मंगलवार, 30 नवंबर 2021

वैदिक शिक्षा का सनातन आधार से इसका उद्देश्य और विषय का संपूर्ण विवेचन



 




 कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अंतर्गत तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें आठवें और नवम अध्याय को तैत्तिरीय उपनिषद कहा जाता है। इसमें से सातवें अध्याय को उपनिषद में शिक्षा वल्ली के रूप में स्मरण किया जाता है। इस शिक्षा वल्ली का प्रथम अनुवाक मंगलाचरण की तरह है। इसके उपरांत द्वितीय अनुवाक में ऋषि कहते हैं कि हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे। तीसरे अनुवाक में वे इसका प्रयोजन बताते हैं कि इससे गुरु और शिष्य दोनों का ब्रह्मवर्चस और ब्रह्म तेज बढ़ेगा, यशस्वी होंगे और शिक्षा के द्वारा लोकों के विषय में, ब्रह्मांड की ज्योतियों के विषय में, सभी प्रकार की विद्याओं के विषय में, विश्व की समस्त प्रकार की प्रजाओं के विषय में तथा शरीर और उसके स्थूल,सूक्ष्म तथा कारण इन सभी रूपों के विषय में और इस प्रकार लोक, प्रजा, ज्योति, विद्या और जीवात्मा के समस्त स्तरों और रहस्यों के विषय में वर्णन करेंगे।
आगे इसी अध्याय में नौवे अनुवाक में बताते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन के मुख्य फल हैं – ऋत अर्थात कॉस्मिक यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों का ज्ञान, सत्य का ज्ञान और सत्य पालन की सामथ्र्य, तप की शक्ति, आंतरिक शांति की सामथ्र्य, इंद्रिय निग्रह की सामथ्र्य, वेदों के पठन पाठन की सामथ्र्य, योग्य संतान प्रजनन की सामथ्र्य, कुटुंब की वृद्धि (प्रजाति) की सामथ्र्य, मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त व्यवहार की सामथ्र्य, यज्ञ की सामथ्र्य और अतिथियों की यथायोग्य सेवा की सामथ्र्य।
समस्त ज्ञान प्रदान कर आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन देते हैं –

”सदा सत्यनिष्ठ रहना, इसमें प्रमाद नहीं करना। धर्ममय ही आचरण करना, इसमें प्रमाद नहीं करना। शुभ कर्मों में कभी प्रमाद मत करना। देव कार्य और पूर्वजों की परंपरा को आगे ले जाने के कार्य में कभी चूक नहीं करना तथा संतति परंपरा गतिमय रखना। ऐश्वर्य की साधना में कभी प्रमाद मत करना और स्वाध्याय तथा ज्ञान विस्तार में कभी चूक नहीं करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानना (विद्या, आयु, तप और आचरण में श्रेष्ठ व्यक्ति जब घर पर बिना आमंत्रण आ जाएँ, तो वे ही अतिथि कहलाते हैं। आजकल के गेस्ट या मेहमान को अतिथि नहीं कहते।)। जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही आचरण करना। हमारे भी जो सुचरित हैं, अच्छे आचरण हैं, उनका ही अनुसरण करना, अन्य आचरणों का नहीं। जो श्रेष्ठ विद्वान आयें, उन्हे आसन देना, विश्राम देना और श्रद्धापूर्वक दान देना। विवेकपूर्वक संकोच सहित अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देना चाहिए। जब जहां कोई दुविधा या शंका हो, तो उत्तम विचार वाले सदाचारी से परामर्श कर कर्तव्य का निश्चय करना। यही आदेश है। यही उपदेश है।”
शिक्षा वल्ली के बाद आगे ब्रह्मानन्द वल्ली है और भृगु वल्ली है। शिक्षा वल्ली में वर्णित पुरुषार्थों को सम्पन्न कर चुके व्यक्ति में ही ब्रह्मानन्द की साधना और ज्ञान की सामथ्र्य आती है, अन्य में नहीं। वस्तुत: ब्रह्मानन्द का संबंध परा विद्या से है। तृतीय मुंडक में द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वाला प्रख्यात मंत्र है जो आत्मा और परमात्मा संबंधी प्रभावशाली विवेचना है। इसलिए योग विद्या ही परा विद्या का मूल आधार है जिसके अनंत भेद या रूप संभव हैं। अत्यंत प्राचीन काल से भारत में यह ज्ञान था कि ज्ञान अनंत है। ब्रह्मानन्द वल्ली के आरंभ में ही उपनिषद मंत्र है – सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। ब्रह्म सत्य हैं, ज्ञान हैं, अनंत हैं। इसीलिए यहाँ विद्या के अनंत रूप सहज विद्यमान हैं। आयुर्वेद से लेकर योग तक प्रत्येक ज्ञान शाखा में ज्ञान के अनंत रूप वर्णित हैं।
इसीलिए विविध पंथ यहाँ सहज स्वीकृत हैं परंतु उन सबका एक सामान्य आधार है, जो सार्वभौम है, यह भी प्रारम्भ से ज्ञात है। ये सार्वभौम नियम या आधुनिक यूरोपीय पदावली में कहें तो सार्वभौम मूल्य हैं। ये ही सामान्य धर्म या सार्वभौम धर्म और मानव धर्म कहे गए हैं। अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी तत्व के प्रति द्रोह और द्वेष का सर्वथा अभाव, सत्य, संयम, अन्य के वस्तुओं के प्रति गिद्धदृष्टि नहीं रखना, मर्यादित भोग और उसके लिए मर्यादित संग्रह – ये पाँच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। इनके सर्वमान्य आधार के साथ व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्रों की अपनी विशेषताओं का सतत् संवर्धन ही अपरा विद्या का विस्तार है और जिन उपकरणों से अर्थात मन और बुद्धि की जिस सामथ्र्य से यह सब ज्ञान होता है, उस आत्मसत्ता के मूल स्वरूप का ज्ञान परा विद्या है।
जब किसी समाज में आत्मसत्ता के स्वरूप का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ लोग होंगे और वे सम्मानित होंगे, तब वहाँ सभी मानस संरचनाएं, ( मेंटल या इंटेलेक्चुअल कान्स्टृक्ट) मर्यादित मान्य होंगी क्योंकि यह ज्ञात होगा कि वे परमार्थ रूप में अंतिम सत्य नहीं हैं, वे सब सापेक्ष सत्य हैं और परिवर्तनशील सत्य हैं। इसीलिए व्यक्ति, कुल, गोत्र, वर्ण, क्षेत्र, आदि सब से परे जो मूल तत्व है, उसके ज्ञान की साधना को परा विद्या कहा गया और उसके ज्ञाता ही सर्वमान्य रहे। इस प्रकार प्रारम्भ से ही भारत में परा और अपरा दोनों विद्याओं की साधना परंपरा प्रवाहित है और शिक्षा वही है जो इन दोनों का ज्ञान दे।

