मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

गणित के समीकरण से दुर्गा देवी की प्रतिमा निर्माण इसी गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया जाता है

 





समझिए गणित के 100 समीकरणों से कैसे बना माँ दुर्गा का चित्र: प्राचीन भारत, जिसने गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया

माँ दुर्गा की तस्वीर, गणित के समीकरणों से
इसी तरह से डाले गए लगभग 100 गणितीय समीकरण (बाएँ) और बन गया माँ दुर्गा का चित्र

गणित के समीकरणों (Equations) की मदद से माँ दुर्गा की तस्वीर उकेरी जाता है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जैसे-जैसे गणित के अलग-अलग समीकरण डाले जाते हैं, वैसे-वैसे अलग-अलग आकृतियाँ बनती हैं और अंत में माँ दुर्गा के चेहरे की तस्वीर बन कर उभरती है। यहाँ हम ये तो जानेंगे ही कि ये कैसे हो रहा है, लेकिन साथ में ही भारत में गणित और ईश्वर के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव की भी बात करेंगे।

गणित के समीकरणों की मदद से कैसे बनी माँ दुर्गा की तस्वीर?
इस ग्राफ का सोर्स ऑनलाइन ग्राफ़िंग प्लेटफॉर्म ‘Desmos’ है, जहाँ से इसे बनाया गया है। लेकिन, इसमें सबसे कमाल की बात है कि अलग-अलग आकृतियों के लिए अलग-अलग समीकरणों को डिराइव करना और फिर उसे सटीक क्रम में लगाना। ग्राफ में एक-एक बिंदु का महत्व होता है और पिक्सेल्स व स्क्रीन के आकर के हिसाब से इसे सजाने के लिए अलग-अलग गणितीय समीकरणों को लगाना ही इस वीडियो की खासियत है।

अर्थात, जिसने भी ‘Desmos’ पर ये समीकरण डाले होंगे उसे क्रमशः उसी तरह से ग्राफ प्राप्त होता गया होगा और अंत में ये तस्वीर बनी। इस तस्वीर के लिए गणित के एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 100 समीकरण प्रयोग में लाए गए हैं और उन्हें देख कर लगता नहीं कि ये आसान हैं। सभी समीकरण अपने-आप में कई गणितीय कैलकुलेशंस समाए हुए हैं। इसके बाद एक-एक करके हर समीकरण को एक्टिवेट किया जाता है, और उसका ग्राफ मिलता चला जाता है।

जैसे, एक स्ट्रेट लाइन का ग्राफ बनाने के लिए आप ‘y = 2x+1‘ लीनियर एक्वेशन का प्रयोग कर सकते हैं। ये एक बेसिक और साधारण उदाहरण है। इसी तरह से वृत्त और त्रिभुज से लेकर पैराबोला और हायपरबोला तक के लिए अलग-अलग समीकरणों का प्रयोग किया जाता है और उन्हें कैसे और कहाँ एडजस्ट करना है ताकि मनपसंद ग्राफ आए, इसमें दिमाग लगाना पड़ता है। इसी तरह से माँ दुर्गा की भौं और आँखें वगैरह बनाने के लिए समीकरणों का प्रयोग किया गया है।

जैसे माँ दुर्गा की नाक में जो नथुनी है, वो वृत्ताकार है। इसी तरह से समीकरणों के हिसाब से ग्राफ कहाँ मिलना चाहिए, उसी हिसाब से उन्हें शिफ्ट किया जाता है। ये तो थी तकनीकी चीजें कि कैसे इस ग्राफ को बनाया गया। 20वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में अपने ज्ञान और प्रतिभा से पूरी दुनिया को लोहा मनवाने वाले भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन भी गणित और ईश्वर को एक साथ जोड़ कर देखते थे।

उन्होंने कहा था कि उनके लिए किसी भी गणितीय समीकरण का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक वो ईश्वरीय विचार को व्यक्त न करे। यानी, हर समीकरण को वो ईश्वर से जोड़ कर देखते थे और फिर आगे बढ़ते थे। जो नास्तिक हैं और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए भी एक तरह से कहा जा सकता है कि गणित जो है, वो इस ब्रह्मांड की भाषा है। किसी भी चीज को गणितीय समीकरण के रूप में डिराइव किया जा सकता है।

श्रीनिवास रामानुजन किसी भी फिजिकल या मेटा-फिजिकल चीज को गणितीय समीकरणों के रूप में देखा करते थे। इसीलिए, उन्होंने ऐसे-ऐसे समीकरण बनाए, जो सभी के पल्ले भी नहीं पड़ती थी और उन्हें समझने के लिए आज भी लगातार रिसर्च हो ही रहे हैं। इसी तरह आप स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड ओइलर का उदाहरण भी ले सकते हैं। यहाँ ये समझने की ज़रूरत है कि जितने भी ईश्वरीय रूप हैं, उनका मूल प्रकृति ही है।

भारत, जिसने हमेशा गणित को ईश्वर को प्राप्त करने का माध्यम माना
भारत में तो हमेशा से प्रकृति की पूजा होती आई है। यहाँ वैदिक काल से ही ये चला आ रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति के साथ ही शुरुआत की जाती है। तो, हम कह सकते हैं कि गणित एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा एक नास्तिक भी ईश्वर की पूजा कर सकता है। इसी मामले में हम हमेशा से सभ्यताओं से आगे रहे हैं। हमने गणित और प्रकृति के संबंधों को समझा है और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बनाया है।

पश्चिमी सभ्यता की सोच हमेशा से ‘बिजनेस ड्रिवेन’ रही है, लीनियर रही है। हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम अनिश्चितताओं के साथ खुद का तालमेल बिठाने में हमेशा से अभ्यस्त रहे हैं। यही कारण है कि हम शून्य (0) और अनंत (∞) के साथ तालमेल बिठाते आए हैं। हमने ईश्वर और मनुष्य के अंतर को इस रूप में देखा है कि जहाँ ईश्वर अनंत है, वहीं मनुष्य अनंत बार जन्मता-मरता है। और ये क्रम, ये सायकल, चलता ही चला जाता है।

