बुधवार, 24 जुलाई 2019
इंटरनेशनल ड्रग माफियाओं की मकड़जाल में भांग अफीम प्रतिबंधित
शिवप्रिया, विजया अर्थात भंग- - - -
भारत में एलोपैथी और शराब का धंधा जमाने के लिए अंग्रेजों ने भांग को बदनाम कर प्रतिबंधित कर दिया। आइए इनके बदरंग में भंग करे, भंग का रंग जमा कर
- इसके पत्ते मसल कर कान में दो दो बूंद रस डालने से दर्द गायब हो जाता है।
- सिरदर्द में इसके पत्ते पीस कर सूंघे या इसका दो दो बूंद रस नाक में डाले।
- इसके चुटकी भर चूर्ण में पीपर, काली मिर्च व सौंठ डाल कर लेने से खांसी में लाभ होता है।
- नपुंसकता और शारीरिक क्षीणता के लिए भांग के बीजों को भूनकर चूर्ण बना कर एक चम्मच नित्य सेवन करे।
- अफगानी पठान इसके बीज फांकते है तभी लंबे चौड़े होते है। भारतीय दिन पर दिन लंबाई में घट रहे है।
- संधिवात में भी इसके भूने बीजों का चूर्ण लाभकारी है।
- यह वायु मंडल को शुद्ध करता है।
- इससे पेपर, कपड़ा आदि बनता है।
- इसका कपड़ा एंटी कैंसर होता है।
- यह टीबी, कुष्ठ, एड्स, कैंसर, दमा, मिर्गी, मानसिक रोग जैसे 100 रोगों का इलाज करता है।
- सिद्ध आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व है। यह सूक्ष्म शरीर पर पहले कार्य करता है।
- तपस्वी, ऋषि मुनि इसका सेवन साधना में लाभ के लिए करते है।
- इसके सेवन से भूख प्यास , डिप्रेशन नहीं होता।
- शरीर के विजातीय तत्वों या टॉक्सिंस को यह दूर करता है।
- इसके बीजों का चूर्ण , ककड़ी के बीजों के साथ शर्बत की तरह पीने से सभी मूत्र रोग दूर होते है।
- यह ग्लूकोमा में आंख की नस से दबाव हटाता है।
- अलझेइमर में भांग का तेल लाभकारी है।
- भांग का तेल कैंसर के ट्यूमर के कोशिकाओं की वृद्धि रोक देता है।
- इसके प्रयोग से कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट दूर हो जाते है।
- डायबिटीज से होने वाले नर्वस के नुकसान से भांग बचाता है।
- भांग हेपेटाइटिस सी के इलाज में सफल है।
- गाजर घास जैसी विषैली जड़ियों को रोक सकता है।
- डायरिया और डिसेंट्री के लिए प्रयोग में आने वाले बिल्वादी चूर्ण में भांग भी होता है।
- इसके पत्तियों के चूर्ण को सूंघने मात्र से अच्छी नींद आती है।
- संग्रहनी या कोलाइटिस में इसका चूर्ण सौंफ और बेल की गिरी के साथ लिया जाता है।
- हाइड्रोसिल में इसके पत्ते पीस कर बांधने से लाभ होता है।
- भांग के बीजों को सरसो के तेल में पका कर छान ले। यह तेल दर्द निवारक होता है।
- इसके पत्ते डाल कर उबाले पानी से घाव धोने से इंफेक्शन नहीं होता और घाव जल्दी भर जाता है।
- इतने सारे गुण होते हुए भी अंग्रजों ने षड़यंत्र कर इसे प्रतिबंधित कर दिया। जिसे भारतीय अंग्रजों ने आगे बढ़ाया।
- यह ज्योतिर्लिंगों और कुछ राज्यों में प्रतिबंधित नहीं है। शिवरात्रि , श्रावण आदि में यह शिव पूजा के लिए मिलता है। इसके बिना शिवपूजा अपूर्ण है।
- गुणों के कारण इसे काला सोना भी कहा गया है।
- विदेशों में इस पर बहुत शोध हुआ है और इसका प्रयोग हो रहा है।
-(प्रिया मिश्रा नाम की एक 21 वर्षीय युवती को लिंफ नोड्स का असाध्य टीबी हुआ था। वह बहुत ही कष्ट में थी।डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। तब एक कामवाली बाई ने उन्हें भांग फूंकने को दी। आश्चर्यजनक रूप से कुछ दिनों में वह ठीक हो गई। तब से प्रिया मिश्रा ने अपना जीवन भांग के महत्व को सभी को बताने में समर्पित कर दिया। येभारत की एकमात्र महिला एक्टिविस्ट है जो भांग के लिए कार्यरत है। भारत में इस पर से प्रतिबंध हटना चाहिए और इसका तथा आयुर्वेद का महत्व बढ़े इसके लिए ये प्रतिबद्ध है, कार्यरत है। इसे अंग्रेज़ी में हेंप कहते है। इनका संस्थान हेंपवती भांग के औषधीय , शोध, पोषक और अन्य उत्पादों के लिए कार्यरत है। )
- यह ड्रग्स की श्रेणी में नहीं आता। यह एक औषधि है।
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सोमवार, 8 जुलाई 2019
कृष्णानंद राय केस: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन हत्यारा कोई नहीं

मुसलमान, भाजपा, न्याय व्यवस्था और भारत में कौन मजबूर और कौन मजबूत, कौन डर रहा है कौन डरा रहा है!?
कृष्णानंद राय केस: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन हत्यारा कोई नहीं
राज्य में भाजपा की सरकार। केंद्र में भाजपा की सरकार। लेकिन मार दिए गए एक भाजपा विधायक को न्याय नहीं मिल पाया। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। 2005 में हुई हत्या के मामले में आज तक कोई अपराधी नहीं! किस पर दोष लगाया जाए? क्या सरकारें अपना काम करने में विफल रहीं? क्या न्यायपालिका को सच नहीं दिख पाया? या फिर मुख़्तार अंसारी और उसके परिवार का रसूख सब पर भारी पर गया? आज इसकी चर्चा हम इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि मुख़्तार अंसारी और उसके भाई बसपा सांसद अफ़ज़ल अंसारी को इस मामले में दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया। आरोपितों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी किया गया।
सबसे पहले इस ख़बर की बात करेंगे। उसके बाद हम इस घटना को रीविजिट करने 15 वर्ष पीछे जाएँगे और फिर हम वापस लौट कर यह देखने की कोशिश करेंगे कि आख़िर इतनी बड़ी हत्या के मामले में आरोपितों के बरी हो जाने, या फिर दोषियों के पकड़ में न आने के पीछे का कारण क्या है? जिम्मेदारी किसकी है? कृष्णनंदन राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर इस केस को दिल्ली ट्रांसफर किया गया था क्योंकि यूपी में इसके निष्पक्ष सुनवाई होने की उम्मीद परिजनों को नहीं थी। दिल्ली की अदालत ने ‘साक्ष्य के अभाव’ में उन आरोपितों को भी बरी कर दिया।
कोर्ट का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपितों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। अदालत 2 अन्य आरोपितों को पहले ही बरी कर चुकी है। सीबीआई ने मामले की लम्बी जाँच की लेकिन दोष नहीं साबित कर पाई। ये थी ख़बर। अब आते हैं अपने सवाल पर। मुख़्तार अंसारी, उसके भाई व बहनोई के ख़िलाफ़ कोई भी अपराध साबित करने में सीबीआई व पुलिस नाकाम क्यों रही? यह सवाल इसीलिए जायज हो जाता है क्योंकि दिसंबर 2005 को एसटीएफ एसएसपी अखिल कुमार ने साफ़-साफ़ कहा था कि ये हत्या मुख़्तार अंसारी ने कराई है। अब जरा पीछे जाकर इस हत्या की वारदात के बारे में जानते हैं।
गवाहों की रहस्यमयी मौतें
- लेख आगे पढ़ें -
क्या हुआ था उस दिन?
