शनिवार, 18 जून 2022

वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य ऐसी नीति निर्धारण क्यों नहीं हो सकता हे

  





   पूरी दुनिया में शिक्षा का लक्ष्य यही है कि पूर्वजों द्वारा संचित ज्ञान राशि को नई पीढ़ी को सौंप दिया जाए।
इसके लिए सबसे पहले ज्ञान के विविध रूपों की स्मृति तथा बोध और संभावनाओं को नई पीढ़ी के मन बुद्धि और चित्त पर अंकित कराना होता है और उसके लिए अभ्यास प्रशिक्षण और कल्पना से भरपूर सृजनशीलता को जागृत और प्रदीपित करना होता है।
साथ ही नई पीढ़ी को अपनी ज्ञान परंपरा की रक्षा और उसमें अभिवृद्धि की निरंतर प्रेरणा देनी होती है और विश्व के अन्य समाजों के पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान राशि की भी जानकारी इस प्रकार देनी पड़ती है कि वह अपने समाज के लिए समृद्धि कारक तो बने लेकिन उसके दुष्प्रभावों से आत्मरक्षा की विधियां भी सोची जा सकें।
भारतीय शिक्षा का लक्ष्य भी शिक्षा के इन्हीं उद्देश्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में अर्जित करना होना चाहिए।
ब्रिटिश शिक्षा के ढांचे का लक्ष्य भारत की नई पीढ़ी को यूरोपीय ज्ञान राशि की जानकारी इस प्रकार से देना था कि यूरोपीय समाज के लिए समृद्धि कारक एक उपकरण भारत की नई पीढ़ी बन सके।।
दुर्भाग्यवश हमारे यहां आज भी शिक्षा की विभिन्न शाखाओं में मुख्यतः यूरोपीय ज्ञान परंपरा की ही रक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था है और आज भी दर्शन, राजनीति शास्त्र, साहित्य, कला, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में यूरोपीय मतों को ही सार्वभौम चिंतन की तरह पढ़ाया जाता है ।यह अत्यंत कष्टप्रद स्थिति है। आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था की दीर्घकालिक नीति बनाई जाए जिसमें समाज की विभिन्न संस्थाएं उस जिम्मेदारी को निभाने का भार स्वीकार करें।
सबसे पहले समाज में आत्म गौरव तथा दायित्व की भावनाएं जगनी आवश्यक है ताकि भारतीय शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहिका बन सके और माध्यम बन सके।।
वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य है। पूरे विश्व के ज्ञान विज्ञान की जानकारी भारतीय लक्ष्यों की सेवा और पोषण के लिए आवश्यक और उपयोगी है लेकिन भारत की शिक्षा विदेशी ज्ञान की सेवा के लिए नहीं होनी चाहिए।
वर्तमान भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 यह कहता है कि राज्य की निधि से पूर्ण पोषित अर्थात शासन द्वारा पूर्व वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी । परंतु यह बात ऐसी शिक्षा संस्था में लागू नहीं होगी जिसका प्रशासन भारत शासन या कोई राज्य का शासन करता है और जो किसी ऐसे न्यास या विन्यास के अधीन स्थापित है जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है।
परंतु अनुच्छेद 29 कहता है कि अल्पसंख्यकों को राज्य द्वारा पोषित और राज्य से सहायता पाने वाले किसी भी शिक्षा संस्था में अपने मजहब या रिलीजन की शिक्षा देने का अधिकार है और अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को ऐसी शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और उनका प्रशासन करने का भी अधिकार है ।।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का प्रावधान अनुच्छेद 29 और 30 के द्वारा बाधित कर दिया गया है और अनुच्छेद 28 केवल हिंदुओं के लिए लागू होता है अर्थात शासन द्वारा वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में हिंदू धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती, यह अनुच्छेद 28 का प्रावधान सिद्ध होता है और शासन द्वारा वित्त पोषित मुसलमानों ईसाइयों आदि अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाओं में इस्लाम या ईसाइयत आदि की शिक्षा खुल कर दी जा सकती हैं ,यह अनुच्छेद 29 व 30 का प्रावधान है । इस प्रकार अनुच्छेद 28, 29 और 30 स्पष्ट रूप से हिंदू समाज और हिंदू धर्म के विरुद्ध तथा इस्लाम ईसाइयत आदि अल्पसंख्यकों के पक्ष में भारत के शासन और प्रान्तों के शासन का पक्षपात दिखाता है ।
यह भारत के संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है और भारत जैसे उदार लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए यह शोभा जनक नहीं है ।
बहुसंख्यकों के साथ ऐसा अन्याय संसार के किसी भी लोकतंत्र में नहीं होता ।
ऐसा अन्याय केवल सोवियत संघ और चीनी कम्युनिस्ट सरकारों में हुआ था। रूस में अब समाप्त हो गया है।
इसलिए भारत सरकार को विश्व के अन्य सभी स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्रों के अनुरूप ही भारत की शिक्षा में भारत के बहुसंख्यकों के धर्म की शिक्षा अनिवार्य करनी चाहिए जैसा कि इंग्लैंड फ्रांस जर्मनी पोलैंड स्वीडन स्वीटजरलैंड पुर्तगाल स्पेन संयुक्त राज्य अमेरिका आदि सर्वत्र है ।।
भारत को अपवाद बनाने का निर्णय क्यों लिया गया इसके विस्तार में न जाकर ,अब इस अपवाद स्थिति को समाप्त करके भारत को भी विश्व के अन्य लोकतांत्रिक राष्ट्रों का अनुसरण करने वाला होना चाहिए ।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का विरोध होना चाहिए और साथ ही अनुच्छेद 29 और 30 का विरोध होना चाहिए।।
सही उपाय तो यह है कि शिक्षा के संबंध में एक स्पष्ट दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए जो कि संविधान में अभी तक नहीं है।।
संविधान में शिक्षा से संबंधित स्पष्ट प्रावधान केवल अल्पसंख्यकों के लिए हैं और हिंदू समाज के लिए केवल इतना प्रावधान है कि वह अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकता ।अन्य प्रावधान नहीं है।
जबकि शिक्षा का मूल प्रावधान तो अपने राष्ट्र की ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में प्रवाहित करना और पुष्ट करनाहै, नई पीढ़ी को उस ज्ञान परंपरामें दक्ष बनाना है। इसलिए शिक्षा संबंधी एक अलग क्लाज जोड़ा जाए जिसमें यह स्पष्ट लिखा जाए कि शिक्षा संसार भर में हर राष्ट्र की अपनी ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में देने के लिए होती है और वह प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र का कर्तव्य है।इसलिए भारत भी भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ाने वाली शिक्षा प्रदान करेगा तथा साथ ही विश्व की ज्ञान परंपरा का राष्ट्र के अनुकूल समायोजन करेगा ।
अनुच्छेद 29 और 30 संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार के लिए हैं। अच्छा तो यह होगा कि अनुच्छेद 29 में सर्वप्रथम एक उपबंध जोड़ दिया जाए कि बहुसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण और उसमें बहुसंख्यक वर्ग की ज्ञान परंपरा और शिक्षा परंपरा का संरक्षण राज्य का कर्तव्य घोषित हो अथवा अनुच्छेद 28 में ही जोड़ दिया जाए कि भारत की ज्ञान परंपरा का पोषण भारत के शासन का कर्तव्य है और प्रत्येक राज्य की सरकार का यह कर्तव्य होगा । तदनुसार आगे के प्रावधान किए जा सकते हैं ।।
पहले तो शासन में यह संकल्प होना आवश्यक है कि वह भारत की ज्ञान परंपरा को मान्यता देता है और उसके संरक्षण के लिए वचनबद्ध है।
भारत का शासन आज तक भारतीय ज्ञान परंपरा नामक किसी भी चीज का कोई संवैधानिक संज्ञान नहीं लेता।वह यह मानकर चलता है कि वे अतीत की वस्तुएं हैंऔऱ वर्तमान में दर्शन राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र अर्थशास्त्र आदि सभी humanities के विषयों में एकमात्र ज्ञान वह हैं जो यूरोपीय ज्ञान परंपरा है ।
यह इतनी बड़ी चीज है कि संसद में विचार होना चाहिए और यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ऐसा करते ही भारत का शासन ज्ञान की दृष्टि से यूरोपीय शासन की एक छोटी और अनुकरणरत शाखा हो जाता है , जिसके पास अपना कोई स्वतंत्र विवेक नहीं है और जो कोई स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ है।
यह भारत के संविधान के विरुद्ध है।भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य है और इसलिए शिक्षा और ज्ञान के विषय में भी भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होना चाहिए ।उसे इंग्लैंड के ज्ञान तंत्र का अथवा यूरोपीय और अमेरिकी ज्ञान तंत्र का एक विनम्र सेवक नहीं रहना चाहिए।
यह स्थिति भारत राष्ट्र के लिए अत्यंत लज्जाजनक है और वर्तमान आत्म गौरव संपन्न शासन को भारत के लोगों को इससे मुक्त करके उसे स्वाभिमान संपन्न बनाने की पहल शिक्षा के क्षेत्र में भी करनी चाहिए साभार आदरणीय श्री रामेश्वर मिश्र पंकज

