रविवार, 6 जनवरी 2019


●◆■★जीरा के फायदे और नुकसान |●◆■★

*january 3, 2019 by सिर्फ आपका अतीत 9024557118*

*स्वस्थ भारत की ओर छोटा सा कदम....* के माध्य्म से आपके पास हम आयुर्वेद के खजाने से हम हर दिन ऐसी जानकारी देने की कोशिश करते है जिससे आप निरोगी ओर स्वस्थ जीवन का परम आनंद ले सके और साथ ही हमारा उद्देश्य *स्वस्थ भारत /विश्व का निर्माण* ओर अब आप इस जानकारी को ध्यान से पढ़े और लोगो तक भेजो

दोस्तों दुनिया भर में भारत की जो मशहूर चीज है वह है यहां के मसाले, हिंदुस्तान के मसाले और इनकी खुशबू का कोई जवाब नहीं | भारत के मसालों का स्वाद यदि कोई एक बार चख लेता है तो फिर उसे भुला पाना आसान नहीं होता है | मसाले खाने में स्वाद व खुशबू तो बढ़ाते ही हैं साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते हैं | उन्हीं मसालों में से सबसे ज्यादा प्रयोग जीरा (Jeera) होता है | बिना जीरे के भारतीय रसोई की कल्पना भी नहीं की जा सकती | जीरा ज़्यादातर दाल में तड़का लगाने के लिए प्रयोग होता है, हम सभी को यही पता होता है कि इसकी खुशबू काफी अच्छी होती है और इससे खाने का स्वाद दुगना हो जाता है _●●पर क्या आप को यह पता है कि हमारी सेहत को सुधारने में भी जीरे का बहुत बड़ा हाथ होता है |●●_
*जीरे के फायदे*
👉🏽कोलेस्ट्रॉल कम करने में लाभकारी – आज कल कोलेस्ट्रॉल की समस्या काफी आम हो गई है | हर कोई इस बीमारी से पीड़ित है ऐसे में जीरा आपके कोलेस्ट्रॉल लेवल को संतुलित रखता है |
👉🏽पेट दर्द में तुरंत राहत
 यदि किसी को पेट दर्द की समस्या है तो जीरा और चीनी को समान मात्रा में मिलाकर उसे दें | इसे खूब चबा चबा कर खाना होता है, जीरे से निकला रस पेट दर्द में तुरंत राहत देता है |
👉🏽जी मिचलाने पर तुरंत जीरा दें – यदि किसी का जी मिचला रहा हो तो जीरे को चबा चबा कर उसका रस चूसने से तुरंत आराम मिलता है | पानी में इलाइची को उबालकर पीने से भी जी मचलाना बंद हो जाता है |
👉🏽बुखार में सहायक
 जीरे के साथ गुड को मिलाकर इसकी गोलियाँ बना कर दिन में दो तीन बार खाने से शरीर का तापमान संतुलन में आ जाता है |
👉🏽पाचन क्रिया सुधारने में सहायक – जीरे में मौजूद पोषक तत्व और एंटी-ओक्सीडेंट पाचन तंत्र को मजबूत करता है | यह इम्यूनिसिस्टम को बढ़ाता है साथ ही पेट से सम्बन्धित रोग भी दूर करता है | इससे खाना अच्छे से पच जाता है | पेट में एंठन नहीं बनती गैस की समस्या नहीं होती | पाचन क्रिया को ठीक रखने के लिए लौंग के भी काफी नुस्खे हैं |
👉🏽शरीर को ठंडक देता है – जीरा तासीर में ठंडा होता है इसके सेवन से शरीर को ठंडक मिलती है | साथ ही यह शरीर से विषाक्त तत्वों को निकाल देता है | गर्मी में ठंडे पानी में नमक,चीनी,नींबू के साथ जीरा पाउडर मिलाकर पीने से शरीर की गर्मी कम हो जाती है | यह डिहाइड्रेशन से भी बचाता है |
👉🏽आयरन का स्त्रोत – जिन लोगों को खून की कमी रहती है उनके लिए जीरा काफी लाभकारी है | यह आयरन का अच्छा स्त्रोत है | गर्भवती महिलाओं के लिए यह अमृत के समान होता है |
👉🏽भूख को बढ़ाता है – जिन लोगों को भूख कम लगती है उनके लिए जीरा बहुत लाभदायक है | खाने से पहले जीरा चबा – चबा कर खाने से भूख ज्यादा लगती है |
👉🏽डिलिवरी के बाद माँ को दूध कम आता हो – प्रसव के बाद अक्सर यह समस्या महिलाओं मे पायी जाती है कि उन्हे दूध कम उतरता है तो उस समय माँ को शाही जीरे का प्रयोग करना चाहिए इससे भरपूर दूध उतरेगा |
*वजन कम करने में सहायक*
