मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

अनमोल धातुएं के वर्तन गायबअब इसपर जहर का लेप टेफ्लान कोटिंग का षड्यंत्र


 

 ■ टेफलोन कोटिंग या काला जहर ????

टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का इतना प्रचार या दुष्प्रचार हुआ कि आजकल हर घर में ये काली कोटिंग वाले बर्तन होना शान की बात समझी जाती है।
न जाने कितने ही ये टेफलोन कोटिंग वाले बर्तन हमारे घर में आ गये हैं, जैसे कि नॉन स्टिक तपेली (पतीली), तवा, फ्राई पेन आदि....अब इजी टू कुक, इजी टू क्लीन वाली छवि वाले ये बर्तन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए है।
मुझे आज भी दादी नानी वाला ज़माना याद आ जाता है, जब चमकते हुए बर्तन किसी भी घर के स्टेंडर्ड की निशानी माने जाते थे, लेकिन आजकल उनकी जगह इन काले बर्तनों ने ले ली है।
हम सब इन बर्तनों को अपने घर में बहुतायत से उपयोग में ले रहे हैं और शायद कोई बहुत बेहतर विकल्प नहीं मिल जाने तक आगे भी उपयोग करते रहेंगे।
किन्तु इनका उपयोग करते समय हम ये बात भूल जाते हैं कि ये काले बर्तन हमारे शरीर को भी काला करके नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हम में से कई लोग यह बात जानते भी नहीं हैं कि वास्तव में ये बर्तन हमारी बीमारियाँ बढ़ा रहे हैं और इनका प्रयोग करके हम हमारे अपनों को ही तकलीफ दे रहे हैं।
टेफलोन को 20 वी शताब्दी की सबसे बेहतरीन केमिकल खोज में से एक माना गया है, जिसका प्रयोग इंजीनियरिंग के क्षेत्र जैसे कि स्पेस सुइट और पाइप में उर्जा रोधी के रूप में किया जा रहा है, किन्तु यह भी एक बड़ा सच है की ये टेफलोन कोटिंग का काला जहर स्वास्थ्य के लिए बना ही नहीं है और अत्यंत खतरनाक है।
इसके प्रयोग से श्वास की बीमारी, कैंसर, ह्रदय रोग आदि कई गंभीर बिमारियां भी होती देखी जा रही हैं।
यह भी सच है की जब टेफलोन कोटेड बर्तन को अधिक गर्म किया जाता है, तो आसपास के क्षेत्र में रह रहे पालतू पक्षियों की जान जाने का खतरा तुरंत ही काफी बढ़ जाता है।
एक न्यूज के अनुसार कुछ समय पहले एक घर के आसपास के 14 पालतू पक्षी तब मारे गए, जब टेफलोन के बर्तन को पहले से गरम किया गया और तेज आंच पर खाना बनाया गया ये पूरी घटना होने में सिर्फ 15 मिनिट लगे....टेफलोन कोटेड बर्तनों में सिर्फ 5 मिनिट में 700 डिग्री टेम्प्रेचर तक गर्म हो जाने की प्रवृति होती है और इसी दौरान 6 तरह की खतरनाक गैस वातावरण में फैल जाती हैं इनमे से 2 गैस ऐसी होती हैं जो केंसर को भी जन्म देती हैं।
अध्ययन बताते हैं कि टेफलोन को अधिक गर्म करने से पक्षियों के लिए हानिकारक टेफलोन टोक्सिकोसिस बनती है और इंसानों के लिए खतरनाक पोलिमर फ्यूम फीवर की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है टेफलोन कोटिंग से उत्पन्न होने वाले केमिकल के शरीर में जाने से होने वाली बीमारियाँ इस तरह की होती हैं....
1- पुरुष इनफर्टिलिटी - हाल ही में हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई है कि लम्बे समय तक टेफलोन केमिकल के शरीर में जाने से पुरुष इनफर्टिलिटी का खतरा बढ़ जाता है और इससे सम्बंधित कई बीमारियाँ पुरुषों में देखी जा सकती हैं।
थायराइड - हाल ही में एक अमेरिकन एजेंसी द्वारा किया गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि टेफलोन की मात्र लगातार शरीर में जाने से थायराइड ग्रंथि सम्बन्धी समस्याएं हो सकती है।
2- बच्चे को जन्म देने में समस्या - केलिफोर्निया में हुई एक स्टडी में ये पाया गया है कि जिन महिलाओं के शरीर में जल, भोजन या हवा के माध्यम से पी ऍफ़ ओ (टेफलोन) की मात्रा सामान्य से अधिक पाई गई थी, उन्हें बच्चो को जन्म देते समय अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. इसी के साथ उनमे बच्चो को जन्म देने की क्षमता भी अपेक्षाकृत कम हो गई, जिससे सीजेरियन ऑपरेशन करना पड़ा।
3- शारीरिक समस्याएं व अन्य बीमारियाँ - पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा शरीर में पाई जाने वाली महिलाओं के बच्चो पर भी इसका असर जन्मजात शारीरिक विकार या समस्याओं के रूप में देखा गया है ।
4- लीवर केंसर का बढ़ा खतरा - एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा होने पर लीवर केंसर का खतरा बढ़ जाता है ।
5- केंसर या ब्रेन ट्यूमर का खतरा - एक प्रयोग के दौरान जब चूहों को पी ऍफ़ ओ के इंजेक्शन लगाए गए तो उनमे ब्रेन ट्यूमर विकसित हो गया. साथ ही केंसर के लक्षण भी दिखाई देने लगे।
6- जहरीला पी ऍफ़ ओ 4 साल तक शरीर में बना रहता है - पी ऍफ़ ओ जब एक बार शरीर के अन्दर चला जाता है तो लगभग 4 साल तक शरीर में बना रहता है जो एक बड़ा खतरा हो जाता है।
■ टेफलोन के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय...
1- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी गैस पर बिना कोई सामान डाले अकेले गर्म करने के लिए न छोड़े।
2- इन बर्तनों को कभी भी 450 डिग्री से अधिक टेम्प्रेचर पर गर्म न करे सामान्यतया इन्हें 350 से 450 डिग्री तक गर्म करना बेहतर होता है।
3- लेकिन हमारे देश में महिलाओं को पता ही नहीं रहता है कि गेस के बर्नर पर रखे बर्तन का टेम्प्रेचर कितना हुआ है, तो वे कंट्रोल कैसे करेंगी???
4- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों में पक रहा खाना बनाने के लिए कभी भी मेटल की चम्मचो का इस्तेमाल ना करे इनसे कोटिंग हटने का खतरा बढ़ जाता है।
5- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी लोहे के औजार या कूंचे ब्रश से साफ़ ना करे, हाथ या स्पंज से ही इन्हें साफ़ करे।
6- इन बर्तनों को कभी भी एक दूसरे के ऊपर जमाकर ना रखे।
7- घर में अगर पालतू पक्षी हैं, तो इन्हें अपने किचन से दूर रखें।
8- अगर गलती से घर में ऐसा कोई बर्तन ज्यादा टेम्प्रेचर पर गर्म हो गया है, तो कुछ देर के लिए घर से बाहर चले जाए और सारे खिड़की दरवाजे खोल दे।
9- ये गलती बार-बार ना दोहराएं, क्यूंकि चारो ओर के वातावरण के लिए भी ये गैस हानिकारक होती हैं और लाखों सूक्ष्म जीवों को भी मार देती हैं।
10- टूटे या जगह-जगह से घिसे हुए टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का उपयोग बंद कर दे. क्यूंकि ये धीरे धीरे आपके भोजन में ज़हर घोल सकते हैं।
11- अगर आपके बर्तन नहीं भी घिसे हैं, तो भी इन्हें हर दो साल में अवश्य ही बदल दें।
12- जहाँ तक हो सके इन बर्तनों कम ही प्रयोग करिए।
13- इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखकर आप अपने और अपने परिवार के स्वास्थ को बेहतर बना सकते हैं...
टेफलोन कोटिंग के काले जहर से अपने परिवार को बचाएं।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

