बुधवार, 20 जुलाई 2022

सबसे अमीर राजा मनस मूसा के माध्यम से अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था धूर्त इतिहासकार कहते वास्को डी गा मा ने भारत खोजा

    मनस मूसा के कारवां में 60 हज़ार लोग शामिल थे और इनमें 12 हज़ार तो केवल सुल्तान के निजी अनुचर थे. मनसा मूसा जिस घोड़े पर सवार थे, उससे आगे 500 लोगों का दस्ता चला करता था जिनके हाथ में सोने की छड़ी होती थी. मनसा मूसा के ये 500 संदेशवाहक बेहतरीन रेशम का लिबास पहना करते थे.
इनके अलावा इस कारवां में 80 ऊंटों का जत्था भी रहता था, जिस पर 136 किलो सोना लदा होता था. कहा जाता है कि मनसा मूसा इतने उदार थे कि वे जब मिस्र की राजधानी काहिरा से गुजरे तो वहां उन्होंने ग़रीबों को इतना दान दे दिया कि उस इलाके में बड़े पैमाने पर महंगाई बढ़ गई.


 मनसा मूसा की इस यात्रा की वजह से उनके दौलत के क़िस्से यूरोपीय लोगों की कान तक पहुंचे. यूरोप से लोग सिर्फ़ ये देखने के लिए उनके पास आने लगे कि उनकी दौलत के बारे में जो कहा जा रहा है वो किस हद तक सच है.
मनसा मूसा की दौलत की जब पुष्टि हो गई तो उस वक्त के महत्वपूर्ण नक़्शे कैटलन एटलस में माली सल्तनत और उसके बादशाह का नाम शामिल किया गया.14वीं सदी के कैटलन एटलस में उस वक्त की उन तमाम जगहों का वर्णन है जो यूरोपीय लोगों को मालूम थी.
मनसा मूसा जो था वो बड़ा विजनरी राजा था। वो केवल धन दौलत ही नहीं बल्कि ज्ञान का भी भूखा इंसान था। वो मक्का शहर में जमकर सोने को व्यय किया। और वो व्यर्थ में ही सोना व्यय नहीं किया बल्कि उसके बदले उन्होंने ढेर सारे किताब खरीदे जो ज्योतिष शास्त्र, आयुर्वेद, गणित और विज्ञान से संबंधित थे।
अपने साथ वो इन क्षेत्रों के विद्वानों के साथ- साथ अनुवादक भी अपने साथ माली ले आया। वो जानता था कि जितना धन हम सोने से कमा पा रहे हैं उससे ज्यादा हम नॉलेज से कमायेंगे। इन विद्वानों और किताबों की मदद से माली अफ्रीका ही नहीं बल्कि विश्व के लिए ज्ञान का केंद्र बन के उभरा। बड़े बड़े लाइब्रेरी स्थापित हुए.. यूनिवर्सिटी बनी। इनके समय में माली विश्व के सबसे धनी देशों में से आता था। और किताबों की मदद से ही माली ने सोने से भी ज्यादा का व्यापार किया बल्कि करता ही रहा जब तक कि घाघ यूरोपीयन्स न आ गए। इन लोगों ने एक जीती जागती और फलरिश करते देश को लूट के गरीब बना दिया... जैसे भारत की विश्व की 35% की जीडीपी जाते जाते केवल 2% तक रह गई। माली के लोगों किताबों की रेगिस्तान के बालू में गाड़-गाड़ के संरक्षित करने का प्रयास किया,जबकि कई बड़े पुस्तकलाय जला दिए गए।
अब जरा सब को मिलाते हैं...
अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था .. ये अरबी अनुवाद रोमन साम्राज्य तक भी पहुँचा फिर वहाँ भी इसका अनुवाद हुआ। अब्बासी वंश के दूसरे खलीफा अल-मंसूर (770 ई) के दरबार में भारतीय ज्योतिषाचार्य के माध्यम से मोहम्मद इब्न इब्राहिम अल-फजरी ने भारतीय ज्योतिष को अरबी में अनुवाद किया। 600 ई में ही भारतीय गणितज्ञ विराहांक ने अरबी में भारतीय वैदिक गणित का अनुवाद कर रहे थे जिसे Liber-Abbaci में संकलित किया जा रहा था। इसी तरह अन्य ज्ञान भी अरबी में अनुवादित हो रहे थे। और ये अनुवादक कालीकट राजा के अधीन होते थे.. इन अनुवादों के बदले राजा को अनगिनत रॉयलिटी मिलती थी जो सोने में आदान प्रदान होता था। और इन सभी किताबों को मनसा मूसा ने भारी कीमत दे कर खरीदा था फिर अपने साथ माली ले गया था।(यूट्यूब में आप ढेरों डॉक्युमेंट्री देख सकते हैं इसके ऊपर). और जब मनसा मूसा कुछ अनुवादित किताबों के बदले सोने से भी ज्यादा व्यापार कर सकता था तो केरल राजा कितना कर सकता था अनुमान लगा लीजिये।
माली राजा सोने के बदले नमक खरीदता था.. और यूरोपीयन और मिडिल ईस्ट के व्यापारी सोने के बदले भारत से मसाले, चन्दन,नील आदि खरीदते थे।
मूसा के 9 वर्ष बाद जब इब्न बतूता हज के लिए मक्का पहुँचा तो उसने भारत के बारे में बड़ा सुना.. फिर वो वहाँ से जमीनी मार्ग से होते हुए दिल्ली पहुँचा... कुछ समय पश्चात वो करीब 1342 के आस पास कालीकट भी पहुँचा। और उसने हर गतिविधि और वैभवता को अपनी किताब में उकेरते भी गया।
1498 में कालीकट के तट पे पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा आता है और बोलता है कि हमने भारत को खोज लिया!! बुड़बक कहीं के। साले चोरकट लूटेरे।
ये तो हो गया हलेलुइया!!
इससे पहले .. जोल्हेलुइया का भी देख ले।
चेरामन पेरुमल का नाम तो सुने होंगे ? नहीं सुने तो बता देते हैं.. ये कालीकट के राजा हुए.. मोहम्मद के समय। इनके जैसा तब कोई शायद ही अमीर होगा। मोहम्मद के जिंदा रहते ही मने कि सन 629 ई में चेरामन जुमा मस्जिद,कोडुंगलुर में बन जाता है जो मक्का के बाद दूसरा होता है। मोहममद की मृत्यु 632 ई में होती है