शुक्रवार, 17 जून 2022

तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर #रामप्पामंदिर तेलंगाना)

 








तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर
(#रामप्पा_मंदिर,तेलंगाना)
भारत वर्ष के हिन्दू मंदिर की भव्यता देखो।
मन्दिर का हर एक चित्र ध्यान से देखिए आपको इसकी भव्यता साफ साफ दिखाई देगी
इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक #Diamond_electron_machine ही काट सकती है वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से
अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है
यहां पर एक नृत्यांगना की मूर्ति भी है जिसने हाई हील पहनी हुई है
सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है
मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई
मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और जिसकी ऊंचाई नौ फीट है,उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है।
पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है
पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है
यह सब आज के समय में करना असंभव है इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास मशीनरी नहीं थी?
उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी
यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थी जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है
#मंदिर_शिव_को_समर्पित है
मंदिर का नाम इसके शिल्पी के नाम पर रखा हुआ है क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुए और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया।
यह मंदिर भीषण आपदाओं को झेलने के बाद भी आज तक सुरक्षित है।छह फीट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर बने इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे हुए हैं। । यह रामायण और महाभारत के दृश्य एक ही पत्थर पर उकेरे गए है, वह भी छीनी हथोड़े से, आप बनाते समय की कल्पना कीजिये,एक हथौड़ा गलत पड़ा, और महीनों-वर्षों का श्रम नष्ट ....
आज तक इस मंदिर में कोई क्षति नही हुई है, मंदिर के न टूटने की बात जब पुरातत्व विज्ञानियों को पता चली, तो उन्होंने मंदिर की जांच की। पुरातत्व विज्ञानी अपनी जांच के दौरान काफी प्रयत्नों के बाद भी मंदिर के इस रहस्य का पता लगाने में सफल नहीं हुए।
बाद में जब पुरातत्व विज्ञानियों ने मंदिर के पत्थर को काटा, तब पता चला कि यह पत्थर वजन में काफी हल्के हैं। उन्होंने पत्थर के टुकड़े को पानी में डाला, तब वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा। पानी में तैरते पत्थर को देखकर मंदिर के रहस्य पता चला।
सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस मंदिर में जो पत्थर मिले है, वह पत्थर विश्व के किसी कोने में नही मिले है, यह पत्थर कहाँ से लाये गए, आज तक इसका पता नही चल पाया है ।।
एक निवेदन -- हम सबको मिलकर हमारे भारत की इन अमूल्य धरोहरों का प्रचार जन-जन तक करना चाहिए, इसका इतना प्रचार हो, की पूरे संसार की की दृष्टि इन पर पड़े और वह भारत की महान संस्कृति पर गर्व करें।

 

सोमवार, 13 जून 2022

किडनी में स्टोन केल्सियम से एक भ्रांति

  




