बुधवार, 12 अगस्त 2020

गवाँम् मध्ये वसाम्यहम् के श्रेष्ठभाव से अनुप्राणित संपूर्ण कला से युक्त योगेश्वर कृष्ण की जन्मदिन की शुभकामना कैसे दूं जब जन्माष्टमी के दिन गौ माता की लाशें निकल रही है

 

 

 

श्रीकृष्णजन्माष्टम्यां हार्दाः शुभाशयाः।
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
सत्पुरुषों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वालों दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं (श्रीकृष्ण) प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।, for the destruction of the evil-doers, for the enthroning of the Right, I am born from age to age.
🙏🙏🙏🙏🙏
किसी वस्तु में ईश्वर नहीं होता , ईश्वर होता है आपकी बुद्धि में ।
और जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तब वह शालिग्राम और नर्मदा शंकर में पत्थर नहीं देखता ।
जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तो गंगा नर्मदा यमुना में नदी नहीं देखता , ईश्वर (देवी) देखता है ।
वह ईश्वर को पीपल और बरगद में देखता है , वह स्त्री में माँ को देखता है वह पुरूष में पिता को देखता है, वह गुरू में ईश्वर देखता है ।
वह गाय में पशु नहीं देवी देखता है ।
और जब बुद्धि ईश्वराकार होने लगेगी तब सर्वत्र श्रीकृष्ण दिखने लगेंगे ।
निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों के सर्वांग रूप साक्षात् श्री हरि , भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आपके इसी जीवन को कल्याणकारी बनाए , ऐसी मनोभावना करता हूँ ।
मथुरा सहित संपूर्ण विश्व राक्षसों से मुक्त हो , शुद्ध हो !
जय श्री कृष्णा



कृष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत का अंकुरण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है कर्मयोगी श्रीकृष्ण* वह कृष्ण नीति आज भी प्रासंगिक जान पड़ती है

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की स्थापना होती है। इसी राष्ट्र धर्म के अनुसार लौकिक-पारलौकिक-नीति, शत्रु-मित्र-व्यवहार, कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय व्यक्ति और समाज तथा देश-देशांतर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है। इसकी क्रियात्मकता और आचरण में त्रुटि होने पर ,प्रमाद होने पर राष्ट्र पतित हो कर नष्ट हो जाते हैं। महापुरुष उसी तत्वज्ञान को अपने पराक्रम, पुरुषार्थ, बुद्धिमत्ता, कुशलता और व्यावहारिकता के द्वारा पतन के गर्त में जाते हुए राष्ट्र में पुनः प्रतिष्ठित कर नवीन स्फूर्ति प्रदान करते हैं। वे राष्ट्र धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। पश्चात लोग उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते हैं। श्री कृष्ण जी ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में आते हैं।
श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है " चोर जार शिखामणि " अर्थात चोरों और व्यभिचारियों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लम्पट चरित्र जिसे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का अवतार ही क्यों न हो। उसे महापुरुष तो क्या एक साधारण अच्छा नागरिक भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दूसरा चरित्र है - एक हाथ मे पाञ्चजन्य शंख और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए योगेश्वर का। यह है तत्कालीन भारत का भाग्य विधाता, वैदिक संस्कृति का उद्गाता और त्राता, महाराज युधिष्ठिर का मंत्री, पांडव साम्राज्य का निर्माता और महाभारत का श्रेष्ठपुरुष श्रीकृष्ण।
पहले चरित्र का चित्रण पुराणों ने किया है और दूसरे का चित्रण महाकवि कृष्ण द्वैपायन व्यास के महाभारत ने। विचारणीय यह है कि हमारे लिए कौन सा स्वरूप आदर्श और अनुकरणीय हो सकता है ? दोनों स्वरूपों में से श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप इन प्रश्नों का समाधान करते हैं।  " श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण , कर्म , स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिसमें अधर्म का आचरण अर्थात श्रीकृष्ण जी ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा। परन्तु इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं। इस को पढ़ - पढ़ा और सुन-सुना कर अन्य मत वाले लोग श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओ की झूठी निंदा क्यों कर होती ? " अतः सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण चरित्र सर्वथा झूठा है और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय नहीं है अतः त्याज्य है।
*श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और वंश*
भारत मे सूर्य और चंद्र वंश के नाम से दो क्षत्रियकुल विख्यात हैं। चंद्र वंश में ययाति नाम के बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। ययाति के बड़े पुत्र यदु राजा हुए। उन्हीं के वंश में उत्पन्न होने के कारण श्रीकृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय कहे जाते हैं। कालांतर में इसी वंश में मधु नामक राजा हुए, इनके वंशज होने से यादव माधव कहलाए। आगे चलकर इसी वंश में सत्वत नाम के बड़े प्रसिद्ध राजा हुए। सत्वत के पुत्रों से दो उपवंश चले एक अंधक और दूसरा वृष्णि। श्रीकृष्ण वृष्णि वंशी थे इसलिए उनका नाम वार्ष्णेय भी है।
राजा अंधक जिन्हें भोज या महाभोज भी कहते थे, उनके दो पुत्र हुए कुकुर और भजमान। श्रीकृष्ण की माता देवकी कुकुर वंश की थी और पिता वासुदेव वृष्णि वंश के थे। श्रीकृष्ण के पितामह का नाम शुर, पिता का नाम वासुदेव तथा माता का नाम देवकी था। इनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में यमुना के किनारे पर बसे मथुरा नामक नगर में हुआ था। मथुरा और उसके आस पास यादवों के कुल सत्रह उपवंश बसे हुए थे और इनके पुरुषों की संख्या अठारह हजार थी, ऐसा महाभारत के सभा पर्व में लिखा है।
श्रीकृष्ण के समान बुद्धिमान, कर्मकुशल, अद्भुत सूझबूझ वाला, उपयज्ञ, व्यवहार कुशल, निश्चिंत और पराक्रमी पुरुष आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ। धर्मशास्त्र एवं वैदिक राजनीति का इतना बड़ा पंडित अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। यह एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है जिसने अपने स्वप्न को जीते जी साकार होते हुए देखा, जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया और जीवन को सफल व धन्य किया। एक ऐसा व्यक्तित्व जो सदा मुस्कराता है, भारी से भारी संकटों का सामना करते हुए भी जो न कभी टूटता है, न झुकता है और न ही मोहग्रस्त होता है। वह कभी जय-पराजय की चिंता नहीं करता , सांसारिक पदार्थो की आसक्ति छू तक नहीं गई, निजी पीड़ा का कभी ध्यान ही नहीं करता। इसे अपनी योजना और अपने बुद्धि कौशल पर पूरा भरोसा है, निराशा और पलायन की प्रव्रत्ति को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देता। सचमुच अद्वितीय आदर्श पुरुष है यह, इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है।
*रुक्मिणी से विवाह*-- जरासंध का एक साथी बड़ा राजा था विदर्भराज भीष्मक। उसकी पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्ण के शील गुणों पर आसक्त थी परन्तु उसका पिता व भाई श्रीकृष्ण के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहते थे। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी पर मुग्ध थे। जरासंध ने रुक्मिणी का विवाह अपने सेनापति चेदिराज शिशुपाल से करवाने का निश्चय किया। सम्बन्ध तय हो गया, बारात आ पहुँची। परन्तु इससे पूर्व ही श्रीकृष्ण रुक्मिणी को उसके पिता के घर से किसी प्रकार निकाल लाए। जब बाराती राजाओं को पता लगा तो उन्होंने श्रीकृष्ण का रास्ता रोकना चाहा परन्तु श्रीकृष्ण ने सबको अपने युद्ध कौशल से परास्त कर दिया। रुक्मिणी के भाई रुक्मी पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि वह सदा के लिए श्रीकृष्ण का होकर रह गया। इस प्रकार एक और बड़ा राज्य यादव संघ के साथ मिल गया और श्रीकृष्ण की शक्ति सुदृढ़ हुई। श्रीकृष्ण ने घर आकर रुक्मिणी से विधिवत विवाह किया।
जरासन्ध ने छियासी राजाओं को कैद में डाल रखा था। श्रीकृष्ण ने जरासन्ध की मृत्यु के तत्काल बाद उन सभी राजाओं को मुक्त करा दिया। वे बड़े प्रसन्न हुए और श्रीकृष्ण जी से अपने योग्य सेवा कार्य बताने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित होने का आदेश देकर उन्हें विदा दी। इस प्रकार छियासी राजा तो श्रीकृष्ण के साथ आ ही गए और भी बहुत से राजे जो जरासन्ध की अधीनता भयवश स्वीकार कर चुके थे, वे भी युधिष्ठिर के पक्ष में आ मिले। धर्म का पक्ष और अधिक सुदृढ़ हुआ और खंड-खंड भारत अखंडता की ओर अग्रसर हुआ।
प्राग्ज्योतिष ( वर्तमान असम ) का राजा नरक जो जरासन्ध का मित्र था, उसने सोलह हजार से अधिक सुंदर स्त्रियों का अपहरण करके बन्दी बना रखा था और उनके साथ बलात्कार करता, करवाता था। श्रीकृष्ण ने उसे मारकर सभी युवतियों को मुक्त करा दिया। इस कार्य से संसार भर की नारी जाति के दिल में अपना आदर पूर्ण स्थान बना लिया और भारत को अखंड बनाने में योगदान प्राप्त किया।
श्रीकृष्ण का जीवन जैसा महाभारत में मिलता है उससे उनके चरित्र और शील का पता चलता है। उनकी दिनचर्या वैदिक धर्म के अनुसार थी। वे प्रतिदिन संध्या और हवन दोनों समय करते थे। दूत बन कर हस्तिनापुर गए तब मार्ग में सायंकाल सन्ध्या, हवन का वर्णन है। इसी प्रकार दूसरे दिन कौरव सभा में जाने से पूर्व संध्या हवन करते हैं। जिस दिन अभिमन्यु मारा गया उस दिन भी सायंकाल सन्ध्या वन्दन करके शोक संतप्त पांडवों से जाकर मिलने का वर्णन है। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण आस्तिक ईश्वर भक्त थे तथा वैदिक कर्मकांड में पूर्णतया निष्ठा रखते थे।
शिष्टाचार और वृद्धजनों को सम्मान देने में भी वे अत्यंत विनीत और शिष्ट थे। व्यास, धृतराष्ट्र, कुंती तथा युधिष्ठिर आदि से जब मिले तब चरण छूकर नमस्ते बोल कर अभिवादन करने का वर्णन मिलता है। माता - पिता के प्रति भी बहुत प्रेम और आदरभाव रखते थे। जब भी घर जाते हैं, पहले माता-पिता के दर्शन करते हैं, चरण छूकर अभिवादन करके पश्चात पत्नी से मिलते है। बड़ो को झुककर अभिवादन और छोटो को गले लगाकर मिलते है। युधिष्ठिर के राजसूय में प्रथम पूज्य होकर भी जब कार्य बांटा गया तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों, विद्वानों के चरण धोने का कार्य अपने लिए आग्रह करके ग्रहण किया। विद्या में वे सांगोपांग वेद तथा विज्ञान के ज्ञाता थे। स्वंय भीष्म पितामह ने उन्हें उस समय के सब पुरुषों में श्रेष्ठ स्वीकार किया है। भीष्म श्रीकृष्ण का बहुत ही आदर करते थे।
रुक्मिणी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थी उसके साथ विवाह के पश्चात श्रीकृष्ण उसे लेकर बद्रिकाश्रम चले गए और वहाँ बारह वर्ष तक दोनों ने घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। इसके पश्चात शास्त्रविधि से गर्भाधान करके सनत कुमार जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम प्रद्युम्न था। भला ऐसा तपस्वी और संयमी पुरुष व्यभिचारी और परस्त्रीगामी कैसे हो सकता है
*श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं ने कहा है*--
*यद यद आचरति श्रेष्ठस्तत तदेवेतरे जनः। स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*
अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते है। वह प्रमाण मान लेता है, संसार भी उसी का अनुवर्तन करने लगता ष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत निर्माण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है योगेश्वर श्रीकृष्ण*
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की....
आप शायद सो गए होंगे पर मुझे आज उसी कृष्ण की जन्म का इंतजार है  जिनके  जन्म से ही  सारेबंधन टूट जाते हैं अभी भी है क्योंकि दीन दुखी भारत नर नारी दुष्टन करत उपद्रव भारी अब जात है हिंद की लाज यही अवसर आओ भारत में जन्म के कुछ क्षण पूर्व यह लेख आपको भेजा है राष्ट्रीय स्वतंत्रत गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क 7984113987
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सभी को ह हार्दिक शुभकामनाएं

