊपर से ( नियम /कानूनों) को प्रकट करती है और शासित करती है।
धार्मिक परम्पराओं में अधर्म का अर्थ मनुष्य को अपने दयित्वों को सही तरीके से न निभा पाने के अर्थों में लिया जाता है ; इसका अर्थ ये कत्तई नहीं होता कि एक मान्यताप्राप्त विश्वास के प्रस्ताव को अस्वीकार करना , या फिर तयशुदा कानूनों (Commandments/ Canaons) का उल्लंघन करना।
#धर्म का अनुवाद प्रायः 'विधि' (Law) में भी किया जाता है , लेकिन अगर यह विधि है तो इसके कुछ तयशुदा विधान/ नियम भी होने चाहिए :
(1) इसको एक अथॉरिटी द्वारा प्रख्यायित (promulgated) और निर्णीत (डिक्री) किया जाना चाहिए , जिसकी एक निर्धारित क्षेत्र में सार्वभौमिक राजनैतिक सत्ता स्थापित हो।
(2) ये अनिवार्य और बाध्यकारी होना चाहिए
(3) किसी कोर्ट द्वारा व्याख्या निर्णय और बलपूर्वक क्रियान्वयन होने की व्यवस्था भी होनी चाहिए
(4) इन विधानों को भंग करने पर सजा/पेनाल्टी होनी चाहिए।
लेकिन धर्म की परम्परा में ऐसा कोई व्याख्या उपलब्ध नही है।
रोमन सम्राट कांस्टिन्टिने ने धर्मविधान (canon laws) के सिस्टम की शुरुवात की जिसका निर्धारण और बलपूर्वक क्रियान्वयन चर्च किया करता था। यहूदी ईश्वर का आधारभूत स्रोत इज़राइल का ईश्वर (God) था। पश्चिमी रेलिजन इस बात से सहमति जाहिर करते हैं कि ईश्वर के विधानों (Laws ऑफ़ God ) का पालन अवश्य होना चाहिए क्योंकि ये सार्वभौमिक सत्ता का ईश्वरीय आदेश है। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण (critical) हो जाता है कि झूठे ईश्वरों (false Gods) की निंदा/ भर्त्सना किया जाय और उनको पराजित किया जाय; क्योंकि वे सच्चे विधि (true laws) को कमजोर करने के लिए नकली (illigitimate) आदेश पारित कर सकते हैं ।और यदि कई ईश्वरों (dieties) के अस्तित्व को स्वीकार किया गया तो ये निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति पैदा होगी कि सच्चा विधि/विधान कौन सा है।
वहीँ दूसरी तरफ (धर्म में ) ऐसे किसी भी सार्वभौमिक सत्ता का रिकॉर्ड / जिक्र नहीं है जो किसी क्षेत्र विशेष में या विशेष समयकाल मे, बिभिन्न धर्म -शास्त्रो (Texrs of Dharma for society) को व्याख्यायित करता हो , और न ही ऐसा कोई दावा कि ईश्वर ने उन सामाजिक विधानों (शाश्त्रो) के रहस्य को स्वयं बताया (revealed) हो, या फिर किसी शासक द्वारा उनका पालन करवाया जाना बाध्यकारी हो । सामजिक विधानों के किसी भी धर्म शाश्त्र के रचयिता को किसी भी राजा द्वारा नियुक्त नहीं किया गया था , और न ही उन्होंने कानून प्रवर्तक (Law Enforcer) की भूमिका में किसी (राजसत्ता ) को अपनी सेवाएं अर्पित की थी , या कभी भी किसी राजसत्ता के किसी भी रूप में कोई अंग रहे थे । वे आधुनिक काल के विधि वेत्ता (Jurists) के बजाय आज के सामजिक विज्ञानियों के समतुल्य थे।प्रसिद्द याज्ञवल्क स्मृति की रचना एक तपस्वी द्वारा सुदूर अभ्यारण्य में किया गया था।प्रसिद्द मनुस्मृति की रचना मनु के आश्रम में की गयी थी जिसकी शुरुवात में ही वे बताया गया है कि , उन्होंने समाधिस्त अवस्था में पूंछे गए प्रश्नो का उत्तर दिया था।मनु (1-82) में वे ऋषियों को बताते हैं कि हर युग का अपना अलग विशिष्ट सामाजिक और व्याहारिक धर्म होता है ।
धर्मशाष्ट्र किसी भी नियम को बलपूर्वक बाध्यकारी नहीं बनाते ; बल्कि एक प्रचलित परिपाटी का वर्णन भर करते हैं।कई परम्परागत स्मृतियाँ (Codified Social Dharma ) किसी वर्गविशेष (community) की प्रचलित स्थानीय रीतिरिवाज का ही वर्णन करती हैं ।( इनमे अन्तर्निहित ) महत्वपूर्ण सिद्धांत ये था कि वर्गविशेष के अंदर से ही आत्मनियंत्रण और अनुशासन को स्थापित करना। स्मतीतियों ने धर्मोपदेशक के आसन पर बैठकर कोई रूढ़िवादी विचार न लादने का दावा करती थी , न करती हैं ; जब तक कि 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशी शासकों ने , स्मृतियों की जगह सत्ताधारी शासकों द्वारा बनाये गए कानूनों को बाध्यकारी बनाया।
धर्म की महिमा गिराकर उसका रिलिजन और विधि के कांसेप्ट से तुलना करने नुकसानदायक परिणाम हुए हैं : धर्म के अध्ययन को पश्चिम के चश्मे से पढ़ा जाने लगा है , जो इसको इसके खुद के स्थापित प्रतिमानों से बहुत दूर ले जाकर खड़ा करता है।
इसके अतिरिक्त ये धर्म के बारे में एक गलत अवधारणा पैदा करता है कि धर्म , विधिनियमक चर्चों , जो सत्तासंघर्ष में शामिल है , उसी के समतुल्य है।
भारत में धर्म की रिलिजन से तुलना एक अनर्थकारी कार्य सिद्ध हुवा है; #सेकुलरिज्म के नाम पर धर्म को उन्ही बंधनों में जकङ दिया गया है , जैसे ईसाइयत को यूरोप में ।
एक Non Religious समाज भी ईश्वर में आश्था न रखने के बावजूद भी अपनी नैतिकता को बचाकर रख सकता है ;लेकिन एक अ-धार्मिक समाज अपनी नैतिक दिसा खो बैठता है और भ्रस्टाचार और अधोपतन की खाई में गिर जाता है ।
नोट- अनुवाद है राजीव मल्होत्रा के इस लेख का।
लेख थोड़ा लंबा है / परंतु पढ़ें अवश्य / और शेयर न करें / कॉपी और पेस्ट करें /