एक हैं मलिक साहब। हमारे साथ पढ़ते थे पंतनगर विश्वविद्यालय में। अविभाजित उत्तर प्रदेश के सबसे खूबसूरत शहर से थे, जहाँ कालान्तर में हमने अपनी ज़िन्दगी के 8 साल 8 महीने और 18 दिन बड़ी शान से गुजारे। जी हाँ, दून वैली। पहाड़ों की रानी मसूरी से मात्र 35 किलोमीटर दूर।
उनकी बस एक ही समस्या थी। भाई पथरी हो गी रे।
अरे मलिक साहब कैसे हो गई?
भाई वो देहरादून का पाणी है ना, बोहोत हार्ड है, ससुरे में कैल्शियम बोहोत है। जिब पाणी मै कैल्शियम जादै हो तो पथरी हो जा।
कम-ओ-बेश यही ख़यालात ज्यादातर लोगों के होते हैं। तो ऐसी ग़लतफ़हमी पाले सभी भाई-बहन आज ही यह ग़लतफ़हमी दिमाग से निकाल दें कि पानी के कैल्शियम का आपके किड़नी में बनने वाली पथरी से कोई सम्बन्ध है।
कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर ऐसा होता तो सारे गढ़वालियों और कुमाउनियों और हिमाचलियों और कश्मीरियों को गुर्दे की पथरी हो चुकी होती। ऐसा है क्या?
नहीं है।
वास्तव में पानी का कैल्शियम इसके लिए जिम्मेदार है ही नहीं। जिम्मेदार हैं आप स्वयं। जो पानी पीते ही नहीं। अगर आप दिन में 10 गिलास अर्थात साढ़े तीन लीटर से कम पानी पीयेंगे तो आपको प्रसाद में पत्थर ही मिलेंगे। फिर घूमते रहना किडनी हॉस्पिटल के चक्कर काटते।
किडनी स्टोन के लिए मूलतः जिम्मेदार है पानी का कम पीया जाना। सोने में सुहागा तब हो जाता है जब आप प्रोटीन खाते हैं ज्यादा और पानी पीते हैं कम। तो यूरिक एसिड बनता है खूब और पानी ना पीने के कारण बाहर वह निकल नहीं पाता और निर्माण करता है किडनी स्टोन का।
किडनी में यूरिक एसिड की मात्रा ज्यादा होने से किडनी के वातावरण की पीएच हो जाती है कम और पीएच कम होते ही किडनी स्टोन बनने लगते हैं।
अब बात करते हैं दूसरे सगूफ़े की।
डॉक्टर के पास जाओ, हर दूसरे तीसरे मरीज को बोलेगा कि खून में कैल्शियम और विटामिन डी की जाँच कराओ और ज्यादातर लैब रिपोर्ट में कैल्शियम और विटामिन डी बताया जाता है कि कम है।
अब डॉक्टर लिख देता है कि कैल्शियम की गोली खाओ और विटामिन डी के कैप्सूल खाओ या ज्यादातर केस में कहता है कि विटामिन डी का टीका लगवाओ। और बस खेल चालू।
कैल्शियम की गोली खिलवाने लगता है और जोर देता है कि विटामिन डी का टीका लिया जाए। सात हज़ार रूपये का आता है। खुले बाजार में भी नहीं बिकता। कुछ खास कंपनियों के रिप्रेजेंटेटिव से ही खरीदना पड़ता है। बस डॉ साहब के मोबाइल की क़िस्त का तो इंतज़ाम हो गया। अब साल भर तक क़िस्त आप भरना डॉ साहब के मोबाइल की।
फिर साल भर बाद किडनी हस्पताल के डॉक्टर की नई गाड़ी की क़िस्त आप ही भरेंगे। उस पट्ठे ने अपना भी जुगाड़ कर लिया और अपने दोस्त का भी।
एक दिन में 800 इंटरनेशनल यूनिट विटामिन डी और 800 से 1200 मिलीग्राम कैल्शियम से ज्यादा खाओगे तो मोबाइल और गाड़ी दोनों की क़िस्तें आप ही भरेंगे।
कितने डॉक्टर हैं जो कैल्शियम और विटामिन डी चालू करने के बाद समय समय पर इन दोनों की आपके खून में जाँच करवाते हैं?
अगर कोई भला डॉक्टर करने की सिफारिश करता भी है तो आप सुपर डॉक्टर बन जाते हैं और सोचते हैं कि अभी तो जाँच करवाई थी। बार बार क्या करवाना!! ये डॉक्टर तो जाँच वाचं लिखते ही रहते हैं।
अरे भाई अगर खून में कैल्सियम का स्तर बढ़ गया तो किडनी स्टोन हो जायेगा। चलो कोई बात नहीं। तुड़वा लेना पत्थर......डॉक्टर से। डॉक्टर को भी जीने का अधिकार है कि नहीं!!!!
इसके अलावा दो हॉर्मोन और हैं। एक है कैल्सीटोनिन और दूसरा है पैराथाइरॉइड हॉर्मोन। इन दोनों में से कोई भी रूठ जाये तो बस खामियाज़ा आपको भुगतना पड़ता है। इन दोनों का काम है ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम के संतुलन को बनाए रखना।
जैसे ही खून में आयोनाइज़्ड कैल्शियम का स्तर एक निश्चित बिंदु से ऊपर जाता है तो थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन आकर उसे नार्मल कर देता है और अगर यह स्तर नीचे गिर जाए तो पैराथाइरॉइड ग्रंथि से पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आकर इसे बढ़ा देता है।
अगर थाइरोइड ग्रंथि या पैराथाइरॉइड ग्रंथि ठीक से काम ना कर रही हों तो आप समझ सकते है कि कैल्सीटोनिन और पैराथाइरॉइड हॉर्मोन की उपलब्धता प्रभावित होगी जो फाइनली किड़नी स्टोन को जन्म दे सकती है।
आप सोच रहे होंगे कि पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कोई जादुगर है। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम कम हुआ तो ये पैराथाइरॉइड हॉर्मोन जादू की छड़ी घुमाएगा और कैल्शियम पैदा।
नहीं ऐसा नहीं है। है वैसे जादू ही, भगवान् का जादू।
कैसे?
यह पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आँतों से कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ा देता है। बहुत लंबी प्रक्रिया है इसकी। किसी और पोस्ट में बताऊंगा। आप बस अभी इतना समझ लो कि अगर थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन ना आये तो ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम का स्तर खतरनाक तऱीके से बढ़ जाता है। जो किड़नी स्टोन को जन्म देता है।
और अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि से ज्यादा पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आ जाये तो?
तो भी वही होगा। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम बढ़ जायेगा। जो किड़नी स्टोन को जन्म देगा।
पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कब ज्यादा आएगा?
अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि किसी ट्यूमर आदि की वजह से हायपरएक्टिव हो गई है तो पैराथाइरॉइड हॉर्मोन का उत्पादन ज्यादा होगा।
कैल्शियम मेटाबोलिज्म इतना आसान नहीं है बाबु मोशाय!!!!
और हाँ.......आर ओ वार ओ का चक्कर छोड़ो, मस्त होकर पानी पीयो, पानी में कैल्शियम ज्यादा हो या कम। टेंशन नक्को। हार्ड वाटर से पथरी नहीं होगी। होगी तो वाटर ना पीने से। बस रंगीन् पानी से बचो। रंगीन पानी बोले तो वही पोंटी चड्ढा और विजय माल्या वाला। किड़नी स्टोन हो ही जाये तो मुझसे संपर्क कर लेना।    

