गुरुवार, 4 अगस्त 2022

नटवर हों या नटराज !! तांडव नृत्य या रास हो या कालियनृत्य नाट्यशास्त्र दशरूपक रंगकर्म की आधुनिक संस्करण


      






 महातांडवसाक्षिणी
ललितासहस्रनाम में एक अवधारणा है > महातांडवसाक्षिणी।
नृत्य के तीन विंब और तीन अभिप्राय हैं
>[१]जब शून्य [शव] पर आद्या नृत्य कर रही है।
यह प्रलयकाल है,तिरोभाव की अवस्था।
 ब्रह्म निष्क्रिय है और साक्षी है,त्रिगुणात्मक शक्ति नृत्य-निरत है।
[२]जब शिवा-शिव परस्पर साक्षी होकर के अथवा दोनों मिल कर युगलनृत्य कर रहे हैं।यह सृष्टिकाल है।
[३] प्रलयकाल के आगमन का नृत्य, जब परम- भैरव सृष्टि को समेट कर आत्मसात करते हुए तांडवनृत्य कर रहे हैं!वहां भगवती महातांडवसाक्षिणी हैं।
शिव के आनन्दनृत्य की चर्चा!!
संसार की अन्य परंपराओं में कहीं ऐसा है या नहीं? मैं नहीं जानता , कि नृत्य के माध्यम से विश्वबोध[सृष्टि; आविर्भाव- तिरोभाव] की विवेचना की गयी हो !
महान कलावेत्ता आनन्द कुमारस्वामी जी ने पुस्तक लिखी > THE DANCE OF SHIVA[A.K.Coomaarsvami] नटवर हों या नटराज!!रास हो या कालियनृत्य !
विचारकों ने उसी प्रकार से व्याख्या की है, जैसे तांडव और लास की।
महाकवि जयशंकरप्रसाद ने इस नृत्य का प्रसंग इस प्रकार चित्रित किया है >>>>>
चिति का स्वरूप यह नित्य जगत।
वह रूप बदलता है शत-शत,
कण विरह-मिलनमय नृत्य-निरत,
उल्लासपूर्ण आनन्द सतत।
[कामायनी : जयशंकर प्रसाद]

सनातन धर्म - हसता नाचता धर्म
इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद्भद्रा देवहूतिर्नो अद्य । प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः ॥
ऋग्वेद में नृत सूनृत आदि शब्दों का प्रयोग बहुलता से है। ऋग्वेद में खोजेंगे तो पदे-पदे प्राप्त होगा। उन सभी मन्त्रों को यहाँ लिख पाना सम्भव नहीं है।
नृ से नृत्य .. नृ अर्थात् वह मनुष्य जो नृत्य कर सकता है, जहाँ नृत्य है वही सूनृत है और जहाँ नृत्य की अवस्था नहीं वह अनृत है।
वैदिक ऋषि की कामना दीर्घायु होकर हसते नाचते हुये मृत्यु को वरण करने की है।
वेद मन्त्रों में अंगुलियाँ फैलाकर नृत्य करने की बात है, इन्द्र भी नर्तक है शिव भी । अग्नीषोमात्मक जगत् हरिहर रूप है। अग्नि रुद्र हैं सोम को हरि कह सकते हैं , सोम हरिताभ है।
ऋषियों ने नाचते गाते हुये ही ईश भक्ति की क्योंकि ईश्वर भी नाचता हुआ और हसता हुआ है।

नाच गोविन्दा नाच
अयं वां कृष्णो अश्विना हवते वाजिनीवसू । मध्वः सोमस्य पीतये ॥

दसवीं सदी में राजा भोज से पूर्व मालवा की धारा नगरी ने साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में उज्जयिनी के वैभव को बहुत पीछे छोड़ दिया था। वह समय भोज के पितृव्य मुञ्ज का था, जिन्हें वाक्पतिराज द्वितीय के नाम से जाना जाता है।मुञ्ज का शासनकाल सन् 974 से 994 तक का माना जाता है । राजा मुञ्ज ने 16 बार चालुक्यवंशी राजा तैलपदेव पर आक्रमण किया। अंतिम युद्ध के बाद मुञ्ज तैलपदेव को बंदी बना कर उज्जयिनी ले आये, और फिर उदारतापूर्वक छोड़ भी दिया । कुछ ही दिनों बाद तैलपदेव ने फिर आक्रमण कर दिया, और मुञ्ज को पराजय झेलना पड़ी । कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए मृत्यु का वरण करना पड़ा ।

वाक्पतिराज मुञ्ज विद्वानों, कवियों और कलाकारों से प्रेम करते थे , वे सरस्वती के अनन्य उपासक थे । राजा मुञ्ज की मृत्यु पर कही गई उक्ति धार के लोगों की जुबान पर अब तक है। ” गते मुञ्जे यश:पुञ्जे निरालम्बा सरस्वती “, अर्थात् यशस्वी मुञ्ज के चले जाने से तो सरस्वती का भी सहारा चला गया।
मुञ्ज के समय में धारानगरी में दो भाई रहते थे । बड़े भाई का नाम था धनञ्जय ,और छोटे का नाम था धनिक। दोनों भाई साहित्य में रुचि रखने वाले योग्य विद्वान् थे। दोनों ही कुशाग्र थे, और दोनों पर ही मुञ्ज की स्नेह-दृष्टि थी। यह समय आज से लगभग 1100 वर्ष पहले का है। सभाओं में भास, कालिदास, भट्टनारायण, भवभूति के नाटक खेले जाने की परम्परा थी। धनञ्जय और धनिक दोनों की ही गहरी रुचि संस्कृत नाटकों में थी, प्राय: दोनों मिल कर ही नाट्यनिर्देशन और रंगकर्म करते, और मुञ्ज की उपस्थिति में नाट्यसभाओं का आयोजन होता।
उन दिनों धारा नगरी में नाटक एक आन्दोलन की तरह था, और ये दोनों भाई ही इस सांस्कृतिक आन्दोलन के सूत्रधार थे। इसी दौर में बड़े भाई धनञ्जय ने नाट्यशास्त्र पर तीन सौ कारिकाएँ लिखीं, और छोटे भाई धनिक ने उन कारिकाओं पर साथ ही साथ ‘अवलोक’ नामक टीका भी लिखी। धनञ्जय की इन कारिकाओं का संग्रह ” दशरूपकम् ” के नाम से जाना
जाता है। यह ‘दशरूपक’ प्राचीन नाट्यशास्त्र का आधुनिक संस्करण माना जाता है, और ग्यारह सदियाँ बीत जाने के बाद आज भी यही एक ग्रंथ है, जिसके सूत्र नाटककारों की अमूल्य निधि समझे जाते हैं ।
मालवा की सांस्कृतिक राजधानी रही धारा नगरी में लिखा गया ‘दशरूपकम्’ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय ग्रंथ है। यह ग्रंथ चार प्रकाशों (अध्यायों )
में बाँटा गया है। ‘दशरूपकम्’ में नाटक के लक्षण, नाटक की पञ्चसन्धियों, कथावस्तु के भेदों के साथ नायक और नायिकाओं के भेदों को सरलतापूर्वक समझाया गया है। नाटक में रसों की महत्ता, पात्रों की संख्या, मंचनिर्माण की प्रक्रिया और रसास्वादन के प्रकारों पर भी विस्तार से चर्चा हुई है ।
‘दशरूपकम्’ में जो कारिकाएँ हैं , वे सामान्यत: कुछ सूत्रों को मिलाकर बने हुए सम्पूर्ण छंद हैं। उदाहरण के लिये देखिए- “अवस्थानुकृतिर्नाट्यं। रूपं दृश्यतयोच्यते। रूपकं तत्समारोपात्। दशधैव रसाश्रयम्। “धनञ्जय ने बहुत ही अच्छी तरह समझाया है कि नाटक अवस्था की अनुकृति है। नाटक “रस” पर ही आश्रित होता है, और नृत्य “भाव” पर आश्रित होता है। ताल और लय पर जो होता है, वह “नृत्त” कहलाता है। धनिक ने अपनी अवलोक टीका से ‘दशरूपकम्’ में चार चाँद लगा दिये हैं। संस्कृत साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण और चुने हुए काव्य-अंशों को एक जगह ला कर धनिक ने बड़े भाई की इस अनुपम कृति को रोचक बना दिया है। ‘दशरूपकम्’ एक विश्वस्तर का शास्त्रीय ग्रंथ है, किंतु आप इसे विविध रसों से परिपूर्ण आह्लादमयी कविता की तरह भी आराम से पढ सकते हैं।
दशरूपककार धनञ्जय के बाद नाट्यशास्त्र का कोई बड़ा आचार्य अब तक नहीं हुआ। धनञ्जय के बाद भट्टनायक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र , मम्मट, शारदातनय, विश्वनाथ आदि ने धनञ्जय की शैली तो अपनायी, किन्तु शारदातनय को छोड़ कर कोई भी नाट्यशास्त्र के नहीं, काव्यशास्त्र के ही आचार्य हुए।
नि:सन्देह ‘दशरूपक’ अकेले धनञ्जय का पराक्रम नहीं है। छोटे भाई धनिक की बहुमूल्य टीका को वहाँ से हटा लिया जाए, तो शायद यह एक नीरस ग्रंथ हो। पूरे ‘दशरूपकम्’ में धारा नगरी के इन दोनों भाइयों की उपस्थिति साथ-साथ अनुभव होती है। धनिक ने तो बाद में ‘काव्यनिर्णय’ ग्रंथ भी लिखा था। धनिक का पुत्र वसन्ताचार्य भी बड़ा विद्वान् था। वह भी मुञ्ज की राजसभा में सम्मानित हुआ था।
दशरूपक के समापन में धनञ्जय ने एक श्लोक लिखा है, जिसमें वे धारनरेश के प्रति अत्यंत कृतज्ञ होकर कहते हैं कि मुञ्ज की राजसभा में कुशलता को प्राप्त करने वाले
विष्णुपुत्र धनञ्जय ने पंडितों के मन को प्रसन्नता व प्रेम में बाँध लेने वाले इस दशरूपक का “आविष्कार ” किया है।
“विष्णो: सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्धहेतु: ।
आविष्कृतं मुञ्जमहीशगोष्ठीवैदग्धभाजा दशरूपमेतत्।।” अत्रि विक्रमार्क  

नृत्य शब्द की अर्थ पूर्ण प्रस्तुतिऔर भाव की अभिव्यक्ति का सुंदर सृजन है। भारतीय मनीषा ने नृत्य के शास्त्र का विकास किया है
और संसार को ऐसा सुंदर उपहार दिया जिसका विज्ञान,
गणित, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र,  नृशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र है। यह ऋग्वेद से लेकर नाट्यवेद तक का अभिन्न अंग है।
हम नृत्य को केवल चक्कर लेना भर समझते हैं तो समझना चाहिए कि बिल्कुल नहीं समझते। समरांगण सूत्रधार का अंतिम अध्याय पांडुलिपियों में अधूरा मिला, अपराजितपृच्छा में भी नृत्य सूत्र अधूरा था, अशोकमल्ल का नृत्य अध्याय अधूरा, अभिनय दर्पण का पाठ खंडित और नृत्तसंग्रह भी आधा अधूरा... इस विषय को अनेकविध जानने का उपाय था विष्णुधर्मोत्तर पुराण का नृत्तसूत्र, महाराणा कुम्भा कृत नृत्य रत्नकोश और मानसोल्लास की चतुर्थ विंशति, पुंडरिक विट्ठल का नर्तन निर्णय, जॉय सेनापति की नृत्य रत्नावली और भारताचार्य का नाट्य शास्त्र... भारत की यह विरासत दरबार से लेकर जनजातियों तक बनी रही है।
भारत ने नाट्यकला को वेद का दर्जा दिया है। पंचम वेद अर्थात् नाट्यशास्त्र। इसकी रचना का श्रेय आचार्य भरत को दिया जाता है लेकिन उन्होंने प्राचीन नाट्य शास्त्र को पितामह प्रोक्त कहा है। यह विश्वास व्यक्त किया है कि अनेक शास्त्र जो पहले थे, उनकी रचना किसने की? स्मृति में भी उन रचनाकारों के नाम नहीं रहे... तो जो-जो जिस विषय का प्रवर्तनकर्ता रहा, वह उसका पितामह माना गया!
भरत ने स्वयं अपने विषय के लिए "ब्रह्मभरत" कहा है। अनेक ग्रंथों में इस विभूतिप्रद ग्रंथ का उल्लेख है। महाभारत के आरण्यक पर्व तक यह कहकर ऋषि रूप भरतसिंह का उल्लेख किया है कि वे नृत्य, गीत विद्या के विशेषज्ञ हैं और लंकेश रावण की सभा में प्रतिष्ठित थे : ऋषिं भरतशार्दूल नृत्यगीतविशारदाः।
कितने आश्चर्य की बात है कि भारत के पास प्रदर्शनधर्मी कलाओं के शताधिक ग्रंथ और उनकी टीकाएं हैं। नाट्य शास्त्र की टीका तो स्वयं आचार्य अभिनव गुप्त ने की और दशरूपक, नाट्यदर्पण, अभिनयदर्पण, नाट्य लक्षण रत्नकोष की चर्चा के बिना कोई टीका पूरी ही नहीं होती। लोक भाषाओं में भी नाटक लिखे और मंचित हुए। इनके तीन स्वरूप हैं : घरेलू नाटक, पथीय नाटक और मंचीय नाटक। नाटक जीवन का दर्शन है और जीवन के लिए ही जीवंत होता है...।
नाट्य रंगमंच और राेम
भारत में नाटकों की सुदीर्घ परंपरा रही है। यूं तो वेदों में नाटकाें की तरह के संवाद मिलते हैं, किंतु स्‍वतन्‍त्र नाट्यशास्‍त्र भी कम पुराना नहीं है। उसमें पूर्ववर्ती शैलालिन सूत्रादि के स्‍मरण से ज्ञात होता है कि भरताचार्य, जिनका काल चौथी सदी ईसापूर्व से लेकर पहली सदी तक अनुमानित किया गया है, से पूर्व भी इस संबंध में काेई विशिष्‍ट शास्‍त्र भारत में विद्यमान था। हरिवंश, रामायण आदि में कई नाटकों के मंचन के संकेत मिलते हैं और नाट्यशास्‍त्र में भी नाटकों के मंचन होते रहने की लोक परंपरा के संदर्भ मिलते हैं। दरअसल नाट्यशास्‍त्र की रचना के मूल में लोक और वेद का सम्मिश्रण करने का विचार ही निहित है।
नाटकों की प्रस्‍तुति का उद्देश्‍य था - ये राज्‍य सदा फले-फूले। इस रंगमंच की आशाओं को समृद्धि सुलभ हो तथा प्रेक्षाकारक सज्‍जों को वेदों में वर्णित धर्म की प्राप्ति हो -
राष्‍ट्र प्रवर्धतां चैव रंगस्‍याशा समृद्धयतु।
प्रेक्षाकर्तुर्महान्‍धर्मो भवतु ब्रह्मभावित:।। (नाट्यशास्‍त्र 5, 108)
नाट्यशास्‍त्र का सबसे गौरवशाली पहलू है नाट्यशाला की रचना। द्वितीय अध्‍याय में रंगमण्‍डप, रंगपीठ के संबंध में जो वर्णन है, वह दुनियाभर में अनूठा ही है क्‍योंकि उसमें षड्दारुक, नेपथ्‍यगृह के साथ साथ ऊह, प्रत्‍यूह, संजवन, सालभंजिका सहित निर्यूह, कुहर, चित्र जालक, गवाक्ष, कपोताली, कुट्टिम और अनेकानेक स्‍तंभों वाली नाट्यशाला के संबंध में जो विवरण आया है, वह भारतीय रंगमंचीय विधान की विराटता को दर्शाता है। भारत कें गुहाओं के काल से लेकर राजधानियों में भी रंगमंचों की रचनाएं हुई हैं। महराणा कुंभा कृत सगीतराज, श्रीकुमार के शिल्‍परत्‍नम्, मानसोल्‍लास, मानसार आदि में भी रंगमंचीय स्‍वरूप का संदर्भ निर्माण के क्रम में आया है।
कई आश्‍चर्य है इस नाट्यशाला की रचना में, कल मुझे रोम की संस्‍कृतिकर्मी सुजान्‍ने फेर्रअरी Suzanne Ferrari ने अपनी एक साइट्स के बारे में बताया तो उसमें नाट्यशाला का विवरण पढ़कर भारतीय परंपरा की ओर झांकने का मन बन गया। वैसे भारत का रोम के साथ संबंध पुराना संबंध रहा है। रोम के व्‍यापारियों का भारत आना जाना रहता था। पंचसिद्धांतिका का रोमकसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत आदि का यवनपुर... न जाने कितने संदर्भ हमारे पास हैं मगर एक संदर्भ नाट्यशाला का भी है... तुलना की जा सकती है। साभार श्रीकृष्ण जुगन