हिन्दू काल गणना - विकिपीडिया
प्राचीन हिन्दू खगोलीय और पौराणिक पाठ्यों में वर्णित समय चक्र आश्चर्यजनक रूप से एक समान हैं। प्राचीन भारतीय भार और मापन पद्धतियां, अभी भी प्रयोग में हैं (मुख्यतः हिन्दू और जैन धर्म के धार्मिक उद्देश्यों में)। यह सभी सुरत शब्द योग में भी पढ़ाई जातीं हैं। इसके साथ साथ ही हिन्दू ग्रन्थों मॆं लम्बाई, भार…
#धर्म_मजहब_रेलीजन  क्या एक ही चीज है ?
पैगंबर प्रॉफ़ेट और ऋषि क्या एक दूसरे के समकक्ष हैं ?
हममें से बहुतायत लोग जो माइकाले के भूत से अभी भी प्रभावित है , वो  तीनों को एक ही मानते हैं / क्योंकि हम अनुवाद के गुलाम हैं / पिछले 250 साल से हम अङ्ग्रेज़ी से हिन्दी मे अनुवाद पढ़ते आए हैं , और उसको सच मानते हैं /
लेकिन क्या वाकई मे ऐसा है ?
दुनिया के तीन मजहब या रेलीजन यहूद इसाइयत और इस्लाम एक ही कुल से निकले हैं जिनको अब्राहमिक रेलीजन कहते हैं / जिसमे god या अल्लाह एक माध्यम (mediator ) के जरिये अपना संदेश आमजन तक पहुंचता है , जिसको प्रॉफ़ेट या पैगंबर कहते हैं / उस प्रॉफ़ेट का कोई विशेष शिक्षा  साधना तप जप करना , और उसमे पारंगत होना जरूरी नहीं है / बस वो god या अल्लाह का प्रिय व्यक्ति हो , और उसका चुना हुआ व्यक्ति हो / Noah (नूह  )  से लेकर मूसा ईशा और पैगंबर मोहम्मद तक यही सिद्धान्त रहा है ओल्ड टेस्टमेंट  के हिसाब से / और उस मजहब या रेलीजन के लोगों को god / अल्लाह के प्रॉफ़ेट या पैगंबर के माध्यम से दिये गए संदेशों को एक होली बुक मे संकलित किया गया है जोकि उस खास समुदाय के लिए code of conduct है /
जबकि धर्म के मामले मे न तो प्रॉफ़ेट का कोई स्थान है न किसी खास होली बुक की / और ऋषि बनने के लिए शिक्षा साधना जप तप आवश्यक है / वो किसी खास समुदाय के लिए नहीं है , पूरे विश्व की अवधारणा है

