श्रीकृष्णजन्माष्टम्यां हार्दाः शुभाशयाः।
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
सत्पुरुषों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वालों दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं (श्रीकृष्ण) प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।, for the destruction of the evil-doers, for the enthroning of the Right, I am born from age to age.
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किसी वस्तु में ईश्वर नहीं होता , ईश्वर होता है आपकी बुद्धि में ।
और जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तब वह शालिग्राम और नर्मदा शंकर में पत्थर नहीं देखता ।
जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तो गंगा नर्मदा यमुना में नदी नहीं देखता , ईश्वर (देवी) देखता है ।
वह ईश्वर को पीपल और बरगद में देखता है , वह स्त्री में माँ को देखता है वह पुरूष में पिता को देखता है, वह गुरू में ईश्वर देखता है ।
वह गाय में पशु नहीं देवी देखता है ।
और जब बुद्धि ईश्वराकार होने लगेगी तब सर्वत्र श्रीकृष्ण दिखने लगेंगे ।
निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों के सर्वांग रूप साक्षात् श्री हरि , भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आपके इसी जीवन को कल्याणकारी बनाए , ऐसी मनोभावना करता हूँ ।
मथुरा सहित संपूर्ण विश्व राक्षसों से मुक्त हो , शुद्ध हो !
जय श्री कृष्णा
कृष्ण का वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत का अंकुरण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है कर्मयोगी श्रीकृष्ण* वह कृष्ण नीति आज भी प्रासंगिक जान पड़ती है
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की स्थापना होती है। इसी राष्ट्र धर्म के अनुसार लौकिक-पारलौकिक-नीति, शत्रु-मित्र-व्यवहार, कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय व्यक्ति और समाज तथा देश-देशांतर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है। इसकी क्रियात्मकता और आचरण में त्रुटि होने पर ,प्रमाद होने पर राष्ट्र पतित हो कर नष्ट हो जाते हैं। महापुरुष उसी तत्वज्ञान को अपने पराक्रम, पुरुषार्थ, बुद्धिमत्ता, कुशलता और व्यावहारिकता के द्वारा पतन के गर्त में जाते हुए राष्ट्र में पुनः प्रतिष्ठित कर नवीन स्फूर्ति प्रदान करते हैं। वे राष्ट्र धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। पश्चात लोग उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते हैं। श्री कृष्ण जी ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में आते हैं।
श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है " चोर जार शिखामणि " अर्थात चोरों और व्यभिचारियों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लम्पट चरित्र जिसे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का अवतार ही क्यों न हो। उसे महापुरुष तो क्या एक साधारण अच्छा नागरिक भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दूसरा चरित्र है - एक हाथ मे पाञ्चजन्य शंख और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए योगेश्वर का। यह है तत्कालीन भारत का भाग्य विधाता, वैदिक संस्कृति का उद्गाता और त्राता, महाराज युधिष्ठिर का मंत्री, पांडव साम्राज्य का निर्माता और महाभारत का श्रेष्ठपुरुष श्रीकृष्ण।
पहले चरित्र का चित्रण पुराणों ने किया है और दूसरे का चित्रण महाकवि कृष्ण द्वैपायन व्यास के महाभारत ने। विचारणीय यह है कि हमारे लिए कौन सा स्वरूप आदर्श और अनुकरणीय हो सकता है ? दोनों स्वरूपों में से श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप इन प्रश्नों का समाधान करते हैं। " श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण , कर्म , स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिसमें अधर्म का आचरण अर्थात श्रीकृष्ण जी ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा। परन्तु इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं। इस को पढ़ - पढ़ा और सुन-सुना कर अन्य मत वाले लोग श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओ की झूठी निंदा क्यों कर होती ? " अतः सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण चरित्र सर्वथा झूठा है और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय नहीं है अतः त्याज्य है।