रविवार, 24 जुलाई 2022

अब बैंक कर्ज़ देकर मुद्रा छाप लेता है । किसी प्रिटिंग press की जरूरत नहीं ।केवल एक entry काफी है

   

   

पहले currency का आधार gold standard हुआ करता था । यानि केंद्रीय बैंक उतनी मुद्रा ही छापता था जितना उसके पास gold reserve है । इससे महंगाई ,उपभोग नियंत्रण में रहता था । पूरा विश्व खुशहाल था । अमीरी गरीब में इतना अंतर नहीं था ।

फिर आया fiat currency का ज़माना , gold standard को त्याग दिया गया । उपभोग को बढ़ाने के लिये fiat currency प्रचलन में आई । इससे महंगाई बढ़ने लगी और सरकारों के पास अथाह शक्ति आ गई खर्च करने की । आजकल के currency notes इस बात का उदहारण है ।

फिर आई बारी reserve financing द्वारा मुद्रा छापने की । जिससे मुद्रा छापने की शक्ति बैंकिंग के पास भी चली गई ।
इससे महंगाई ,गरीबी , धन की लूट ,भ्रष्टाचार बढ़ने लगा । पैसा विदेशों में ट्रांसफर कर विदेशों में भाग जाने का दौर शुरु हुआ ।
अब बैंक कर्ज़ देकर मुद्रा छाप लेता है । किसी प्रिटिंग press की जरूरत नहीं ।केवल एक entry काफी है और एक voucher जिस पर आपके sign होतें है । मान लो आप 10 लाख कर्ज़ लेनें जातें है तो बैंक आपको नकद नहीं देता । 10 लाख की एक entry आपके loan account में debit कर दी जाती है । औऱ 10 लाख की एक एंट्री आपके सेविंग account में क्रेडिट कर दी जाती है ।
बस हो गया 10 लाख की करेंसी का निर्माण । अगर बैंक को किसी को 100 करोड़ भी देना हो तो बैंक के पास 100 करोड़ नकद नहीं चाहिये । उनके पास अधिक से अधिक 10%यानी की राशि नकद चाहिए

कै रोना काल में इसी reserve financing के माध्यम से 27 लाख करोड़ का पैकेज अरबपतियों को दिया गया जो एक प्रकार का कर्ज था ।
यह कर्ज़ जो reserve financing की मदद से बड़े लोगों को दिया जाता है वह धीरे धीरे आम लोगों पर चढ़ जाता है । जिससे उनकी सेविंग समाप्त हो जाती है और वह कर्जदार हो जातें हैं ।आम इंसान की सारी सेविंग धीरे धीरे बड़े लोगों के पास चली जाती है ।
उदहारण के लिये 1960-70 तक अमेरिका में 80% सेविंग आम लोगों के पास थी । फिर reserve financing से आम आदमी की सारी सेविंग कॉर्पोरेट के पास पहुँचा दी गई । आज अमेरिका में आम आदमी के सिर पड़ कर्ज़ है और उनकी सारी सेविंग कॉरपोरेट के पास है ।
भारत में यह प्रक्रिया 1992 में शुरू हुई जिसको आर्थिक सुधारों का नाम दिया गया । और आजतक जारी है । तभी आपने देखा होगा कि पहले भारत के हरेक व्यक्ति के पास सेविंग होती थी आज भारत के अधिकतर व्यक्तियों के ऊपर कर्ज़ है ।
सरकार के लिये सुझाव ।
सरकार पहले reserve financing से fiat करेंसी पर आए फिर fiat currency से गोल्ड standard पर वापिस आये ।

आम लोग अगर कर्ज़ ना लेने का प्रण कर लें तो इस व्यवस्था के मक्कड़जाल से बच सकतें है अगर अधिकतर लोग यह निर्णय कर लें तो यह व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है । उपभोग कम करें , कर्ज़ ना लें ।


बुधवार, 20 जुलाई 2022

सबसे अमीर राजा मनस मूसा के माध्यम से अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था धूर्त इतिहासकार कहते वास्को डी गा मा ने भारत खोजा

    मनस मूसा के कारवां में 60 हज़ार लोग शामिल थे और इनमें 12 हज़ार तो केवल सुल्तान के निजी अनुचर थे. मनसा मूसा जिस घोड़े पर सवार थे, उससे आगे 500 लोगों का दस्ता चला करता था जिनके हाथ में सोने की छड़ी होती थी. मनसा मूसा के ये 500 संदेशवाहक बेहतरीन रेशम का लिबास पहना करते थे.
इनके अलावा इस कारवां में 80 ऊंटों का जत्था भी रहता था, जिस पर 136 किलो सोना लदा होता था. कहा जाता है कि मनसा मूसा इतने उदार थे कि वे जब मिस्र की राजधानी काहिरा से गुजरे तो वहां उन्होंने ग़रीबों को इतना दान दे दिया कि उस इलाके में बड़े पैमाने पर महंगाई बढ़ गई.


 मनसा मूसा की इस यात्रा की वजह से उनके दौलत के क़िस्से यूरोपीय लोगों की कान तक पहुंचे. यूरोप से लोग सिर्फ़ ये देखने के लिए उनके पास आने लगे कि उनकी दौलत के बारे में जो कहा जा रहा है वो किस हद तक सच है.
मनसा मूसा की दौलत की जब पुष्टि हो गई तो उस वक्त के महत्वपूर्ण नक़्शे कैटलन एटलस में माली सल्तनत और उसके बादशाह का नाम शामिल किया गया.14वीं सदी के कैटलन एटलस में उस वक्त की उन तमाम जगहों का वर्णन है जो यूरोपीय लोगों को मालूम थी.
मनसा मूसा जो था वो बड़ा विजनरी राजा था। वो केवल धन दौलत ही नहीं बल्कि ज्ञान का भी भूखा इंसान था। वो मक्का शहर में जमकर सोने को व्यय किया। और वो व्यर्थ में ही सोना व्यय नहीं किया बल्कि उसके बदले उन्होंने ढेर सारे किताब खरीदे जो ज्योतिष शास्त्र, आयुर्वेद, गणित और विज्ञान से संबंधित थे।
अपने साथ वो इन क्षेत्रों के विद्वानों के साथ- साथ अनुवादक भी अपने साथ माली ले आया। वो जानता था कि जितना धन हम सोने से कमा पा रहे हैं उससे ज्यादा हम नॉलेज से कमायेंगे। इन विद्वानों और किताबों की मदद से माली अफ्रीका ही नहीं बल्कि विश्व के लिए ज्ञान का केंद्र बन के उभरा। बड़े बड़े लाइब्रेरी स्थापित हुए.. यूनिवर्सिटी बनी। इनके समय में माली विश्व के सबसे धनी देशों में से आता था। और किताबों की मदद से ही माली ने सोने से भी ज्यादा का व्यापार किया बल्कि करता ही रहा जब तक कि घाघ यूरोपीयन्स न आ गए। इन लोगों ने एक जीती जागती और फलरिश करते देश को लूट के गरीब बना दिया... जैसे भारत की विश्व की 35% की जीडीपी जाते जाते केवल 2% तक रह गई। माली के लोगों किताबों की रेगिस्तान के बालू में गाड़-गाड़ के संरक्षित करने का प्रयास किया,जबकि कई बड़े पुस्तकलाय जला दिए गए।
अब जरा सब को मिलाते हैं...
अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था .. ये अरबी अनुवाद रोमन साम्राज्य तक भी पहुँचा फिर वहाँ भी इसका अनुवाद हुआ। अब्बासी वंश के दूसरे खलीफा अल-मंसूर (770 ई) के दरबार में भारतीय ज्योतिषाचार्य के माध्यम से मोहम्मद इब्न इब्राहिम अल-फजरी ने भारतीय ज्योतिष को अरबी में अनुवाद किया। 600 ई में ही भारतीय गणितज्ञ विराहांक ने अरबी में भारतीय वैदिक गणित का अनुवाद कर रहे थे जिसे Liber-Abbaci में संकलित किया जा रहा था। इसी तरह अन्य ज्ञान भी अरबी में अनुवादित हो रहे थे। और ये अनुवादक कालीकट राजा के अधीन होते थे.. इन अनुवादों के बदले राजा को अनगिनत रॉयलिटी मिलती थी जो सोने में आदान प्रदान होता था। और इन सभी किताबों को मनसा मूसा ने भारी कीमत दे कर खरीदा था फिर अपने साथ माली ले गया था।(यूट्यूब में आप ढेरों डॉक्युमेंट्री देख सकते हैं इसके ऊपर). और जब मनसा मूसा कुछ अनुवादित किताबों के बदले सोने से भी ज्यादा व्यापार कर सकता था तो केरल राजा कितना कर सकता था अनुमान लगा लीजिये।
माली राजा सोने के बदले नमक खरीदता था.. और यूरोपीयन और मिडिल ईस्ट के व्यापारी सोने के बदले भारत से मसाले, चन्दन,नील आदि खरीदते थे।
मूसा के 9 वर्ष बाद जब इब्न बतूता हज के लिए मक्का पहुँचा तो उसने भारत के बारे में बड़ा सुना.. फिर वो वहाँ से जमीनी मार्ग से होते हुए दिल्ली पहुँचा... कुछ समय पश्चात वो करीब 1342 के आस पास कालीकट भी पहुँचा। और उसने हर गतिविधि और वैभवता को अपनी किताब में उकेरते भी गया।
1498 में कालीकट के तट पे पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा आता है और बोलता है कि हमने भारत को खोज लिया!! बुड़बक कहीं के। साले चोरकट लूटेरे।
ये तो हो गया हलेलुइया!!
इससे पहले .. जोल्हेलुइया का भी देख ले।
चेरामन पेरुमल का नाम तो सुने होंगे ? नहीं सुने तो बता देते हैं.. ये कालीकट के राजा हुए.. मोहम्मद के समय। इनके जैसा तब कोई शायद ही अमीर होगा। मोहम्मद के जिंदा रहते ही मने कि सन 629 ई में चेरामन जुमा मस्जिद,कोडुंगलुर में बन जाता है जो मक्का के बाद दूसरा होता है। मोहममद की मृत्यु 632 ई में होती है


रविवार, 17 जुलाई 2022

बैजू बावरा का शास्त्रीय संगीत जिससे पत्थर भी पिघल जाते थे

   

 ध्रुपद गायक बैजू बावरा का काल पंद्रहवीं शताब्दी का माना जाता है। तानसेन से अपने मुकाबले में बैजू ने राग मालकौंस गाया। इसके प्रभाव से पत्थर पिघल गया। पिघले हुए पत्थर में बैजू ने अपना तानपुरा फेंका। पत्थर ठंडा होने पर तानपुरा पत्थर में गड़ा रह गया।
तानसेन पत्थर पिघलाकर तानपुरा निकाल नहीं सके। पंद्रहवीं शताब्दी तक पत्थर को राग शक्ति से पिघलाया जा सकता था।
आज ये कथा स्वामी सूर्यदेव जी की पोस्ट से एक क्लू मिलने के बाद लिखी जा रही। गुरुदेव ने लिखा कि प्राचीन काल में शिल्पकार राग मालकौंस गाते हुए ग्रेनाइट के पत्थरों को काटते थे। जब तक कोई विधि न हो ग्रेनाइट को कलात्मक ढंग से काट नहीं सकते। गुरुदेव ने बहुत अच्छे से अल्केमी को एक्सप्लेन किया।
पत्थरों को किसी तरह मुलायम बनाकर फिर सूक्ष्म कारीगरी करने की थ्योरी नई नहीं है। इस पर कई वर्ष से शोध किया जा रहा है। कंबोडिया से भी एक मिथक निकल कर आया है।
कंबोडिया में एक विशेष पत्थर होता था। इसे म्यूजिकल स्टोन कहते थे। संगीत वाले पत्थर विश्व के अनेक भागों में पाए जाते हैं, जो एक विशेष राग उत्सर्जित करते हैं। संभव है कंबोडिया के वे जादुई पत्थर विशेष क्रिया के बाद राग मालकौंस की ध्वनि निकालने लगते होंगे। कंबोडिया मिथक कहता है कि इस विशेष पत्थर से बाकी बड़ी चट्टानों को पिघलाया / मुलायम किया जाता था।।
ऋग्वेद में एक पौधे का उल्लेख है। पक्का नाम नहीं पता। American cliff swallow नामक अमेरिकी चिड़िया प्राचीन काल में पथरीली चोटियों में छेद कर घोंसला बना लेती थी। वह पर्टिकुलर स्थान पर इस पौधे की पत्तियों का रस प्रयोग करती थी। स्पष्ट है कि चोंच पत्थर को नहीं छेद सकती। प्राचीन पेरू निवासियों ने इस पक्षी की सहायता से उस पौधे का पता लगाया और उसका प्रयोग अपने अचंभित करने वाले निर्माणों में किया। कुछ कहते हैं वह पौधा विलुप्त हो गया और कुछ कहते हैं कि वह अब भी सर्वाइव कर रहा है।
कर्नाटक के होयसलेश्वर मंदिर में पत्थर को मुलायम बनाकर अविश्वसनीय शिल्प बनाने का जीवंत प्रमाण देखा जा सकता है। कहना मुश्किल है कि वे कौनसी विधि प्रयोग में ला रहे थे। अधिक विश्वास इस बात का है कि वे राग मालकौंस की शक्ति से ऐसा कर रहे थे। विश्व के अन्य भागों में भी ये कार्य हो रहा था। कुछ को चिड़िया ने बताया था।
नीचे फ़ोटो में अचरज से होयसलेश्वर मंदिर का शिल्प देख रहे वृद्ध पर्यटक के मन की गुत्थी सुलझाने का एक प्रयास भर किया है।

रविवार, 19 जून 2022

शादी की उम्र से ही तय होता है घर की सुख शांति समृद्धी होगी संस्कृति

 