गर्भ संस्कार के माध्यम से श्रेष्ठ आत्मा के अवतरण का विधान

   



*प्रसव पीड़ाकम या दूर करने के लिए उपयोग में आनेवाली पेनकिलर दवाएँ माता व बालक के बीच पय:पान (दुग्धपान) के समय स्नेह संबंध विकसित होने में बाधा पैदा करती है | संशोधकों ने देखा है कि पेनकिलर दवा लेने से माता में तरल मातृत्व हार्मोन ऑक्सिटोसिन स्त्रावित नहीं होता | इससे नवजात शिशु जन्म के समय चेतनाशून्य या स्तम्भ हो जाता है | यही कारण हैं कि वह अपने प्रारम्भिक क्षणों में माता के प्रति आकृष्ट नहीं होता और स्वत: पय:पान करने की कोशिश भी नहीं करता | इसके विपरीत जो माताएँ पेनकिलर दवा का सेवन नहीं करती, उनमें यह हार्मोन स्त्रावित होने से माता और बालक के बीच स्तनपान के हर अवसर पर दोनों और से प्रेम बढ़ता देखा गया हैं |*
*अत: पेनकिलर दवाइयों का सेवन न करके निम्न उपचारों में से किसी भी एक का प्रयोग करें*

*१] स्वच्छ चारा खानेवाली देशी गाय के ताजे गोबर का एक चम्मच (१० मि.ली.) रस आसन्न प्रसवा (जिसकी प्रसूति का समय निकट आ गया हो) को पिलाने से प्रसव सुलभ हो जाता है*

 *(इस उपचार से व होमेओपेथी की मदद से पिछले 3 माह  में आज 5 अगस्त 2019  ज्योति बहन जबलपुर  9399341299  के मार्गदर्शन में 10 बहनो ने सामान्य प्रसव से स्वस्थ व तंदरुस्त बच्चे को इस ब्रह्मांड में जन्म दी
 
*२] पीपर (पिप्पली) व वचा चूर्ण जल में पीसकर एरंड तेल के साथ मिला के नाभि में लेप करने से अनेक कष्टों से पीड़ित स्त्री भी सुखपूर्वक प्रसव करती है*

*३] सूर्यमुखी की जड़ को डोरी में बाँधकर प्रसूता के हाथ या सिर पर बाँधने से शीघ्र प्रसव होता है*
*४] प्रसूता के हाथ-पैर के नाख़ून व् नाभि पर थूहर के दूध का लेप करें |*
*5 अगस्त 2019 को मोनिका बहन तारानगर राजस्थान 8233322334 से गर्भधारण से लेकर प्रसव तक मार्गदर्शन में एक बहन ने जिसकी आखरी समय मे बच्चे का गर्दन नाल में फंसा हुआ था बिना शल्य क्रिया के सामान्य प्रसव से इस ब्रह्मांड में आगमन हुआ आज के एलोपैथी चिकित्सा शल्य क्रिया की सलाह दे रहे  थे परन्तु गर्भवती बहन के अटल विश्वास ने मोनिका बहन की बात मान पहले जायफल का रस एक चम्मच सेवन कर हॉस्पिटल गयी व शल्य कक्ष  में जाने से पहले परिवार वालो से पुनः आधे घण्टे का समय माँग मोनिका बहन के अनुसार एक एक कप गर्म दूध व देशी गाय का घी व स्वादानुसार मिश्री मिलाकर सेवन की और सेवन करने के मात्र 15 मिंट बाद ही सामान्य प्रसव से अपने स्वस्थ तंदरुस्त बच्चे (लड़का) को जन्म दी घरेलू उपचारों के चमत्कार को शत शत नमन व इन दोनों बहन के सेवा व विश्वास को*
*सुखपूर्वक प्रसवकारक मंत्र :*

*१] पहला उपाय :- “एं ह्रीं भगवति भगमालिनि चल चल भ्रामय भ्रामय पुष्पं विकासय विकासय स्वाहा “ इस मंत्र द्वारा अभिमंत्रित दूध गर्भिणी स्त्री को पिलायें तो सुखपूर्वक प्रसव होगा*

*२] दूसरा उपाय :- गर्भिणी स्त्री स्वयं प्रसव के समय ‘जम्भला-जम्भला‘ जप करे*
*३] तीसरा उपाय:- देशी गाय के गोबर का १२ से १५ मि.ली. रस ‘ॐ नमो नारायणाय‘ मंत्र का २१ बार जप करके पीने से भी प्रसव-बाधाएँ दूर होंगी और बिना ऑपरेशन के प्रसव होगा*

*४] प्रसुति के समय अमंगल की आशंका हो तो निम्न मंत्र का जप करें :सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिकेशरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोSस्तुते(दुर्गासप्तशती)*

*५) मंत्रः ॐ कौंरा देव्यै नमः। ॐ नमो आदेश गुरु का…. कौंरा वीरा का बैठी हात… सब दिराह मज्ञाक साथ…. फिर बसे नाति विरति…. मेरी भक्ति… गुरु की शक्ति…. कौंरा देवी की आज्ञा।*

*प्रसव के समय कष्ट उठा रही स्त्री को इस मंत्र से अभिमंत्रित किया हुआ जल पिलाने से वह स्त्री बिना पीड़ा के बच्चे को जन्म देती है।*

*विशेष : “सुवर्णप्राश टेबलेट ”   सुवर्ण भस्म से पुष्य नक्षत्र में बनाई यह पुण्यदायी गोली आयु,शक्ति,मेधा,बुद्धि,कांति व जठराग्निवर्धक तथा ग्रहबाधा निवारक, उत्तम गर्भपोषक है ।गर्भवती स्त्री इसका सेवन करके निरोगी,तेजस्वी ,मेधावी संतती को जन्म दे सकती है*

*आयुर्वेदिक घरेलु उपाय*

*पहला प्रयोगः प्रसूति के समय ताजे गोबर (1-2 घण्टे के भीतर का) को कपड़े में निचोड़कर एक चम्मच रस पिला देने से प्रसूति शीघ्र हो जाती है।*

*दूसरा प्रयोगः तुलसी का 20 से 50 मि.ली. रस पिलाने से प्रसूति सरलता से हो जाती है।*

*तीसरा प्रयोगः पाँच तोला आँवले को 20 तोला पानी में खूब उबालिये। जब पानी 8 तोला रह जाये तब उसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर देने से बिना किसी प्रसव पीड़ा के शिशु का जन्म होता है*

*चौथा प्रयोगः नीम अथवा बिजौरे की जड़ कमर में बाँधने से प्रसव सरलता से हो जाता है। प्रसूति के बाद जड़ छोड़ दें।*

*विशेष : “सुवर्णप्राश टेबलेट ” सुवर्ण भस्म से पुष्य नक्षत्र में बनाई यह पुण्यदायी गोली आयु,शक्ति,मेधा,बुद्धि,कांति व जठराग्निवर्धक तथा ग्रहबाधा निवारक, उत्तम गर्भपोषक है ।गर्भवती स्त्री इसका सेवन करके निरोगी,तेजस्वी ,मेधावी संतती को जन्म दे सकती है*

*औषधियों से उपचार*

*1. एरण्ड: एरण्ड का तेल गर्म दूध में 50 मिलीलीटर की मात्रा में मिलाकर पिलाने से अगर प्रसव में दर्द हो तो दर्द तेज होकर बंद हो जायेगा*