रविवार, 17 जुलाई 2022

बैजू बावरा का शास्त्रीय संगीत जिससे पत्थर भी पिघल जाते थे

   

 ध्रुपद गायक बैजू बावरा का काल पंद्रहवीं शताब्दी का माना जाता है। तानसेन से अपने मुकाबले में बैजू ने राग मालकौंस गाया। इसके प्रभाव से पत्थर पिघल गया। पिघले हुए पत्थर में बैजू ने अपना तानपुरा फेंका। पत्थर ठंडा होने पर तानपुरा पत्थर में गड़ा रह गया।
तानसेन पत्थर पिघलाकर तानपुरा निकाल नहीं सके। पंद्रहवीं शताब्दी तक पत्थर को राग शक्ति से पिघलाया जा सकता था।
आज ये कथा स्वामी सूर्यदेव जी की पोस्ट से एक क्लू मिलने के बाद लिखी जा रही। गुरुदेव ने लिखा कि प्राचीन काल में शिल्पकार राग मालकौंस गाते हुए ग्रेनाइट के पत्थरों को काटते थे। जब तक कोई विधि न हो ग्रेनाइट को कलात्मक ढंग से काट नहीं सकते। गुरुदेव ने बहुत अच्छे से अल्केमी को एक्सप्लेन किया।
पत्थरों को किसी तरह मुलायम बनाकर फिर सूक्ष्म कारीगरी करने की थ्योरी नई नहीं है। इस पर कई वर्ष से शोध किया जा रहा है। कंबोडिया से भी एक मिथक निकल कर आया है।
कंबोडिया में एक विशेष पत्थर होता था। इसे म्यूजिकल स्टोन कहते थे। संगीत वाले पत्थर विश्व के अनेक भागों में पाए जाते हैं, जो एक विशेष राग उत्सर्जित करते हैं। संभव है कंबोडिया के वे जादुई पत्थर विशेष क्रिया के बाद राग मालकौंस की ध्वनि निकालने लगते होंगे। कंबोडिया मिथक कहता है कि इस विशेष पत्थर से बाकी बड़ी चट्टानों को पिघलाया / मुलायम किया जाता था।।
ऋग्वेद में एक पौधे का उल्लेख है। पक्का नाम नहीं पता। American cliff swallow नामक अमेरिकी चिड़िया प्राचीन काल में पथरीली चोटियों में छेद कर घोंसला बना लेती थी। वह पर्टिकुलर स्थान पर इस पौधे की पत्तियों का रस प्रयोग करती थी। स्पष्ट है कि चोंच पत्थर को नहीं छेद सकती। प्राचीन पेरू निवासियों ने इस पक्षी की सहायता से उस पौधे का पता लगाया और उसका प्रयोग अपने अचंभित करने वाले निर्माणों में किया। कुछ कहते हैं वह पौधा विलुप्त हो गया और कुछ कहते हैं कि वह अब भी सर्वाइव कर रहा है।
कर्नाटक के होयसलेश्वर मंदिर में पत्थर को मुलायम बनाकर अविश्वसनीय शिल्प बनाने का जीवंत प्रमाण देखा जा सकता है। कहना मुश्किल है कि वे कौनसी विधि प्रयोग में ला रहे थे। अधिक विश्वास इस बात का है कि वे राग मालकौंस की शक्ति से ऐसा कर रहे थे। विश्व के अन्य भागों में भी ये कार्य हो रहा था। कुछ को चिड़िया ने बताया था।
नीचे फ़ोटो में अचरज से होयसलेश्वर मंदिर का शिल्प देख रहे वृद्ध पर्यटक के मन की गुत्थी सुलझाने का एक प्रयास भर किया है।