पुत्री जैसे जैसे किशोरावस्था को पार कर रही होती है, अभिभावकों के मन में उसके विवाह और सुखद भविष्य के स्वप्न स्पन्दित होने लगते हैं। युवावस्था के बढ़ते पड़ाव के साथ साथ यह चिंता और व्याकुलता में परिवर्तित होता चला जाता है।जबतक विवाह न हो जाय, सोते जागते इसके अतिरिक्त ध्यान में कुछ और आता ही नहीं।
किन्तु कभी आपने विचार किया है कि जिस पुत्री के सुखद भविष्य के लिए आपने इतने स्वप्न देखे, इतने प्रयास किये,,,,पुत्री को शिक्षित किया,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की योग्यता भी दे दी, अपने सामर्थ्य से कई गुना आगे बढ़कर उसके विवाह में व्यय किया......
आपने स्वयं ही उसका घर परिवार सुख शान्ति,, सब कुछ बिखेर दिया।
कैसे ?
वो ऐसे कि आपने अपनी पुत्री 👰 को शिक्षित तो किया,पर उसकी तैयारी ऐसी न करायी कि वह अपने ससुराल में सामंजस्य बिठा पाए।वह सबको अपना सके और अपने सेवा, अपनत्व, मृदुल स्वभाव और सदाचरण से लोगों को बाध्य कर दे कि लोग उसे अपनाए बिना न रह पाएँ।आपने उसे अधिकार और केवल अधिकार का भान रखना तो सिखा दिया, पर "कर्तव्य प्रथम" और यही सर्वोपरि,, यह न समझा सके।
👰बेटी को विदा करने के साथ ही पग पग पर अपने हस्तक्षेप से ऐसी व्यवस्था कर दी कि पुत्री के लिए अपने माता पिता भाई बहन तो पहले से भी अधिक अपने हो गए, पर पति के माता पिता भाई बहन बोझ और त्यज्य होकर गए।
बेचारे दामाद ने बड़ी कोशिश की कि वह अपने माता पिता भाई बहन को भी अपनी पत्नी और उसके मायके वालों के लिए स्वीकार्यता दिलवा पाए,परन्तु नित क्लेश के कारण उसके सम्मुख केवल दो ही मार्ग बचे,,या तो वह अपना दाम्पत्य जीवन बचाये या अपने अभिभावकों सहोदरों का साथ बचाये।
अपने पुत्र/भाई को पिसते हुए देखकर, उसके घर को टूटने से बचाने के लिए अन्ततः लड़के के परिजन ही वृद्धावस्था में एकाकीपन स्वीकार कर पुत्र को स्वतन्त्र कर देते हैं।आजकल के शिक्षित और आर्थिक रूप से समर्थ समझदार अभिभावक पुत्र का विवाह करने के साथ ही उसकी गृहस्थी अलग बसा देते हैं(यदि एक ही शहर में रह रहे हों तो अन्यथा तो दो अलग अलग जगह रहने पर दोनों दोनों के लिए अतिथि बनकर रह जाते हैं।दुर्भाग्य प्रबल हुआ तो टोटल सम्बन्ध विच्छेद)।
अब आइये,,अगली पीढ़ी पर।परिजनों से दूर रह रहे ऐसे एकल परिवार में जहाँ पुत्री ने कभी नहीं देखा कि माता दादा दादी, चाचा चाची,बुआ फूफा या चचेरे फुफेरे भाई बहन से कोई मतलब रख रहे, उनके लिए उसके मन में सम्मान या कोई स्थान है।ऐसे में जब वह ब्याह कर ससुराल जाएगी तो क्योंकर उस पराए घरवालों को अपनाएगी? और जब वह किसीको अपनाएगी नहीं तो भला किस प्रकार वह सबके मन में अपने लिए स्थान,अपने जीवन में सुख और शांति पाएगी?
यदि बच्ची भोजन पकाना, घर की साफ सफाई आदि को अत्यन्त तुच्छ(नौकर वाले काम) समझती है,जबकि माता का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि पुत्र हो या पुत्री,बचपन से ही उसकी तैयारी ऐसी कराएँ कि अपने शरीर, अपने वस्त्र,अपने स्थान को साफ सुथरा रखना,अपने लिए स्वच्छ सादा पौष्टिक भोजन पका सकने में वय के 19वें वर्ष तक पहुँचते पहुँचते वे दक्ष हो जाँय।ऐसे बच्चे जहाँ भी रहेंगे व्यवस्थित और सुखी रहेंगे।बच्चे में यदि एडॉप्टबिलिटी(व्यक्तियों परिस्थितियों को स्वीकारने और उनके साथ सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता)नहीं,तो इसमें पूरा दोष माता पिता का है,निश्चित मानिए।
आज की शिक्षा सुसंस्कृत करने के लिए नहीं,बस आर्थिक सक्षमता के लिए होती है(नून तेल जुटान विद्या)।इसलिए यह दायित्व माता पिता और परिवार का होता है कि बच्चे को जीवन के लिए तैयार करें।जब आप संयुक्त परिवार में रहते हैं,निश्चित रूप से परिवार के सभी सदस्य भिन्न सोच विचार के होंगे और बहुधा उनको हैण्डिल करना,शांति सौहार्द्र बनाये रखना,एक बड़ी चुनौती होती है।किन्तु यदि आप और आपके बच्चे बचपन से ही सबको मैनेज करने में सफल होते हैं,,तो निश्चित मानिए कि वे अपने कार्मिक जीवन में भी अवश्य सफल होंगे। नौकरी में हों या व्यवसाय में साथ वाले सभी प्रतिस्पर्धी ही होते हैं,प्रत्येक परिस्थिति एक चुनौती ही होती है।
आज से 20-25 वर्ष पूर्व तक किशोरवय की अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचते पहुँचते लड़कियों का ब्याह हो जाता था।ऐसी लड़कियों के लिए नए घर की रीत,खानपान, सदस्यों के अनुरूप ढ़लने का सामर्थ्य वर्तमान की तुलना में बहुत अधिक होता था।आज 28 से 35 तक की लड़कियाँ अपने हिसाब से जीने की अभ्यस्त हो चुकी होती हैं।उनमें एडॉप्टबिलिटी इतनी कम हो चुकी होती है कि यदि बचपन से ही मानसिक तैयारी कराकर न रखी जाय तो विवाहोपरांत उसका जीवन तो दुरूह होता ही है,जहाँ वह जाती है,उनके सुख चैन भी कपूर के धुएँ के समान कुछ ही दिनों में उड़ जाते हैं।
बढ़ते हुए विवाह विच्छेद की घटनाएँ,, युवाओं में लिव-इन की स्वीकार्यता, हमारे सामाजिक भविष्य को उस ओर लिए जा रहे हैं,जहाँ व्यक्ति के पास भौतिक सुख साधन का अम्बार होते हुए भी व्यकि दुःख अवसाद में घिरा,टूट हारा एकाकी होगा।क्योंकि वास्तविक "सुख और शान्ति" तो व्यक्ति के जीवन में तभी आ सकता है जब उसके पास परिजनों का स्नेह हो,परिवार में एक दूसरे के लिए आदर आत्मीयता हो,सुख दुःख में कभी वह स्वयं को अकेला नहीं पाये और भौतिक समृद्धि को ही जीवन ध्येय व सुख न माने।
साभार द्वारा बुन्देला धर्मेंद्र जी

शनिवार, 18 जून 2022

वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य ऐसी नीति निर्धारण क्यों नहीं हो सकता हे

  





   पूरी दुनिया में शिक्षा का लक्ष्य यही है कि पूर्वजों द्वारा संचित ज्ञान राशि को नई पीढ़ी को सौंप दिया जाए।
इसके लिए सबसे पहले ज्ञान के विविध रूपों की स्मृति तथा बोध और संभावनाओं को नई पीढ़ी के मन बुद्धि और चित्त पर अंकित कराना होता है और उसके लिए अभ्यास प्रशिक्षण और कल्पना से भरपूर सृजनशीलता को जागृत और प्रदीपित करना होता है।
साथ ही नई पीढ़ी को अपनी ज्ञान परंपरा की रक्षा और उसमें अभिवृद्धि की निरंतर प्रेरणा देनी होती है और विश्व के अन्य समाजों के पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान राशि की भी जानकारी इस प्रकार देनी पड़ती है कि वह अपने समाज के लिए समृद्धि कारक तो बने लेकिन उसके दुष्प्रभावों से आत्मरक्षा की विधियां भी सोची जा सकें।
भारतीय शिक्षा का लक्ष्य भी शिक्षा के इन्हीं उद्देश्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में अर्जित करना होना चाहिए।
ब्रिटिश शिक्षा के ढांचे का लक्ष्य भारत की नई पीढ़ी को यूरोपीय ज्ञान राशि की जानकारी इस प्रकार से देना था कि यूरोपीय समाज के लिए समृद्धि कारक एक उपकरण भारत की नई पीढ़ी बन सके।।
दुर्भाग्यवश हमारे यहां आज भी शिक्षा की विभिन्न शाखाओं में मुख्यतः यूरोपीय ज्ञान परंपरा की ही रक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था है और आज भी दर्शन, राजनीति शास्त्र, साहित्य, कला, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में यूरोपीय मतों को ही सार्वभौम चिंतन की तरह पढ़ाया जाता है ।यह अत्यंत कष्टप्रद स्थिति है। आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था की दीर्घकालिक नीति बनाई जाए जिसमें समाज की विभिन्न संस्थाएं उस जिम्मेदारी को निभाने का भार स्वीकार करें।
सबसे पहले समाज में आत्म गौरव तथा दायित्व की भावनाएं जगनी आवश्यक है ताकि भारतीय शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहिका बन सके और माध्यम बन सके।।
वेदों उपनिषदों महाकाव्यों पुराणों गणित ज्योतिष आयुर्वेद वास्तु कला और शिल्प विद्याओं के भारतीय रूपों की और ज्ञान विज्ञान की समस्त भारतीय उपलब्धियों की जानकारी भारत की नई पीढ़ी को देना राष्ट्रीय कर्तव्य है। पूरे विश्व के ज्ञान विज्ञान की जानकारी भारतीय लक्ष्यों की सेवा और पोषण के लिए आवश्यक और उपयोगी है लेकिन भारत की शिक्षा विदेशी ज्ञान की सेवा के लिए नहीं होनी चाहिए।
वर्तमान भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 यह कहता है कि राज्य की निधि से पूर्ण पोषित अर्थात शासन द्वारा पूर्व वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी । परंतु यह बात ऐसी शिक्षा संस्था में लागू नहीं होगी जिसका प्रशासन भारत शासन या कोई राज्य का शासन करता है और जो किसी ऐसे न्यास या विन्यास के अधीन स्थापित है जिसके अनुसार उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है।
परंतु अनुच्छेद 29 कहता है कि अल्पसंख्यकों को राज्य द्वारा पोषित और राज्य से सहायता पाने वाले किसी भी शिक्षा संस्था में अपने मजहब या रिलीजन की शिक्षा देने का अधिकार है और अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को ऐसी शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और उनका प्रशासन करने का भी अधिकार है ।।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का प्रावधान अनुच्छेद 29 और 30 के द्वारा बाधित कर दिया गया है और अनुच्छेद 28 केवल हिंदुओं के लिए लागू होता है अर्थात शासन द्वारा वित्त पोषित किसी भी शिक्षा संस्था में हिंदू धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती, यह अनुच्छेद 28 का प्रावधान सिद्ध होता है और शासन द्वारा वित्त पोषित मुसलमानों ईसाइयों आदि अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाओं में इस्लाम या ईसाइयत आदि की शिक्षा खुल कर दी जा सकती हैं ,यह अनुच्छेद 29 व 30 का प्रावधान है । इस प्रकार अनुच्छेद 28, 29 और 30 स्पष्ट रूप से हिंदू समाज और हिंदू धर्म के विरुद्ध तथा इस्लाम ईसाइयत आदि अल्पसंख्यकों के पक्ष में भारत के शासन और प्रान्तों के शासन का पक्षपात दिखाता है ।
यह भारत के संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है और भारत जैसे उदार लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए यह शोभा जनक नहीं है ।
बहुसंख्यकों के साथ ऐसा अन्याय संसार के किसी भी लोकतंत्र में नहीं होता ।
ऐसा अन्याय केवल सोवियत संघ और चीनी कम्युनिस्ट सरकारों में हुआ था। रूस में अब समाप्त हो गया है।
इसलिए भारत सरकार को विश्व के अन्य सभी स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्रों के अनुरूप ही भारत की शिक्षा में भारत के बहुसंख्यकों के धर्म की शिक्षा अनिवार्य करनी चाहिए जैसा कि इंग्लैंड फ्रांस जर्मनी पोलैंड स्वीडन स्वीटजरलैंड पुर्तगाल स्पेन संयुक्त राज्य अमेरिका आदि सर्वत्र है ।।
भारत को अपवाद बनाने का निर्णय क्यों लिया गया इसके विस्तार में न जाकर ,अब इस अपवाद स्थिति को समाप्त करके भारत को भी विश्व के अन्य लोकतांत्रिक राष्ट्रों का अनुसरण करने वाला होना चाहिए ।
इस प्रकार अनुच्छेद 28 का विरोध होना चाहिए और साथ ही अनुच्छेद 29 और 30 का विरोध होना चाहिए।।
सही उपाय तो यह है कि शिक्षा के संबंध में एक स्पष्ट दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए जो कि संविधान में अभी तक नहीं है।।
संविधान में शिक्षा से संबंधित स्पष्ट प्रावधान केवल अल्पसंख्यकों के लिए हैं और हिंदू समाज के लिए केवल इतना प्रावधान है कि वह अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकता ।अन्य प्रावधान नहीं है।
जबकि शिक्षा का मूल प्रावधान तो अपने राष्ट्र की ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में प्रवाहित करना और पुष्ट करनाहै, नई पीढ़ी को उस ज्ञान परंपरामें दक्ष बनाना है। इसलिए शिक्षा संबंधी एक अलग क्लाज जोड़ा जाए जिसमें यह स्पष्ट लिखा जाए कि शिक्षा संसार भर में हर राष्ट्र की अपनी ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी में देने के लिए होती है और वह प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र का कर्तव्य है।इसलिए भारत भी भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ाने वाली शिक्षा प्रदान करेगा तथा साथ ही विश्व की ज्ञान परंपरा का राष्ट्र के अनुकूल समायोजन करेगा ।
अनुच्छेद 29 और 30 संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार के लिए हैं। अच्छा तो यह होगा कि अनुच्छेद 29 में सर्वप्रथम एक उपबंध जोड़ दिया जाए कि बहुसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण और उसमें बहुसंख्यक वर्ग की ज्ञान परंपरा और शिक्षा परंपरा का संरक्षण राज्य का कर्तव्य घोषित हो अथवा अनुच्छेद 28 में ही जोड़ दिया जाए कि भारत की ज्ञान परंपरा का पोषण भारत के शासन का कर्तव्य है और प्रत्येक राज्य की सरकार का यह कर्तव्य होगा । तदनुसार आगे के प्रावधान किए जा सकते हैं ।।
पहले तो शासन में यह संकल्प होना आवश्यक है कि वह भारत की ज्ञान परंपरा को मान्यता देता है और उसके संरक्षण के लिए वचनबद्ध है।
भारत का शासन आज तक भारतीय ज्ञान परंपरा नामक किसी भी चीज का कोई संवैधानिक संज्ञान नहीं लेता।वह यह मानकर चलता है कि वे अतीत की वस्तुएं हैंऔऱ वर्तमान में दर्शन राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र अर्थशास्त्र आदि सभी humanities के विषयों में एकमात्र ज्ञान वह हैं जो यूरोपीय ज्ञान परंपरा है ।
यह इतनी बड़ी चीज है कि संसद में विचार होना चाहिए और यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ऐसा करते ही भारत का शासन ज्ञान की दृष्टि से यूरोपीय शासन की एक छोटी और अनुकरणरत शाखा हो जाता है , जिसके पास अपना कोई स्वतंत्र विवेक नहीं है और जो कोई स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ है।
यह भारत के संविधान के विरुद्ध है।भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य है और इसलिए शिक्षा और ज्ञान के विषय में भी भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होना चाहिए ।उसे इंग्लैंड के ज्ञान तंत्र का अथवा यूरोपीय और अमेरिकी ज्ञान तंत्र का एक विनम्र सेवक नहीं रहना चाहिए।
यह स्थिति भारत राष्ट्र के लिए अत्यंत लज्जाजनक है और वर्तमान आत्म गौरव संपन्न शासन को भारत के लोगों को इससे मुक्त करके उसे स्वाभिमान संपन्न बनाने की पहल शिक्षा के क्षेत्र में भी करनी चाहिए साभार आदरणीय श्री रामेश्वर मिश्र पंकज