*श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और वंश*
भारत मे सूर्य और चंद्र वंश के नाम से दो क्षत्रियकुल विख्यात हैं। चंद्र वंश में ययाति नाम के बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। ययाति के बड़े पुत्र यदु राजा हुए। उन्हीं के वंश में उत्पन्न होने के कारण श्रीकृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय कहे जाते हैं। कालांतर में इसी वंश में मधु नामक राजा हुए, इनके वंशज होने से यादव माधव कहलाए। आगे चलकर इसी वंश में सत्वत नाम के बड़े प्रसिद्ध राजा हुए। सत्वत के पुत्रों से दो उपवंश चले एक अंधक और दूसरा वृष्णि। श्रीकृष्ण वृष्णि वंशी थे इसलिए उनका नाम वार्ष्णेय भी है।
राजा अंधक जिन्हें भोज या महाभोज भी कहते थे, उनके दो पुत्र हुए कुकुर और भजमान। श्रीकृष्ण की माता देवकी कुकुर वंश की थी और पिता वासुदेव वृष्णि वंश के थे। श्रीकृष्ण के पितामह का नाम शुर, पिता का नाम वासुदेव तथा माता का नाम देवकी था। इनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में यमुना के किनारे पर बसे मथुरा नामक नगर में हुआ था। मथुरा और उसके आस पास यादवों के कुल सत्रह उपवंश बसे हुए थे और इनके पुरुषों की संख्या अठारह हजार थी, ऐसा महाभारत के सभा पर्व में लिखा है।
श्रीकृष्ण के समान बुद्धिमान, कर्मकुशल, अद्भुत सूझबूझ वाला, उपयज्ञ, व्यवहार कुशल, निश्चिंत और पराक्रमी पुरुष आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ। धर्मशास्त्र एवं वैदिक राजनीति का इतना बड़ा पंडित अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। यह एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है जिसने अपने स्वप्न को जीते जी साकार होते हुए देखा, जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया और जीवन को सफल व धन्य किया। एक ऐसा व्यक्तित्व जो सदा मुस्कराता है, भारी से भारी संकटों का सामना करते हुए भी जो न कभी टूटता है, न झुकता है और न ही मोहग्रस्त होता है। वह कभी जय-पराजय की चिंता नहीं करता , सांसारिक पदार्थो की आसक्ति छू तक नहीं गई, निजी पीड़ा का कभी ध्यान ही नहीं करता। इसे अपनी योजना और अपने बुद्धि कौशल पर पूरा भरोसा है, निराशा और पलायन की प्रव्रत्ति को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देता। सचमुच अद्वितीय आदर्श पुरुष है यह, इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है।
*रुक्मिणी से विवाह*-- जरासंध का एक साथी बड़ा राजा था विदर्भराज भीष्मक। उसकी पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्ण के शील गुणों पर आसक्त थी परन्तु उसका पिता व भाई श्रीकृष्ण के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहते थे। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी पर मुग्ध थे। जरासंध ने रुक्मिणी का विवाह अपने सेनापति चेदिराज शिशुपाल से करवाने का निश्चय किया। सम्बन्ध तय हो गया, बारात आ पहुँची। परन्तु इससे पूर्व ही श्रीकृष्ण रुक्मिणी को उसके पिता के घर से किसी प्रकार निकाल लाए। जब बाराती राजाओं को पता लगा तो उन्होंने श्रीकृष्ण का रास्ता रोकना चाहा परन्तु श्रीकृष्ण ने सबको अपने युद्ध कौशल से परास्त कर दिया। रुक्मिणी के भाई रुक्मी पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि वह सदा के लिए श्रीकृष्ण का होकर रह गया। इस प्रकार एक और बड़ा राज्य यादव संघ के साथ मिल गया और श्रीकृष्ण की शक्ति सुदृढ़ हुई। श्रीकृष्ण ने घर आकर रुक्मिणी से विधिवत विवाह किया।