रविवार, 19 जून 2022

शादी की उम्र से ही तय होता है घर की सुख शांति समृद्धी होगी संस्कृति

 


पुत्री जैसे जैसे किशोरावस्था को पार कर रही होती है, अभिभावकों के मन में उसके विवाह और सुखद भविष्य के स्वप्न स्पन्दित होने लगते हैं। युवावस्था के बढ़ते पड़ाव के साथ साथ यह चिंता और व्याकुलता में परिवर्तित होता चला जाता है।जबतक विवाह न हो जाय, सोते जागते इसके अतिरिक्त ध्यान में कुछ और आता ही नहीं।
किन्तु कभी आपने विचार किया है कि जिस पुत्री के सुखद भविष्य के लिए आपने इतने स्वप्न देखे, इतने प्रयास किये,,,,पुत्री को शिक्षित किया,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की योग्यता भी दे दी, अपने सामर्थ्य से कई गुना आगे बढ़कर उसके विवाह में व्यय किया......
आपने स्वयं ही उसका घर परिवार सुख शान्ति,, सब कुछ बिखेर दिया।
कैसे ?
वो ऐसे कि आपने अपनी पुत्री 👰 को शिक्षित तो किया,पर उसकी तैयारी ऐसी न करायी कि वह अपने ससुराल में सामंजस्य बिठा पाए।वह सबको अपना सके और अपने सेवा, अपनत्व, मृदुल स्वभाव और सदाचरण से लोगों को बाध्य कर दे कि लोग उसे अपनाए बिना न रह पाएँ।आपने उसे अधिकार और केवल अधिकार का भान रखना तो सिखा दिया, पर "कर्तव्य प्रथम" और यही सर्वोपरि,, यह न समझा सके।
👰बेटी को विदा करने के साथ ही पग पग पर अपने हस्तक्षेप से ऐसी व्यवस्था कर दी कि पुत्री के लिए अपने माता पिता भाई बहन तो पहले से भी अधिक अपने हो गए, पर पति के माता पिता भाई बहन बोझ और त्यज्य होकर गए।
बेचारे दामाद ने बड़ी कोशिश की कि वह अपने माता पिता भाई बहन को भी अपनी पत्नी और उसके मायके वालों के लिए स्वीकार्यता दिलवा पाए,परन्तु नित क्लेश के कारण उसके सम्मुख केवल दो ही मार्ग बचे,,या तो वह अपना दाम्पत्य जीवन बचाये या अपने अभिभावकों सहोदरों का साथ बचाये।
अपने पुत्र/भाई को पिसते हुए देखकर, उसके घर को टूटने से बचाने के लिए अन्ततः लड़के के परिजन ही वृद्धावस्था में एकाकीपन स्वीकार कर पुत्र को स्वतन्त्र कर देते हैं।आजकल के शिक्षित और आर्थिक रूप से समर्थ समझदार अभिभावक पुत्र का विवाह करने के साथ ही उसकी गृहस्थी अलग बसा देते हैं(यदि एक ही शहर में रह रहे हों तो अन्यथा तो दो अलग अलग जगह रहने पर दोनों दोनों के लिए अतिथि बनकर रह जाते हैं।दुर्भाग्य प्रबल हुआ तो टोटल सम्बन्ध विच्छेद)।
अब आइये,,अगली पीढ़ी पर।परिजनों से दूर रह रहे ऐसे एकल परिवार में जहाँ पुत्री ने कभी नहीं देखा कि माता दादा दादी, चाचा चाची,बुआ फूफा या चचेरे फुफेरे भाई बहन से कोई मतलब रख रहे, उनके लिए उसके मन में सम्मान या कोई स्थान है।ऐसे में जब वह ब्याह कर ससुराल जाएगी तो क्योंकर उस पराए घरवालों को अपनाएगी? और जब वह किसीको अपनाएगी नहीं तो भला किस प्रकार वह सबके मन में अपने लिए स्थान,अपने जीवन में सुख और शांति पाएगी?
यदि बच्ची भोजन पकाना, घर की साफ सफाई आदि को अत्यन्त तुच्छ(नौकर वाले काम) समझती है,जबकि माता का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि पुत्र हो या पुत्री,बचपन से ही उसकी तैयारी ऐसी कराएँ कि अपने शरीर, अपने वस्त्र,अपने स्थान को साफ सुथरा रखना,अपने लिए स्वच्छ सादा पौष्टिक भोजन पका सकने में वय के 19वें वर्ष तक पहुँचते पहुँचते वे दक्ष हो जाँय।ऐसे बच्चे जहाँ भी रहेंगे व्यवस्थित और सुखी रहेंगे।बच्चे में यदि एडॉप्टबिलिटी(व्यक्तियों परिस्थितियों को स्वीकारने और उनके साथ सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता)नहीं,तो इसमें पूरा दोष माता पिता का है,निश्चित मानिए।
आज की शिक्षा सुसंस्कृत करने के लिए नहीं,बस आर्थिक सक्षमता के लिए होती है(नून तेल जुटान विद्या)।इसलिए यह दायित्व माता पिता और परिवार का होता है कि बच्चे को जीवन के लिए तैयार करें।जब आप संयुक्त परिवार में रहते हैं,निश्चित रूप से परिवार के सभी सदस्य भिन्न सोच विचार के होंगे और बहुधा उनको हैण्डिल करना,शांति सौहार्द्र बनाये रखना,एक बड़ी चुनौती होती है।किन्तु यदि आप और आपके बच्चे बचपन से ही सबको मैनेज करने में सफल होते हैं,,तो निश्चित मानिए कि वे अपने कार्मिक जीवन में भी अवश्य सफल होंगे। नौकरी में हों या व्यवसाय में साथ वाले सभी प्रतिस्पर्धी ही होते हैं,प्रत्येक परिस्थिति एक चुनौती ही होती है।
आज से 20-25 वर्ष पूर्व तक किशोरवय की अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचते पहुँचते लड़कियों का ब्याह हो जाता था।ऐसी लड़कियों के लिए नए घर की रीत,खानपान, सदस्यों के अनुरूप ढ़लने का सामर्थ्य वर्तमान की तुलना में बहुत अधिक होता था।आज 28 से 35 तक की लड़कियाँ अपने हिसाब से जीने की अभ्यस्त हो चुकी होती हैं।उनमें एडॉप्टबिलिटी इतनी कम हो चुकी होती है कि यदि बचपन से ही मानसिक तैयारी कराकर न रखी जाय तो विवाहोपरांत उसका जीवन तो दुरूह होता ही है,जहाँ वह जाती है,उनके सुख चैन भी कपूर के धुएँ के समान कुछ ही दिनों में उड़ जाते हैं।
बढ़ते हुए विवाह विच्छेद की घटनाएँ,, युवाओं में लिव-इन की स्वीकार्यता, हमारे सामाजिक भविष्य को उस ओर लिए जा रहे हैं,जहाँ व्यक्ति के पास भौतिक सुख साधन का अम्बार होते हुए भी व्यकि दुःख अवसाद में घिरा,टूट हारा एकाकी होगा।क्योंकि वास्तविक "सुख और शान्ति" तो व्यक्ति के जीवन में तभी आ सकता है जब उसके पास परिजनों का स्नेह हो,परिवार में एक दूसरे के लिए आदर आत्मीयता हो,सुख दुःख में कभी वह स्वयं को अकेला नहीं पाये और भौतिक समृद्धि को ही जीवन ध्येय व सुख न माने।
साभार द्वारा बुन्देला धर्मेंद्र जी