*2. सोंठ: 10 ग्राम सोंठ का चूर्ण लगभग 500 मिलीलीटर दूध में अच्छी तरह पकाकर लेने से 15 मिनट के अन्दर-अन्दर बच्चा बाहर आ जायेगा*

*3. केला:> केले की जड़ लाकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के बांयी जांघ पर बांधे। इससे जल्द लाभ होग*

*> केले के ऊपर कपूर का चूर्ण डालकर खाने से प्रसव यानी डिलीवरी में दर्द नहीं होता है*

*4. पीपल लता: पीपल लता की गांठदार जड़ को पीपला मूल कहते हैं। कुछ पंसारी लोग पीपल लता की मोटी शाखाओं के टुकड़े कर बेचते हैं। अत: सावधानी से ही लें। प्रसव में ज्यादा देर होने पर पीपलामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाने से प्रसव यानी डिलीवरी का दर्द बढ़कर प्रसव हो जाता है। प्रसव के तुरन्त बाद इसके बारीक चूर्ण का घोल देने से लाभ होता है*
*5. लोध्र: लोध्र का लेप करने से प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को प्रसव के समय हुए योनिक्षत पर लगाने से लाभ होता है*
*6. जायफल: प्रसव यानी डिलीवरी के समय होने वाले कमर दर्द में जायफल घिसकर लेप करने व सेवन करने से लाभ होता है*
*7. पीपरामूल: प्रसव के समय पीपरा मूल, दालचीनी का चूर्ण लगभग 1.20 ग्राम में थोड़ी सी भांग के साथ प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से प्रसव यानी बच्चे का जन्म आराम से होता है*
*8. कलिहारी: सुख से प्रसव के लिए कलिहारी करी जड़ पीसकर नाभि के नीचे लगाने से लाभ होता है*
*9. कपास: डिलीवरी के बाद में कपास की छाल का काढ़ा प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से गर्भाशय जल्दी ही ठीक हो जाता है*
*10. सरपत: प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) आसपास वातावरण साफ करने के लिये सरपत की धूनी जला कर धुंआ करें*
*11. कंगुनी: प्रसव पीड़ा को कम करने के लिये कंगुनी के चूर्ण को दूध में बुझाकर, मिश्री को मिलाकर खाने से लाभ होता है। अगर पहले से ही लिया जाये तो दर्द कम रहता है*
*12. काफी: शरीर में स्फूर्ति पैदा करने के लिए काफी के बीज भूनकर, अच्छी तरह से पीसकर पानी में उबालकर पीने से लाभ होता है।*
*13. अजाझाड़े: अजाझाड़े की जड़ कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है।*
*14. बादाम :आखिरी महीने में प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को 2 बादाम और 10-15 मुनक्का के दाने पानी में भिगोकर पीसकर खिलाने से लाभ होग*
*15. तुलसी: महिला को प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के समय 2 चम्मच तुलसी का रस पिलाने से प्रसव का दर्द कम हो जाता है*
*16. बथुए: बथुए के 20 ग्राम बीजों को पानी में उबालकर, छानकर बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री को पिलाने से पीड़ा कम होगी*
*17. हल्दी: बच्चा होने के आखिरी माह में एक चम्मच पिसी हुई हल्दी गर्म दूध के साथ सुबह-शाम पिलाएं*
*18. नींबू: गर्भ के आखिरी महीने में पानी में नींबू का रस डालकर रोज पीने से लाभ होता है*
*19. लौकी: लौकी को बिना पानी के साथ उबालकर उसका रस 30 ग्राम की मात्रा में निकालकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिला देने से दर्द में आराम मिलता है।*
*20. हींग: चुटकी भर हींग लेकर, 10 ग्राम गुड़ में मिलाकर खाकर, ऊपर से आधा कप पानी या गाय का दूध पियें*
*21. अंजीर: प्रसव के समय में 15-20 दिन तक रोज दो अंजीर दूध के साथ खाने से लाभ होता है*
*22. लालघुंघची: लाल घुंघची के दाने लेकर इसे बारीक पीस लें, फिर इसे पुराने गुड़ के साथ खायें इससे प्रसव के समय दर्द नहीं होता है।*
*23. जंगली पुदीना: जंगली पुदीना और हंसराज दोनों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। फिर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से दर्द में लाभ होता है।*
*24. कलिहारी: कलिहारी की जड़ हाथ-पैरों में थोड़ी-थोड़ी बांध लें। कुछ देर बाद प्रसव के समय स्त्री को बिना अधिक पीड़ा के डिलीवरी हो जायेगी*
*25. पोई: पोई की जड़ लेकर उसका काढ़ा बनाकर 4-5 चम्मच में 2 चम्मच तिल्ली का तेल मिलाकर स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे लेप करने से प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) शीघ्र और बिना दर्द के हो जाता है।*

*26. बिजौरा: बिजौरा की जड़ 10 ग्राम और महुआ 10 ग्राम दोनों को घी में पीस लें, फिर उसमें 2 चम्मच लेकर हर 1 घंटे बाद पिलाते रहें। इससे प्रसव यानी डिलिवरी में तकलीफ कम होती है।*
*27. अपामार्ग: अपामार्ग की जड़ और कलिहारी की जड़ को लेकर एक पोटली में रखें। फिर स्त्री की कमर से पोटली को बांधने प्रसव यानी डिलीवरी आसानी से हो जाती है।*
*28. हींग: हींग और बाजरे को गुड़ में रखकर निगल जाएं। दो घूंट से ज्यादा पानी न पियें। यह करने से बच्चा देने के समय दर्द नहीं होगा।*
*29. कपूर: पके केले में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग कपूर मिलाकर खाने से बच्चे का जन्म (चाइल्ड बर्थ) आराम से होता है*
*30. पान: पान को योनि में रखने तथा पान का सेंक व लेप करने से सूजन नष्ट हो जाती है और औरत का दूध साफ होकर निकलता है।*
*31. कसौंदी: कसौंदी के पत्तों का रस देने से प्रसव (चाइल्ड बर्थ) जल्दी होता है।*
*32. कुचला: कुचला की मज्जा (बीच के हिस्से) को पानी में घिसकर नाभि पर लगायें।*
*33. तेजपात: तेजपत्ते के पत्तों की धूनी देने से बच्चा सुख से उत्पन्न हो जाता है।*
*34. प्रसव में देरी होने पर या गर्भ में पल रहे है बच्चे का आडा या उल्टा होने की सबसे अच्छी दवाई है जब डॉक्टर कितना भी चिल्लाये अॉपेशन करवाओ तब आप अपने मरीज को घर ले आओ या ऐसे किसी डॉक्टर के पास मरीज को लेकर ही मत जाइए. गाय के गोबर और गोमूत्र एक ऐसी विशिष्ट दवा हैं जो इस प्रकार के आपात अवस्था मे देने पर फौरन अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं चाहे डॉक्टर कितना ही चिल्लाये आप किसी देशी बछडी का गोमूत्र और गोबर लेकर आपस में मिलाइये और उसका रस निकल कर माँ को चार चार घंटे के अंतर में 3 बार पिला दीजिये पेट के आदत उल्टा बच्चा भी सीधा हो जाता है और बिना किसी दर्द बच्चा बाहर आ जाता है लेकिन ये दवा 9 महीना पूरा होने के बाद होने वाले प्रसव में ही काम आती है उससे पहले ये अगर बच्चा 7-8 महीने में होता है तो ये दवा इतना काम नही आती है ये रुकी हुई प्रसव पीडा को पुन: प्रारंभ करती हैं, शिशु जन्म को सरल बनती हैं तथा गर्भ में   शिशु   की स्थिति को भी पुन: सही कर देती है।*
*35. जब कोई माँ गर्भावस्था में है तो चुना रोज खाना चाहिए क्योकि गर्भवती माँ को सबसे ज्यादा काल्सियम की जरुरत होती है और चुना कैल्सियम का सबसे बड़ा भंडार है । गर्भवती माँ को चुना खिलाना चाहिए अनार के रस में - अनार का रस एक कप और चुना गेहूँ के दाने के बराबर ये मिलाकर रोज पिलाइए नौ महीने तक लगातार दीजिये तो चार फाईदे होंगे - पहला फाईदा होगा के माँ को बच्चे के जनम के समय कोई तकलीफ नही होगी और नोर्मलmk डेलीभरी होगा, दूसरा बच्चा जो पैदा होगा वो बहुत हस्त-पुष्ट और तंदरुस्त होगा, तीसरा फायदा वो बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नही पड़ता जिसकी माँ ने चुना खाया, और चौथा सबसे बड़ा लाभ है वो बच्चा बहुत होसियार होता है बहुत Intelligent और ठतपससपंदज होता है उसका IQ बहुत अच्छा होता है ।*