रविवार, 9 सितंबर 2018






करीब पच्चीस साल पहले, तारामंडल, मुंबई के निदेशक थे भौतिक वैज्ञानिक डॉक्टर सुब्रह्मण्यम। वैज्ञानिक थे पर जनेऊ पहनते थे। एक बार टाईम्स के पत्रकार ने उनसे पूछा… आप तो वैज्ञानिक हैं फिर ये जनेऊ क्यों और कैसे? जनेऊ क्यों पहनते हैं आप? उनका जवाब कालजयी था।
उन्होंने कहा…
“मैं खगोलविद हूं। आसमान देख रहे हैं, भौतिकी का वो हिस्सा है हमारा क्षेत्र, अनंत। भौतिक आकाश में ये जो तारे हैं, वो क्या हैं? मैं तारामंडल का निदेशक क्यों हूं?
विज्ञान, दरअसल भविष्य का अतीत है। जब भी मैं तारों भरा आकाश देखता हूं, तो मैं अतीत में देख रहा होता हूं। ये तारे… वक्त की अलग अलग समतल की परतों में हैं और वे परतें, उस वक्त की हैं; जब हमारे पुरखे इस दुनिया में थे। ये तारे मेरे पूर्वजों के वक्त के हैं, जो मुझे दिख अभी रहे हैं। इस तरह पूरा आकाश मुझको, मेरे पुरखों से, मेरे पीतरों से जोड़ता है।
उसी तरह ये जनेऊ भी मुझको मेरे पुरखो से जोड़ता है।
मेरे पूर्वजों के गुणसुत्रों से ही मेरा वजूद है। मैं जो दिखता हूं और जो मैं हूं उनके सूत्रों से। ये जनेऊ भी तो सूत्र ही है… उनके भौतिक और जैविक नहीं, उनके आध्यात्मिक और वैचारिक गुणों का सूत्र। उनके वचन, संकल्प, आचरण और जीवन मूल्यों का सूत्र… इसी से मैं वैज्ञानिक होकर भी जनेऊ पहनता हूं। कि वक्त में डोर में लिपटे, विचार धागे हैं ये, मेरे पुरखों के विचार के धागे।”
कमाल कहा उन्होंने
कभी गौर किया कि जनेऊ धागा क्यों है? उसके परवल और तानी की खास गिनती क्यों है? वे मूल्य हैं… जीवन के मूल्य, जीने के एक खास तरीके का वचन, एक रिवायत, एक संस्कार के सूत्र। धागे ही सूत्र होते हैं। और संसार सूत्रों से ही बंधा हुआ है… धागों से…
तो जनेऊ पहनने से अच्छा इसलिए लगता है कि आप फौरन अपने पूर्वजों के आदर्शों, वचनों और मूल्यों से, अपनी जड़ों से जुड़ जाते हैं। अनायास आपकी एक सांस्कृतिक पहचान स्थापित हो जाती है, जो सीधा आपको आपके पीतरों से जोड़ती है… अपनी जड़ों से जोड़ने वाला धागा है, सूत्र है… जनेऊ।
और जड़ से जुड़ते, हरियाली तो छाती ही है, एक गरिमाबोध, एक संबल, आत्मबल तो आता ही है भीतर। तंतुओं की शक्ति से ही संसार चलायमान है। भौतिकी यही करता है… वो उन्ही तंतुओं की पड़ताल करता है। और हमारे जीवन मूल्य भी तंतुओं के बूते ही हम तक स्थानांन्तरित है। जनेऊ उसी से गरिमा और गौरव भरते हैं तन और मन में कि वो तंतु हैं..
कभी यज्ञोपवीत संस्कार की विधि पर गौर कीजिए।
पहले मूंज की डोर होती है… फिर धागा होता है…
जनेऊ… खरीदे नहीं जाते थे… वे काते जाते थे… घर की मां, दादी यानि अनुभवी बुजुर्ग महिलाएं, तकली या चरखे पर जनेऊ कातती थीं। वे उसे मेड़ातीं (कई स्तरों पर फोल्ड, उमेंठन) करतीं थी। ये फोल्ड निर्धारित होते थे। परिवार की बुजुर्ग दादी, नानी, के हाथ से प्रेम और श्रद्धा बना जनेऊ… आशीर्वाद और मंगलकामनाओं से परिपूर्ण होता था। (बाद में ये बस पुरोहिताईन का काम रह गया। और अब तो वे भी बाजार से ही खरीदते हैं। बाजार ने सब बेच दिया। आशीर्वादों और मंगलकामनाओं तक का धंधा कर लिया।) खैर…
प्रेम से बने, मां के हाथ के पकवान का स्वाद क्यों होता है अदभुत? क्योंकि सूत्र होता है वहां, स्नेह सूत्र।
वैसा ही जनेऊ में भी होता था। जब भी बाबा, दादी से धोती मांगते होंगे… और दादी या मां; जिस श्रद्धा से धोती निकाल देती होंगी, वो आदर… एक गरिमापूर्ण रिश्ता स्थापित करता है। बिहार में धोतियां मोड़ी नहीं जातीं, उमेंठीं जाती हैं, रस्सियों की तरह। ऐंठन… उमेंठन… फिर वही सूत्र है… डीएनए भी उमेंठा ही हुआ है। ये जनेऊ में वही ऐंठन और उमेंठन है।
डीएनए की तरह, धोती और जनेऊ की ये उमेंठन भी अक्सर घर की स्त्रियों के हाथों ही दी गयीं होतीं थीं।
तो सूचनाएं सदैव उमेंठन के तरीके से ही बहती हैं। चाहे संस्कार की सूचना हो या संचार की सूचना। जनेऊ पीतरों से हम तक आने वाली सूचनाओं की उमेंठन है।
जनेऊ पहनने से इसीलिए एक गरिमाबोध होता है। वो सूत्र बंधन है… सदाचार के आचरण की वचनबद्धता। वो पीतरों के मूल्यों की रक्षा का संकल्प है।
जनेऊ हमें अपने पूरखों से जोड़ता है… इसी से उसे पहन खुद में आत्मविश्वास और सुरक्षा भाव आता है कि हम प्राचीन हैं… और लंबे अतीत के अभिभावकों की मंगल कामनाओं, आशीर्वचनों से आरक्षित और संरक्षित हैं।
वंदे मातरम जय गौ माता अजय कर्मयोगी

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018



भूमिगत जल, वृहत्संहिता 
[हमारी शिक्षा और व्यवस्था
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अंकल सैम छाती ठोक कर आपको बतायेंगे कि कैसे धरती फोड और आकाश फाड कर जो भी ज्ञान संभव है, उन्होंने हासिल किया है। ब‌डी बडी सेटेलाईट अब आसमान से नीचे आँख़ें गडाये  तकती रहती हैं और बताती हैं कि कहाँ कहाँ धरती के भीतर पानी मिलेगा। ठीक है कि विज्ञान जितना विकसित होगा, उसके आकलन उतने ही सटीक होंगे। तथापि यह विवेचना आवश्यक है कि जब आसमानी आँखें नहीं थी तब क्या धरती के भीतर झांकने की कोई कोशिश नहीं हुई? कूप-तडागों वाला भारत कब से यह जानता था कि धरती की भीतरी सतहों में कहाँ कहाँ जल उपलब्ध हो सकता है तथा कहाँ से और कैसे उसको बाहर निकाला जा सकता है? हमारी पाठ्यपुस्तकें इस विषय पर बहुत नीरस हैं तथा सीधे जल चक्र से आरम्भ होती हैं। कुल मिलाकर वही गोल गोल कि पानी से भाप निकलती है फिर बादल बन कर बरस जाती है। बरसो जितना जल हो बल हो, लेकिन मालूम तो हो कि पानी फिर जमीन के भीतर प्रवेश कैसे करता है, कहाँ छिपा बैठा रहता है और उसकी तलाश के मुख्यविन्दु क्या हो सकते हैं। हमने बडे बडे शब्द चुन लिये हैं जैसे जियोलॉजी, जियोमॉर्फोलॉजी और हाईड्रोलोजी जिनके समन्वयन से आज प्रयास किया जाता है कि जमीन के भीतर का ज्ञान हासिल हो। सगर्व यह सब मॉडर्न साईंस का हिस्सा और देन माना गया है। हमारी पाठ्यपुस्तकें तो ख़ुदा खैर करे छुईमुई का पौधा हैं कि  किसी ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ की समयावधि मध्यकाल से नीचे सरकी तो फिर अक्षरों का रंग भगवा मान लिया जाता है और मिथक मिथक का कोलाहल मचने लगता है। यही कारण है कि किसी स्कूल में पढने वाले किसी बच्चे को यह नहीं पता होगा कि ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी में वाराहमिहिर नाम का एक भारतीय गणितज्ञ और खगोल शास्त्री था जिसने जमीन के भीतर झांकने का प्रयास किया और भूमिगत जल को के कर अपने ग्रंथ वृहत्संहिता के उदकार्गल अध्याय में लगभग सवा सौ श्लोको के माध्यम से ऐसी जानकारियों को संकलित किया जो आज भी विज्ञान की दृष्टि में सिद्ध मानी जाती हैं।

