शनिवार, 30 मई 2020

अस्पताल का लाखों का बिल, दर्द और तनाव से मुक्ती में दादी के घरेलू नुस्खे

   
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अक्सर घर के बुजुर्गों के पास ही हर समस्या का समाधान मिल जाया करता है, जो रामबाण इलाज होता है। ऐसी ही कुछ छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जि‍न्हें हल करने के लि‍ए दादी मां के यह 22 रामबाण घरेलू नुस्खे ही काफी हैं । जरूर जानिए ... 1. कान दर्द 2. दांत दर्द 3. दांतों के सुराख 4. बच्चों के पेट के कीड़े 5. गिल्टी का दर्द 6. पेट के केंचुए एवं कीड़े 7. छोटे बच्चों को उल्टी दस्त 8. कब्ज दूर करने हेतु 9. आग से जल जाने पर 10. कान की फुंसी 11. कुकुर खांसी 12. पेशाब की जलन 13. फोड़े 14. सिरदर्द 15. पेशाब में चीनी (शकर) 16. मस्तिष्क की कमजोरी 17. अधकपारी का दर्द 18. खूनी दस्त 19. जुकाम - 1 पाव गाय का दूध गरम करके उसमें 12 दाना कालीमिर्च एवं 1 तोला मिश्री 20. मंदाग्नि 21. उदर विकार - अजवाइन, कालीमिर्च एवं सेंधा नमक 22. मोटापा दूर करना बालों के झड़ने पर नियंत्रण के लिए प्राकृतिक घरेलू उपचार यहाँ

 1. कान दर्द - प्याज पीसकर उसका रस कपड़े से छान लें। फिर उसे गरम करके 4 बूंद कान में डालने से कान का दर्द समाप्त हो जाता है।

 2. दांत दर्द - हल्दी एवं सेंधा नमक महीन पीसकर, उसे शुद्ध सरसों के तेल में मिलाकर सुबह-शाम मंजन करने से दांतों का दर्द बंद हो जाता है।

3. दांतों के सुराख - कपूर को महीन पीसकर दांतों पर उंगली से लगाएं और उसे मलें। सुराखों को भली प्रकार साफ कर लें। फिर सुराखों के नीचे कपूर को कुछ समय तक दबाकर रखने से दांतों का दर्द निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है।

4. बच्चों के पेट के कीड़े - छोटे बच्चों के पेट में कीड़े हों तो सुबह एवं शाम को प्याज का रस गरम करके 1 तोला पिलाने से कीड़े अवश्य मर जाते हैं। धतूरे के पत्तों का रस निकालकर उसे गरम करके गुदा पर लगाने से चुन्ने (लघु कृमि) से आराम हो जाता है।

5. गिल्टी का दर्द - प्याज पीसकर उसे गरम कर लें। फिर उसमें गो-मूत्र मिलाकर छोटी-सी टिकरी बना लें। उसे कपड़े के सहारे गिल्टी पर बांधने से गिल्टी का दर्द एवं गिल्टी समाप्त हो जाती है।

6. पेट के केंचुए एवं कीड़े - 1 बड़ा चम्मच सेम के पत्तों का रस एवं शहद समभाग मिलाकर प्रात:, मध्यान्ह एवं सायं को पीने से केंचुए तथा कीड़े 4-5 दिन में मरकर बाहर निकल जाते हैं।

7. छोटे बच्चों को उल्टी दस्त - पके हुए अनार के फल का रस कुनुकुना गरम करके प्रात:, मध्यान्ह एवं सायं को 1-1 चम्मच पिलाने से शिशु-वमन अवश्य बंद हो जाता है।

8. कब्ज दूर करने हेतु - 1 बड़े साइज का नींबू काटकर रात्रिभर ओस में पड़ा रहने दें। फिर प्रात:काल 1 गिलास चीनी के शरबत में उस नींबू को निचोड़कर तथा शरबत में नाममात्र का काला नमक डालकर पीने से कब्ज निश्चित रूप से दूर हो जाता है।

9. आग से जल जाने पर - कच्चे आलू को पीसकर रस निकाल लें, फिर जले हुए स्थान पर उस रस को लगाने से आराम हो जाता है। इसके अतिरिक्त इमली की छाल जलाकर उसका महीन चूर्ण बना लें, उस चूर्ण को गो-घृत में मिलाकर जले हुए स्थान पर लगाने से आराम हो जाता है।

10. कान की फुंसी - लहसुन को सरसों के तेल में पकाकर, उस तेल को सुबह, दोपहर और शाम को कान में 2-2 बूंद डालने से कान के अंदर की फुंसी बह जाती है अथवा बैठ जाती है तथा दर्द समाप्त हो जाता है।

11. कुकुर खांसी - फिटकरी को तवे पर भून लें और उसे महीन पीस लें। तत्पश्चात 3 रत्ती फिटकरी के चूर्ण में समभाग चीनी मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करने से कुकुर खांसी ठीक हो जाती है।

12. पेशाब की जलन - ताजे करेले को महीन-महीन काट लें। पुन: उसे हाथों से भली प्रकार मल दें। करेले का पानी स्टील या शीशे के पात्र में इकट्ठा करें। वही पानी 50 ग्राम की खुराक बनाकर 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) पीने से पेशाब की कड़क एवं जलन ठीक हो जाती है।

13. फोड़े - नीम की मुलायम पत्तियों को पीसकर गो-घृत में उसे पकाकर (कुछ गरम रूप में) फोड़े पर हल्के कपड़े के सहारे बांधने से भयंकर एवं पुराने तथा असाध्य फोड़े भी ठीक हो जाते हैं।

14. सिरदर्द - सोंठ को बहुत महीन पीसकर बकरी के शुद्ध दूध में मिलाकर नाक से बार-बार खींचने से सभी प्रकार के सिरदर्द में आराम होता है।

15. पेशाब में चीनी (शकर)- जामुन की गुठली सुखाकर महीन पीस डालें और उसे महीन कपड़े से छान लें। अठन्नीभर प्रतिदिन 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) ताजे जल के साथ लेने से पेशाब के साथ चीनी आनी बंद हो जाती है। इसके अतिरिक्त ताजे करेले का रस 2 तोला नित्य पीने से भी उक्त रोग में लाभ होता है।

16. मस्तिष्क की कमजोरी - मेहंदी का बीज अठन्नीभर पीसकर शुद्ध शहद के साथ प्रतिदिन 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) सेवन करने से मस्तिष्क की कमजोरी दूर हो जाती है और स्मरण शक्ति ठीक होती है तथा सिरदर्द में भी आराम हो जाता है।

17. अधकपारी का दर्द - 3 रत्ती कपूर तथा मलयागिरि चंदन को गुलाब जल के साथ घिसकर (गुलाब जल की मात्रा कुछ अधिक रहे) नाक के द्वारा खींचने से अधकपारी का दर्द अवश्य समाप्त हो जाता है।

18. खूनी दस्त - 2 तोला जामुन की गुठली को ताजे पानी के साथ पीस-छानकर, 4-5 दिन सुबह 1 गिलास पीने से खूनी दस्त बंद हो जाता है। इसमें चीनी या कोई अन्य पदार्थ नहीं मिलाना चाहिए।

19. जुकाम - 1 पाव गाय का दूध गरम करके उसमें 12 दाना कालीमिर्च एवं 1 तोला मिश्री- इन दोनों को पीसकर दूध में मिलाकर सोते समय रात को पी लें। 5 दिन में जुकाम बिलकुल ठीक हो जाएगा अथवा 1 तोला मिश्री एवं 8 दाना कालीमिर्च ताजे पानी के साथ पीसकर गरम करके चाय की तरह पीयें और 5 दिन तक स्नान न करें।

20. मंदाग्नि - अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े करके नींबू के रस में डालकर और नाममात्र का सेंधा नमक मिलाकर शीशे के बर्तन में रख दें। 5-7 टुकड़े नित्य भोजन के साथ सेवन करें, मंदाग्नि दूर हो जाएगी।

21. उदर विकार - अजवाइन, कालीमिर्च एवं सेंधा नमक- इन तीनों को एक में ही मिलाकर चूर्ण बना लें। ये तीनों बराबर मात्रा में होने चाहिए। इस चूर्ण को प्रतिदिन नियमित रूप से रात को सोते समय गरम जल के साथ सेवन करने से (मात्रा अठन्नीभर) सभी प्रकार के उदर रोग दूर हो जाते हैं।

22. मोटापा दूर करना - 1 नींबू का रस 1 गिलास जल में प्रतिदिन खाली पेट पीने से मोटापा दूर हो जाता है। ऐसा 3 महीने तक निरंतर करना चाहिए। गर्मी एवं बरसात के दिनों में यह प्रयोग विशेष लाभदायक होता है।

