#गौवर्धन_अन्नकूट_पूजा.
दीपोत्सव के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है, इसे अन्नकूट पर्व के नाम
से भी मनाया जाता है. इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध
स्पष्ट दिखाई देता है. हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार गाय उसी प्रकार
पवित्र होती जैसे नदियों में मां गंगा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. गाय को
मां लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप कहा गया है, मां लक्ष्मी जिस प्रकार सुख
समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से उत्तम
स्वास्थ्य रूपी सौभाग्य, आरोग्य, दीर्घायु और धन आदि प्रदान करती हैं और
गाय का बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है, इस तरह गौ माता के साथ सम्पूर्ण
गौवंश मानव मात्र के लिए वंदनीय, पूजनीय और आदरणीय है. अतः गौमाता के प्रति
श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के
दिन गोर्वधन पूजा की जाती हैं. भारत के लोग जीवन में भी आज के दिन गाय के प्रति श्रद्धा और उल्लास का आज सर्वोत्तम उदाहरण आज भीद मिलता है इस वीडियो में आप को दिखाया गया है
आज का पंचांग - शरद ऋतु, कार्तिक मास, कृष्ण/शुक्ल पक्ष, विशाखा नक्षत्र, अमावस्या/प्रतिपदा तिथि, रविवार, गोवर्धन पूजा, विश्वकर्मा दिवस, महावीर स्वामी निर्वाण दिवस, वृश्चिक सक्रांति, अन्नकूट, अमावस्या पुण्य, देव कार्य एवं स्नान दान की अमावस्या, राहुकाल शाम 4:30 बजे से रात्रि 6:00 बजे तक, दिशाशूल पश्चिम दिशा में, सूर्य दक्षिणायन, युगाब्द 5122, सूक्ष्म मान से आनंद और स्थूल मान से प्रमादी नामक विक्रमी संवत 2077 तदानुसार 15 नवंबर सन 2020.
गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक लोकगाथा प्रचलित है, प्राचीन काल में एक बार देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था, देवराज इन्द्र का अभिमान चूर करने के लिए श्रीकृष्ण जो स्वयं भगवान श्रीविष्णु के अवतार हैं, ने एक लीला रची जिसमें एक दिन उन्होंने देखा कि सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे हैं, श्रीकृष्ण ने मां यशोदा से पूछा मां आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं. मां यशोदा नें बताया कि लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं. श्रीकृष्ण ने पूछा मां हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं ? मां यशोदा ने कहा वह वर्षा करते हैं, जिससे अन्न की पैदावार होती है, उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है. श्रीकृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और देवराज इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं, अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए. लीलाधारी श्रीकृष्ण की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की. देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और बदले में मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी, प्रलय के समान वर्षा देख कर सभी बृजवासी श्रीकृष्ण को कोसने लगे कि सब इन का कहा मानने से हुआ है. तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसके नीचे अपने समस्त गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया. देवराज इन्द्र श्रीकृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी. देवराज इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें, देवराज इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता, अत: वे प्रजापति ब्रह्मा के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया. प्रजापति ब्रह्मा ने देवराज इन्द्र से कहा कि आप जिस श्रीकृष्ण की बात कर रहे हैं वह तो भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं. प्रजापति ब्रह्मा के श्रीमुंख से यह सुनकर देवराज इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु! मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा, आप तो दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल को क्षमा करें तत्पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर श्रीकृष्ण की पूजा आराधना कर उन्हें भोग लगाया. भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर सभी को हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने को कहा, तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा.
गोवर्धन पूजा के
दिन ब्रह्ममुहूर्त जागरण कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो शरीर पर तेल मलकर
स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें. निवास
स्थान अथवा देवस्थान के मुख्यद्वार के सामने प्रात: गाय के गोबर से
गोवर्धन पर्वत बनाएं, उसे वृक्ष, शाखा एवं पुष्प इत्यादि से श्रृंगारित
करें. गोवर्धन पर्वत का अक्षत, पुष्प आदि से विधिवत पूजन करें, पूजन करते
समय निम्न प्रार्थना करें -
गौवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक,
विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रभो भव.
दीपोत्सव की रात्रि को निमंत्रित की हुई गायों को स्नान कराएं, गायों को
विभिन्न अलंकारों, मेहंदी आदि से श्रृंगारित करें, उनका गंध, अक्षत, पुष्प
से पूजन करें, नैवेद्य अर्पित कर निम्न मंत्र से प्रार्थना करें -
लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुरूपेण संस्थिता,
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु.
सायंकाल पश्चात पूजित गायों से पूजित गोवर्धन पर्वत का मर्दन कराएं, उस
गोबर से घर-आंगन में लेपन कर वैदिक परंपरा में इंद्र, वरुण, अग्नि, विष्णु
आदि देवताओं की पूजा व हवन का विधान है. गौवर्धन पूजा से पूर्व ॐ श्री
कृष्णाय शरणं मम: मंत्र का उच्चारण अवश्य करें.
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय कृष्णाय
क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे.
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे हरे.
अन्नकूट पर्व मनाने से मनुष्य को लंबी आयु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती
है, दारिद्रय का नाश होकर मनुष्य जीवन पर्यंत सुखी और समृद्ध रहता है. ऐसा
माना जाता है कि यदि इस दिन कोई मनुष्य दुखी रहता है तो वह वर्ष भर दुखी ही
रहेगा, इसलिए हर मनुष्य को इस दिन प्रसन्न रहकर भगवान श्रीकृष्ण को प्रिय
अन्नकूट उत्सव को भक्तिपूर्वक तथा आनंदपूर्वक मनाना चाहिए.
सादर आभार











