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अजय कर्मयोगी

आज हम बात करेगे एक ऐसे शख़्स की जो पैदा तो चन्द्रशेखर तिवारी हुआ था लेकिन शहीद हुआ चंद्रशेखर आजाद बनकर. खुद को आजाद घोषित कर दिया था और कभी अंग्रेजो के हाथो ना मरने की कसम खाई थी. Let’s begin…

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे |
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:
चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1||
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः |
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||2||
न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ
मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः |
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||3||
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः |
अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||4||
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म |
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||5||
अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||
[मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]
[न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]
[न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]
[न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]
[न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…]
[मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…।
ॐ नम: शिवाय
हर हर महादेव
पृथ्वी पर
#शिव के प्रतिनिधि हैं..!!
पेड़-पौधे
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वनस्पति उपासना यानि पेड़-पौधों की पूजा हमारे संस्कृति का मुख्य अंग
है... यह पद्घति अकारण नहीं शुरू हुई है...पेड़ों से हमें आक्सीजन, भोजन और
जल तीनों मिलता है और इन्हीं से हमारा जीवन चलता है...।
ऐतरेय और
कौषितकि ब्राह्मïण ग्रंथ में "प्राणौ वै वनस्पति:"। (ऐतरेय 2.4, कौषितकि
12.7) कहा गया है... जहां वनस्पतियों से हमारे जीवन को संचालित करने वाले
तत्व मिलते हैं, वहीं वनस्पतियां ऐसे तत्वों को भी समाप्त करती हैं, जो
हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं..... इसीलिये वनस्पतियों को पृथ्वी पर
शिव की प्रतिनिधि माना जाता हैं, जोकि कार्बन डाइ आक्साइड का हलाहल पीकर
हमें जीवन अमृत आक्सीजन देती हैं...।
शुक्लयजुर्वेद का एक उदाहरण है- "नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्य:।
क्षेत्राणां पतये नम:।
वनानां पतये नम:।
वृक्षाणां पतये नम:।
ओषधीनां पतये नम:।
कक्षाणां पतये नम:"। (यजुर्वेद 16.17.18)।
इसमें शिव को वृक्ष, वन, ओषधियों इत्यादि का स्वामी का कहा गया है....
देवताओं को उनके गुणानुरूप जीवों और पदार्थों का स्वामी नियुक्त किया गया
है... यदि शिव वनस्पतियों के स्वामी कहे गये हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि
वनस्पतियों का गुण भी शिव जैसा होना चाहिये... शिव का शिवत्व बहुत व्यापक
है....शिव का मलतब होता है सुंदर और वनस्पतियां भी पृथ्वी का श्रृंगार करती
हैं... सुंदरता बढ़ाती हैं.. इस तरह से वनस्पतियों का व्यवहार उनको शिव का
प्रतिनिधि साबित कर देता है.. वहीं दूसरी ओर शिव विश्वपूज्य व सर्वपूज्य