शुक्रवार, 17 जून 2022

तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर #रामप्पामंदिर तेलंगाना)

 








तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमय मंदिर
(#रामप्पा_मंदिर,तेलंगाना)
भारत वर्ष के हिन्दू मंदिर की भव्यता देखो।
मन्दिर का हर एक चित्र ध्यान से देखिए आपको इसकी भव्यता साफ साफ दिखाई देगी
इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक #Diamond_electron_machine ही काट सकती है वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से
अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है
यहां पर एक नृत्यांगना की मूर्ति भी है जिसने हाई हील पहनी हुई है
सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है
मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई
मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और जिसकी ऊंचाई नौ फीट है,उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है।
पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है
पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है
यह सब आज के समय में करना असंभव है इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास मशीनरी नहीं थी?
उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी
यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थी जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है
#मंदिर_शिव_को_समर्पित है
मंदिर का नाम इसके शिल्पी के नाम पर रखा हुआ है क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुए और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया।
यह मंदिर भीषण आपदाओं को झेलने के बाद भी आज तक सुरक्षित है।छह फीट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर बने इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे हुए हैं। । यह रामायण और महाभारत के दृश्य एक ही पत्थर पर उकेरे गए है, वह भी छीनी हथोड़े से, आप बनाते समय की कल्पना कीजिये,एक हथौड़ा गलत पड़ा, और महीनों-वर्षों का श्रम नष्ट ....
आज तक इस मंदिर में कोई क्षति नही हुई है, मंदिर के न टूटने की बात जब पुरातत्व विज्ञानियों को पता चली, तो उन्होंने मंदिर की जांच की। पुरातत्व विज्ञानी अपनी जांच के दौरान काफी प्रयत्नों के बाद भी मंदिर के इस रहस्य का पता लगाने में सफल नहीं हुए।
बाद में जब पुरातत्व विज्ञानियों ने मंदिर के पत्थर को काटा, तब पता चला कि यह पत्थर वजन में काफी हल्के हैं। उन्होंने पत्थर के टुकड़े को पानी में डाला, तब वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा। पानी में तैरते पत्थर को देखकर मंदिर के रहस्य पता चला।
सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस मंदिर में जो पत्थर मिले है, वह पत्थर विश्व के किसी कोने में नही मिले है, यह पत्थर कहाँ से लाये गए, आज तक इसका पता नही चल पाया है ।।
एक निवेदन -- हम सबको मिलकर हमारे भारत की इन अमूल्य धरोहरों का प्रचार जन-जन तक करना चाहिए, इसका इतना प्रचार हो, की पूरे संसार की की दृष्टि इन पर पड़े और वह भारत की महान संस्कृति पर गर्व करें।

 

सोमवार, 13 जून 2022

किडनी में स्टोन केल्सियम से एक भ्रांति

  




एक हैं मलिक साहब। हमारे साथ पढ़ते थे पंतनगर विश्वविद्यालय में। अविभाजित उत्तर प्रदेश के सबसे खूबसूरत शहर से थे, जहाँ कालान्तर में हमने अपनी ज़िन्दगी के 8 साल 8 महीने और 18 दिन बड़ी शान से गुजारे। जी हाँ, दून वैली। पहाड़ों की रानी मसूरी से मात्र 35 किलोमीटर दूर।
उनकी बस एक ही समस्या थी। भाई पथरी हो गी रे।
अरे मलिक साहब कैसे हो गई?
भाई वो देहरादून का पाणी है ना, बोहोत हार्ड है, ससुरे में कैल्शियम बोहोत है। जिब पाणी मै कैल्शियम जादै हो तो पथरी हो जा।
कम-ओ-बेश यही ख़यालात ज्यादातर लोगों के होते हैं। तो ऐसी ग़लतफ़हमी पाले सभी भाई-बहन आज ही यह ग़लतफ़हमी दिमाग से निकाल दें कि पानी के कैल्शियम का आपके किड़नी में बनने वाली पथरी से कोई सम्बन्ध है।
कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर ऐसा होता तो सारे गढ़वालियों और कुमाउनियों और हिमाचलियों और कश्मीरियों को गुर्दे की पथरी हो चुकी होती। ऐसा है क्या?
नहीं है।
वास्तव में पानी का कैल्शियम इसके लिए जिम्मेदार है ही नहीं। जिम्मेदार हैं आप स्वयं। जो पानी पीते ही नहीं। अगर आप दिन में 10 गिलास अर्थात साढ़े तीन लीटर से कम पानी पीयेंगे तो आपको प्रसाद में पत्थर ही मिलेंगे। फिर घूमते रहना किडनी हॉस्पिटल के चक्कर काटते।
किडनी स्टोन के लिए मूलतः जिम्मेदार है पानी का कम पीया जाना। सोने में सुहागा तब हो जाता है जब आप प्रोटीन खाते हैं ज्यादा और पानी पीते हैं कम। तो यूरिक एसिड बनता है खूब और पानी ना पीने के कारण बाहर वह निकल नहीं पाता और निर्माण करता है किडनी स्टोन का।
किडनी में यूरिक एसिड की मात्रा ज्यादा होने से किडनी के वातावरण की पीएच हो जाती है कम और पीएच कम होते ही किडनी स्टोन बनने लगते हैं।
अब बात करते हैं दूसरे सगूफ़े की।
डॉक्टर के पास जाओ, हर दूसरे तीसरे मरीज को बोलेगा कि खून में कैल्शियम और विटामिन डी की जाँच कराओ और ज्यादातर लैब रिपोर्ट में कैल्शियम और विटामिन डी बताया जाता है कि कम है।
अब डॉक्टर लिख देता है कि कैल्शियम की गोली खाओ और विटामिन डी के कैप्सूल खाओ या ज्यादातर केस में कहता है कि विटामिन डी का टीका लगवाओ। और बस खेल चालू।
कैल्शियम की गोली खिलवाने लगता है और जोर देता है कि विटामिन डी का टीका लिया जाए। सात हज़ार रूपये का आता है। खुले बाजार में भी नहीं बिकता। कुछ खास कंपनियों के रिप्रेजेंटेटिव से ही खरीदना पड़ता है। बस डॉ साहब के मोबाइल की क़िस्त का तो इंतज़ाम हो गया। अब साल भर तक क़िस्त आप भरना डॉ साहब के मोबाइल की।
फिर साल भर बाद किडनी हस्पताल के डॉक्टर की नई गाड़ी की क़िस्त आप ही भरेंगे। उस पट्ठे ने अपना भी जुगाड़ कर लिया और अपने दोस्त का भी।
एक दिन में 800 इंटरनेशनल यूनिट विटामिन डी और 800 से 1200 मिलीग्राम कैल्शियम से ज्यादा खाओगे तो मोबाइल और गाड़ी दोनों की क़िस्तें आप ही भरेंगे।
कितने डॉक्टर हैं जो कैल्शियम और विटामिन डी चालू करने के बाद समय समय पर इन दोनों की आपके खून में जाँच करवाते हैं?
अगर कोई भला डॉक्टर करने की सिफारिश करता भी है तो आप सुपर डॉक्टर बन जाते हैं और सोचते हैं कि अभी तो जाँच करवाई थी। बार बार क्या करवाना!! ये डॉक्टर तो जाँच वाचं लिखते ही रहते हैं।
अरे भाई अगर खून में कैल्सियम का स्तर बढ़ गया तो किडनी स्टोन हो जायेगा। चलो कोई बात नहीं। तुड़वा लेना पत्थर......डॉक्टर से। डॉक्टर को भी जीने का अधिकार है कि नहीं!!!!
इसके अलावा दो हॉर्मोन और हैं। एक है कैल्सीटोनिन और दूसरा है पैराथाइरॉइड हॉर्मोन। इन दोनों में से कोई भी रूठ जाये तो बस खामियाज़ा आपको भुगतना पड़ता है। इन दोनों का काम है ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम के संतुलन को बनाए रखना।
जैसे ही खून में आयोनाइज़्ड कैल्शियम का स्तर एक निश्चित बिंदु से ऊपर जाता है तो थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन आकर उसे नार्मल कर देता है और अगर यह स्तर नीचे गिर जाए तो पैराथाइरॉइड ग्रंथि से पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आकर इसे बढ़ा देता है।
अगर थाइरोइड ग्रंथि या पैराथाइरॉइड ग्रंथि ठीक से काम ना कर रही हों तो आप समझ सकते है कि कैल्सीटोनिन और पैराथाइरॉइड हॉर्मोन की उपलब्धता प्रभावित होगी जो फाइनली किड़नी स्टोन को जन्म दे सकती है।
आप सोच रहे होंगे कि पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कोई जादुगर है। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम कम हुआ तो ये पैराथाइरॉइड हॉर्मोन जादू की छड़ी घुमाएगा और कैल्शियम पैदा।
नहीं ऐसा नहीं है। है वैसे जादू ही, भगवान् का जादू।
कैसे?
यह पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आँतों से कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ा देता है। बहुत लंबी प्रक्रिया है इसकी। किसी और पोस्ट में बताऊंगा। आप बस अभी इतना समझ लो कि अगर थाइरोइड ग्रंथि से कैल्सीटोनिन ना आये तो ब्लड प्लाज्मा में कैल्शियम का स्तर खतरनाक तऱीके से बढ़ जाता है। जो किड़नी स्टोन को जन्म देता है।
और अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि से ज्यादा पैराथाइरॉइड हॉर्मोन आ जाये तो?
तो भी वही होगा। ब्लड प्लाज्मा में आयोनाइज़्ड कैल्शियम बढ़ जायेगा। जो किड़नी स्टोन को जन्म देगा।
पैराथाइरॉइड हॉर्मोन कब ज्यादा आएगा?
अगर पैराथाइरॉइड ग्रंथि किसी ट्यूमर आदि की वजह से हायपरएक्टिव हो गई है तो पैराथाइरॉइड हॉर्मोन का उत्पादन ज्यादा होगा।
कैल्शियम मेटाबोलिज्म इतना आसान नहीं है बाबु मोशाय!!!!
और हाँ.......आर ओ वार ओ का चक्कर छोड़ो, मस्त होकर पानी पीयो, पानी में कैल्शियम ज्यादा हो या कम। टेंशन नक्को। हार्ड वाटर से पथरी नहीं होगी। होगी तो वाटर ना पीने से। बस रंगीन् पानी से बचो। रंगीन पानी बोले तो वही पोंटी चड्ढा और विजय माल्या वाला। किड़नी स्टोन हो ही जाये तो मुझसे संपर्क कर लेना।    

रविवार, 12 जून 2022

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल: ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त व ब्रह्मगुप्त_प्रमेय

 


देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि संस्कृत भाषा में  जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
देखते हैं -
*"चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।*
*यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।"*
बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है !
इसका अर्थ है -
यदि वर्ग की भुजा 2a हो
तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
ये क्या है ?
अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता है
शायद ईसा के जन्म से पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था।हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे , जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है ,
इस श्लोक का उल्लेख किया है -
*परे पूर्णमिति।*
*उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।*
*तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।*
*तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।*
*तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।*
शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किये हुए भारतीय छात्र ने इसका नाम भी सुना हो , जबकि यह "मेरु प्रस्तार" है।
परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से "पास्कल त्रिभुज" के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीयों को शर्म इस बात पर आने लगी कि भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते।

*"चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।*
*अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥"*
ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता है लेकिन ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है। जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता है।
उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो कुछ इस तरह होगा-
(१०० + ४) * ८ + ६२०००/२०००० = ३.१४१६
*ऋगवेद में π का मान ३२ अंक तक शुद्ध है।*
*गोपीभाग्य मधुव्रातः श्रुंगशोदधि संधिगः |*
*खलजीवितखाताव गलहाला रसंधरः ||*
इस श्लोक को डीकोड करने पर ३२ अंको तक π का मान 3.1415926535897932384626433832792… आता है।

चक्रीय_चतुर्भुज का क्षेत्रफल:
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त के गणिताध्याय के क्षेत्रव्यवहार के श्लोक १२.२१ में निम्नलिखित श्लोक वर्णित है-
*स्थूल-फलम् त्रि-चतुर्-भुज-बाहु-प्रतिबाहु-योग-दल-घातस् ।*
*भुज-योग-अर्ध-चतुष्टय-भुज-ऊन-घातात् पदम् सूक्ष्मम् ॥*
अर्थ:
त्रिभुज और चतुर्भुज का स्थूल (लगभग) क्षेत्रफल उसकी आमने-सामने की भुजाओं के योग के आधे के गुणनफल के बराबर होता है तथा सूक्ष्म (exact) क्षेत्रफल भुजाओं के योग के आधे में से भुजाओं की लम्बाई क्रमशः घटाकर और उनका गुणा करके वर्गमूल लेने से प्राप्त होता है।

ब्रह्मगुप्त_प्रमेय:
चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण यदि लम्बवत हों तो उनके कटान बिन्दु से किसी भुजा पर डाला गया लम्ब सामने की भुजा को समद्विभाजित करता है।
ब्रह्मगुप्त ने श्लोक में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-
*त्रि-भ्जे भुजौ तु भूमिस् तद्-लम्बस् लम्बक-अधरम् खण्डम् ।*
*ऊर्ध्वम् अवलम्ब-खण्डम् लम्बक-योग-अर्धम् अधर-ऊनम् ॥*
(ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, गणिताध्याय, क्षेत्रव्यवहार १२.३१)

वर्ग_समीकरण का व्यापक सूत्र:
ब्रह्मगुप्त का सूत्र इस प्रकार है-
*वर्गचतुर्गुणितानां रुपाणां मध्यवर्गसहितानाम् ।*
*मूलं मध्येनोनं वर्गद्विगुणोद्धृतं मध्यः ॥*
ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत - 18.44
अर्थात :
व्यक्त रुप (c) के साथ अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित गुणांक (4ac) को अव्यक्त मध्य के गुणांक के वर्ग (b²) से सहित करें या जोड़ें। इसका वर्गमूल प्राप्त करें तथा इसमें से मध्य अर्थात b को घटावें।
पुनः इस संख्या को अज्ञात ञ वर्ग के गुणांक (a) के द्विगुणित संख्या से भाग देवें।
प्राप्त संख्या ही अज्ञात "त्र" राशि का मान है।
श्रीधराचार्य ने इस बहुमूल्य सूत्र को भास्कराचार्य का नाम लेकर अविकल रुप से उद्धृत किया —
*चतुराहतवर्गसमैः रुपैः पक्षद्वयं गुणयेत् ।*
*अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् ॥* -- भास्करीय बीजगणित, अव्यक्त-वर्गादि-समीकरण, पृ. - 221
अर्थात :-
प्रथम अव्यक्त वर्ग के चतुर्गुणित रूप या गुणांक (4a) से दोनों पक्षों के गुणांको को गुणित करके द्वितीय अव्यक्त गुणांक (b) के वर्गतुल्य रूप दोनों पक्षों में जोड़ें। पुनः द्वितीय पक्ष का वर्गमूल प्राप्त करें।☺

आर्यभट्ट की ज्या (Sine) सारणी:
आर्यभटीय का निम्नांकित श्लोक ही आर्यभट की ज्या-सारणी को निरूपित करता है:
*मखि भखि फखि धखि णखि ञखि ङखि हस्झ स्ककि किष्ग श्घकि किघ्व ।*
*घ्लकि किग्र हक्य धकि किच स्ग झश ङ्व क्ल प्त फ छ कला-अर्ध-ज्यास् ॥*
माधव की ज्या सारणी:
निम्नांकित श्लोक में माधव की ज्या सारणी दिखायी गयी है। जो चन्द्रकान्त राजू द्वारा लिखित *'कल्चरल फाउण्डेशन्स आफ मैथमेटिक्स'* नामक पुस्तक से लिया गया है।
*श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।*
*तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।*
*धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।*
*म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।*
*मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।*
*अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।*
*तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।*
*शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।*
*छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।*
*रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखोe बली।।*
*धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।*
*कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।*
*तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।*
*स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।*
(२.९.५)

संख्या_रेखा की परिकल्पना (कॉन्सेप्ट्)
*"एकप्रभृत्यापरार्धसंख्यास्वरूपपरिज्ञानाय रेखाध्यारोपणं कृत्वा एकेयं रेखा दशेयं, शतेयं, सहस्रेयं इति ग्राहयति, अवगमयति, संख्यास्वरूम, केवलं, न तु संख्याया: रेखातत्त्वमेव।"*
Brhadaranyaka Aankarabhasya (4.4.25)

जिसका अर्थ है-
1 unit, 10 units, 100 units, 1000 units etc. up to parardha can be located in a number line. Now by using the number line one can do operations like addition, subtraction and so on.