रविवार, 12 जून 2022

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल: ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त व ब्रह्मगुप्त_प्रमेय

 


देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
देखते हैं -
*"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।*
*यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"*
बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है !
इसका अर्थ है -
यदि वर्ग की भुजा 2a हो
तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
ये क्या है ?
अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है
शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है ,
इस श्लोक का उल्लेख किया है -
*परे पूर्णमिति।*
*उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।*
*तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।*
*तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।*
*तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।*
शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किये हुए भारतीय छात्र ने इसका नाम भी सुना हो , जबकि यह "मेरु प्रस्तार" है।
परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से "पास्कल त्रिभुज" के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीयों को शर्म इस बात पर आने लगी कि भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते।

*"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।*
*अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"*
ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता है लेकिन ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है। जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता है।
उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो कुछ इस तरह होगा-
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६
*ऋगवेद में π का मान ३२ अंक तक शुद्ध है।*
*गोपीभाग्य मधुव्रातः श्रुंगशोदधि संधिगः |*
*खलजीवितखाताव गलहाला रसंधरः ||*
इस श्लोक को डीकोड करने पर ३२ अंको तक π का मान 3.1415926535897932384626433832792… आता है।

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल:
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-
*स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।*
*भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥*
अर्थ:
त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है।

ब्रह्मगुप्त_प्रमेय:
चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।
ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-
*त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।*
*ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥*
(ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)

वर्ग_समीकरण का व्यापक सूत्र:
ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है-
*वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।*
*मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥*
ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44
अर्थात :
व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें।
पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें।
प्राप्त संख्या ही अज्ञात "त्र" राशि का मान है।
श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —
*चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।*
*अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥* -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221
अर्थात :-
प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।☺

आर्यभट्ट की ज्या (Sine) सारणी:
आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:
*मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।*
*घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥*
माधव की ज्या सारणी:
निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित *'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स'* नामक पुस्तक से लिया गया है।
*श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।*
*तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।*
*धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।*
*म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।*
*मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।*
*अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।*
*तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।*
*शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।*
*छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।*
*रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखोe बली।।*
*धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।*
*कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।*
*तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।*
*स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।*
(२.९.५)

संख्या_रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)
*"एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव।"*
Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25)

जिसका अर्थ है-
1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.


ये तो कुछ नमूना हैं , जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है बल्कि तमाम विज्ञान भरा पड़ा है।
दुर्भाग्य से कालांतर में व विदेशी आक्रांताओं के चलते संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का भावी पीढ़ी द्वारा विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए ।
*वन्दे संस्कृत मातरम्*

शनिवार, 4 जून 2022

कोलेस्ट्रोल महाघोटाले मे अमेरिकी डाक्टरों, वैज्ञानिकों और ड्रग कंपनियों के गठजोड़ ने 1.5 खरब डालर डकार लिए।

 




 कोलेस्ट्रोल सिर्फ कोलेस्ट्रोल है और यह अच्छा या बुरा नहीं होता
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चालीस साल से कोलेस्ट्रोल के नाम पर दुनिया को धोखा दिया जा रहा था। अमेरिकी डाक्टरों, वैज्ञानिकों और ड्रग कंपनियों के गठजोड़ ने 1970 से अब तक कोलेस्ट्रोल कम करने की दवाएं बेच-बेच कर 1.5 खरब डालर डकार लिए।

बेहिचक इसे कोलेस्ट्रोल महाघोटाला कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं। पेथलेबों में इसकी जांच का धंधा भी खूब चमका। डाक्टरों और ड्रगिस्ट की भी चांदी हुई। पता नहीं अनेक लोगों ने कोलेस्ट्रोल फोबिया के कारण ही दम तोड़ दिया होगा। कोलेस्ट्रोल घटाने वाली दवाओं के दुष्प्रभाव से ना मालूम कितने लोगों के शरीर में नई-नई विकृतियों ने जन्म लिया होगा। 

बहरहाल अब अमेरिकी चिकित्सा विभाग ने पलटी मार ली है। कोलेस्ट्रोल के कारण जिन खाद्य वस्तुओं को निषेध सूची में डाला गया था, उन्हें हटा लिया है। अब कहा जा रहा है कि कोलेस्ट्रोल सिर्फ कोलेस्ट्रोल है और यह अच्छा या बुरा नहीं होता। यह मानव शरीर के लिए आवश्यक है। नर्व सेल की कार्यप्रणाली और स्टेराइड हार्मोन के निर्माण जैसी गतिविधियों में इसकी जरूरत होती है। हम जो भोजन लेते हैं उससे मात्र 15-20 फीसद कोलेस्ट्रोल की आपूर्ति होती है। जबकि हमें प्रतिदिन 950 मिलीग्राम की जरूरत होती है। शेष कोलेस्ट्रोल हमारे लिवर को बनाना पड़ता है। अगर हम कोलेस्ट्रोल वाला खाना नहीं खाएंगे, तो जाहिर है लिवर को ज्यादा मशक्कत करना पड़ेगी। जिनके शरीर में कोलेस्ट्रोल ज्यादा होता है, तो यह समझिए कि उनका लिवर ठीक ठाक काम कर रहा है। कोलेस्ट्रोल के नाम पर डाक्टर लोगों को नट्स, घी, मक्खन,आदि न खाने या कम खाने की सलाह देते रहे। असली घी को दुश्मन और घानी के तेलों को महादुश्मन बता कर रिफाइंड तेलों का कारोबार चमकाते रहे। अब तो रिफाइंड तेलों की पोल भी खुल चुकी है।