वह 29 नवंबर 2005 का दिन था, जिसे गाज़ीपुर वाले आज भी ‘ब्लैक डे’ कहते हैं। कृष्णानंद राय मुहम्मदाबाद से विधायक थे। वह पिछली केंद्र सरकार में 5 वर्षों तक मंत्री रहे मनोज सिन्हा के क़रीबी भी थे। वही मनोज सिन्हा, जिन्हें गाज़ीपुर से हरा कर मुख़्तार अंसारी का भाई अफ़ज़ल अंसारी इस वर्ष सांसद बना है। यह बात बहुत कम ही लोगों को पता है कि कृष्णानदान राय इस घटना में मारे जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे बल्कि उनके साथ उनके 6 अन्य सहयोगियों की भी जान गई थी। ये हत्या इतनी वीभत्स थी और इतने बेख़ौफ़ तरीके से अंजाम दिया गया था, जिससे कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि इसके पीछे कितनी बड़ी ताक़तें थीं।शासन से बेख़ौफ़ हत्यारों ने 400 राउंड गोलियाँ चलाईं थीं। घटना के बाद पोस्टमॉर्टम के दौरान मृतकों के शरीर से 67 गोलियाँ निकाली गईं। इतनी ज्यादा संख्या में बुलेट अंदर धँसने के बाद शायद ही कोई ज़िंदा बचे, वो भी तब जब ये गोलियाँ एके-47 दागी गई हों। विधायक राय लोगों में लोकप्रिय थे, इस कारण जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। विरोध प्रदर्शन करने वालों में कई ऐसे लोग भी शामिल थे, जो आज यूपी व दिल्ली में सत्ता के सर्वेसर्वा हैं। आपको बता दें कि देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उस वक़्त इस हत्या के विरोध में धरना दिया था। राजनाथ ने एक-दो दिन नहीं बल्कि 14 दिनों तक धरना दिया था और उनका धरना ख़त्म कराने के लिए ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आना पड़ा था।
5 वर्षों तक राजनाथ सिंह देश के गृह मंत्री रहे और उनके कार्यकाल के दौरान भी यह जाँच अहम प्रक्रियाओं से गुजरी लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोषियों को न बख्शने की बात करते हैं और क़ानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पुलिस को उन्होंने सशक्त किया है लेकिन हत्यारा कोई नहीं! सीबीआई जैसी एजेंसियाँ कथित बाहुबलियों और बड़ी मछलियों पर हाथ डालने से न हिचकने का दावा करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! 15 वर्षों तक 7 आरोपितों पर मामला चलता है और विभिन्न संस्थाएँ अपने-अपने स्तर से जाँच करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उस समय की सपा सरकार का दौर गया, मनोज सिन्हा 5 साल मंत्री रहे लेकिन हत्यारा कोई नहीं!
कृष्णानंद राय हत्याकांड: नहीं मिला न्याय
तो फिर 400 राउंड गोलियाँ किसने चलाई? नहीं पता चल पाएगा। शायद इसलिए नहीं चल पाएगा क्योंकि सलमान ख़ान ने हिरन मारा या नहीं, यही मामला 20 वर्षों से अटका पड़ा है। 1998 में एक काला हिरन का शिकार कर लिया जाता है और ग्लैमर वर्ल्ड के आरोपितों के ख़िलाफ़ दो दशक तक चली जाँच के बाद भी मामले में क्या डेवलपमेंट्स हुए हैं, कुछ भी क्लियर नहीं है। ऐसे कैसे मिलेगा न्याय? जिस देश की न्याय व्यवस्था एक जानवर के शिकारी को सज़ा देने में नाकाम रही है, उससे एक नेता के कातिलों को सज़ा दिलाने की उम्मीद ही बेमानी है। सवाल सिर्फ़ विधायक का नहीं है बल्कि उनके साथ मारे गए 6 अन्य लोगों का भी है।हो सकता है विधायक का परिवार संपन्न रहा हो और न्याय के लिए वह आगे की प्रक्रिया में जा सकता है लेकिन उनके साथ मारे गए उनके 6 सहयोगियों के परिजनों की आशाएँ भी इसी मामले से जुड़ी हैं। विधायक की पत्नी अलका राय ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि प्रदेश में सुनवाई होने से जवानों की जान को ख़तरा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया, तभी मामला प्रदेश से बाहर ट्रांसफर किया गया। इससे समझा जा सकता है कि कृष्णनंदन राय के हत्यारों के पीछे कितनी बड़ी ताक़तें काम कर रही थीं। जिसके कारण मामले को यूपी से दिल्ली भेजा जा सकता है, वो कुछ भी कर सकते हैं, कम से कम सज़ा से तो बच ही सकते हैं!
गाज़ीपुर की जनता भी उन्हें भूल जाएगी। ऐसा ही होता आया है। भले ही उनकी शवयात्रा में 5 किलोमीटर लम्बी लाइन लगी हो, जनता क्यों इस पचड़े में पड़ना चाहेगी क्योंकि उसे भी पता है कि जो अदालत और जाँच एजेंसियों को धता बता सकता है वो कुछ भी कर सकता है। क्या कृष्णनंदन राय ने ख़ुद को ही गोली मार ली? क्या उन्होंने 67 बुलेट्स ख़ुद अपने और अपने सहयोगियों के शरीर में घुसेड़ दिए? अफसोस, इन सवालों के जवाब शायद फाइलों में धूल फाँकते रह जाएँगे न्याय के इंतजार में।
संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे
भारतीय शास्त्रीय संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे :
https://ajaykarmyogi.blogspot.com/2018/05/blog-post_71.html?m=1
1. राग दुर्गा – आत्मविश्वास बढानेवाला.
2. राग यमन – कार्यशक्ति बढानेवाला.
3. राग देसकार – उत्थान व संतुलन साधनेवाला
4. राग बिलावल – अध्यात्मिक उन्नति व संतुलन साधनेवाला.
5. राग हंसध्वनि – सत्य असत्य को परिभाषित करनेवाला राग.
6. राग शाम कल्याण – मुलाधार उत्तेजित करनेवाला और आत्मविश्वास बढानेवाला.
7. राग हमीर – आक्रामकता बढानेवाला, यश देनेवाला, शक्ति और उर्जा निर्माण करनेवाला.
8. राग केदार – स्वकर्तृत्व पर पूर्ण विश्वास, भरपूर उर्जा निर्माण करनेवाला और मुलाधार उत्तेजित करनेवाला.
9. राग भूप – शांति निर्माण, संतुलन साधकर अहंकार मिटाता है.
10. राग अहिर भैरव – शुद्ध इच्छा, प्रेम एवं भक्ति भाव निर्माण करता है व आध्यात्मिक उन्नति, पोषक वातावरण निर्मित कारक.
11. राग भैरवी – भावना प्रधान राग, सर्व सदिच्छा पूर्ण कर प्रेम सशक्त और वृद्धि करता है.
12. राग मालकौस – अतिशय शांत एवं मधुर राग. प्रेमभाव निर्माण करता है व संसारिक सुख में वृद्धि करेगा.
13. राग भैरव – शांत वृत्ति व शुध्द इच्छा निर्माण करता है. आध्यात्मिक प्रगति के लिये पोषक एवं शिवत्व जागृत करनेवाला राग.
14. राग जयजयवंती – सुख समृद्धि और यश देने वाला राग. समस्या दूर करनेकी क्षमता.
15. राग भीम पलासी - संसार सुख व प्रेम देता है.
16. राग सारंग – अति मधुर राग. कल्पना शक्ति व कार्यकुशलता बढाकर नवनिर्मित ज्ञान प्रदान करता है, आत्मविश्वास बढाकर परिस्थिति का ज्ञान देता है.