इसमें से परा का मूल ज्ञान सबको आवश्यक है, अत: योग और ध्यान की किसी न किसी पद्धति के द्वारा आत्मस्वरूप का ज्ञान सबके लिए सर्वोपरि मान्य रहा। जबकि अपने संस्कारों और सामथ्र्य तथा प्रतिभा के अनुरूप अपरा विद्या के किस एक या कतिपय अनुशासनों में दक्षता को स्वधर्म माना गया। अत: सामान्य धर्म और स्वधर्म, दोनों का ज्ञान प्रत्येक विद्यार्थी को कराना शिक्षा का भारतीय लक्ष्य है।
यहाँ कुछ और आधारभूत तथ्य स्मरण कर लेना चाहिए। समस्त शिक्षा वृद्ध संवाद है अर्थात ज्ञान की किसी न किसी शाखा या अनुशासन में उत्कर्ष प्राप्त अपने पूर्वज लोगों के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया गया, प्रस्तुत किया गया, उसे नयी पीढ़ी को देना ही शिक्षा का मूल आधार है। वही शिक्षा है। इस प्रकार किसी भी समाज की सम्यक शिक्षा वह है जो सर्वप्रथम अपने ही समाज और राष्ट्र में हुए ज्ञानियों के द्वारा प्रस्तुत, निरूपित और व्याख्यायित ज्ञान के स्वरूप को ठीक-ठीक नयी पीढ़ी को प्रदान करे। अर्थात् अपने वृद्धों से संवाद करें। परंतु वर्तमान में 1947 ईसवी के बाद से जो लोग शासन में रहे, उन्होंने शिक्षा के नाम पर यूरोप और बाद में संयुक्त राज्य अमेंरिका के जो कुछ अनुशासनों में वृद्धि प्राप्त या उत्कर्ष प्राप्त ज्ञानी लोग हैं, उनसे ही भारत के विद्यार्थियों का संवाद बलपूर्वक कराया।
उदाहरण के लिए इतिहास में, राजनीति शास्त्र में, अर्थशास्त्र में, समाजशास्त्र में, मानस शास्त्र यानी मनोविज्ञान में और शब्दशास्त्र, भाषा शास्त्र आदि में यूरोप के सयाने लोग, वृदध लोग क्या क्या कहते रहे हैं और क्या कह रहे हैं, उसे ही भारत के विश्वविद्यालयों में मूल रूप से पढ़ाया जाता है और मात्र शोभा या अलंकार की भांति एकाध भारतीय विद्वानों के भी अंश उस विषय में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के सभी विद्यार्थियों को शासन के द्वारा यूरोप के और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृद्धों से संवाद करने को विवश किया जाता है। यह तो शिक्षा के प्रयोजन से रहित शिक्षा हुई। शिक्षा का मूल प्रयोजन है सर्वप्रथम अपने समाज और राष्ट्र के वृद्धों से विद्यार्थियों का संवाद कराना। उनके ज्ञान को उन्हें प्रदान करना। इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद, योगशास्त्र सहित समस्त भारतीय दर्शन शास्त्र, व्याकरण, भाषा शास्त्र आदि सभी रूपों में सबसे पहले अपने देश के ज्ञानियों को जानना आवश्यक है। फिर यूरो-अमेरिकी विद्वानों को भी अवश्य वे जानें।
अपरा विद्या के प्रत्येक अनुशासन में सर्वप्रथम विद्यार्थियों को अपने ही राष्ट्र और अपने ही समाज के वृद्धों के द्वारा जाने गए और प्रस्तुत किए गए ज्ञान को जानना चाहिए तथा सर्वप्रथम अपने ही वृद्धों से संवाद करना चाहिए। इसके बाद जैसा हमारे वृद्धों ने निर्देश दिया है, सारे संसार के भी वृद्धों से ज्ञान प्राप्त करना सहज स्वाभाविक है। अपनों से संवाद न करके केवल बाहरी वृद्धों के ज्ञान को जानना तो शिक्षा के प्रयोजन को नष्ट करना है। अत: भारतीय शिक्षा वही है जो सर्वप्रथम इतिहास में, अर्थशास्त्र में, राजनीति शास्त्र में, मानस शास्त्र में, मनोविज्ञान सहित प्रत्येक मानविकी अनुशासन में भारत का ज्ञान नयी पीढ़ी को प्रदान करे। भारत के शास्त्र ज्ञान को, भारत के महान ज्ञानियों के ज्ञान को अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएं। यही भारतीय शिक्षा का मूल लक्ष्य है।
भारत में ज्ञान की अनंत शाखाएं हैं और उनका अत्यधिक विस्तार है। अत: जिसमें अपने संस्कार और प्रतिभा और रुचि के कारण विशेष गति हो, उस अनुशासन में विशेष ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए और यूरोप या संयुक्त राज्य अमेंरिका सहित विश्व के अन्य देशों के भी वृद्धों का ज्ञान यदि संबंधित विषय में प्राप्त हो सके तो और अच्छा है। परंतु शिक्षा के मूल में अपने राष्ट्र और अपने समाज के वृद्धों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही आधार बनना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का लक्ष्य है।

वैसे भी समस्त विश्व में शिक्षा का मूल लक्ष्य और प्रयोजन यही है। आखिर यूरोप में और संयुक्त राज्य अमेंरिका में भी प्रत्येक विद्यार्थी को सर्वप्रथम अपने ही ज्ञानवृद्धिप्राप्त सयानों का ज्ञान ही प्रदान किया जाता है। भारत में इतने महान ज्ञानी हुए हैं, इतिहास संबंधी, राजनीति शास्त्र संबंधी, वित्तशास्त्र संबंधी अथवा मानसशास्त्र संबंधी या धर्मशास्त्र संबंधी उन महान भारतीय ज्ञानियों के ज्ञान को तो यूरोप के किसी भी देश में प्रारंभ में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाता। यहां तक कि बाद में भी कुछ यदि पढ़ाया जाता है तो उनकी अपनी व्याख्याओं के साथ पढ़ाया जाता है, उनके अपने दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है। भारतीय ऋषियों के दृष्टिकोण को यथावत किसी भी यूरोपीय देश में अथवा संयुक्त राज्य अमेंरिका में किसी भी अनुशासन में नहीं पढ़ाया जाता। जिन क्षेत्रों में भारतीय ऋषि और भारतीय गुरुजन सर्वश्रेष्ठ मान्य है, उन क्षेत्रों में भी पहले हमारा ज्ञान वहाँ विद्यार्थियों को नहीं दिया जाता। क्योंकि सर्वत्र शिक्षा का मूल प्रयोजन अपने ही पूर्वजों के ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करना है। भारत में भी शिक्षा के इसी सार्वभौम प्रयोजन के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जानी आवश्यक है।
हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही तय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तत्वावधान में भारत के श्रेष्ठ विद्वानों का एक वृहद निकाय व्यापक विचार-विमर्श करें और वेदों उपनिषदों पुराणों महाकाव्यों आदि के परंपरागत विद्वानों तथा अन्य सभी ज्ञान धाराओं के मुखिया लोगों और ज्ञानी लोगों और भारतीय कला रूपों तथा शिल्प परंपराओं के ज्ञानी और हुनरमंद व्यक्तियों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों का एक समवाय हो और उसमें शिक्षा के नए स्वरूपों के विषय में सर्व अनुमति के आधार पर एक प्रामाणिक स्वरुप विकसित किया जाए।
हमारी ज्ञान परंपराएं विराट और विविध हैं। उनके प्रतिनिधियों के संवाद से राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस विषय में राजनेताओं और प्रशासकों को स्वयं अपने स्तर पर निर्णय लेने का हठ नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इन विषयों के अधिकारी विद्वान नहीं हैं। राजनीति शास्त्र या विधिशास्त्र अथवा प्रशासनिक शास्त्र में उनका कोई योगदान अवश्य हो सकता है परंतु ज्ञान के अन्य विराट क्षेत्रों में राजपुरुषों और प्रशासकों का कोई निर्णायक योगदान नहीं हो सकता। भारतीय शिक्षा सदा ही परंपरा से शिक्षक केंद्रित यानी आचार्य केंद्रित रही है और उसे पुन: आचार्य केंद्रित ही किए जाने की वश्यकता है।
शिक्षा को शिक्षक के स्थान पर प्रशासक और मंत्रालय के सचिव तथा मुखिया लोग तय करें, यह तो अंग्रेजी काल से चला था और यह परंपरा भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने वाली प्रमाणित हुयी है। भारतीय शिक्षा के स्वरूप और लक्ष्यों का निर्धारण भारत के ज्ञानियों के द्वारा ही हो, ऐसी व्यवस्था करना शासन का कर्तव्य है। ऐसी समृद्ध शिक्षा परंपरा का पुन: उत्कर्ष ही भारतीय शिक्षा के लक्ष्य होने चाहिए। भारतीय धरोहर

आज देश की दो विशेष पुण्य आत्माओं का तिथि है पर दुर्भाग्य से हम सब अनजान हैं एक भोग में डूबी हुई आधुनिक संस्कृति के कुछ युवा नौजवान के प्रेरणास्रोत महान बलिदानी क्रांतिकारी खुदीराम बोस जिनका शब्द हृदय को झंकृत कर देता है मैं गरीब हूं यह जीवन या प्राण न्योछावर करने के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है जो भारत मां को अर्पण कर सकूं दूसरे महान राष्ट्र भक्त श्री राजीव दीक्षित जी जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए अपना प्राण न्योछावर कर दिया और मानसिक गुलामी से बाहर निकालने में अपना अमूल्य योगदान दिया ऐसे महापुरुषों को सत-सत नमन
अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पर whatsapp टेलीग्राम या डायरेक्ट कॉल 7984113987 यदि दोनों नंबर  यदि नहीं लग रहे हैं मैसेज या whatsapp कॉल कर सकते हैं क्योंकि पिछले तीन साल से हमारा नंबर अपडेट नहीं हो रहा है google पर। हमारे संपर्क संचार में व्यवधान किया जा रहा है https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2021/11/blog-post.html?m=1
 हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही......यह फोटो जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की है। जनेऊ, रुद्राक्ष धारण कर नियमित त्रिकाल संध्यावंदन करते हुए। सामान्यतः राजा-महाराजों की वैभवशाली छवियां प्रदर्शित की जाती हैं। भोगी बताया जाता है। कभी नहीं बताया जाता, क्षत्रिय राजा निष्ठा से कर्मकांड करते थे। सहयोग : समीर मोहन एवम आकाश फोटो स्टेटस में देखें

बुधवार, 29 सितंबर 2021

उन्नत बीज जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी

 