 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

प्रधानमंत्री मोदी के चुनावक्षेत्र काशी के श्मशान जहां चिता की आग कभी बुझती नहीं वही नगरवधू के नृत्य की अद्भुत परंपरा



# काशी का # मणिकर्णिका श्मशान घाट के बारे में मान्यता है कि यहां # चिता पर लेटने वाले को सीधे # मोक्ष मिलता है। दुनिया का ये इकलौता श्मशान जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। जहां लाशों का आना और चिता का जलना कभी नहीं थमता। यहाँ पर एक दिन में करीब
# 300_शवों का अंतिम संस्कार होता है।
*
बहुत से लोग भारत की इस प्राचीन परंपरा से अनभिज्ञ हैं लेकिन ये सच है कि सदियों से बनारस के इस श्मशान घाट पर # चैत्र_माह में आने वाले नवरात्रों की सप्तमी की रात पैरों में घुंघरू बांधी हुई # वेश्याओं का जमावड़ा लगता है। एक तरफ
# जलती_चिता_के_शोले आसमान में उड़ते हैं तो दूसरी ओर घुंघरू और तबले की आवाज पर नाचती वेश्याएं दिखाई देती हैं।
*
मौत के मातम के बीच श्मशान महोत्सव का रंग बदल देते हैं तबले की आवाज, घुंघरुओं का संगीत, और मदमस्त नाचती नगरवधुएं। जो व्यक्ति इस प्रथा से अनजान होगा उसके लिए यह मंजर बेहद हैरानी भरा हो सकता है कि रात के समय श्मशान भूमि पर इस जश्न का क्या औचित्य है?
*
# भगवान_भोलेनाथ को समर्पित, काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। यही वजह है कि वेश्याएं भी यहां नाच-नाचकर भोलेनाथ से यह प्रार्थना करती हैं कि उन्हें इस तुच्छ जीवन से मुक्ति मिले और अगले जन्म में वे भी समाज में सिर उठाकर जी सकें

शनिवार, 4 जुलाई 2020

सुपात्र शिष्य को सुपात्र गुरु ईश्वर की प्रेरणा और आपका अनुराग ही तय करता है गुरु शिष्य की महिमा और मर्यादा

 