*36. एक गिलास देशी गाय के दूध में एक चम्मच देशी गाय का नियमित सेवन करना ही चाहिए*

*होमओपैथी
 भाई राजीव दीक्षित जी के ज्ञान से प्रोत्साहित हो प्राप्त आत्मविश्वास से इस दवा के मात्र एक दो ज्यादा से ज्यादा तीन खुराक में पिछले 3 सालों में सैकड़ो बहन का सामान्य प्रसव सम्भव हो पाया है*
*जब पल्साटिला से फायदा न हो - (गौसिपियम Q)*

*जब दर्द काफी समय तक रहने के बाद कम हो जाए - (कॉलोफाइलम 30 या 200)*

*दुर्बल या रक्तहीन औरतों में जब प्रसव पीड़ा बंद हो जाए या कम हो जाए - (सीकेल कोर 200)*

*जब चिड़चिड़ी औरत प्रसव वेदना सहन न कर चिल्लाए - (कैमोमिला 200 या 1M)*

*जब दर्द के साथ पेशाब और पाखाने की हाज़त हो - (नक्स वोमिका 200)*

*जब तेज प्रसव दर्द अचानक आए, जाए, चेहरा व आंखे लाल, जरा सा झटका लगते ही तकलीफ बढ़े - (बेलाडोना 200)*

*जब दर्द के साथ तेज मितली रहे - (इपिकैक 30 या 200)*

*जब दर्द बंद होकर रोगिणी पसीने से तर होकर बर्फ की तरह ठंडी हो जाए मगर फिर भी कपड़ा ओढ़ना पसंद न करे - (कैम्फर 30 या 200)*

*बायोकैमिक औषधि - (काली फॉस 6X)*
*प्रसव सरल करने के लिए गर्भ के अंतिम माह में 15 दिन तक कॉलोफाइलम 30, रोज एक खुराक दें।*
*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*
*मन्त्र 1 :-*
*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*
*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें*
*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*
*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*
*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*
*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*
*• ‎भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें*
*मन्त्र 2 :-*
*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)*
*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*
*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये*
*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*
*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये*
*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें*
*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और स्वदेशी भारत स्वावलंबी भारत स्वाभिमानी भारत के निर्माण में एक पहल आप सब भी अपने जीवन मे भाई राजीव दीक्षित जी को अवश्य सुनें*
*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*
*मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम मे लगा हुआ हूँ*
*उनके बताए आयुर्वेद के पानी के सूत्रों का कट्टर अनुयायी व क्षमता व परिस्थिति अनुसार आयुर्वेद के यम नियम का पालनकर्ता।*
*उनके व हमसब के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत निर्माण हेतु (मोक्ष प्राप्ति हेतु अपने व औरो के त्रैहिक (दैहिक दैविक व भौतिक)दुःखो  को दूर करने का प्रयासरत्त आदरणीय के मार्गदर्शन के सहयोग से*
*आयुर्वेद, घरेलू,पंचगव्य व होमेओपेथी के अध्ययन  व भाई राजीवदीक्षित के विचार ज्ञान  से ज्ञानित हो ज्ञान को निस्वार्थ भाव से ज्ञान का प्रचार प्रसार हेतु अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान के सहयोगी वन श्रेष्ठ उन्नत भारत के योगदान हेतू 9336919081 पर whatsapp संपर्क
*वन्देमातरम*



मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

गणित के समीकरण से दुर्गा देवी की प्रतिमा निर्माण इसी गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया जाता है

 





समझिए गणित के 100 समीकरणों से कैसे बना माँ दुर्गा का चित्र: प्राचीन भारत, जिसने गणित से ईश्वर को प्राप्त करना सिखाया

माँ दुर्गा की तस्वीर, गणित के समीकरणों से
इसी तरह से डाले गए लगभग 100 गणितीय समीकरण (बाएँ) और बन गया माँ दुर्गा का चित्र

गणित के समीकरणों (Equations) की मदद से माँ दुर्गा की तस्वीर उकेरी जाता है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जैसे-जैसे गणित के अलग-अलग समीकरण डाले जाते हैं, वैसे-वैसे अलग-अलग आकृतियाँ बनती हैं और अंत में माँ दुर्गा के चेहरे की तस्वीर बन कर उभरती है। यहाँ हम ये तो जानेंगे ही कि ये कैसे हो रहा है, लेकिन साथ में ही भारत में गणित और ईश्वर के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव की भी बात करेंगे।

गणित के समीकरणों की मदद से कैसे बनी माँ दुर्गा की तस्वीर?
इस ग्राफ का सोर्स ऑनलाइन ग्राफ़िंग प्लेटफॉर्म ‘Desmos’ है, जहाँ से इसे बनाया गया है। लेकिन, इसमें सबसे कमाल की बात है कि अलग-अलग आकृतियों के लिए अलग-अलग समीकरणों को डिराइव करना और फिर उसे सटीक क्रम में लगाना। ग्राफ में एक-एक बिंदु का महत्व होता है और पिक्सेल्स व स्क्रीन के आकर के हिसाब से इसे सजाने के लिए अलग-अलग गणितीय समीकरणों को लगाना ही इस वीडियो की खासियत है।

अर्थात, जिसने भी ‘Desmos’ पर ये समीकरण डाले होंगे उसे क्रमशः उसी तरह से ग्राफ प्राप्त होता गया होगा और अंत में ये तस्वीर बनी। इस तस्वीर के लिए गणित के एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 100 समीकरण प्रयोग में लाए गए हैं और उन्हें देख कर लगता नहीं कि ये आसान हैं। सभी समीकरण अपने-आप में कई गणितीय कैलकुलेशंस समाए हुए हैं। इसके बाद एक-एक करके हर समीकरण को एक्टिवेट किया जाता है, और उसका ग्राफ मिलता चला जाता है।

जैसे, एक स्ट्रेट लाइन का ग्राफ बनाने के लिए आप ‘y = 2x+1‘ लीनियर एक्वेशन का प्रयोग कर सकते हैं। ये एक बेसिक और साधारण उदाहरण है। इसी तरह से वृत्त और त्रिभुज से लेकर पैराबोला और हायपरबोला तक के लिए अलग-अलग समीकरणों का प्रयोग किया जाता है और उन्हें कैसे और कहाँ एडजस्ट करना है ताकि मनपसंद ग्राफ आए, इसमें दिमाग लगाना पड़ता है। इसी तरह से माँ दुर्गा की भौं और आँखें वगैरह बनाने के लिए समीकरणों का प्रयोग किया गया है।

जैसे माँ दुर्गा की नाक में जो नथुनी है, वो वृत्ताकार है। इसी तरह से समीकरणों के हिसाब से ग्राफ कहाँ मिलना चाहिए, उसी हिसाब से उन्हें शिफ्ट किया जाता है। ये तो थी तकनीकी चीजें कि कैसे इस ग्राफ को बनाया गया। 20वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में अपने ज्ञान और प्रतिभा से पूरी दुनिया को लोहा मनवाने वाले भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन भी गणित और ईश्वर को एक साथ जोड़ कर देखते थे।