 अत्यधिक बालों के झड़ने से छुटकारा पाने के 50 सबसे अच्छे प्राकृतिक घरेलू उपचार हैं जो आप आसानी से घर पर कर सकते हैं। 1. एलो वेरा: शुद्ध मुसब्बर का रस या मुसब्बर जेल सीधे खोपड़ी पर लागू किया जा सकता है। यह बालों के झड़ने के लिए प्राकृतिक उपचारों में से एक है जो संक्रमण का इलाज करेगा या आपकी खोपड़ी को शुष्क कर देगा। एलो वेरा में विटामिन ए, सी, ई और फोलिक एसिड के साथ-साथ कोलीन, बी 1, बी 2, बी 3 (नियासिन) और बी 6 शामिल हैं। यहाँ आप बालों के झड़ने के इलाज के लिए इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: जेल या जूस से अपने स्कैल्प की मालिश करें, कुछ घंटों तक प्रतीक्षा करें और फिर गुनगुने पानी से धो लें। बालों के झड़ने को रोकने के लिए लगभग 3 से 6 महीने तक एलो वेरा के रस के साथ त्रिफला चूर्ण का उपयोग करें। 2. नारियल का दूध: बालों के ऊतकों को पोषण देने के लिए, नारियल का दूध सबसे अच्छा काम करता है और आपके बालों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का एक समृद्ध स्रोत है। आप सिर्फ नारियल का कद्दूकस करके और उसके दूध को निचोड़कर नारियल का दूध प्राप्त कर सकते हैं। नारियल का दूध बालों के झड़ने को नियंत्रित करने और कुल खोपड़ी को चमकाने का एक प्राकृतिक घरेलू उपचार है। इस तरह एक प्रभावी नारियल का दूध मास्क बनाएं। कैसे करें और उपयोग करें: एक कप नारियल का दूध, आधा कप दही, दो बड़े चम्मच कपूर का तेल मिलाएं। बालों पर इस मिश्रण की मालिश करें और इसे लगभग 2 घंटे तक बैठने दें। बालों को तौलिये में लपेटें और सूखने दें। मलो मत। आधे घंटे के बाद गुनगुने पानी से धो लें। 3. गर्म तेल की मालिश: गुनगुने तेल के साथ खोपड़ी और बालों की नियमित मालिश रक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने में मदद करेगी। हम आपके बालों की मालिश करने के लिए नारियल तेल या तिल के तेल के उपयोग की सलाह देते हैं। कई अन्य तेल हैं जिनका उपयोग मालिश करने के लिए किया जा सकता है, विशेष रूप से जैतून, अरंडी, जोजोबा और बादाम। यह बालों के झड़ने के लिए सबसे अच्छा सरल घरेलू उपचार में से एक है और यह स्ट्रैंड द्वारा आपके बालों की त्वचा पर रक्त परिसंचरण को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कैसे करें और उपयोग करें: अपने बालों को बीच में रखें और अच्छी तरह से कंघी करें। ल्यूक कुछ नारियल तेल (या किसी अन्य तेल) को गर्म करता है और सीधे खोपड़ी पर कुछ डाल देता है। इसे धीरे-धीरे रिसने दें जबकि यह अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ने लगता है। अब, अपनी उंगलियों का उपयोग करते हुए, खोपड़ी पर तेल की अच्छी तरह से मालिश करें। लगभग 20 मिनट तक मालिश करें। एक बार हो जाने के बाद, बालों को पोनी टेल की स्थिति में ले जाएं और कोमल दबाव डालें और इसे खींचें। यह खोपड़ी को मजबूत करेगा। तेल को लगभग एक घंटे तक लगा रहने दें। आप गर्म तेल में कुछ कपूर भी मिला सकते हैं। कपूर रूसी को ठीक करने के लिए जाना जाता है। 4. आंवला या भारतीय करौदा: नारियल के तेल में कुछ सूखे आंवले डालें और उन्हें तब तक उबालें जब तक आपको काला तेल न मिल जाए। अगर आप इस तेल की मालिश करते हैं तो यह बहुत प्रभावी साबित होगा। आंवला में आहार फाइबर होता है और यह विटामिन सी से भरपूर होता है। कैल्शियम, प्रोटीन और आयरन की अच्छी खुराक बालों की मजबूती के लिए सहायक होती है। कैसे करें और उपयोग करें: आप आंवले का इस्तेमाल सिर्फ शिकाकाई के साथ पेस्ट बनाकर कर सकते हैं। इस पेस्ट को गीले बालों में लगाएं और कुछ मिनट बाद अपने बालों को धो लें। नोट आंवले के रस (आंवला) और निम्बू के रस को मिला कर बालों के झड़ने का इलाज किया जा सकता है। शहद के साथ मिश्रित होने पर आंवले मददगार है। यह उन महिलाओं के लिए सबसे अच्छे और सही बालों के झड़ने वाले घरेलू उपचारों में से एक है, जिनके सूखे बाल हैं। 5. नीम (भारतीय बकाइन): नीम का पौधा बहुत फायदेमंद है और इसमें सजावटी और आवश्यक गुण हैं। नीम का एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल, एंटी-सेडेटिव, एंटी-डायबिटिक गुण स्वस्थ बालों के लिए आवश्यक है। नीम बीमारियों के इलाज के लिए उपयोगी है और बालों के झड़ने के लिए एक अद्भुत घरेलू उपचार भी है। यहाँ आप कैसे तैयार कर सकते हैं, कैसे करें और उपयोग करें: नीम के साथ पानी उबालें, जब तक कि पानी आधा न हो जाए। इसे ठंडा करें और अपने बालों को धो लें। आप सप्ताह में एक बार इस घोल से अपने बालों को धो सकते हैं। यह खोपड़ी से खुजली और रूसी से बचने के लिए बालों के झड़ने के लिए सबसे अच्छा उपचार में से एक है। 6. हिबिस्कस: हिबिस्कस या गुड़हल एक फूल है जो आसानी से उपलब्ध है। यह फूल लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है और भगवान गणेश को चढ़ाया जाता है। हिबिस्कस या गुड़हल में पुनर्जीवित करने वाले गुण होते हैं और यह आपके बालों को पोषण देने में मददगार होता है। हिबिस्कस बालों को रूसी से बचाता है और असमय धूसर बालों का विकास करता है। यह बालों के झड़ने को रोकने में बहुत मददगार है। यह विटामिन ए, बी और सी, फॉस्फोरस और कैल्शियम, अमीनो एसिड और अन्य पोषक तत्वों जैसे खनिजों में समृद्ध है जो इसे हमारे तालों के लिए सबसे अच्छा बनाते हैं। यह बालों के अत्यधिक झड़ने का एक घरेलू उपचार है। कैसे करें और उपयोग करें: अपने बालों की लंबाई के आधार पर हिबिस्कस (3 या 4) पीस लें। इन्हें तब तक पीसें जब तक आपको एक गाढ़ा पेस्ट न मिल जाए। इसे कुछ दही के साथ मिलाएं। इसे अपने स्कैल्प और जड़ों पर लगाएं। समान रूप से अपने बालों के अंत किस्में तक लागू करें। आप मेथी के साथ हिबिस्कस का भी उपयोग कर सकते हैं। रातभर भिगोने के बाद मेथी का पेस्ट बना लें। इसे छाछ के साथ मिलाएं और लागू करें। 7. लहसुन और प्याज: कैसे करें और उपयोग करें: लहसुन और प्याज दोनों ही सल्फर के समृद्ध स्रोत हैं और दोनों ही बालों के विकास में मदद करते हैं। लहसुन को लागू करने के लिए, लहसुन को छीलें और उन्हें नारियल के तेल के साथ उबालें। इस तेल को अपने स्कैल्प में लगाएं और मालिश करें। सर्वोत्तम परिणाम देखने के लिए सप्ताह में 2 से 3 बार इस तेल से मालिश करें। प्याज को लागू करने के लिए, आपको उन्हें बारीक रूप से काटना और रस निकालना होगा। कैसे करें और उपयोग करें: प्याज के रस से स्कैल्प की अच्छे से मालिश करें और माइल्ड शैम्पू से अपने बालों को धो लें। ये दोनों बालों के झड़ने के लिए और बालों के विकास के लिए सबसे अच्छा घरेलू उपचार हैं। अगर प्याज को शहद के साथ मिलाया जाए तो इसे एलोवेरा को हेयर मास्क के रूप में लगाया जा सकता उपयोगी हेयर फॉल के घरेलू उपचार है  गुड़हल आंवला आयरन, सल्फर, फॉस्फोरस, प्रोटीन, जिंक और आयोडीन का एक समृद्ध स्रोत है। अपने बालों को फिर से उगाने के लिए, इसका एक मास्क बनाएं। कैसे करें और उपयोग करें: ऑलिव ऑयल के साथ । अपने बालों के छोर तक खोपड़ी पर मालिश करें। इसे एक घंटे के लिए छोड़ दें और एक हल्के शैम्पू का उपयोग करके अच्छी तरह से पानी से धो लें।