17. राग गौरी – गुण वर्घक राग - शुद्ध ईच्छा, मर्यादाशीलता, प्रेम, उत्थान ,समाधान कारक.
पशु पक्षियों जैसा ही, मनुष्यों के पास भी शुरुआत में सिर्फ बोली थी, कोई भाषा नहीं थी। धीरे धीरे सभ्यता के विकास के साथ शब्दों के स्वरुप तय हुए, व्याकरण तैयार हुआ और अलग अलग सभ्यताओं के लिए अलग अलग भाषाएँ बनी। अभी के भारत की संस्कृति ही देख लें तो कई भाषाओँ के साथ साथ कई बोलियाँ भी मिल जायेंगी। जैसे ये भाषा के साथ होता है, वैसे ही ये संगीत के लिए भी होता है। एक सरगम और संगीत के एक प्रारूप के तय होने के साथ ही लोकगीतों से अलग, भारतीय शास्त्रीय संगीत का उदय हुआ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भी भेद होता है, राग कम हैं और रागिनियाँ अधिक। रागों के लिए भाव भी होते हैं, परिवार भारत में महत्वपूर्ण इकाई है, इसलिए हर राग का परिवार भी होता है। धर्म से भारतीय संस्कृति के जुड़े होने के कारण हर राग, नटनागर यानि भगवान शिव से भी जुड़ा है। पांच राग भगवन शिव के पांच मुख से निकले बताये जाते हैं। सुबह की शुरुआत का राग भैरव (भूमि तत्व), हिंडोल (आकाश तत्व), दीपक (अग्नि तत्व), श्री (वायु तत्व) और मेघ (जल तत्व) शिव के हैं और छठा मालकौंस राग पार्वती का है।
उन्नीसवीं सदी के शुरुआत तक यही राग-रागिनी पद्दति भारतीय शास्त्रीय संगीत के वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल होती थी। ऐसे चार मत होते थे, जिनमें से ये भरत मत के रागों के नाम हैं। भरत मत में हरेक राग की पांच पांच रागिनियाँ, आठ पुत्र राग और आठ वधु मानी जाती थी। हनुमत मत में भी रागों के नाम यही थे। रागिनियों, पुत्र रागों इत्यादि की गिनती बदलती थी। शिव मत के अनुसार भी छः राग माने जाते थे। प्रत्येक की छः-छः रागिनियाँ तथा आठ पुत्र मानते थे। इस मत में राग भैरव, राग श्री, राग मेघ, राग बसंत, राग पंचम, और राग नट नारायण होते थे।
सन 1810-20 के बीच इस पद्दति की आलोचना शुरू हुई और सुधार की जरूरत महसूस की जाने लगी। ये काम पचास साल बाद शुरू होना था। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म ही 1860 में हुआ (देहावसान-1936)। अधिकांश उत्तर भारत में जो आधुनिक थाट पद्दति आज जानी जाती है, उसके जन्मदाता पंडित भातखंडे थे। उन्होंने 1640 के आस पास के कर्णाटक शैली के विद्वान पंडित वेंकटमखिन की शैली के आधार पर वर्गीकरण का प्रयास शुरू किया। इस काम के लिए वो उत्तर भारत के कई शास्त्रीय घरानों में घुमते रहे।
बरसों की मेहनत से वो दस प्रमुख थाट में भारतीय शास्त्रीय संगीत को बाँट पाए। बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावारी, भैरवी और तोडी थाट में आज संगीत बांटा जा सकता है। जैसे मालकौंस को भैरवी थाट में डाल सकते हैं, राग श्री को पूर्वी थाट में डालेंगे। थाट को परिवार के उपनाम की तरह समझिये। जैसे किसी के घर शादी का कार्ड देने आया कोई व्यक्ति पारिवारिक उपनाम से फलां परिवार को सादर आमंत्रण लिखकर छोड़ सकता है। उस आमंत्रण के उपनाम से कई लोग पहचाने जाते हैं इसलिए परिवार के कई लोगों में से एक या कुछ व्यक्ति चले जायेंगे।
थाट का बनना गणित पर आधारित है। सरगम के सात स्वरों में से पांच को विकृति दी जा सकती है, यानि कोमल और तीव्र स्वर भी होते हैं। इस तरह कुल सात शुद्ध स्वर और पांच विकृत, बारह स्वर होते हैं। अब अगर पर्मुटेशन-कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करें और सा, पा को केवल शुद्ध स्वर, और रे, गा, म, धा, और नी का एक (कोमल या तीव्र) रूप इस्तेमाल करें तो कुल 32 स्वरुप बनेंगे। अपनी तलाश में पंडित भातखंडे को जो दस थाट प्रबल दिखे, उन्होंने उसमें ही सबको बांटा।
ये जो ज्यादातर थाट हैं, इनसे मिलते जुलते से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के चर्च मॉड भी मिल जाते हैं। एक अंतर ये कहा जा सकता है कि हाई ऑक्टेव पिच के लिए चर्च बच्चों का बंध्याकरण करके उनसे गवाता था। ऐसे एक गाने लायक किन्नर बच्चे के बंध्याकरण में कई बच्चों की मौत भी हो जाती थी। बाद में ये वहशी हरकत ख़त्म हुई तो ऑपेरा के कई हिस्से ही दोबारा तैयार करने पड़े। जो पुरानी पद्दति थी उसे गाने लायक बचपन से बंध्याकरण करके बच्चों को आज तैयार नहीं किया जा सकता। खुशकिस्मती से भारतीय परम्पराओं में ऐसी अमानवीयता नहीं होती, इसलिए रागों को गायब नहीं करना पड़ा।
ये जरूर है कि एक ही व्यक्ति का इतने वृहदाकार संगीत शास्त्र पर काम पूर्ण हो, ऐसा थोड़ा कठिन है। इस वजह से पंडित भातखंडे का वर्गीकरण भी पूरा नहीं माना जाता। दस थाटों में उनके वर्गीकरण पर आगे क्या प्रयास हुए, उन प्रयासों को कितनी सफलता मिली ये भी बहस का मुद्दा हो जाता है। अब आप अगर यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो देखिये कि जो बात संगीत पर होनी थी वो धर्म से शुरू होकर गणित तक पहुँच गई। इतने पे भी स्थिति ये है कि हम ये बताने की कोशिश करें कि राग हिंडोल मारवा थाट का है, या कल्याण थाट का, तो एक बड़ी बहस खड़ी हो सकती है।
तो आप ये भी समझ सकते हैं कि माला की तरह, धर्म से होते हुए, संगीत को जोड़ते जो गणित तक पहुंचा है, वो सबको जोड़ता धागा ही संस्कृति है। हरेक हिस्से की अपनी महत्ता है, साथ आये तो और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
जैसे अब फ़िल्मी गानों में भजन नहीं होते, लोरियां नहीं होती, राखी-दिवाली या फसल की कटनी पर खुश होते किसानों के गाने नहीं होते, वैसे ही अब फ़िल्मी गाने प्रेरक भी नहीं होते। उनसे प्रकृति के बारे में सोचने जानने की कोई उत्सुकता नहीं जागती। संगीत की भारतीय जरूरतों को फ़िल्में अब पूरा नहीं करती, तुलनात्मक रूप से अगर पुराने गाने देखें तो ये अंतर नजर आ जाता है। ऐसा एक पुराना गाना लता मंगेशकर के प्रिय गानों में से एक “ज्योति कलश छलके” भी है। ये गाना १९६१ में आई फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” में था।