उन्होंने कहा था कि उनके लिए किसी भी गणितीय समीकरण का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक वो ईश्वरीय विचार को व्यक्त न करे। यानी, हर समीकरण को वो ईश्वर से जोड़ कर देखते थे और फिर आगे बढ़ते थे। जो नास्तिक हैं और ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए भी एक तरह से कहा जा सकता है कि गणित जो है, वो इस ब्रह्मांड की भाषा है। किसी भी चीज को गणितीय समीकरण के रूप में डिराइव किया जा सकता है।

श्रीनिवास रामानुजन किसी भी फिजिकल या मेटा-फिजिकल चीज को गणितीय समीकरणों के रूप में देखा करते थे। इसीलिए, उन्होंने ऐसे-ऐसे समीकरण बनाए, जो सभी के पल्ले भी नहीं पड़ती थी और उन्हें समझने के लिए आज भी लगातार रिसर्च हो ही रहे हैं। इसी तरह आप स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड ओइलर का उदाहरण भी ले सकते हैं। यहाँ ये समझने की ज़रूरत है कि जितने भी ईश्वरीय रूप हैं, उनका मूल प्रकृति ही है।

भारत, जिसने हमेशा गणित को ईश्वर को प्राप्त करने का माध्यम माना
भारत में तो हमेशा से प्रकृति की पूजा होती आई है। यहाँ वैदिक काल से ही ये चला आ रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति के साथ ही शुरुआत की जाती है। तो, हम कह सकते हैं कि गणित एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा एक नास्तिक भी ईश्वर की पूजा कर सकता है। इसी मामले में हम हमेशा से सभ्यताओं से आगे रहे हैं। हमने गणित और प्रकृति के संबंधों को समझा है और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बनाया है।

पश्चिमी सभ्यता की सोच हमेशा से ‘बिजनेस ड्रिवेन’ रही है, लीनियर रही है। हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम अनिश्चितताओं के साथ खुद का तालमेल बिठाने में हमेशा से अभ्यस्त रहे हैं। यही कारण है कि हम शून्य (0) और अनंत (∞) के साथ तालमेल बिठाते आए हैं। हमने ईश्वर और मनुष्य के अंतर को इस रूप में देखा है कि जहाँ ईश्वर अनंत है, वहीं मनुष्य अनंत बार जन्मता-मरता है। और ये क्रम, ये सायकल, चलता ही चला जाता है।

भारत में हमेशा से शून्य (0) और अनंत (∞) की चर्चा होती आई है और इन दोनों के माध्यम से हर चीज को समझने की कोशिश होती आई है। पूरी दुनिया में आज भी एक हिस्सा है, जो अपने मजहब के आधार पर दुनिया को गोल मानता है। लेकिन, हम कभी इस बात पर आश्चर्यचकित नहीं रहे कि दुनिया गोल है। क्यों? क्योंकि हमें ये बातें आदिकाल से मालूम थी। ये गणित को लेकर हमारी समझ का ही कमाल था।

हालाँकि, पश्चिमी सभ्यता के लिए ये काफी बड़ा शॉक बन कर आया था कि अरे, पृथ्वी गोल है? आज भी ‘वर्ल्ड इज फ्लैट’ कर के एक संस्था है, जो इन बातों को नकारती है। तो भले ही ये पश्चिमी जगत के लिए एक खोज था, प्राचीन भारत के लिए एक ऐसी चीज थी, जो उनकी समझ में पहले से समाई हुई थी। आप भारत की प्राचीन संरचनाओं को ही ले लीजिए, आपको पता चलेगा कि हम शुरू से ही ज्योमेट्री और सीमेट्रीसिटी को लेकर अच्छी समझ रखते हैं।

हजारों उदाहरण हैं लेकिन गुजरात स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर को हम यहाँ देख सकते हैं। साल में दो बार ऐसा होता है, जब पृथ्वी की भूमध्य रेखा से सूर्य के केंद्र का आमना-सामना होता है। इसे Equinox कहते हैं। 20 मार्च और 23 सितम्बर के आसपास हर साल यह होता है। सीधे शब्दों में कहें तो यही वो मौका होता है जब सूर्य का केंद्र सीधा भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। जब Equinox के दिन सूर्योदय होता था तो सूर्य की किरणें सबसे पहले यहाँ सूर्य की प्रतिमा के सिर पर स्थित हीरे के ऊपर पड़ती थी। इसके बाद पूरा मंदिर स्वर्ण प्रकाश से नहा जाता था।

सीमेट्रीसिटी हमारी पुरानी संरचनाओं का एक अहम भाग रहा है। क्यों? क्योंकि एक ऐसा ही समभाव, एक ऐसी ही सीमेट्रीसिटी आपको प्रकृति हर जगह दिखाती है। ये प्रकृति की एक खासियत है। इसीलिए, प्राचीन भारत की हर संरचनाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था, परफेक्शन के साथ। हम प्रकृति के साथ कितने सहज थे और कितने अच्छे तरीके से उसे समझते थे, उसका ये एक अहम प्रमाण है।

गणित और उसके समीकरणों पर आधारित रहा है हमारा आध्यात्मिक इतिहास
हमारी जो ‘Thought Process’ थी, यानी हमारी जो सोच-विचार की प्रक्रिया थी, हमारा जो दर्शन था, वो हमेशा से गणित पर आधारित रहा है। कहा जाता है कि गणित ‘प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy)’ का ही एक भाग है। यहाँ तक कि अध्यात्म में भी हम गणित का इस्तेमाल करते थे। दुनिया की कई सभ्यताओं में 16वीं शताब्दी से पहले भी एक से बढ़ कर एक गणितज्ञ हुए हैं, जो मेटा-फिजिक्स में भी पारंगत रहे हैं।

भारत में 7वीं शताब्दी में ही ब्रह्मगुप्त हुए थे, जिन्होंने गणित और खगोलीय ज्ञान से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने इस पर पुस्तकें लिख कर शून्य (0) की गणना की प्रक्रियाएँ समझाईं। उनके सारे टेक्स्ट अंडाकार, या दीर्घवृत्तीय रूप में हैं। उस समय संस्कृत में ऐसा ही किया जाता है। यानी, हमारी भाषा और उसका साहित्य भी गणित की समझ के हिसाब से लिखे जाते थे। खगोलीय विज्ञान भी प्लेनेट मोशन का कैलकुलेशन है।

गैलीलियो ने भी इसकी गणना की थी। हालाँकि, खगोलीय विज्ञान को व्यक्ति के जीवन के साथ कैसे जोड़ा जाता है या फिर इसका किसी के जन्म-मरण पर क्या प्रभाव है – इस पर बहस हो सकती है। लेकिन, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इन सबका आधार गणित ही रहा है। किसी भी सिद्धांत को साबित करने के लिए ‘causality’ या कारण स्पष्ट होना चाहिए। कोई भी चीज क्यों और कैसे हो रही, उसे गणितीय ढंग से साबित किया जा सकता है।

आप कह सकते हैं कि महान ब्रिटिश वैज्ञानिक न्यूटन से पहले ‘नेचुरल फिलॉसोफी’ और विज्ञान एक-दूसरे के साथ ही चलते थे लेकिन उसके बाद वैज्ञानिकों ने इन दोनों को अलग-अलग रूप में लेना शुरू किया और विज्ञान एक अलग ब्रांच बन कर उभरा। इसीलिए, प्राचीन भारतवर्ष में जो गणितज्ञ रहे हैं, वो ऋषि भी रहे हैं। क्योंकि वो गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे। वो प्रकृति का अध्ययन करते थे, इसीलिए गणित और ईश्वर को साथ में देखते थे।