9. काली मिर्च के बीज और चूना: काली मिर्च और चूना विटामिन ए और विटामिन सी, फ्लेवोनॉयड्स, कार्टेनोइड्स और कई अन्य एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। वे सभी विकास सुनिश्चित करते हैं और रूसी से भी लड़ते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: नींबू के रस के अर्क में थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च मिलाएं। इस मिश्रण को अपने स्कैल्प पर लगाएं। इसे 15 मिनट के लिए छोड़ दें और ठंडे पानी में धो लें। आप काली मिर्च में अरंडी का तेल या नारियल का तेल भी मिला सकते हैं। यह मिश्रण बहुत अच्छा साबित होता है और बालों के झड़ने को प्राकृतिक रूप से ठीक कर सकता है। यह बालों के झड़ने के प्राकृतिक उपचारों में से एक है और यह बालों को एक अच्छा बनावट भी देता है। 10. लाल ग्राम या कबूतर मटर: कबूतर मटर में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की अच्छाई होती है। वे विटामिन सी और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन से भी समृद्ध होते हैं जो बालों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति करते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: कुछ कबूतर या लाल चने रात भर भिगोएँ। बहुत कम पानी मिलाते हुए इसे गाढ़ा और महीन पेस्ट बना लें। अपने बालों पर लागू करें। यह पेस्ट प्राकृतिक रूप से बालों के झड़ने को ठीक करने के लिए प्रभावी है। यह बालों के झड़ने को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। मास्क को हर वैकल्पिक दिन में लगभग 45 मिनट तक रखें। कुछ ऐसे उबटन के बारे में बताते हैं, जिससे आप बेदाग व निखरी त्‍वचा पा सकती हैं- *हल्दी* हल्‍दी त्‍वचा के लिए कितनी अच्‍छी होती है इस बारे में हम आपको समय-समय पर बताते रहते हैं। जी हां हल्‍दी में मौजूद एंटी-ऑक्‍सीडेंट और करक्यूमिन नामक तत्‍व ना केवल हेल्‍थ के लिए बल्कि आपको सुंदर बनाने में भी मददगार होते है। आपने देखा ही होगा दुल्‍हन को शादी से पहले हल्‍दी लगाई जाती है ताकि उसके त्‍वचा निखरी हुई दिखाई दें। हल्‍दी का उबटन बनाने के लिए आपको हल्‍दी, बेसन या आटा, ताजी मलाई, थोड़ा सा सरसों का तेल और दूध की जरूरत होती है। सबसे पहले हल्‍दी में बेसन या आटा मिला लें। फिर इसमें ताजी मलाई, दूध और थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर गाढ़ा पेस्‍ट बना लें। इसे 10 मिनट चेहरे पर लगाकर ऐसे ही छोड़ दें। जब ये थोड़ा सूख जाए तो इसे हल्‍का सा रगड़कर साफ कर लें। फिर चेहरे को पानी से धो लें। *ग्रीन-टी* हल्‍दी की तरह ग्रीन टी में भी एंटी-ऑक्‍सीडेंट भरपूर मात्रा में होते है। इसलिए इसका इस्‍तेमाल वेट लॉस के लिए किया जाता है। लेकिन क्‍या आप जानती हैं कि आप ग्रीन टी का उबटन बनाकर भी अपने चेहरे पर लगा सकती हैं। ग्रीन टी का उबटन बनाने के लिए आपको 2 ग्रीन टी के बैग, 1 छोटा चम्‍मच नींबू के रस और 1 छोटा चम्‍मच शहद की जरूरत होती है। सबसे पहले 2 ग्रीन-टी बैग को पानी में अच्छी तरह डिप करें और फिर उसमें से पाउडर निकाल लें। अब इसमें नींबू का रस और शहद मिक्स कर लें। इसे अपने चेहरे पर लगाकर 15 मिनट के लिए ड्राई होने दें और फिर इसे पानी से धो लें। *चंदन पाउडर* चंदन पाउडर हमारी त्‍वचा के लिए बहुत अच्‍छा होता है। इसमें मौजूद एंटीबैक्टीरियल तत्व चेहरे को बूढ़ा होने से बचाते हैं। ये त्‍वचा को टाइट कर उसे जवां बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा चंदन में हर्बल एंटीसेप्टिक गुण होते है। इसके अलावा अगर यह सनटैन को भी ठीक करता है। चंदर का उबटन बनाने के लिए आापको थोड़े से चंदन पाउडर, 1 छोटा चम्‍मच टमाटर और नींबू के रस की जरूरत होती है। सबसे पहले चंदन पाउडर में इन दोनों चीजों को अच्‍छी तरह से मिलाकर पेस्‍ट बना लें। फिर इसे अपने चेहरे पर 10-15 मिनट लगाएं और फिर ताजे पानी से धो लें। आप इसका इस्‍तेमाल रोजाना कर सकती हैं। ऐसा करने से ना केवल आपकी स्किन ग्‍लोइंग होगी बल्कि यह एलर्जी व पिंपल्स जैसी समस्याओं को भी दूर करेगा। *बादाम* बादाम में विटामिन, प्रोटीन और मिनरल्स का खजाना छुपा होता है, इसलिए ये स्किन के लिए काफी फायदेमंद होता है। बरसों से स्किन केयर में बादाम का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। इसे लगाने से एजिंग से निजात और स्किन से कालेपन दूर होने की समस्या कम होती है। इसके अलावा बादाम में कई तरह के एंटी ऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं जो चेहरे में निखार लाते हैं और स्किन का रूखापन भी दूर करते हैं। रात को 10-15 बादाम को भिगो दे और सुबह उठकर इसे छील कर इसका पेस्ट बना लें। फिर इसमें हल्‍का सा दूध और शहद मिला कर आप स्क्रब की तरह इस्तेमाल करें। रेगुलर ऐसा करने से आपको खुद फर्क महसूस होगा।


गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

संस्कृत स्वयं समृद्ध,व देशों के समृद्धि का आधार और सभी भाषाओं की जननी क्यों है?

 
    
संस्कृत स्वयं एक समृद्ध और देश की समृद्धि का आधार है इस तथ्य को अंग्रेजी शिक्षा के पढ़े हुए ज्ञानी अगर समझ जाएं तो देश पुनः अपने गौरव को प्राप्त कर लेगा क्यों सारा विश्व आज संस्कृत के पीछे पड़ा हुआ है भारत सो रहा है यदि आप स्वयं जगे हुए हैं और लोगों को भी जगाना चाहते हैं तो यथाशीघ्र गुरुकुल शिक्षा अभियान का हिस्सा बनने के लिए व्हाट्सएप संपर्क करें 9336919081
   संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है।

संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे #प्राचीन_भाषा है और सबसे वैज्ञानिक_भाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। #भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।

ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।

तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?
शब्दों का आधार #ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है #शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था।
प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर *संस्कृत के 36 #स्वर बने और इन 36 रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72 प्रकार की #ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने*। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल *108 ध्वनियों पर संस्कृत की #वर्णमाला आधारित है*। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। *अतः प्राचीनतम #आर्यभाषा जो #ब्रह्मांडीय_संगीत थी उसका नाम "संस्कृत" पड़ा*। संस्कृत – संस् + कृत् अर्थात
#श्वासों_से_निर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर संपर्क से अभिव्यक्त हुयी*।

कालांतर में #पाणिनी ने नियमित #व्याकरण के द्वारा संस्कृत को परिष्कृत एवं सर्वम्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान किया। #पाणिनीय_व्याकरण ही संस्कृत का प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है*। दिव्य व दैवीय गुणों से युक्त, अतिपरिष्कृत, परमार्जित, सर्वाधिक व्यवस्थित, अलंकृत सौन्दर्य से युक्त , पूर्ण समृद्ध व सम्पन्न , पूर्णवैज्ञानिक #देववाणी *संस्कृत – मनुष्य की आत्मचेतना को जागृत करने वाली, सात्विकता में वृद्धि , बुद्धि व आत्मबलप्रदान करने वाली सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है*। अन्य सभी भाषाओ में त्रुटि होती है पर इस भाषा में कोई त्रुटि नहीं है। इसके उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि सहस्त्रों वर्षो से लेकर आज तक वैदिक मन्त्रों की ध्वनियों व मात्राओं में कोई पाठभेद नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे बल्कि विश्व के आधुनिक विद्वानों और भाषाविदों ने भी एक स्वर में संस्कृत को पूर्णवैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ माना है।

*संस्कृत की सर्वोत्तम शब्द-विन्यास युक्ति के, गणित के, कंप्यूटर आदि के स्तर पर नासा व अन्य वैज्ञानिक व भाषाविद संस्थाओं ने भी इस भाषा को एकमात्र वैज्ञानिक भाषा मानते हुये इसका अध्ययन आरंभ कराया है* और भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का बताया है। अतः अंग्रेजी बोलने में बड़ा गौरव अनुभव करने वाले, अंग्रेजी में गिटपिट करके गुब्बारे की तरह फूल जाने वाले कुछ महाशय जो संस्कृत में दोष गिनाते हैं उन्हें कुँए से निकलकर संस्कृत की वैज्ञानिकता का एवं संस्कृत के विषय में विश्व के सभी विद्वानों का मत जानना चाहिए।
*नासा की वेबसाईट पर जाकर संस्कृत का महत्व पढ़ें।*

*काफी शर्म की बात है कि भारत की भूमि पर ऐसे लोग हैं जिन्हें अमृतमयी वाणी संस्कृत में दोष और विदेशी भाषाओं में गुण ही गुण नजर आते हैं वो भी तब जब विदेशी भाषा वाले संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं* ।

अतः जब हम अपने बच्चों को कई विषय पढ़ा सकते हैं तो संस्कृत पढ़ाने में संकोच नहीं करना चाहिए। देश विदेश में हुये कई शोधो के अनुसार संस्कृत मस्तिष्क को काफी तीव्र करती है जिससे अन्य भाषाओं व विषयों को समझने में काफी सरलता होती है , साथ ही यह सत्वगुण में वृद्धि करते हुये नैतिक बल व चरित्र को भी सात्विक बनाती है। अतः सभी को यथायोग्य संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

आज दुनिया भर में लगभग 6900 भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन भाषाओं की जननी कौन है?

नहीं?

कोई बात नहीं आज हम आपको दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।
*दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है :- संस्कृत भाषा* ।

आइये जाने संस्कृत भाषा का महत्व :
संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों एवं व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या एक से अधिक चक्रों को निम्न प्रकार से प्रभावित करके उन्हें क्रियाशील – उर्जीकृत करता है :-

मूलाधार चक्र – स्वर 'अ' एवं क वर्ग का उच्चारण मूलाधार चक्र पर प्रभाव डाल कर उसे क्रियाशील एवं सक्रिय करता है।
स्वर 'इ' तथा च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को उर्जीकृत करता है।
स्वर 'ऋ' तथा ट वर्ग का उच्चारण मणिपूरक चक्र को सक्रिय एवं उर्जीकृत करता है।
स्वर 'लृ' तथा त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को प्रभावित करके उसे उर्जीकृत एवं सक्रिय करता है।
स्वर 'उ' तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र को प्रभावित करके उसे सक्रिय करता है।
ईषत् स्पृष्ट वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रियता प्रदान करता है।
ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से

सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रिय करता है।
इस प्रकार देवनागरी लिपि के प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के किसी न किसी उर्जा चक्र को सक्रिय करके व्यक्ति की चेतना के स्तर में अभिवृद्धि करता है। वस्तुतः *संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द इस प्रकार से संरचित (design) किया गया है कि उसके स्वर एवं व्यंजनों के मिश्रण (combination) का उच्चारण करने पर वह हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करे*। प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसीलिये कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। शब्दों में शक्ति होती है जिसका दुरूपयोग एवं सदुपयोग स्वयं पर एवं दूसरे पर प्रभाव डालता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति का स्वभाव, आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व निर्धारित होता है।