भारत में हमेशा से शून्य (0) और अनंत (∞) की चर्चा होती आई है और इन दोनों के माध्यम से हर चीज को समझने की कोशिश होती आई है। पूरी दुनिया में आज भी एक हिस्सा है, जो अपने मजहब के आधार पर दुनिया को गोल मानता है। लेकिन, हम कभी इस बात पर आश्चर्यचकित नहीं रहे कि दुनिया गोल है। क्यों? क्योंकि हमें ये बातें आदिकाल से मालूम थी। ये गणित को लेकर हमारी समझ का ही कमाल था।

हालाँकि, पश्चिमी सभ्यता के लिए ये काफी बड़ा शॉक बन कर आया था कि अरे, पृथ्वी गोल है? आज भी ‘वर्ल्ड इज फ्लैट’ कर के एक संस्था है, जो इन बातों को नकारती है। तो भले ही ये पश्चिमी जगत के लिए एक खोज था, प्राचीन भारत के लिए एक ऐसी चीज थी, जो उनकी समझ में पहले से समाई हुई थी। आप भारत की प्राचीन संरचनाओं को ही ले लीजिए, आपको पता चलेगा कि हम शुरू से ही ज्योमेट्री और सीमेट्रीसिटी को लेकर अच्छी समझ रखते हैं।

हजारों उदाहरण हैं लेकिन गुजरात स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर को हम यहाँ देख सकते हैं। साल में दो बार ऐसा होता है, जब पृथ्वी की भूमध्य रेखा से सूर्य के केंद्र का आमना-सामना होता है। इसे Equinox कहते हैं। 20 मार्च और 23 सितम्बर के आसपास हर साल यह होता है। सीधे शब्दों में कहें तो यही वो मौका होता है जब सूर्य का केंद्र सीधा भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। जब Equinox के दिन सूर्योदय होता था तो सूर्य की किरणें सबसे पहले यहाँ सूर्य की प्रतिमा के सिर पर स्थित हीरे के ऊपर पड़ती थी। इसके बाद पूरा मंदिर स्वर्ण प्रकाश से नहा जाता था।

सीमेट्रीसिटी हमारी पुरानी संरचनाओं का एक अहम भाग रहा है। क्यों? क्योंकि एक ऐसा ही समभाव, एक ऐसी ही सीमेट्रीसिटी आपको प्रकृति हर जगह दिखाती है। ये प्रकृति की एक खासियत है। इसीलिए, प्राचीन भारत की हर संरचनाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था, परफेक्शन के साथ। हम प्रकृति के साथ कितने सहज थे और कितने अच्छे तरीके से उसे समझते थे, उसका ये एक अहम प्रमाण है।

गणित और उसके समीकरणों पर आधारित रहा है हमारा आध्यात्मिक इतिहास
हमारी जो ‘Thought Process’ थी, यानी हमारी जो सोच-विचार की प्रक्रिया थी, हमारा जो दर्शन था, वो हमेशा से गणित पर आधारित रहा है। कहा जाता है कि गणित ‘प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy)’ का ही एक भाग है। यहाँ तक कि अध्यात्म में भी हम गणित का इस्तेमाल करते थे। दुनिया की कई सभ्यताओं में 16वीं शताब्दी से पहले भी एक से बढ़ कर एक गणितज्ञ हुए हैं, जो मेटा-फिजिक्स में भी पारंगत रहे हैं।

भारत में 7वीं शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त हुए थे, जिन्होंने गणित और खगोलीय ज्ञान से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने इस पर पुस्तकें लिख कर शून्य (0) की गणना की प्रक्रियाएँ समझाईं। उनके सारे टेक्स्ट अंडाकार, या दीर्घवृत्तीय रूप में हैं। उस समय संस्कृत में ऐसा ही किया जाता है। यानी, हमारी भाषा और उसका साहित्य भी गणित की समझ के हिसाब से लिखे जाते थे। खगोलीय विज्ञान भी प्लेनेट मोशन का कैलकुलेशन है।

गैलीलियो ने भी इसकी गणना की थी। हालाँकि, खगोलीय विज्ञान को व्यक्ति के जीवन के साथ कैसे जोड़ा जाता है या फिर इसका किसी के जन्म-मरण पर क्या प्रभाव है – इस पर बहस हो सकती है। लेकिन, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इन सबका आधार गणित ही रहा है। किसी भी सिद्धांत को साबित करने के लिए ‘causality’ या कारण स्पष्ट होना चाहिए। कोई भी चीज क्यों और कैसे हो रही, उसे गणितीय ढंग से साबित किया जा सकता है।

आप कह सकते हैं कि महान ब्रिटिश वैज्ञानिक न्यूटन से पहले ‘नेचुरल फिलॉसोफी’ और विज्ञान एक-दूसरे के साथ ही चलते थे लेकिन उसके बाद वैज्ञानिकों ने इन दोनों को अलग-अलग रूप में लेना शुरू किया और विज्ञान एक अलग ब्रांच बन कर उभरा। इसीलिए, प्राचीन भारतवर्ष में जो गणितज्ञ रहे हैं, वो ऋषि भी रहे हैं। क्योंकि वो गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे। वो प्रकृति का अध्ययन करते थे, इसीलिए गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे।

भारत में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने हमेशा से गणित और ईश्वर को साथ में देखा। यहाँ आपको एक काफी रोचक चीज भी बताना चाहेंगे। केरल में 14-16वीं शताब्दी में ही ‘केरला स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी’ (केरलीय गणित समुदाय) का संचालन होता था, जिसकी स्थापना ‘संगमग्राम के माधव’ ने की थी। उनका त्रिकोणमिति, बीजगणित और ज्यामिति के अध्ययन में अहम योगदान था।