जैसा की उस दौर की ज्यादातर फिल्मों में होता था, इसे भी लता मंगेशकर ने ही गाया है। गीत के बोल पंडित नरेंद्र शर्मा के हैं, और संगीत सुधीर फड़के का दिया हुआ है। ये गाना राग भूपाली पर आधारित सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक होगा (और कोई इसपर आधारित हो भी तो हमें याद नहीं)। सुबह एक आम भारतीय घर में कैसे होती थी, या आज भी होती है, वो एक एक कर के गाने में सामने आती जाती है। अब शहरों में, कामकाजी महिलाओं के लिए सुबह ऐसी नहीं होती, माँ के ऑफिस की छुट्टी होना भी बच्चों के लिए उत्सव होता है।
जिस दौर का ये गाना है इसे मीना कुमारी पर फिल्माया गया है और उनके साथ कोई छोटा बच्चा है। इस शरारती से बाल कलाकार का नाम भी पता नहीं। सुबह उठाना, सूर्य को प्रणाम, आँगन में पानी छिड़कना, रंगोली जैसे रोज के कामों में लगी माँ है और वहीँ खेलता शरारत करता उसका बच्चा। कई लोगों के लिए ये नोस्टाल्जिया की फीलिंग भी शायद जगा दे। अगर गाने के बोल सुनेंगे तो भी निरर्थक ठूंसे गए शब्द नहीं मिलते। वो सूरज उगने की प्रक्रिया में आस पास होते बदलाव दर्शाते हैं। बादलों और क्षितिज का रंग बदलना, दूब-घास का ज्यादा हरा नजर आना, ओस की बची बूंदे और फूल, धरती को माँ की तरह सहेजती सहलाती माँ के प्यार जैसी उषा की किरणें।
भारत के शहरों में स्थितियां भले काफी बदल गई हैं, गावों-कस्बों में अब भी कुछ भी रामायण-महाभारत से बाहर नहीं होता। ये गाना भी यशोदा-कृष्ण की पृष्ठभूमि पर ही बनाया गया है। सुबह पर आधारित एक और गाना भी है, जो विजेता फिल्म का था। वो जो “मन आनंद आयो रे” वाला गाना है, वो राग अहीर भैरव पर आधारित है। दोनों देखिएगा, उम्मीद है सुबहें पसंद तो आने लगेंगी।
[ एडिट : मेरा ख़याल था कि राग के बारे में ज्यादा जानकारी पसंद नहीं की जायेगी इसलिए एक पैराग्राफ छोड़ दिया था। फिल्मों में अक्सर जो शास्त्रीय पर आधारित गाने के नाम पर अस्सी के दशक के बाद सुनाई देता रहा वो मुजरा होता था जो किसी तवायफ़ के कोठे पर चल रहा होता था। कोठे पर आम तौर पर ठुमरी चलती है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं होती, इसलिए भी ये बाद की फिल्मों में कम सुनाई दिया। इस राग में सात सुरों में से सिर्फ पांच ही इस्तेमाल होते हैं, सभी सुर नहीं लगते। कोमल और दीर्घ स्वर भी नहीं होते इसलिए ये सीखने के लिए आसान रागों में से एक गिना जाता है। जो शास्त्रीय संगीत सीखते हैं उन्हें शुरू में राग यमन, राग भैरव के साथ राग भूपाली सिखाया जाता है।
संगीत को लिखने का लिहाज देखिये तो भारत में ज्यादातर श्रुति परंपरा रही है, इसलिए इंग्लिश म्यूजिकल नोटेशन की तरह इसे एक ही तयशुदा तरीके से नहीं लिखा जाता। भारत में फ़िलहाल लिखने के दो तरीके, भातखंडे और पालुस्कर दोनों प्रचलन में हैं। राग भूपाली को ही कर्णाटक संगीत में मोहनम कहते हैं और इस से बिलकुल मिलता जुलता एक राग देशकर भी होता है। देशकर और भूपाली में मामूली सा अंतर ये है कि भूपाली कल्याण थाट का होता है और देशकर, बिलावल थाट का। आरोह-अवरोह समझना भी मुश्किल नहीं होता।
सात सुर सा, रे, गा, म, पा, ध, नी एक क्रम में लगभग सबको पता होते ही हैं। राग भूपाली में म और नी इस्तेमाल नहीं किये जाते तो उन्हें हटा कर सीधे यानि बढ़ते क्रम में लिख देते हैं। बढ़ते क्रम में लिखना आरोह (आरोहण यानि उपर चढ़ना) हो जाएगा : सा, रे, गा, पा, ध, सा और अवरोह यानि उतारना होगा : सा, ध, पा, गा, रे, सा। समय के हिसाब से ये रात के पहले पहर का होता है और रस के हिसाब से इसे भक्ति रस का माना जाता है। इसी पर आधारित और फ़िल्मी गाने देखने हों तो एक गाना है “पंख होते तो उड़ आती रे” (सेहरा) या “दिल हुम हुम करे” (रुदाली का) सुन सकते हैं। लेकिन पुराने गाने के बदले बिलकुल ही नए गाने पर तुले हुए हैं तो हाल में एक नए वाले मनोज कुमार यानि अक्षय कुमार की फिल्म आई थी “नमस्ते लन्दन”। उसका एक गाना है “मैं जहाँ रहूँ”, वही तेरी याद साथ है वाला, वो भी इसी राग पर आधारित है। चुनते रहिये। ]
बाजारों चौराहों से गुजरते कभी कंप्यूटर ट्रेनिंग के इश्तेहार देखे हैं ? उनमें अक्सर एक सी शार्प सिखाने का प्रचार होता है | जावा के बगल में ही C # का निशान बना होता है | कभी सोचा है कि ये C# क्या है ? असल में ये एक म्यूजिक नोटेशन होता है | आम तौर पर जो आप हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में सात सुर जानते हैं वैसे ही अंग्रेजी में भी सात ही सुर होते हैं | लेकिन इनके अलावा एक कोमल स्वर के नाम से जाने जाने वाले सुर भी होते हैं |
हिंदी में हम लोग सात सुरों के लिए सा, रे, गा, मा जैसा लिखते हैं वैसे ही ये कोमल स्वर अंग्रेजी में जो होते हैं उनके नाम लिखने के लिए C# या F# इस्तेमाल होते हैं | इसी से प्रेरणा लेकर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का नाम सी शार्प (C#) रखा गया |
अब आप शायद सोच रहे होंगे कि सुर होते कितने हैं ? भारतीय शास्त्रीय संगीत में इनकी गिनती बारह होती है | अगर आप सोच रहे हैं कि आपने शास्त्रीय संगीत नहीं सुना इसलिए आपने सभी बारह सुर नहीं सुने तो आप फिर से गलत सोच रहे हैं | दूरदर्शन का जो पुराना वाला प्रचार होता था “मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा” वाला ! उसमें ये बारह के बारह इस्तेमाल होते हैं | अब फिर अगर आप कहीं ये सोच रहे हैं कि आपने पुराने ज़माने का ये प्रचार तो सुना ही नहीं इसलिए बारह सुर नहीं सुने तो आपने इश्किया फिल्म का “दिल तो बच्चा है जी” तो सुना ही होगा ? उसमें भी बारह सुर इस्तेमाल होते हैं |
इनके अलावा भी कई गाने हैं जो बारह सुर इस्तेमाल करते हैं | जो भी गाना राग भैरवी पर आधारित होता है उसमें ऐसा होगा | राग भैरवी सुबह के समय गाया जाने वाला राग है | किसी क्लासिकल म्यूजिक कॉन्सर्ट में गए होंगे तो आखरी वाला गाना राग भैरवी का होता है | बिलकुल वैसे ही जैसे बार बंद होते समय कैलिफोर्निया वाला गाना बजता है | इसपर आधारित कई गाने हैं, पुराने में “लागा चुनरी में दाग”, “रमैया वस्ता वैया”, “चिंगारी कोई भड़के” जैसे गाने हैं | नयी फिल्मों में जोधा-अकबर का “मनमोहना”, हेट स्टोरी वाला “आज फिर तुमपे प्यार आया है”, लक बाय चांस का “सपनों से भरे नैना” | बहुत से गाने हैं |
राग भैरवी कैसा होता है तो इसे भी सुन सकते हैं | आनन्द कुमार
संकलन अजय कर्मयोगी
रविवार, 7 जुलाई 2019
#पुराणों_में एक कथा है जो कुछ इस प्रकार है...