भारत में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने हमेशा से गणित और ईश्वर को साथ में देखा। यहाँ आपको एक काफी रोचक चीज भी बताना चाहेंगे। केरल में 14-16वीं शताब्दी में ही ‘केरला स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी’ (केरलीय गणित समुदाय) का संचालन होता था, जिसकी स्थापना ‘संगमग्राम के माधव’ ने की थी। उनका त्रिकोणमिति, बीजगणित और ज्यामिति के अध्ययन में अहम योगदान था।

उन्होंने ही दुनिया में सबसे पहले π (Pi) की गणना ट्रिगोनोमेट्री के रूप में दी थी। केरल के इस गणितीय समुदाय ने एक के बाद एक आगे बढ़ कर कई समीकरण दिए, जिनका काफी बाद में अध्ययन हुआ और दुनिया भर में लोकप्रिय हुए। यानी, हमारी प्राचीन सभ्यता गणित को लेकर निश्चितता (समीकरण और डेरिवेशन) और ईश्वर को लेकर अनिश्चितता, इन दोनों के साथ ही तारतम्य बिठाने में काफी कुशल हुआ करते थे।
इसी तरह ‘Metaphysics’ दर्शन की वह शाखा है जो किसी ज्ञान की शाखा के वास्तविकता (Reality) का अध्ययन करती है। भारतीय सभ्यता में ‘Personification’ का एक ट्रेंड रहा है, जैसे उन्होंने नदियों, पहाड़ों और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को जहाँ एक व्यक्ति के रूप में देखा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने गणित के माध्यम से ईश्वर को डिराइव करने की चेष्टा भी जारी रखी। आज जब गणितीय समीकरणों से माँ दुर्गा की तस्वीर बनाना संभव है, तो ऐसी चीजों को विकसित करने में भारत का बड़ा योगदान है।



शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

नवरात्रि पीछे आध्यात्मिक वैज्ञानिक और शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष



नवरात्र की आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता ”
संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण है।
नौ रात्रियों समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने से यह शब्द पुलिंग रूप ‘ नवरात्र ‘ कहना उचित है।
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं।
उनमें मार्च व सितंबर माह मे पड़ने वाली संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है।
दिन और रात के तापमान मे अंतर के कारण, ऋतु संधियों में प्रायः शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं,
वास्तव मे, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है।
आयुर्वेद के अनुसार इस बदलाव से जहां शरीर मे वात, पित्त, कफ मे दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण मे रोगाणु … जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं।
सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है।
नवरात्र के विशेष काल मे देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन, तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं।
नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संबंध इन नौ से सीधा जुड़ा है…
– हमारे शरीर में9 इंद्रियाँ हैं –
आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, वाक्, मन, बुद्धि, आत्मा।
– नौ ग्रह हैं जो हमारे सभी शुभ अशुभ के कारक होते हैं–
बुध, शुक्र, चंद्र, बृहस्पति, सूर्य, मंगल, केतु, शनि, राहु।
– नौ उपनिषद हैं –
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मूंडक, मांडूक्य, एतरेय, तैतिरीय, श्वेताश्वतर।
– नवदुर्गा यानी9 देवियाँ हैं –
शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुशमांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धरात्री।
शरीर और आत्मा के सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है।
इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि,
साफ सुथरे शरीर मे शुध्द बुद्धि,
उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म,
कर्मों से सच्चरित्रता और
क्रमश: मन शुध्द होता है।
स्वच्छ मन मंदिर मे ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्र मे निम्न आहार को अधिक महत्व दिया गया है,
जिसका सीधा सीधा संबंध हमारे स्वास्थ और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बड़ाने के लिए ही है–
1. कुट्टू – शैल पुत्री
2. दूध दही– ब्रह्म चारिणी
3. चौलाई– चंद्रघंटा
4. पेठा– कूष्माण्डा
5. श्यामक चावल – स्कन्दमाता
6. हरी तरकारी– कात्यायनी
7. काली मिर्च व तुलसी– कालरात्रि
8. साबूदाना– महागौरी
9. आंवला– सिध्दीदात्री !
अब जानते हैं कि नवरात्र को ‘ नवरात्र ‘ ही क्यूँ कहते हैं?
क्योंकि‘ रात्रि‘ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है।
भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है।
यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात मे ही मनाने की परंपरा है।
यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता, जैसे शिव दिन आदि।
दिन मे आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी… किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है।
इसके पीछे ध्वनि प्रदूषण के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन मे सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।
रेडियो इस बात का जीता जागता उदाहरण है।
कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।
मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य मे समझने और समझाने का प्रयत्न किया।
रात्रि मे प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है।
हमारे ऋषि मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।
इसी वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर मंत्र जप की विचार तरंगों में भी दिन के समय अवरोध रहता है,
इसीलिए ऋषि मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है।
इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुए, साधक गण रात्रि मे संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं,
उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य पूर्ण होती है।
सामान्यजन , दिन मे ही पूजा पाठ निपटा लेते हैं,
जबकि एक साधक, इस अवसर की महत्ता जानता है और ध्यान, मंत्र जप आदि के लिए रात्रि का समय ही चुनता है।
नवरात्र से नवग्रहों का संबंध भी है…
चैत्र नवरात्र प्राय: ‘ मीन मेष ‘ की संक्रांति पर आती है।
नवग्रह में कोई भी ग्रह अनिष्ट फल देने जा रहा हो जो शक्ति उपासना करने से विशेष लाभ मिलती है।
– सूर्य ग्रह के कमजोर रहने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए शैलपुत्री की उपासना से लाभ मिलती है।
– चंद्रमा के दुष्प्रभाव को दूर करने के कुष्मांडा देवी की विधि विधान से नवरात्रि में साधना करें।
– मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिए स्कंदमाता,
– बुध ग्रह की शांति तथा अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिए कात्यायनी देवी,
– गुरु ग्रह के अनुकूलता के लिए महागौरी,
– शुक्र के शुभत्व के लिए सिद्धिदात्रि तथा
– शनि के दुष्प्रभाव को दूर कर शुभता पाने के लिए कालरात्रि के उपासना सार्थक रहती है।
– राहु की शुभता प्राप्त करने के लिए ब्रह्माचारिणी की उपासना करनी चाहिए।
– केतु के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लिए चंद्रघंटा की साधना अनुकूलता देती है।
नवरात्र वर्ष मे चार बार आते है, जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है।
चैत्र नवरात्र से ही विक्रम संवत का आरंभ होता है…
इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है।
इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है,
इसमें माँ की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है।
इस पर्व मे तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों
श्री शैलपुत्री,
श्री ब्रह्मचारिणी,
श्री चंद्रघंटा,
श्री कुष्मांडा,
श्री स्कंदमाता,
श्री कात्यायनी,
श्री कालरात्रि,
श्री महागौरी, और
श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है।
” प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी !
तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम् !
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च!
सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्!
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः ! ”
इनकी आराधना करने से कई प्रकार की गुप्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
इन दिनों किए जाने वाले टोने टोटके भी बहुत प्रभावशाली होते हैं, जिनके माध्यम से कोई भी मनोकामना पूर्ति करने का प्रयास करता है पर यदि उसका शुभ भाव नहीं है तो यह प्रयास फलित नहीं हो सकता।
किन्तु राह पर पड़े टोने टोटकों जैसे अशुभ भाव के लोगों से स्वयं को बचाना भी अति आवश्यक होता है और आज के इस आधुनिक वैश्विक राक्षस से बचने और इनका विनाश करने के लिए ऊर्जा प्राप्त करने और शक्ति को जागरण करने का का यह एक उत्तम और श्रेष्ठ अनुष्ठान है