उन्होंने ही दुनिया में सबसे पहले π (Pi) की गणना ट्रिगोनोमेट्री के रूप में दी थी। केरल के इस गणितीय समुदाय ने एक के बाद एक आगे बढ़ कर कई समीकरण दिए, जिनका काफी बाद में अध्ययन हुआ और दुनिया भर में लोकप्रिय हुए। यानी, हमारी प्राचीन सभ्यता गणित को लेकर निश्चितता (समीकरण और डेरिवेशन) और ईश्वर को लेकर अनिश्चितता, इन दोनों के साथ ही तारतम्य बिठाने में काफी कुशल हुआ करते थे।
इसी तरह ‘Metaphysics’ दर्शन की वह शाखा है जो किसी ज्ञान की शाखा के वास्तविकता (Reality) का अध्ययन करती है। भारतीय सभ्यता में ‘Personification’ का एक ट्रेंड रहा है, जैसे उन्होंने नदियों, पहाड़ों और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को जहाँ एक व्यक्ति के रूप में देखा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने गणित के माध्यम से ईश्वर को डिराइव करने की चेष्टा भी जारी रखी। आज जब गणितीय समीकरणों से माँ दुर्गा की तस्वीर बनाना संभव है, तो ऐसी चीजों को विकसित करने में भारत का बड़ा योगदान है।



शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

नवरात्रि पीछे आध्यात्मिक वैज्ञानिक और शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष



नवरात्र की आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता ”
संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण है।
नौ रात्रियों समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने से यह शब्द पुलिंग रूप ‘ नवरात्र ‘ कहना उचित है।
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं।
उनमें मार्च व सितंबर माह मे पड़ने वाली संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है।
दिन और रात के तापमान मे अंतर के कारण, ऋतु संधियों में प्रायः शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं,
वास्तव मे, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है।
आयुर्वेद के अनुसार इस बदलाव से जहां शरीर मे वात, पित्त, कफ मे दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण मे रोगाणु … जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं।
सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है।
नवरात्र के विशेष काल मे देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन, तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं।
नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संबंध इन नौ से सीधा जुड़ा है…
– हमारे शरीर में9 इंद्रियाँ हैं –
आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, वाक्, मन, बुद्धि, आत्मा।
– नौ ग्रह हैं जो हमारे सभी शुभ अशुभ के कारक होते हैं–
बुध, शुक्र, चंद्र, बृहस्पति, सूर्य, मंगल, केतु, शनि, राहु।
– नौ उपनिषद हैं –
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मूंडक, मांडूक्य, एतरेय, तैतिरीय, श्वेताश्वतर।
– नवदुर्गा यानी9 देवियाँ हैं –
शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुशमांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धरात्री।
शरीर और आत्मा के सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है।
इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि,
साफ सुथरे शरीर मे शुध्द बुद्धि,
उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म,
कर्मों से सच्चरित्रता और
क्रमश: मन शुध्द होता है।
स्वच्छ मन मंदिर मे ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्र मे निम्न आहार को अधिक महत्व दिया गया है,
जिसका सीधा सीधा संबंध हमारे स्वास्थ और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बड़ाने के लिए ही है–
1. कुट्टू – शैल पुत्री
2. दूध दही– ब्रह्म चारिणी
3. चौलाई– चंद्रघंटा
4. पेठा– कूष्माण्डा
5. श्यामक चावल – स्कन्दमाता
6. हरी तरकारी– कात्यायनी
7. काली मिर्च व तुलसी– कालरात्रि
8. साबूदाना– महागौरी
9. आंवला– सिध्दीदात्री !
अब जानते हैं कि नवरात्र को ‘ नवरात्र ‘ ही क्यूँ कहते हैं?
क्योंकि‘ रात्रि‘ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है।
भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है।
यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात मे ही मनाने की परंपरा है।
यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता, जैसे शिव दिन आदि।
दिन मे आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी… किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है।
इसके पीछे ध्वनि प्रदूषण के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन मे सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।
रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है।
कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।
मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य मे समझने और समझाने का प्रयत्न किया।
रात्रि मे प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है।
हमारे ऋषि मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।
इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर मंत्र जप की विचार तरंगों में भी दिन के समय अवरोध रहता है,
इसीलिए ऋषि मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है।
इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुए, साधक गण रात्रि मे संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं,
उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य पूर्ण होती है।
सामान्यजन , दिन मे ही पूजा पाठ निपटा लेते हैं,
जबकि एक साधक, इस अवसर की महत्ता जानता है और ध्यान, मंत्र जप आदि के लिए रात्रि का समय ही चुनता है।
नवरात्र से नवग्रहों का संबंध भी है…
चैत्र नवरात्र प्राय: ‘ मीन मेष ‘ की संक्रांति पर आती है।
नवग्रह में कोई भी ग्रह अनिष्ट फल देने जा रहा हो जो शक्ति उपासना करने से विशेष लाभ मिलती है।
– सूर्य ग्रह के कमजोर रहने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए शैलपुत्री की उपासना से लाभ मिलती है।
– चंद्रमा के दुष्प्रभाव को दूर करने के कुष्मांडा देवी की विधि विधान से नवरात्रि में साधना करें।
– मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिए स्कंदमाता,
– बुध ग्रह की शांति तथा अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिए कात्यायनी देवी,
– गुरु ग्रह के अनुकूलता के लिए महागौरी,
– शुक्र के शुभत्व के लिए सिद्धिदात्रि तथा
– शनि के दुष्प्रभाव को दूर कर शुभता पाने के लिए कालरात्रि के उपासना सार्थक रहती है।
– राहु की शुभता प्राप्त करने के लिए ब्रह्माचारिणी की उपासना करनी चाहिए।
– केतु के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लिए चंद्रघंटा की साधना अनुकूलता देती है।
नवरात्र वर्ष मे चार बार आते है, जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है।
चैत्र नवरात्र से ही विक्रम संवत का आरंभ होता है…
इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है।
इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है,
इसमें माँ की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है।
इस पर्व मे तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों
श्री शैलपुत्री,
श्री ब्रह्मचारिणी,
श्री चंद्रघंटा,
श्री कुष्मांडा,
श्री स्कंदमाता,
श्री कात्यायनी,
श्री कालरात्रि,
श्री महागौरी, और
श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है।
” प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी !
तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम् !
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च!
सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्!
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः ! ”
इनकी आराधना करने से कई प्रकार की गुप्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
इन दिनों किए जाने वाले टोने टोटके भी बहुत प्रभावशाली होते हैं, जिनके माध्यम से कोई भी मनोकामना पूर्ति करने का प्रयास करता है पर यदि उसका शुभ भाव नहीं है तो यह प्रयास फलित नहीं हो सकता।
किन्तु राह पर पड़े टोने टोटकों जैसे अशुभ भाव के लोगों से स्वयं को बचाना भी अति आवश्यक होता है और आज के इस आधुनिक वैश्विक राक्षस से बचने और इनका विनाश करने के लिए ऊर्जा प्राप्त करने और शक्ति को जागरण करने का का यह एक उत्तम और श्रेष्ठ अनुष्ठान है