बुतरस घाली एक समय संयुक्त राष्ट्र के महासचिव रहे थे जिन्होंने चिंता जाहिर करते हुई कहा था कि पानी के लिये लडा जायेगा तीसरा विश्वयुद्ध। अगर ऐसा ही है तो हमारी क्या तैयारी है? क्या एक सौ पच्चीस करोड की यह जनसंख्या जो कि निरंतर बढती जा रही है, वर्तमान में उपलब्ध जल-संसाधनों पर निर्भर रह सकेगी? आज हम भू-जल पर बहुत अधिक निर्भर हो गये हैं जिससे हालात यह कि पाताल सूखता जा रहा है। अब भी हम बडी बडी मशीनों को ले कर धरती की धडकन सुनने निकलते हैं और बार बार ऐसा होता है कि अनुमान धरे रह जाते हैं और गहरे-गहरे गड्ढे खोद कर भी भीतर बूंद भी नहीं मिलता। इसे संज्ञान में लेते हुए सोचिये कि पाँचवी-छठी सदी में कैसे वाराहमिहिर ने मृदा के रंग, वनस्पतियों, पत्थर और उसके प्रकार, क्षेत्र, देश आदि के अनुसार किस स्थान पर भूमिगत जल की उपलब्धिता हो सकती है, इसका विवरण प्रदान किया है। विज्ञान की भाषा में धरती की सतह के नीचे, चट्टानों के कणों के बीच के अंतरकाश या रन्ध्राकाश में मौजूद जल को भूमिगत जल कहते हैं। मीठे पानी के स्रोत के रूप में यह एक प्राकृतिक संसाधन है। जलभर (Aquifer) धरातल की सतह के नीचे चट्टानों का एक ऐसा संस्तर है जहाँ भूजल एकत्रित होता है और मनुष्य द्वारा नलकूपों से निकालने योग्य अनुकूल दशाओं में होता है। वृहत्संहिता न केवल भू-जल को पारिभाषित करती है अपितु जलभर के विभिन्न आयामों पर भी जानकारी उपलब्ध है।

वृहत्संहिता के उदकार्गल में भूजल सम्बंधित जो व्याख्या प्रस्तुत की गयी है उसपर संक्षिप्त दृष्टि डालते हैं। ग्रंथ कहता है - पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्त्तयैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः अर्थात - जिस प्रकार मानव शरीर में नाड़ियाँ होती हैं उसी प्रकार पृथ्वी में भी विभिन्न ऊँची-नीची शिराएँ होती हैं। एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्चयुतं नभस्तो वसुधाविशेषात्, नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परी यं क्षितितुल्यमेव अर्थात आकाश से बरसता सब जल स्वाद में एक सा होता है। परन्तु भूमि की विशेषता से वह अनेक वर्ण और स्वाद का हो जाता है। उसकी परीक्षा भू्मि के समान ही करनी चाहिए। अर्थात् जैसी भू्मि होगी वैसा जल भी होगा। यही नहीं यदि ऐसा स्थान है जहाँ पानी मिलने की संभावना न्यूनतम है तब हमारी तलाश कैसी होनी चाहिए इसे एक श्लोक से समझें कि - यदि वेतसोSम्बुरहिते देशे हस्तैस्त्रिभिस्ततः पश्चात्, सार्धे पुरुषे तोयं वहति शिरा पश्चिमा तत्र अर्थात जलहीन देश में वेदमजनूँ नामक पेड़ के पश्चिम में तीन हाथ दूर, डेढ़ पुरुष नीचे जल होता है। वहाँ पश्चिमी शिरा बहती है। 120 अँगुल का एक पुरुष है अर्थात जब एक पुरुष अपने हाथ ऊपर खड़े करे तब उसका सम्पूर्णता में अनुमापन। इसी अनुमाप पर उदकार्गल में बहुत सी गणनायें की गयी हैं। उदाहरण के लिये - चिह् नमपि चार्ध पुरुषे मंडूकः पाण्डूरोSथ मृत्पीता, पुटभेदकश्च तस्मिन् पाषाणो भवति तोपनधः अर्थात आधा पुरुष खोदने पर वहाँ श्वेत मेंढक निकलता है, फिर पीले रंग की मिट्टी होती है, उसके बाद परतदार पत्थर होता है जिसके नीचे पानी होता है।

पेड-पौधों और जीवजगत के व्यवहार का बहुत सूक्ष्म विवेचन ग्रंथ के इस अध्याय में किया गया है। यह श्लोक देखें कि - जम्बूवृक्षस्य प्राग्वल्मीको यदि भवेत्समीपस्थः, स्माद्दक्षिणपाशर्वे सलिलं पुरुषद्वये स्वादु अर्थात यदि जामुन के पेड़ से पूर्व दिशा में पास ही सर्प की बाँबी हो तो उस पेड़ से तीन हाथ दक्षिण में दो पुरुष नीचे मधुर जल होता है। ऐसा ही यह श्लोक देखें कि - भार्ङ्गी विवृता दन्ती शूकरपादीश्च लक्ष्मणा चैव, नवमालिका च हस्तद्वयेSम्बु याम्ये त्रिभिः पुरुषैः अर्थात भांरगी, निसोत दंती (दत्यूणी), सूकरपादी, लक्ष्मण, मालती वनस्पति जहाँ हो तो उनसे दो हाथ दक्षिण में तीन पुरुष नीचे पानी होता है। इसी तरह भू-विज्ञान की भी गहरी समझ वाराहमिहिर के शास्त्र से परिलक्षित होती है जब वे लिखते हैं - यत्र स्निग्धा निम्ना सवालुका सानुनादिनी वा स्यात्, तत्रर्धपञ्चमैर्वारि मानवैः पञ्चभिर्यदि वा अर्थात चिकनी नीची बालु रेत हो और पैर रखने से ध्वनि हो तो साढ़े चार या पाँच पुरुष नीचे पानी होता है। इसी तरह का याह उदाहरण देखें कि - मृन्नीलोत्पलवर्णा कापोता चैव दृश्यते तस्मिन्, हस्तेSजगन्धिमत्स्यो भवति पयोSल्पं च सक्षारम् अर्थात पहले नीलकमल सी, फिर कबूतर वर्ण की मिट्टी दिखाई देती है। इसके एक हाथ नीचे मछली निकलती है, उसमें चकोर जैसी दुर्गन्ध होती है, वहाँ थोड़ा और खारा पानी निकलता है। इतना ही नहीं कैसे पत्थर होंगे तो भूजल का स्तर क्या होगा जैसे उद्धरण भी प्राप्त होते हैं जैसे -  अहिराजः पुरुषेSस्मिन् धूम्रा धात्री कुलत्थवर्णोSश्मा, माहेन्द्री भवति शिरा वहति सफेनं सदा तोयम् अर्थात पहले पुरुष खोदने पर बड़ा सर्प, फिर धुएँ जैसी भूमि, फिर कुलथी के रंग के पत्थर के नीचे आव पूर्व की आती है, उसमे से सदैव झागदार पानी आता है।