जबकि ये सब हमारे लिए आवश्यक हैं। यह थ्योरी भी दम तोड़ चूकी है कि कोलेस्ट्रोल धमनियों में जम जाता है, जिसके कारण ब्लाकेज होते हैं और दिल का दौरा पड़ता है। असल में ब्लाकेज का कारण केल्सीफिकेशन है। यही केल्सीफिकेशन गुर्दों और गाल ब्लडर में पथरी का कारण भी बनता है। अमेरिकी हार्ट स्पेशलिस्ट डा. स्टीवन निसेन के अनुसार चार दशकों से हम गलत मार्ग पर चल रहे थे। डा. चेरिस मास्टरजान के अनुसार अगर हम कोलेस्ट्रोल वाला आहार नहीं लेते तो शरीर को इसका निर्माण करना पड़ता है।
एलोपैथी में थ्योरियां बार-बार बदलती हैं। जबकि हमारा आयुर्वेद हजारों साल से वात, पित्त और कफ के संतुलन को निरोगी काया का परिचायक मानता आ रहा है। इनका शरीर में असंतुलन ही रोगों को जन्म देता है। आयुर्वैद सिर्फ चिकित्सा प्रणाली नहीं सम्पूर्ण जीवनशैली सिखाता है। होमियोपैथी भी लाइक क्योर लाइक के सिद्धांत पर टिकी है। आज अधिकांश बीमारियों का कारण है गलत जीवन शैली और फास्टफुड जैसा आहार। अगर जीवनशैली में सुधार कर लिया जाए, प्रकृति से नजदीकियां कायम रखी जाएं और योग प्राणायाम का सहारा लिया जाए तो रोगों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा....
DR PARDEEP


बुधवार, 18 मई 2022

IIT के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कम्पनिया भारत की बौद्धिक सम्पदाओं पर खुलेआम डाका

 