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।


   


कोई आठ पीढ़ी पहले कच्छ का एक वणजारा राजस्थान से बैल लेकर सौराष्ट्र बेचने गया।
वहाँ उसे एक सौदा करांची का मिल गया तो सिंध चला गया।

चौमासा शुरू हो चुका था,
आँधी तूफान और रण में पानी भर गया तो उसने घूमकर राजस्थान से आने की सोची।
लेकिन रेगिस्तान में डकैती और लूटपाट का खतरा था...
उसने अपनी चौसठ स्वर्णमुद्राएँ वहाँ के एक परिचित माहेश्वरी सेठ के पास रखी,
लिखा पढ़ी की और लौट आया।
किन्हीं कारणों से कभी वापस न जा सका।
मुद्राएं सेठ के पास पड़ी रही, पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता रहा।

1947 में सेठ को पलायन करना पड़ा।
हवा का रुख देख लिया था,
वह खैरथल(अलवर) में शिफ्ट हो गया।
और, आप आश्चर्य करेंगे...
5 पीढ़ी बाद उनके वंशज पूछताछ करते हुए भुज के पास एक घुमक्कड़ डेरे पर गये और गिनकर पूरी 59 मुहरें उनको सौंप दी।
उस समय उल्टा ब्याज लगता था, सो एक पीढ़ी तक धन सहेजने की एक स्वर्णमुद्रा के हिसाब से 5 मुद्राएं काट कर बाकी उन्हें दे दीं!
सेठ के वंशजों ने पूछताछ की।
स्थानीय वरिष्ठ लोगों को साथ रखा। 5 पीढ़ी में वणजारे का कुनबा कितना बढ़ा, सभी सदस्यों का वहीं बँटवारा किया और वापस लौट आए।

वृतांत का एक दुःखद पहलू यह था कि वे सभी अत्यंत गरीब और दीन हीन हो चुके थे,
किन्तु सुखद पहलू यह है कि उसी वणजारा परिवार ने उस धन का सदुपयोग किया और आज वह एक शीर्षस्थ परिवार है,
उनके परिवार में जज, वकील और उच्च ब्यूरोक्रेट हैं,
उन्होंने ही यह घटना सुनाई।
नाम लेने की जरूरत नहीं है!!

लगभग 300 वर्ष पहले समृद्धि का पैमाना गाय हुआ करती थी...
एक जोड़ी बैल, छह तोला सोने में आती थी, आप कल्पना कर सकते हैं।
बैल, घोड़ा, ऊँट के मूल्य में बहुत कम अंतर था।
तब सुथार एक गिन्नी में बैलगाड़ी बनाते थे।
सबकुछ शिल्प आधारित था।
कुम्हार, चर्मकार, नापित, घसियारा, पानी लाने वाला, पशु चराने वाला, पशुओं के उपकरण, बधियाकरण, प्रशिक्षण जैसे अनेक कार्य थे।

उदाहरण के लिए एक कुम्हार को लगभग 100 घरों के लिए वर्ष पर्यंत बर्तन सप्लाई के बदले वर्ष में दो बार एक-एक चाँदी का सिक्का मिलता था – यानि 200 तोला चाँदी प्रतिवर्ष... साथ ही अन्न फ्री, सुरक्षा फ्री, मिट्टी पानी अपनी मर्जी से और अपने धंधे का स्वामी।

सोना, चाँदी, घी और अन्न से विनिमय होता था।
सौ सेर तिल्ली के तेल के बदले 50 सेर घी।
फल फूल तो लगभग मुफ्त थे,
सूखे मेवे, मसाले, नारियल और पंसारी का सामान हाट में बिकता था।

विगत 200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।
कहीं कहीं अब भी उसके अवशेष विद्यमान हैं,
धर्मपाल साहित्य का अध्ययन कर वस्तुस्थिति जान सकते हैं।
मेरी जानकारी का स्रोत भी धर्मपाल जी का साहित्य ही है,
यह दस खण्डों में प्रकाशित है,
आप पढ़ सकते हैं।

गड़बड़ हुई अंग्रेजों के हस्तक्षेप से, उदाहरण के लिए नील की जबरन खेती से अन्न का कृत्रिम अभाव या ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट देने अथवा विदर्भ के इस्पात कारखानों को बंद करने के एवज में घर बैठे धन देना – जैसी क्रूर कुटिल बातों से यह सारा अर्थतन्त्र जो अन्योन्याश्रित और सुदृढ़ था, नष्ट हो गया।
भूखमरी, विद्वेष, रोजगार का संकट और जातीय विभेद भी बढ़ा...
और, भारतीय समाज अत्यंत दीन हीन स्थिति को पहुँच गया।

प्रेमचंद के भारत में जिस अभागे भारत का वर्णन है, वह मरणासन्न भारतीय अर्थव्यवस्था का शोकगीत है – बिल्कुल लुटा पिटा, भूखा नंगा! हालाँकि नेहरू परिवार तब भी सोने के बटन से सज्जित अचकन पहन कर अधिवेशन से एक दिन पहले होने वाले जुलूस में बग्घी पर सवार होकर ही शामिल होता था!!