राजा रैवतक की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे।...... थक-हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए।
.
राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।
गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा- कहो, कैसे आना हुआ?
राजा ने कहा-हे ब्रह्मदेव..... मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं??????
ब्रह्मा जी जोर से हँसे और बोले- जब तुम आये तबतक तो नहीं...... पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर 27 चतुर्युग बीत चुके हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है....अब तुम वहाँ जाओ...... और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो... अच्छा हुआ की तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।
अब विज्ञान की ओर आइए.... प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन की एक थ्योरी पढ़ाई जाती है... थ्योरी आफ रिलेटिविटी ....
आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है- मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है कि यदि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये.... तो वापस आनेपर उसकी आयु मात्र 66 वर्ष की होगी जबकि धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे।....
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अब आप स्वयं सोचिए.... जो बात वैज्ञानिकों को जानने में इतना समय लगा... वो हमारे देश में, सनातन धर्म में... काफी पहले ही पुराणों में लिख दिया गया था....
और इस महान सनातन धर्म के होते हुए धरती को चपटी बताने वाले मजहब के लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ बताए तो इससे बड़ा मजाक कुछ नहीं हो सकता....<
मंगलवार, 25 जून 2019
पुणे में एक नए गुरुकुल की स्थापना हेतु विशेष सेमिनार व विचार विमर्श
वंदे मातरम् साथियों
आचार्य अजय कर्मयोगी जी विश्वप्रसिद्ध 'गुरुकुलम' गुजरात से पधार रहे हैं और पुरे भारत में गुरुकुलीय शिक्षा को स्थापित करने के लिए कार्य कर रहे है वो 26 तारीख को पुणे पधार रहे हैं , हम आचार्य जी के तत्वाधान में 26 तारीख को एक संगोष्ठी का आयोजन करने जा रहे हैं I
गुरुकुल शिक्षा क्या है ? देश में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को क्यों पुनः स्थापित करना चाहिए ? और आधुनिक शिक्षा प्रणाली (लॉर्ड मैकाले शिक्षा प्रणाली) से यह कैसे उत्तम है गुरुकुल से भूख, बीमारी, बेरोजगारी सहित सभी समस्याओं का समाधान कैसे हो? आदि विषयों पर विचार विमर्श करने के लिए व इससे संबंधित अन्य जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है I आचार्य श्री 'अजय कर्मयोगी जी' इस संगोष्ठी को संबोधित करेंगे I इस शुभ अवसर का लाभ उठाने के लिए आप सभी जागरूक देशभक्त सादर आमंत्रित हैं I और 26 तारीख सुबह 3:00 बजे के करीब हम बैठक रखना चाहते है जिसमें हम उनसे गुरुकुल और अन्य विषयों पर चर्चा कर सकते है तो जो जो साथी पुणे या आस पास से है कृप्या सुचित करें ....
सम्पर्क सूत्र :-
श्री दयानंद जी इंगले--9881110267
श्री अजय कर्मयोगी जी - 9336919081
शनिवार, 22 जून 2019
भारतीय योग दर्शन में प्रदर्शन नहीं इस सिद्धांत से दुनिया का कल्याण का विशिष्ट विश्लेषण
योग गुरु बाबाओं के भी गुरु मिल गये
या कहै सेर को सवा सेर मिला
बाबा जो कर सकते हैं वो ये कर सकता है किन्तु जो ये कर सकता है वो बाबा नहीं कर सकते
तो हुआ योग में उनका बाप
https://youtu.be/MWw1-h-d5MI
अब बस एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081
हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्मा को योगशास्त्र का आदि प्रवक्ता कहा गया है। योगशास्त्र को प्राचीनकाल में ‘हैरण्यगर्भशास्त्र’ कहा जाता था। प्राचीन भारतीय इतिहास की आधारशिला पुराणों के अनुसार सृष्टि के आदि में सनकादि ॠषियों, मरीच्यादि प्रजापतियों ने योगसिध्दि प्राप्त की। स्वयंभू मंवंतर में महर्षि कपिल महायोगी थे। उन्होंने अपनी माता देवहूति को ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तियोग तथा अपने शिष्य आसुरि को सांख्यदर्शन का उपदेश दिया। इसी काल में स्वयंभू मनु की पांचवी पीढ़ी में भगवान शिव महायोगी हैं और वे ही तंत्रशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। उनकी पत्नि दक्षपुत्री सती एवं उमा (पावर्ती) भी योगविद्या निष्णात थीं। इस प्रकार सृष्टि के आदिकाल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, शिव, ॠषभदेव, सनत्कुमार, नारद, कर्दम, कपिल तथा वेद ॠचाओं के दृष्टा अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप आदि अनेकों योगसिद्ध साधकों आदि महर्षियों के योगशास्त्र का विस्तार किया।
वैवस्वत मन्वंतर में योगदर्शन के आदि प्रवक्ता भगवान विवस्वान् अर्थात् सूर्य कश्यप थे। उन्होंने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को, मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को योगशास्त्र का उपदेश दिया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययं, विवस्वान्मनवे प्राह, मनुरिक्ष्वाकवे ब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः, स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप॥
अर्थात् हे अर्जुन! आदि में इस योग को विस्वान् सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे मनु को कहा, मनु ने इक्ष्वाकु को कहा और इस प्रकार परंपरा से प्राप्त योग को राजर्षि ने जाना जो कि बहुत काल तक नष्ट हो गया था उसे मैं तुझे कह रहा हूं।
इस प्रकार योगशास्त्र के अध्ययन एवं प्रयोग शिष्य परंपरा के द्वारा सूर्यवंश में हजारों वर्षों तक चला। वैवस्वत मन्वतंर के 24 वें त्रेतायुगांत में महर्षि बाल्मिकी ने भगवान् राम को योगशास्त्र की शिक्षा दी। उस काल में विश्व के आदिकाल महर्षि बाल्मिकी ने भी योगसाधना के ग्रंथ योग-वशिष्ठ और इतिहास ग्रंथ रामायण की रचना की। इसी प्रकार सहस्रबाहू के गुरु भगवान दत्तात्रेय भी योगसिद्ध महात्मा थे जो कि आज भी समस्त वानप्रस्थ-संयासी समुदाय के गुरु माने जाते हैं। छठे अवतार भगवान परशुराम ने योग साधना कर अनेकों सिध्दियां प्राप्त की थी जिनमें मन की गति से यात्रा करना भी शामिल है। इस काल में शेषावतार महर्षि पतंजलि ने हिरण्यगर्भशास्त्र को क्रमबद्ध कर योगसूत्र की रचना की जो कि योगदर्शन के इतिहास में युगांतकारी उपलब्धि थी।
इस काल में मैत्रावारूणि वशिष्ठ कराल जनक, असुरि शिष्य पंचशिख, उनके शिष्य धर्मध्वज जनक, याज्ञवलक्य, उनके शिष्य दैवराजि जनक, विभिन्न ऐक्ष्वाकु जैन तीर्थंकर, कॉम्पिल्यनरेश ब्रह्मदत्त, पतंजलि आदि अनेकों ज्ञात-अज्ञात ॠषियों ने योगदर्शन का विकास किया।