पानी भी मिल गया तब कूप-तालाब आधि खोद कर उसका दोहन सुनिश्चित किया जाता है, ऐसे में भी वाराहमिहिर के पास अनेक समाधान हैं। वे खनन में हो रही कठिनाईयों और न टूटने वाले पत्थरों से निजात पाने का उपाय भी निर्धारित करते हैं और लिखते हैं कि - भेदं यदा नैति शिला तदानीं पालाशकाष्ठैः सह तिन्दुकानाम्, प्रज्वालयित्वानलमग्निवर्णा सुधाम्बुसिक्ता प्रविदारमेति अर्थात कूप आदि खोदने के समय शिला निकले और वह फूटे नहीं तो उस पर ढाक और तेंदु की लकड़ी जलाकर उसे लाल करके ऊपर चूने की कलों से मिला पानी छिड़कें तो वह शिला टूट जाती है। एक अन्य उदाहरण देखें कि - तोयं श्रृतं मोक्षकभस्मना वा यत्सप्तकृत्वः परिषेचनं तत्, कार्य शरक्षारयुतं शिलायाः प्रस्फोटनं वह्निवितापितायाः अर्थात
मरुवा पेड़ की भस्म मिलाकर पानी उबालकर उसमें शरका खार मिला कर फिर अग्नि से तपाई शिला के ऊपर सात बार वह पानी छिड़कने से वह शिला टूट जाती है। कूप निर्माण के पश्चात संरक्षण के लिये उल्लेख है कि  - द्वारं च न नैर्वाहिकमेकदेशे कार्य शिलासचितवारिमार्गम्, कोशस्थितं निर्विवरं कपाटं कृत्वा ततः पांसुभिरावपेत्तम् अर्थात जल निकलने के लिए एक ओर मार्ग रखना चाहिए जिसे पत्थरों से बाँधकर पक्का करवा दें। उस जलमार्ग का छिद्ररहित मजबूत काठ के तख्तों से ढँककर, ऊपर से मिट्टी दबा दें। प्राप्त भू-जल की शुद्धि के उपाय भी बताये गये हैं - अञ्जनमुस्तोशीरैः सराजकोशातकामलकचूणँ:, कतकफलसमायुक्तैर्योगः कूपे प्रदातव्यः अर्थात अंजन (सुरमा), मोथा, खस, बड़ी तुरई, आमल, कतक (निर्मली) आदि सबका चूर्ण कूप में डाल दें। इसी कडी में यह श्लोक भी देखें कि - कलुषं कटुकं लवणं विरसं सलिलं यदि वा शुभगन्धि भवेत्, तदनेन भवत्यमलं सूरसं सुसुगन्धिगुणैरपरैश्चयुतम् अर्थात यदि जल गंदा, कड़वा, खारा, बेस्वाद या दुर्गन्धित हो तो वह इस चूर्ण से निर्मल, मीठा, सुगंधित और अन्य कई गुणों वाला हो जाता है।

वाराहमिहिर ने भूमिगत जल पर जो शोध प्रस्तुत किया वह विज्ञान की दुनियाँ में अभी ध्यान या विवेचना प्राप्त नहीं कर सका है। हमारी हालत यह कि हम बहुत ऊँचा उड रहे हैं, हवाओं के रुख से हमें आसमान छूने का अहसास भी हो रहा है परंतु भान ही नहीं कि पतंग कबकी मांझे से कट कर अलग हो गयी है। मेरे इस आलेख का पूर्वाग्रह यह नहीं कि पाठ्यक्रम में वाराहमिहिर ही  पढाये जायें, अपितु यह है कि क्यों विद्यार्थियों को गर्व प्रदान नहीं किया जाये कि भू-विज्ञान और जल-विज्ञान के अनेक सिद्धांत भारतीयों ने प्रतिपादित किये हैं? प्रश्न तो बहुत से हैं कि विज्ञान के युग का दंभ भरने वाले समय के पास अब भी काले मेघा पानी दे के सिद्धांत पर आधारित खेती की दशा-दिशा ही है जबकि समाधान धूल भरे ताखों पर पडे झख मार रहे हैं।
संकलन संशोधन अजय कर्मयोगी
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गुरुवार, 6 सितंबर 2018




    