शनिवार, 18 जून 2022

वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य ऐसी नीति निर्धारण क्यों नहीं हो सकता हे

  





   पूरी दुनिया में शिक्षा का लक्ष्य यही है कि पूर्वजों द्वारा संचित ज्ञान राशि को नई पीढ़ी को सौंप दिया जाए।
इसके लिए सबसे पहले ज्ञान के विविध रूपों की स्मृति तथा बोध और संभावनाओं को नई पीढ़ी के मन बुद्धि और चित्त पर अंकित कराना होता है और उसके लिए अभ्यास प्रशिक्षण और कल्पना से भरपूर सृजनशीलता को जागृत और प्रदीपित करना होता है।
साथ ही नई पीढ़ी को अपनी ज्ञान परंपरा की रक्षा और उसमें अभिवृद्धि की निरंतर प्रेरणा देनी होती है और विश्व के अन्य समाजों के पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान राशि की भी जानकारी इस प्रकार देनी पड़ती है कि वह अपने समाज के लिए समृद्धि कारक तो बने लेकिन उसके दुष्प्रभावों से आत्मरक्षा की विधियां भी सोची जा सकें।
भारतीय शिक्षा का लक्ष्य भी शिक्षा के इन्हीं उद्देश्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में अर्जित करना होना चाहिए।
ब्रिटिश शिक्षा के ढांचे का लक्ष्य भारत की नई पीढ़ी को यूरोपीय ज्ञान राशि की जानकारी इस प्रकार से देना था कि यूरोपीय समाज के लिए समृद्धि कारक एक उपकरण भारत की नई पीढ़ी बन सके।।
दुर्भाग्यवश हमारे यहां आज भी शिक्षा की विभिन्न शाखाओं में मुख्यतः यूरोपीय ज्ञान परंपरा की ही रक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था है और आज भी दर्शन, राजनीति शास्त्र, साहित्य, कला, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में यूरोपीय मतों को ही सार्वभौम चिंतन की तरह पढ़ाया जाता है ।यह अत्यंत कष्टप्रद स्थिति है। आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था की दीर्घकालिक नीति बनाई जाए जिसमें समाज की विभिन्न संस्थाएं उस जिम्मेदारी को निभाने का भार स्वीकार करें।
सबसे पहले समाज में आत्म गौरव तथा दायित्व की भावनाएं जगनी आवश्यक है ताकि भारतीय शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहिका बन सके और माध्यम बन सके।।
वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य है। पूरे विश्व के ज्ञान विज्ञान की जानकारी भारतीय लक्ष्यों की सेवा और पोषण के लिए आवश्यक और उपयोगी है लेकिन भारत की शिक्षा विदेशी ज्ञान की सेवा के लिए नहीं होनी चाहिए।
वर्तमान भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 यह कहता है कि राज्य की निधि से पूर्ण पोषित अर्थात शासन द्वारा पूर्व वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी । परंतु यह बात ऐसी शिक्षा संस्था में लागू नहीं होगी जिसका प्रशासन भारत शासन या कोई राज्य का शासन करता है और जो किसी ऐसे न्यास या विन्यास के अधीन स्थापित है जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है।
परंतु अनुच्छेद 29 कहता है कि अल्पसंख्यकों को राज्य द्वारा पोषित और राज्य से सहायता पाने वाले किसी भी शिक्षा संस्था में अपने मजहब या रिलीजन की शिक्षा देने का अधिकार है और अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को ऐसी शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और उनका प्रशासन करने का भी अधिकार है ।।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का प्रावधान अनुच्छेद 29 और 30 के द्वारा बाधित कर दिया गया है और अनुच्छेद 28 केवल हिंदुओं के लिए लागू होता है अर्थात शासन द्वारा वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में हिंदू धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती, यह अनुच्छेद 28 का प्रावधान सिद्ध होता है और शासन द्वारा वित्त पोषित मुसलमानों ईसाइयों आदि अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाओं में इस्लाम या ईसाइयत आदि की शिक्षा खुल कर दी जा सकती हैं ,यह अनुच्छेद 29 व 30 का प्रावधान है । इस प्रकार अनुच्छेद 28, 29 और 30 स्पष्ट रूप से हिंदू समाज और हिंदू धर्म के विरुद्ध तथा इस्लाम ईसाइयत आदि अल्पसंख्यकों के पक्ष में भारत के शासन और प्रान्तों के शासन का पक्षपात दिखाता है ।
यह भारत के संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है और भारत जैसे उदार लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए यह शोभा जनक नहीं है ।