भूखा नँगा भारत हमें मिला 1947 में...
तबतक सबकुछ तबाह हो गया था केवल ऊपरी वर्ग में हुंडी और सेहनाणी परम्परा विद्यमान थी.... शिल्प आधारित समस्त औद्योगिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी... जिसमें वामपंथी तिकड़म की फसल की अपार सम्भावना थी और यही छल हम आज तक भुगत रहे हैं।
आधुनिक तकनीक के सहारे हिन्दू अर्थतन्त्र की पुनर्स्थापना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

अभी त्यौहार शुरू होने वाले हैं।
पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है।
शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।
एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे,
ढूँढ़िये कि आज वे किस स्थिति में हैं?
और, धनतेरस तक तनिष्क को कोई रियायत नहीं।
इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए!
हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

विश्व सरकार के सामने बाधाएं और उनका विनाश, जिसने आपका भी विनाश निश्चित है


   

   
 दुनिया कितनी बदल रही है और अगले 5 सालो में कितनी और बदलेगी?
 2020 में हमारी मन:स्थिति बदलने जा रही है और हम को विश्व ब्यवस्था का अंग बनाने की तैयारी चल रही है अब एक ही विश्व सरकार होगी  और आपको स्वयं इसी में ही सभी समस्याओं का समाधान नजर आएगा और आप ही विश्व सरकार बनाने के पैरोंकार बनेंगे ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई है नीचे दिया हुआ एक भाई का लेख आपको भेज रहा हूं जिसमें सुखद भविष्य की एक संकल्पना जो इसी स्थिति की तरफ ले जा रहा है
 यह भाई साहब तो केवल बोल ही रहे हैं एक  लखनऊ के गांधी साहब बड़ी नाम है वह संविधान भी बना दिए है विश्व के करीब 100 देशों के प्रतिनिधियों का उसमें आगमन भी हुआ था जो विश्व सरकार की संकल्पना को साकार करने का  डिमांड भी रखा गया है  आप बिना हथियार उठाए भी युद्ध जीत सकते हैं यदि आप दुश्मन थी चाल को समझने की शक्ति है इसलिए एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान whatsapp संपर्क 9336919081 या
 7984113987 केवल कॉल
बिंदु से बिंदु जोड़ना बहुत कठिन काम है, फिर भी आप कोशिश कर सकते है।
प्रश्न हैं :
1 - #रॉकफेलर और #रॉथचाइल्ड परिवार का व्यापार क्या है?
2 - दुनिया के 5 बड़े देशो की जनसंख्या क्या है, ये कितने उत्पाद बनाते हैं, कितने कारखाने इन देशों में हैं?
3 - ब्रिटेन कितना बड़ा देश है, वह कितने उद्योग चलाता है और कितने समान एक्सपोर्ट करता है?
4 - पाउंड की कीमत इतनी क्यों?
5 - इस्राइल क्या करता है कितना कमाता है कितना उगाता है क्या इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट करता है?
6 - दुनिया मे कितने अमेरिकन डॉलर छापे गए हैं और इसके लिए अमेरिकन सरकार के पास कितना सोना सुरक्षित है?
7 - व्यापार और Mass Manipulation and Mind Control का क्या संबंध है, दुनिया मे ताकतवर देश और परिवार इसका उपयोग कैसे करते हैं?
8 - टेक और रिसर्च से पैसा कौन और कैसे कमा रहा है, क्या जो रिसर्च दुनिया मे बेंची जा रही हैं वे हमारे कितने हित में हैं, हित में है या नहीं यह कौन तय करता है?
9 - प्लास्टिक, सिंथेटिक और कैमिकल की रिसर्च से अरबो कमाने वाले देश क्या आज इससे होने वाले नुकसान के लिए जवाबदेह हैं?
10 - दुनिया मे कब तक पेपर मनी व्यवस्था खत्म हो सकती है, और यह क्यों होगी?
11 - कोरोना और पर्यावरण परिवर्तन के प्रभाव से सस्टेनेबल लाइफ स्टाइल, आर्गेनिक खेती और इम्युनिटी बूस्टर के क्षेत्र के बढ़ने से कौन कौन से उद्योग बढेंगे और कौन से तबाह होंगे?
#सोचिये
दुनिया कितनी बदल रही है और अगले 5 सालो में कितनी और बदलेगी?

2013 से मैं बोल रहा हूँ कि समय दक्षिण पन्थ का है और इंटरनेट ही सतयुग का वाहक है।
2016 से जिओ ने सतयुग की आवक को सुनिश्चित कर दिया अब समय है 5G और AI का बस 5G के आते ही ऑटोमोशन, मनी ट्रेल, लोकेशन और ऑनलाइन ट्रैकिंग और ज्यादा व्यवस्थित हो जाएगी।
अगले 10 सालो में अपराध नगण्य होंगे और जो होंगे वे 100% पकड़े जाएंगे।
#इंटरनेट जनता का मन्तव्य तुरन्त सरकार तक पहुंचा रहा है।
सरकार को निर्णय बदलने मजबूर कर रहा है मतलब अब वास्तविक लोकतंत्र भी इंटरनेट का आश्रित है।
20 वी सदी में राजशाही खत्म हुई और छोटी रियासतों को जोड़कर बड़े राष्ट्र बने, अब 21वी सदी में सारे राष्ट्रों को जोड़कर एक ग्लोबल सरकार बनाने की जरूरत आन पड़ी है।
वैश्विक महामारी, परमाणु अस्त्र, धर्म आधारित राष्ट्र और आर्थिक असमानता की समस्याओं का एक मात्र हल अब वैश्विक सरकार है।
सारे राष्ट्र बिल्कुल वैसे ही काम करे जैसे अमेरिका के 50 राज्य काम करते हैं, ऑटोनोमस राज्यो की तरह सबके अपने कानून हो पर मुद्रा और सुरक्षा एक सी हो।
#UNO को दिया जाने वाला फण्ड टैक्स से आये और वैसे ही बटे जैसे GST राज्यो और राष्ट्रीय सरकार के बीच बंटता है।
इससे वर्तमान राष्ट्रों के रक्षा बजट बिल्कुल वैसे ही खत्म हो जाएंगे जैसे भारतीय राज्यो में यह शून्य हैं।
व्यापारिक चुंगी/टैक्स/लेवी/वैट खत्म होंगे, पासपोर्ट खत्म होंगे, बैंकिंग व्यवस्था वैश्विक होगी तो कालाधन और आतंकी फंडिंग खत्म होगी।
ब्लड डायमंड, ब्लडी गोल्ड, मादक द्रव्यों का व्यवसाय, अपराधियो का पलायन खत्म होगा।
अगर यह हुआ तो विश्व मे क्या कोई समस्या बचेगी?
सनातन का #वसुधैव_कुटुम्बकम यही तो है जिसे Narendra Modi प्रोमोट कर रहे हैं।
ईश्वर चाहेगा तो अगली पीढ़ी #विश्वपति या वैश्विक मंत्री के लिए वोट करेगी।
अगर यह नहीं हुआ तो तय मानिये दुनिया 2060 नहीं देख पाएगी।
संघर्षो के मूल में हमेशा बंटवारा, आत्म केंद्रित व्यवस्था और अहम होता है, अगर हम संयुक्त, सम्मलित और हम की विचारधारा पर आ जाएं तो पाकिस्तान हो या चीन वह हमारे लिए दिल्ली, यू पी या छत्तीसगढ़ हो जाएगा और राष्ट्रों के बीच की दुश्मनी सुखमय जीवन की प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगी।
बस यही तो चाहिए विश्व को