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।


   


कोई आठ पीढ़ी पहले कच्छ का एक वणजारा राजस्थान से बैल लेकर सौराष्ट्र बेचने गया।
वहाँ उसे एक सौदा करांची का मिल गया तो सिंध चला गया।

चौमासा शुरू हो चुका था,
आँधी तूफान और रण में पानी भर गया तो उसने घूमकर राजस्थान से आने की सोची।
लेकिन रेगिस्तान में डकैती और लूटपाट का खतरा था...
उसने अपनी चौसठ स्वर्णमुद्राएँ वहाँ के एक परिचित माहेश्वरी सेठ के पास रखी,
लिखा पढ़ी की और लौट आया।
किन्हीं कारणों से कभी वापस न जा सका।
मुद्राएं सेठ के पास पड़ी रही, पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता रहा।

1947 में सेठ को पलायन करना पड़ा।
हवा का रुख देख लिया था,
वह खैरथल(अलवर) में शिफ्ट हो गया।
और, आप आश्चर्य करेंगे...
5 पीढ़ी बाद उनके वंशज पूछताछ करते हुए भुज के पास एक घुमक्कड़ डेरे पर गये और गिनकर पूरी 59 मुहरें उनको सौंप दी।
उस समय उल्टा ब्याज लगता था, सो एक पीढ़ी तक धन सहेजने की एक स्वर्णमुद्रा के हिसाब से 5 मुद्राएं काट कर बाकी उन्हें दे दीं!
सेठ के वंशजों ने पूछताछ की।
स्थानीय वरिष्ठ लोगों को साथ रखा। 5 पीढ़ी में वणजारे का कुनबा कितना बढ़ा, सभी सदस्यों का वहीं बँटवारा किया और वापस लौट आए।

वृतांत का एक दुःखद पहलू यह था कि वे सभी अत्यंत गरीब और दीन हीन हो चुके थे,
किन्तु सुखद पहलू यह है कि उसी वणजारा परिवार ने उस धन का सदुपयोग किया और आज वह एक शीर्षस्थ परिवार है,
उनके परिवार में जज, वकील और उच्च ब्यूरोक्रेट हैं,
उन्होंने ही यह घटना सुनाई।
नाम लेने की जरूरत नहीं है!!

लगभग 300 वर्ष पहले समृद्धि का पैमाना गाय हुआ करती थी...
एक जोड़ी बैल, छह तोला सोने में आती थी, आप कल्पना कर सकते हैं।
बैल, घोड़ा, ऊँट के मूल्य में बहुत कम अंतर था।
तब सुथार एक गिन्नी में बैलगाड़ी बनाते थे।
सबकुछ शिल्प आधारित था।
कुम्हार, चर्मकार, नापित, घसियारा, पानी लाने वाला, पशु चराने वाला, पशुओं के उपकरण, बधियाकरण, प्रशिक्षण जैसे अनेक कार्य थे।

उदाहरण के लिए एक कुम्हार को लगभग 100 घरों के लिए वर्ष पर्यंत बर्तन सप्लाई के बदले वर्ष में दो बार एक-एक चाँदी का सिक्का मिलता था – यानि 200 तोला चाँदी प्रतिवर्ष... साथ ही अन्न फ्री, सुरक्षा फ्री, मिट्टी पानी अपनी मर्जी से और अपने धंधे का स्वामी।

सोना, चाँदी, घी और अन्न से विनिमय होता था।
सौ सेर तिल्ली के तेल के बदले 50 सेर घी।
फल फूल तो लगभग मुफ्त थे,
सूखे मेवे, मसाले, नारियल और पंसारी का सामान हाट में बिकता था।

विगत 200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।
कहीं कहीं अब भी उसके अवशेष विद्यमान हैं,
धर्मपाल साहित्य का अध्ययन कर वस्तुस्थिति जान सकते हैं।
मेरी जानकारी का स्रोत भी धर्मपाल जी का साहित्य ही है,
यह दस खण्डों में प्रकाशित है,
आप पढ़ सकते हैं।

गड़बड़ हुई अंग्रेजों के हस्तक्षेप से, उदाहरण के लिए नील की जबरन खेती से अन्न का कृत्रिम अभाव या ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट देने अथवा विदर्भ के इस्पात कारखानों को बंद करने के एवज में घर बैठे धन देना – जैसी क्रूर कुटिल बातों से यह सारा अर्थतन्त्र जो अन्योन्याश्रित और सुदृढ़ था, नष्ट हो गया।
भूखमरी, विद्वेष, रोजगार का संकट और जातीय विभेद भी बढ़ा...
और, भारतीय समाज अत्यंत दीन हीन स्थिति को पहुँच गया।

प्रेमचंद के भारत में जिस अभागे भारत का वर्णन है, वह मरणासन्न भारतीय अर्थव्यवस्था का शोकगीत है – बिल्कुल लुटा पिटा, भूखा नंगा! हालाँकि नेहरू परिवार तब भी सोने के बटन से सज्जित अचकन पहन कर अधिवेशन से एक दिन पहले होने वाले जुलूस में बग्घी पर सवार होकर ही शामिल होता था!!

भूखा नँगा भारत हमें मिला 1947 में...
तबतक सबकुछ तबाह हो गया था केवल ऊपरी वर्ग में हुंडी और सेहनाणी परम्परा विद्यमान थी.... शिल्प आधारित समस्त औद्योगिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी... जिसमें वामपंथी तिकड़म की फसल की अपार सम्भावना थी और यही छल हम आज तक भुगत रहे हैं।
आधुनिक तकनीक के सहारे हिन्दू अर्थतन्त्र की पुनर्स्थापना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

अभी त्यौहार शुरू होने वाले हैं।
पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है।
शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।
एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे,
ढूँढ़िये कि आज वे किस स्थिति में हैं?
और, धनतेरस तक तनिष्क को कोई रियायत नहीं।
इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए!
हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

विश्व सरकार के सामने बाधाएं और उनका विनाश, जिसने आपका भी विनाश निश्चित है


   

   
 दुनिया कितनी बदल रही है और अगले 5 सालो में कितनी और बदलेगी?
 2020 में हमारी मन:स्थिति बदलने जा रही है और हम को विश्व ब्यवस्था का अंग बनाने की तैयारी चल रही है अब एक ही विश्व सरकार होगी  और आपको स्वयं इसी में ही सभी समस्याओं का समाधान नजर आएगा और आप ही विश्व सरकार बनाने के पैरोंकार बनेंगे ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई है नीचे दिया हुआ एक भाई का लेख आपको भेज रहा हूं जिसमें सुखद भविष्य की एक संकल्पना जो इसी स्थिति की तरफ ले जा रहा है
 यह भाई साहब तो केवल बोल ही रहे हैं एक  लखनऊ के गांधी साहब बड़ी नाम है वह संविधान भी बना दिए है विश्व के करीब 100 देशों के प्रतिनिधियों का उसमें आगमन भी हुआ था जो विश्व सरकार की संकल्पना को साकार करने का  डिमांड भी रखा गया है  आप बिना हथियार उठाए भी युद्ध जीत सकते हैं यदि आप दुश्मन थी चाल को समझने की शक्ति है इसलिए एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान whatsapp संपर्क 9336919081 या
 7984113987 केवल कॉल
बिंदु से बिंदु जोड़ना बहुत कठिन काम है, फिर भी आप कोशिश कर सकते है।
प्रश्न हैं :
1 - #रॉकफेलर और #रॉथचाइल्ड परिवार का व्यापार क्या है?
2 - दुनिया के 5 बड़े देशो की जनसंख्या क्या है, ये कितने उत्पाद बनाते हैं, कितने कारखाने इन देशों में हैं?
3 - ब्रिटेन कितना बड़ा देश है, वह कितने उद्योग चलाता है और कितने समान एक्सपोर्ट करता है?
4 - पाउंड की कीमत इतनी क्यों?
5 - इस्राइल क्या करता है कितना कमाता है कितना उगाता है क्या इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट करता है?
6 - दुनिया मे कितने अमेरिकन डॉलर छापे गए हैं और इसके लिए अमेरिकन सरकार के पास कितना सोना सुरक्षित है?
7 - व्यापार और Mass Manipulation and Mind Control का क्या संबंध है, दुनिया मे ताकतवर देश और परिवार इसका उपयोग कैसे करते हैं?
8 - टेक और रिसर्च से पैसा कौन और कैसे कमा रहा है, क्या जो रिसर्च दुनिया मे बेंची जा रही हैं वे हमारे कितने हित में हैं, हित में है या नहीं यह कौन तय करता है?
9 - प्लास्टिक, सिंथेटिक और कैमिकल की रिसर्च से अरबो कमाने वाले देश क्या आज इससे होने वाले नुकसान के लिए जवाबदेह हैं?
10 - दुनिया मे कब तक पेपर मनी व्यवस्था खत्म हो सकती है, और यह क्यों होगी?
11 - कोरोना और पर्यावरण परिवर्तन के प्रभाव से सस्टेनेबल लाइफ स्टाइल, आर्गेनिक खेती और इम्युनिटी बूस्टर के क्षेत्र के बढ़ने से कौन कौन से उद्योग बढेंगे और कौन से तबाह होंगे?
#सोचिये
दुनिया कितनी बदल रही है और अगले 5 सालो में कितनी और बदलेगी?