बहुसंख्यकों के साथ ऐसा अन्याय संसार के किसी भी लोकतंत्र में नहीं होता ।
ऐसा अन्याय केवल सोवियत संघ और चीनी कम्युनिस्ट सरकारों में हुआ था। रूस में अब समाप्त हो गया है।
इसलिए भारत सरकार को विश्व के अन्य सभी स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्रों के अनुरूप ही भारत की शिक्षा में भारत के बहुसंख्यकों के धर्म की शिक्षा अनिवार्य करनी चाहिए जैसा कि इंग्लैंड फ्रांस जर्मनी पोलैंड स्वीडन स्वीटजरलैंड पुर्तगाल स्पेन संयुक्त राज्य अमेरिका आदि सर्वत्र है ।।
भारत को अपवाद बनाने का निर्णय क्यों लिया गया इसके विस्तार में न जाकर ,अब इस अपवाद स्थिति को समाप्त करके भारत को भी विश्व के अन्य लोकतांत्रिक राष्ट्रों का अनुसरण करने वाला होना चाहिए ।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का विरोध होना चाहिए और साथ ही अनुच्छेद 29 और 30 का विरोध होना चाहिए।।
सही उपाय तो यह है कि शिक्षा के संबंध में एक स्पष्ट दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए जो कि संविधान में अभी तक नहीं है।।
संविधान में शिक्षा से संबंधित स्पष्ट प्रावधान केवल अल्पसंख्यकों के लिए हैं और हिंदू समाज के लिए केवल इतना प्रावधान है कि वह अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकता ।अन्य प्रावधान नहीं है।
जबकि शिक्षा का मूल प्रावधान तो अपने राष्ट्र की ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में प्रवाहित करना और पुष्ट करनाहै, नई पीढ़ी को उस ज्ञान परंपरामें दक्ष बनाना है। इसलिए शिक्षा संबंधी एक अलग क्लाज जोड़ा जाए जिसमें यह स्पष्ट लिखा जाए कि शिक्षा संसार भर में हर राष्ट्र की अपनी ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में देने के लिए होती है और वह प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र का कर्तव्य है।इसलिए भारत भी भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ाने वाली शिक्षा प्रदान करेगा तथा साथ ही विश्व की ज्ञान परंपरा का राष्ट्र के अनुकूल समायोजन करेगा ।
अनुच्छेद 29 और 30 संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार के लिए हैं। अच्छा तो यह होगा कि अनुच्छेद 29 में सर्वप्रथम एक उपबंध जोड़ दिया जाए कि बहुसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण और उसमें बहुसंख्यक वर्ग की ज्ञान परंपरा और शिक्षा परंपरा का संरक्षण राज्य का कर्तव्य घोषित हो अथवा अनुच्छेद 28 में ही जोड़ दिया जाए कि भारत की ज्ञान परंपरा का पोषण भारत के शासन का कर्तव्य है और प्रत्येक राज्य की सरकार का यह कर्तव्य होगा । तदनुसार आगे के प्रावधान किए जा सकते हैं ।।
पहले तो शासन में यह संकल्प होना आवश्यक है कि वह भारत की ज्ञान परंपरा को मान्यता देता है और उसके संरक्षण के लिए वचनबद्ध है।
भारत का शासन आज तक भारतीय ज्ञान परंपरा नामक किसी भी चीज का कोई संवैधानिक संज्ञान नहीं लेता।वह यह मानकर चलता है कि वे अतीत की वस्तुएं हैंऔऱ वर्तमान में दर्शन राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र अर्थशास्त्र आदि सभी humanities के विषयों में एकमात्र ज्ञान वह हैं जो यूरोपीय ज्ञान परंपरा है ।
यह इतनी बड़ी चीज है कि संसद में विचार होना चाहिए और यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ऐसा करते ही भारत का शासन ज्ञान की दृष्टि से यूरोपीय शासन की एक छोटी और अनुकरणरत शाखा हो जाता है , जिसके पास अपना कोई स्वतंत्र विवेक नहीं है और जो कोई स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ है।
यह भारत के संविधान के विरुद्ध है।भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य है और इसलिए शिक्षा और ज्ञान के विषय में भी भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होना चाहिए ।उसे इंग्लैंड के ज्ञान तंत्र का अथवा यूरोपीय और अमेरिकी ज्ञान तंत्र का एक विनम्र सेवक नहीं रहना चाहिए।
यह स्थिति भारत राष्ट्र के लिए अत्यंत लज्जाजनक है और वर्तमान आत्म गौरव संपन्न शासन को भारत के लोगों को इससे मुक्त करके उसे स्वाभिमान संपन्न बनाने की पहल शिक्षा के क्षेत्र में भी करनी चाहिए साभार आदरणीय श्री रामेश्वर मिश्र पंकज