ये तो कुछ नमूना हैं , जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है बल्कि तमाम विज्ञान भरा पड़ा है।
दुर्भाग्य से कालांतर में व विदेशी आक्रांताओं के चलते संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का भावी पीढ़ी द्वारा विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए ।
*वन्दे संस्कृत मातरम्*

शनिवार, 4 जून 2022

कोलेस्ट्रोल महाघोटाले मे अमेरिकी डाक्टरों, वैज्ञानिकों और ड्रग कंपनियों के गठजोड़ ने 1.5 खरब डालर डकार लिए।

 




 कोलेस्ट्रोल सिर्फ कोलेस्ट्रोल है और यह अच्छा या बुरा नहीं होता
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चालीस साल से कोलेस्ट्रोल के नाम पर दुनिया को धोखा दिया जा रहा था। अमेरिकी डाक्टरों, वैज्ञानिकों और ड्रग कंपनियों के गठजोड़ ने 1970 से अब तक कोलेस्ट्रोल कम करने की दवाएं बेच-बेच कर 1.5 खरब डालर डकार लिए।

बेहिचक इसे कोलेस्ट्रोल महाघोटाला कहा जाए तो कोई हर्ज नहीं। पेथलेबों में इसकी जांच का धंधा भी खूब चमका। डाक्टरों और ड्रगिस्ट की भी चांदी हुई। पता नहीं अनेक लोगों ने कोलेस्ट्रोल फोबिया के कारण ही दम तोड़ दिया होगा। कोलेस्ट्रोल घटाने वाली दवाओं के दुष्प्रभाव से ना मालूम कितने लोगों के शरीर में नई-नई विकृतियों ने जन्म लिया होगा। 

बहरहाल अब अमेरिकी चिकित्सा विभाग ने पलटी मार ली है। कोलेस्ट्रोल के कारण जिन खाद्य वस्तुओं को निषेध सूची में डाला गया था, उन्हें हटा लिया है। अब कहा जा रहा है कि कोलेस्ट्रोल सिर्फ कोलेस्ट्रोल है और यह अच्छा या बुरा नहीं होता। यह मानव शरीर के लिए आवश्यक है। नर्व सेल की कार्यप्रणाली और स्टेराइड हार्मोन के निर्माण जैसी गतिविधियों में इसकी जरूरत होती है। हम जो भोजन लेते हैं उससे मात्र 15-20 फीसद कोलेस्ट्रोल की आपूर्ति होती है। जबकि हमें प्रतिदिन 950 मिलीग्राम की जरूरत होती है। शेष कोलेस्ट्रोल हमारे लिवर को बनाना पड़ता है। अगर हम कोलेस्ट्रोल वाला खाना नहीं खाएंगे, तो जाहिर है लिवर को ज्यादा मशक्कत करना पड़ेगी। जिनके शरीर में कोलेस्ट्रोल ज्यादा होता है, तो यह समझिए कि उनका लिवर ठीक ठाक काम कर रहा है। कोलेस्ट्रोल के नाम पर डाक्टर लोगों को नट्स, घी, मक्खन,आदि न खाने या कम खाने की सलाह देते रहे। असली घी को दुश्मन और घानी के तेलों को महादुश्मन बता कर रिफाइंड तेलों का कारोबार चमकाते रहे। अब तो रिफाइंड तेलों की पोल भी खुल चुकी है।

जबकि ये सब हमारे लिए आवश्यक हैं। यह थ्योरी भी दम तोड़ चूकी है कि कोलेस्ट्रोल धमनियों में जम जाता है, जिसके कारण ब्लाकेज होते हैं और दिल का दौरा पड़ता है। असल में ब्लाकेज का कारण केल्सीफिकेशन है। यही केल्सीफिकेशन गुर्दों और गाल ब्लडर में पथरी का कारण भी बनता है। अमेरिकी हार्ट स्पेशलिस्ट डा. स्टीवन निसेन के अनुसार चार दशकों से हम गलत मार्ग पर चल रहे थे। डा. चेरिस मास्टरजान के अनुसार अगर हम कोलेस्ट्रोल वाला आहार नहीं लेते तो शरीर को इसका निर्माण करना पड़ता है।
एलोपैथी में थ्योरियां बार-बार बदलती हैं। जबकि हमारा आयुर्वेद हजारों साल से वात, पित्त और कफ के संतुलन को निरोगी काया का परिचायक मानता आ रहा है। इनका शरीर में असंतुलन ही रोगों को जन्म देता है। आयुर्वैद सिर्फ चिकित्सा प्रणाली नहीं सम्पूर्ण जीवनशैली सिखाता है। होमियोपैथी भी लाइक क्योर लाइक के सिद्धांत पर टिकी है। आज अधिकांश बीमारियों का कारण है गलत जीवन शैली और फास्टफुड जैसा आहार। अगर जीवनशैली में सुधार कर लिया जाए, प्रकृति से नजदीकियां कायम रखी जाएं और योग प्राणायाम का सहारा लिया जाए तो रोगों के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा....
DR PARDEEP


बुधवार, 18 मई 2022

IIT के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कम्पनिया भारत की बौद्धिक सम्पदाओं पर खुलेआम डाका

 


वो शिक्षा डिग्री ज्ञान बल प्रतिभा अनुभव पैसा पद प्रतिष्ठा किस काम का जो देश के कुछ काम न आ सके , सम्मानीय प्रतिभा वो है जो देश के उत्थान में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग करे । आई आई टी सच्चाई भारत केआई आई टी उच्च शिक्षण संस्थानों पर विश्व के अमीर देश एवम् उनकी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया भारत की बौद्धिक सम्पदाओं पर डाका खुलेआम डाल रही है । अमेरिका की सकल आय का 35% और यूरोपीय यूनियन की सकल आय का 39 % हिस्सा बौद्धिक सम्पदा अधिकारो पर ही आधारित है इसमें सबसे बड़ा योगदान उन भारतीय वैज्ञानिक इंजीनियरों का है जो पढ़ते भारत में है लेकिन अविष्कारों , नावचारो (इन्वेंशन इनोवेशन ) अमेरिका यूरोप जैसे विकसित अमीर देशो के लिए करते है भारत का गरीब किसान मजदूर रात दिन मेहनत करता है जब वो एक माचिस की डिबिया या नमक भी खरीदता है तो उस पर टैक्स देता है इसी टैक्स में से कुछ पैसा आई आई टी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों को सब्सिडी के नाम पर जाता है परंतु यहाँ से निकलने वाला विधार्थी देश को क्या देता है आइये उसकी समीक्षा करते है । आई आई टी कुल सीटे प्रतिवर्ष - 9885 छात्र चार वर्ष में 4 x 9885 = 39540 छात्र प्रतिवर्ष छात्र पर पढ़ाई का कुल खर्च - 3.4 लाख रूपये छात्र द्वारा प्रतिवर्ष देय राशि - 90000 रूपये प्रतिवर्ष भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि - 2.5 लाख रूपये (भारतीय कर दाता की मेहनत की कमाई ) प्रतिवर्ष सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि 39540 छात्र x 2.5 लाख रूपये = 988 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष वित्तीय वर्ष 2015 -2016 में भारत सरकार ने आई आई टी को बजट स्वीकृत किया है -1703.85 करोड़ रूपये सभी विधार्थी भारत के राष्ट्रिय बैंको से 20 लाख से ज्यादा लोन लेते है वो भी कोलैटरल फ्री लोन । Economic Times shows that out of the remittances of $70 billion to India, the remittancess from IITians who go to developed countries is much lower than the remittancess from the Middle East to the state of Kerla . Most of the Malayalis in the Gulf are blue- coller workers, Not IIT enginneers . इतना सब करने के बाद कंप्यूटर साइंस ,इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स , मेकेनिकल , मेटलर्जिकल केमिकल प्रोडक्शन इत्यादि क्षेत्र के 98885 विश्वस्तरीय इंजिनियर निकलते है लेकिन भारत को क्या मिला ..? आई आई टी का कड़वा सत्य इतने अनुदान के बावजूद 20 वर्षो में (1986-2006) एक भी आई आई टी के छात्र ने भारतीय सेना को सेवा देना उचित नहीं समझ । अंतरिक्ष में स्वावलम्बन स्वदेशी तकनिकी के बल पर तिरंगा लहराने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र इसरो में आई आई टी व एन आई टी के 2% छात्र भी कार्यरत नहीं है । आई टी के 9885 छात्रो में से केवल 20 छात्र 2013 में भारतीय रक्षा अनुसंधान डी आर डी ओ में कार्यरत हुए । भारतीय अनुसंधान डीआरडीओ में 2700 वैज्ञानिको की कमी है । दूसरी तरफ आई आई टी के छात्र फिलिप कार्ट ऑनलाइन मेगा स्टोर चला रहे है । आई आई टी मद्रास से 7 छात्रो को फ्लिपकार्ट ने नौकरी पर रखा है आन लाइन मार्केटिंग हेतू आइये देखते है उनकी योग्यता क्या है ? फ्लिपकार्ट 1छात्र कम्प्यूटर साइंस 2 छात्र केमिकल इंजीनियरिंग 1 छात्र मेकेनिकल इंजिनयरिंग 1 छात्र मेटलर्जि , 1 छात्र बायोटेक्नोलॉजी 1 छात्र इंजिनयरिंग फिजिक्स । Tavant आई टी सोलुशन सर्विस कम्पनी आई आई टी मद्रास के 10 छात्रो को नौकरी पर रखा जिसमे एक भी कम्प्यूटर साइंस नहीं था । 3 छात्र एरोस्पेस , 2 छात्र मेटलर्जी ,1 छात्र इलेक्ट्रिकल ,2 छात्र केमिकल , 1 छात्र मेकेनिकल ,1 छात्र फिजिक्स आंकड़े आई आई टी मद्रास के है 118 छात्र 2014 में फ्लिपकार्ड कम्पनी में कार्यरत हुए 36 छात्र तो केवल आई आई टी खडगपुर से है जो फ्लिप कार्ड में कार्यरत है । इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स , मेकेनिकल , मेटलर्जिकल केमिकल इत्यादि क्षेत्र के 98885 विश्वस्तरीय इंजिनियर आई आई टी से निकलते है लेकिन दुर्भाग्य देखिये उनमे से कुछ विदेशी कम्पनियो की क्रीम पाउडर लिपस्टिक बेच रहे है और बाकी डॉलर कमाने अमीर विकसित देशो की ओर पलायन कर जाते है और भारत में अपने माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ जाते है । अमेरिका में वैज्ञानिक और इंजिनियर भेजने वाले देशो में भारत शीर्ष पर है । नेशनल साइंस फाउंडेशन के नेशनल सेंटर फॉर साइंस एन्ड इंजीनियरिंग इस्टैटिक्स की रिपोर्ट के अनुशार 2003 से 2013 आते आते 85 फीसदी का इजाफा हुवा है । एशिया से अमरिका 29.6 लाख वैज्ञानिक इंजिनियर गए है ।इसमें से 9.5 लोग अकेले भारतीय है । भारत का प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन ) आज हमारे देश के अन्दर जितने बेहतरीन तकनीकी संस्थान हैं, जैसे आई आई टी आई आई एम, एम्स आदि, उनमे से जितने अच्छे प्रतिभा हैं वो सब अमेरिका भाग जाते हैं। हर वो अच्छी प्रतिभा जो कुछ कर सकता है इस देश में रहकर अपने राष्ट्र के लिए, अपने समाज के लिए, वो भारत से अमीर विकसित देशो में भाग जाता है उसके पीछे का कारण है इन संस्थानों में पढने वाले विद्यार्थियों का दिमाग ऐसा सेट कर दिया जाता है कि वो केवल अमेरिका/युरोप की तरफ देखता है ।उनके लिए पहले से एक माहौल बना दिया जाता है, और माहौल क्या बनाया जाता है कि जो प्रोफ़ेसर उनको पढ़ाते हैं वहां वो दिन रात एक ही बात उनके दिमाग में डालते रहते हैं कि "बोलो अमेरिका में कहाँ जाना है" तो वो विद्यार्थी जब पढ़ के तैयार होता है तो उसका एक ही मिशन होता है कि "चलो अमेरिका" | IITs मे जो सिलेबस पढाया जाता है वो विकसित अमीर देशो के हिसाब से तैयार होता है बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के हिसाब से तैयार किया जाता है । कभी ये देश के अंदर इस्तेमाल की कोशिश करें तो 10% से 20% ही इस देश के काम का होगा बाकी 80% अमेरिका/युरोप के हिसाब से होगा । इसी को तकनीकी भाषा में आप ब्रेन ड्रेन प्रतिभा पलायन कहते है, मैं उसे भारत की तकनीकी का सत्यानाश मानता हूँ, क्योंकि ये सबसे अच्छा दिमाग हमारे देश में नहीं टिकेगा तब तो हमारी तकनीकी इसी तरह हमेशा पीछे रहती जाएगी । आप सीधे समझिये न कि जो विद्यार्थी पढ़कर तैयार हुआ, वही विद्यार्थी अगर भारत में रुके तो क्या-क्या नहीं करेगा अपने दिमाग का इस्तेमाल कर के, लेकिन वो दिमाग अगर यहाँ नहीं रुकेगा, अमेरिका चला जायेगा तो वो जो कुछ करेगा, अमेरिका के लिए करेगा, अमरीकी सरकार के लिए करेगा और हम बेवकूफों की तरह क्या मान के बैठे जाते हैं कि "देखो डॉलर तो आ रहा है", अरे डॉलर जितना आता है उससे ज्यादा तो नुकसान हो जाता है । वर्तमान समय में जो डॉलर विदेशो से आ रहा है उसमे सबसे बड़ा योगदान उन लोगो का है जो 10 ,12 वी पास उन भारतीयो का है जो रात दिन मेहनत मजदूरी करके विदेशो से डॉलर भारत भेज रहे है । आप बताइए कि इससे खुबसूरत दुष्चक्र क्या होगा कि आपका दुश्मन आपको ही पीट रहा है आपकी ही गोटी से | कभी भी कोई भी विकसित अमीर देश भारत जैसे विकासशील देशो में तकनीकी को विकसित नहीं होने देना चाहता । इस देश के वैज्ञानिक यहाँ रुक जायेंगे, इंजिनियर यहाँ रुक जायेंगे, डॉक्टर यहाँ रुकेंगे, मैनेजर यहाँ रुकेंगे तो भारत में रुक कर कोई ना कोई बड़ा काम करेंगे अमीर देशो की दूकान बन्द हो जायेगी दूसरी तरफ हम फंडामेंटल रिसर्च मे बहुत पीछे चले जाते हैं, जब तक हमारे देश मे बेसिक रिसर्च नहीं होगी तो हम अप्लाइड फील्ड मे कुछ नहीं कर सकते हैं, सिवाए दूसरो के नकल करने के । मतलब हमारा नुकसान ही नुकसान और अमीर विकसित देश अमेरिका और युरोप का फायदा ही फायदा । सबसे बड़ी बात क्या है, हमारे देश मे सबसे बड़ा स्किल्ड मैंन पावर है चीन के बाद, हमारे पास 65 हज़ार वैज्ञानिक हैं, दुनिया के सबसे ज़्यादा इंजिनियरिंग कॉलेज हमारे देश मे हैं, अमेरिका से 4-5 गुना ज़्यादा इंजिनियरिंग कॉलेज हैं भारत मे, अमेरिका से ज़्यादा हाई-टेक रिसर्च इन्स्टिट्यूट हैं भारत मे, अमेरिका से ज़्यादा मेडिकल कॉलेज हैं भारत मे, हमारे यहाँ पॉलिटेक्निक, ITI की संख्या ज़्यादा है, नॅशनल लॅबोरेटरीस 44 से ज़्यादा हैं जो CSIR के कंट्रोल मे हैं, इतना सब होते हुए भी हम क्यों पीछे हैं ? आज लाखो रूपये में एक इंजिनियर तैयार किया जाता है इस उम्मीद में कि समय आने पर वो राष्ट्र के काम में लगेगा, देश के काम में लगेगा, राष्ट्र को सहारा देगा, वो अचानक भाग कर विदेश चला जाता है। समाधान 1.अमेरिका ने और युरोप के देशों ने अपने यहाँ के ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) को रोकने के लिए तमाम तरह के नियम बनाए हैं और उनके यहाँ अलग अलग देशों में अलग अलग कानून हैं कि कैसे अपने देश की प्रतिभाओं को बाहर जाने से रोका जाये । उधर अमेरिका और यूरोप के अधिकांश देशों में ये परंपरा है कि आपको कमाने के लिए अगर विदेश जाना है तो फ़ौज की सर्विस करनी पड़ेगी, सीधा सा मतलब ये है कि आपको बाहर नहीं जाना है और उन्ही देशो में ये गोल्डेन रुल है कि अगर उनके यहाँ बहुतायत में ऐसे लोग होंगे तो ही उनको बाहर जाने देने के लिए अनुमति के बारे में सोचा जायेगा । 2. जब आई आई टी से निकल कर ये छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के बांड शाइन कर सकते है तो भारत सरकार से क्यों नहीं । उच्च शिक्षण संस्थानों में सब्सिडी उन्ही छात्रो को मिले जो देश में रह कर सेवा देने को तत्पर तैयार हो । 3. भारत के बैंक एजुकेशन लोन छात्रो को सशर्त प्रदान करे जो छात्र भारत में रह कर कार्य करे उन्हें लोन की अदायगी में छूट प्रदान करे । 4. आई आई टी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों का पाठ्यक्रम बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के सुविधा के अनुशार न बने बल्कि पाठ्यक्रम भारत का कल्चर एग्रीकल्चर को आधार मानकर उसमे नैनोटेक्नोलॉजी को केंद्र में रखा जाए ऐसी तकनकी इन संस्थानों से निकले जिससे गावँ को स्वावलम्बन मिले गावँ से शहर की ओर होने वाला पलायन रुके छोटे छोटे संयंत्र बने जिसको कम पूंजी लागत से सरलता और सफलता के साथ संचालित हो । भारत सरकार आज अभियान चला रही है मेक इन इण्डिया भारत के प्रधानमंत्री वित्तमंत्री विदेशी पूंजी निवेश को लेकर बड़े चिंतित है यदि देश के सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोग स्वदेशी का चिंतन करे ऐसी नीतिया बनाये जिससे देश से जो प्रतिभा का पलायन हो रहा है वो रुके ।आज देश में पूंजी निवेश नहीं प्रतिभा पलायन को रोकने की आवश्यकता है ब्रेन ड्रेन नहीं रिवर्श ब्रेन की जरूरत है ।आज भारत को मेक इन इण्डिया नहीं डिस्कवर इन इण्डिया की जरूरत है । कहते है किसी भी राष्ट्र की नीव उस राष्ट्र के युवाओ की संकल्प शक्ति होती है परंतु डॉलर की लालच में जो टूट जाए वो संकल्प हो ही नहीं सकता । विधार्थी साथियो के लिए प्रेरणादायक प्रसंग जब रमन ने ठुकराये युवक को चुना प्रसिद्ध वैज्ञानिक भौतिकशाश्त्री सी वि रमन जी को अपने विभाग के लिए योग्य वैज्ञानिक की आवश्यकता थी । उन्होंने अखबारो में विज्ञापन दिया पढ़कर बहुत सारे आवेदन आये रमन जी ने उनमे से कुछ का चयन करके साक्षात्कार के लिए बुलाया । साक्षात्कार हुवा इनमे से एक युवक ऐसा था जिसे रमन जी ने साक्षात्कार में अस्वीकार कर दिया था ।थोड़ी देर बाद जब साक्षात्कार समाप्त हो गया वो युवक कार्यालय के आस पास घूम रहा था रमन जी उससे नाराज होते हुए बोले जब मैंने तुम्हे अस्वीकार कर दिया तुम इस पद के अयोग्य हो गए तुम्हे नौकरी यहाँ नहीं मिलने वाली जाओ अपने घर जाओ । तब उस युवक ने विनम्रता से कहा सर आप नाराज मत हो , मुझे आने जाने का किराया भूल से अधिक दिया गया है इसलिए मै अतरिक्त कराया वापस करने हेतू लिपिक को ढूंढ रहा था । प्रसिद्ध वैज्ञायानिक रमन उसकी बातो को सुनकर विस्मित हुए फिर कुछ सोच कर बोले मैंने तुम्हारा चयन कर लिया है ।तुम चरित्रवान हो ।भौतिक के ज्ञान में तुम जरूर कुछ कमजोर हो जिसे मैं पढ़ाकर दूर कर सकता हूँ परंतु चरित्रवान व्यक्ति पाना कठिन है । वस्तुतः सर्वोच्च पात्रता तो ईमानदारी होती है जो कर्म निष्ठां व समर्पण को जन्म देती है ज्ञान की कमी को अध्धयन से दूर किया जा सकता है परंतु चारित्रिक दुर्बलता संस्थान को हर प्रकार से हानि पहुचाती है । चेहरे का क्या है ये वो तो साथ ही चला जाता है वो तो कर्म ही होता है जो किसी को साधारण नाविक के बेटे को कर्मयोगी कलाम बना देता है और किसी को युवाओ का प्रेरणा पुंज भाई राजीव दीक्षित । है वही सूरमा इस जग में जो अपनी राह बनाता है कोई चलता है पदचिन्हों पर कोई पद चिन्ह बनाता है । हर बड़ा सपना बड़ी हकीकत बनता है अगर सपने को हकीकत करने वालो का संकल्प बड़ा हो जाए । युवा साथियो आओ मिलकर व्यक्ति से व्यक्ति , व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र को जोड़ने वाले भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर स्थापित करे । आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए धन्यवाद् और अच्छा लगे तो इसे अग्रेषित कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये , अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, अपने नाम से डालिये मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये । भारत को मात्र विकसित नहीं विश्वगुरु बनाना है । स्वदेशी से स्वावलम्बी भारत