वो शिक्षा डिग्री ज्ञान बल प्रतिभा अनुभव पैसा पद प्रतिष्ठा किस काम का जो देश के कुछ काम न आ सके , सम्मानीय प्रतिभा वो है जो देश के उत्थान में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग करे । आई आई टी सच्चाई भारत केआई आई टी उच्च शिक्षण संस्थानों पर विश्व के अमीर देश एवम् उनकी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया भारत की बौद्धिक सम्पदाओं पर डाका खुलेआम डाल रही है । अमेरिका की सकल आय का 35% और यूरोपीय यूनियन की सकल आय का 39 % हिस्सा बौद्धिक सम्पदा अधिकारो पर ही आधारित है इसमें सबसे बड़ा योगदान उन भारतीय वैज्ञानिक इंजीनियरों का है जो पढ़ते भारत में है लेकिन अविष्कारों , नावचारो (इन्वेंशन इनोवेशन ) अमेरिका यूरोप जैसे विकसित अमीर देशो के लिए करते है भारत का गरीब किसान मजदूर रात दिन मेहनत करता है जब वो एक माचिस की डिबिया या नमक भी खरीदता है तो उस पर टैक्स देता है इसी टैक्स में से कुछ पैसा आई आई टी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों को सब्सिडी के नाम पर जाता है परंतु यहाँ से निकलने वाला विधार्थी देश को क्या देता है आइये उसकी समीक्षा करते है । आई आई टी कुल सीटे प्रतिवर्ष - 9885 छात्र चार वर्ष में 4 x 9885 = 39540 छात्र प्रतिवर्ष छात्र पर पढ़ाई का कुल खर्च - 3.4 लाख रूपये छात्र द्वारा प्रतिवर्ष देय राशि - 90000 रूपये प्रतिवर्ष भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि - 2.5 लाख रूपये (भारतीय कर दाता की मेहनत की कमाई ) प्रतिवर्ष सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि 39540 छात्र x 2.5 लाख रूपये = 988 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष वित्तीय वर्ष 2015 -2016 में भारत सरकार ने आई आई टी को बजट स्वीकृत किया है -1703.85 करोड़ रूपये सभी विधार्थी भारत के राष्ट्रिय बैंको से 20 लाख से ज्यादा लोन लेते है वो भी कोलैटरल फ्री लोन । Economic Times shows that out of the remittances of $70 billion to India, the remittancess from IITians who go to developed countries is much lower than the remittancess from the Middle East to the state of Kerla . Most of the Malayalis in the Gulf are blue- coller workers, Not IIT enginneers . इतना सब करने के बाद कंप्यूटर साइंस ,इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स , मेकेनिकल , मेटलर्जिकल केमिकल प्रोडक्शन इत्यादि क्षेत्र के 98885 विश्वस्तरीय इंजिनियर निकलते है लेकिन भारत को क्या मिला ..? आई आई टी का कड़वा सत्य इतने अनुदान के बावजूद 20 वर्षो में (1986-2006) एक भी आई आई टी के छात्र ने भारतीय सेना को सेवा देना उचित नहीं समझ । अंतरिक्ष में स्वावलम्बन स्वदेशी तकनिकी के बल पर तिरंगा लहराने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र इसरो में आई आई टी व एन आई टी के 2% छात्र भी कार्यरत नहीं है । आई टी के 9885 छात्रो में से केवल 20 छात्र 2013 में भारतीय रक्षा अनुसंधान डी आर डी ओ में कार्यरत हुए । भारतीय अनुसंधान डीआरडीओ में 2700 वैज्ञानिको की कमी है । दूसरी तरफ आई आई टी के छात्र फिलिप कार्ट ऑनलाइन मेगा स्टोर चला रहे है । आई आई टी मद्रास से 7 छात्रो को फ्लिपकार्ट ने नौकरी पर रखा है आन लाइन मार्केटिंग हेतू आइये देखते है उनकी योग्यता क्या है ? फ्लिपकार्ट 1छात्र कम्प्यूटर साइंस 2 छात्र केमिकल इंजीनियरिंग 1 छात्र मेकेनिकल इंजिनयरिंग 1 छात्र मेटलर्जि , 1 छात्र बायोटेक्नोलॉजी 1 छात्र इंजिनयरिंग फिजिक्स । Tavant आई टी सोलुशन सर्विस कम्पनी आई आई टी मद्रास के 10 छात्रो को नौकरी पर रखा जिसमे एक भी कम्प्यूटर साइंस नहीं था । 3 छात्र एरोस्पेस , 2 छात्र मेटलर्जी ,1 छात्र इलेक्ट्रिकल ,2 छात्र केमिकल , 1 छात्र मेकेनिकल ,1 छात्र फिजिक्स आंकड़े आई आई टी मद्रास के है 118 छात्र 2014 में फ्लिपकार्ड कम्पनी में कार्यरत हुए 36 छात्र तो केवल आई आई टी खडगपुर से है जो फ्लिप कार्ड में कार्यरत है । इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स , मेकेनिकल , मेटलर्जिकल केमिकल इत्यादि क्षेत्र के 98885 विश्वस्तरीय इंजिनियर आई आई टी से निकलते है लेकिन दुर्भाग्य देखिये उनमे से कुछ विदेशी कम्पनियो की क्रीम पाउडर लिपस्टिक बेच रहे है और बाकी डॉलर कमाने अमीर विकसित देशो की ओर पलायन कर जाते है और भारत में अपने माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते है । अमेरिका में वैज्ञानिक और इंजिनियर भेजने वाले देशो में भारत शीर्ष पर है । नेशनल साइंस फाउंडेशन के नेशनल सेंटर फॉर साइंस एन्ड इंजीनियरिंग इस्टैटिक्स की रिपोर्ट के अनुशार 2003 से 2013 आते आते 85 फीसदी का इजाफा हुवा है । एशिया से अमरिका 29.6 लाख वैज्ञानिक इंजिनियर गए है ।इसमें से 9.5 लोग अकेले भारतीय है । भारत का प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन ) आज हमारे देश के अन्दर जितने बेहतरीन तकनीकी संस्थान हैं, जैसे आई आई टी आई आई एम, एम्स आदि, उनमे से जितने अच्छे प्रतिभा हैं वो सब अमेरिका भाग जाते हैं। हर वो अच्छी प्रतिभा जो कुछ कर सकता है इस देश में रहकर अपने राष्ट्र के लिए, अपने समाज के लिए, वो भारत से अमीर विकसित देशो में भाग जाता है उसके पीछे का कारण है इन संस्थानों में पढने वाले विद्यार्थियों का दिमाग ऐसा सेट कर दिया जाता है कि वो केवल अमेरिका/युरोप की तरफ देखता है ।उनके लिए पहले से एक माहौल बना दिया जाता है, और माहौल क्या बनाया जाता है कि जो प्रोफ़ेसर उनको पढ़ाते हैं वहां वो दिन रात एक ही बात उनके दिमाग में डालते रहते हैं कि "बोलो अमेरिका में कहाँ जाना है" तो वो विद्यार्थी जब पढ़ के तैयार होता है तो उसका एक ही मिशन होता है कि "चलो अमेरिका" | IITs मे जो सिलेबस पढाया जाता है वो विकसित अमीर देशो के हिसाब से तैयार होता है बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के हिसाब से तैयार किया जाता है । कभी ये देश के अंदर इस्तेमाल की कोशिश करें तो 10% से 20% ही इस देश के काम का होगा बाकी 80% अमेरिका/युरोप के हिसाब से होगा । इसी को तकनीकी भाषा में आप ब्रेन ड्रेन प्रतिभा पलायन कहते है, मैं उसे भारत की तकनीकी का सत्यानाश मानता हूँ, क्योंकि ये सबसे अच्छा दिमाग हमारे देश में नहीं टिकेगा तब तो हमारी तकनीकी इसी तरह हमेशा पीछे रहती जाएगी । आप सीधे समझिये न कि जो विद्यार्थी पढ़कर तैयार हुआ, वही विद्यार्थी अगर भारत में रुके तो क्या-क्या नहीं करेगा अपने दिमाग का इस्तेमाल कर के, लेकिन वो दिमाग अगर यहाँ नहीं रुकेगा, अमेरिका चला जायेगा तो वो जो कुछ करेगा, अमेरिका के लिए करेगा, अमरीकी सरकार के लिए करेगा और हम बेवकूफों की तरह क्या मान के बैठे जाते हैं कि "देखो डॉलर