  शिष्य गुरु का चयन नहीं करता अपितु गुरु शिष्य का चयन स्वयं करता हैं।
शिष्य अपने अंदर स्वार्थ लेकर गुरु ढूंढेगा तो उसे केवल कालनेमि गुरु मिलेगे।
यदि आपके मन में उपासना करने की,  परमात्मा को पाने की तीव्र इच्छा या तड़प होगी तो परमात्मा आपको स्वयं ही किसी सक्षम गुरु से आपको दीक्षा दिलवा देगा।
इसीलिए अपने अंदर पात्रता उत्पन्न करें।
दीक्षा के उपरांत गुरु द्वारा दिये गये आज्ञा आदेश को मंत्र की तरह का विधिवत स्वयं  ध्यान रख कर उसे साधना की अग्नि में तपाये, मंत्र जप से भी श्रेष्ठ कर्म को आधार बना कर धर्म राष्ट्र और मानवता की साधना के द्वारा मनुष्य यात्रा के शिखर पर पहुच जाता हैं।
यदि आपको सही में आपको इस जीवन से मुक्त होना हैं तो आपके पास गुरु हैं अथवा नहीं, इसका कोई बड़ा महत्व नहीं हैं। परमात्मा सम्पूर्ण जगत का गुरु हैं। गुरु बनाने से पहले स्वयं के अंदर पात्रता अर्जित करों, गुरु स्वयं मिल जायेगा, नहीं तो निरा भटकाव हैं, ये माया गुरु तत्व को देखने ही नहीं देंगी।
गुरु के पास बैठो,
आँसू आ जाएँ, बस इतना ही काफी है।
चरण छूना गुरु के, बस याद रहे भविष्य की कोई आकांक्षा ना हो।
मौन प्रार्थना जल्दी पहुँचती हैं गुरु तक, क्योंकि मुक्त होतीं हैं शब्दों के बोझ से।
गुरु का होना ही आशीर्वाद है, मांगना नहीं पड़ता, गुरु के पास होने से ही सब मिल जाता है।
जैसे फूल के पास जाओ खुशबू बिन मांगे मिल ही जाती है
कुछ मांगना मत गुरु से सिर्फ जाना उसकी शरण में, सब स्वयं ही मिल जायेगा।।
-गुरु शिष्य सम्बन्ध की आवश्यक बाते*
*गुरु दीक्षा क्या है -*
दीक्षा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द दक्ष से हुई है जिसका अर्थ है कुशल होना। समानार्थी अर्थ है - *विस्तार*। इसका दूसरा स्रोत दीक्ष शब्द है जिसका अर्थ है - *समर्पण* : अतः दीक्षा का सम्पूर्ण अर्थ हुआ - *स्वयं का विस्तार*।
दीक्षा के द्वारा शिष्य में यह सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि गुरु से प्राप्त ऊर्जा के द्वारा शिष्य के अंदर आतंरिक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है , जिसके प्रकाश में वह अपने अस्तित्व् के उद्देश्य को देख पाने में सक्षम होता है। दीक्षा से अपूर्णता का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है।
गुरु का ईश्वर से साक्षात सम्बन्ध होता है। ऐसा गुरु जब अपनी आध्यात्मिक / प्राणिक ऊर्जा का कुछ अंश एक समर्पित शिष्य को हस्तांतरित करता है तो यह प्रक्रिया गुरु दीक्षा कहलाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की सबसे प्रारम्भिक पग है। गुरु दीक्षा के उपरांत शिष्य गुरु की आध्यात्मिक सत्ता का उत्तराधिकारी बन जाता है। गुरु दीक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे गुरु और शिष्य के मध्य आत्मा के स्तर पर संबंद्ध बनता है जिससे गुरु और शिष्य दोनों के मध्य ऊर्जा का प्रवाह सहज होने लगता है। गुरु दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य दोनों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। गुरु का उत्तरदायित्व समस्त बाधाओं को दूर करते हुए शिष्य को आध्यात्मिकता की चरम सीमा पर पहुचाना होता है। वहीं शिष्य का उत्तरदायित्व हर परिस्थिति में गुरु के द्वारा बताये गए नियमों का पालन करना होता है।
*दीक्षा के प्रकार-*
स्पर्श दीक्षा, दृग दीक्षा, मानस दीक्षा
शक्ति, शाम्भवी, मांत्रिक दीक्षा
*गुरु दीक्षा कौन दे सकता है -*
गुरु शब्द का अर्थ है जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये। एक सम्पूर्ण जागृत गुरु, जो की सहस्त्र्सार चक्र में स्थित हो वही दीक्षा देने का अधिकारी होता है . ऐसे गुरु की पहचान उनके व्यवहार से होती है। ऐसे गुरु सबके लिए करुणामय होते है. उनका ज्ञान अभूतपूर्व होता है . जागृत गुरु अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और मोह से दूर रहते है. वह शिष्य की किसी भी समस्या और परिस्थिति का समाधान निकालने में सक्षम होते है. ऐसे गुरु का ध्यान अत्यंत उच्च कोटि का होता है।
*गुरु दीक्षा किसको दी जाती है -*
शिव पुराण में भगवान् शिव माता पार्वती को योग्य शिष्य को दीक्षा  देने के महत्त्व को इस प्रकार समझाते है - हे वरानने ! आज्ञा हीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन तथा विधि के पालनार्थ दक्षिणा हीन जो जप किया जाता है वह निष्फल होता है।
इस वाक्य से गुरु दीक्षा का महत्त्व स्थापित होता है। दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य एक दूसरे के पाप और पुण्य कर्मों के भागी बन जाते है। शास्त्रो के अनुसार गुरु और शिष्य एक दूसरे के सभी कर्मों के दसवे हिस्से के फल के भागीदार बन जाते है, यही कारण है कि दीक्षा सोच समझकर ही दी जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि दीक्षा के योग्य कौन होता है? धर्म अनुरागी, उत्तम संस्कार वाले और वैरागी व्यक्ति को दीक्षा दी जाती है। दीक्षा के उपरान्त आदान प्रदान की प्रक्रिया गुरु और शिष्य दोनों के सामर्थ्य पर निर्भर करती है। दीक्षा में गुरु के सम्पूर्ण होने का महत्व तो है ही किन्तु सबसे अधिक महत्व शिष्य के योग्य होने का है। क्योंकि दीक्षा की सफलता शिष्य की योग्यता पर ही निर्भर करती है। शिष्य यदि गुरु की ऊर्जा और ज्ञान को आत्मसात कर अपने जीवन में ना उतार पाये अर्थात क्रियान्वित ना करे तो श्रेष्ठ प्रक्रिया भी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए अधिकांशतः गुरु शिष्य के धैर्य, समर्पण और योग्यता का परीक्षण एक वर्ष तक विभिन्न विधियों से करने के उपरान्त ही विशेष दीक्षा देते है। ऐसी दीक्षा मन, वचन और कर्म जनित पापों का क्षय कर परम ज्ञान प्रदान करती है।
शिष्य को किस प्रकार की दीक्षा दी जाए इसका निर्धारण गुरु शिष्य की योग्यता और प्रवृत्ति के अनुसार करता है। दीक्षा का प्रथम चरण है मंत्र द्वारा दीक्षा। जब शिष्य अपनी मनोभूमि को तैयार कर, सामर्थ्य, योग्यता, श्रद्धा, त्यागवृत्ति के द्वारा मंत्रो को सिद्ध कर लेता है तो दीक्षा के अगले चरण में पहुंच जाता है। अगला स्तर प्राण दीक्षा / शाम्भवी दीक्षा का होता है।
कभी कभी गुरु स्वयं ही अपने शिष्य का चुनाव करते है। शिष्य का गुरु से जब पिछले जन्म से ही सम्बन्ध होता है और जागृत गुरु को इसका ज्ञान होता है, ऐसी परिस्थिति में गुरु स्वयं शिष्य का चुनाव करते है।
जब व्यक्ति की योग्यता अच्छी हो और गुरु पाने की तीव्र अभिलाषा हो तो योग्य गुरु को योग्य शिष्य से मिलाने में इश्वर स्वयं सहायता करते है। ऐसा श्री राम कृष्ण परमहंस के साथ हुआ था। उनके गुरु तोताराम को माँ काली ने स्वप्न में दर्शन देकर रामकृष्ण के गुरु बनने का आदेश दिया था।
तीसरी परिस्थिति में शिष्य अपनी बुद्धिमत्ता से गुरु की योग्यता की पहचान कर दीक्षा को धारण करता है और गुरु शिष्य की योग्यता को समझकर दीक्षा के प्रकार का निर्धारण करता है।
*अच्छे शिष्य के लक्षण -*
* गुरु के वचनों पर पूर्ण विश्वास करने वाला
* आज्ञाकारी
* आस्तिक और सदाचारी
* सत्य वाणी का प्रयोग करने वाला
* चपलता, कुटिलता, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि अवगुणों से दूर रहने वाला
* जितेन्द्रिय
* पर निंदा, छिद्रान्वेषण, कटु भाषण और सिगरेट मद्य इत्यादि व्यसनों से दूर रहने वाला
* गुरु के सदुपदेशों पर चिंतन मनन करने वाला
* नियमों का पालन श्रद्धा और विश्वास से करने वाला
* गुरु की सेवा में उत्साह रखने वाला
* गुरु की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति दोनों परिस्थितियों में उनके आदेशों का पालन करना
*चेतना के जागरण के लिए तीन पक्षों का सामंजस्य अनिवार्य है -*
१- शिष्य का पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास
२- गुरु की सामर्थ्य
३- दैवीय कृपा
*गुरु की आवश्यकता क्यों -*
गुरु की चेतना इश्वर से निरंतर संयुक्त रहने के कारण इश्वर तुल्य होती है , जबकि साधारण मनुष्य की चेतना संसार से जुडी रहने के कारण वाह्य्मुखी और अधोगामी होती है। चेतना के वाह्य मुखी और अधोगामी होने के कारण इश्वर से हमारा संपर्क टूट जाता है जिसके कारण अविद्या का प्रभाव बढ़ जाता है। अविद्या के प्रभाव के कारण मनुष्य की प्रवृत्ति छोटी छोटी बातों में दुखी होने की, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, अनिर्णय और अविवेक की स्थिति से घिर जाता है। फलस्वरूप निम्न कर्मों की ओर प्रवृत होकर चेतना के स्तर से गिर कर मनुष्य योनी को छोड़कर निम्न योनियों को प्राप्त हो जाता है।
गुरु को प्रकृति और ईश्वर के नियमों का ज्ञान होने के कारण उनमे अज्ञानता के भंवर से निकलने की क्षमता होती है। वह शिष्य को धीरे धीरे ज्ञान देकर , कर्मों की गति सही करवाकर और सामर्थ्य की वृद्धि करवाकर अज्ञान के इस भंवर से निकाल कर ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करवा देते है।
*क्या हमारा विकास सृष्टि और हमारे परिवारजनों को प्रभावित करता है -*
हम सभी एक चेतना के अंश है, चाहे वह कोई भी वनस्पति हो, जीव हो, नदी हो, पहाड़ पर्वत हो अथवा पशु पक्षी हो. इसका अर्थ यह है कि ईश्वर सृष्टि के हर कण में विद्यमान है। यह एक अलग बात है की मनुष्य पौधों और जंतुओं में चेतना का प्रतिशत भिन्न भिन्न होता है। चेतना के प्रतिशत के अनुपात के अनुसार कार्य और विचार की क्षमता प्राप्त होती है। मनुष्यों में सृष्टि के अन्य व्यक्त रूपो से चेतना का प्रतिशत अधिक होता है। इसी कारण मनुष्य को इच्छा, कर्म और ज्ञान की सामर्थ्य प्राप्त है। चेतना का स्तर मनुष्य अपने प्रयासों के द्वारा बढ़ा कर परम चेतना को प्राप्त कर सकता है। जब एक चेतना अपना विकास कर परम चेतना को प्राप्त करती है तो सकारात्मक ऊर्जा की सृष्टि में वृद्धि हो जाती है और विभिन्न अनुपातों में अन्य प्राणियों के विकास में सहायक होती है...गुरु दक्षिणा किसे ?? और कैसी ?? कौन गुरु ?? भारत में हजारों साल से कुलगुरु की परंपरा रही है जो उच्च कुल से और कुलीन होते   जो पशुवत जीवन आहार निद्रा भय मैथुन से ऊपर मानवीय संवेदना जगाते हैं आप जीवन में अनेक अन्य लोगों से भी कुछ श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त होता है उनमें से किसी एक के प्रति श्रद्धा होती है जिनके विचार आपके अपनी भाव विचार से अनुप्राणीत होकर आप अपना गुरु वरण करते हैं कभी-कभी सही गुरु की पहचान ना होने से या अपनी तृष्णा वासना की पूर्ति के चक्कर में बनावटी बाजारु मिडिया मैनेजमेंट कालनेमि गुरुघंटाल मास्टर जो चारों तरफ बहुतायत से दिख जाते हैं और आप उन्हीं में उलझ जाते हैं जिनके वजह से जीवन लक्ष्य भटक जाता है और जीवन नीरस और  बोझिल होकर शोक अभाव मैं डूबा रहता है पहले परंपरागत गुरु के लिए आपको कोई खोज नहीं करनी होती है पर व्यवहारिक जीवन में दूसरे गुरु को बड़े सावधानी से खोज की जाती है जिससे आप आपका जीवन श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है
जीवन में जो भी ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन उन्नत किया है इस गुरु पूर्णिमा पर्व पर आपका गुरु के प्रति कुछ पुष्प पत्र फल फूल गुरु दक्षिणा योगदान अर्पण समर्पण सानिध्य करते हैं तो जरुर करें अन्यथा अभिमान भारी पड़ेगा और यह ज्ञान भी समय पर कोई काम आने वाला नहीं अजय कर्मयोगी
13 - जुलाई को -पूर्णिमा है, न जाने कितने शिष्य जिंहोंने अपने गुरु से मंत्र लिया हुआ है उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करेंगे। गुरुजी तो शिष्यों की श्रद्धा देखकर गदगद हो जाएँगे। शिष्यों की शिष्यता देखते ही बनेगी।
यदि बिना विकार के देखा जाए तो अपने से अधिक गुणवान और मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धा रखना बहुत अच्छी बात है, परंतु क्या सच्ची में ऐसा है? मेरे विचार से नहीं । अभी तक लोग केवल गुरु की बातें करते आए हैं। गुरु ढोंगी होता है शिष्यों को बहकाकर अपना बुकचा भरता है, अपने ऐशो-आराम के लिए बहुरुप रखता है, यह सच है, परंतु सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कई शिष्यों द्वारा भी गुरु का फ़ायदा उठाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा के पर्व पर गुरु और शिष्य दोनों को यह सोचना चाहिए। गुरु जो सम्मोहन फैलाकर अबोधजनों को अपनी ओर खींच रहे हैं, क्या सचमुच गुरु हैं? उनमें गुरुता है? शिष्य जो गुरु के नाम पर मज़े कर रहे हैं क्या यही श्रद्धा है? नहीं।
न आज कोई गुरु है न शिष्य। सभी अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। सबसे बड़ा गुरु अपना मन है, अपनी आत्मा है, अपना विवेक है, जिसकी आज्ञा से हम चलते हैं। मन को नियँत्रित किए बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता और आत्म-ज्ञान के बिना विवेक जागृत नहीं होता। हमारा विवेक हमें कभी ग़लत कार्य करने की सलाह नहीं देता। विवेक से चलने के लिए मनोबल बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए बाहरी थपेड़ों से अप्रभावित रहने का अभ्यास करना पड़ता है, जो अत्यंत कठिन है। चारों ओर फैले भौतिक सुख जो इंद्रियों को तृप्त करते हैं मन को पीछे धकेलते रहते हैं। इतना पीछे कर देते हैं कि इंद्रिय-सुख ही मन का सुख लगने लगता है। पर असल में आत्मा और परमात्मा का सुख ही असली सुख होता है। विवेक एक सुंदर नियँत्रक हैं। हमें हमेशा ग़लत कार्य करने से रोकता हैं। गुरु भी तो यही करता है तो फिर शरीर के अंदर छिपे गुरु को पहचानना और उसकी बात मानना ही सर्वश्रेष्ठ है।
जब आत्म गुरु मर जाता है या कुपोषित हो जाता है तो हम बाहर की ओर भागते हैं। जहाँ तक गृहण करने की बात है तो उसके लिए ज़रुरी नहीं कि एक ही व्यक्ति सिखा सकता है। मन तो हमारा है उसे स्वयं ही समझना होगा, रही बात संसार की तो सजीव और निर्जीव, त्याज्य और स्वीकार्य सभी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। अनुभव मार्गदर्शन का कार्य भी करता है, पर मन मारकर तो किसी भी गुरु से कुछ नहीं सीखा जा सकता। आज मन को जागृत करके उसी को बलवान बनाने की महती आवश्यकता है। पर कमज़ोर मन ही भ‍टकता फिरता है। एक श्रेष्ठ गुरु के सानिध्य से यह उच्चता श्रेष्ठता प्राप्त करता है
     बरना यहां बहुत सारे कालनेमि मजमा लगाए बैठे आपको भटकाने के लिए



मंगलवार, 30 जून 2020

गीताप्रेस शस्त्रों गोली पिस्तौल की सप्लाई करता था शास्त्रों के बीच में रखकर

    