उदाहरणार्थ जब 'राम' शब्द का उच्चारण किया जाता है है तो हमारा अनाहत चक्र जिसे ह्रदय चक्र भी कहते है सक्रिय होकर उर्जीकृत होता है। 'कृष्ण' का उच्चारण मणिपूरक चक्र – नाभि चक्र को सक्रिय करता है। 'सोह्म' का उच्चारण दोनों 'अनाहत' एवं 'मणिपूरक' चक्रों को सक्रिय करता है।

वैदिक मंत्रो को हमारे मनीषियों ने इसी आधार पर विकसित किया है। प्रत्येक मन्त्र स्वर एवं व्यंजनों की एक विशिष्ट संरचना है। इनका निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शुद्ध उच्चारण ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करने के साथ साथ मष्तिष्क की चेतना को उच्चीकृत करता है। उच्चीकृत चेतना के साथ व्यक्ति विशिष्टता प्राप्त कर लेता है और उसका कहा हुआ अटल होने के साथ-साथ अवश्यम्भावी होता है। शायद आशीर्वाद एवं श्राप देने का आधार भी यही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं सार्थकता इस तरह स्वयं सिद्ध है।

*भारतीय शास्त्रीय संगीत के सातों स्वर हमारे शरीर के सातों उर्जा चक्रों से जुड़े हुए हैं* । प्रत्येक का उच्चारण सम्बंधित उर्जा चक्र को क्रियाशील करता है। शास्त्रीय राग इस प्रकार से विकसित किये गए हैं जिससे उनका उच्चारण / गायन विशिष्ट उर्जा चक्रों को सक्रिय करके चेतना के स्तर को उच्चीकृत करे। प्रत्येक राग मनुष्य की चेतना को विशिष्ट प्रकार से उच्चीकृत करने का सूत्र (formula) है। इनका सही अभ्यास व्यक्ति को असीमित ऊर्जावान बना देता है।

*संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि #महर्षि_पाणिनि; #महर्षि_कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि #पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है।* यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है। ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है। जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।

*संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ?*
यह विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है। चार महत्वपूर्ण विशेषताएँ:- 1. अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:): संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं -यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं-यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा । जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- " राम फल खाता है"इसको संस्कृत में बोला जायेगा- " राम: फलं खादति"=राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है। संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना होता है ।

2.शब्द-रूप:-संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। *विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं*। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं- यथा:- रम् (मूल धातु)-राम: रामौ रामा:;रामं रामौ रामान् ;रामेण रामाभ्यां रामै:; रामाय रामाभ्यां रामेभ्य: ;रामात् रामाभ्यां रामेभ्य:; रामस्य रामयो: रामाणां; रामे रामयो: रामेषु ;हे राम ! हे रामौ ! हे रामा : ।ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन *25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं -आत्मा (पुरुष), (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार, (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण, (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्, (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द,( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश।*

3.द्विवचन:- *संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन*। सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

4. सन्धि:- *संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि*। संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।"इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे #देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।
इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन *संस्कृत शब्द* इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। *बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ* इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।
अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की *खोज हार्वे ने 1922 में की थी,* जिसे *हृदय शब्द* स्वयं *लाखों वर्षों* से उजागर कर रहा था ।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। *संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक* स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। #देवनागरी_लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है! इसलिए इसमें *हरेक चिन्ह* के लिए *एक और केवल एक ही ध्वनि है।*

*देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं*। **संस्कृत* केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि *संस्कारित भाषा* भी है, अतः *इसका नाम संस्कृत* है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। *संस्कृत को संस्कारित* करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि *महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।*

*विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में* एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। *संस्कृत में जब दो अक्षर* निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। *इसे शोध में कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि* के लिए सबसे *उपयुक्त भाषा सिद्ध हुई है* और यह भी पाया गया है कि *संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।*

*संस्कृत ही एक मात्र साधन है, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाती है।* इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। *संस्कृत केवल एक भाषा* मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। *संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है।* संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और *वसुधैव कुटुंबकम्* की भावना भी. 🙏🕉

गुरुवार, 19 मार्च 2020

योगी ने साइनाइड जहर यानी मौत को चुनौती से वैज्ञानिक सीवी रमन भी हतप्रभ

  
 
प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए, अनादि काल से अपनी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य दुस्साहस करता आया है और करता आया है अपने जीवन का बलिदान भी। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसे बलिदानियों की कमी नहीं रही है।
'#पोटेशियम #सायनाइड' का नाम मेडिकल साइन्स में कौन नहीं जानता ? यह अत्यंत तीव्र महाविष है जिसका असर प्राणी के शरीर पर इतनी तेजी से पड़ता है कि वह एक क्षण से भी कम समय में मर जाता है। इस महाविष का सुई की नोंक पर लगा सूक्ष्मतम कण ही काफी है। उस कण को जीभ पर रखने मात्र से ही प्राणी निर्जीव हो जाता है। यही कारण है कि आज तक कोई भी व्यक्ति इस महाविष का स्वाद नहीं बता पाया। इसका स्वाद बताने के लिए समय- समय पर तीन वैज्ञानिकों ने पूरी तैयारी करके अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी लेकिन वे एक शब्द तो क्या एक अक्षर से अधिक बतला पाने में सफल नहीं हुए।
लेकिन इस सत्य को भारत के एक महायोगी '#नरसिंह #स्वामी' ने झुटला दिया और अनेक विषों और घातक प
कौन था वह महायोगी ? क्या उसे 'अमरत्व' की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी ? क्या वह कालंजयी था ?

हाँ, इसमें संदेह नहीं, उस परम साधक को निश्चय ही अमरत्व की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी। उस महायोगी की खोज की थी उस समय के कलकत्ता विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के रीडर डा. #नियोगी ने।
कलकत्ता के पास एक गांव था-'#मधुपुर'। अब तो वह एक बड़ा टाउन बन गया है। डा. नियोगी की वहां रिश्तेदारी थी। एक बार वह किसी काम से उसी रिश्तेदारी में गए हुए थे। उस समय मधुपुर गांव में स्वामीजी की तपस्या और सिद्धियों की धूम मची हुई थी। गांव के लोग उन्हें संत, महात्मा और योगी कहते थे और बहुत आदर करते थे उनका। सभी लोग उनकी सिद्धियों और योगबल से चमत्कृत थे।
कहते हैं नरसिंह स्वामी ने पूरे तीस वर्षों तक हिमालय की दुर्गम कंदराओं में रह कर
'#कुण्डलिनी #योग' की कठिन साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। फिर लोक- कल्याण की भावना के चलते उस तपोभूमि से निकल कर संसार के शोर-गुल भरे क्षेत्र में आ गए वह। मधुपुर में कालीदेवी का एक मंदिर है, उसीके पास एक कुटिया बना कर रहने लगे। कालीमंदिर के सामने कदम्ब का एक पेड़ था उसी के नीचे बैठकर स्वामीजी दीन-दुखी, असहाय-अपाहिज लोगों की सेवा करने लगे। शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। डा. नियोगी ने भी स्वामीजी के चमत्कारों की कथा सुनी। उनकी जिज्ञासा जाग उठी और एक दिन वह स्वामीजी की कुटिया पर पहुँच गए। उन्होंने अपना परिचय दिया और स्वामीजी ने उन्हें अपने पास बैठा कर उनसे आत्मीयता से बात की। लेकिन कुछ ही समय बाद वह वार्तालाप एक सिद्ध योगी और कर्मठ विज्ञान-वेत्ता के बीच शास्त्रार्थ के रूप में बदल गया। तर्क-वितर्क तेज हो गया। थोड़ी देर बाद डा. नियोगी ने आवेश में आकर उन्हें चुनौती दे डाली-- कोई व्यक्ति अंगारे नहीं खा सकता, तेजाब नहीं पी सकता, जहर नहीं चाट सकता।
यह सुनकर स्वामीजी मुस्कराये फिर सहज स्वर में बोले-- ये तीनों काम मैं ही तुम्हें करके दिखा सकता हूँ। लेकिन डा. नियोगी प्रत्यक्ष प्रमाण पाये बिना उस महान योगी की क्षमता पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे। उनको घोर आश्चर्य हुआ उस समय जब स्वामीजी तत्काल तैयार हो गए उन तीनों असंभव कार्य करने के लिए।
डा. नियोगी ने तुरंत कोयले के दहकते अंगारे, शुद्ध तेजाब और तीक्ष्ण विष की व्यवस्था की और उन्हें स्वामीजी के सामने प्रस्तुत कर दिया। सभी जानते हैं कि कोई भी प्राणी इन प्राण घातक पदार्थों का सेवन कर जीवित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने कुछ उपहास के भाव के साथ कहा-- लीजिये स्वामीजी, अब आप अपनी बातों को सच साबित कर दिखाएँ, अन्यथा योगी का यह बाना उतार कर फेंक दें। डा. नियोगी की ये कड़वी बातें सुनकर भी स्वामीजी मुस्कराते रहे। इस बीच डा. नियोगी की इस चुनौति की चर्चा चारों ओर फ़ैल चुकी थी। देखते-ही-देखते मधुपुर की जनता उस अद्भुत चमत्कार को देखने काली मंदिर की ओर उमड़ पड़ी।
क्या स्वामीजी यह चमत्कार कर पाने में समर्थ हो पाये या उन्हें अपने योगी के बाना को छोड़ कर वहां से जाना पड़ा ?
नरसिंह स्वामी ने हज़ारों लोगों की आश्चर्यचकित आँखों के सामने वह तीव्र विष उठा कर पी लिया। फिर तेजाब उठा कर अपनी हथेली पर उड़ेल लिया और मुस्कराते हुए उसे इस प्रकार चाटने लगे जैसे शहद चाट रहे हों। अंत में उन्होंने दहकते अंगारों को उठा-उठा कर इस तरह खाना शुरू किया मानो स्वादिष्ट रसगुल्ले खा रहे हों।
'#हठयोग' कुण्डलिनी साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। हठयोग के साधक का शरीर के सभी अंगों पर अधिकार होता है जिसके फलस्वरूप शरीर पर किसी पदार्थ का प्रभाव नहीं पड़ता, भले ही #पोटेशियम #सायनाइड ही क्यों न हो। हठयोग के इस चमत्कार को देख कर डा. नियोगी भी एकबारगी स्तब्ध रह गए। वह स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया। मधुपुर से जाते समय डा. नियोगी ने स्वामीजी से प्रार्थना की एक बार वह अपनी इस महान योगविद्या का प्रदर्शन कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रख्यात वैज्ञानिकों के सामने अवश्य करें। स्वामीजी ने डा. नियोगी के इस अनुरोध को सहजभाव से स्वीकार कर लिया।
विज्ञान जगत में तहलका मचा देने वाले विश्व के अभूतपूर्व प्रदर्शन का आयोजन शुरू होने वाला था। तारीख निश्चित हुई--16 जनवरी,1932। यह चमत्कृत कर देने वाला आयोजन और प्रदर्शन #सर #सी.#वी. #रमन की अध्यक्षता में किया जा रहा था जो उस समय भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में पहुँच चुके थे। उस विलक्षण प्रदर्शन के आयोजक थे डा. नियोगी के अतिरिक्त साइन्स फैकल्टी के डीन डा.भट्टाचार्य, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के हैड ऑफ़ द डिपार्टमेंट डा.सरकार।  उस अवसर पर देश-विदेश के अनेक वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित किया गया था। आयोजन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त डा.सी.वी. रमन ने अध्यक्ष की हैसियत से इसकी सच्चाई परखने के लिए एक समिति का गठन किया था जिसमें पांच सदस्य थे--
1--ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के साइन्स विभागाध्यक्ष, 2--पेरिस यूनिवर्सिटी, फ़्रांस के साइन्स फैकल्टी के डीन, 3-- न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, अमेरिका के साइन्स विभाग के रीडर, 4-- मद्रास विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर और 5--कलकत्ता विश्वविद्यालय के डा. नियोगी। कहने की आवश्यकता नहीं, उस समय उस आयोजन की समूचे विश्व में धूम मच गई थी। उस प्रदर्शन को प्रत्यक्ष देखने के लिए विश्व के तमाम देशों से वैज्ञानिकों और जिज्ञासुओं के दल-के-दल भारत आने लगे।
निश्चित समय पर आयोजन आरम्भ हुआ। नरसिंह स्वामी प्रदर्शन हॉल में आ खड़े हुए। उनके चहरे पर वही सहज मुस्कान थी। सबसे पहले समिति की ओर से डॉक्टरों ने उनका गहन परिक्षण किया। हर प्रकार से जाँच कर तलाशी ली गई। यह निश्चित हो गया कि स्वामीजी ने किसी छल-प्रपंच का सहारा नहीं लिया है, न किसी प्रकार की ऐसी दवाई का सेवन किया है कि जो उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हो। सब कुछ सामान्य पाया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से भयंकर से भयंकर विष मंगा कर पहले ही रख लिए गए थे। इतना ही नहीं, विदेशों से आने वाले वैज्ञानिक भी अपने साथ भयंकरतम महाविष 'पोटेशियम सायनाइड' लेकर आये थे।
आयोजन के अध्यक्ष डा.सी.वी.रमन ने स्वामीजी के सामने एक दस्तावेज रखते हुए अनुरोध किया कि प्रदर्शन से पूर्व इस पर हस्ताक्षर कर दें। क़ानूनी कार्यवाही निश्चित रूप से महत्वपूर्ण थी। उस दस्तावेज में यह घोषणा थी--" स्वामीजी स्वेच्छा से यह प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान यदि उनकी मृत्यु हो जाती है तो समिति पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।"।       हस्ताक्षर करने के बाद ही यह प्रदर्शन संभव था। स्वामीजी ने बिना सोचे-समझे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।
दार्थो के आलावा संसार का सबसे तीक्ष्ण विष 'पोटेशियम सायनाइड' को भी खाकर जीवित बने रहने का अद्भुत कारनामा करके सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिकों में तहलका मचा दिया था।