तो आ रहा है", अरे डॉलर जितना आता है उससे ज्यादा तो नुकसान हो जाता है । वर्तमान समय में जो डॉलर विदेशो से आ रहा है उसमे सबसे बड़ा योगदान उन लोगो का है जो 10 ,12 वी पास उन भारतीयो का है जो रात दिन मेहनत मजदूरी करके विदेशो से डॉलर भारत भेज रहे है । आप बताइए कि इससे खुबसूरत दुष्चक्र क्या होगा कि आपका दुश्मन आपको ही पीट रहा है आपकी ही गोटी से | कभी भी कोई भी विकसित अमीर देश भारत जैसे विकासशील देशो में तकनीकी को विकसित नहीं होने देना चाहता । इस देश के वैज्ञानिक यहाँ रुक जायेंगे, इंजिनियर यहाँ रुक जायेंगे, डॉक्टर यहाँ रुकेंगे, मैनेजर यहाँ रुकेंगे तो भारत में रुक कर कोई ना कोई बड़ा काम करेंगे अमीर देशो की दूकान बन्द हो जायेगी दूसरी तरफ हम फंडामेंटल रिसर्च मे बहुत पीछे चले जाते हैं, जब तक हमारे देश मे बेसिक रिसर्च नहीं होगी तो हम अप्लाइड फील्ड मे कुछ नहीं कर सकते हैं, सिवाए दूसरो के नकल करने के । मतलब हमारा नुकसान ही नुकसान और अमीर विकसित देश अमेरिका और युरोप का फायदा ही फायदा । सबसे बड़ी बात क्या है, हमारे देश मे सबसे बड़ा स्किल्ड मैंन पावर है चीन के बाद, हमारे पास 65 हज़ार वैज्ञानिक हैं, दुनिया के सबसे ज़्यादा इंजिनियरिंग कॉलेज हमारे देश मे हैं, अमेरिका से 4-5 गुना ज़्यादा इंजिनियरिंग कॉलेज हैं भारत मे, अमेरिका से ज़्यादा हाई-टेक रिसर्च इन्स्टिट्यूट हैं भारत मे, अमेरिका से ज़्यादा मेडिकल कॉलेज हैं भारत मे, हमारे यहाँ पॉलिटेक्निक, ITI की संख्या ज़्यादा है, नॅशनल लॅबोरेटरीस 44 से ज़्यादा हैं जो CSIR के कंट्रोल मे हैं, इतना सब होते हुए भी हम क्यों पीछे हैं ? आज लाखो रूपये में एक इंजिनियर तैयार किया जाता है इस उम्मीद में कि समय आने पर वो राष्ट्र के काम में लगेगा, देश के काम में लगेगा, राष्ट्र को सहारा देगा, वो अचानक भाग कर विदेश चला जाता है। समाधान 1.अमेरिका ने और युरोप के देशों ने अपने यहाँ के ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को रोकने के लिए तमाम तरह के नियम बनाए हैं और उनके यहाँ अलग अलग देशों में अलग अलग कानून हैं कि कैसे अपने देश की प्रतिभाओं को बाहर जाने से रोका जाये । उधर अमेरिका और यूरोप के अधिकांश देशों में ये परंपरा है कि आपको कमाने के लिए अगर विदेश जाना है तो फ़ौज की सर्विस करनी पड़ेगी, सीधा सा मतलब ये है कि आपको बाहर नहीं जाना है और उन्ही देशो में ये गोल्डेन रुल है कि अगर उनके यहाँ बहुतायत में ऐसे लोग होंगे तो ही उनको बाहर जाने देने के लिए अनुमति के बारे में सोचा जायेगा । 2. जब आई आई टी से निकल कर ये छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के बांड शाइन कर सकते है तो भारत सरकार से क्यों नहीं । उच्च शिक्षण संस्थानों में सब्सिडी उन्ही छात्रो को मिले जो देश में रह कर सेवा देने को तत्पर तैयार हो । 3. भारत के बैंक एजुकेशन लोन छात्रो को सशर्त प्रदान करे जो छात्र भारत में रह कर कार्य करे उन्हें लोन की अदायगी में छूट प्रदान करे । 4. आई आई टी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों का पाठ्यक्रम बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के सुविधा के अनुशार न बने बल्कि पाठ्यक्रम भारत का कल्चर एग्रीकल्चर को आधार मानकर उसमे नैनोटेक्नोलॉजी को केंद्र में रखा जाए ऐसी तकनकी इन संस्थानों से निकले जिससे गावँ को स्वावलम्बन मिले गावँ से शहर की ओर होने वाला पलायन रुके छोटे छोटे संयंत्र बने जिसको कम पूंजी लागत से सरलता और सफलता के साथ संचालित हो । भारत सरकार आज अभियान चला रही है मेक इन इण्डिया भारत के प्रधानमंत्री वित्तमंत्री विदेशी पूंजी निवेश को लेकर बड़े चिंतित है यदि देश के सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोग स्वदेशी का चिंतन करे ऐसी नीतिया बनाये जिससे देश से जो प्रतिभा का पलायन हो रहा है वो रुके ।आज देश में पूंजी निवेश नहीं प्रतिभा पलायन को रोकने की आवश्यकता है ब्रेन ड्रेन नहीं रिवर्श ब्रेन की जरूरत है ।आज भारत को मेक इन इण्डिया नहीं डिस्कवर इन इण्डिया की जरूरत है । कहते है किसी भी राष्ट्र की नीव उस राष्ट्र के युवाओ की संकल्प शक्ति होती है परंतु डॉलर की लालच में जो टूट जाए वो संकल्प हो ही नहीं सकता । विधार्थी साथियो के लिए प्रेरणादायक प्रसंग जब रमन ने ठुकराये युवक को चुना प्रसिद्ध वैज्ञानिक भौतिकशाश्त्री सी वि रमन जी को अपने विभाग के लिए योग्य वैज्ञानिक की आवश्यकता थी । उन्होंने अखबारो में विज्ञापन दिया पढ़कर बहुत सारे आवेदन आये रमन जी ने उनमे से कुछ का चयन करके साक्षात्कार के लिए बुलाया । साक्षात्कार हुवा इनमे से एक युवक ऐसा था जिसे रमन जी ने साक्षात्कार में अस्वीकार कर दिया था ।थोड़ी देर बाद जब साक्षात्कार समाप्त हो गया वो युवक कार्यालय के आस पास घूम रहा था रमन जी उससे नाराज होते हुए बोले जब मैंने तुम्हे अस्वीकार कर दिया तुम इस पद के अयोग्य हो गए तुम्हे नौकरी यहाँ नहीं मिलने वाली जाओ अपने घर जाओ । तब उस युवक ने विनम्रता से कहा सर आप नाराज मत हो , मुझे आने जाने का किराया भूल से अधिक दिया गया है इसलिए मै अतरिक्त कराया वापस करने हेतू लिपिक को ढूंढ रहा था । प्रसिद्ध वैज्ञायानिक रमन उसकी बातो को सुनकर विस्मित हुए फिर कुछ सोच कर बोले मैंने तुम्हारा चयन कर लिया है ।तुम चरित्रवान हो ।भौतिक के ज्ञान में तुम जरूर कुछ कमजोर हो जिसे मैं पढ़ाकर दूर कर सकता हूँ परंतु चरित्रवान व्यक्ति पाना कठिन है । वस्तुतः सर्वोच्च पात्रता तो ईमानदारी होती है जो कर्म निष्ठां व समर्पण को जन्म देती है ज्ञान की कमी को अध्धयन से दूर किया जा सकता है परंतु चारित्रिक दुर्बलता संस्थान को हर प्रकार से हानि पहुचाती है । चेहरे का क्या है ये वो तो साथ ही चला जाता है वो तो कर्म ही होता है जो किसी को साधारण नाविक के बेटे को कर्मयोगी कलाम बना देता है और किसी को युवाओ का प्रेरणा पुंज भाई राजीव दीक्षित । है वही सूरमा इस जग में जो अपनी राह बनाता है कोई चलता है पदचिन्हों पर कोई पद चिन्ह बनाता है । हर बड़ा सपना बड़ी हकीकत बनता है अगर सपने को हकीकत करने वालो का संकल्प बड़ा हो जाए । युवा साथियो आओ मिलकर व्यक्ति से व्यक्ति , व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र को जोड़ने वाले भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर स्थापित करे । आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए धन्यवाद् और अच्छा लगे तो इसे अग्रेषित कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये , अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, अपने नाम से डालिये मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये । भारत को मात्र विकसित नहीं विश्वगुरु बनाना है । स्वदेशी से स्वावलम्बी भारत