इसलिये हुये क्योंकि उन्होने #विष पीकर संसार की रक्षा की और अमृत अन्य के लिये छोड़ दिया... विष पीकर अमृत छोड़ देना भी शिवत्व है... हमारे #पर्यावरण
में वनस्पतियों की भूमिका शिव सरीखी है....। वनस्पतियां भी कार्बन डाइ
आक्साइड जैसे विष को ग्रहण कर हमारे लिये आक्सीजन जैसी अमृत छोड़ देती
हैं... यह बताने की आवश्कता नहीं है कि आक्सीजन के बिना जीवन की परिकल्पना
नहीं की जा सकती.. एक बात और समझने की है, ओषधियां भी पेड़-पौधों से ही
मिलती हैं.. ओषधियों के बारे में हमारे ग्रंथों में कहा गया है कि इनका
जन्म देव के रौद्र रूप से हुआ है, इसलिये ओषधियां दोषों और विकारों को
समाप्त करने में सक्षम है.. यह भी शिव का ही गुण हैं... सरल सी बात है कि
वही शिव का जो स्वभाव है, वनस्पतियां का भाव है... ऐसे विचार कीजिये कि
हमारे आस पास कितने ही शिव हैं...।
वेदों में पर्वत, जल, वायु,
वर्षा और अग्नि को पर्यावरण का शोधक कहा है और इन सभी पर्यावरण शोधकों का
मूल तो वनस्पतियां ही हैं.... वनस्पतियों के कम होने से सबसे पहला प्रभाव
आक्सीजन के स्तर पर पड़ता है...।
वेदों में दो प्रकार के वायु की चर्चा
है प्राणवायु और अपान वायु...। प्राणवायु से जीवन का संचार होता है और
अपानवायु से सारीरिक दोषों का निवारण होता है....। उदाहरण देखें-
"आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद् रप:।
त्वं हि विश्व भेषज देवानां दूत ईयसे।।"
(अथर्ववेद 4.13.3)
वायु को विश्वभेषज कहा गया है... यानि की वल्र्ड डाक्टर...अथर्ववेद में
वायु और सूर्य को रक्षक के रूप में वंदना की गई है.. उदाहरण देखें-"युवं
वायो सविता च भुवनानि रक्षय:।"
(अथर्ववेद 4,24,3)।
अथर्ववेद
शुद्घ वायु को औषधि मानता है... ताजी हवा शरीर में प्रवेश करते ही हम
तरोताजा हो जाते हैं... बहुत से रोग बहुत से कष्ट ऐसे ही कट जाते
हैं..लेकिन जब हमने पेड़-पौधों के महत्व को नकार दिया और हमें संकट से
बचाने वाली वनस्पतियों के लिये हम संकट बने तो पर्यावरण का तंत्र खराब हो
गया... हम आज जहर पीने को मजबूर हैं... वेदों में प्रदूषण के कारकों को
क्रव्याद यानि जीव को सुखाकर निर्जीव करने वाला कहा गया है.. उदाहरण देखें-
"ये पर्वता: सोमपृष्ठा: आप:।
वात: पर्जन्य आदग्निनस्ते क्रव्यादमशीशमन।"
(अथर्ववेद 3.21.10)
तो वहीं यह भी कहा गया है कि यह वनस्पतियों के अभाव में पनपते हैं... जहां
आज हम उत्सर्जन कम करने पर जोर दे रहे हैं तो वहीं वेदों ने शोधन बढ़ाने
पर जोर दिया है... अथर्ववेद में तमाम ऐसे वनस्पतियों की सूची मिलती है जोकि
पर्यावरण के शोध के रूप में काम करते हैं... इसमें #अश्वत्थ (पीपल),कुष्ठ (कठ), भद्र और चीपुत्र (#देवदार और चीड़), #प्लक्ष (#पिलखन और #पाकड़), न्यग्रौध (बड़), खदिर (खैर), #उदुम्बर (गूलर), अपामार्ग (चिरचिरा), और #गुग्गुल (गूगल) हैं...।
अथर्ववेद में कहा गया है कि इन वृक्षों से वायु शुद्घ होती है और पर्यावरण
का संतुलन सही बना रहता है... हमारे प्राचीन साहित्य में वृक्षारोपण को बल
दिया गया है.. अब तक हमने कई प्रथायें सुनी हैं कि पुत्र होने पर वहां एक
वृक्ष रोपा जाता है... जबकि हम नहीं जानते कि मस्त्य पुराण में #दशपुत्रसमोद्रुम:'
कहकर वृक्षों का महत्व बताया गया है...। दशपुत्रसमोद्रुम: का मतलब है, एक
वृक्ष दश पुत्रों के समान है... ऐसा उदाहरण विश्व के अन्य साहित्यकोश से या
संस्कृति से नहीं मिल सकता...।
शिव सदा कल्याण करें..।।
साभार- डॉ.अरुण के.पांडे
सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...