सोमवार, 16 मई 2022

. कश्यप और कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा पर मनाते हैं पर बुद्ध जयंती की गूंँज में भुलाया गया हजारों साल का पौराणिक महत्व

   



  भगवान विष्णु के कूर्म अवतार रूप में कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है. कूर्म जयंती वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर प्रकट हुए थे. साथ ही समुद्र मंथन के वक्त अपनी पीठ पर मंदरांचल पर्वत को उठाकर रखा था.

कमठ या कूर्म स्वरूप मिस्र के देव

मिस्र में 664-332 ईसा पूर्व खेप्री स्करब देव की मान्यता रही है। यह कमठ के समान पेट वाला माना गया था जिसका वह कवच आयुध भी था। भारतीय कथाओं में भी ऐसे रूप वर्णित है।
किसी भी तरह की रचना, चिंतन और नियमन के साथ साथ स्वरूप के लिए उसके पास मानव मस्तिष्क और मानव जैसी ही मुखाकृति स्वीकारी गई थी। इसे गुबरेला के रूप में भी देखकर पहचान दी जा सकती है।
अनोखी आकृति अभी बर्लिन के मिस्र संग्रहालय में संरक्षित है और देखी जा सकती है...
*
Humanoid Khepri Scarab
This rare model of the Egyptian scarab beetle creator god Khepri, with a human head and arms emerging from a scarab’s exoskeleton.
Most likely from the Late Period, ca. 664-332 BC.
Now in the Egyptian Museum of Berlin.
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनु

वेदोंमें कूर्म अवतार             

 - #स_यत्कूर्मो_नाम ! #एतद्वै_रूपं_कृत्वा_प्रजापतिः_प्रजा_असृजत ! (शतपथ ब्राह्मण ७/५/१५ शुक्ल यजुर्वेद)
-"प्रजापति परमेश्वरने कूर्मरूप धारण कर प्रजाकी रचनाकी है ।"  
 #अन्तरतः_कूर्मभूतं_सर्पन्तम् ! #तमब्रवीत् ! #मम_वै_त्वङ्मांसात्_समभुः ! #नेत्यब्रवीत्  ! #पूर्वमेवाहमिहासमिति ! #तत्पुरुषस्य_पुरुषत्वम्  ! #सहस्राक्षः_सहस्रपात् !(तैत्तरीय आरण्यक १/२३ कृष्णयजुर्वेद)  - " कूर्म होकर जल में संचार करते हुए कूर्म से प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा "हे कूर्म ! तुम हमारे त्वक् माँसादि सम्बन्धी रस से उत्पन्न हुए हो " , कूर्म ने कहा " जो तुमने कहा वह सही नहीं है ,मैं तो पहले से ही था अर्थात् कूर्मशरीरमात्र  तुम्हारे त्वक् मांसादि से उत्पन्न हुआ । मैं अनन्त चैतन्यरूप ईश्वर (सनातन विष्णु) तो पहले से ही हूँ । पूर्व में होने से ही ईश्वरका पुरुष नाम हुआ  (आदिपुरुष भगवान् )! वह कुर्मावताधारी भगवान् श्रीहरिः अपना महत्त्व प्रकट करने के लिये विराटरूप धारणकर हजारों सिरों ,आँखों और चरणोंसे युक्त होकर आविर्भूत हुए !"
✍🏻वरुण शिवाय

कश्य॑प जयन्ती
वैशाख मास की पूर्णिमा को कूर्मावतार जयन्ती मनाई जाती है। कूर्म अर्थात् कश्यप ।
ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि, मरीचि के पुत्र हुये कश्यप ।
कश्यप के पुत्र विवस्वान् और विवस्वान् के वैवस्वत मनु हुये।
शतपथब्राह्मण में कूर्म के सम्बन्ध में - स यत्कूर्मो नाम । एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत यदसृजताकरोत्तद्यदकरोत्तस्मात्कूर्मः कश्यपो वै कूर्मस्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति -  ७/५/१/५ |
 ऋग्वेदसंहिता के सूक्त-पाठ को सुनिये जिसमें #कश्यप का स्मरण किया गया है।

♥❥ वैशाख पूर्णिमा माने भगवान् कश्यप की जयन्ती ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क

महर्षि कश्यप जयंती की शुभ कामनाएं । कश्यप ऋषि ;
जब हम सृष्टि विकास की बात करते हैं तो इसका मतलब है जीव, जंतु या मानव की उत्पत्ति से होता है। सभी मूलतः इन्ही ब्रह्मा के कुल के है ।

ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस-पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। मान्यता अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी।

विष्णु पुराण के अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।
अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्९वाज।

परशुराम जी के गुरु ब्रह्मऋषि कश्यप थे। इनको वचन देने वश परशुराम जी रात्रि में महेंद्र पर्वत में सीमित रहते है।

कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। पुराणों अनुसार हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। कश्यप ने बहुत से स्मृति-ग्रंथों की रचना की थी।

कश्यप कथा :
पुराण अनुसार सृष्टि की रचना और विकास के काल में धरती पर सर्वप्रथम भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के निवेदन पर दक्ष प्रजापति ने अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से 66 कन्याएँ पैदा की।

इन कन्याओं में से 13 कन्याएँ ऋषि कश्यप की पत्नियाँ बनीं। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। ऋषि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने जाते हैं।
विष्णु पुराणों अनुसार सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार रहे हैं- वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

श्रीमद्भागवत के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी साठ कन्याओं में से  13 कन्याओं का विवाह ऋषि कश्यप के साथ तथा अन्य कन्याओ के विवाह बाद शेष 4 कन्याओं का विवाह भी कश्यप के साथ ही कर दिया गया।

*कश्यप की 17 पत्नीयाँ : इस प्रकार ऋषि कश्यप की अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सुरसा, तिमि, विनता, कद्रू, पतांगी और यामिनी आदि पत्नियाँ बनीं।

अदिति : पुराणों अनुसार कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्यों को जन्म दिया, जिनमें भगवान नारायण का वामन अवतार भी शामिल था।

माना जाता है कि चाक्षुष मन्वन्तर काल में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों(सूर्य) के रूप में जन्म लिया, जो कि इस प्रकार थे- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।

ऋषि कश्यप के पुत्र विस्वान से मनु का जन्म हुआ। महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।

दिति : कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निसंतान रहे। जबकि हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। इन्ही के आगे ययाति हुए जिनका विवाह दैत्य गुरु शुराचार्य की कन्या देवयानी से हुआ। जिनके राजा पुरु हुए।

दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई।

रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए।
पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए।
सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए।
इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ।
मुनि के गर्भ से अप्सराएँ जन्मीं।
कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने साँप, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।

ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया।
सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की।
रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।

रानी विनता के गर्भ से गरुड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए।
कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई, जिनमें प्रमुख आठ नाग थे-अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।

रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ।
यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया।
उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जो कि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।

माना जाता है कि कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्मीर का प्राचीन नाम था। समूचे कश्मीर पर ऋषि कश्यप और उनके पुत्रों का ही शासन था। कश्यप ऋषि का इतिहास प्राचीन माना जाता है। शोध करें तो पाएंगे जानवरो की जातिया होती थी जिनका आपस मे मैथुन सम्भव न हुआ किन्तु मनुष्य जाति के आपस मे विवाह सम्बन्ध मैथुन आदि हुए है।  मनुष्य जाति के जीव ही कर्म भाव से सुर- असुर /  दैत्य देवता की दो जातियों में बदलते है।
कैलाश पर्वत के आसपास भगवान शिव के गणों की सत्ता थी। उक्त इलाके में ही दक्ष राजाओं का साम्राज्य भी था। कश्यप ऋषि के जीवन पर शोध किए जाने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

शाकाहार शास्त्र की दृष्टि में एवं मांसाहार पश्चिमी अवधारणा

  