"सभी मित्रों को शिक्षक दिवस की  हार्दिक शुभकामना कैसे दूं" ------------------
लेकिन अफसोस ये दिन हम ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन पर मनाते हैं जो शिक्षक के नाम पर कलंक है,
जी हाँ सही सुना #सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक के नाम पर कलंक हैं ....
वैसे ही जैसे नेहरू #बालदिवस के लिए कंलक हैं।
इनके बहुत सारे कारनामे हैं लेकिन एक झूठ का - जाल बुनकर - गाँधी की तरह ही - इनको भी -समाज में "महान व्यक्ति" स्थापित कर दिया गया है। -----------------
इनका सबसे घिनौना काम कि इन्होंने अपने ही विद्यार्थी की लिखी पुस्तक अपने नाम से प्रकाशित करवाई थी ....
छात्र #जदुनाथ सिन्हा ने जब अपनी थीसिस जमा की ....
तो चैकिंग के लिए प्रोफेसर राधाकृष्णन के पास आई ....
और इन्होंने उसको अपने पास ही रख लिया,
तथा 2 साल बाद इंग्लैंड से हूबहू अपने नाम से #इंडियन_फिलॉसफी नाम देकर छपवा दिया .....
जिसके लिए इनको बहुत वाहवाही प्रशंसा और शौहरत मिली और ....
जदुनाथ ने जब कोर्ट में केस किया .....
तो उस गरीब को डरा धमका के चुप करवा दिया।
क्योंकि धूर्त और मक्कार लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लोगों को कैसे दबाया जाता है .....
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दूसरा घिनौना काम था इनका कि जब ये 1952 में रूस में राजदूत थे ....
तो इन्होंने नेताजी बोस से मुलाकात की थी....
और नेहरू से रिहाई की बात की ....
लेकिन नेहरू ने चुप रहने को कहा ....
और ये चुप हो गए .....
बदले में 1952 में ही भारत बुलाकर उपराष्ट्रपति का पद मिल गया।
बात यहीं खत्म न हुई .....
1954 में इनको #भारतरत्न भी दिया गया.....
बात यहाँ रुकने वाली कहाँ थी ....
क्योंकि नेहरू की मजबूरी बन गयी थी इनको खुश रखना .... क्योंकि नेहरू जानते थे देश नेताजी से कितना प्यार करता है .....
अगर देश को पता चल गया नेताजी जिंदा हैं रूस की जेल में ....
तो देश में भूचाल आ जायेगा लोग नेताजी को छुड़ाने के लिए जी जान लगा देंगे।
बात यहाँ  खत्म न हुई ....
इनको 1962 में राष्ट्रपति का पद भी मिला .....
और इस महत्वाकाँक्षी धूर्त व्यक्ति ने राष्ट्रपति बनते ही 1962 में अपने नाम से अपने ही जन्मदिन को #शिक्षकदिवस घोषित कर दिया।
इनकी एक और महानता ये भी रही .....
कि जब 1931 में अंग्रेज हमारे महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद को मार रहे थे ....
ताकि स्वतंत्रता संग्राम की दबा दिया जाए,
तो दूसरी ओर राधाकृष्णन को "सर" की उपाधि से नवाजा गया था .....
और उसी समय पता नहीं किस बेशर्मी से इन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी "सर" की उपाधि स्वीकार भी की थी। ---------------------
राधाकृष्णन जी ने बड़ी कुशलता  से वेदांत दर्शन की ऐसी व्याख्या की जो तत्कालीन ईसाइयों को भी अपने अनुकूल लगी .
उदाहरणार्थ उन्होंने चेतना के ५ स्तरों का निम्नानुसार वर्गीकरण किया :
१)The worshippers of the Absolute(ब्रह्म उपासक )
2)The worshippers of the personal God(जीसस पिता God के उपासक )
3)The worshippers of the incarnations like Rama, Kṛiṣhṇa, Buddha ( राम , कृष्ण , बुद्ध आदि अवतारों के उपासक )
4)Those who worship ancestors, deities and sages(पूर्वजों , ऋषियों एवं विविध देवताओं के उपासक :देवी माता , हनुमान जी आदि के उपासक )
5)The worshippers of the petty forces and spirits(प्रेतादिक उपासक )
अब इसमें चतुराई से ईसाइयत को सबसे ऊपर रख दिया गया है और उधर उन्हें वेदांती प्रचारित करने की भी पूरी युक्ति विद्यमान है ,केवल ब्रह्म नाम लेने से .
पर ब्रह्म का उपासक कोई समाज तो होता नहीं , ब्रह्म को जानने वाला तो ब्रह्ममय हो जाता है (ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति ).अतः यह तो अति विरल स्थिति है .
इस युक्ति श्रृंखला द्वारा ईसाइयत को सर्वोपरि रख दिया गया .
सामान्य शिक्षा प्राप्त हिन्दू ब्रह्म का नाम पढ़कर मगन होकर समझेंगे कि हाँ भाई , सर्वोच्च दशा तो वही है .
क्योंकि हिन्दू समाज अति परिपक्व समाज रहा है और वह मर्यादित रहा है अतः दर्शन के प्रसंग में राजनीति उसके लिए विषयांतर है पर ईसाई और मुसलमान तो धर्म दर्शन के नाम पर भी राजनीति ही करते हैं जिन्हें आधुनिक हिन्दू लोग गलत राज्य व्यवस्था द्वारा फैलाये गए अज्ञान के कारण नहीं समझते ...
ऐसे नियोजित छल से वेदांत की दुहाई देकर भारत में ईसाइयत को प्रतिष्ठा दी गयी है और इसमें मुख्य खेल तो विदेशी विद्वानों का था,  पर राधाकृष्णन जी उसके एक उपकरण बने .
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सर्वपल्ली गांवके एक मेधावी छात्र थे।उन्होंने ईसाइयोंके स्कूलऔर ईसाइयोंके ही कॉलेजमें पढ़ाईकी और उनके अधीन ही अध्यापक बने।
वे कभी कांग्रेस में नहीं गए।किसीअन्य ऐसे प्रयास से भीनहीं जुड़े।
वे कम्युनिस्ट और  ईसाइयों के सदा निकट रहे और अंग्रेजोंने उन्हें सदा अपना भरोसेमंद पाया।उनका बेटा गोपाल कट्टर नास्तिक और कम्युनिस्ट है।
उन्हें भारतीय  दर्शनका प्रकांड विद्वान प्रचारित किया गया।उनकी स्थापनाएं,:
1) पाश्चात्य जैन बौद्ध दर्शन वेदों से पहलेही भारतमें व्यापक था।
2) बादमें वेदका प्रचार हुआ।
3)वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीँ हैं,रचयिताओं के कथन हैं।
4)ईसाइयत औऱ वेदान्त का समन्वय होंना चाहिये।
Dr jadunath sinha
 जो राधाकृष्णन के स्टूडेंड थे, ने पीएचडी की थीसिस जमा की, वह लंबे समय लंबित रखी।
इस बीच वह copypaste राधाकृष्णन ने अपने नाम से पब्लिश किये और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की
जदुनाथ जो अपनी योग्यता से कलकत्ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अप्पोइन्ट हुए, ने राधाकृष्णनन पर मुकदमा कर दिया।
कैसल में follow-ups करने पर sir Ashutosh Mukharji के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी , जो कलकत्ता विश्वविद्यालय जे VC थे, राधाकृष्णन के मित्र, के दबाव में कोर्ट के बाहर समझौता करना पड़ा।
साक्ष्य
Roundtableindia. Co. In
 संशोधन संकलन  अजय कर्मयोगी
साभार नितिन भदौया रामेश्वर मिश्र