महाभारत काल में गृहस्थ आश्रम के पश्चात् वानप्रस्थ में योगसाधना करके संन्यास आश्रम में प्रवेश करना सामान्य नियम था। महर्षि वेदव्यास प्रणीत श्रीमद्भगवदगीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग, जपयोग आदि का विस्तार से वर्णन है। पातंजलि योगसूत्र पर उनका ‘व्यासभाष्य’ योगशास्त्र के इतिहास की सार्वकालिक रचना है, जिस पर आगामी पांच हजार वर्षों तक अनेकानेक योगियों, विद्वानों ने टीका, वृत्ति, विवरण आदि अनेकों ग्रंथों की रचना की जिनके माध्यम से आज तक हमें योगशास्त्र का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त होता है।
अष्टम् अवतार भगवान कृष्ण को योगिराज कहा जाता है जो कि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों विषयों के जगद्गुरू माने जाते हैं। इस काल में महाभारत युद्ध के समय उपदिष्ट उनकी भगवदगीता योग ही नहीं बल्कि मानवता के इतिहास में अद्वितीय उपदेश है जिसका संकलन कर वेदव्यास भी अमर हो गए। श्रीमदभगवदगीता के ज्ञानयोग, भक्तियोग, निष्काम कर्मयोग आदि विभिन्न योगसाधनाएं पांच हजार वर्षों से ज्ञानियों, गृहस्थों, संयासियों, साधकों के लिए मार्गदर्शन हेतु दीपस्तंभ के रूप में स्थापित है। श्री कृष्ण के ही कुलबंध 22वें जैन तीर्थंकर अरिष्टनेमी या नेमिनाथ ने इसी काल में सौराष्ट्र स्थित गिरनार पर्वत पर योग साधना कर मोक्ष प्राप्त किया। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ इस काल में विख्यात योगी हुए। वेदव्यास से लेकर महात्मा बुद्ध के 1500 वर्षों के अंतराल में योगशास्त्र पर अनेकों प्रयोग, शोध हुए तथा अनेकानेक प्रकार की योगपद्धतियों का विकास किया गया। ‘ब्रह्मपुराण’, ‘शिवपुराण’, ‘अग्निपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ आदि पुराण एवं ‘पंचरात्र’ आदि तांत्रिक ग्रंथ तथा इनके अनुशांगिक साहित्य में योगसाधना की अनेकों पद्धतियों का वर्णन प्राप्त होता है।
1922 ईस्वी में अविभाजित भारत में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई की गई जिसमें सिंधुघाटी की अति-प्राचीन सभ्यता का उद्धाटन हुआ। बाद में भारतीय पुरातत्वशास्त्रियों ने उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर, पंजाब के रोपड़, हरियाणा के कुणाल, बनावाली, शीशवाल, राखी गढ़ी, राजस्थान के कालीबंगन, गुजरात के धौलावीर, सुरकोटड़ा, लोथल, भेट, द्वारका, रंगपुर, राजड़ी आदि स्थानों पर उत्खनन कर सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता का अन्वेषण किया। 1985 ई. में भारतीय भूगर्भ-वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों ने नासा के एक उपग्रह से प्राप्त भूगर्भीय मानचित्र के आधार पर आदि बद्री, हिमाचल प्रदेश से लेकर कच्छ के रण तक 4500 किमी क्षेत्र का सर्वेक्षण कर विलुप्त सरस्वती नदी का उद्धाटन किया। इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता के उत्खनन में विलुप्त पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई जिसमें पशुपति शिव, कार्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े साधक आदि अनेकों योगमुद्राओं में साधकों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी योगशास्त्र को लगभग 3000 ईसापूर्व प्राचीन सिद्ध करती है। अतः महाभारतकालीन साहित्यिक स्रोत एवं सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाण योगशास्त्र की प्राचीनता को समान रूप से प्रमाणित करते हैं।
भारतीय ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार भगवान बुद्ध एवं स्वामी महावीर का काल लगभग कलि संवत् 1500 अर्थात् 1600 ईसा पूर्व है। बौद्ध और जैन दर्शन संयास और मोक्षोपाय के दर्शन हैं। अतः इस काल में चार आश्रमों की जीवनशैली के स्थान पर संन्यास और मोक्ष का महत्व बढ़ गया और इस काल में मंत्रयोग, यंत्रयोग की योगसाधना का बहुत विकास हुआ। इस क ाल में शाक्तमुनि सिध्दार्थ, मेघंकल, शरणंकर, दीपंकर, कौडिन्य, मंगल, सुमन, रैवत, शोभित, अनामदर्शी, पद्म, नारद, सुमेध, सुजात, प्रियदर्शी, अर्थदर्शी, पुष्य, विपश्यिन, विश्वभू, कुसंधि, कनकमुनि, काश्यप और गौतम चौबीस बुध्दों ने योग साधनाओं के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया। हीनयानी बौद्ध ध्यानमार्ग और महायानी बौद्ध अष्टांग योग की साधना करते थे। बोधिसत्व मैत्रेय का ‘सूत्रालंकार’, असंग का ‘योगाचार भूमिशास्त्र’, और वसुबंधु का ‘विज्ञप्तिमात्रतासिध्दि’ आदि इस काल में उल्लेखनीय साधना ग्रंथ है। इन्होंने एक अलग बौद्ध संप्रदाय योगाचार की स्थापना की।
24 वें जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी उनके शिष्य आर्य सुधर्मा, स्थविर संभूति विजय, भद्रबाहू आदि जैन मुनि योगसाधक इसी काल में हुए। गणधर गौतम इंद्रभूति ने जैनसाधना के बारह अंगों और 14 पूर्वों को उपनिबद्ध किया। इस काल में श्वेतांबर और दिगंबर जैन साधकों ने योग विद्या में अनेकों प्रयोग किए और तांत्रिक और शुद्ध यौगिक साधनाओं का विकास किया। बौद्धसंघ की विपश्यना और जैनसंघ की प्रेक्षाध्यान पद्धति का प्रादुर्भाव इसी काल में हुआ। योग-तंत्र मार्ग के अनेकों बौद्ध, जैन साधु इस काल में हुए। भारत की योग दर्शन के
आस्तिक दर्शन के ईश्वर कृष्ण, उद्योतकर आदि सांख्य एवं योग के आचार्य इसी काल की विभूतियां थे। इसी काल में महर्षि गौड़पाद, भाष्यकार पतंजलि एवं गोविंद भागवतपाद ने साधना मार्ग की अनेकों सिध्दियां प्राप्त कीं। ‘जाबालोपनिषद’, ‘योगशिखोपनिषद’, ‘अद्वयतारकोउपनिषद’, ‘तेजबिन्दु उपनिषद’, ‘योगतत्वोपनिषद’, ‘अमृतबिन्दोपनिषद’ आदि योगशास्त्र के ग्रंथों का प्रणयन इस काल में किया गया।
आद्य शंकराचार्य भगवत्पाद का प्रादुर्भाव कलिसंवत् 2593, युधिष्ठिर संवत् 2629 अर्थात् 374 विक्रमपूर्व तदनुसार 509 ईसापूर्व में हुआ। उन्होंने न केवल तत्कालीन भारत में प्रचलित अनेकों दर्शनिक मतों, संप्रदायों, पाखंडों को शास्त्रार्थ से पराजित किया तथा भारत में प्रचलित अनेकों प्रकार की साधना पद्धतियों का समन्वय कर आधुनिक सर्वपंथ-समभाव की आधारशिला रखी। आदिशंकर ने आस्तिक और नास्तिक दर्शनों में प्रचलित, निराकार एवं साकार साधना, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, बुद्धयोग, जैनयोग आदि को समन्वित कर भविष्य के भारतीय दार्शनिक चिंतन, समन्वित कर्मकांड, मोक्ष साधना, संन्यास की मार्गदर्शिका का निर्माण कर मानवता अभियान का सूत्रपात किया। उन्होंने वेदांत, सांख्य तंत्रशास्त्र, स्त्रोत तथा अनेकों साधना ग्रंथों के साथ-साथ योगसूत्र के वेदव्यास पर लिखकर योगशास्त्र की महत्ता को प्रमाणित किया। उन्होंने दशनामी संप्रदाय तथा चार शंकरमठों की स्थापना कर योग साधना परंपरा को स्थायी कर दिया जो कि पूज्य शंकराचार्यों द्वारा आज तक प्रचलित है।