 शास्त्रों में शाकाहार
प्रायः लोग मांस भोजन के लिए शास्त्रों का अपने अनुसार विकृत अर्थ लगाते हैं। विशेषकर भारत में वामपन्थियों का उद्देश्य है कि भारत में गो पूजा परम्परा नष्ट करने के लिए गोमांस भोजन की परम्परा दिखायी जाय। उनको केवल ३ शब्द अलग अलग स्थानों से खोज कर जोड़ देना है-गो, मांस, भोजन। विभिन्न प्रसंगों में इनके क्या अर्थ हिं, उनसे इनको कोई मतलब नहीं है। ये ३ शब्द मिलते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया।
१. यज्ञ में पशुबलि-
(१) मांसाहार के लिए मिथ्या अर्थ-यज्ञ में उपरिचर वसु ने पशु बलि का समर्थन किया था जिस पर ऋषियों ने उनको शाप दिया था।
महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३३७-
देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात्॥१३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा।
कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः॥१४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थविदिनम्।
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद दिवः पत॥१५॥
अद्यप्रभृति ते याजन्नाकाशे विहता गतिः।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि॥१६॥
यहां अज का अर्थ बीजी पुरुष कहा गया है, जिसकी यज्ञ द्वारा उपासना होती है।
(२) रन्तिदेव पर दैनिक गोहत्या का आक्षेप-महाभारत, द्रोण पर्व, अध्याय ६७-
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत्।
आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः॥१४॥
= जो भी अतिथि संकृति पुत्र रन्तिदेव के यहाँ रात में आता था, उसे २१,००० गौ छू कर दान करते थे।
कोई भी २१,००० गौ एक बार क्या, जीवन भर में नहीं खा सकता है। यहां गो शब्द सम्पत्ति की माप भी है। मुद्राओं के नाम बदलते रहे हैं। उनका स्थायी नाम था-गो, धेनु। किसी को एक लाख गाय दी जायेगी तो वह उनको रख नहीं पायेगा, न देख भाल कर सकता है। यहाँ गो बड़ी मुद्रा (स्वर्ण), धेनु छोटी मुद्रा (रजत), निष्क सबसे छोटी मुद्रा है। निष्क से पंजाबी में निक्का, या धातु नाम निकेल हुआ है। निष्क मिलना अच्छा है, अतः नीक का अर्थ अच्छा है।
अन्नं वै गौः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/८/३ आदि)
इन्द्र मूर्ति १० धेनु में खरीदने का उल्लेख है-
क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। (ऋक, ४/२४/१०)
२१००० गो या स्वर्ण मुद्रा देने के बाद उनको अच्छा भोजन कराते थे-
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्ट मणिकुण्डलाः।
सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा॥
वहाँ कुण्डल, मणि पहने रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे-आप लोग खूब दाल भात खाइये। आज का भोजन पहले जैसा नहीँ है, उससे अच्छा है।
यही वर्णन शान्ति पर्व (६७/१२७-१२८) में भी है।
अनुशासन पर्व (११५/६३-६७) में बहुत से राजाओं की सूची है जिन्होंने तथा कई अन्य महान् राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था। इनमें रन्तिदेव का भी नाम है-
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च।
रैवते रन्तिदेवेन वसुना, सृञ्जयेन च॥६३॥
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च।
दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा॥६४॥
विरूपश्वेन निमिना जनकेन च धीमता।
ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह॥६५॥
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च।
अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना॥६६॥
हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च।
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम॥६७॥
श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव , वसु, सृञ्जय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत-इन सबने तथा अन्य राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था।
(३) भगवान् राम आदि कई राजाओं का ऊपर उल्लेख है कि उन लोगों ने जीवन में कभी मांस नहीं खाया।
(४) वामपन्थी झूठ-उत्तर रामचरित में एक प्रसंग है कि वसिष्ट दशरथ से मिलने आये तो उनको वत्सतरी दी गयी। वत्सतरी के बाद मडमड ध्वनि हुई। इसका अर्थ किया गया कि २ वर्ष की गाय दी गयी जिसे देखते ही वसिष्ठ ने उसे खाना आरम्भ कर दिया जिसकी हड्डियों के टूटने से मडमड शब्द हुआ। उसके बाद दशरथ ने कहा कि मधुपर्क हो गया अब प्रसंग पर चर्चा करें। यहां स्पष्टतः वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है जो सभी अतिथियों को दिया जाता है। अतिथि यात्रा में थके होने से उनको मीठा तथा जल की कमी होने से जल देते हैं। छोटे बच्चों को भी पेट खराब होने पर नमक-चीनी का घोल देते हैं। खाली पेट में मधुपर्क जाने पर हलका शब्द होता है। कभी कभी जोर की डकार भी होती है। गाय को खाना बाघ या मगरमच्छ के लिये भी सम्भव नहीं है। उसके पैर मे मनुश्य की हड्डी भले ही टूट जाय, मनुष्य से मुंह में नहीं ले सकता।
इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में लिखा है कि ऋषि लोग घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम का मूर्खतापूर्ण अनुवाद है। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग = हड्डी, तर = सूप। वास्तव में इस उपनिषद् में घोड़े की चर्चा ही नहीं है। यहां सूर्य या वरुण को अश्व कहा है, उससे बड़े ब्रह्म की व्याख्या होने से यह श्वेताश्वतर है।
२. शमिता-
यज्ञ में पशु का आलभन करते हैं-उसका पीठ, कन्धा आदि छूते है। इसे शमिता कहते हैं, अर्थात् शान्त करने वाला। शान्त करने के लिए हत्या नहीँ की जाती है। पर इसका अर्थ किया जाता है कि पशु का कन्धा आदि छू कर देखते हैं कि कहाँ से उसका मांस काटना अच्छा होगा। आजकल भी घुड़सवारी सिखाई जाती है कि घोड़े पर चढ़ने के पहले उसकी गर्दन तथा कन्धा थपथपाना चाहिए। इससे वह प्रसन्न हो कर अच्छी तरह दौड़ता है। बच्चों की भी प्रशंसा के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं, यद्यपि वे भाषा भी समझ सकते हैं। यही आलभन है। शिष्य भी पहले गुरु को जा कर नमस्कार करता है तो गुरु उसके कन्धे पर हाथ रख कर आलभन करते हैं। यदि आलभन द्वारा उसकी हत्या करेंगे तो शिक्षा कौन लेगा? गुरु को भी फांसी होगी। हर अवसर पर यदि कोई पैर छूकर नमस्कार करे तो उसकी पीठ पर ही हाथ रख कर ही आशीर्वाद दिया जाता है।
शमितार उपेतन यज्ञं देवेभिरिन्वितम्। पाशात् पशुं प्र मुञ्चत बन्धाद् यज्ञपतिं परि। (तैत्तिरीय सं, ३/१/४/१०)
प्राजापत्या वै पशवः तेषां रुद्रो अधिपतिः यत् एताभ्यां उपाकरोति, ताभ्यां एव एनं प्रतिप्रोच्या आलभत आत्मनो अनाव्रस्काय द्वाभ्यां उपाकरोति
द्विपाद् यजमानः प्रतिष्ठित्या उपाकृत्य पञ्च जुहोति। पाङ्क्ताः पशवः पशून् एव अवरुन्धे, मृत्यवे वा एष नीयते यत् पसुः तं यत् अन्वारभेत प्रमायुको यजमानः स्यात् नाना प्राणो यजमानस्य पशूनेत्याह व्यावृत्यै॥१॥ यत् पशुः मायुं अकृत इति जुहोति शान्त्यै शमितार उपेनेत्याह यथा यजुः एव एतत् वपायां वा आह्नियमाणायां अग्नेः मेधो अपक्रामति त्वां उ ते दधिरे हव्यवाहमिति वपामपि जुहोति अग्नेः एव मेधं अवरुन्धे अथो शृतत्वाय पुरस्तात् स्वाहा कृतयो वा अन्ये देवा उपरिष्टात् स्वाहा कृतयो अन्ये स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा इति अभितो वपां जुहोति॥२॥ (तैत्तिरीय सं, ३/१/५/१-२)
इसका आशय है कि प्रजापति से पशु हुए, उनका स्वामी रुद्र है (पशुपति)। उनको २ मन्त्रों से तैयार करता है जिससे उनको क्षति नहीं पहुंचे। यजमान के २ पाद (रंगाचारी कश्यप के अनुसार चेतना के २ स्तर) हैं, जो उसके आधार हैं। उसके बाद वह ५ पशुओं का प्रयोग करता है। पशु को कष्ट नहीं होना चाहिए। उनकी शान्ति के लिए मन्त्र पढ़ता है। इसकी त्रुटिपूर्ण नकल कुरान में है, पशु को मारते समय मन्त्र पढ़ते हैं। यहां, ५ प्रकार के पशुओं के कै अर्थ हैं, जिनकी व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों में है।
देव, पिता, माता आदि को शमिता कहा गया है। स्पष्टतः उनका उद्देश्य अपने सन्तान का पालन है, हत्या नहीं-
दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। ... उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ,,, अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वं अध्रिगो। अध्रिगुश्च अपापश्च उभौ देवानां शमितारौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)
इसी प्रकार उपनयन, विवाह आदि में सन्तान माता-पिता से अलग होती है, तो माता-पिता को कष्ट की शान्ति करायी जाती है, सन्तान को आश्वासन देते हैं कि दैव सहायक होगा। पहले माता को सान्त्वना दी जाती है, जिसे लोकभाषा में इमली घोटाना कहते हैं।
शक्ति का प्रयोग या खर्च होना आंशिक मृत्यु है। यदि पशु नहीं रहेगा तो प्रयोग किसका होगा-
मृत्युः तत् अभवत् धाता शमिता उग्रः विशां पतिः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/६)
अथर्व सं (१०/९) शतौदना गौ के विषय में है। गौ यज्ञ या निर्माण स्वरूप है-(१) निर्माण स्थान (शरीर, वेदी), (२) गति या क्रिया (गम् = गति), (३) स्रोत तथा निर्मित पदार्थ। गौ पशु भी मूल यज्ञ कृषि का साधन है तथा उसका दुग्ध भोजन है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता है अतः गौ पशु तथा यज्ञ दोनों अवध्य हैं (यजुर्वेद प्रथ सूक्त में अघ्न्या)। १०० ओदन (पकाया चावल, भात) के कई अर्थ हैं-(१) १०० प्रकार की निर्माण सामग्री , (२) शरीर में हृदय से निकली १०० नाड़ियां (कठोपनिषद्, २/३/१६), (३) या लोकों के निर्माण के प्रत्येक स्तर पर आनन्द के १०० भाग में १ भाग का उपयोग जिससे मनुष्य लोक से आरम्भ कर उच्च लोकों में आनन्द १००-१०० गुणा बढ़ता जाता है (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/८)
हिरण्य ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥७॥
घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति। पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीः दिवं प्रेहि शतौदने॥११॥ (अथर्व, १०/९)
कुछ वनस्पति शान्त करती हैं, उनको भी शमिता कहा है-
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन। (ऋक्, १०/११/८, अथर्व, ५/१२/१२, वाज. यजु, २९/३५, मैत्रायणी सं, ४/१३/३, काण्व सं, १६/२०, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/३/४) = गार्हपत्य अग्नि (वनस्पतिः) दक्षिणाग्नि (शमिता) और आहवनीय अग्नि (देवः अग्निः) मिष्ट और घृत के साथ (मधुना घृतेन) हवि का आस्वादन करावे (हव्यं स्वदन्तु)।
शान्तिपूर्वक २ हाथों से निर्माण करना भी शमिता है-
सोमस्य या शमितरा सुहस्ता (ऋक्, ५/४३/४)
निर्माण के क्रम अश्वत्थ हैं (ऊर्ध्व मूल अश्वत्थ-गीता, १५/१), शमी वृक्ष से भी शान्ति मिलती है, अतः शमी नाम है। पत्नी में दोनों गुण होते हैं अतः कहा है कि शमी और अश्वत्थ पर चढ़ो-शमीमश्वत्थमारूढ (अथर्व, ६/११/१)
व्यवसाय या यज्ञ भी शमी है जिससे कर्ता सूर्य जैसा तेजस्वी होता है-
विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाधतः (ऋक्, १/११०/४)
शमी से यज्ञ करने पर शान्ति होती है-
शमीभिर्यज्ञमाशत (ऋक्, १/२०/२)
इच्छाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया (ऋक्, १/८३/४, अथर्व, २०/२५/४)
यज्ञ के लिए बिना बाधा लगातार क्रिया चाहिये, जिसे अध्रिगु कहा है (निरुक्त, ५/११) = मन्त्र, अग्नि, इन्द्र आदि। बाधा दूर करना शमिध्वम् है-
अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। (मैत्रायणी सं, ४/१३/४, काण्व सं, १६/२१, ऐतरेय ब्रा, २/७/११, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/६/४)
बुद्धि के आवरण या कर्म बन्धन भी शमी द्वारा काटे जाते हैं (गीता, १५/२)-
धिया नहुषि अस्य बोधताम् (ऋक्, १०/९२/१२)-यहां बुद्धि प्रेरित करने वाला नहुष (तन्त्र का कुण्डलिनी?) कहा है।
जीवन यज्ञ पत्नी के साथ शान्ति पूर्वक (शंयु) रहने से होता है-
शंयुना पत्नी संयाजान् (वाज यजु, १९/२९)
अथा नः शं योरपो दधात (ऋक्, १०/१५/४, वाज यजु, १९/५५, मैत्रायणी सं, ४/१०/६, काण्व सं, २१/१४)
तच्छं योरावृणीमहे। गातुं यज्ञाय यज्ञपतये। (ऋक् खिल, १०/१९१/१५, तैत्तिरीय सं, २/६/१०/३, मैत्रायनी सं, ४/ १३/१०, शतपथ ब्रा, १/९/१/२७, तैत्तिरीय ब्रा, ३/५/११/१, तैत्तिरीय आरण्यक, १/९/७) = शंयु के निकट प्रार्थना करते हैं कि यज्ञ का देवों के प्रति गमन हो (गातु यज्ञाय) और यजमान का देवों के प्रति गमन हो (गातुं यज्ञ पतये)। यही गीता (३/१०) में कहा है कि देव (आन्तरिक और बाह्य प्राण) और मनुष्य यज्ञ द्वारा परस्पर की उन्नति करते हैं।
शंयु को बृहस्पति का पुत्र कहा है, अर्थात् बुद्धि के अभ्यास से शान्ति होती है।
३. यज्ञ, पशु, मेध-
(१) ब्रह्म, कर्म, यज्ञ-(गीता, ८/१-४)-ब्रह्म सब कुछ है।
जो गति है, वह कर्म है।
चक्रीय कर्म में आवश्यक उत्पादन यज्ञ है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता ३/१०)
एवं प्रवर्तितं चक्रं ... (गीता ३/१६)
यज्ञ चक्र (गीता, ३/१४-१६)
अक्षर-ब्रह्म-कर्म-यज्ञ-पर्जन्य-अन्न-भूत-(भूत के अक्षर रूप से पुनः आरम्भ।
(२) निर्माण, उत्पाद-निर्माण के लिए २ प्रकार का मिश्रण होता ह-
अग्नि या अन्नाद - भोक्ता
सोम = आकाश में बिखरा पदार्थ, भुक्त, अन्न।
पाक ४ प्रकार से है-१. अग्नि + अग्नि, २, अग्नि + सोम (क) पूरा सोम इन्धन कि तरह जलता है। (ख) अग्नि ही सोम की तरह फैल जाता है। ३. सोम + सोम-जैसे गैस + गैस, वायु + जल (मेघ), जल + ठोस। २ प्रकार का मिश्रण वेद में वराह (जल स्थल का पशु) या मेघ कहा गया है।