 


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

विश्व की जनता को UN के माध्यम से कैसे उल्लू बनाया जाता है

 

दुनियाकी सरकारें और उनकी सासु मां युएन, जगत की जनता को कैसे उल्लु बना रही है उसका एक सटिक उदाहरण है ।
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Mukesh Singh
93,328 किलोग्राम कोविड 19 की टेस्टिंग किट का आयात भारत ने 2018 में किया वर्ल्ड बैंक की लिंक नीचे है।
जब कोरोना 2020 में भारत मे फैला जैसा हम लोगो को पता है तब भारत को एडवांस में पता था 2 साल पहले की भारत मे कोरोना आने वाला है।
जिसे नोवल कोविड 19 का नाम WHO ने 2020 में दिया और कहा यह नया वायरस है तब यह कमाल की बात है कि इस कि किट न जाने कितने साल पहले बनानी शुरू कर दी जाती है और बीमारी के आने से 2साल पहले भारत उसे खरीद भी लेता है ।
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मेरी बातें कुछ लोगो को अच्छी नही लगती परन्तु यह बाते उनके भी हित मे है अभी भी समय है जाग जाओ।
मन्दबुद्धि को समझया जा सकता है।
बन्दबुद्धि को नही।
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जिस बीमारी के बारे में WHO को पता 2020 में चलता है उसकी टेस्टिंग किट भारत को 2018 में वर्ल्ड बैंक द्वारा दो चार किलोग्राम नही बल्कि 93,328
लगभग 1लाख किलोग्राम बेच दी जाती है और भारत वर्ल्ड बैंक से कर्ज़ा लेकर खरीद भी लेता है क्या यह महज इत्तफाक है या कोई सोची समझी साजिश जरा सोचिए क्यों चुपचाप WHO ने लगभग सभी अपनी साईड से नोवल कोविड 19 के आगे से नोवल गायब कर दिया है।
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आप नीचे दिये गये वर्ल्ड बैंक की लिंक में देखेगे वर्ल्ड बैंक ने 2018 में ही दुनिया को करोड़ो किलोग्राम टेस्ट किट बेच दिए थे जो बीमारी 2019 - 2020 में अस्तित्व में आती है।
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जरा सोचिए मेरा मकसद सिर्फ आप को डर से छुटकारा दिलाने का है। जैसे जैसे देश में टेस्ट किट आती रहेगी बीमारी बडती हुई दिखाई देगी।
इसका ताजा उदाहरण पिछले 2 महीने है ।
जरा सोचिए-------
https://wits.worldbank.org/trade/comtrade/en/country/ALL/year/2018/tradeflow/Exports/partner/WLD/nomen/h5/product/300215?fbclid=IwAR3HGmi6RGpxNoxgncXRwWj0Hvq2N7eDfUbuZFxJsuC4tYSoXUSNxRZUW6A





बुधवार, 30 सितंबर 2020

गलती कोई भी अंग करे पर कान ही क्यों पकड़ा जाता है

गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं
गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ग्रंथों में रहन-सहन के नियम और तरीकों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए ग्रंथों में दाहिने कान को अधिक पवित्र माना जाता है।
1. मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।
2. गोभिल गृह्यसूत्र के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु, चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है।
गोभिल गृह्यसूत्र का श्लोक...
मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।
एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।
3. पराशर स्मृति के बारहवें अध्याय के 19 वें श्लोक में बताया गया है कि के छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।
पराशर स्मृति का श्लोक...
क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।
एक नए दृष्टिकोण से समझें ............
कान पकड़ना का अर्थ है – बुरे काम को न करने की प्रतिज्ञा करना।
ऐसा भी कहा जाता है कि कान के मूल में जो नाड़ियाँ हैं उनका मूत्राशय और गुदा से संबंध है। दाहिने कान की नाड़ी मूत्राशय के लिए गई है और बाएँ कान की नाड़ी गुदा से संबंध है। मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को लपेटने से उन नाड़ियों पर दबाव पड़ता है फल स्वरूप मूत्राशय की नाड़ियाँ भी कड़ी रहती हैं। तदनुसार, बहुमूत्र, मधुमेह, प्रमेह आदि रोग नहीं होते। इसी प्रकार दाहिने कान की नाड़ियाँ दबने से काँच, भगन्दर, बवासीर आदि गुदा के रोग नहीं होते। कई सज्जन शौच जाते समय दोनों कानों पर यज्ञोपवीत चढ़ाते हैं उनका तर्क यह है कि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है इसलिए दोनों कानों पर उपवीत को बढ़ाना चाहिए। मैथुन के समय कान पर भले ही चढ़ाया जाय पर अशुद्ध अंगों से ऊंचा अवश्य कर लेना चाहिये।

क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तेच्छिप्टे तथान्नृते।
पतितानाँ चसम्भायें दक्षिणं श्रवण स्पृष्येत।
पाराशर स्मृति 7। 38

अर्थात्- छींकने पर, थूकने पर, दाँतों से किसी अंग के उच्छि


ष्ट हो जाने पर झूठ बोलने और पाठकों के साथ संभाषण करने पर अपने दाहिने कान का स्पर्श करें।