इसी काल में आगे चलकर गुरू मत्स्येन्द्रनाथ आदि तांत्रिक, गुरू गोरखनाथ आदि योगी, भर्तृहरि आदि नाथपंथी, बौद्ध योगी, व्रजयानी तांत्रिक, सिद्ध सरहपाद आदि नवनाथ-चौरासी सिध्दों की परंपरा, जैनमुनि कुंदकुंदाचार्य, उमास्वाति, हरिभद्रसूरि में अनेकों योगियों ने योगशास्त्र का विस्तार किया। सातवीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के वैष्णव आळवार एवं शैव नयन्नार संतो ने भक्तियोग की स्थापना की। इसी काल में वाचस्पति मिश्र ने योगशास्त्र के व्यासभाष्य पर ‘तत्ववैशारदी टीका’ लिखकर विद्वत् समाज में योगदर्शन को प्रतिष्ठापित किया। इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता हठयोग का प्रचलन थी। ‘शिवसंहिता’, ‘घेरंडसंहिता’, ‘सिद्ध-सिध्दांत-पद्धति’, ‘योगसिध्दांत पद्धति’, ‘अवधूतगीता’, ‘हठसंहिता’, ‘हठदीपिका’, ‘कौलज्ञान निर्णय’, ‘कुलार्णव-तंत्र’, ‘विद्यार्णव-तंत्र’ आदि योग-तंत्र के अनेकों ग्रंथ इस काल में रचे गए।
आदि शंकराचार्य के समन्वित दर्शन की आधारशिला पर ही मध्यकालीन निर्गुण और सगुण भक्ति आंदोलन रूपी मानवता से प्रेम की विश्व की अद्वितीय अट्टालिका निर्मित की जा सकी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में 12 वैष्णव अलवार संत और 63 शैव नयनार संत भक्तियोग के प्रवर्तक थे। इसी परंपरा में कलियुग की पंचम सहस्राब्दि के आरंभ में रामानुज के सभी जातियों के लिए भक्तियोग की दीक्षा के द्वार खोल दिए। उत्तर भारत में उनके शिष्य स्वामी रामानंद ने भक्ति मार्ग का प्रचार किया। रामानंद के दो शिष्य ज्ञानयोगी संत कबीर और भक्ति मार्गी संत तुलसीदास विश्व प्रसिद्ध संत हुए। इसके साथ ही यमुनाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, निंबार्काचार्य, बल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, गरू नानकदेव, गुरू रामदास, समर्थ श्री रामदास, गुरू अर्जुनदेव, दशमेश गरू गोविन्द सिंह, संत रविदास, गरीबदास, दादु दयाल, नरसी मेहता, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत सुरदास, मीराबाई, रहीम आदि अनेक भक्तों ने भक्तियोग का प्रचार किया। यहां तक कि भारतीय भक्तियोग ने इस्लाम को भी आकर्षित किया और सूफीमत का प्रादुर्भाव हुआ जो कि विपरित मतों के समन्वय का प्रतीक बन गया। शेख मोइनुद्दीन चिश्ती, शेख निजामुदीन औलिया आदि सूफी संत इसकी काल में हुए। मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ अर्थात् रानी पद्मावती तथा ‘कान्हावत्’ अर्थात् भगवान कृष्ण का चरित्र इस काल की उच्चतम योग-दार्शनिक रचनाएं हैं।
इस कालखंड में योगसाधना में ज्ञानयोग और भक्तियोग अपने चरमोत्कर्ष पर था। एेंद्रीय शक्ति को सिद्धकर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गुप्त साधनाएं और घोर तपस्याओं को छोड़कर भारतीय समाज शुद्ध आचरण और प्रेम साधना की ओर अग्रसर हुआ। इसके साथ ही योगसाधना केवल संयासियों तक सीमित न रहकर समाज में गृहस्थ जीवन में ही निष्काम भाव से मोक्ष की प्राप्ति के लिए सहज साधना का काल आरंभ हुआ। इस काल की सबसे बड़ी विशेषता मानव-मानव में समानता का उद्धोष था।
सके क्यो के अतिरिक्त हिरण्यगर्भ की पातंजल योग परंपरा में भी इसी काल में योगशास्त्र का विस्तार होता रहा। योगसूत्र पर राजा भोज प्रणीत ‘राजमार्तण्ड’, हेमचंद्राचार्य के ‘योगशास्त्र’, विज्ञानभिक्षु प्रणीत ‘योगभाष्य’ और ‘योगस्तर संग्रह’, श्रीनिवास भट्ट की ‘हठसंकेत चंद्रिका’, सुंदरदेव की ‘हठतत्वकौमुदी’, हर्षकीर्ति की ‘हठयोग प्रणाली’, आत्माराम की ‘हठयोग प्रदीपिका’, भोगेश्वरमुनि की ‘योगरत्न’ प्रदीपिका आदि योग साहित्य इसी काल के ग्रंथरत्न हैं।
पुनर्जागरण काल में अनेकों युगपुरूषों ने जन्म लिया। स्वामी दयानंद जैसे उद्भट वैदिक विद्वान, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविंद, महर्षि रमण, स्वामी विशुध्दानंद, तैलंग स्वामी, योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी, गोपीनाथ कविराज, आदि अनेकों योगसाधक इस काल में हुए। ईसा की 20वीं सदी के द्वितीय विभूति महात्मा गांधी ने तो निष्काम कर्मयोग और अहिंसा का प्रयोग न केवल सक्रिय राजनीति में किया बल्कि उनके सत्याग्रह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान दिया। ईसा की 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में श्रीपद प्रभुपाद, आचार्य रजनीश, महर्षि महेश योगी, जैन आचार्य श्री महाप्रज्ञ, बाबा रामदेव आदि महान विभूतियों ने भारतीय योगसाधना और दर्शन का जोर-शोर से प्रचार किया है।
परिणामस्वरूप योगदर्शन और साधना ने भारत से बाहर निकलकर विश्वव्यापी साधना का रूप ले लिया। आज विश्व के सभी मतों, संप्रदायों, पूजा पद्धतियों के मानने वालों आस्तिकों, नास्तिकों ने योगसाधना की ओर आकर्षित होकर मोक्ष प्राप्ति या शारीरिक-मानसिक शांति-संतोष की प्राप्ति के लिए प्रयासरत हैं। इस प्रकार सृष्टि के आरंभ से उदय हुए योग-साधना रूपी दीपक अब सभी मतों के समन्वय रूपी सूर्य बनकर अपनी आभा से विश्व को आलोकित कर रहा है।
संकलन अजय कर्मयोगी
ध्यान - योग - नियम
यमनियमासनप्राणायाम प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोष्टावङ्गानि ।।
आजकल बहोत लोग कहते है कि हम आज्ञाचक्रमे ध्यान करते है । हमे प्रकाशपुंज के दर्शन होते है । एक घंटा दो घंटे समाधि लगती है । ऐसे कही गुरु भी है जो मंत्र देकर कहे देते है ये मंत्र का जाप करो और ध्यान लगाओ । पर कोई उपासना इतनी आसान नही होती । पुस्तक पढ़कर या किसी गुरु के कहे देने से ऐसे ध्यान लग जाय और समाधि अवस्था प्राप्त होती तो पूरी दुनिया योगियो से भरी होती और सतयुग आ गया होता।
किसी भी विषयमे निपुण होना हो तो उन विषय को साध्य करने के अनेक नियम ओर पूरक अभ्यास होते है । ऐसे ही ध्यान समाधि जैसे उच्च उपासना के अष्ट नियम साधना बताई गई है । ये सारे नियम उपासना साध्य करने के बाद ही सालों के बाद योगियो को ध्यान समाधि अवस्था प्राप्त होती है । किसी सम्प्रदाय की शिबिर में गए और ध्यान समाधि लग गई ये तो कोई मूर्ख व्यक्ति की कल्पना मात्र है । कोई भी व्यक्ति आंखे बंद करे और दोनों आंख आज्ञाचक्र की ओर खिंचे तो चित्र विचित्र कलर या कल्पना स्वरूप प्रकाश दिखना वो तो मनुष्य देह की आँख का दृष्टि विज्ञान है , कोई ध्यान समाधि नही । जहाँ सच्चे साधको को साधक गुरु के सनिध्यमे सालों के अभ्यास के बाद साध्य होता है वो आपको बस आंखे बंद करते ही साध्य हो गया ये तो मात्र भ्रामक कल्पना है ।
पंतजलि ऋषिने अष्टांग योग साध्य करने जो मार्ग दिखाया है , संक्षिप्तमे देखते है । यम , नियम , आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग है । इस हरेक विषय को साध्य करे तब समाधि अवस्था प्राप्त होती है ।
1 यम :-
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहा:यमा ।।
पांच सामाजिक नैतिकता