रविवार, 26 अगस्त 2018



ब्रह्मचर्य  - वीर्य रक्षण  - योग-साधना"।

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1. वीर्य  के  बारें  में  जानकारी  -

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है।
 40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है।
 एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है । जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है।

सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते है ।।
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2. वीर्य  को पानी  की  तरह   रोज बहा देने से नुकसान   -

शरीर के अन्दर विद्यमान ‘वीर्य’ ही जीवन शक्ति का भण्डार है।
शारीरिक एवं मानसिक दुराचर तथा प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक मैथुन से इसका क्षरण होता है। कामुक चिंतन से भी इसका नुकसान होता है।

मैथून के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है।
 रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है।  ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। खोखला होता जाता  है  इन्सान ।

स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के  प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है -
 1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना।
 २.  सविलास की क्रीड़ा करना।
 3. स्त्री के रुप यौवन की प्रशंसा करना।
 4. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना।
 5. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया।

    इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया  आदि इसमें शामिल है।
 शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगते हैं और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है।
 ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है। अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता।
    धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तानोत्पत्ति और बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है।

मैथुन क्रिया से होने वाले नुकसान निम्रानुसार है-
* शरीर की जीवनी शक्ति घट जाती है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
* आँखो की रोशनी कम हो जाती है।
* शारीरिक एवं मानसिक बल कमजोर हो जाता है।
* जिस तरह जीने के लिये ऑक्सीजन चाहिए वैसे ही ‘निरोग’ रहने के लिये ‘वीर्य’।
* ऑक्सीजन प्राणवायु है तो वीर्य जीवनी शक्ति है।
* अधिक मैथुन से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाता  है।
* चिंतन विकृत हो जाता है।

वीर्यक्षय से विशेषकर तरूणावस्था में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं - 

  चेहरे पर मुँहासे , नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखाएँ, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, दुर्बलता,  आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, शिरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्नदोष व मानसिक अशांति।

अगर ग्रुप  में  किसी  भाई  को ये समस्याएँ हैं  तो उपाय भी  लिख रहा हूँ  -

लेटकर श्वास बाहर निकालें और अश्विनी मुद्रा अर्थात् 30-35 बार गुदाद्वार का आकुंचन-प्रसरण श्वास रोककर करें।
ऐसे एक बार में 30-35 बार संकोचन विस्तरण करें। तीन चार बार श्वास रोकने में 100 से 120 बार हो जायेगा।
 यह ब्रह्मचर्य की रक्षा में खूब मदद करेगी। इससे व्यक्तित्व का विकास होगा ही,  व ये  रोग भी दूर होंगे समय के साथ ।।
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3. वीर्य  रक्षण  से  लाभ -

शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव,  कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है।
ऐसे  व्यक्ति  को जल्दी  से कोई  रोग नहीं  होता है  उसमें  रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है  ।

पहले के जमाने में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। और  उस वक्त में  यहाँ वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए  । 

भगवान बुद्ध  ने कहा है -  ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’

स्वामी रामतीर्थ  ने कहा है - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।

पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन होने पर योगी पश्चाताप करता है।

भगवान शंकर ने  कहा  है-
'इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान महिमा हुई है।'

कुछ  उपाय  -

ब्रह्मचर्य जीवन जीने के लिये सबसे पहले ‘मन’ का साधने की आवश्यकता है।
 भोजन पवित्र एवं सादा होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए।
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1.   प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएँ।
2.    तेज मिर्च मसालों से बचें। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन करें।
3.    सभी नशीले पदार्थों से बचें।
4.    गायत्री मन्त्र या अपने ईष्ट मन्त्र का जप व लेखन करें।
5.    नित्य ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करें।
6.    मन को खाली न छोड़ें किसी रचनात्मक कार्य व लक्ष्य से जोड़ रखें।
7.    नित्य योगाभ्यास करें। निम्न आसन व प्राणायाम अनिवार्यत: करें-
आसन-पश्चिमोत्तासन, सर्वांगासन, भद्रासन प्राणायाम- भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम विलोम।

जो हम खाना खाते हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है।खाना खाने के बाद रस बनता है जो कि नाडियों में चलता है।फिर बाद में खून बनता है।इस प्रकार से यह क्रम चलता है और अंत में वीर्य बनता है।
वीर्य में अनेक गुण होतें हैं।
 क्या आपने कभी यह सोचा है कि शेर इतना ताकतवर क्यों होता है?वह अपने जीवन में केवल एक बार बच्चॉ के लिये मैथुन करता है।जिस वजह से उसमें वीर्य बचा रहता है और वह इतना ताकतवर होता है।
 जो वीर्य इक्कठा होता है वह जरूरी नहीं है कि धारण क्षमता कम होने से वीर्य बाहर आ जायेगा।वीर्य जहाँ इक्कठा होता है वहाँ से वह नब्बे दिनों बाद पूरे शरीर में चला जाता है।
फिर उससे जो सुंदरता,शक्ति,रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि बढती हैं उसका कोई पारावार नहीं होता है।
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4.  पत्नी  का त्याग  नहीं  करना है -