छोटी-मोटी अशुद्धताएं कान का स्पर्श करने मात्र से दूर हो जाती हैं। कान को छूने पकड़ने या दबाने से भूल सुधारने का प्रायश्चित होने का सम्बन्ध है। बालक के कान पकड़ने का अध्यापकों का यही प्रयोजन होता है कि उसे देवत्व का और मनोबल का विकास हो। कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाने से भी सूक्ष्म रूप से वही प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए भी मलमूत्र के समय उसके कान पर चढ़ाने का विधान है।
आदित्यावसवो रुद्रा वायुरग्निश्व धर्मराट्।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं निष्ठन्ति देवताः॥
शंख्यायन-
अग्निरापश्च वेदाश्च सोमः सूर्योऽनिलस्तथा।
सर्वे देवास्तु विप्रस्य कर्णे तिष्ठन्ति दक्षिणें॥
आचार मयूख-
प्रभासादीनि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे वसन्ति मुनिरब्रवीत॥
परराशरः
उपरोक्त तीन श्लोकों में दाहिने कान का पवित्रता का वर्णन है। शांख्यायन का मत है कि आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता विप्र-के दाहिने कान में सदा रहते हैं। आचार्य मयूखकार का कथन है अग्नि, जल, वेद, सोम, सूर्य, अनिल तथा सब देवता ब्राह्मण के दाहिने कान में निवास करते हैं। पराशर का मत है कि गंगा आदि सरिताएं तीर्थ गण दाहिने कान में निवास करते हैं। इसलिए ऐसे पवित्र अंग पर मलमूत्र त्यागते समय यज्ञोपवीत को चढ़ा लेते हैं जिससे वह अपवित्र न होने पावे।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

रिफाइंड ऑयल को.विड से भी खतरनाक और लाखो लोगों की मौत का जिम्मेदार

 




जीवन जीने की संपूर्णआधार गांव के उस परंपरागत उद्योग धंधे जो आपस में सहजीवन के साथ सहअस्तित्व की व्यवस्था  को पुन: स्थापित किए बिना हमारा जीवन अधूरा हो जाएगा इसलिए अपनी परंपरागत श्रेष्ठ सर्वोत्तम जाति व्यवस्था को पुनः संयोजन करिए और अपने तेली घांची समाज को निवेदन कर उसके कोल्हू घानी को चलवाईए अन्यथा यह अदाढ़ी और कच्ची घाणी का तेल व कंपनी और सरकार आपका जीवन लेने लिए पर्याप्त है सबसे ज्यादा मौतें देने वाला भारत में कोई है l
तो वह है...
*रिफाईनड तेल*
केरल आयुर्वेदिक युनिवर्सिटी आंफ रिसर्च केन्द्र के अनुसार, हर वर्ष 20 लाख लोगों की मौतों का कारण बन गया है... *रिफाईनड तेल
रिफाईनड तेल से *DNA डैमेज, RNA नष्ट, , हार्ट अटैक, हार्ट ब्लॉकेज, ब्रेन डैमेज, लकवा शुगर(डाईबिटीज), bp नपुंसकता *कैंसर* *हड्डियों का कमजोर हो जाना, जोड़ों में दर्द,कमर दर्द, किडनी डैमेज, लिवर खराब, कोलेस्ट्रोल, आंखों रोशनी कम होना, प्रदर रोग, बांझपन, पाईलस, स्केन त्वचा रोग आदि!. एक हजार रोगों का प्रमुख कारण है।*
*रिफाईनड तेल बनता कैसे हैं।*
बीजों का छिलके सहित तेल निकाला जाता है, इस विधि में जो भी Impurities तेल में आती है, उन्हें साफ करने वह तेल को स्वाद गंध व कलर रहित करने के लिए रिफाइंड किया जाता है
*वाशिंग*-- वाशिंग करने के लिए पानी, नमक, कास्टिक सोडा, गंधक, पोटेशियम, तेजाब व अन्य खतरनाक एसिड इस्तेमाल किए जाते हैं, ताकि Impurities इस बाहर हो जाएं |इस प्रक्रिया मैं तारकोल की तरह गाडा वेस्टेज (Wastage} निकलता है जो कि टायर बनाने में काम आता है। यह तेल ऐसिड के कारण जहर बन गया है।
*Neutralisation*--तेल के साथ कास्टिक या साबुन को मिक्स करके 180°F पर गर्म किया जाता है। जिससे इस तेल के सभी पोस्टीक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
*Bleaching*--इस विधी में P. O. P{प्लास्टर ऑफ पेरिस} /पी. ओ. पी. यह मकान बनाने मे काम ली जाती है/ का उपयोग करके तेल का कलर और मिलाये गये कैमिकल को 130 °F पर गर्म करके साफ किया जाता है!
*Hydrogenation*-- एक टैंक में तेल के साथ निकोल और हाइड्रोजन को मिक्स करके हिलाया जाता है। इन सारी प्रक्रियाओं में तेल को 7-8 बार गर्म व ठंडा किया जाता है, जिससे तेल में पांलीमर्स बन जाते हैं, उससे पाचन प्रणाली को खतरा होता है और भोजन न पचने से सारी बिमारियां होती हैं।
*निकेल*एक प्रकार का Catalyst metal (लोहा) होता है जो हमारे शरीर के Respiratory system, Liver, skin, Metabolism, DNA, RNA को भंयकर नुकसान पहुंचाता है।

रिफाईनड तेल के सभी तत्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसिड (कैमिकल) मिल जाने से यह भीतरी अंगों को नुकसान पहुंचाता है।

आप गंदी नाली का पानी पी लें, उससे कुछ भी नहीं होगा क्योंकि हमारे शरीर में प्रति रोधक क्षमता उन बैक्टीरिया को लडकर नष्ट कर देता है, लेकिन रिफाईनड तेल खाने वाला व्यक्ति की अकाल मृत्यु होना निश्चित है!