मंगलवार, 10 मार्च 2020

बंद करो करोना का रोनाधोना,ऐसे मनाएं होली कुछ नहीं होना

    



* इस तरीके से बनाये अपने घर में होली का रंग और कोरोना से बचें.
*होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता है । वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव भी कहा गया है।*
*यह वैदिक उत्सव है । लाखों वर्ष पहले भगवान रामजी हो गये । उनसे पहले उनके पिता, पितामह, पितामह के पितामह दिलीप राजा और उनके बाद रघु राजा... रघु राजा के राज्य में भी यह महोत्सव मनाया जाता था ।
*होली रंगों का त्यौहार है, हँसी-खुशी का त्यौहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन.... इस आधुनिक रूप से होली मनाने से बहुत नुकसान होता है ।*
*आपको हम रासायनिक रंगों से होने वाली हानियां और अपने घर में ही सस्ते में प्राकृतिक रंग किस प्रकार बना सकते हैं, उसके बारे में बताते है।*
*रासायनिक रंगों से होने वाली हानि...*
*1 - काले रंग में लेड ऑक्साइडत पड़ता है जो गुर्दे की बीमारी, दिमाग की कमजोरी करता है ।*
*2 - हरे रंग में कॉपर सल्फेट होता है जो आँखों में जलन, सूजन, अस्थायी अंधत्व लाता है ।*
*3 - सिल्वर रंग में एल्युमीनियम ब्रोमाइड होता है जो कैंसर का कारक होता है ।*
*4- नीले रंग में प्रूशियन ब्लू (कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस) होता है जिससे भयंकर त्वचारोग होता है ।
*5 - लाल रंग में मरक्युरी सल्फाइड होता है जिससे त्वचा का कैंसर होता है ।*
*6- बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड होता है जिससे दमा, एलर्जी होती है ।*
*अब आपको घर में ही प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ बता रहे हैं जो आसानी से बनाकर उपयोग कर सकते हैं और मना सकते हैं एक स्वस्थ होली ।*
*केसरिया रंग - पलाश के फूलों से यह रंग सरलता से तैयार किया जा सकता है। पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें । सुबह इस केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लाएं अथवा उबालकर होली का आनंद उठायें ।
*यह रंग होली खेलने के लिए सबसे बढ़िया है। शास्त्रों में भी पलाश के फूलों से होली खेलने का वर्णन आता है । इसमें औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है । रक्तसंचार को नियमित व मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ ही यह मानसिक शक्ति तथा इच्छाशक्ति में भी वृद्धि करता है ।
*सूखा हरा रंग - मेंहदी का पाउडर तथा गेहूँ या अन्य अनाज के आटे को समान मात्रा में मिलाकर सूखा हरा रंग बनायें । आँवला चूर्ण व मेंहदी को मिलाने से भूरा रंग बनता है, जो त्वचा व बालों के लिए लाभदायी है ।*
*सूखा पीला रंग - हल्दी व बेसन मिला के अथवा अमलतास व गेंदे के फूलों को छांव में सुखाकर पीस के पीला रंग प्राप्त कर सकते हैं।*
*गीला पीला रंग - एक चम्मच हल्दी दो लीटर पानी में उबालें या मिठाइयों में पड़ने वाले रंग जो खाने के काम आते हैं, उनका भी उपयोग कर सकते हैं । अमलतास या गेंदे के फूलों को रात को पानी में भिगोकर रखें, सुबह उबालें ।*
*लाल रंगः लाल चंदन (रक्त चंदन) पाउडर को सूखे लाल रंग के रूप में प्रयोग कर सकते हैं । यह त्वचा के लिए लाभदायक व सौंदर्यवर्धक है । दो चम्मच लाल चंदन एक लीटर पानी में डालकर उबालने से लाल रंग प्राप्त होता है, जिसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलायें ।*
*पीला गुलाल : (१) ४ चम्मच बेसन में २ चम्मच हल्दी चूर्ण मिलायें | (२) अमलतास या गेंदा के फूलों के चूर्ण के साथ कोई भी आटा या मुलतानी मिट्टी मिला लें ।*
*पीला रंग : (1) 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में उबालें | (2) अमलतास, गेंदा के फूलों को रातभर भिगोकर उबाल लें ।*
*जामुनी रंग : चुकंदर उबालकर पीस के पानी में मिला लें।*
*काला रंग : आँवले के चूर्ण को लोहे के बर्तन में रातभर भिगोयें ।*
*लाल रंग : (1) आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी चूर्ण व चुटकीभर चूना मिलाकर 10 लीटर पानी में डाल दें | (2) 2 चम्मच लाल चंदन चूर्ण 1 लीटर पानी में उबालें ।*
*लाल गुलाल : सूखे लाल गुड़हल के फूलों का चूर्ण उपयोग करें ।*
*हरा रंग : (1) पालक, धनिया या पुदीने की पत्तियों के पेस्ट को पानी में भिगोकर उपयोग करें | (2) गेहूँ की हरी बालियों को पीस लें ।*
*हरा गुलाल : गुलमोहर अथवा रातरानी की पत्तियों को सुखाकर पीस लें  ।
*भूरा हरा गुलाल : मेहँदी चूर्ण के साथ आँवला चूर्ण मिला लें
*सभी देशवासियों से अनुरोध है कि आप केमिकल रंगों से होली न खेलें और न ही जानवरों जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैस आदि पर कोई रंग डाले क्योंकि रंग में केमिकल
होता है। वो अपने आप को साफ़ करने के लिए अपने को जीभ से चाटते हैं और वो केमिकल उनके पेट में जाता है और बीमार पड़ जाते हैं या मर जाते हैं ।*
*होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी, वैदिक गानों से ही करनी चाहिए । फिल्मो के गानों से करने से हानि होती है । उससे भी बचें ।*
*पूरे साल स्वस्थ्य रहने के लिए क्या करें होली पर..??*