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा के पश्चात भारत मैं कल घोषणा की गई कि भारत में उन्नत तकनीक के अनेक फसलों का बीज राष्ट्र को देने की घोषणा की है जिससे किसान समृद्ध खुशहाल और भारत की प्रजा कुपोषण से मुक्त हो जाएगी

किसी समय में सेम का पौधा घर की सुरक्षा में लगी घास फूस की टटिया पर फैल कर रसोई की महीने 2 महीने का इंतजाम कर देता था!
और कभी छप्पर (खपरैल) की छत पर फैली लौकी कद्दू की बेले मिलकर महीने 2 महीने सब्जी का खर्च निकाल देती थी!
 खलियान में फैली कद्दू की बेल पर लगने वाले पीले पीले फूलों से स्वादिष्ट और सुगंधित पकोडीयों से सुबह के नाश्ता में महीना कब निकल जाता था; पता ही नहीं लगता था!
जेठ, बैशाख के महीने में दाल और कुमड़े(कुमेहड़ा) से बनी बडीयां (बरीं) जाड़ों तक का रसोई का खर्च झेल जाती थी!
 इन्हीं महीनों में अम्मा के हाथ का बना बथुआ और भात खाने का भी अपना अलग ही तरह का आनंद होता था; ऐसा लगता था! मानो! स्वर्ग में परोसे जाने वाले भोजन का आनंद ले रहे हो!
सावन,भादो के महीने में भूसे के गुगों पर फैली तोरई की बेलें; तथा तालाब पर पानी में उगने वाली चोलाई और नारी के साग से रसोई के कई महा निकल जाते थे!
यह वह दिन थे; जब सब्जी पर होने वाले खर्च का अहसास! तक नहीं होता था!
जाड़े के मौसम में गांव के बाहर घूरें के ढेरों पर या फिर पानी के नल के पास के स्थान को साफ कर; धनिए के बीज को जूते से रगड़ कर कुछ समय तक घूरे में; पोटली बांधकर गाड़ दिया जाता था!
 उसके बाद उसकी क्यारियां बनाकर  देते थे; और उसके चारों ओर लहसन, बाकला, मूली, देसी टमाटर, फूलगोभी की लगा दिए जाते थे!
फिर जाड़े की सीजन में इन सभी सब्जियों का भोकाल चलता था! जैसे-जैसे शरद ऋतु आगे बढ़ती;
 मूली और टमाटर तथा हरे धनिया की चटनी को तो जमाई वाला रुतबा हासिल हो जाता था!
 खिचड़ी के साथ तो हरी चटनी, मूली का चोली दामन का साथ होता था!
तब हम लोगों को जीडीपी का कोई ज्ञान नहीं था!
 राजनीति में पडकर हम अपना आपसी व्यवहार खराब नहीं करते थे!
 ना! ही! एक दूसरे के प्रति बैर और जलन की भावना थी! लाख वैचारिक मतभेद होने के बाद भी; हम सब में आपसी प्रेम और मानवता थी!
यह सभी सब्जियां सर्व सुलभ और रसोई की साथी थीं!
अगर घर पर कोई मेहमान आ जाते थे; तो तीन चार सब्जियों का इंतजाम तो चुटकी बजाते यूं ही हो जाता था!
 वह भी बिल्कुल ऑर्गेनिक एकदम शुद्ध!
गर्मी के मौसम में गांव के चारों ओर आम की बगिया से आंधी में गिरे आमों से पूरे साल के अचार का इंतजाम हो जाता था!
गांव के अंदर लगी आटा पीसने वाली चक्की से गेहूं का आटा पीसकर शुद्ध आता था!
 जैसे-जैसे शाम को एक घर से धुआं उठता था; तो फिर क्या? गोबर से बने कंडे के टुकड़े को लेकर आग मांग कर लाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता था!
सूरज के ढलने के समय रेडियो पर चौपाल और आकाशवाणी के मनमोहक समाचारों और कार्यक्रमों से दिन विदा लेता था!
रात में  छतों पर सोते समय फुल आवाज में रेडियो पर विविध भारती के सतरंगी गानों की धुनें गूंजा करती थी; जिसकी स्वर लहरियां हवा में एक गांव से दूसरे गांव तक सुनाई देती थी!
रातें बड़ी होती थी; द्वा!रे द्वारे! खटीयों पर बिस्तर लगाए जाते थे!
 मर्द घर से बाहर दरवाजों पर सोते थे;वहीं महिलाएं घर के आंगन में खटिया बिछा कर सोती थी!
 हर तीसरे दरवाजे पर कथा कहानियां, बुझजनीयां होती थी! कहीं-कहीं तो बड़े बूढ़े एक साथ बैठकर आल्हा का राग छेड़ देते थे!
 जो किसी बड़े मनोरंजक कार्यक्रम से कम नहीं होता था!
 घर के बीच आंगन में लगे नीम के पेड़ के नीचे पड़ी खटिया में बहुएं अपनी साड़ी से पर्दा खींचकर सोती थी!
वहीं बच्चे अपनी दादी से कहानी सुनते सुनते सो जाते थे!
एक एक व्यक्ति के कम से कम पांच पांच बच्चे होते थे! लेकिन सब खुश, हष्ट पुष्ट, सबके सपने पूरे होते थे!
 लेकिन महंगाई कभी उन बड़े बूढ़ों को हडी नहीं!
 उन्होंने कभी आंदोलन नहीं किया!
एकदम खुश और मस्त लोग थे!
तब किसानों में कर्ज का फैशन बिल्कुल नहीं था!
 किसान कर्ज से ऐसे घबराते थे; नाम लेने मात्र से ही जैसे सांप की पूंछ पर पैर पड़ गया हो!
समय बदला,आ गया टेलीविजन और नौकरी का जमाना!
 बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही टीवी देख कर कोट पैंट और जींस पहनने लगे सेंट का तो जैसे चलन ही चल पड़ा!
 सरकारी नौकरी वाले दामादो में बेटियों के पिताओं को भगवान विष्णु नजर आने लगे!
 बच्चियों को नारायण के साथ बिहाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, गृह ऋण, गोल्ड लोन मजबूरी बन गया!
और वक्त बदलता ही चला गया, और फिर आया वकीलों और इंजीनियरों का दौर!
इनसे रिश्तो के लिए बेटियों के बाप अपने पूर्वजों की संपत्ति भी बेचने को तैयार थे! फिर क्या था?
 धीरे धीरे घर की कच्ची दीवारों पर सेम की बैलों को फैलाने वाली बेटियां अपने पति के साथ रहने फ्लैटों में चली गई!
 जहां जाकर, उन्हीं बेटियों ने कैक्टस के पौधे उगाने शुरू कर दिए!
 और फिर देखते ही! देखते! सब्जियां भी महंगी हो गई!
 बहुत पुरानी यादें ताजा हो गई।
 सच में सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं होता था! कहीं महंगाई नहीं थी!
 जिसके पास कुछ नहीं था उसका भी काम चलता था।
 महंगाई का दूर-दूर तक नामोनिशान न था।
 सिर्फ था! तो चैनो अमन, प्यार, सम्मान, भाईचारा, बड़े छोटे की तहजीब!
पुराने दिनों में दही,मट्ठा की भरमार थी;
 जिसके पास कुछ नहीं था,उसका भी काम चलता था।
 चना, मटर गुड,आम,जामुन;
 सबके लिए उपलब्ध रहता था।
 बेमेल विचारों के रहते भी;
 अगाध आपसी प्रेम था।
 आज की दकियानूसी,बैर,वैमनस्य,जलन भरी मानसिकता;
 तब उसका नामोनिशान न था।
 हाय रे! आधुनिकता! हाय रे! ऊंची शिक्षा;
 कहां तक ले आई,
 चारों तरफ सिर्फ महंगाई ही महंगाई;
 बेफिजूल खर्चों से घिरे इंसान,आडंबर में अपनी नींद गवाई।
विचारणीय है कि:
 क्या हमारा लक्ष्य यही है, जिधर हम जा रहे हैं। या फिर सिर्फ हम गफलत में हैं!और जिंदगी का सफर यूं ही जारी है!