शुक्रवार, 17 जून 2022

तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर #रामप्पामंदिर तेलंगाना)

 








तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर
(#रामप्पा_मंदिर,तेलंगाना)
भारत वर्ष के हिन्दू मंदिर की भव्यता देखो।
मन्दिर का हर एक चित्र ध्यान से देखिए आपको इसकी भव्यता साफ साफ दिखाई देगी
इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक #Diamond_electron_machine ही काट सकती है वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से
अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है
यहां पर एक नृत्यांगना की मूर्ति भी है जिसने हाई हील पहनी हुई है
सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है
मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई
मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और जिसकी ऊंचाई नौ फीट है,उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है।
पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है
पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है
यह सब आज के समय में करना असंभव है इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास मशीनरी नहीं थी?
उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी
यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थी जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है
#मंदिर_शिव_को_समर्पित है
मंदिर का नाम इसके शिल्पी के नाम पर रखा हुआ है क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुए और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया।
यह मंदिर भीषण आपदाओं को झेलने के बाद भी आज तक सुरक्षित है।छह फीट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर बने इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे हुए हैं। । यह रामायण और महाभारत के दृश्य एक ही पत्थर पर उकेरे गए है, वह भी छीनी हथोड़े से, आप बनाते समय की कल्पना कीजिये,एक हथौड़ा गलत पड़ा, और महीनों-वर्षों का श्रम नष्ट ....
आज तक इस मंदिर में कोई क्षति नही हुई है, मंदिर के न टूटने की बात जब पुरातत्व विज्ञानियों को पता चली, तो उन्होंने मंदिर की जांच की। पुरातत्व विज्ञानी अपनी जांच के दौरान काफी प्रयत्नों के बाद भी मंदिर के इस रहस्य का पता लगाने में सफल नहीं हुए।
बाद में जब पुरातत्व विज्ञानियों ने मंदिर के पत्थर को काटा, तब पता चला कि यह पत्थर वजन में काफी हल्के हैं। उन्होंने पत्थर के टुकड़े को पानी में डाला, तब वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा। पानी में तैरते पत्थर को देखकर मंदिर के रहस्य पता चला।
सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस मंदिर में जो पत्थर मिले है, वह पत्थर विश्व के किसी कोने में नही मिले है, यह पत्थर कहाँ से लाये गए, आज तक इसका पता नही चल पाया है ।।
एक निवेदन -- हम सबको मिलकर हमारे भारत की इन अमूल्य धरोहरों का प्रचार जन-जन तक करना चाहिए, इसका इतना प्रचार हो, की पूरे संसार की की दृष्टि इन पर पड़े और वह भारत की महान संस्कृति पर गर्व करें।

 

सोमवार, 13 जून 2022

किडनी में स्टोन केल्सियम से एक भ्रांति

  