  आपके लिए गीता प्रेस कि यह चौकाने वाली जानकारी एक अकल्पनीय रहस्यमई बात हो सकती है कि शास्त्रों के बीच में शस्त्रों को रखकर सशस्त्र क्रांति का एक शंखनाद अंग्रेजो के विरुद्ध हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के नेतृत्व में गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण के द्वारा द्वारा चलाई जा रही थी
हिंदुओं के हृदय के प्राण ~ हनुमान प्रसाद पोद्दार 'भाई जी'
आज से लगभग छः महीना पहले मैनें BBC में गीताप्रेस परएक लेख पढा था। लेख में यह कुतर्क गढा गया था कि, किस तरह गीताप्रेस नामक छापखाना हिंदू भारत बनाने के मिशन पर काम कर रहा है। उसके बाद मैनें एक और “गीताप्रेस की महिलाओं पर तालिबानी सोच” शीर्षक से एक लेख पढा। दोनों लेख पढकर मेरे दिमाग की घंटी बज उठी थी।आखिर BBC गीताप्रेस जैसे विशुद्ध धार्मिक प्रेस का विरोध क्यों कर रही है? अवश्य ही इसके पिछे कोई न कोई रहस्य छिपा हुआ है। क्योंकि BBC भारत में उसी का विरोध करता आया है, जो अंग्रेजी सत्ता का विरोधी था। तभी मेरे दिमाग ने कहा, “अवश्य ही गीताप्रेस भी अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध रहा होगा।”
तब से लेकर मैं खोज करता रहा, और कल मेरी खोज पूरी हुई और आज BBC के उस पुराने लेख को काउंटर कर रहा हूँ। आगे बढने से पहले बता दूँ, गीताप्रेस के विरूद्ध कम्युनिस्टों का अलग षडयंत्र चल रहा है। गीताप्रेस पर एक वामपंथी पत्रकार ने भी किताब लिखी है जिसका नाम है, “Gita Press And The Making Of Hindu India”.
ऐसे तो गीताप्रेस की स्थापना 1924 में हुई है, उसके पहले कलकत्ता में 1920 में “गोविंद भवन कार्यालय” की स्थापना हुई थी। और उससे पहले ‘कल्याण’ पत्रिका शुरू हुई थी। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि गीताप्रेस के संस्थापक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार एक क्रांतिकारी थे। और उनके क्रांतिकारी संगठन का नाम था ‘अनुशीलन समिति’। कलकत्ता में बन्दूक, पिस्तौल और कारतूस की शस्त्र कंपनी थी जिसका नाम “रोडा आर.बी. एण्ड कम्पनी” था। यह कंपनी जर्मनी, इंग्लैण्ड आदि देशों से बंदरगाहों से शस्त्र पेटियाँ मंगाती थी।
देशभक्त क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लङने के लिए पिस्तौल और कारतूस की जरूरत थी। लेकिन उनके पास धन नहीं था कि खरीद सकें। तब ‘अनुशीलीन समिति’ के क्रांतिकारियों ने शस्त्र चुराने की योजना बनाई। और इस काम को हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को सौंप दिया गया। हनुमान प्रसाद जी ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस रोडा बी.आर.डी. कंपनी में एक शिरीष चंद्र मित्र नाम का बंगाली क्लर्क था, जो अध्यात्मिक प्रवृति का था। वह हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का बहुत आदर करता था। पोद्दार जी ने इसका फायदा उठाकर उस क्लर्क को अपने पक्ष में कर लिया।
हनुमान प्रसाद पोद्दार जी
एक दिन कंपनी ने शिरीष चंद्र मित्र को कहा समुद्र चुंगी से जिन बिल्टीओं का माल छुङाना है वह छुङा कर ले आएं। उसने यह सूचना तत्काल हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को दे दी। सूचना पाते ही पोद्दार जी कलकत्ता बंदरगाह पर पहुंच गये। यह बात है 26 अगस्त 1914 बुधवार के दिन की। बंदरगाह पर रोडा कम्पनी की 202 शस्त्र पेटीयां आई हुईं थी। जिसमें 80 माउजर पिस्तौल और 46 हजार कारतूस थे, जिसे कंपनी के क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र ने समुंद्री चुंगी जमा कर छुङा लिया।
इधर बंदरगाह के बाहर हनुमान प्रसाद पोद्दार जी शिरिष चंद्र का इंतजार कर रहे थे। इसमें से 192 शस्त्र पेटीयां कंपनी में पहुंचा दी गईं और बाकी के 10 शस्त्र पेटीयां हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के घर पर पहुंच गई। आनन-फानन में पोद्दार जी ने अपने संगठन के क्रांतिकारी साथियों को बुलाया और सारे शस्त्र सौंप दिये। उस पेटी में 300 बङे आकार की पिस्तौल थी। इनमें से 41 पिस्तौल बंगाल के क्रांतिकारीयों के बीच बांट दिया गया। बाकी 39 पिस्तौल बंगाल के बाहर अन्य प्रांत में भेज दी गई। काशी गई, इलाहाबाद गई, बिहार, पंजाब, राजस्थान भी गई।
आगे जब अगस्त 1914 के बाद क्रांतिकारियों ने सरकारी अफसरों, अंग्रेज आदि को मारने जैसे 45 काण्ड इन्हीं माउजर पिस्तौलों से सम्पन्न किये थे। क्रांतिकारियों ने बंगाल के मामूराबाद में जो डाका डाला था उसमें भी पुलिस को पता चला की रोडा कम्पनी से गायब माउजर पिस्तौल से किया गया है। थोङा आगे बढ गये थे खैर पीछे लौटते हैं।
हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को पेटीयों के ठौर-ठिकाने पहुंचाने-छिपाने में पंडित विष्णु पराङकर (बाद में कल्याण के संपादक ) और सफाई कर्मचारी सुखलाल ने भी मदद की थी। बाद में मामले के खुलासा होने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार, क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र, प्रभुदयाल, हिम्मत सिंह, कन्हैयालाल चितलानिया, फूलचंद चौधरी, ज्वालाप्रसाद, ओंकारमल सर्राफ के विरूद्ध गिरफ्तारी के वारंट निकाले गये। 16 जुलाई 1914 को छापा मारकर क्लाइव स्ट्रीव स्थित कोलकाता के बिरला क्राफ्ट एंड कंपनी से हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को गिरफ्तार कर लिया गया। शेष लोग भी पकङ लिये गये। सभी को कलकता के डुरान्डा हाउस जेल में रखा गया। पुलिस ने 15 दिनों तक सभी को फांसी चढाने, काला पानी आदि की धमकी देकर शेष साथियों को नाम बताने और माल पहुंचाने की बात उगलवाना चाहा, लेकिन किसी ने सच नही उगला। पोद्दार जी के गिरफ्तार होते ही माङवारी समाज में भय व्याप्त हो गया। पकङे जाने के भय से इनके लिखे साहित्य को लोगों ने जला दिया था।

पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार जी छूट गये। इसके दो कारण थे, पहला कि शस्त्र कंपनी के क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र बंगाल छोङ चुके थे। इसलिए गिरफ्तार नही किये गये। दूसरा कारण तमाम अत्याचार के बाद भी किसी ने भेद नही उगला था।
इस घटना से छः साल पूर्व 1908 में जो बंगाल के मानिकतला और अलीपुर में बम कांड हुआ था, उसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से गीताप्रेस गोरखपुर के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार शामिल रहे थे। उन्होनें बम कांड के अभियुक्त क्रांतिकारियों की पैरवी की। पोद्दार जी का भूपेन्द्रनाथ दत्त, श्याम सुंदर चक्रवर्ती, ब्रह्मबान्धव उपाध्याय, अनुशीलन समिति के प्रमुख पुलिन बिहारी दास, रास बिहारी बोस, विपिन चंद्र गांगुली,अमित चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारीयों से सदस्य होने के कारण निकट संबध था।अपने धार्मिक कल्याण पत्रिका बेचकर क्रांतिकारियों की पैरवी करते थे। बाद में कोलकता में गोविंद भवन कार्यालय की स्थापना हुई तो पुस्तकों और कल्याण पत्रिका के बंडलों के नीचे क्रांतिकारियों के शस्त्र छुपाये जाते थे।
इतना ही नहीं खुदीराम बोस, कन्हाई लाल, वारीन्द्र घोष, अरबिंद घोष, प्रफुल्ल चक्रवर्ती के मुकदमे में भी ‘अनुशीलन समिति’ की ओर से हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने ही पैरवी की थी। उन दिनों क्रांतिकारियों की पैरवी करना कोई साधारण बात नहीं थी।
भारत विभाजन के मांग पर कांग्रेसी नेता जिन्ना के सामने चुप रहते थे पर गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका पुरजोर आवाज में कहती थी, “जिन्ना चाहे देदे जान, नहीं मिलेगा पाकिस्तान”। कल्याण यह कहकर ललकारता था। यह पंक्ति कल्याण के आवरण पृष्ठ पर छपती थी। पाकिस्तान निर्माण के विरोध में कल्याण महीनों तक लिखता रहा था।
गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका ऐसी निडर पत्रिका थी कि कल्याण ने अपने एक अंक में प्रधानमंत्री नेहरू को हिंदू विरोधी तक बता दिया था। इसने महात्मा गांधी को भी एक बार खरी-खोटी सुनाते हुए कह डाला था, “महात्मा गांधी के प्रति मेरी चिरकाल से श्रद्धा है, पर इधर वे जो कुछ कर रहे हैं और गीता का हवाला देकर हिंसा-अहिंसा की मनमानी व्याख्या वे कर रहे हैं, उससे हिंदूओं की निश्चित हानि हो रही है और गीता का भी दुरपयोग हो रहा है।”
जब मालवीय जी हिंदूओं पर अमानवीय अत्याचारों की दिल दहला देने वाली गाथाएं सुनकर द्रवित होकर 1946 में स्वर्ग सिधार गए, तब गीताप्रेस ने मालवीय जी की स्मृति में कल्याण का श्रद्धांजली अंक निकाला। इसमें नोआखली, खुलना, तथा पंजाब सिंध में हो रहे अत्याचारों पर मालवीय जी की ह्रदय विदारक टिप्पणी प्रकाशित की गई थी। जिस कारण उत्तरप्रदेश और बिहार की कांग्रेसी सरकार ने कल्याण के श्रद्धांजली अंक को आपतिजनक घोषित करते हुए जब्त कर लिया था।
जब भारत विभाजन के समय दंगा शुरू हो गया था और पाकिस्तान से हिंदूओं पर अत्याचारों की खबर आ रही थी, तब भी गीताप्रेस ने कांग्रेस नेताओं पर खूब स्याही रंगी थी। तब कल्याण ने अपने सितम्बर-अक्टूबर 1947 के अंक में यह लिखना शुरू कर दिया था, “हिंदू क्या करें?” इन अंको में हिंदूओं को आत्मरक्षा के उपाय बताए जाते थे। ऐसे गीताप्रेस और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी से BBC और कम्युनिस्टों की चिढन स्वाभाविक ही है।
 