बुधवार, 4 अगस्त 2021

online education के आत्मघाती परिणाम


 

खबर है कि जुआ में पैसा हारने के बाद भय से तेरह वर्ष के लड़के ने फाँसी लगा कर आत्महत्या कर ली। लड़का किसी अच्छे प्रतिष्ठित विद्यालय का विद्यार्थी था। मैं ऐसे असँख्य बच्चों को जानता हूँ जो इससे भी कम आयु के हैं और अपना परिवार चलाने के लिए कहीं दैनिक मजदूरी कर रहे हैं। और हाँ! उन लड़कों ने कभी प्राइवेट स्कूल का मुँह भी नहीं देखा।! वो अपने जीवन जीने के साथ दूसरे के जीवन जीने में सहयोगी बन गए

 सोच कर देखिये! 13 वर्ष की उम्र आत्महत्या की होती है क्या? तेरह वर्ष की उम्र होती है कहानियां पढ़ने की। यह उम्र होती है दोस्तों के संग उछलने-कूदने की, सीखने की, हँसने-खिलखिलाने की... तेरह वर्ष का बच्चा यदि आत्महत्या कर रहा है, इसका एक ही अर्थ है कि वह पूरी तरह अकेला हो गया है। उसके पास अपनी बात बताने के लिए न कोई अच्छा दोस्त है, न ही वैसे रिश्ते हैं जिनसे वह हर बात कह सके। उसे इतना अकेला कौन बना गया है? यकीन कीजिये, उसे उसके धूर्त विद्यालय और मूर्ख अभिभावकों ने अकेला कर दिया है।
https://ajaykarmyogi1.blogspot.com/2021/08/13.html?m=1
प्राचीन काल में शिक्षा ज्ञान के लिए ली जाती थी, फिर समय आया जब शिक्षा का लक्ष्य नौकरी प्राप्त करना हो गया। पर अभी शिक्षा स्टेटस सिम्बल है। अधिकांश परिवार फी के नाम पर शौक से लुट रहे हैं, ताकि कह सकें कि "मेरा बच्चा शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ता है" उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि बच्चा क्या सीख रहा है, उन्हें बस यह पता है कि वे गर्व से छाती फुला कर कह सकते हैं कि हम दो लाख पर ईयर फी भरते हैं।
दरअसल शिक्षा प्राप्त करना जीवन जीने की एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे अब हौवा बना दिया गया है। बच्चों को जैसे हल में जोत दिया जा रहा है, जहाँ वे चाह कर भी किताबों से बाहर सर निकाल कर दूसरी ओर नहीं देख पा रहे हैं। हम यह सोच कर खुश हो रहे हैं कि हमारा छोटा बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है। हम यह सोच कर प्रसन्न हैं कि वह कम्प्यूटर, मोबाइल वगैरह चला लेता है। हमें पता भी नहीं चलता कि वह धीरे धीरे मूर्ख बन रहा है। उसमें न सामाजिकता की समझ विकसित हो रही, न व्यवहारिकता की समझ हो रही है। वह न धर्म को समझ रहा है, न नैतिकता को... वह बिल गेट्स के बारे में सबकुछ जानता है, पर अपने रामगढ़ वाले मौसा के बारे में कुछ नहीं जानता।
आधुनिक परिवारों के अधिकांश अभिभावक यह भूल चुके हैं कि बच्चों को समय देना भी उनका कर्तव्य है। वे बच्चों को स्कूल में हाँक कर निश्चिन्त हो जाते हैं। वे उसे महंगे सामान दे देते हैं, उसके लिए हर आवश्यक-अनावश्यक वस्तु खरीद देते हैं, पर समय नहीं देते।
जीवन जीने की कला स्कूल नहीं सिखाता, यह सिखाना एक श्रेष्ठ गुरु का काम है। श्रेष्ठ गुरु और गुरुकुलों से दूर करके अभिभावक भी यदि न सिखाये तो बच्चा भले बड़ा अधिकारी बन जाये, पर कभी सुखपूर्वक जी नहीं पायेगा। और यही कारण है कि आजकल अच्छे खासे सुखी सम्पन्न परिवार के लोग भी छोटी सी परेशानी से हार कर आत्महत्या कर लेते हैं। या घुट घुट करके जीते हैं
हमारी पीढ़ी तक बच्चों को माता पिता नहीं बल्कि दादा-दादी पालते थे उनके लिए लिए ना केवल कहानियों की किताबें आदि लाते थे बल्कि उनका उंगली पकड़कर चलाने से लेकर जागने से लेकर सोने तक बच्चे दादा दादी के सानिध्य में ही रहते थे। बच्चों के चरित्र निर्माण में उन किताबों से भी बड़ा महत्वपूर्ण प्रशिक्षण साक्षात होता था। ऐसा नहीं है कि अब के आधुनिक पढ़े-लिखे माता पिता अभिभावक उन  का महत्व नहीं समझते,वे समझते हैं पर    दादा दादी और परिवार की परंपराओं में उन्हें हीनता नजर आता है। उन्हें लगता है कि कम्प्यूटर के युग में दादा दादी की और परिवार की सानिध्य कहीं बच्चों को पीछे न ढकेल दे। वस्तुतः वे प्राइवेट विद्यालयी शिक्षा प्रणाली के हौवे में फँस गए हैं, जो चाह कर भी अपने बच्चों को सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं।
यदि ऐसी घटनाओं से बचना है तो स्कूलों पर निर्भरता छोड़ कर अपने बच्चों को दादा दादी परिवार का सानिध्य और समय देना ही होगा। बात केवल आत्महत्या की नहीं है, यदि उसे सही तरीके से जीवन जीना न सिखाया तो आपका उच्च शिक्षित लड़का अपने जीवन में अनपढ़ लड़कों से पराजित होता रहेगा। अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पे whatsapp या 7984113987 पर काल करें 

पहले *भटूरे* को फुलाने के लिये उसमें *ENO* डालिये
फिर *भटूरे* से फूले पेट को पिचकाने के लिये *ENO* पीजिये
*जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य आप कभी नहीं समझ पायेंगे*
*पांचवीं* तक *स्लेट* की बत्ती को *जीभ* से चाटकर *कैल्शियम* की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी
*लेकिन*
इसमें *पापबोध* भी था कि कहीं *विद्यामाता* नाराज न हो जायें ...!!!
*पढ़ाई* के *तनाव* हमने *पेन्सिल* का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ...!!!
*पुस्तक* के बीच *पौधे की पत्ती* और *मोरपंख* रखने से हम *होशियार* हो जाएंगे ... ऐसा हमारा *दृढ विश्वास* था
*कपड़े* के *थैले* में *किताब-कॉपियां* जमाने का *विन्यास* हमारा *रचनात्मक कौशल* था ...!!!
हर साल जब नई *कक्षा* के *बस्ते बंधते* तब *कॉपी किताबों* पर *जिल्द* चढ़ाना हमारे जीवन का *वार्षिक उत्सव* मानते थे ...!!!
*माता - पिता* को हमारी *पढ़ाई* की कोई *फ़िक्र* नहीं थी, न हमारी *पढ़ाई* उनकी *जेब* पर *बोझा* थी ...
*सालों साल* बीत जाते पर *माता - पिता* के *कदम* हमारे *स्कूल* में न पड़ते थे ...!!!
एक *दोस्त* को *साईकिल* के बिच वाले *डंडे* पर और *दूसरे* को *पीछे कैरियर* पर *बिठा* हमने कितने रास्ते *नापें* हैं, यह अब याद नहीं बस कुछ *धुंधली* सी *स्मृतियां* हैं ...!!!
*स्कूल* में *पिटते* हुए और *मुर्गा* बनते हमारा *ईगो* हमें कभी *परेशान* नहीं करता था दरअसल हम जानते ही नही थे कि, *ईगो* होता क्या है❓️
*पिटाई* हमारे *दैनिक जीवन* की *सहज सामान्य प्रक्रिया* थी
*पीटने वाला* और *पिटाने वाला* दोनो *खुश* थे,
* पिटाने वाला* इसलिए कि हमे *कम पिटे* *पीटने वाला* इसलिए *खुश* होता था कि *हाथ साफ़* हुवा ...!!!
हम अपने *माता - पिता* को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना *प्यार* करते हैं, क्योंकि हमें *"आई लव यू"* कहना आता ही नहीं था ...!!!
आज हम *गिरते - सम्भलते*, *संघर्ष* करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ *मंजिल* पा गये हैं तो कुछ न जाने *कहां खो* गए हैं ...!!!
हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है, हमे *हकीकतों* ने *पाला* है, हम सच की दुनि�
🙏🏻🌹🌹🙏🏻

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

शिव स्वरोदय विज्ञान का चमत्कार जीवन मैं आनंद और खुशियां अपार

  


  
स्वर विज्ञान सबसे महत्वपूर्ण खोज है, *शिव स्वरोदय* में इसका विस्तृत उल्लेख है ।

इसे अपनाए और जीवन में परिवर्तन महसूस करे।
*विवेक
*सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्वर*
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सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।
इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।
सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

*स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ*
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(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।
(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।
(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

*तीथी अनूसार स्वरोदय*

शुक्ल पक्ष:-

• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया बांया (उल्टा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी -दांया (सीधा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी बांया (उल्टा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी –दांया (सीधा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा – बांया (उल्टा)

कृष्ण पक्ष:-
• प्रतिपदा, द्वितीया व तृतीया दांया (सीधा)
• चतुर्थी, पंचमी एवं षष्ठी बांया (उल्टा)
• सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी दांया(सीधा)
• दशमी, एकादशी एवं द्वादशी बांया(उल्टा)
• त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या --दांया(सीधा)