एक हैं मलिक साहब। हमारे साथ पढ़ते थे पंतनगर विश्वविद्यालय में। अविभाजित उत्तर प्रदेश के सबसे खूबसूरत शहर से थे, जहाँ कालान्तर में हमने अपनी ज़िन्दगी के 8 साल 8 महीने और 18 दिन बड़ी शान से गुजारे। जी हाँ, दून वैली। पहाड़ों की रानी मसूरी से मात्र 35 किलोमीटर दूर।
उनकी बस एक ही समस्या थी। भाई पथरी हो गी रे।
अरे मलिक साहब कैसे हो गई?
भाई वो देहरादून का पाणी है ना, बोहोत हार्ड है, ससुरे में कैल्शियम बोहोत है। जिब पाणी मै कैल्शियम जादै हो तो पथरी हो जा।
कम-ओ-बेश यही ख़यालात ज्यादातर लोगों के होते हैं। तो ऐसी ग़लतफ़हमी पाले सभी भाई-बहन आज ही यह ग़लतफ़हमी दिमाग से निकाल दें कि पानी के कैल्शियम का आपके किड़नी में बनने वाली पथरी से कोई सम्बन्ध है।
कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर ऐसा होता तो सारे गढ़वालियों और कुमाउनियों और हिमाचलियों और कश्मीरियों को गुर्दे की पथरी हो चुकी होती। ऐसा है क्या?
नहीं है।
वास्तव में पानी का कैल्शियम इसके लिए जिम्मेदार है ही नहीं। जिम्मेदार हैं आप स्वयं। जो पानी पीते ही नहीं। अगर आप दिन में 10 गिलास अर्थात साढ़े तीन लीटर से कम पानी पीयेंगे तो आपको प्रसाद में पत्थर ही मिलेंगे। फिर घूमते रहना किडनी हॉस्पिटल के चक्कर काटते।
किडनी स्टोन के लिए मूलतः जिम्मेदार है पानी का कम पीया जाना। सोने में सुहागा तब हो जाता है जब आप प्रोटीन खाते हैं ज्यादा और पानी पीते हैं कम। तो यूरिक एसिड बनता है खूब और पानी ना पीने के कारण बाहर वह निकल नहीं पाता और निर्माण करता है किडनी स्टोन का।
किडनी में यूरिक एसिड की मात्रा ज्यादा होने से किडनी के वातावरण की पीएच हो जाती है कम और पीएच कम होते ही किडनी स्टोन बनने लगते हैं।
अब बात करते हैं दूसरे सगूफ़े की।
डॉक्टर के पास जाओ, हर दूसरे तीसरे मरीज को बोलेगा कि खून में कैल्शियम और विटामिन डी की जाँच कराओ और ज्यादातर लैब रिपोर्ट में कैल्शियम और विटामिन डी बताया जाता है कि कम है।
अब डॉक्टर लिख देता है कि कैल्शियम की गोली खाओ और विटामिन डी के कैप्सूल खाओ या ज्यादातर केस में कहता है कि विटामिन डी का टीका लगवाओ। और बस खेल चालू।
कैल्शियम की गोली खिलवाने लगता है और जोर देता है कि विटामिन डी का टीका लिया जाए। सात हज़ार रूपये का आता है। खुले बाजार में भी नहीं बिकता। कुछ खास कंपनियों के रिप्रेजेंटेटिव से ही खरीदना पड़ता है। बस डॉ साहब के मोबाइल की क़िस्त का तो इंतज़ाम हो गया। अब साल भर तक क़िस्त आप भरना डॉ साहब के मोबाइल की।
फिर साल भर बाद किडनी हस्पताल के डॉक्टर की नई गाड़ी की क़िस्त आप ही भरेंगे। उस पट्ठे ने अपना भी जुगाड़ कर लिया और अपने दोस्त का भी।
एक दिन में 800 इंटरनेशनल यूनिट विटामिन डी और 800 से 1200 मिलीग्राम कैल्शियम से ज्यादा खाओगे तो मोबाइल और गाड़ी दोनों की क़िस्तें आप ही भरेंगे।
कितने डॉक्टर हैं जो कैल्शियम और विटामिन डी चालू करने के बाद समय समय पर इन दोनों की आपके खून में जाँच करवाते हैं?
अगर कोई भला डॉक्टर करने की सिफारिश करता भी है तो आप सुपर डॉक्टर बन जाते हैं और सोचते हैं कि अभी तो जाँच करवाई थी। बार बार क्या करवाना!! ये डॉक्टर तो जाँच वाचं लिखते ही रहते हैं।
अरे भाई अगर खून में कैल्सियम का स्तर बढ़ गया तो किडनी स्टोन हो जायेगा। चलो कोई बात नहीं। तुड़वा लेना पत्थर......डॉक्टर से। डॉक्टर को भी जीने का अधिकार है कि नहीं!!!!
इसके अलावा दो हॉर्मोन और हैं। एक है कैल्सीटोनिन और दूसरा है पैराथाइरॉइड हॉर्मोन। इन दोनों में से कोई भी रूठ जाये तो बस खामियाज़ा आपको भुगतना पड़ता है। इन दोनों का काम है ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम के संतुलन को बनाए रखना।
जैसे ही खून में आयोनाइज़्ड कैल्शियम का स्तर एक निश्चित बिंदु से ऊपर जाता है तो थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन आकर उसे नार्मल कर देता है और अगर यह स्तर नीचे गिर जाए तो पैराथाइरॉइड ग्रंथि से पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आकर इसे बढ़ा देता है।
अगर थाइरोइड ग्रंथि या पैराथाइरॉइड ग्रंथि ठीक से काम ना कर रही हों तो आप समझ सकते है कि कैल्सीटोनिन और पैराथाइरॉइड हॉर्मोन की उपलब्धता प्रभावित होगी जो फाइनली किड़नी स्टोन को जन्म दे सकती है।
आप सोच रहे होंगे कि पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कोई जादुगर है। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम कम हुआ तो ये पैराथाइरॉइड हॉर्मोन जादू की छड़ी घुमाएगा और कैल्शियम पैदा।
नहीं ऐसा नहीं है। है वैसे जादू ही, भगवान् का जादू।
कैसे?
यह पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आँतों से कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ा देता है। बहुत लंबी प्रक्रिया है इसकी। किसी और पोस्ट में बताऊंगा। आप बस अभी इतना समझ लो कि अगर थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन ना आये तो ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम का स्तर खतरनाक तऱीके से बढ़ जाता है। जो किड़नी स्टोन को जन्म देता है।
और अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि से ज्यादा पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आ जाये तो?
तो भी वही होगा। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम बढ़ जायेगा। जो किड़नी स्टोन को जन्म देगा।
पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कब ज्यादा आएगा?
अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि किसी ट्यूमर आदि की वजह से हायपरएक्टिव हो गई है तो पैराथाइरॉइड हॉर्मोन का उत्पादन ज्यादा होगा।
कैल्शियम मेटाबोलिज्म इतना आसान नहीं है बाबु मोशाय!!!!
और हाँ.......आर ओ वार ओ का चक्कर छोड़ो, मस्त होकर पानी पीयो, पानी में कैल्शियम ज्यादा हो या कम। टेंशन नक्को। हार्ड वाटर से पथरी नहीं होगी। होगी तो वाटर ना पीने से। बस रंगीन् पानी से बचो। रंगीन पानी बोले तो वही पोंटी चड्ढा और विजय माल्या वाला। किड़नी स्टोन हो ही जाये तो मुझसे संपर्क कर लेना।    