शनिवार, 30 मई 2020

अस्पताल का लाखों का बिल, दर्द और तनाव से मुक्ती में दादी के घरेलू नुस्खे

   
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अक्सर घर के बुजुर्गों के पास ही हर समस्या का समाधान मिल जाया करता है, जो रामबाण इलाज होता है। ऐसी ही कुछ छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जि‍न्हें हल करने के लि‍ए दादी मां के यह 22 रामबाण घरेलू नुस्खे ही काफी हैं । जरूर जानिए ... 1. कान दर्द 2. दांत दर्द 3. दांतों के सुराख 4. बच्चों के पेट के कीड़े 5. गिल्टी का दर्द 6. पेट के केंचुए एवं कीड़े 7. छोटे बच्चों को उल्टी दस्त 8. कब्ज दूर करने हेतु 9. आग से जल जाने पर 10. कान की फुंसी 11. कुकुर खांसी 12. पेशाब की जलन 13. फोड़े 14. सिरदर्द 15. पेशाब में चीनी (शकर) 16. मस्तिष्क की कमजोरी 17. अधकपारी का दर्द 18. खूनी दस्त 19. जुकाम - 1 पाव गाय का दूध गरम करके उसमें 12 दाना कालीमिर्च एवं 1 तोला मिश्री 20. मंदाग्नि 21. उदर विकार - अजवाइन, कालीमिर्च एवं सेंधा नमक 22. मोटापा दूर करना बालों के झड़ने पर नियंत्रण के लिए प्राकृतिक घरेलू उपचार यहाँ

 1. कान दर्द - प्याज पीसकर उसका रस कपड़े से छान लें। फिर उसे गरम करके 4 बूंद कान में डालने से कान का दर्द समाप्त हो जाता है।

 2. दांत दर्द - हल्दी एवं सेंधा नमक महीन पीसकर, उसे शुद्ध सरसों के तेल में मिलाकर सुबह-शाम मंजन करने से दांतों का दर्द बंद हो जाता है।

3. दांतों के सुराख - कपूर को महीन पीसकर दांतों पर उंगली से लगाएं और उसे मलें। सुराखों को भली प्रकार साफ कर लें। फिर सुराखों के नीचे कपूर को कुछ समय तक दबाकर रखने से दांतों का दर्द निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है।

4. बच्चों के पेट के कीड़े - छोटे बच्चों के पेट में कीड़े हों तो सुबह एवं शाम को प्याज का रस गरम करके 1 तोला पिलाने से कीड़े अवश्य मर जाते हैं। धतूरे के पत्तों का रस निकालकर उसे गरम करके गुदा पर लगाने से चुन्ने (लघु कृमि) से आराम हो जाता है।

5. गिल्टी का दर्द - प्याज पीसकर उसे गरम कर लें। फिर उसमें गो-मूत्र मिलाकर छोटी-सी टिकरी बना लें। उसे कपड़े के सहारे गिल्टी पर बांधने से गिल्टी का दर्द एवं गिल्टी समाप्त हो जाती है।

6. पेट के केंचुए एवं कीड़े - 1 बड़ा चम्मच सेम के पत्तों का रस एवं शहद समभाग मिलाकर प्रात:, मध्यान्ह एवं सायं को पीने से केंचुए तथा कीड़े 4-5 दिन में मरकर बाहर निकल जाते हैं।

7. छोटे बच्चों को उल्टी दस्त - पके हुए अनार के फल का रस कुनुकुना गरम करके प्रात:, मध्यान्ह एवं सायं को 1-1 चम्मच पिलाने से शिशु-वमन अवश्य बंद हो जाता है।

8. कब्ज दूर करने हेतु - 1 बड़े साइज का नींबू काटकर रात्रिभर ओस में पड़ा रहने दें। फिर प्रात:काल 1 गिलास चीनी के शरबत में उस नींबू को निचोड़कर तथा शरबत में नाममात्र का काला नमक डालकर पीने से कब्ज निश्चित रूप से दूर हो जाता है।

9. आग से जल जाने पर - कच्चे आलू को पीसकर रस निकाल लें, फिर जले हुए स्थान पर उस रस को लगाने से आराम हो जाता है। इसके अतिरिक्त इमली की छाल जलाकर उसका महीन चूर्ण बना लें, उस चूर्ण को गो-घृत में मिलाकर जले हुए स्थान पर लगाने से आराम हो जाता है।

10. कान की फुंसी - लहसुन को सरसों के तेल में पकाकर, उस तेल को सुबह, दोपहर और शाम को कान में 2-2 बूंद डालने से कान के अंदर की फुंसी बह जाती है अथवा बैठ जाती है तथा दर्द समाप्त हो जाता है।

11. कुकुर खांसी - फिटकरी को तवे पर भून लें और उसे महीन पीस लें। तत्पश्चात 3 रत्ती फिटकरी के चूर्ण में समभाग चीनी मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करने से कुकुर खांसी ठीक हो जाती है।

12. पेशाब की जलन - ताजे करेले को महीन-महीन काट लें। पुन: उसे हाथों से भली प्रकार मल दें। करेले का पानी स्टील या शीशे के पात्र में इकट्ठा करें। वही पानी 50 ग्राम की खुराक बनाकर 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) पीने से पेशाब की कड़क एवं जलन ठीक हो जाती है।

13. फोड़े - नीम की मुलायम पत्तियों को पीसकर गो-घृत में उसे पकाकर (कुछ गरम रूप में) फोड़े पर हल्के कपड़े के सहारे बांधने से भयंकर एवं पुराने तथा असाध्य फोड़े भी ठीक हो जाते हैं।

14. सिरदर्द - सोंठ को बहुत महीन पीसकर बकरी के शुद्ध दूध में मिलाकर नाक से बार-बार खींचने से सभी प्रकार के सिरदर्द में आराम होता है।

15. पेशाब में चीनी (शकर)- जामुन की गुठली सुखाकर महीन पीस डालें और उसे महीन कपड़े से छान लें। अठन्नीभर प्रतिदिन 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) ताजे जल के साथ लेने से पेशाब के साथ चीनी आनी बंद हो जाती है। इसके अतिरिक्त ताजे करेले का रस 2 तोला नित्य पीने से भी उक्त रोग में लाभ होता है।

16. मस्तिष्क की कमजोरी - मेहंदी का बीज अठन्नीभर पीसकर शुद्ध शहद के साथ प्रतिदिन 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) सेवन करने से मस्तिष्क की कमजोरी दूर हो जाती है और स्मरण शक्ति ठीक होती है तथा सिरदर्द में भी आराम हो जाता है।

17. अधकपारी का दर्द - 3 रत्ती कपूर तथा मलयागिरि चंदन को गुलाब जल के साथ घिसकर (गुलाब जल की मात्रा कुछ अधिक रहे) नाक के द्वारा खींचने से अधकपारी का दर्द अवश्य समाप्त हो जाता है।

18. खूनी दस्त - 2 तोला जामुन की गुठली को ताजे पानी के साथ पीस-छानकर, 4-5 दिन सुबह 1 गिलास पीने से खूनी दस्त बंद हो जाता है। इसमें चीनी या कोई अन्य पदार्थ नहीं मिलाना चाहिए।

19. जुकाम - 1 पाव गाय का दूध गरम करके उसमें 12 दाना कालीमिर्च एवं 1 तोला मिश्री- इन दोनों को पीसकर दूध में मिलाकर सोते समय रात को पी लें। 5 दिन में जुकाम बिलकुल ठीक हो जाएगा अथवा 1 तोला मिश्री एवं 8 दाना कालीमिर्च ताजे पानी के साथ पीसकर गरम करके चाय की तरह पीयें और 5 दिन तक स्नान न करें।

20. मंदाग्नि - अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े करके नींबू के रस में डालकर और नाममात्र का सेंधा नमक मिलाकर शीशे के बर्तन में रख दें। 5-7 टुकड़े नित्य भोजन के साथ सेवन करें, मंदाग्नि दूर हो जाएगी।

21. उदर विकार - अजवाइन, कालीमिर्च एवं सेंधा नमक- इन तीनों को एक में ही मिलाकर चूर्ण बना लें। ये तीनों बराबर मात्रा में होने चाहिए। इस चूर्ण को प्रतिदिन नियमित रूप से रात को सोते समय गरम जल के साथ सेवन करने से (मात्रा अठन्नीभर) सभी प्रकार के उदर रोग दूर हो जाते हैं।

22. मोटापा दूर करना - 1 नींबू का रस 1 गिलास जल में प्रतिदिन खाली पेट पीने से मोटापा दूर हो जाता है। ऐसा 3 महीने तक निरंतर करना चाहिए। गर्मी एवं बरसात के दिनों में यह प्रयोग विशेष लाभदायक होता है।