*स्वर कि पहचान*
 
सवेरे नींद से जगते ही नासिका से स्वर देखें। जिस तिथि को जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो बिस्तर पर उठकर स्वर वाले नासिका छिद्र की तरफ के हाथ की हथेली का चुम्बन ले लें और उसी दिशा में मुंह पर हाथ फिरा लें।
यदि बांये स्वर का दिन हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर जमीन पर रखकर नीचे उतरें, फिर दायां पैर बांये से मिला लें और इसके बाद दुबारा बांया पैर आगे निकल कर आगे बढ़ लें।
यदि दांये स्वर का दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिस्तर पर उठकर दांयी हथेली का चुम्बन ले लें और फिर बिस्तर से जमीन पर पैर रखते समय पर पहले दांया पैर जमीन पर रखें और आगे बढ़ लें।
यदि जिस तिथि को स्वर हो, उसके विपरीत नासिका से स्वर निकल रहा हो तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेट लें। इससे जो स्वर चाहिए, वह शुरू हो जाएगा और उसके बाद ही बिस्तर से नीचे उतरें।

*स्वर अनूसार दैनिक कर्म*

स्नान, भोजन, शौच आदि के वक्त दाहिना स्वर रखें।
पानी, चाय, काफी आदि पेय पदार्थ पीने, पेशाब करने, अच्छे काम करने आदि में बांया स्वर होना चाहिए।
जब शरीर अत्यधिक गर्मी महसूस करे तब दाहिनी करवट लेट लें और बांया स्वर शुरू कर दें। इससे तत्काल शरीर ठण्ढक अनुभव करेगा।

जब शरीर ज्यादा शीतलता महसूस करे तब बांयी करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर शुरू हो जाएगा और शरीर जल्दी गर्मी महसूस करेगा।
जिस किसी व्यक्ति से कोई काम हो, उसे अपने उस तरफ रखें जिस तरफ की नासिका का स्वर निकल रहा हो। इससे काम निकलने में आसानी रहेगी।
जब नाक से दोनों स्वर निकलें, तब किसी भी अच्छी बात का चिन्तन न करें अन्यथा वह बिगड़ जाएगी। इस समय यात्रा न करें अन्यथा अनिष्ट होगा। इस समय सिर्फ भगवान का चिन्तन ही करें। इस समय ध्यान करें तो ध्यान जल्दी लगेगा।

*स्वर द्वारा भविष्य ज्ञान*

दक्षिणायन शुरू होने के दिन प्रातःकाल जगते ही यदि चन्द्र स्वर हो तो पूरे छह माह अच्छे गुजरते हैं। इसी प्रकार उत्तरायण शुरू होने के दिन प्रातः जगते ही सूर्य स्वर हो तो पूरे छह माह बढ़िया गुजरते हैं। कहा गया है - कर्के चन्द्रा, मकरे भानु।
रोजाना स्नान के बाद जब भी कपड़े पहनें, पहले स्वर देखें और जिस तरफ स्वर चल रहा हो उस तरफ से कपड़े पहनना शुरू करें और साथ में यह मंत्र बोलते जाएं -
 *ॐ जीवं रक्ष*।
इससे दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा के लिए टल जाता है।

आप घर में हो या आफिस में, कोई आपसे मिलने आए और आप चाहते हैं कि वह ज्यादा समय आपके पास नहीं बैठा रहे। ऎसे में जब भी सामने वाला व्यक्ति आपके कक्ष में प्रवेश करे उसी समय आप अपनी पूरी साँस को बाहर निकाल फेंकियें, इसके बाद वह व्यक्ति जब आपके करीब आकर हाथ मिलाये, तब हाथ मिलाते समय भी यही क्रिया गोपनीय रूप से दोहरा दें।

ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है, जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं। किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।
स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए, जैसे विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।
इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभ शुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।

*अन्य उपाय*
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यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।
गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।
स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

जन सामान्य का क रोना का इलाज और बेन्टीलेटर सब फ्री जिन्होंने लूटा है उन्हें लुटवाने दें





🙏🏻 *तथाकथित कोरोना से मुक्त बनाये ये उपाय*
हमारी मजबुत रोग प्रतिरोधक क्षमता हमे कोरोना से बचाती है।  इस काढ़े का सेवन करे व अन्य लोगो से भी साझा करे ।
हल्दी 100 ग्राम
सौंठ 50 ग्राम
कालीमिर्च 10 ग्राम
गीलोय 200 ग्राम
कालमेध   100 ग्राम၊              चिरायता 50 ग्राम      कुटकी 50 ग्राम   पारिजात 50 ग्राम
सभी चीजो को साफ करके चूरन बनां लिजिए आैर मिक्स कर दिजिए  । दो गिलास पानी मे एक चम्मच चूर्ण लेकर धीमी आंच पर काढ़ा बनाए जब आधा गिलास पानी बचे तब ठंडा होने पर खाली पेट सुबह सेवन करे । https://youtu.be/DqMPeeXUJ3E

कृपया इस संकट की घड़ी मे ऐसी जानकारी को  सभी तक पहुंचाने की सेवा जरूर करे ।
अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान  
*इस वक्त सिर्फ एक चीज जो आपके घर और हॉस्पिटल में अंतर पैदा कर रही है, वो 'वेंटिलेटर' है..*
बाकी आपके पास दवाइयों की जानकारी/लिस्ट है, होम आइसोलेशन गाइड है, डॉक्टर्स भी किसी ना किसी संपर्क से फोन पर अवेलबल हो जाते होंगे, लेकिन बस वो वेंटिलेटर ही है, जो अभी तक घरों में मौजूद नहीं है।
उस वेंटीलेटर की आपको कभी जरूरत ही नही पड़ेगी अगर आप एक्सटर्नल सेनिटाइजर के साथ-साथ 'इंटर्नल सेनिटाइजर' भी इस्तेमाल करें। ये सेनिटाइजर है 'अजवायन के पानी की भाप' लेना और ये भाप मुहँ से अंदर लेनी है। अजवाइन के पानी की भाप आपके फेफड़ों के लिए सेनिटाइजर का काम करती है। ये भाप ना केवल ऑक्सीजन का लेवल बढ़ाती है बल्कि इससे हमारी बॉडी ब्लॉट भी नहीं करती। इसके अलावा ऑक्सीजन का लेवल बॉडी में बनाये रखने के लिए हमें ठीक मात्रा में पानी भी पीते रहना चाहिए ताकि शरीर में इसकी कमी नहीं हो।

इसके अतिरिक्त एक चीज और कर लें - हम सबने ABCD पढ़ी ही होगी। कोविड की इस स्ट्रेन में हम उसमें से A हटा दें और सिर्फ BCD का ध्यान रख लें। विटामिन B हरी सब्जियों और मौसमी फल में मिल जाएगा। विटामिन C खट्टी चीजों - नींबू, संतरा, अंगूर, टमाटर में मिल जाएगा और विटामिन D सुबह की धूप में 10 मिनट की एक वॉक से मिल जाएगा।

अब अगर हम एक मौसमी फल, एक नींबू पानी का गिलास, 10 मिनट की छत पर एक वॉक और अजवाइन के पानी की भाप ले रहे हैं तो कोविड हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

हॉस्पिटल और घर के बीच जो वेंटिलेटर आ रहा है उसे ऊपर बताए तरीकों से मार कर हम स्वस्थ्य रह सकते हैं। बाकी मास्क, सेनेटाइजर और वैक्सीन अति-आवश्यक है। उसे तो बिल्कुल भी नहीं भूलना है।