(३) पशुमेध-१. पशु-कोई भी दृश्य पदार्थ (पश्य = देखना)। प्रजापति द्वारा दृश्य जगत् में जो कुछ भी निर्माण हुआ वह पशु है। यह ५ प्रकार के हैं-१’ पुरुष (मनुष्य, जो पुर या किसी रचना में रहे), २. अश्व (घोड़ा, चलाने वाली ऊर्जा), ३. गौ (निर्माण क्रिया, गति, स्थान), ४. अवि (भेड़ा, अग्र गति), ५. अज (बकरा, अजन्मा, सनातन निर्माण चक्र)।
(अग्निः) एतान् पञ्च पशून् अपश्यत्। पुरुषं अश्वं गां, अविं, अजं-यद् अपश्यत्, तस्मात् एते पशवः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/२/१/२)
देवा यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥१५॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥ (पुरुष सूक्त)
मेध-चेतन तत्त्व पुरुष २ प्रकार से निर्माण करता है-
२. मेध (विचार, योजना) यह क्रिया करने की शक्ति मेधा = बुद्धि है।
मेधृ मेधा-हिंसनयोः संगमे च (पाणिनीय धातु पाठ, १/६११)-कई विचारों को आत्मसात् (हिंसा) कर योजना (योग, संगम) होती है।
३. तप-कर्म, श्रम।
यत् सप्तान्नानि मेधया तपसा अजनयत् पिता। इति मेधया हि तपसा अजनयत् पिता। (शतपथ ब्राह्मण, १४/४/३/१, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/५/१)
यहां निर्माण करने वाला चेतन तत्त्व पुरुष या पिता है। निर्माण का स्थान माता है (मा माने, माप करना, माता)।
यो नः पिता यो जनिता विधाता। (ऋक्, १०/८२/३, वाज. यजु, १७/२७, काण्व सं, १८/१, तैत्तिरीय सं, ४/६/२/१)
निर्माण के लिये प्रयुक्त बुद्धि मेधा ह, उसके लिए किसी वस्तु का प्रयोग मेध है। जिन वस्तुओं का प्रयोग निर्माण के लिए हो सकता है, वे मेध्य या ग्राम्य पशु हैं। जो उपलब्ध या उपयोगी नहीं हैं वे आरण्य पशु हैं।
विश्वरूपं वै पशूनां रूपम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/४/६)
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥ (पुरुष सूक्त)
सप्त ग्राम्याः पशवः सप्तारण्याः (शतपथ ब्राह्मण, ३/८/४/१६, ९/५/२/८)
अस्मै वै लोकाय ग्राम्याः पशवः आलभ्यन्ते। अमुष्मा आरण्याः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/३/१)
४. अन्न, मद्य, मांस-
(१) जो प्राणियों द्वारा खाया जाय वह अन्न है (अद् भोजने)-
अद्यते अत्ति च भूतानि। तस्मात् अन्नं तदुच्यते। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/२)
अद्भ्यो वा अन्नं जायते (तैत्तिरीय आरण्यक, ८/२) = जल (या उसके जैसे फैले पदार्थ) से अन्न होता है।
अन्न पशु है (केवल देखता है, कर नहीं शकता)-अन्नमु वै पशवः (जैमिनीय उपनिषद्, ३/१४१)
(२). मद-पदार्थों का सत्त्व (सत्) अन्न है। यह आनन्द देता है।
रसो वै मदः (जैमिनीय उपनिषद्, १/२१५, २१६, ३/२८, १५९, २२२, २९५)
दृश्य रूप ऋक् है, उसका प्रभाव साम या रस है-
यो वा ऋचि मदो यः सामन् रसो वै सः (माध्य. शतपथ, ४/३/२५)
जो भी स्वादिष्ट है तथा ऊर्जा देता है वह मद है-
मदन्तीभिः प्रोक्षति। तेज एवास्मिन् दधाति। (तैत्तिरीय आरण्यक, ५/४/१)
मदिन्तम इति स्वादिष्ट इत्येवैतदाह। (माध्य. शतपथ, ३/८/३/२५)
(३) मांस-उत्तम अन्न जो आकाश की तरह फैला विराट् (पृथ्वी पर उत्पन्न) है-
नभो मांसानि (तैत्तिरीय सं. ७/५/२५/१) मांसानि विराट् (छन्दः) जैमिनीय उपनिषद् (२/५८)
एतदु ह वै परममन्नाद्यं यन्मांसम् (माध्य. शतपथ, ११/७/१/३)
(४) मद्य, मांस, काम का निषेध-न मांसं समश्नीयात्। न स्त्रियं उपेयात्। यन्मांसं अश्नीयात्, यत् स्त्रियं उपेयात्, निर्वीर्यः स्यात्। न एनं अग्निं उपनमेत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/९/७-८)
शरीर या फल दोनों का कोमल भाग मांस है। पशु शरीर के कोमल भाग को मांस इसलिए कहते हैं कि यह कहता है कि मैं उसे (सः) खाऊंगा, जो मुझे (मां) खाता है-
मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनु स्मृति, ५/५५)
बकरे का मांस अधिक खाने वाले प्रायः उसके जैसी दाढ़ी भी रखते हैं।
मद्य, मांस, मैथुन मनुष्य की प्रवृत्ति है। उसे पूरी तरह बन्द नहीं किया जा सकता है। किन्तु कल्याण तथा उन्नति के लिए उसे सीमित और नियन्त्रित करना चाहिए।
न मांस भक्षणे दोषः न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥ (मनुस्मृति, ५/५६)
मनु स्मृति (५/३९-४१) के अनुसार केवल यज्ञ के लिए पशु बलि दी जा सकती है। यहां यज्ञ का अर्थ उपयोगी निर्माण है, अनावश्यक बलि नहीं होती है। बलि का अर्थ हत्या नहीं, उसकी ऊर्जा या श्राम् का उपयोग है। मरने पर बेकार हो जायेगा।
(५) बाइबिल, कुरान में निषेध-
Genesis-(1/29) And God said, Behold, I have given you every herb bearing seed, which [is] upon the face of all the earth, and every tree, in the which [is] the fruit of a tree yielding seed; to you it shall be for meat.
Koran (2/61) And when you said, Musa , we will no longer confine ourselves to a single food: So, pray for us to your Lord that He may bring forth for us of what the earth grows — of its vegetable, its cucumbers, its wheat, its lentils and its onions. He said, do you want to take what is inferior in exchange for what is better?
Koran (2/174) also prohibits eating of-Khinjar = which is seen. But it is taken only as swine.
एक प्रकार से यहां वही कहा है जो वेद या स्मृति में लिखा है। बाइबिल (जेनेसिस, १/२९) या कुरान (२/६१) में कहा है कि पृथ्वी से जो निकले वही खाना चाहिये। इसका अर्थ है कि कृषि उत्पाद ही खाना चाहिये। जैन लोग इसका विशेष अर्थ करते हैं कि केवल सतह से ऊपर का अन्न खाना चाहिए, आलू आदि नीचे की जड़ नहीं। जड़ से पुनः उत्पत्ति होती है, अतः उत्पादन स्रोत नहीं बन्द करना है, या उसके साथ सूक्ष्म जीव रहते हैं जिनकी हिंसा नहीं करनी है। अपने लोभ के कारण बाइबिल, कुरान में इसी का विपरीत अर्थ किया जाता है कि पृथ्वी के ऊपर जो कुछ है वह खाया जा सकता है। मनुस्मृति में पूर्ण निषेध मना किया है, क्योंकि सभी मानते नहीं है। कुरान में पूर्ण निषेध के कारण सदा मांस मैथुन की योजना बनाते रहते हैं।
६. मेध यज्ञ-
(१) अश्वमेध- किसी जीव से अश्रु की तरह पिण्ड से तेज निकलता है, अतः उस तेज को अश्रु या परोक्ष में अश्व कहते हैं। जैसे पशु अश्व गाड़ी खींचता है, उसी प्रकार किसी भी कार्य के लिऊर्जा को अश्व कहते हैं। इंजन की शक्ति की माप भी अश्वशक्ति कहते हैं।
प्रजापतेरक्ष्यश्वयत्। तत्पराततत्ततोऽश्वः समभवद्, यदश्वयत् तत् अश्वस्य अश्वत्वम्। (शतपथ ब्राह्मण, १३/३/१/१)
वारुणो वा अश्वः। (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/१८) सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९) अश्वो मनुष्यान् (अवहत्)- (शतपथ ब्राह्मण, १०/६/४/१)
प्राचीन साहित्य में कई रथों में हजारों अश्व लगाने का वर्णन है, जो भौतिक रूप में किसी गाड़ी में लगाना असम्भव है। ऋक् (८/४६/२९) में ६०,००० अश्वों के रथ का वर्णन है। महाभारत, वन पर्व (४२/२-७) में इन्द्र के रथ में १०,००० अश्व का उल्लेख है। महाभारत, आदि पर्व (२२४/१०-१५) के अनुसार अर्जुन के दिव्य रथ में दिव्य गान्धर्व अश्व थे जिनसे तेज प्रकाश निकलता था। महाभारत, द्रोण पर्व (१७५/१३) के अनुसार घटोत्कच के रथ में सैकड़ों घोड़े थे तथा वह आकाश में चल सकता था।
आकाश में ऊर्जा का स्रोत सूर्य ही अश्व है। सूर्य का स्रोत वरुण (आकाशगंगा का विरल अप्) भी अश्व कहा है।
पृथ्वी पर वायु अश्व है जो मेघ को चलाता है, तूफान लाता है या समुद्र की पाल-नौका को चलने की शक्ति देता है। पूर्व एशिया के जापान-कोरिया को भद्राश्व कहते थे (भारत से ९० अंश पूर्व), क्योंकि वहां समुद्री वायु की गति कम होती है (आधुनिक भूगोल में-horse latitude)
किसी देश में परिवहन और सञ्चार अश्व है। राजा का कर्तव्य है इनकी बाधा दूर करना, जिसे अश्वमेध कहते हैं। नाटकीय रूप से घोड़ा पूरे देश में घूमता रहता है, जिसके पीछे राजा सेना ले कर चलते हैं। बिना खाये पिये घोड़ा नहीं घूम सकता है, न उसको पता है कि अगले देश में जाने का मार्ग क्या है। उसके पीछे राजा भी सेना ले कर नहीं चल सकता, लाखों की सेना एक साथ नहीं चल सकती है। उनको रोकने के लिए अन्य देश का राजा चेक गेट पर नहीं बैठा रहेगा।
मनुष्य शरीर में नाड़ी तथा नस में प्राण का सञ्चार अश्व है। इसको पुनः सशक्त करना अश्वमेध है जिसे वाजीकरण (वाजि = अश्व) या काया-कल्प भी कहते हैं। दशरथ की पुत्र प्राप्ति यज्ञ को भी रामायण में अश्व (हय) मेध कहा है। दशरथ और उनकी रानियों की पुत्र जन्म देने की आयु बीत चुकी थी। पुत्र जन्म के लिए उनमें प्राण का सञ्चार आवश्यक था। यहां घोड़ा छोड़ने का अर्थ है प्राण प्रवाह मुक्त करना।
वीर्यं वा अश्वः (शतपथ ब्राह्मण २/१/४/२३)
प्राणापानौ वा एतौ देवानाम्। यदर्काश्वमेधौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/९/२१/३)
सुतार्थी वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् (रामायण, बालकाण्ड, ८/२)
तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम (बालकाण्ड, ८/८)
(२) नरमेध-ब्रह्म पुराण, गौतमी माहात्म्य, अध्याय ३४ में सूर्य वंश के राजा हरिश्चन्द्र (प्रायः ७,३०० ईपू) की कथा है जिनको वरुण ने ऐसे पुत्र होने का वरदान दिया था जिसके कर्म और गुणों की ख्याति तीनों लोकों में फैलेगी। जैसे ही उनके पुत्र रोहित का जन्म हुआ, वरुण ने उसकी बलि की मांग की। हरिश्चन्द्र उसे कई बार टालते गये-दांत नहीं निकला है, यज्ञोपवीत नहीं हुआ या शिक्षा नहीं हुई, आदि। वरुण ने क्रुद्ध हो कर उनको जलोदर होने का शाप दिया। तब रोहित भाग गया और एक व्यक्ति शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लाया। किन्तु वरुण उनकी पूजा से प्रसन्न हो गये और कहा कि बलि की आवश्यकता नहीं है।
यही कथा भागवत पुराण (९/७), ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय ३१, ऋक् सूक्त (१/२४) में है जिसमें शुनःशेप के मन्त्र हैं।
इसका एक अर्थ है कि मिथ्या आचरण से अप्वा (जलोदर-Ascites) होता है (अथर्व, ३/२/५, ऋक्, १०/१०३/१२)। इसकी ओषधि रोहित (Tecomella undulata) नाम की वनस्पति है (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, १३/४५-८४)। किन्तु मुख्य अर्थ है कि यदि रोहित को मार कर बलि दी जाती, तो वरुण के वरदान का कोई अर्थ नहीं था कि पुत्र तीनों लोकों में विख्यात होगा। यहां बलि का अर्थ है अपनी पूरी शक्ति शिक्षा तथा देश की उन्नति में लगा देना।
इसी प्रकार अब्राहम की कथा बाइबिल और कुरान में है। अब्राहम ईराक के उर नगर में रहते थे। उनको भी गुणी पुत्र होने का वरदान मिला था। पर जन्म होते ही पुत्र इस्माइल की बलि मांगने लगे। मार कर बलि देने पर वह गुणी कैसे होता? अपने या पुत्र के बदले मुस्लिम लोग भेड़ (अरब में) या बकरे की बलि देते हैं। शुनःशेप सूक्त (ऋक्, १/२४) में भी कहा है कि राजा वरुण ने उरु नगर बनाया था। ईराक में इसके अवशेष प्रायः ८,००० वर्ष पुराने अनुमानित हैं।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)।
अतः नरमेध का अर्थ है किसी उद्देश्य या देश के लिए जीवन लगाना। हत्या से कोई लाभ नहीं होना है। इसके लिए माता-पिता भी सन्तान को शान्त कर कर्मठ होने का आशीर्वाद देते हैं, जिसे शमिता कहते हैं।
दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ... अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। अध्रिगुश्चापापश्च उभौ शमितारौ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)
(३) गोमेध-एक अर्थ में सभी यज्ञ गो हैं। इसके मेध का अर्थ है, इसके उत्पाद का उपभोग। शतोदना गौ के मेध का आध्यात्मिक अर्थ है हृदय से निकली १०० नाड़ियों का मार्ग छोड़ कर १०१वी नाड़ी से जा कर मोक्ष प्राप्त करना।
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति, विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥ (कठोपनिषद्, २/३/१६)
हिरण्यं ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥ (अथर्व, १०/९/७)
आधिभौतिक रूप में गोमेध का अर्थ है गो रूपी पृथ्वी (स्थल, जल, वायु और जीव मण्डल इसके ४ स्तन हैं) या उसके अंश अप्ने देश का पालन करना।
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)
(४) सर्वमेध यज्ञ-सभी यज्ञों में समन्वय का भाव सर्वहुत या गीता का ब्रह्म यज्ञ है। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। अतः यज्ञ स्थान, हवि, हवन, उत्पाद, कर्ता आदि सभी कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म का ही ब्रह्म में हवन हो रहा है। कर्ता, कर्म आदि सभी एक हैं, अतः इसे सुकृत कहा है। बाइबिल में इसका अनुवाद है कि हर सृष्टि के बाद भगवान् ने कहा कि बहुत अच्छा बना ह। उनको किसी से अपने काम का प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं थी।
असत् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सत् अजायत। तदा आत्मानं स्वयं अकुरुत। तस्मात् तत् सुकृतं उच्यत, इति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१)
तत् सर्वेषु भूतेषु आत्मानं हुत्वा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यम् पर्यैत्, तथैव एतद् यजमानः सर्वमेधे सर्वान् मेधान् हुत्वा सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यं पर्येति (शतपथ ब्राह्मण, १३/७/१/१)
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना गीता 4/24

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...