 अत्यधिक बालों के झड़ने से छुटकारा पाने के 50 सबसे अच्छे प्राकृतिक घरेलू उपचार हैं जो आप आसानी से घर पर कर सकते हैं। 1. एलो वेरा: शुद्ध मुसब्बर का रस या मुसब्बर जेल सीधे खोपड़ी पर लागू किया जा सकता है। यह बालों के झड़ने के लिए प्राकृतिक उपचारों में से एक है जो संक्रमण का इलाज करेगा या आपकी खोपड़ी को शुष्क कर देगा। एलो वेरा में विटामिन ए, सी, ई और फोलिक एसिड के साथ-साथ कोलीन, बी 1, बी 2, बी 3 (नियासिन) और बी 6 शामिल हैं। यहाँ आप बालों के झड़ने के इलाज के लिए इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: जेल या जूस से अपने स्कैल्प की मालिश करें, कुछ घंटों तक प्रतीक्षा करें और फिर गुनगुने पानी से धो लें। बालों के झड़ने को रोकने के लिए लगभग 3 से 6 महीने तक एलो वेरा के रस के साथ त्रिफला चूर्ण का उपयोग करें। 2. नारियल का दूध: बालों के ऊतकों को पोषण देने के लिए, नारियल का दूध सबसे अच्छा काम करता है और आपके बालों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का एक समृद्ध स्रोत है। आप सिर्फ नारियल का कद्दूकस करके और उसके दूध को निचोड़कर नारियल का दूध प्राप्त कर सकते हैं। नारियल का दूध बालों के झड़ने को नियंत्रित करने और कुल खोपड़ी को चमकाने का एक प्राकृतिक घरेलू उपचार है। इस तरह एक प्रभावी नारियल का दूध मास्क बनाएं। कैसे करें और उपयोग करें: एक कप नारियल का दूध, आधा कप दही, दो बड़े चम्मच कपूर का तेल मिलाएं। बालों पर इस मिश्रण की मालिश करें और इसे लगभग 2 घंटे तक बैठने दें। बालों को तौलिये में लपेटें और सूखने दें। मलो मत। आधे घंटे के बाद गुनगुने पानी से धो लें। 3. गर्म तेल की मालिश: गुनगुने तेल के साथ खोपड़ी और बालों की नियमित मालिश रक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने में मदद करेगी। हम आपके बालों की मालिश करने के लिए नारियल तेल या तिल के तेल के उपयोग की सलाह देते हैं। कई अन्य तेल हैं जिनका उपयोग मालिश करने के लिए किया जा सकता है, विशेष रूप से जैतून, अरंडी, जोजोबा और बादाम। यह बालों के झड़ने के लिए सबसे अच्छा सरल घरेलू उपचार में से एक है और यह स्ट्रैंड द्वारा आपके बालों की त्वचा पर रक्त परिसंचरण को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कैसे करें और उपयोग करें: अपने बालों को बीच में रखें और अच्छी तरह से कंघी करें। ल्यूक कुछ नारियल तेल (या किसी अन्य तेल) को गर्म करता है और सीधे खोपड़ी पर कुछ डाल देता है। इसे धीरे-धीरे रिसने दें जबकि यह अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ने लगता है। अब, अपनी उंगलियों का उपयोग करते हुए, खोपड़ी पर तेल की अच्छी तरह से मालिश करें। लगभग 20 मिनट तक मालिश करें। एक बार हो जाने के बाद, बालों को पोनी टेल की स्थिति में ले जाएं और कोमल दबाव डालें और इसे खींचें। यह खोपड़ी को मजबूत करेगा। तेल को लगभग एक घंटे तक लगा रहने दें। आप गर्म तेल में कुछ कपूर भी मिला सकते हैं। कपूर रूसी को ठीक करने के लिए जाना जाता है। 4. आंवला या भारतीय करौदा: नारियल के तेल में कुछ सूखे आंवले डालें और उन्हें तब तक उबालें जब तक आपको काला तेल न मिल जाए। अगर आप इस तेल की मालिश करते हैं तो यह बहुत प्रभावी साबित होगा। आंवला में आहार फाइबर होता है और यह विटामिन सी से भरपूर होता है। कैल्शियम, प्रोटीन और आयरन की अच्छी खुराक बालों की मजबूती के लिए सहायक होती है। कैसे करें और उपयोग करें: आप आंवले का इस्तेमाल सिर्फ शिकाकाई के साथ पेस्ट बनाकर कर सकते हैं। इस पेस्ट को गीले बालों में लगाएं और कुछ मिनट बाद अपने बालों को धो लें। नोट आंवले के रस (आंवला) और निम्बू के रस को मिला कर बालों के झड़ने का इलाज किया जा सकता है। शहद के साथ मिश्रित होने पर आंवले मददगार है। यह उन महिलाओं के लिए सबसे अच्छे और सही बालों के झड़ने वाले घरेलू उपचारों में से एक है, जिनके सूखे बाल हैं। 5. नीम (भारतीय बकाइन): नीम का पौधा बहुत फायदेमंद है और इसमें सजावटी और आवश्यक गुण हैं। नीम का एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल, एंटी-सेडेटिव, एंटी-डायबिटिक गुण स्वस्थ बालों के लिए आवश्यक है। नीम बीमारियों के इलाज के लिए उपयोगी है और बालों के झड़ने के लिए एक अद्भुत घरेलू उपचार भी है। यहाँ आप कैसे तैयार कर सकते हैं, कैसे करें और उपयोग करें: नीम के साथ पानी उबालें, जब तक कि पानी आधा न हो जाए। इसे ठंडा करें और अपने बालों को धो लें। आप सप्ताह में एक बार इस घोल से अपने बालों को धो सकते हैं। यह खोपड़ी से खुजली और रूसी से बचने के लिए बालों के झड़ने के लिए सबसे अच्छा उपचार में से एक है। 6. हिबिस्कस: हिबिस्कस या गुड़हल एक फूल है जो आसानी से उपलब्ध है। यह फूल लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है और भगवान गणेश को चढ़ाया जाता है। हिबिस्कस या गुड़हल में पुनर्जीवित करने वाले गुण होते हैं और यह आपके बालों को पोषण देने में मददगार होता है। हिबिस्कस बालों को रूसी से बचाता है और असमय धूसर बालों का विकास करता है। यह बालों के झड़ने को रोकने में बहुत मददगार है। यह विटामिन ए, बी और सी, फॉस्फोरस और कैल्शियम, अमीनो एसिड और अन्य पोषक तत्वों जैसे खनिजों में समृद्ध है जो इसे हमारे तालों के लिए सबसे अच्छा बनाते हैं। यह बालों के अत्यधिक झड़ने का एक घरेलू उपचार है। कैसे करें और उपयोग करें: अपने बालों की लंबाई के आधार पर हिबिस्कस (3 या 4) पीस लें। इन्हें तब तक पीसें जब तक आपको एक गाढ़ा पेस्ट न मिल जाए। इसे कुछ दही के साथ मिलाएं। इसे अपने स्कैल्प और जड़ों पर लगाएं। समान रूप से अपने बालों के अंत किस्में तक लागू करें। आप मेथी के साथ हिबिस्कस का भी उपयोग कर सकते हैं। रातभर भिगोने के बाद मेथी का पेस्ट बना लें। इसे छाछ के साथ मिलाएं और लागू करें। 7. लहसुन और प्याज: कैसे करें और उपयोग करें: लहसुन और प्याज दोनों ही सल्फर के समृद्ध स्रोत हैं और दोनों ही बालों के विकास में मदद करते हैं। लहसुन को लागू करने के लिए, लहसुन को छीलें और उन्हें नारियल के तेल के साथ उबालें। इस तेल को अपने स्कैल्प में लगाएं और मालिश करें। सर्वोत्तम परिणाम देखने के लिए सप्ताह में 2 से 3 बार इस तेल से मालिश करें। प्याज को लागू करने के लिए, आपको उन्हें बारीक रूप से काटना और रस निकालना होगा। कैसे करें और उपयोग करें: प्याज के रस से स्कैल्प की अच्छे से मालिश करें और माइल्ड शैम्पू से अपने बालों को धो लें। ये दोनों बालों के झड़ने के लिए और बालों के विकास के लिए सबसे अच्छा घरेलू उपचार हैं। अगर प्याज को शहद के साथ मिलाया जाए तो इसे एलोवेरा को हेयर मास्क के रूप में लगाया जा सकता उपयोगी हेयर फॉल के घरेलू उपचार है  गुड़हल आंवला आयरन, सल्फर, फॉस्फोरस, प्रोटीन, जिंक और आयोडीन का एक समृद्ध स्रोत है। अपने बालों को फिर से उगाने के लिए, इसका एक मास्क बनाएं। कैसे करें और उपयोग करें: ऑलिव ऑयल के साथ । अपने बालों के छोर तक खोपड़ी पर मालिश करें। इसे एक घंटे के लिए छोड़ दें और एक हल्के शैम्पू का उपयोग करके अच्छी तरह से पानी से धो लें।

9. काली मिर्च के बीज और चूना: काली मिर्च और चूना विटामिन ए और विटामिन सी, फ्लेवोनॉयड्स, कार्टेनोइड्स और कई अन्य एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। वे सभी विकास सुनिश्चित करते हैं और रूसी से भी लड़ते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: नींबू के रस के अर्क में थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च मिलाएं। इस मिश्रण को अपने स्कैल्प पर लगाएं। इसे 15 मिनट के लिए छोड़ दें और ठंडे पानी में धो लें। आप काली मिर्च में अरंडी का तेल या नारियल का तेल भी मिला सकते हैं। यह मिश्रण बहुत अच्छा साबित होता है और बालों के झड़ने को प्राकृतिक रूप से ठीक कर सकता है। यह बालों के झड़ने के प्राकृतिक उपचारों में से एक है और यह बालों को एक अच्छा बनावट भी देता है। 10. लाल ग्राम या कबूतर मटर: कबूतर मटर में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की अच्छाई होती है। वे विटामिन सी और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन से भी समृद्ध होते हैं जो बालों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति करते हैं। कैसे करें और उपयोग करें: कुछ कबूतर या लाल चने रात भर भिगोएँ। बहुत कम पानी मिलाते हुए इसे गाढ़ा और महीन पेस्ट बना लें। अपने बालों पर लागू करें। यह पेस्ट प्राकृतिक रूप से बालों के झड़ने को ठीक करने के लिए प्रभावी है। यह बालों के झड़ने को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। मास्क को हर वैकल्पिक दिन में लगभग 45 मिनट तक रखें। कुछ ऐसे उबटन के बारे में बताते हैं, जिससे आप बेदाग व निखरी त्‍वचा पा सकती हैं- *हल्दी* हल्‍दी त्‍वचा के लिए कितनी अच्‍छी होती है इस बारे में हम आपको समय-समय पर बताते रहते हैं। जी हां हल्‍दी में मौजूद एंटी-ऑक्‍सीडेंट और करक्यूमिन नामक तत्‍व ना केवल हेल्‍थ के लिए बल्कि आपको सुंदर बनाने में भी मददगार होते है। आपने देखा ही होगा दुल्‍हन को शादी से पहले हल्‍दी लगाई जाती है ताकि उसके त्‍वचा निखरी हुई दिखाई दें। हल्‍दी का उबटन बनाने के लिए आपको हल्‍दी, बेसन या आटा, ताजी मलाई, थोड़ा सा सरसों का तेल और दूध की जरूरत होती है। सबसे पहले हल्‍दी में बेसन या आटा मिला लें। फिर इसमें ताजी मलाई, दूध और थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर गाढ़ा पेस्‍ट बना लें। इसे 10 मिनट चेहरे पर लगाकर ऐसे ही छोड़ दें। जब ये थोड़ा सूख जाए तो इसे हल्‍का सा रगड़कर साफ कर लें। फिर चेहरे को पानी से धो लें। *ग्रीन-टी* हल्‍दी की तरह ग्रीन टी में भी एंटी-ऑक्‍सीडेंट भरपूर मात्रा में होते है। इसलिए इसका इस्‍तेमाल वेट लॉस के लिए किया जाता है। लेकिन क्‍या आप जानती हैं कि आप ग्रीन टी का उबटन बनाकर भी अपने चेहरे पर लगा सकती हैं। ग्रीन टी का उबटन बनाने के लिए आपको 2 ग्रीन टी के बैग, 1 छोटा चम्‍मच नींबू के रस और 1 छोटा चम्‍मच शहद की जरूरत होती है। सबसे पहले 2 ग्रीन-टी बैग को पानी में अच्छी तरह डिप करें और फिर उसमें से पाउडर निकाल लें। अब इसमें नींबू का रस और शहद मिक्स कर लें। इसे अपने चेहरे पर लगाकर 15 मिनट के लिए ड्राई होने दें और फिर इसे पानी से धो लें। *चंदन पाउडर* चंदन पाउडर हमारी त्‍वचा के लिए बहुत अच्‍छा होता है। इसमें मौजूद एंटीबैक्टीरियल तत्व चेहरे को बूढ़ा होने से बचाते हैं। ये त्‍वचा को टाइट कर उसे जवां बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा चंदन में हर्बल एंटीसेप्टिक गुण होते है। इसके अलावा अगर यह सनटैन को भी ठीक करता है। चंदर का उबटन बनाने के लिए आापको थोड़े से चंदन पाउडर, 1 छोटा चम्‍मच टमाटर और नींबू के रस की जरूरत होती है। सबसे पहले चंदन पाउडर में इन दोनों चीजों को अच्‍छी तरह से मिलाकर पेस्‍ट बना लें। फिर इसे अपने चेहरे पर 10-15 मिनट लगाएं और फिर ताजे पानी से धो लें। आप इसका इस्‍तेमाल रोजाना कर सकती हैं। ऐसा करने से ना केवल आपकी स्किन ग्‍लोइंग होगी बल्कि यह एलर्जी व पिंपल्स जैसी समस्याओं को भी दूर करेगा। *बादाम* बादाम में विटामिन, प्रोटीन और मिनरल्स का खजाना छुपा होता है, इसलिए ये स्किन के लिए काफी फायदेमंद होता है। बरसों से स्किन केयर में बादाम का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। इसे लगाने से एजिंग से निजात और स्किन से कालेपन दूर होने की समस्या कम होती है। इसके अलावा बादाम में कई तरह के एंटी ऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं जो चेहरे में निखार लाते हैं और स्किन का रूखापन भी दूर करते हैं। रात को 10-15 बादाम को भिगो दे और सुबह उठकर इसे छील कर इसका पेस्ट बना लें। फिर इसमें हल्‍का सा दूध और शहद मिला कर आप स्क्रब की तरह इस्तेमाल करें। रेगुलर ऐसा करने से आपको खुद फर्क महसूस होगा।


गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

संस्कृत स्वयं समृद्ध,व देशों के समृद्धि का आधार और सभी भाषाओं की जननी क्यों है?