चाहे इस विश्व के कण कण में hospital खोल दो , चाहे हर मनुष्य क्या , हर जीव के कोख से Doctor पैदा करवा दो ,
चाहे दवाईयों के पेड़ या फसल ही बोने लग जाओ , तब भी सब बीमारियों से मरते ही रहेंगे ।
क्यों ????
क्योंकि
*काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।*
*निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।।*
जब तक हमारे खान पान की शैली , खाद्य अखाद्य की मर्यादा , नियम संयम की ऐसी तैसी रहेगी तब तक हम लोग मरते रहेंगे ।
इस विश्व के शारीरिक रोग का एकमात्र कारण यह छोटी सी मांसल जीभ है ।
इसी जीभ के स्वाद के लिए लोगों ने भोजन के नियम संयम , आचार , व्यवहार सब खत्म कर दिया और आज hospital में doctors के पैरों पर नाक रगड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं।
चिल्ला रहे हैं हॉस्पिटल hospital कर के ।
जब बोला जाता है कि अपने शरीर में कुछ भी कूड़ा कर्कट मत डालो , तो सब गुस्से से सामने वाले को देखते हैं । असंयमित खाना , असंयमित पीना , बाहर का चाटना , घर घर अशुद्धता शुद्धता का विचार किये चाटना , पैकेट बन्द सामग्रियों को खाना , pesticides, insecticides, रासायनिक उर्वरक खा खा कर रक्त, धमनियों और dna तक भरना , पानी को इतना फ़िल्टर कर लेना कि उसमें से सब minerals और essentials nutrients निकाल कर पीना , सुबह सवेरे शाम दोपहर रात जब चाहे तब मुँह चलाना , कोई समय नहीं , कोई नियम नहीं कि कब खाना , क्या खाना , कितना खाना , कैसे खाना , क्यों खाना ।
बस भगवान ने मुँह दे दिया तो उसमें कुछ भी कभी भी कैसे भी डाल लो ।
ठंड़ीयों तक में गधे लोगों को मैंने आम खाते देखा है और Ice Cream खाते देखा है । उनके चेहरे पर दर्प भाव रहता है कि वो ऐसा फल खा रहे हैं जो उपलब्ध नहीं है ।
लेकिन उन मूर्खाधिराजों को यही नहीं पता कि यही दर्प भाव हॉस्पिटल और doctors लाखों का तुमसे लूट कर तुम्हे जीवन भर रोगी बनाकर तोड़ेंगे ।
जब बोला जाता है कि Maid से सब काम करवा लो लेकिन भोजन स्वयं बनाओ तो उसमें नारी सशक्तिकरण घुस कर और आधुनिकता का हवाला देकर hospital में एक bed book करवा लेते हैं।
मर जायेंगे , आह माई आह माई करते रहेंगे लेकिन भोजन maid ही बनाएगी जिसका पता नहीं किस विचार , कौन से तरंगों से , कौन से energy लेवल से , कौन से भावना डालकर , किज शुद्धता से वह भोजन तैयार करेगी या करेगा ।
बस लोलुप जीभ को स्वाद मिलना चाहिए और मोटी चमड़ी को आराम ।
भले ही इससे पूरा परिवार का स्वास्थ्य हाशिये पर ही क्यों न आ जाये ।
Sauce, बंद buiscuits , नमकीन , cold drinks , पिज़्ज़ा , burger , गंदे बासी canned juices सबके घर में पड़े होंगे और लैपटॉप पर काम करते भक्षण चलता रहेगा  लेकिन अजवाईन , हरड़ , सौंफ , मेथी दाना , पीपली , गोंद, इत्यादि शायद ही कोई महीने में खाता हो ।
यह सब खाने में सबकी नानी मर जाती है लेकिन नानी के साथ साथ यह भी जल्दी hospital के bed पर मरे पाए जाते हैं।
ग़लत काम करेंगे सब खुद लेकिन चिल्लायेंगे Hospital और Doctors को।
जिस दिन इस जीभ को संयमित कर लिया तो उसी दिन समझिये कि आप स्वस्थ्य होते चले जायेंगे ।
जिस दिन अपने kitchen या रसोई को शरीर के मंदिर के तौर पर बनाकर उस रसोई घर को घर का एक औषधालय बना लेंगे तो उसी दिन से आप स्वस्थ्य होते जाएंगे ।
जिस दिन आपकी रसोई में आपके घर की स्त्रियों के अलावा किसी अन्य का प्रवेश वर्जित होगा , उसी दिन से आपका Hospitals और Doctors से नाता टूटने लगेगा ।
जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे बाहर का नहीं खाना और सबके घर घर का नहीं चाटना , उसी दिन से आपके घर से रोग अपनी गठरी बांधने लगेंगे ।
बहुत ही आवश्यक हो तभी इस व्रत या नियम को तोड़े ।
जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे एकमात्र मौसमी फल और सब्जियों का ही सेवन करना है , ठीक उसी दिन से वैभव और लक्ष्मी अपना बोरिया बिस्तर लेकर आपके घर में ठिकाना बनाने आ जाएंगी ।
और एक अन्य महत्वपूर्ण बात
*तन को बली बना लो ऐसा , सह ले सर्दी वर्षा घाम ।*
*मन को बलि बना लो ऐसा , टेक न छाड़े आठों याम ।।*
मन को ऐसा बलिष्ठ बना लो कि कोई तुम्हें अपने नियम से डिगा न सके ।
ऐसा नहीं कि यार दोस्तों ने कहा दिया तो तुम भी अपने घर का संस्कार भुलाकर पीने और मांस सेवन करने लगे ।
मतलब तुम्हारे माँ बाप का संस्कार इतना गिरा था कि अन्य दोस्तों के संस्कार उस पर हावी हो गए ।
तुम इतने कमजोर निकले कि उनकी गलत बातें तुमने ग्रहण कर ली लेकिन अपनी अच्छी बातों या आदतों का प्रभाव तुम उन पर नहीं डाल सके । धिक्कार है तुम्हें ।
तो तुम उनके गुलाम हो।
मैं बार बार कहता रहूँगा कि जिस दिन तुमने अपने रहन सहन , आचार , विचार , खान पान , नियम संयम को संयमित एवं नियमित कर लिया , उसी दिन से सब ठीक हो जाएगा ।
वरना तो हॉस्पिटल और डॉक्टर भले ही कोई अपने दोनों जेब में लेकर घूमो या अपने नौ द्वार स्थान में ही घुसेड़ कर क्यों न रखे , वह मरेगा और रोगों से ही मरेगा । कोरोना ही नहीं कोरोना से भी बड़ी बड़ी बीमारियों से मरेगा ।
फिर एक बार सुन लो समझ लो


सोमवार, 22 मार्च 2021

प्राचीन गुरुकुल का दंड उठक बैठक आज विदेशों में लोकप्रिय हो रहा है

 


 

   
प्राचीन भारतीय गुरुकुलों में शारीरिक सजा देने का श्रेष्ठ वैज्ञानिक कारण............
विदेशी भी अपना रहे हैं...........
उठक बैठक की सजा ............
भारत में गुरुकुल के ज़माने से आक स्कूल, विद्यालयों में बच्चों को उठक बैठक की सजा देने की परम्परा चली आ रही है. दोनों हाथों को आपस में क्रॉस करके बाएं हाथ से दाहिने कान और दहिने हाथ से बाये कान को पकड़कर उठना बैठना होता था. जिस बच्चे को यह सजा मिलती वो तो शर्मसार हो जाता था. लेकिन हाल में हुई रिसर्च से पता चला है कि इस कसरत के लाभ अद्धभुत हैं.
कान पकड़ कर उठक बैठक करना यह प्राचीन योग है, जोकि दिमाग के लिए बहुत लाभदायक है. हमारे भारतीय स्कूलों में यह सजा अक्सर पढाई में कमजोर बच्चों को दी जाती है, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था. उस समय गुरुकुलों में सभी को यह योग कराया जाता था. अब विदेशों में यह योग Super Brain Yoga के नाम से प्रसिद्ध हो रहा है.
हम भारतीयों का तो ऐसा है कि जब कोई ये न बोले – वैज्ञानिक रिसर्च में पता चला है…विदेशी इसका पेटेंट करना चाहते हैं…फॉरेन साइंटिस्ट ने कहा, हम किसी बात का विश्वास ही नहीं करते.
उठक बैठक के लाभ ............
यह योग करते समय ध्यान दें कि कान के उपरी हिस्से को नहीं बल्कि निचले हिस्से (Earlobe) को पकड़ा जाता है. कान के इस हिस्से में विशेष एक्यूप्रेशर पॉइंट होते हैं, जिसे दबाने से दिमाग की विशेष तंत्रिकाओं में सक्रियता बढती है, मस्तिष्क कार्यक्षमता बढ़ती है.
इस पोस्चर में उठने बैठने से मस्तिष्क की मेमोरी सेल्स में तेजी से रक्त प्रवाह होता है. दिमाग के बाये और दायें हिस्सों की कार्यप्रणाली में सामंजस्य स्थापित होता है, जिससे कि मन शांत और केन्द्रित होता है. फलस्वरूप याददाश्त तेज होती है और दिमाग तेज होता है.
यह योग करने से Autism, Asperger’s syndrome जैसी दिमागी बीमारियाँ, सीखने और व्यवहार सम्बन्धित रोग में भी लाभ मिलता है. इसी लाभ के कारण कक्षा के कमजोर और शरारती बच्चों को यह योग करवाया जाता था, लेकिन इसे कोई भी करे उसे लाभ ही मिलेगा.
उठक-बैठक कैसे करें .............
सामने देखते हुए सीधे खड़े हों, ठुड्डी जमीन के समानांतर हो. दोनों पैर कंधो की चौड़ाई जितना दूरी पर हो और पंजे सीधे हों. अब सीने के सामने से दोनों हाथो को क्रॉस करते हुए बाएं हाथ से दाहिने कान का निचला हिस्सा और दाहिने हाथ से बाएं कान का निचला हिस्सा पकड़ें. कान न बहुत तेजी से दबाएँ कि एकदम लाल ही हो जाएँ न एकदम हल्के से. मध्यम प्रेशर लगाते हुए पकड़ें. कान के सिरे को अंगूठे और पहली ऊँगली के बीच पकड़ें. अंगूठे ऊपर की तरफ हो और ऊँगली पीछे जाये. हाथ सीने के ऊपर हों, जिसमें दाहिना हाथ ऊपर आये. सामने देखते हुए धीरे-धीरे बैठना शुरू करें. आराम से जितना झुक सकें झुकें, फिर धीरे-धीरे उठ खड़े हों. बैठक लगाते समय सांस छोड़ें और उठक लगाते समय सांस लें. एक बार में 1 से 3 मिनट तक यह करें. उठक बैठक के तुरंत बाद आप अनुभव करेंगे कि दिमाग शांत होता है और फ्रेश ऊर्जा महसूस होती है. इस योग को करने से तुरंत लाभ तो मिलते हैं, लेकिन करीब 3 हफ्ते तक करने से ही बड़े बदलाव महसूस होंगे. यह योग करते समय जीभ को तालू से सटाकर रखें, अधिक लाभ मिलेगा.