रविवार, 12 जून 2022

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल: ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त व ब्रह्मगुप्त_प्रमेय

 


देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
देखते हैं -
*"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।*
*यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"*
बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है !
इसका अर्थ है -
यदि वर्ग की भुजा 2a हो
तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
ये क्या है ?
अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है
शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है ,
इस श्लोक का उल्लेख किया है -
*परे पूर्णमिति।*
*उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।*
*तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।*
*तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।*
*तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।*
शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किये हुए भारतीय छात्र ने इसका नाम भी सुना हो , जबकि यह "मेरु प्रस्तार" है।
परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से "पास्कल त्रिभुज" के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीयों को शर्म इस बात पर आने लगी कि भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते।

*"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।*
*अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"*
ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता है लेकिन ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है। जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता है।
उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो कुछ इस तरह होगा-
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६
*ऋगवेद में π का मान ३२ अंक तक शुद्ध है।*
*गोपीभाग्य मधुव्रातः श्रुंगशोदधि संधिगः |*
*खलजीवितखाताव गलहाला रसंधरः ||*
इस श्लोक को डीकोड करने पर ३२ अंको तक π का मान 3.1415926535897932384626433832792… आता है।

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल:
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-
*स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।*
*भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥*
अर्थ:
त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है।

ब्रह्मगुप्त_प्रमेय:
चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।
ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-
*त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।*
*ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥*
(ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)

वर्ग_समीकरण का व्यापक सूत्र:
ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है-
*वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।*
*मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥*
ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44
अर्थात :
व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें।
पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें।
प्राप्त संख्या ही अज्ञात "त्र" राशि का मान है।
श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —
*चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।*
*अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥* -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221
अर्थात :-
प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।☺

आर्यभट्ट की ज्या (Sine) सारणी:
आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:
*मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।*
*घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥*
माधव की ज्या सारणी:
निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित *'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स'* नामक पुस्तक से लिया गया है।
*श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।*
*तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।*
*धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।*
*म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।*
*मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।*
*अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।*
*तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।*
*शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।*
*छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।*
*रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखोe बली।।*
*धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।*
*कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।*
*तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।*
*स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।*
(२.९.५)

संख्या_रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)
*"एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव।"*
Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25)

जिसका अर्थ है-
1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.


ये तो कुछ नमूना हैं , जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है बल्कि तमाम विज्ञान भरा पड़ा है।
दुर्भाग्य से कालांतर में व विदेशी आक्रांताओं के चलते संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का भावी पीढ़ी द्वारा विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए ।
*वन्दे संस्कृत मातरम्*

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...