भारतीय सभ्यता और संस्कृति में योग और संगीत का समावेश भी प्राचीन काल से है। स्वर साधना स्वयं एक यौगिक क्रिया है जिसमें मन, शरीर व प्राण तीनों में शुद्धता एवं चैतन्यता आती है। भारतीय संस्कृति में योग के साथ संगीत का गहरा रिश्ता रहा है। योग के सिद्धान्त के अनुसार श्वासों से जुड़ना अर्न्तमन से जुड़ना है और व्यक्ति जब अन्तर्मन से जुड़ जाता है तो ऋणात्मक संवेग कम हो जाता है और धनात्मक संवेग स्थायी होने लगते हैं। ये धनात्मक संवेग मनोविकारों से व्यक्ति को दूर रखते हैं।
किंवदन्ती है कि समुद्र गुप्त जब वीणा वादन करता था तो उसके उपवन में बसंत ऋतु का आभास होता था। संगीत द्वारा पेड़ पौधों को रोग-ग्रस्त होने से बचाया जा सकता है। पं0 ओम्कार नाथ ठाकुर जी ने भैरवी के प्रभाव को पौधों पर महसूस किया। विद्वानों के मत से चारूकेशी राग से धान का उत्पादन बढ़ता है। भरतनाट्यम् नृत्य फूलों के बढ़ने में सहायक है। अन्नामलाई विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र के विशेषज्ञ डा0 टी0सी0एन0 सिंह ने ध्वनि तरंगों के प्रयोग द्वारा पौधों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि की बात स्वीकार की है। संगीत के मधुर स्वर से पौधों में प्रोटोप्लाज़्म कोष में उपस्थित क्लोरोप्लास्ट विचलित व गतिमान हो जाता है।
बहेलियों के बीन तथा सपेरे के बीन बजाने पर मृग व सर्प मोहित हो जाते हैं। कनाडा में संगीत सुनाकर अधिक दूध गायों से प्राप्त किया जाता है। पं0 ओमकार नाथ ठाकुर जी ने नाद की महत्ता को स्वीकार करते हुये कहा है कि- ‘‘मैंने नाद की मधुरता से हिंसक जानवर शेर, चीतों आदि की आँखों में कुत्ते सी मोहब्बत पलते देखी है।''
स्पष्ट है कि संगीत कला ऐसी कला है जो मन की गहराईयों को छूकर परमानन्द की प्राप्ति कराती है। यह रोगी को निरोगी और संवेदनाशून्य को संवेदनशील बनाती है। भारतीय संगीत प्रेरणा व प्राण शक्ति को पहचान कर पाश्चात्य विद्वानों की मान्यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्टि करने लगी हैं। संगीत के माध्यम से विभिन्न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किये जा रहे हैं वे अत्यन्त चमत्कारिक एवं सम्भावनाओं से परिपूर्ण हैं।
भारतीय संगीत की प्रमुख विशिष्टता ‘रागदारी संगीत' है। राग भारतीय संगीत की आधारशिला है। इसके अर्न्तनिहित स्वर-लय, रस-भाव अपने विशिष्ट प्रभाव से व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करता है। स्वर तथा लय की भिन्न-भिन्न प्रक्रिया उसकी शारीरिक क्रियाओं, रक्त संचार, मान्सपेशियों, कंठ ध्वनियों आदि में स्फूर्ति उर्जा उत्पन्न करते हैं तथा व्याधियों को दूर करते हैं।
विभिन्न रोगों के लिये संगीतज्ञों एवं संगीत चिकित्सकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने कुछ राग निश्चित किये हैं, जो उन रोगों को दूर करने में सहायक सिद्ध हुये हैं, हो रहे हैं।