सोमवार, 8 मार्च 2021

जत् पिंडे तत् ब्रहमांन्डेे केे रहस्यमयी शरीर व ब्रहमांड जहॉं भूहीनता का प्रभाव रहता है शंगरिला घाटी व कुंडलिनी जागरण का रहस्य

  

  मनुष्य शरीर में देवत्व का वास ...................

#वैदिक-समाधान-गुरुकुल
चीन का सन् 1962 में भारत पर आक्रमण करने का वास्तविक कारण क्या था ?
इसका असल कारण बहुत ही रोमांचक आध्यात्मिक और दिलचस्प कारण था ।
जानिए एक महत्वपूर्ण जानकारी।
इस संसार में ऐसा बहुत कुछ है जो कि हम नहीं जानते, यदा कदा कुछ तथ्य सामने आते रहते हैं जो कभी-कभी सत्य को प्रकट कर ही देते हैं
सन् 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध का एक ऐसा कारण है, जिसे तत्कालीन भारत सरकार नहीं जानती थी।
हो सकता है कि परिवर्तित सरकारें भी न जानती हों। आज की NDA सरकार भी जानती हो,,,,
यह भी आवश्यक नहीं।
सन् 1962 के चीन के भारत पर आक्रमण का वास्तविक कारण था--
#शंगरी_ला_घाटी'।
यह घाटी
#तवांग_मठ के निकट वह घाटी है जहां तृतीय और चतुर्थ आयामों की संधि स्थली है।
यह वह दिव्य घाटी है जहाँ कोई साधारण व्यक्ति भी अचानक पहुंच जाए तो वह अमर हो जाता है।
उस शंगरी ला घाटी की दिव्यता का रहस्य चीन के शासकों को 'हिब्रू ग्रंथों' और 'भारतीय ग्रंथों' से पता चल गया था।
तिब्बत पर अधिकार करना चीन की उसी मंशा का परिणाम था।
जब तिब्बत पर अधिकार करने के बाद वहाँ वह घाटी नहीं मिली तो सन् 1962 में अरुणाचल प्रदेश स्थित तवांग मठ के नजदीक हमला कर वहाँ के भूभाग पर कब्जा करना उनकी उसी योजना का हिस्सा था।
लेकिन
उन्हें तब भी 'शंगरी ला घाटी' नहीं मिलनी थी न ही मिली। आज जो
चीन भारत को आंखें दिखा रहा है, उस के पीछे भी एकमात्र कारण वही 'शंगरी ला घाटी' है। भूटान के पास का वह क्षेत्र तो मात्र बहाना है। उसे तो वही दिव्य 'शंगरी ला घाटी' चाहिए।
'शंगरी ला घाटी' वह घाटी है जहाँ भारत के 64 तंत्र, योग और भारत की प्राच्य विद्याओं को सिखाने के लिए संसार के कोने कोने से पात्र व्यक्तियों को खोज खोज कर बुलाया जाता है और शिक्षा-दीक्षा देने के बाद उस के विस्तार के लिए आचार्यों को घाटी के बाहर भेज दिया जाता है।
उस घाटी की सब से बड़ी विशेषता है कि वह चतुर्थ आयाम में स्थित होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होती।
वहाँ उस घाटी में सैकड़ों हज़ारों की संख्या में उच्चकोटि के योगी, साधक, सिद्ध तपस्यारत हैं। वहाँ हमारे इस तीन आयामों वाले संसार की तरह समय की गति तेज नहीं है, बल्कि वह समय मन्द है।
वहाँ पहुंच जाने वाला व्यक्ति हज़ारों साल तक वैसा का वैसा ही बना रहता है युवा, स्वस्थ और अक्षुण्ण।
यही कारण है कि उस विशेषता के कारण चीनियों की नीयत उस क्षेत्र के लिये हमेशा से कब्जा करने की रही है।
और आज भी वह भूटान के बहाने से वही निशाना साधने पर आमादा है।
वैसे एक मिथक ये भी है कि भगवान परशुराम, कृपाचार्य और रुद्रांश बजरंग बली यहीं निवास करते हैं विष्णु के कल्कि अवतार को यहाँ 'शांग्रीला घाटी' में लाने  वाला व्यक्ति अश्वथामा होगा इसी घाटी में कल्कि अवतार की शिक्षा दीक्षा होगी।
हम जिक्र कर रहे हैं शंगरी ला घाटी का।
ये तिब्बत और अरुणाचल की सीमा पर है। तंत्र मंत्र के कई जाने माने साधकों ने अपनी किताबों में इस का जिक्र किया है।
लोगों का ऐसा मानना है कि ये जगह किसी खास धर्म या संस्कृति की नहीं है, जो भी इसके लायक होता है, वह इसे ढूंढ सकता है।
1942 में एक अंग्रेज अफसर LP फरैल को इस जगह पर कुछ खास अनुभव हुए थे, जिसके बारे में उन्होंने 1959 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में लेख प्रकाशित करवाए थे। तिब्बती बुद्धिस्ट्स का मानना है कि जब दुनिया में युद्ध होगा, शंभाला का 25वां शासक इस धरती को बचाने आएगा।
प्रसिद्ध योगी परमहंस विशुद्धानंद जी ने भी इस आश्रम की शक्तियों को महसूस किया था, जिस का उन के शिष्य पद्म विभूषण और साहित्य अकादमी से नवाजे गए और गर्वनमेंट संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ.  गोपीनाथ कविराज जी ने बड़े विस्तार से अपनी पुस्तक में वर्णन किया है।
तिब्बती साधक भी इसके बारे में कहते रहे हैं। इस घाटी को उस बरमूडा ट्राएंगल की तरह ही दुनिया की सबसे रहस्यपूर्ण जगह माना जाता है।
कहा जाता है कि भू-हीनता का प्रभाव रहता है। ये भी कहा जाता है कि इस घाटी का सीधा संबंध दूसरे लोक से है।
जाने माने तंत्र साहित्य लेखक और विद्वान अरुण कुमार शर्मा ने भी अपनी किताब तिब्बत की वह रहस्यमय घाटी में इस जगह का विस्तार से जिक्र किया है। बकौल उन के दुनिया में कुछ ऐसी जगहें हैं जो भू-हीनता और वायु-शून्यता वाली हैं, ये जगहें वायुमंडल के चौथे आयाम से प्रभावित होती हैं। माना जाता है इन जगहों पर जा कर वस्तु या व्यक्ति का अस्तित्व दुनिया से गायब हो जाता है। माना जाता है ये जगहें देश और काल से परे होती हैं