(क) अहिंसा - अहिंसाप्रतिष्ठायांतत्सन्निधौ वैरत्याग: ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अहिंसा से प्रतिष्ठित हो जाने पर उस योगी के वैरभाव छूट जाता है ।
शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना ये अहिंसा है ।
(ख) सत्य -सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफ़लाश्रययत्वम् ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात सत्य से प्रतिष्ठित (वितर्क शून्यता स्थिर) हो जाने पर उस साधक में क्रियाओं और उनके फलों की आश्रयता आ जाती है ।
अर्थात जब साधक सत्य की साधना में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके किए गए कर्म उत्तम फल देने वाले होते हैं और इस सत्य आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर कल्याणकारी होता है ।
विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना ये सत्य की उपासना है
(ग) अस्तेय - अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अस्तेय के प्रतिष्ठित हो जाने पर सभी रत्नों की उपस्थति हो जाती है ।
अस्तेय अर्थात चोर-प्रवृति का न होना । सद्विचार , सदवानी , सद्कर्म , दान , पुण्य , जप जाप भक्ति स्वयम करो । स्वयं पुण्य ऊर्जा प्राप्त करो । न कि कोई सिद्ध गुरु कृपा करदे ओर सब हो जाय ये तो चोरी हुई ।
(घ) ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभ: ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात ब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित हो जाने पर वीर्य(सामर्थ्य) का लाभ होता है ।
ब्रह्मचर्य दो अर्थ हैं-
चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम बरतना ये ब्रह्मचर्य है ।
(च) अपरिग्रह - अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध :।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अपरिग्रह स्थिर होने पर (बहुत, वर्तमान और भविष्य के ) जन्मों तथा उनके प्रकार का संज्ञान होता है । अपरिग्रह का अर्थ आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना । बिना महेनत किय्या ओरो का हक्क नही छिनना ।
2 ;- नियम
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा: ।। पातंजलयोगदर्शन
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान - नियम कहे जाते हैं ।
पाँच व्यक्तिगत नैतिकता
(क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि ।
(ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना ।
(ग) तप - स्वयं से अनुशाषित रहना ।
(घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना ।
(ड़) ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए । इच्छित फल न मिले की मंत्र , गुरु , इष्ट बदलते रहना वो तो मूर्खता मात्र है ।
3 ;- आसन
योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण
आसन शरीर को साधने का तरीका है।
पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है (स्थिरसुखमासनम्। पतंजलि के योगसूत्र में ने आसनों के नाम नहीं गिनाए हैं। लेकिन परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे सम्बंधित ‘हठयोगप्रदीपिका’ ‘घेरण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद’ में विस्तार से वर्णन मिलता है। किसी भी एक आसनमे 3 -4 घंटे तक सुखपूर्वक बैठना वो है आसन सिद्ध होना ।
4 ;- प्राणायाम
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।। पातंजलयोगदर्शन
उस ( आसन) के सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम है ।
योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।
5 ;- प्रत्याहार
इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। अतः चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैं, जिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं।
6 ;- धारणा
मन को एकाग्रचित्त करके ध्येय विषय पर लगाना पड़ता है। किसी एक विषय का ध्यान में बनाए रखना। एक ईश्वर के स्वरूप में पूर्ण भाव स्थिर करना ।
7 ;- ध्यान
किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है। जब ध्येय वस्तु का चिन्तन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
8 ;- समाधि
यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है। समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं : सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाताहै।
ध्यान योग उपासना की ये सब प्राथमिक समज है । बाकी तो सद्गुरु के सनिध्यमे सालों तक के अभ्यास के बाद ही ये अवस्था प्राप्त होती है । नेति धोती नाड़ी शोधन सहित अनेक क्रिया है जो सद्गुरु के सनिध्यमे की जाती है । कुंडलिनी जागरण या सप्तचक्र जागृति उपसनामे भी ये सब साध्य होना चाहिए । बिनाकोइ सद्गुरु के मात्र पुस्तक या अन्य माहिती के आधार पर या लेभागु व्यापारी संस्थानों के गुरुओं से अगर ये क्रिया करते हो तो आंख , दिमाग और नाड़ियों के अनेक रोग भी संभव है , इसलिए सोच समझ कर ही ये क्रिया करे
शुक्रवार, 21 जून 2019
योग अपने मार्ग से भटक कर भोग का मार्ग पकड़ा
भारतीय जीवन दर्शन और उसका मार्गदर्शन करने वाली ज्ञान परंपरा में जीव का लक्ष्य निर्धारित है-मोक्ष। योग, मोक्ष प्राप्ति का ही एक मार्ग है। यह इतनी ऊंची और श्रेष्ठ विधा र्थी परंतु आज इसका पतन हो कर भोग का मार्ग बन गई है जो शरीर और इंद्रियों के सुख के लिए इसका उपयोग उपभोग किया जा रहा है भोग से ही रोग की उत्पत्ति होती है आज इसी योग के सहारे भोगों को भोगने के लिए पुनः शरीर और मन को तैयार कराया जा रहा है जिससे योग अपने मार्ग से भटक कर भोग का मार्ग बन गया है
योग का एक अन्य अर्थ है आत्मा का परमात्मा से योग।
प्रश्न उठता है मोक्ष प्राप्ति या आत्मा के परमात्मा से मिलने की प्रक्रिया क्या है ? इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि ने किया, जिसे अष्टांग योग कहा। अष्टांग योग यानि-यम,नियम,आसन प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान और समाधि। जो मानव शरीर या आत्मा इन प्रक्रियाओं को पूरा करेगी वही मोक्ष या परमात्मा से मिलने की अधिकारी है।
यम- अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह।
नियम- शौच,संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिनिधान।
आसन- शारीरिक यौगिक क्रियाओं की विविध श्रंखला। प्राणायाम-श्वास-प्रश्वांस की विभिन यौगिक क्रियाएं।
जब मानव शरीर या आत्मा इतनी प्रक्रियाएं पूरी करती है तब वह प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि के लिए तैयार होती है। तब योग पूर्ण होता है।
अष्टांग योग की कुछ प्रक्रियाएं, आसन-प्राणायाम आदि सिर्फ मनुष्य को शारीरिक रूप से स्वस्थ रखती हैं।
शेष जो कुछ है वह वैश्विक बाजार में सिर्फ एक चिकित्सकी प्रोडक्ट है।
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