2013 से मैं बोल रहा हूँ कि समय दक्षिण पन्थ का है और इंटरनेट ही सतयुग का वाहक है।
2016 से जिओ ने सतयुग की आवक को सुनिश्चित कर दिया अब समय है 5G और AI का बस 5G के आते ही ऑटोमोशन, मनी ट्रेल, लोकेशन और ऑनलाइन ट्रैकिंग और ज्यादा व्यवस्थित हो जाएगी।
अगले 10 सालो में अपराध नगण्य होंगे और जो होंगे वे 100% पकड़े जाएंगे।
#इंटरनेट जनता का मन्तव्य तुरन्त सरकार तक पहुंचा रहा है।
सरकार को निर्णय बदलने मजबूर कर रहा है मतलब अब वास्तविक लोकतंत्र भी इंटरनेट का आश्रित है।
20 वी सदी में राजशाही खत्म हुई और छोटी रियासतों को जोड़कर बड़े राष्ट्र बने, अब 21वी सदी में सारे राष्ट्रों को जोड़कर एक ग्लोबल सरकार बनाने की जरूरत आन पड़ी है।
वैश्विक महामारी, परमाणु अस्त्र, धर्म आधारित राष्ट्र और आर्थिक असमानता की समस्याओं का एक मात्र हल अब वैश्विक सरकार है।
सारे राष्ट्र बिल्कुल वैसे ही काम करे जैसे अमेरिका के 50 राज्य काम करते हैं, ऑटोनोमस राज्यो की तरह सबके अपने कानून हो पर मुद्रा और सुरक्षा एक सी हो।
#UNO को दिया जाने वाला फण्ड टैक्स से आये और वैसे ही बटे जैसे GST राज्यो और राष्ट्रीय सरकार के बीच बंटता है।
इससे वर्तमान राष्ट्रों के रक्षा बजट बिल्कुल वैसे ही खत्म हो जाएंगे जैसे भारतीय राज्यो में यह शून्य हैं।
व्यापारिक चुंगी/टैक्स/लेवी/वैट खत्म होंगे, पासपोर्ट खत्म होंगे, बैंकिंग व्यवस्था वैश्विक होगी तो कालाधन और आतंकी फंडिंग खत्म होगी।
ब्लड डायमंड, ब्लडी गोल्ड, मादक द्रव्यों का व्यवसाय, अपराधियो का पलायन खत्म होगा।
अगर यह हुआ तो विश्व मे क्या कोई समस्या बचेगी?
सनातन का #वसुधैव_कुटुम्बकम यही तो है जिसे Narendra Modi प्रोमोट कर रहे हैं।
ईश्वर चाहेगा तो अगली पीढ़ी #विश्वपति या वैश्विक मंत्री के लिए वोट करेगी।
अगर यह नहीं हुआ तो तय मानिये दुनिया 2060 नहीं देख पाएगी।
संघर्षो के मूल में हमेशा बंटवारा, आत्म केंद्रित व्यवस्था और अहम होता है, अगर हम संयुक्त, सम्मलित और हम की विचारधारा पर आ जाएं तो पाकिस्तान हो या चीन वह हमारे लिए दिल्ली, यू पी या छत्तीसगढ़ हो जाएगा और राष्ट्रों के बीच की दुश्मनी सुखमय जीवन की प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगी।
बस यही तो चाहिए विश्व को

 


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

विश्व की जनता को UN के माध्यम से कैसे उल्लू बनाया जाता है

 

दुनियाकी सरकारें और उनकी सासु मां युएन, जगत की जनता को कैसे उल्लु बना रही है उसका एक सटिक उदाहरण है ।
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Mukesh Singh
93,328 किलोग्राम कोविड 19 की टेस्टिंग किट का आयात भारत ने 2018 में किया वर्ल्ड बैंक की लिंक नीचे है।
जब कोरोना 2020 में भारत मे फैला जैसा हम लोगो को पता है तब भारत को एडवांस में पता था 2 साल पहले की भारत मे कोरोना आने वाला है।
जिसे नोवल कोविड 19 का नाम WHO ने 2020 में दिया और कहा यह नया वायरस है तब यह कमाल की बात है कि इस कि किट न जाने कितने साल पहले बनानी शुरू कर दी जाती है और बीमारी के आने से 2साल पहले भारत उसे खरीद भी लेता है ।
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मेरी बातें कुछ लोगो को अच्छी नही लगती परन्तु यह बाते उनके भी हित मे है अभी भी समय है जाग जाओ।
मन्दबुद्धि को समझया जा सकता है।
बन्दबुद्धि को नही।
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जिस बीमारी के बारे में WHO को पता 2020 में चलता है उसकी टेस्टिंग किट भारत को 2018 में वर्ल्ड बैंक द्वारा दो चार किलोग्राम नही बल्कि 93,328
लगभग 1लाख किलोग्राम बेच दी जाती है और भारत वर्ल्ड बैंक से कर्ज़ा लेकर खरीद भी लेता है क्या यह महज इत्तफाक है या कोई सोची समझी साजिश जरा सोचिए क्यों चुपचाप WHO ने लगभग सभी अपनी साईड से नोवल कोविड 19 के आगे से नोवल गायब कर दिया है।
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आप नीचे दिये गये वर्ल्ड बैंक की लिंक में देखेगे वर्ल्ड बैंक ने 2018 में ही दुनिया को करोड़ो किलोग्राम टेस्ट किट बेच दिए थे जो बीमारी 2019 - 2020 में अस्तित्व में आती है।
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जरा सोचिए मेरा मकसद सिर्फ आप को डर से छुटकारा दिलाने का है। जैसे जैसे देश में टेस्ट किट आती रहेगी बीमारी बडती हुई दिखाई देगी।
इसका ताजा उदाहरण पिछले 2 महीने है ।
जरा सोचिए-------
https://wits.worldbank.org/trade/comtrade/en/country/ALL/year/2018/tradeflow/Exports/partner/WLD/nomen/h5/product/300215?fbclid=IwAR3HGmi6RGpxNoxgncXRwWj0Hvq2N7eDfUbuZFxJsuC4tYSoXUSNxRZUW6A





सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...