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शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है.................
१. आँख — चन्द्र, सूर्य
२. कान —दशो दिशाएँ
३. नाक —अश्विनी कुमार
४. मुँह — अग्निदेव
५. जिभ्या — वरुण
६. हाथ — इन्द्र
७. पैर — उपेन्द्र
८. गुदा — गणेश
९. लिंग —ब्रह्मा
१०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी
११. हृदय — शिव-पार्वती
१२. कंठ — सरस्वती
१३. आज्ञाचक्र-- शिव
व्यक्ति को गणेश जी की शक्तियां प्राप्त होती हैं जिससे वह रिद्धि सिद्धि का स्वामी बन जाता है । प्रारम्भ गणेश जी से होता है इसी कारण गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं प्रथम पूजा का कारण यह नहीं है कि वह सबसे बड़े हैं । इनसे बड़े तो इंद्र है जिन का वास स्वाधिष्ठान में है ।
इसके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जिस के देवता इंद्र है और देवी ब्रह्मचारिणी । इस स्थान पर तभी पहुंचा जा सकता है जब ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए । यहां तक पहुंचने से पहले साधकों के लिए इंद्र अप्सराएं भेज दिया करता है जिससे उनका ब्रह्मचर्य टूट जाए वह पतित हो जाए । ऐसे प्रमाण बहुत से ग्रंथों में हैं । जो इस स्थान तक पहुंच जाता है उसके पास इंद्र की शक्तियां आ जाती हैं । इंद्र की पूरी परिषद और सभी देवी देवता उसके अधीन हो जाते हैं l
उससे ऊपर मणिपुरक चक्र है इसके देवता ब्रह्माजी है । यहां की देवी सरस्वती है ब्रह्मा जी की उत्पत्ति नाभि कमल से हुई है । वह इस स्थान में रहकर गर्भ में रहने वाले बच्चे की रचना करते हैं । यह स्थान पूरे शरीर का केंद्र माना जाता है इस स्थान पर पहुंचने वाले साधक के पास ब्रह्मा जी की शक्ति आ जाती हैं और उस के आशीर्वाद से किसी को भी संतान की प्राप्ति हो सकती है
इससे ऊपर अनहद चक्र है जिसमें जिसमें हर समय विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों की आवाज आती रहती है l इस चक्र के देवता विष्णु जी हैं जो छीर सागर में लेटे हुए हैं l जब ब्रह्मा जी किसी बच्चे की निर्माण (रचना ) कार्य पूरा कर देते हैं और उसकी उत्पत्ति (जन्म) हो जाती है तब उनका कार्य पूर्ण हो जाता है और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी विष्णु जी पर आ जाती है । जिससे मां के स्तनों में दूध आ जाता है यह स्तन छीर सागर का प्रतीक है l यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास विष्णु जी की शक्तियां आ जाती हैं ।.वह अपने शरीर को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से स्थूल बना सकता है और किसी भी लोक में जा सकता है ।
विष्णु जी को ही सर्वोच्च देव और पालनहार माना जाता है इसीलिए लोग कहते हैं कि वह भगवान सबके ह्रदय में किंतु ऐसा नहीं है भगवान विष्णु और देव विष्णु में अंतर है।
अनहद से ऊपर विशुद्ध चक्र है इसके देवता शंकर जी है और देवी उमा जी है यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास शंकर जी की शक्ति आ जाती है और मृत्यु उसकी इच्छा पर निर्भर हो जाती है ।
इससे ऊपर आज्ञा चक्र है जहां पर तीसरा नेत्र होता है यह आत्मा का क्षेत्र है यहां पहुंचने पर कुंडली भी जो शक्ति रूपा थी वह इस आत्मा ईश्वर ब्रह्म शिव क्षेत्र में पहुंचकर शिव से मिलती है यहां पर पहुंचने वाला साधक अर्धनारीश्वर बन जाता है । शंकर जी ध्यान साधना योग आध्यात्म के द्वारा यहां तक पहुंचे ,वह शिव बन गए, उन्हें शिव कहा जाने लगा ।
कुंडलिनी यहीं पर रुक जाती है इस कुंडलिनी शक्ति के द्वारा मूलाधार में रहने वाला जीव इन चक्रों से होता हुआ शिवव बनता है जो पहले शिव ही था जिसे माया ने जीव बना दिया था । जो जीव इस स्थिति में पहुंच कर अपने पूर्व के स्वरूप को प्राप्त करता है इसे ही स्वरूप की प्राप्ति, आत्मज्ञान की प्राप्ति आत्मज्ञान आदि नामों से जाना जाता है । जहां पर साधक लिखा है वहां जीव पढ़ा जाए । आप शरीर नहीं है जीव हैं , प्राप्ति जीव को ही होती है शरीर सिर्फ माध्यम है ।
दुनिया के जितने भी गुरु जी लोग हैं उन्हें जीव की जानकारी नहीं है कि जीव क्या है ? कैसा है ? कहां रहता है ? वह सिर्फ कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक पहुंचने का विवरण बताते है । जब जीव शिव बन जाता है तब वह नीचे वाले संपूर्ण देवताओं और देवियों से श्रेष्ठ बन जाता है । इसीलिए कहा है बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा ।
मानव शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है और कितनी प्रसन्नता की बात है कि वह मानव तन आपके पास है । यहां दिव्य ज्योतिर्मय प्रकाश और चिदानंद है । जीव शिव बनते ही चिदानंद और ज्योतिर्मय हो जाता है । यहाँ पर जीव का पहुंचना ही समाधि कहलाता है क्योंकि वह शिव से अथवा शिव के समत्व प्राप्त कर लेता है या शिव के समक्ष हो जाता है ।शंकर जी अपने आप को यही स्थित रखते है । इसलिए अधिकतर वह समाधि में रहते हैं ।
यहां तक पहुंचने वाले गुरु स्वयं को भगवान मानने लगते हैं क्योंकि ब्रह्मा विष्णु महेश उससे नीचे होते हैं । वह इसी आत्मा ईश्वर ब्रह्म और दिव्य चेतन ज्योति को ही परमात्मा घोषित कर देते हैं । ध्यान साधना का अभीष्ट यही है । इससे आगे ना तो कुंडलिनी जा सकती है और ना ही कोई गुरु
आज के संसार में जितने भी गुरु है उन्हें महात्मा कहलाने पर संशय है क्योंकि जिसका इष्ट, अभीष्ट आत्मा ही है वह आत्मा से महान अर्थात् महात्मा कैसे हो सकता है ? कोई भी गुरु इस क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ा सकता क्योंकि गुरु भी ज्योतिर्मय शिव ही है। इसे ही कैवल्य कहते हैं । इससे ऊपर सहस्त्र सार है । महावीर स्वामी बुद्ध भी आज्ञा चक्र से आगे नहीं पहुंचे क्योंकि इससे ऊपर जाने की ना तो कोई क्रिया है और ना ही कोई कर्म यह सिर्फ़ भगवान की कृपा पर आधारित है। यह स्वयं को ही भगवान मानने लगते हैं जिससे भगवान से इनका संबंध नहीं रहता ।
जिसका इष्ट और अभीष्ट परमात्मा है जो आत्मा से ऊपर और परमात्मा से नीचे होता है वह महात्मा कहलाता है । वही असली गुरु है वह सहस्त्र सार में साकार रूप में अभय मुद्रा में बैठे होते हैं ,और यहीं से पूरे शरीर पर नियंत्रण करते हैं । संसारी गुरु ने इस स्थान को परमात्मा का स्थान बता दिया है जबकि सच्चाई यह है परमात्मा ना तो इस शरीर में है और ना ही ब्रह्मांड में । वह परमधाम में रहता है । वह युग युग में एक बार किसी शरीर विशेष में अवतरित होता है।
यह संपूर्ण शरीर सूक्ष्म ब्रह्मांड है जो कुछ ब्रह्मांड में है वह इस शरीर में भी है जिस प्रकार एक ग्लोब संपूर्ण पृथ्वी का प्रतिरूप होता है उसमें सभी चीजें सूक्ष्म रूप में होती हैं । उसी प्रकार इस शरीर में भी सभी चीजें हैं जो इस ब्रह्मांड में है किंतु सूक्ष्म रूप में । जितने भी देवी देवता इस ब्रह्मांड में हैं वह सूक्ष्म रूप से शरीर में है यथार्थ रूप में वह अपने लोक में है ।
यह लोग अपने शिष्यों को भ्रमित करके कुछ क्रियाएं बता देते हैं कहते हैं करते रहो सच्चाई नहीं बताते। जबकि यम नियम का पालन किए बिना कोई भी क्रिया नहीं हो सकती जिसमें ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है । यदि यह ब्रह्मचर्य का पालन करवाने लगेंगे तो कोई भी शिष्य इनके पास नहीं रुकेगा, जो इन्हें रुपये देना तो दूर एक गिलास पानी भी नहीं देगा । इन्हें शिष्यों के कल्याण से मतलब नहीं है उसके धन से मतलब है क्योंकि इन्हें शिष्य के पैसे से अपने बेटा बेटी पालने हैं ।
ये स्वयं मूलाधार में पड़े हुए हैं । जो मूलाधार में पड़ा हुआ है वह किसी को आज्ञा चक्र अथवा सहस्त्र सार में क्या पहुंचाएगा ? यह साधन किसी दुर्लभ गुरु के सानिध्य में रहकर संयमित जीवन जीकर ही की जा सकती है अन्यथा नहीं ।
आप सभी लोग इस कुंडलिनी के चक्कर में मत पड़े भगवान की भक्ति करें जो उपलब्धि कुंडलिनी की अंतिम उपलब्धि है भगवान के भक्तों को उससे भी आगे सहज ही प्राप्त होती है क्योंकि भक्त क्रिया पर नहीं कृपा पर आधारित है । भगवान किस को क्या दे देगा कोई भी नहीं जानता ? यह संसार के गुरु आप का भला नहीं कर सकते यह सिर्फ अपना भला करने में लगे हुए हैं भगवान भला नहीं करता परम कल्याण करता है उस पर विश्वास रखिए

  



सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...