*1- होली के बाद 15-20 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है ।
*2- इन दिनों में भुने हुए चने - ‘होला का सेवन शरीर से वात, कफ आदि दोषों का शमन करता है ।*

*3- एक महीना इन दिनों सुबह नीम के 20-25 कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है ।*

*4- होली के दिन चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ था । इन दिनों में हरिनाम कीर्तन करना-कराना चाहिए । नाचना, कूदना-फाँदना चाहिए जिससे जमे हुए कफ की छोटी-मोटी गाँठें भी पिघल जायें और वे ट्यूमर कैंसर का रूप न ले पाएं और कोई दिमाग या कमर का ट्यूमर भी न हो । होली पर नाचने, कूदने-फाँदने से मनुष्य स्वस्थ रहता है।

गुरुवार, 5 मार्च 2020

करोना वायरस के प्रभाव से होलिका दहन सहित संपूर्ण त्यौहार व्रत और संस्कृति आज प्रासंगिक बना


  


 भारतीय सनातन संस्कृति और उसके विभिन्न आयामों का आप सूक्ष्मता से विवेचन करेंगे यह संपूर्ण जीवन पद्धति है इसमें कोई वायरस या त्रिविध तापों का संपूर्ण समाधान है और उसी  भारत अपनी सनातन संस्कृति की छोड़कर पागल बनने की तरफ अग्रसर हो रहा है .....
बन्द करो #करोना  का रोना
बनो सनातन कुछ ना होना
तन- मन- जीवन हिन्दू हो तो
सदा स्वस्थ कोई रोग ना होना
करना है तो करो नमस्ते
शेक हैंड मत "#करोना"
खाना में शाकाहार करो ,
मांसाहार मत " #करोना"
रोज करो तुलसी का सेवन ,
धूम्रपान मत " #करोना"
नीम गिलोय का घूंट भरो
मदिरा पान मत " #करोना*
देशी भोजन रोज करो
फ़ास्ट फ़ूड मत " #करोना"
हाथ साफ दस बार करो
कहीं गंदगी मत " #करोना*
अग्नि संस्कार करो शव का
लाश दफन मत " #करोना*
#CoronaVirus #WuhanCoronaVirus
भारत की जलवायु और प्रकृति ही करेगी कोरौना का सफाया। 4℃ से 6℃ तक ही कोरौना सक्रिय और पनप पाता है और इससे अधिक तापमान में अपनी ताकत खोता है और असक्रिय होकर दम तोड़ देता है। यही कारण है कि इबोला, सार्स, स्वाइन फ्लू आदि भारत मे पूरी दुनिया की तादाद में कमजोर रहे।
मीडिया फ्लू से डरने से अधिक शाकाहारी जीवन और आयुर्वेद को अपनायें। गिलोय, नीम, तुलसी, हल्दी और गौमूत्र का सेवन तो कोरौना क्या इसकी सात पुश्तों से लड़ सकने लायक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाता है।
#SAAR #Ebola #SwineFlu #BirdFlu #ZikaVirus #NipahVirus
यज्ञ में जावित्री की आहुति कोरोना वायरस का काल है
कोरोना वायरस दुनिया में कहर ढा रहा है अब यह चीन की महामारी ना होकर विश्वमहारी की ओर बढ़ रहा है| 50 देशों में फैल गया है 2800 से अधिक मौतें 75000 से अधिक केस सामने आ आ चुके हैं| कोरोना इबोला हेपेटाइटिस स्वाइन फ्लू या अन्य महामारी संक्रमण के लिए जिम्मेदार वायरस कोई आजकल के तो है नहीं यह भी उतने ही प्राचीन है कि जितना प्राचीन पृथ्वी पर जीवन है|
14 शताब्दी में मध्य एशिया यूरोप में प्लेग के वायरस ने 20 करोड लोगों का सफाया कर दिया था यह virus भारत का कुछ नहीं बिगाड़ पाया | भारत की संस्कृति यज्ञ संस्कृति रही है यज्ञ ने इस देश को महामारी संक्रामक रोग से बचाया है यहां जो भी महामारी आई पराधीनता के काल में आई या जब से हमने यज्ञ करना कराना छोड़ दिया|
भारत से 9000 किलोमीटर दूर दक्षिण एशियाई देश है इंडोनेशिया यह 2,000 से अधिक छोटे बड़े टापू से मिलकर बना देश है.... यह आर्यव्रत का हिस्सा था सनातन  संस्कृति से ही संरक्षित होता था| इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता है जो उसके प्राचीन नाम जयकृत का अपभ्रंश है| राजे महाराजे भारत के इस देश से जावित्री और जायफल मसाले को मंगाते थे यह मसाला अपने देश में नहीं होता... इंडोनेशिया के बाली सुमात्रा जावा द्वीप में यह होता है.... जावित्री , जायफल एक ही पेड़ के उत्पाद है जायफल पेड़ का बीज है तथा जावित्री बीज को घेरा हुए लाल आवरण है|
जावित्री केवल मसाला ही नहीं यह दुनिया की बेस्ट एंटी वायरल मेडिसिन है.... हमारे पूर्वज हवन सामग्री में मिलाकर यज्ञ में इसे डालते थे.... जावित्री इन रोगों का खात्मा करती है जो स्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं कोरोनावायरस से जुकाम फेफड़ों का तीव्र संक्रमण एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम कहते हैं उसका खात्मा कर देती है| कोरोनावायरस बड़ा ही अजीबोगरीब है| यह वायरसों के एक परिवार का सदस्य है जिसने सभी का कॉमन नाम कोरोना ही है... हाल फिलहाल जिस से चीन में आतंक फैला हुआ है वैज्ञानिकों ने उसका नाम कोविड 2019 रखा है.... यह वायरस गोलाकार होता है इसके चारों तरफ सुनहरे कांटे होते हैं इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से जब देखते हैं एक क्राउन( ताज) की भांति यह आवरण से ढका हुआ होता है| कोरोना परिवार के वायरस साधारण जुकाम से लेकर खतरनाक निमोनिया के लिए जिम्मेदार है|
United State Disease Control , विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस कोरोना 2019 वायरस के सामने लाचार है ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन केवल एडवाइजरी इस वायरस से बचाव के तरीके ही जारी कर रहा है |
अभी तक तो दुनिया की किसी लेबर्ट्री में इस वायरस के खिलाफ कोई एंटीवायरल ड्रग नहीं बनी है Remedesvir नामक ड्रग को इसका समाधान खोजा जा रहा है लेकिन वह अभी क्लिनिकल ट्रायल से कोसों दूर है|
यह तो रहा संक्षिप्त में इस वायरस का वैज्ञानिक वर्णन अब मुद्दे पर लौटते हैं कोरोना क्या जितने भी ज्ञात अज्ञात वायरस हैं जो खोजे गए हैं या खोजे जाएंगे उनकी संख्या 10 करोड़ से अधिक बताई जाती है सभी का काल है यज्ञ...|
अपने देश में होली, दीपावली जैसे प्राचीन त्योहारों पर ऋतु अनुकूल सामग्री से बड़े-बड़े यज्ञ करने की स्वस्थ परंपरा रही है| फागुन , चैत्र के महीने में जब जावित्री को यज्ञ सामग्री में मिलाकर व खेतों में उगे हुए गेहूं जौ की बालियों को मिलाकर यज्ञ किया जाए तो यह खतरनाक वायरस मानव शरीर तो क्या गांव की सीमाओं में भी नहीं घुस सकते...  हमारे ऋषियों ने सावित्री की गणना सुगंधी कारक जड़ी बूटी में की है जावित्री केवल सुगंधीकारक ही नहीं रोग नाशक भी है|

जावित्री कोई बहुत महंगा मसाला नहीं है ₹20 में 10 ग्राम मिलती है अर्थात ₹2000 किलो है 1 किलो जावित्री से एक गांव को वायरस से मुक्त किया जा सकता है यदि विधिवत यज्ञ किया जाए... साथ ही ऋतु अनुकूल सामग्री इस्तेमाल में लाई जाए|
साथियों अपने देश को कोरोनावायरस से सर्वाधिक खतरा है क्योंकि भारत विशाल आबादी का देश है चीन से हमारी सीमाएं मिली हुई है यह तो ईश्वर का कोई कर्म है यह virus भारत में अभी नहीं फैला है... कोरोना वायरस से पीड़ित व्यक्ति की छींक की एक बूंद में करोड़ों वर्ष होते हैं एक व्यक्ति छींक के द्वारा एक समय पर दर्जनों लोगों को संक्रमित कर सकता है|
सरकार के भरोसे मत बैठिए सरकारे इस वायरस से आपको नहीं बचा पाएंगी बताना चाहूंगा ईरान सहित कुछ मध्य एशियाई देशों के तो उपराष्ट्रपति भी इस वायरस से संक्रमित हैं...|
वायरस से आपको केवल और केवल यज्ञ ही बचा सकता है यदि सभी रोगों की एंटीवायरल एंटीबायोटिक थेरेपी है|
इस होली पर 9 मार्च को अपने गांव चौपालों पर सामूहिक जावित्री मसाले से युक्त सामग्री से यज्ञ कीजिए विशेष दो-तीन घंटे आप अपने गांव राष्ट्र को बचा सकते हैं| 

सोमवार, 6 जनवरी 2020

गांधी दर्शन में रामराज्य का विचार के प्रतिपादक धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी ही थे