 
    
संस्कृत स्वयं एक समृद्ध और देश की समृद्धि का आधार है इस तथ्य को अंग्रेजी शिक्षा के पढ़े हुए ज्ञानी अगर समझ जाएं तो देश पुनः अपने गौरव को प्राप्त कर लेगा क्यों सारा विश्व आज संस्कृत के पीछे पड़ा हुआ है भारत सो रहा है यदि आप स्वयं जगे हुए हैं और लोगों को भी जगाना चाहते हैं तो यथाशीघ्र गुरुकुल शिक्षा अभियान का हिस्सा बनने के लिए व्हाट्सएप संपर्क करें 9336919081
   संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है।

संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे #प्राचीन_भाषा है और सबसे वैज्ञानिक_भाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। #भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।

ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।

तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?
शब्दों का आधार #ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है #शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था।
प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर *संस्कृत के 36 #स्वर बने और इन 36 रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72 प्रकार की #ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने*। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल *108 ध्वनियों पर संस्कृत की #वर्णमाला आधारित है*। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। *अतः प्राचीनतम #आर्यभाषा जो #ब्रह्मांडीय_संगीत थी उसका नाम "संस्कृत" पड़ा*। संस्कृत – संस् + कृत् अर्थात
#श्वासों_से_निर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर संपर्क से अभिव्यक्त हुयी*।

कालांतर में #पाणिनी ने नियमित #व्याकरण के द्वारा संस्कृत को परिष्कृत एवं सर्वम्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान किया। #पाणिनीय_व्याकरण ही संस्कृत का प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है*। दिव्य व दैवीय गुणों से युक्त, अतिपरिष्कृत, परमार्जित, सर्वाधिक व्यवस्थित, अलंकृत सौन्दर्य से युक्त , पूर्ण समृद्ध व सम्पन्न , पूर्णवैज्ञानिक #देववाणी *संस्कृत – मनुष्य की आत्मचेतना को जागृत करने वाली, सात्विकता में वृद्धि , बुद्धि व आत्मबलप्रदान करने वाली सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है*। अन्य सभी भाषाओ में त्रुटि होती है पर इस भाषा में कोई त्रुटि नहीं है। इसके उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि सहस्त्रों वर्षो से लेकर आज तक वैदिक मन्त्रों की ध्वनियों व मात्राओं में कोई पाठभेद नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे बल्कि विश्व के आधुनिक विद्वानों और भाषाविदों ने भी एक स्वर में संस्कृत को पूर्णवैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ माना है।

*संस्कृत की सर्वोत्तम शब्द-विन्यास युक्ति के, गणित के, कंप्यूटर आदि के स्तर पर नासा व अन्य वैज्ञानिक व भाषाविद संस्थाओं ने भी इस भाषा को एकमात्र वैज्ञानिक भाषा मानते हुये इसका अध्ययन आरंभ कराया है* और भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का बताया है। अतः अंग्रेजी बोलने में बड़ा गौरव अनुभव करने वाले, अंग्रेजी में गिटपिट करके गुब्बारे की तरह फूल जाने वाले कुछ महाशय जो संस्कृत में दोष गिनाते हैं उन्हें कुँए से निकलकर संस्कृत की वैज्ञानिकता का एवं संस्कृत के विषय में विश्व के सभी विद्वानों का मत जानना चाहिए।
*नासा की वेबसाईट पर जाकर संस्कृत का महत्व पढ़ें।*

*काफी शर्म की बात है कि भारत की भूमि पर ऐसे लोग हैं जिन्हें अमृतमयी वाणी संस्कृत में दोष और विदेशी भाषाओं में गुण ही गुण नजर आते हैं वो भी तब जब विदेशी भाषा वाले संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं* ।

अतः जब हम अपने बच्चों को कई विषय पढ़ा सकते हैं तो संस्कृत पढ़ाने में संकोच नहीं करना चाहिए। देश विदेश में हुये कई शोधो के अनुसार संस्कृत मस्तिष्क को काफी तीव्र करती है जिससे अन्य भाषाओं व विषयों को समझने में काफी सरलता होती है , साथ ही यह सत्वगुण में वृद्धि करते हुये नैतिक बल व चरित्र को भी सात्विक बनाती है। अतः सभी को यथायोग्य संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

आज दुनिया भर में लगभग 6900 भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन भाषाओं की जननी कौन है?

नहीं?

कोई बात नहीं आज हम आपको दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।
*दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है :- संस्कृत भाषा* ।

आइये जाने संस्कृत भाषा का महत्व :
संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों एवं व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या एक से अधिक चक्रों को निम्न प्रकार से प्रभावित करके उन्हें क्रियाशील – उर्जीकृत करता है :-

मूलाधार चक्र – स्वर 'अ' एवं क वर्ग का उच्चारण मूलाधार चक्र पर प्रभाव डाल कर उसे क्रियाशील एवं सक्रिय करता है।
स्वर 'इ' तथा च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को उर्जीकृत करता है।
स्वर 'ऋ' तथा ट वर्ग का उच्चारण मणिपूरक चक्र को सक्रिय एवं उर्जीकृत करता है।
स्वर 'लृ' तथा त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को प्रभावित करके उसे उर्जीकृत एवं सक्रिय करता है।
स्वर 'उ' तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र को प्रभावित करके उसे सक्रिय करता है।
ईषत् स्पृष्ट वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रियता प्रदान करता है।
ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से

सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रिय करता है।
इस प्रकार देवनागरी लिपि के प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के किसी न किसी उर्जा चक्र को सक्रिय करके व्यक्ति की चेतना के स्तर में अभिवृद्धि करता है। वस्तुतः *संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द इस प्रकार से संरचित (design) किया गया है कि उसके स्वर एवं व्यंजनों के मिश्रण (combination) का उच्चारण करने पर वह हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करे*। प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसीलिये कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। शब्दों में शक्ति होती है जिसका दुरूपयोग एवं सदुपयोग स्वयं पर एवं दूसरे पर प्रभाव डालता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति का स्वभाव, आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व निर्धारित होता है।

उदाहरणार्थ जब 'राम' शब्द का उच्चारण किया जाता है है तो हमारा अनाहत चक्र जिसे ह्रदय चक्र भी कहते है सक्रिय होकर उर्जीकृत होता है। 'कृष्ण' का उच्चारण मणिपूरक चक्र – नाभि चक्र को सक्रिय करता है। 'सोह्म' का उच्चारण दोनों 'अनाहत' एवं 'मणिपूरक' चक्रों को सक्रिय करता है।

वैदिक मंत्रो को हमारे मनीषियों ने इसी आधार पर विकसित किया है। प्रत्येक मन्त्र स्वर एवं व्यंजनों की एक विशिष्ट संरचना है। इनका निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शुद्ध उच्चारण ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करने के साथ साथ मष्तिष्क की चेतना को उच्चीकृत करता है। उच्चीकृत चेतना के साथ व्यक्ति विशिष्टता प्राप्त कर लेता है और उसका कहा हुआ अटल होने के साथ-साथ अवश्यम्भावी होता है। शायद आशीर्वाद एवं श्राप देने का आधार भी यही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं सार्थकता इस तरह स्वयं सिद्ध है।

*भारतीय शास्त्रीय संगीत के सातों स्वर हमारे शरीर के सातों उर्जा चक्रों से जुड़े हुए हैं* । प्रत्येक का उच्चारण सम्बंधित उर्जा चक्र को क्रियाशील करता है। शास्त्रीय राग इस प्रकार से विकसित किये गए हैं जिससे उनका उच्चारण / गायन विशिष्ट उर्जा चक्रों को सक्रिय करके चेतना के स्तर को उच्चीकृत करे। प्रत्येक राग मनुष्य की चेतना को विशिष्ट प्रकार से उच्चीकृत करने का सूत्र (formula) है। इनका सही अभ्यास व्यक्ति को असीमित ऊर्जावान बना देता है।

*संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि #महर्षि_पाणिनि; #महर्षि_कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि #पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है।* यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है। ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है। जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।

*संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ?*
यह विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है। चार महत्वपूर्ण विशेषताएँ:- 1. अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:): संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं -यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं-यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा । जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- " राम फल खाता है"इसको संस्कृत में बोला जायेगा- " राम: फलं खादति"=राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है। संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना होता है ।

2.शब्द-रूप:-संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। *विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं*। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं- यथा:- रम् (मूल धातु)-राम: रामौ रामा:;रामं रामौ रामान् ;रामेण रामाभ्यां रामै:; रामाय रामाभ्यां रामेभ्य: ;रामात् रामाभ्यां रामेभ्य:; रामस्य रामयो: रामाणां; रामे रामयो: रामेषु ;हे राम ! हे रामौ ! हे रामा : ।ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन *25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं -आत्मा (पुरुष), (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार, (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण, (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्, (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द,( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश।*

3.द्विवचन:- *संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन*। सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

4. सन्धि:- *संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि*। संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।"इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे #देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।
इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन *संस्कृत शब्द* इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। *बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ* इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।
अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की *खोज हार्वे ने 1922 में की थी,* जिसे *हृदय शब्द* स्वयं *लाखों वर्षों* से उजागर कर रहा था ।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। *संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक* स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। #देवनागरी_लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है! इसलिए इसमें *हरेक चिन्ह* के लिए *एक और केवल एक ही ध्वनि है।*

*देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं*। **संस्कृत* केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि *संस्कारित भाषा* भी है, अतः *इसका नाम संस्कृत* है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। *संस्कृत को संस्कारित* करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि *महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।*

*विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में* एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। *संस्कृत में जब दो अक्षर* निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। *इसे शोध में कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि* के लिए सबसे *उपयुक्त भाषा सिद्ध हुई है* और यह भी पाया गया है कि *संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।*

*संस्कृत ही एक मात्र साधन है, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाती है।* इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। *संस्कृत केवल एक भाषा* मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। *संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है।* संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और *वसुधैव कुटुंबकम्* की भावना भी. 🙏🕉

गुरुवार, 19 मार्च 2020

योगी ने साइनाइड जहर यानी मौत को चुनौती से वैज्ञानिक सीवी रमन भी हतप्रभ

  
 
प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए, अनादि काल से अपनी जिज्ञासा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य दुस्साहस करता आया है और करता आया है अपने जीवन का बलिदान भी। विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसे बलिदानियों की कमी नहीं रही है।
'#पोटेशियम #सायनाइड' का नाम मेडिकल साइन्स में कौन नहीं जानता ? यह अत्यंत तीव्र महाविष है जिसका असर प्राणी के शरीर पर इतनी तेजी से पड़ता है कि वह एक क्षण से भी कम समय में मर जाता है। इस महाविष का सुई की नोंक पर लगा सूक्ष्मतम कण ही काफी है। उस कण को जीभ पर रखने मात्र से ही प्राणी निर्जीव हो जाता है। यही कारण है कि आज तक कोई भी व्यक्ति इस महाविष का स्वाद नहीं बता पाया। इसका स्वाद बताने के लिए समय- समय पर तीन वैज्ञानिकों ने पूरी तैयारी करके अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी लेकिन वे एक शब्द तो क्या एक अक्षर से अधिक बतला पाने में सफल नहीं हुए।
लेकिन इस सत्य को भारत के एक महायोगी '#नरसिंह #स्वामी' ने झुटला दिया और अनेक विषों और घातक प
कौन था वह महायोगी ? क्या उसे 'अमरत्व' की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी ? क्या वह कालंजयी था ?

हाँ, इसमें संदेह नहीं, उस परम साधक को निश्चय ही अमरत्व की दुर्लभ सिद्धि प्राप्त थी। उस महायोगी की खोज की थी उस समय के कलकत्ता विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के रीडर डा. #नियोगी ने।
कलकत्ता के पास एक गांव था-'#मधुपुर'। अब तो वह एक बड़ा टाउन बन गया है। डा. नियोगी की वहां रिश्तेदारी थी। एक बार वह किसी काम से उसी रिश्तेदारी में गए हुए थे। उस समय मधुपुर गांव में स्वामीजी की तपस्या और सिद्धियों की धूम मची हुई थी। गांव के लोग उन्हें संत, महात्मा और योगी कहते थे और बहुत आदर करते थे उनका। सभी लोग उनकी सिद्धियों और योगबल से चमत्कृत थे।
कहते हैं नरसिंह स्वामी ने पूरे तीस वर्षों तक हिमालय की दुर्गम कंदराओं में रह कर
'#कुण्डलिनी #योग' की कठिन साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। फिर लोक- कल्याण की भावना के चलते उस तपोभूमि से निकल कर संसार के शोर-गुल भरे क्षेत्र में आ गए वह। मधुपुर में कालीदेवी का एक मंदिर है, उसीके पास एक कुटिया बना कर रहने लगे। कालीमंदिर के सामने कदम्ब का एक पेड़ था उसी के नीचे बैठकर स्वामीजी दीन-दुखी, असहाय-अपाहिज लोगों की सेवा करने लगे। शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई। डा. नियोगी ने भी स्वामीजी के चमत्कारों की कथा सुनी। उनकी जिज्ञासा जाग उठी और एक दिन वह स्वामीजी की कुटिया पर पहुँच गए। उन्होंने अपना परिचय दिया और स्वामीजी ने उन्हें अपने पास बैठा कर उनसे आत्मीयता से बात की। लेकिन कुछ ही समय बाद वह वार्तालाप एक सिद्ध योगी और कर्मठ विज्ञान-वेत्ता के बीच शास्त्रार्थ के रूप में बदल गया। तर्क-वितर्क तेज हो गया। थोड़ी देर बाद डा. नियोगी ने आवेश में आकर उन्हें चुनौती दे डाली-- कोई व्यक्ति अंगारे नहीं खा सकता, तेजाब नहीं पी सकता, जहर नहीं चाट सकता।
यह सुनकर स्वामीजी मुस्कराये फिर सहज स्वर में बोले-- ये तीनों काम मैं ही तुम्हें करके दिखा सकता हूँ। लेकिन डा. नियोगी प्रत्यक्ष प्रमाण पाये बिना उस महान योगी की क्षमता पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे। उनको घोर आश्चर्य हुआ उस समय जब स्वामीजी तत्काल तैयार हो गए उन तीनों असंभव कार्य करने के लिए।
डा. नियोगी ने तुरंत कोयले के दहकते अंगारे, शुद्ध तेजाब और तीक्ष्ण विष की व्यवस्था की और उन्हें स्वामीजी के सामने प्रस्तुत कर दिया। सभी जानते हैं कि कोई भी प्राणी इन प्राण घातक पदार्थों का सेवन कर जीवित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने कुछ उपहास के भाव के साथ कहा-- लीजिये स्वामीजी, अब आप अपनी बातों को सच साबित कर दिखाएँ, अन्यथा योगी का यह बाना उतार कर फेंक दें। डा. नियोगी की ये कड़वी बातें सुनकर भी स्वामीजी मुस्कराते रहे। इस बीच डा. नियोगी की इस चुनौति की चर्चा चारों ओर फ़ैल चुकी थी। देखते-ही-देखते मधुपुर की जनता उस अद्भुत चमत्कार को देखने काली मंदिर की ओर उमड़ पड़ी।
क्या स्वामीजी यह चमत्कार कर पाने में समर्थ हो पाये या उन्हें अपने योगी के बाना को छोड़ कर वहां से जाना पड़ा ?
नरसिंह स्वामी ने हज़ारों लोगों की आश्चर्यचकित आँखों के सामने वह तीव्र विष उठा कर पी लिया। फिर तेजाब उठा कर अपनी हथेली पर उड़ेल लिया और मुस्कराते हुए उसे इस प्रकार चाटने लगे जैसे शहद चाट रहे हों। अंत में उन्होंने दहकते अंगारों को उठा-उठा कर इस तरह खाना शुरू किया मानो स्वादिष्ट रसगुल्ले खा रहे हों।
'#हठयोग' कुण्डलिनी साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। हठयोग के साधक का शरीर के सभी अंगों पर अधिकार होता है जिसके फलस्वरूप शरीर पर किसी पदार्थ का प्रभाव नहीं पड़ता, भले ही #पोटेशियम #सायनाइड ही क्यों न हो। हठयोग के इस चमत्कार को देख कर डा. नियोगी भी एकबारगी स्तब्ध रह गए। वह स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया। मधुपुर से जाते समय डा. नियोगी ने स्वामीजी से प्रार्थना की एक बार वह अपनी इस महान योगविद्या का प्रदर्शन कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रख्यात वैज्ञानिकों के सामने अवश्य करें। स्वामीजी ने डा. नियोगी के इस अनुरोध को सहजभाव से स्वीकार कर लिया।
विज्ञान जगत में तहलका मचा देने वाले विश्व के अभूतपूर्व प्रदर्शन का आयोजन शुरू होने वाला था। तारीख निश्चित हुई--16 जनवरी,1932। यह चमत्कृत कर देने वाला आयोजन और प्रदर्शन #सर #सी.#वी. #रमन की अध्यक्षता में किया जा रहा था जो उस समय भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के महानतम वैज्ञानिकों की श्रेणी में पहुँच चुके थे। उस विलक्षण प्रदर्शन के आयोजक थे डा. नियोगी के अतिरिक्त साइन्स फैकल्टी के डीन डा.भट्टाचार्य, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के हैड ऑफ़ द डिपार्टमेंट डा.सरकार।  उस अवसर पर देश-विदेश के अनेक वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित किया गया था। आयोजन के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त डा.सी.वी. रमन ने अध्यक्ष की हैसियत से इसकी सच्चाई परखने के लिए एक समिति का गठन किया था जिसमें पांच सदस्य थे--
1--ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के साइन्स विभागाध्यक्ष, 2--पेरिस यूनिवर्सिटी, फ़्रांस के साइन्स फैकल्टी के डीन, 3-- न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी, अमेरिका के साइन्स विभाग के रीडर, 4-- मद्रास विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर और 5--कलकत्ता विश्वविद्यालय के डा. नियोगी। कहने की आवश्यकता नहीं, उस समय उस आयोजन की समूचे विश्व में धूम मच गई थी। उस प्रदर्शन को प्रत्यक्ष देखने के लिए विश्व के तमाम देशों से वैज्ञानिकों और जिज्ञासुओं के दल-के-दल भारत आने लगे।
निश्चित समय पर आयोजन आरम्भ हुआ। नरसिंह स्वामी प्रदर्शन हॉल में आ खड़े हुए। उनके चहरे पर वही सहज मुस्कान थी। सबसे पहले समिति की ओर से डॉक्टरों ने उनका गहन परिक्षण किया। हर प्रकार से जाँच कर तलाशी ली गई। यह निश्चित हो गया कि स्वामीजी ने किसी छल-प्रपंच का सहारा नहीं लिया है, न किसी प्रकार की ऐसी दवाई का सेवन किया है कि जो उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हो। सब कुछ सामान्य पाया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से भयंकर से भयंकर विष मंगा कर पहले ही रख लिए गए थे। इतना ही नहीं, विदेशों से आने वाले वैज्ञानिक भी अपने साथ भयंकरतम महाविष 'पोटेशियम सायनाइड' लेकर आये थे।
आयोजन के अध्यक्ष डा.सी.वी.रमन ने स्वामीजी के सामने एक दस्तावेज रखते हुए अनुरोध किया कि प्रदर्शन से पूर्व इस पर हस्ताक्षर कर दें। क़ानूनी कार्यवाही निश्चित रूप से महत्वपूर्ण थी। उस दस्तावेज में यह घोषणा थी--" स्वामीजी स्वेच्छा से यह प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान यदि उनकी मृत्यु हो जाती है तो समिति पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।"।       हस्ताक्षर करने के बाद ही यह प्रदर्शन संभव था। स्वामीजी ने बिना सोचे-समझे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।
दार्थो के आलावा संसार का सबसे तीक्ष्ण विष 'पोटेशियम सायनाइड' को भी खाकर जीवित बने रहने का अद्भुत कारनामा करके सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिकों में तहलका मचा दिया था।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...