सोमवार, 16 मई 2022

. कश्यप और कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा पर मनाते हैं पर बुद्ध जयंती की गूंँज में भुलाया गया हजारों साल का पौराणिक महत्व

   



  भगवान विष्णु के कूर्म अवतार रूप में कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है. कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर प्रकट हुए थे. साथ ही समुद्र मंथन के वक्त अपनी पीठ पर मंदरांचल पर्वत को उठाकर रखा था.

कमठ या कूर्म स्वरूप मिस्र के देव

मिस्र में 664-332 ईसा पूर्व खेप्री स्करब देव की मान्यता रही है। यह कमठ के समान पेट वाला माना गया था जिसका वह कवच आयुध भी था। भारतीय कथाओं में भी ऐसे रूप वर्णित है।
किसी भी तरह की रचना, चिंतन और नियमन के साथ साथ स्वरूप के लिए उसके पास मानव मस्तिष्क और मानव जैसी ही मुखाकृति स्वीकारी गई थी। इसे गुबरेला के रूप में भी देखकर पहचान दी जा सकती है।
अनोखी आकृति अभी बर्लिन के मिस्र संग्रहालय में संरक्षित है और देखी जा सकती है...
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Humanoid Khepri Scarab
This rare model of the Egyptian scarab beetle creator god Khepri, with a human head and arms emerging from a scarab’s exoskeleton.
Most likely from the Late Period, ca. 664-332 BC.
Now in the Egyptian Museum of Berlin.
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनु

वेदोंमें कूर्म अवतार             

 - #स_यत्कूर्मो_नाम ! #एतद्वै_रूपं_कृत्वा_प्रजापतिः_प्रजा_असृजत ! (शतपथ ब्राह्मण ७/५/१५ शुक्ल यजुर्वेद)
-"प्रजापति परमेश्वरने कूर्मरूप धारण कर प्रजाकी रचनाकी है ।"  
 #अन्तरतः_कूर्मभूतं_सर्पन्तम् ! #तमब्रवीत् ! #मम_वै_त्वङ्मांसात्_समभुः ! #नेत्यब्रवीत्  ! #पूर्वमेवाहमिहासमिति ! #तत्पुरुषस्य_पुरुषत्वम्  ! #सहस्राक्षः_सहस्रपात् !(तैत्तरीय आरण्यक १/२३ कृष्णयजुर्वेद)  - " कूर्म होकर जल में संचार करते हुए कूर्म से प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा "हे कूर्म ! तुम हमारे त्वक् माँसादि सम्बन्धी रस से उत्पन्न हुए हो " , कूर्म ने कहा " जो तुमने कहा वह सही नहीं है ,मैं तो पहले से ही था अर्थात् कूर्मशरीरमात्र  तुम्हारे त्वक् मांसादि से उत्पन्न हुआ । मैं अनन्त चैतन्यरूप ईश्वर (सनातन विष्णु) तो पहले से ही हूँ । पूर्व में होने से ही ईश्वरका पुरुष नाम हुआ  (आदिपुरुष भगवान् )! वह कुर्मावताधारी भगवान् श्रीहरिः अपना महत्त्व प्रकट करने के लिये विराटरूप धारणकर हजारों सिरों ,आँखों और चरणोंसे युक्त होकर आविर्भूत हुए !"
✍🏻वरुण शिवाय

कश्य॑प जयन्ती
वैशाख मास की पूर्णिमा को कूर्मावतार जयन्ती मनाई जाती है। कूर्म अर्थात् कश्यप ।
ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि, मरीचि के पुत्र हुये कश्यप ।
कश्यप के पुत्र विवस्वान् और विवस्वान् के वैवस्वत मनु हुये।
शतपथब्राह्मण में कूर्म के सम्बन्ध में - स यत्कूर्मो नाम । एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत यदसृजताकरोत्तद्यदकरोत्तस्मात्कूर्मः कश्यपो वै कूर्मस्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति -  ७/५/१/५ |
 ऋग्वेदसंहिता के सूक्त-पाठ को सुनिये जिसमें #कश्यप का स्मरण किया गया है।

♥❥ वैशाख पूर्णिमा माने भगवान् कश्यप की जयन्ती ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क

महर्षि कश्यप जयंती की शुभ कामनाएं । कश्यप ऋषि ;
जब हम सृष्टि विकास की बात करते हैं तो इसका मतलब है जीव, जंतु या मानव की उत्पत्ति से होता है। सभी मूलतः इन्ही ब्रह्मा के कुल के है ।

ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस-पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। मान्यता अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी।

विष्णु पुराण के अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।
अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्९वाज।

परशुराम जी के गुरु ब्रह्मऋषि कश्यप थे। इनको वचन देने वश परशुराम जी रात्रि में महेंद्र पर्वत में सीमित रहते है।

कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। पुराणों अनुसार हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। कश्यप ने बहुत से स्मृति-ग्रंथों की रचना की थी।

कश्यप कथा :
पुराण अनुसार सृष्टि की रचना और विकास के काल में धरती पर सर्वप्रथम भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के निवेदन पर दक्ष प्रजापति ने अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से 66 कन्याएँ पैदा की।

इन कन्याओं में से 13 कन्याएँ ऋषि कश्यप की पत्नियाँ बनीं। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। ऋषि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने जाते हैं।
विष्णु पुराणों अनुसार सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार रहे हैं- वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

श्रीमद्भागवत के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी साठ कन्याओं में से  13 कन्याओं का विवाह ऋषि कश्यप के साथ तथा अन्य कन्याओ के विवाह बाद शेष 4 कन्याओं का विवाह भी कश्यप के साथ ही कर दिया गया।

*कश्यप की 17 पत्नीयाँ : इस प्रकार ऋषि कश्यप की अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सुरसा, तिमि, विनता, कद्रू, पतांगी और यामिनी आदि पत्नियाँ बनीं।

अदिति : पुराणों अनुसार कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्यों को जन्म दिया, जिनमें भगवान नारायण का वामन अवतार भी शामिल था।

माना जाता है कि चाक्षुष मन्वन्तर काल में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों(सूर्य) के रूप में जन्म लिया, जो कि इस प्रकार थे- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।

ऋषि कश्यप के पुत्र विस्वान से मनु का जन्म हुआ। महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।

दिति : कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निसंतान रहे। जबकि हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। इन्ही के आगे ययाति हुए जिनका विवाह दैत्य गुरु शुराचार्य की कन्या देवयानी से हुआ। जिनके राजा पुरु हुए।

दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई।

रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए।
पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए।
सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए।
इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ।
मुनि के गर्भ से अप्सराएँ जन्मीं।
कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने साँप, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।

ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया।
सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की।
रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।

रानी विनता के गर्भ से गरुड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए।
कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई, जिनमें प्रमुख आठ नाग थे-अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।

रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ।
यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया।
उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जो कि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।

माना जाता है कि कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्मीर का प्राचीन नाम था। समूचे कश्मीर पर ऋषि कश्यप और उनके पुत्रों का ही शासन था। कश्यप ऋषि का इतिहास प्राचीन माना जाता है। शोध करें तो पाएंगे जानवरो की जातिया होती थी जिनका आपस मे मैथुन सम्भव न हुआ किन्तु मनुष्य जाति के आपस मे विवाह सम्बन्ध मैथुन आदि हुए है।  मनुष्य जाति के जीव ही कर्म भाव से सुर- असुर /  दैत्य देवता की दो जातियों में बदलते है।
कैलाश पर्वत के आसपास भगवान शिव के गणों की सत्ता थी। उक्त इलाके में ही दक्ष राजाओं का साम्राज्य भी था। कश्यप ऋषि के जीवन पर शोध किए जाने की आवश्यकता है।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...