ब्रह्मचर्य में स्त्री और पुरुष का कोई लेना देना ही नहीं है।
प्राचीन काल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे, ऋषि पत्नियां भी बहुत जागृत और ग्यानी होती थी। आत्मसाक्षात्कार का जितना अधिकार पुरुषो को था उतना ही स्त्रियों को भी था।
 ब्रह्मचर्य को पूर्ण गरिमा प्राचीन काल में ही मिली थी। मैंने एक कथा सुनी थी, एक ऋषि ने अपने पुत्र को दुसरे ऋषि के पास सन्देश लेकर भेजा था, पुत्र ने पिता से कहा की राह में एक नदी पड़ती है, कैसे पार करूँगा।
 ऋषि ने कहा जाकर नदी से कहना,अगर मेरे पिता ने एक पल भी ब्रह्मचर्य का व्रत ना त्यागा हो, स्वप्न में भी नहीं, तो हे नदी तू मुझे रास्ता दे दे।
कथा कहती है की नदी ने रास्ता दे दिया। कैसा विरोधाभास है, एक पुत्र का पिता और ब्रह्मचारी , कैसे ?
जाहिर  है  कि संभोग एक बार  सन्तानोपत्ति  के  लिए  किया गया था , आनंद के लिए  नहीं  ।
बुद्ध और महावीर के बाद हज़ारों युवक अपनी पत्नियों को घर को छोड़ कर भिक्षु बन गए , तब ब्रह्मचर्य का अर्थ सिर्फ स्त्री निषेध बन गया।

नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग के बिना सृष्टि का व्यवस्थाक्रम नहीं चल सकता।
 दोनों का मिलन कामतृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होता, वरन घर बसाने से लेकर व्यक्तियों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवित्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही सम्भव होता है।

अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों की, पाप-पतन की जड़ है।
इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
 इस सनक में लोग घर छोडक़र भागने में, स्त्री बच्चे को बिलखता छोडक़र भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े।

तंत्र के पथिको ने आज्ञा चक्र में अर्ध नारीश्वर की कल्पना की है, यह कल्पना नहीं यथार्थ है, विज्ञान भी स्वीकारता है, की, हर स्त्री में एक पुरुष विद्यमान है और हर पुरुष में एक स्त्री।

जब साधक या साधिका की चेतना आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है, जब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र का भेदन करती है तो काम ऊर्जा राम ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है, साधक जीव संज्ञा से शिव संज्ञा में प्रविष्ट हो जाता है।
 आज्ञा चक्र में पुरुष साधक को अपने भीतर की स्त्री का दर्शन होता है और स्त्री साधक को अपने भीतर के पुरुष का, जैसे ही यह दर्शन मिलता है, वैसे ही बाहर की स्त्री या पुरुष विलीन हो जाता है, खो जाता है।
 बाहर की स्त्री या पुरुष में रस ख़त्म हो जाता है, आप अपने भीतर के पुरुष या स्त्री को पा लेते हैं, और साथ ही आप आतंरिक या आध्यात्मिक सम्भोग के रहस्य को जान लेते हैं, जो पंचमकार का एक सूक्ष्म मकार है।
यह बिलकुल उसी तरह होता है , जैसे खेचरी मुद्रा में साधक ललना चक्र से टपकने वाली मदिरा का पान करके आनंद में रहता है। जैसे ही आपको भीतर का सौंदर्य मिलता है, बाहर का सौंदर्य खो जाता है ।
संसार की स्त्री या पुरुष में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है, कोई रस नहीं रह जाता है, यही वो घडी है, जब ब्रह्मचर्य आपके भीतर से प्रस्फूटित होता है. अब आप वो नहीं रहे आप रूपांतरित हो जाते हैं, यही वो जगह है जहाँ शिवत्व घटता है । 

5.  कमेन्टस  में   चर्चा   -

एक बात  ध्यान  रखना है  चर्चा  में  कि यहाँ  माता-बहने  भी  हैं  तो शब्दों  का ख्याल  रखना है  ,  कामुक या गंदे  शब्दों  से परहेज  करना है  जहां  तक हो सके ।

शादीशुदा व्यक्ति पूर्ण  ब्रह्मचर्य  ना रख सकें  तो भी  संयमित  जीवन  अवश्य  व्यतीत  करना चाहिए  ।

अगर कोई  कहता है  कि  यौन इच्छाओं  को दबाने  से नपुंसकता  आ जाएगी  या  दबाने  से अच्छा  है  भोग लो ,  तो  भाई  ऐसा  है  कि उपर  लिखी  दिनचर्या  अपनाओगे तो यौन इच्छाएँ  पैदा  ही  नहीं  होगी  ,
मन निर्मल  तो तन निर्मल  ।।

अगर  कोई  कहे  कि  संभोग    8-10  दिन  इतना ज्यादा  करो  कि घृणा  हो जाए , तो भाई  ऐसा  है  कि  नसें उभर आएंगी  , पीड़ा  भी  महसूस  करोगे , संभोग  से  मन उचट भी  जाएगा ,  परन्तु  .....
महिने 2-3   में  वीर्य  बनने पर ,  कामुक  साहित्य  , नेट पर अशलील चीजें  देखने पर , नारी  को गलत भावना  से देखने पर फिर  से काम वेग उठेगा , तुम फिर  बह जाओगे।

इसलिए  ये  सोचना  बिल्कुल  गलत होगा कि  8-10  दिन  जमकर करो तो घृणा  हो जाएगी  सदा के लिए । ।

साधना पर भी  प्रभाव  पडेगा  ,  जो व्यक्ति  कामुक है  ,  उसके  विचार  भी  वैसे  चलेंगे  ,  ज्यादा  वीर्य  नष्ट  करने  से  शरीर  में  शक्ति  का संचार कम होगा ,  वह  1 घण्टे  तक  ज्ञान मुद्रा  में  ही  नहीं  बैठ पाएगा  । अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...