जरासन्ध ने छियासी राजाओं को कैद में डाल रखा था। श्रीकृष्ण ने जरासन्ध की मृत्यु के तत्काल बाद उन सभी राजाओं को मुक्त करा दिया। वे बड़े प्रसन्न हुए और श्रीकृष्ण जी से अपने योग्य सेवा कार्य बताने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित होने का आदेश देकर उन्हें विदा दी। इस प्रकार छियासी राजा तो श्रीकृष्ण के साथ आ ही गए और भी बहुत से राजे जो जरासन्ध की अधीनता भयवश स्वीकार कर चुके थे, वे भी युधिष्ठिर के पक्ष में आ मिले। धर्म का पक्ष और अधिक सुदृढ़ हुआ और खंड-खंड भारत अखंडता की ओर अग्रसर हुआ।
प्राग्ज्योतिष ( वर्तमान असम ) का राजा नरक जो जरासन्ध का मित्र था, उसने सोलह हजार से अधिक सुंदर स्त्रियों का अपहरण करके बन्दी बना रखा था और उनके साथ बलात्कार करता, करवाता था। श्रीकृष्ण ने उसे मारकर सभी युवतियों को मुक्त करा दिया। इस कार्य से संसार भर की नारी जाति के दिल में अपना आदर पूर्ण स्थान बना लिया और भारत को अखंड बनाने में योगदान प्राप्त किया।
श्रीकृष्ण का जीवन जैसा महाभारत में मिलता है उससे उनके चरित्र और शील का पता चलता है। उनकी दिनचर्या वैदिक धर्म के अनुसार थी। वे प्रतिदिन संध्या और हवन दोनों समय करते थे। दूत बन कर हस्तिनापुर गए तब मार्ग में सायंकाल सन्ध्या, हवन का वर्णन है। इसी प्रकार दूसरे दिन कौरव सभा में जाने से पूर्व संध्या हवन करते हैं। जिस दिन अभिमन्यु मारा गया उस दिन भी सायंकाल सन्ध्या वन्दन करके शोक संतप्त पांडवों से जाकर मिलने का वर्णन है। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण आस्तिक ईश्वर भक्त थे तथा वैदिक कर्मकांड में पूर्णतया निष्ठा रखते थे।
शिष्टाचार और वृद्धजनों को सम्मान देने में भी वे अत्यंत विनीत और शिष्ट थे। व्यास, धृतराष्ट्र, कुंती तथा युधिष्ठिर आदि से जब मिले तब चरण छूकर नमस्ते बोल कर अभिवादन करने का वर्णन मिलता है। माता - पिता के प्रति भी बहुत प्रेम और आदरभाव रखते थे। जब भी घर जाते हैं, पहले माता-पिता के दर्शन करते हैं, चरण छूकर अभिवादन करके पश्चात पत्नी से मिलते है। बड़ो को झुककर अभिवादन और छोटो को गले लगाकर मिलते है। युधिष्ठिर के राजसूय में प्रथम पूज्य होकर भी जब कार्य बांटा गया तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों, विद्वानों के चरण धोने का कार्य अपने लिए आग्रह करके ग्रहण किया। विद्या में वे सांगोपांग वेद तथा विज्ञान के ज्ञाता थे। स्वंय भीष्म पितामह ने उन्हें उस समय के सब पुरुषों में श्रेष्ठ स्वीकार किया है। भीष्म श्रीकृष्ण का बहुत ही आदर करते थे।
रुक्मिणी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थी उसके साथ विवाह के पश्चात श्रीकृष्ण उसे लेकर बद्रिकाश्रम चले गए और वहाँ बारह वर्ष तक दोनों ने घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। इसके पश्चात शास्त्रविधि से गर्भाधान करके सनत कुमार जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम प्रद्युम्न था। भला ऐसा तपस्वी और संयमी पुरुष व्यभिचारी और परस्त्रीगामी कैसे हो सकता है
*श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं ने कहा है*--
*यद यद आचरति श्रेष्ठस्तत तदेवेतरे जनः। स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*
अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते है। वह प्रमाण मान लेता है, संसार भी उसी का अनुवर्तन करने लगता ष्ण का वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत निर्माण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है योगेश्वर श्रीकृष्ण*
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की....
आप शायद सो गए होंगे पर मुझे आज उसी कृष्ण की जन्म का इंतजार है जिनके जन्म से ही सारेबंधन टूट जाते हैं अभी भी है क्योंकि दीन दुखी भारत नर नारी दुष्टन करत उपद्रव भारी अब जात है हिंद की लाज यही अवसर आओ भारत में जन्म के कुछ क्षण पूर्व यह लेख आपको भेजा है राष्ट्रीय स्वतंत्रत गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क 7984113987
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सभी को ह हार्दिक शुभकामनाएं