*दिलथाम के अब पढे*

*हमारा शरीर करोड़ों Cells (कोशिकाओं) से मिलकर बना है, शरीर को जीवित रखने के लिए पुराने Cells नऐ Cells से Replace होते रहते हैं नये Cells (कोशिकाओं) बनाने के लिए शरीर खुन का उपयोग करता है, यदि हम रिफाईनड तेल का उपयोग करते हैं तो खुन मे Toxins की मात्रा बढ़ जाती है व शरीर को नए सेल बनाने में अवरोध आता है, तो कई प्रकार की बीमारियां जैसे* -— कैंसर *Cancer*, *Diabetes* मधुमेह, *Heart Attack* हार्ट अटैक, *Kidney Problems* किडनी खराब,
*Allergies, Stomach Ulcer, Premature Aging, Impotence, Arthritis, Depression, Blood pressure आदि हजारों बिमारियां होगी।*
रिफाईनड तेल बनाने की प्रक्रिया से तेल बहुत ही मंहगा हो जाता है, तो इसमे पांम आंयल मिक्स किया जाता है! (पांम आंयल सवमं एक धीमी मौत है)

प्रत्येक तेल कंपनियों को 40 %
खाद्य तेलों में पांम आंयल मिलाना अनिवार्य है, अन्यथा लाईसेंस रद्द कर दिया जाएगा!
इससे अमेरिका को बहुत फायदा हुआ, पांम के कारण लोग अधिक बिमार पडने लगे, हार्ट अटैक की संभावना 99 %बढ गई, तो दवाईयां भी अमेरिका की आने लगी, हार्ट मे लगने वाली स्प्रिंग(पेन की स्प्रिंग से भी छोटा सा छल्ला) , दो लाख रुपये की बिकती हैं,
यानी कि अमेरिका के दोनो हाथों में लड्डू, पांम भी उनका और दवाईयां भी उनकी!
*अब तो कई नामी कंपनियों ने पांम से भी सस्ता,, गाड़ी में से निकाला काला आंयल* *(जिसे आप गाडी सर्विस करने वाले के छोड आते हैं)*
*वह भी रिफाईनड कर के खाद्य तेल में मिलाया जाता है, अनेक बार अखबारों में पकड़े जाने की खबरे आती है।*
सोयाबीन एक दलहन हैं, तिलहन नही...
दलहन में... मुंग, मोठ, चना, सोयाबीन, व सभी प्रकार की दालें आदि होती है।
तिलहन में... तिल, सरसों, मुमफली, नारियल, बादाम,ओलीव आयल, आदि आती है।
अतः सोयाबीन तेल , पेवर पांम आंयल ही होता है। पांम आंयल को रिफाईनड बनाने के लिए सोयाबीन का उपयोग किया जाता है।
सोयाबीन की एक खासियत होती है कि यह,
प्रत्येक तरल पदार्थों को सोख लेता है,
पांम आंयल एक दम काला और गाढ़ा होता है,
उसमे साबुत सोयाबीन डाल दिया जाता है जिससे सोयाबीन बीज उस पांम आंयल की चिकनाई को सोख लेता है और फिर सोयाबीन की पिसाई होती है, जिससे चिकना पदार्थ तेल तथा आटा अलग अलग हो जाता है, आटा से सोया मंगोडी बनाई जाती है!
आप चाहें तो किसी भी तेल निकालने वाले के सोयाबीन ले जा कर, उससे तेल निकालने के लिए कहे!महनताना वह एक लाख रुपये भी देने पर तेल नही निकालेगा, क्योंकि. सोयाबीन का आटा बनता है, तेल नही!
फॉर्च्यून.. अर्थात.. आप के और आप के परिवार के फ्यूचर का अंत करने वाला.
सफोला... अर्थात.. सांप के बच्चे को सफोला कहते हैं!
*5 वर्ष खाने के बाद शरीर जहरीला
10 वर्ष के बाद.. सफोला (सांप का बच्चा अब सांप बन गया है.
*15 साल बाद.. मृत्यु... यानी कि सफोला अब अजगर बन गया है और वह अब आप को निगल जायगा.!*

*पहले के व्यक्ति 90.. 100 वर्ष की उम्र में मरते थे तो उनको मोक्ष की प्राप्ति होती थी, क्योंकि.उनकी सभी इच्छाए पूर्ण हो जाती थी।*

*और आज... अचानक हार्ट अटैक आया और कुछ ही देर में मर गया....?*
*उसने तो कल के लिए बहुत से सपने देखें है, और अचानक मृत्यु..?*
अधुरी इच्छाओं से मरने के कारण.. प्रेत योनी मे भटकता है।

*राम नही किसी को मारता.... न ही यह राम का काम!*
*अपने आप ही मर जाते हैं.... कर कर खोटे काम!!*
गलत खान पान के कारण, अकाल मृत्यु हो जाती है!

*सकल पदार्थ है जग माही..!*
*कर्म हीन नर पावत नाही..!!*
अच्छी वस्तुओं का भोग,.. कर्म हीन, व आलसी व्यक्ति संसार की श्रेष्ठ वस्तुओं का सेवन नहीं कर सकता!

*तन मन धन और आत्मा की तृप्ति के लिए सिर्फ ओलीव आयल ,राइस ब्रान , कच्ची घाणी का तेल, तिल सरसों, मुमफली, नारियल, बादाम आदि का तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए!* पोस्टीक वर्धक और शरीर को निरोग रखने वाला सिर्फ कच्ची घाणी का निकाला हुआ तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए!
आज कल सभी कम्पनी.. अपने प्रोडक्ट पर कच्ची घाणी का तेल ही लिखती हैं!
वह बिल्कुल झूठ है.. सरासर धोखा है!
कच्ची घाणी का मतलब है कि,, लकड़ी की बनी हुई, औखली और लकडी का ही मुसल होना चाहिए! लोहे का घर्षण नहीं होना चाहिए. इसे कहते हैं.. कच्ची घाणी.
जिसको बैल के द्वारा चलाया जाता हो!
आजकल बैल की जगह मोटर लगा दी गई है!
लेकिन मोटर भी बैल की गती जितनी ही चले!
लोहे की बड़ी बड़ी सपेलर (मशिने) उनका बेलन लाखों की गती से चलता है जिससे तेल के सभी पोस्टीक तत्व नष्ट हो जाते हैं और वे लिखते हैं.. कच्ची घाणी...
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सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...