  
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री (१९०७ - १९८२) भारत के एक महान सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। उनका मूल नाम हरि नारायण ओझा था। वे हिन्दू दसनामी परम्परा के संन्यासी थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम " हरिहरानन्द सरस्वती" था किन्तु वे "करपात्री" नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे। उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद नामक राजनैतिक दल भी बनाया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें 'धर्मसम्राट' की उपाधि प्रदान की गई।
जीवनी -
स्वामी श्री का जन्म संवत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को ग्राम भटनी, ज़िला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में सनातन धर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण स्व. श्री रामनिधि ओझा एवं परमधार्मिक सुसंस्क्रिता स्व. श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम 'हरि नारायण' रखा गया। स्वामी श्री 8-9 वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे। वस्तुतः 9 वर्ष की आयु में सौभाग्यवती कुमारी महादेवी जी के साथ विवाह संपन्न होने के पश्चात 16 वर्ष की अल्पायु में गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली। हरि नारायण से ' हरिहर चैतन्य ' बने। वे स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति 'फोटोग्राफिक' थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। उन्होंने तर्क धुरंधर मदन मोहन मालवीय जी एवं स्वामी दयानंद सरस्वती जी को भी परास्त किया था, उन्हें सरस्वती जी का वरदान था कि स्वप्न में भी उनकी वाणी शास्त्र विरूद्ध नहीं होगी। उनके लिए शास्त्र सम्मत भगवान् का स्वरूप ही ग्राह्य था।स्वामी जी वैष्णव मतों के विरूद्ध नहीं थे, बल्कि जब काशी के विद्वत्परिषद् ने भागवत्पुराण के नवम् दशम् स्कन्ध को अश्लील एवं क्षेपक कहकर निकालने का निर्णय कर लिया तब करपात्रीजी ने पूरे दो माह पर्यन्त भागवत की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत कर सिद्ध कर दिया कि वह तो भागवत की आत्मा ही है, हाँ जब कुछ वैष्णवों ने करपात्रीजी के लिए अपने ग्रंथों में कटु शब्दों का प्रयोग किये तब उनके शास्त्रार्थ महारथी शिष्यों ने उसका उसी भाषा में उत्तर दिया। इससे उन्हें वैष्णव विरोधी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। आज जो रामराज्य संबंधी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर अांदोलन, धर्म सापेक्ष राज्य, आदि सभी के मूल में स्वामी जी ही हैं। संतों के वैचारिक विरोधों के साथ ही उनमें आपसी प्रेम भी है हमें उसे नहीं भूलना चाहिए।
शिक्षा-
नैष्ठिक ब्रम्हचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया।
तपस्वी जीवन-
17 वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखंड साधना, आत्मदर्शन, धर्म सेवा का संकल्प लिया। काशी धाम में शिखासूत्र परित्याग के बाद विद्वत, सन्यास प्राप्त किया। एक ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र रखकर भयंकर शीतोष्ण वर्षा का सहन करना इनका 18 वर्ष की आयु में ही स्वभाव बन गया था। त्रिकाल स्नान, ध्यान, भजन, पूजन, तो चलता ही था। विद्याध्ययन की गति इतनी तीव्र थी कि संपूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम घंटों और दिनों में हृदयंगम कर लेते। गंगातट पर फूंस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, घरों में भिक्षाग्रहण करनी, चौबीस घंटों में एक बार। भूमिशयन, निरावण चरण (पद) यात्रा। गंगातट नखर में प्रत्येक प्रतिपदा को धूप में एक लकड़ी की किल गाड कर एक टांग से खड़े होकर तपस्या रत रहते। चौबीस घंटे व्यतीत होने पर जब सूर्य की धूप से कील की छाया उसी स्थान पर पड़ती, जहाँ 24 घंटे पूर्व थी, तब दूसरे पैर का आसन बदलते। ऐसी कठोर साधना और घरों में भिक्षा के कारण "करपात्री" कहलाए। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा.
दण्ड ग्रहण-
24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर "अभिनवशंकर" के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर "परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज" हलाए।
अखिल भारतीय राम राज्य परिषद-
अखिल भारतीय राम राज्य परिषद भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधानसभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।
गोरक्षा आन्दोलन -
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था , करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती । इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें . जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं .लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी .जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया , जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी ,तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया , हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी , जिसे "गोपाष्टमी" भी कहा जाता है .इस धरने में भारत साधु-समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। जैन मुनि सुशीलकुमार जी तथा सार्वदेशिक सभा के प्रधान लाला रामगोपाल शालवाले और हिन्दू महासभा के प्रधान प्रो॰ रामसिंह जी भी बहुत सक्रिय थे। श्री संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा पुरी के जगद्‍गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे.लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी , जिस से कई साधू मारे गए । इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ” गुलजारी लाल नंदा ” ने अपना त्याग पत्र दे दिया , और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था . लेकिन संत " राम चन्द्र वीर " अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था . राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है । यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था .
ब्रह्मलीन-
माघ शुक्ल चतुर्दशी संवत 2038 (7 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से उनके पंच प्राण महाप्राण में विलीन हो गए। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधी दी गई|
उन्होने वाराणसी में "धर्मसंघ" की स्थापना की। उनका अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता। वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक थे। सन् १९४८ में उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना की जो परम्परावादी हिन्दू विचारों का राजनैतिक दल है।
आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपने अनेक अद्भुत ग्रन्थ लिखे जैसे :- वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य आदि। आपके ग्रंथो में भारतीय परंपरा का बड़ा ही अद्भुत व् प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आप ने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है।
धर्मसम्राट के कुछ महत्पूर्ण उपदेश -
दुस्त्यज दुर्व्यसन एवं पाशविकी चेष्टाओं को दूर करने के लिए दुस्त्यज धर्मनिष्ठा की अपेक्षा होती है और फिर उस दुस्त्यज धर्मनिष्ठा के त्याग के लिये दुस्त्यज ब्रह्मनिष्ठा या भगवद् अनुराग की अपेक्षा होती है।
हमें चमत्कार , सिद्धि या शान्ति आदि गुणों से मोहित नहीं होना है । हमें वेद- पुराणों के अनुसार चलना होगा चाहे उसमें कमियाँ ही क्यों न दीखें । यह वैदिकों का धर्म है । 
भावुक भक्तों और ब्रह्मवादियों को ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है । 
कर्मणा वर्ण व्यवस्था मानने पर दिन भर में ही अनेक बार वर्णन बदलते रहेंगे। फिर व्यवस्था क्या होगी ? अतः उपनयन ,वेदाध्ययन, अग्निहोत्र आदि कर्म  का अनुष्ठान भोजन विवाह आदि सभी सांस्कृतिक कर्म जन्मना ब्राम्हण आदि के आपस में ही हो सकते हैं । जन्मना ब्राह्मण और कर्मणा मुसलमान ब्राम्हण आदमी भोजन विवाह आदि संबंध तथा जन्मना वर्णों से भिन्न लोगों का उपनयन ,अग्निहोत्र आदि कर्मों का अधिकार सर्वथा शास्त्र विरुद्ध है ।
साधन भक्ति के प्रभाव से मनुष्य क्या नहीं कर सकता, अर्थात् सब कुछ कर सकता है। विशुद्ध भक्ति और भगवच्चरणारविन्द में उत्कट प्रेम होने पर मनुष्य में दैवी ऐश्वर्य प्रकट होने लगता है। जो व्यक्ति केवल परमेश्वर को ही अपना सर्वस्व (सर्वेसर्वा) समझता है, वह असम्भव से असम्भव कार्य को सम्भव कर देता है। 
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः । नश्वरं गृह्यमाणं तं विद्धि मायामनोमयम् ।। (श्रीमद्भागवत 11.7.7) -- यह जगत् क्या है ? यह जगत् मन का विलास है , सारा विश्व-प्रपञ्च मनोमात्र है । " हे उद्धव ! इस जगत् में जो कुछ मन से सोचा जाता है , वाणी से कहा जाता है , नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है वह सब नाशवान है । स्वप्न की तरह मन का विलास है , माया मात्र है , ऐसा समझो । " मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ।। (माण्डूक्य कारिका , 3.31) सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावेभावात्तदभावेSभावात् , इति अन्वय-व्यतिरेकलक्षणमनुमानम् ।। ( शाङ्करभाष्य ) विमतं मनोमात्रं तद्भावे नियतभावत्वात् , यथा मृद्भावे नियतभावो मृन्मात्रो घटादिः ।। ( आनन्दगिरि ) -- " जाग्रत् अवस्था में , स्वप्नावस्था में प्रपञ्च का उपलम्भ ( उपलब्धि ) होता है । सुषुप्ति और समाधि मे प्रपञ्च का उपलम्भ नहीं होता । इसका कारण क्या है ? जाग्रत् - स्वप्न में मन स्पन्दित होता है , कलना युक्त होता है , ग्राह्य-ग्राहक भाव को प्राप्त होता है । जब कि सुषुप्ति-समाधि में कलना युक्त नहीं होता ,ग्राह्य ग्राहक भाव को प्राप्त नहीं होता । सुषुप्ति में मन सुप्त - विलीन हो जाता है और समाधि में विस्मृत । इससे सिद्ध होता है कि सारा जगत् मन का विलास है ।
"एक दूसरे पर अनन्य प्रीती करनेवाले दो मालिकों के नौकर यदि एक दूसरे के स्वामी की निंदा करें तो वह दोनों जैसे स्वामी द्रोही कहे जाते हैं । वैसे ही एक दूसरे के आत्मा और एक-दूसरे के ध्यान में निमग्न माधव श्री विष्णु और  श्री शिव की निंदा करने वाले स्वामी द्रोही है ।"
श्रीआद्यशंकराचार्यजी ने कहा है -- अस्ति न खलु कश्चिदुपापायः सर्वलोकपरितोषकरो यः | सबको संतुष्ट कर पाना संभव नहीं है अतः स्वयं के और सबके हित के अविरुद्ध तथा अनुरूप आचरण निःशंक होकर करते रहना चाहिए सबको संतुष्ट करने के व्यामोह में स्व - पर हित से विमुख नहीं होना चाहिए |  स्व - पर  हित के अविरुद्ध और अनुकूल प्रिय का ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए .

रुद्राक्ष का चमत्कार को ना बनाएं व्यापार

   


रूद्राक्ष का चमत्कारिक रहस्य:
रूद्राक्ष को मनुष्य जाति के लिए चमत्कार पूर्णं तथा वरदान स्वरूप बताया गया है। इसकी उत्पत्ती मानव मात्र के कल्याण के लिए भगवान शंकर ने अपने अश्रुओं से किया है। कहा जाता है कि रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है।
जो व्यक्ति किसी भी रूप में रूद्राक्ष धारण कर लेता है उसके सारे समस्याओं का निराकरण स्वतः ही होने लगता है, तथा वह समस्त प्रकार के संकटों से बचा रहता है। ऐसे व्यक्ति की कभी भी आकस्मीक दुर्घटना नहीं होती वह हर प्रकार के अला-बलाओं से मुक्त रहता है। रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के पापों का क्षय होता है चाहे वह गोहत्या अथवा ब्रह्म हत्या जैसा पाप ही क्यों न हो।
रूद्राक्ष की माला को तंत्र शास्त्रों में अत्यधिक महत्व पूर्णं एवं चमत्कारिक माना गया है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु जीवन की प्राप्ति होती है तथा उसकी अकाल मृत्यु कभी नही हो सकती। जो मनुष्य रूद्राक्ष धारण करता है उसे जीवन में धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है, साथ ही साथ मनुष्य के अनेकों शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान होने लगता है तथा मन में असिम शांति का अनुभव होने लगता है।
रूद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के उपर भुत-प्रेत, जादू-टोना, तथा किए-कराए का कोइ आर नही पड़ता। रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति रूद्र तुल्य हो जाता है उसके पाप, ताप, संताप पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं। चाहे कोई संयासी हो अथवा गृहस्थ सभी के लिए रूद्राक्ष सामान रूप से उपयोगी माना गया है। जिस घर में नित्य रूद्राक्ष का पूजन किया जाए उस घर में हमेशा सुख शांति बनी रहती है तथा उसके घर में अचल लक्ष्मी का सदा वास होता है।
रूद्राक्ष के मुखों के अनुसार पुराणों मे इसका महत्व तथा उपयोगिता का उल्लेख मिलता है। मुख्यतः एक मुख से लेकर इक्किस मुखी तक रूद्राक्ष प्राप्त होता है तथा प्रत्येक रूद्राक्ष का अपना अलग-अलग महत्व तथा उपयोगिता होती है।
एकमुखी रूद्राक्ष
पुराणों मे एकमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र का स्वरूप कहा गया है यह चैतन्य स्वरूप पारब्रह्म का प्रतिक है। एकमुखी रूद्राक्ष को अत्यंत दुर्लभ तथा अद्वितिय माना गया है क्योंकि सौभाग्य शाली मनुष्य को ही एक मुखी रूद्राक्ष प्राप्त होता है।
इसे धारण करने वाले व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अभाव नही रहता तथा जीवन में धन, यश, मान-सम्मान, की प्राप्ति होती रहती है तथा लक्ष्मी चिर स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है। एकमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से सभी प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक रोगों का नाश होने लगता है तथा उसकी समस्त मनोकामनाएं स्वतः पूर्णं होने लगती हैं।
परंतु ध्यान रखें गोलाकार एकमुखी रूद्राक्ष को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है यह अत्यंत दुर्लभ है। काजू दाने की आकार वाली एकमुखी रूद्राक्ष सरलता से प्रप्त होती है परंतु यह कम प्रभावी होता है।
दोमुखी रूद्राक्ष
शास्त्रों में दोमुखी रूद्राक्ष को अर्धनारिश्वर का प्रतिक माना गया है। यह शिव भक्तों के लिए उचित एवं उपयोगी माना गया है। इसे धारण करने से मन में शांति तथा चिŸा में एकाग्रता आने से आध्यात्मीक उन्नती तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है।है।
तीनमुखी रूद्राक्ष
तीनमुखी रूद्राक्ष को साक्षात अग्नि स्वरूप माना गया है। इस रूद्राक्ष में त्रिगुणात्मक शक्तियाँ समाहित होती हैं। इसे धारण करने वाला व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है उसके सभी मनोरथ शीघ्र पुरे हो जाते हैं। तथा घर में धन-धान्य, यश, सौभाग्य की वृद्धि होने लगती है। तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से परीक्षा, इन्टरव्यु, नौकरी तथा रोजगार के क्षेत्र में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त होती है।
चारमुखी रूद्राक्षचारमुखी रूद्राक्ष को ब्रह्म स्वरूप माना जाता है। यह शिक्षा के क्षेत्र में पूर्णं रूप से सफलता दिलाने में समर्थ है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति कि वाक शक्ति प्रखर तथा स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है और शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति अग्रणी हो जाता है।
पाँचमुखी रूद्राक्ष
पाँचमुखी रूद्राक्ष को साक्षात रूद्र स्वरूप है। यह रूद्रावतारी हनुमान का प्रतिनिधित्व करता है। इसे कालाग्नी नाम से भी जाना जाता है, यह प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। माला के लिए इसी रूद्राक्ष का उपयोग किया जाता है। पंचमुखी रूद्राक्ष को किसी भी साधना में सिद्धि एवं पूर्णं सफलता दायक माना गया है। इसे धारण करने से सांप, बिच्छु, भुत-प्रेत जादू-टोने से रक्षा होती है तथा मानसिक शांति और प्रफुल्लता प्रदान करते हुए मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों तथा रोगों को नष्ट करने में समर्थ है।
छःमुखी रूद्राक्ष
इसे भगवान कार्तिकेय का स्वरूप माना गया है। छःमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य की खोई हुई शक्तियाँ पुनः जागृत होने लगती हैं। स्मरण शक्ति प्रबल तथा बुद्धि तीब्र होती है। छःमुखी रूद्राक्ष धारण करने से ब्रह्महत्या से भी बड़ा पाप नष्ट हो जाता है। तथा धर्म, यश तथा पुण्य प्राप्त होता है। इसे धारण करने से हृदय रोग, चर्मरोग, नेत्ररोग, हिस्टिरीया तथा प्रदर रोग जैसे विकार नष्ट हो जाते हैं।
सातमुखी रूद्राक्ष
सातमुखी रूद्राक्ष सप्तऋषियों के स्वरूप है। इसे धारण करने से धन, संपति, कीर्ति और विजय की प्राप्ति होती है तथा कार्य व्यापार में निरंतर बढ़ोŸारी होती है। सप्तमुखी रूद्राक्ष को दुर्घटना तथा अकाल मृत्यु को हरण करने वाला तथा पूर्णं संसारिक सुख प्रदान करने वाला बताया गया है।
अष्टमुखी रूद्राक्ष
इसे अष्टभुजी देवी माँ दुर्गा का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति, चित्त में एकाग्रता तथा केश मुकदमों में सफलता प्राप्त होती है। अष्टमुखी रूद्राक्ष को धारणा करने से आँखों मे अजीब सा सम्मोहन शक्ति आ जाती है जिससे सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। इसके माध्यम से कुण्डलिनी शक्ति को भी जागृत किया जा सकता है।
नौमुखी रूद्राक्ष
नौमुखी रूद्राक्ष नवदुर्गा, नवग्रह, तथा नवनाथों का प्रतिक माना जाता है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार की साधनाओं मंे सफलता प्राप्त होती है। यह अकाल मृत्यु निवारक, शत्रुओं को परास्त करने, मुकदमों में सफलता प्रदान करने तथा धन, यश तथा कीर्ति प्रदान करने में समर्थ है।
दसमुखी रूद्राक्ष
दसमुखी रूद्राक्ष को दसो दिशाओं का सुचक तथा दिग्पाल का प्रतिक है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के लौकिक तथा पारलौकिक कामनाओं की पूति होती है। समस्त प्रकार के विघ्न बाधाओं तथा तांत्रिक बाधाओं से रक्षा करते हुए सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
ग्यारहमुखी रूद्राक्षग्यारहमुखी रूद्राक्ष को हनुमान स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने पर किसी भी चीज का अभाव नही रहता तथा सभी प्रकार के संकट और कष्ट दुर हो जाते हैं। इसे धारण करने से संक्रामक रोगों का नाश होता है। यदि बंध्या स्त्री को भी इसे धारण कराया जाए तो निश्चय ही उसकी संताने पैदा हो जाती है।
बारहमुखी रूद्राक्ष
बारह मुखी रूद्राक्ष को आदित्य स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति तेजस्वी तथा शक्तिशाली बनता है तथा उसके चेहरे पर हमेशा ओज और तेज झलकता रहता है साथ ही सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसे धरण करने से आँखों की रोशनी बढ़ जाती है तथा आँखों में सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
तेरहमुखी रूद्राक्ष
इसे इन्द्र स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से समस्त प्रकार के सिद्धियों मे सफलता प्राप्त होती है। शारीरिक सौन्दर्य मे वृद्धि तथा जीवन में यश, मान सम्मान, पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
चैदहमुखी रूद्राक्ष
इसे साक्षात त्रिपुरारी स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से स्वास्थ्य लाभ शारीरिक, मानसिक तथा व्यापारिक उन्नती मे सहायक होता है। यह स्मस्त प्रकार के आध्यात्मीक तथा भौतिक सुखों को प्रदान करने में समर्थ है।
गौरीशंकर रूद्राक्ष
इसे शिव तथा शक्ति का मिश्रीत स्वरूप माना गया है। यह प्राकृतिक रूप से वृक्ष पर ही जुड़ा हुआ उत्पन्न होता है। इसे धारण करने पर शिव तथा शक्ति की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है, यह आर्थिक दृष्टि से पूर्णं सफलता दायक होता है। पारिवारिक सामंजस्य आकर्षण तथा मंगल कामनाओं की सिद्धि में सहायक होने के साथ-साथ लड़का-लड़की के विवाह में आ रही बाधाओं को समाप्त कर वर अथवा बधू की प्राप्ति मे भी सहायक है।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...