दोस्तों आज की सबसे बड़ी और सबसे आम समस्या है – तेजी से वजन बढ़ना | यह हर तीसरे व्यक्ति की समस्या बनी हुई है | आज कल का खान-पान ऐसा हो गया है जिससे खाने पर कंट्रोल नहीं रहता और लोग मोटापे का शिकार हो जाते हैं | बढ़ता वजन ना केवल शरीर पर बल्कि कहीं ना कहीं दिमाग पर भी असर डाल रहा है | ऐसे में लोग तरह तरह की एक्सरसाइज़ करते हैं | कई लोग तो इसके लिए दवाइयाँ भी खाते हैं | पर कोई खास असर उन्हें दिखाई नहीं देता | ऐसे में यदि आप ये सब करके थक गए हैं तो जरा इस नुस्खे को भी अपना कर जरूर देखिये आपको बेहतर परिणाम मिलेंगे |
👉🏽जीरा पाउडर को पानी में मिलाकर उसमें दो चार बूंदें शहद की डालकर रोज़ सुबह खाली पेट पीएं |
👉🏽रोज एक चम्मच जीरा पाउडर दही में मिलाकर खाएं |
👉🏽रोजाना एक या दो चम्मच जीरा रात को पानी में भिगोकर रखें | सुबह उस पानी को जीरे समेत उबाल लें | अब उसे ठंडा करके सिप सिप करके पिये |
👉🏽जीरे को यदि अदरक और नींबू के साथ मिलाकर इसका सेवन किया जाये तो यह वजन को जल्दी कम करने में काफी मदद करता है |
*🤦🏻‍♀त्वचा सम्बन्धी रोगों को दूर करता है🤦🏻‍♀*
👉🏽विटामिन सी का स्त्रोत – जीरा ना सिर्फ हमारे रोगों को दूर भगाता है बल्कि यह हमारी त्वचा के लिए भी काफी फायदेमंद साबित हुआ है | जीरा पाउडर में विटामिन सी पाया जाता है जो त्वचा के लिए काफी अच्छा होता है |
👉🏽त्वचा की कसावट के लिए – आप जब भी फेसपैक लगाएँ तो उसमें थोड़ा सा जीरा पाउडर जरूर मिला लें | यह ना केवल आपकी त्वचा में कसाव लाता है बल्कि आपकी रंगत भी निखारता है |
👉🏽त्वचा सम्बन्धी रोग – यदि आप पिम्पल्स से परेशान हैं या चेहरे के दाग धब्बों से परेशान हैं तो जीरा पाउडर का पेस्ट बना कर उस जगह पर लगाएँ इससे आपको काफी अच्छे परिणाम नजर आएंगे |
👉🏽चेहरे की चमक – पानी में जीरा उबाल लें और इस पानी को ठंडा करके इससे मुँह धो लें | इससे चेहरे पे चमक आ जाती है |
*👩🏻बालों की समस्या को करता है दूर👩🏻*
जीरा ना केवल हमारी त्वचा के लिए फायदा करता है बल्कि हमारे बालों के लिए भी काफी लाभकारी है | बस फर्क सिर्फ इतना है की यहां ★जीरा काला★ इस्तेमाल होता है मतलब रसोई घर में जो जीरा यूज होता है वह नहीं बल्कि इसके लिए अलग से काला जीरा आता है |
■बालों के झड़ने की समस्या – यदि बालों के झड़ने की समस्या से परेशान हैं तो काले जीरे का तेल सिर में लगाएँ इसके परिणाम काफी कारागार हुए हैं |
■लंबे मजबूत घने बालों के लिए – रोजाना काले जीरे का सेवन दवाई की तरह करें | इससे बालों का विकास होगा, बाल काले और मजबूत हो जाएँगे |
■रूसी से निजात – जिन लोगों को रूसी की समस्या है वह तेल को गर्म करके जीरा भी गर्म कर लें | अब गुनगुने तेल से सिर की मसाज करें | 2 से 3 बार ऐसा करने से सिर की रूसी खत्म हो जाती है |
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*जीरे के अत्यधिक प्रयोग के साइडिफ़ेक्ट*
👉🏽जीरे के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए किसी भी चीज को यदि एक संतुलित तरीके से लिया जाये तो यह फायदा करती है और यदि अधिकता की जाये तो नुकसान करती है ऐसा ही जीरे के साथ भी है |
👉🏽गर्भवती स्त्रियों को जीरे के ज्यादा सेवन से बचना चाहिए | जीरे का ज्यादा सेवन समय से पहले डिलिवरी या गर्भपात का कारण भी हो  सकता है |
👉🏽जीरे के ज्यादा प्रयोग से एलर्जी या चेहरे पर चकते भी हो सकते हैं |
👉🏽पीरियड के समय जीरे का ज्यादा प्रयोग ज्यादा ब्लीडिंग का कारण बन सकता है |
👉🏽जीरे को अत्यधिक लंबे समय तक व ज्यादा सेवन से लीवर व किडनी को भी नुकसान हो सकता है |




सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके पास थी ही नही। हमारी महत्ताको मिटानेका भरपूर प्रयासों हुए पश्चिमीकूटनीतिक विज्ञान द्वारा। फ़िर भी आज हमारे अन्वेषणके आगे पश्चिमीविश्व एक असमंजस मनोदशामें है की ये तो हमसे भी कहीं कालसे परे है ।

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (भारतीय काल गणना )

1. क्रति = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग
2. 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
3. 2 त्रुति = 1 लव ,
4. 1 लव = 1 क्षण
5. 30 क्षण = 1 विपल ,
6. 60 विपल = 1 पल
7. 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
8. 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
9. 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
10. 7 दिवस = 1 सप्ताह
11. 4 सप्ताह = 1 माह ,
12. 2 माह = 1 ऋतु
13. 6 ऋतु = 1 वर्ष ,
14. 100 वर्ष = 1 शताब्दी
15. 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
16. 432 सहस्राब्दी = 1 युग
17. 2 युग = 1 द्वापर युग ,
18. 3 युग = 1 त्रेता युग ,
19. 4 युग = सतयुग
20. सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
21. 71 महायुग = 1 मनवन्तर ,
22. 1000 महायुग = 1 कल्प
23. 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
24. 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
25. महाकाल = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )
सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में
बना जिस पर हमको गर्व है ।

#वन्दे_मातरम् !!
जय #आर्यवर्त

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018




*कुम्भ पर्व-स्थलों का
सांस्कृतिक व भौगोलिक रहस्य*x

ज्योतिष विद्या के स्रोत के विषय में दो मत हैं –
१. ज्योतिष विद्या अनेक देशों में स्वतन्त्रतया जन्मी।
२. ज्योतिष विद्या मूलत: भारतीय है।

हमारा मत इन दोनों से अन्य और तीसरा मत भी है
जो उपर्युक्त दोनों मतों से प्राचीन है, किन्तु मानवता द्वारा उसे विस्मृत कर दिया गया है। वह मत है –

३. *तीसरा मत : -* मानवता के आरम्भिक काल में जब संस्कृतियाँ व राष्ट्र पृथक् नहीं हुए थे तभी ज्योतिष का जन्म हो चुका था और उनके पृथक् होने के उपरान्त श्रेष्ठ संस्कृतियों व राष्ट्रों ने स्वतन्त्रतया इसका पृथक्-पृथक् विकास किया जिसका समय-समय पर न केवल विनिमय हुआ अपितु संयुक्त परियोजनाएँ भी चलाईं गईं।

ऐसी ही एक संयुक्त परियोजना थी –
रेखांशों का निर्धारण!

अक्षांशों (Latitudes) व रेखांशों (Longitudes) का ज्ञान अति महत्त्वपूर्ण है। इनके बिना समुद्र यात्रा, मानचित्र-निर्माण आदि अनेक बातें अशक्य ही हैं। अक्षांशों का ज्ञान अपेक्षाकृत सरल है। सूर्य की सहायता से इनका अनुमान हो सकता है। उत्तरी गोलार्ध में ध्रुवतारे (Polaris) की सहायता से अक्षांश जानने की परम्परा अति प्राचीन है किन्तु रेखांश जानना अत्यन्त कठिन बात रही है। इसके दो पक्ष हैं –

१. किन्हीं दो स्थलों में से कौनसा पूर्व में है और कौनसा पश्चिम में?
अथवा अमुक स्थल के रेखांश पर पड़ने वाले अन्य स्थल क्या-क्या हैं ?
२. किस स्थल के रेखांश को ०° रेखांश माना जाए?

द्वितीय प्रश्न अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी से पूरी पृथ्वी के समय का निर्धारण हो सकता था।

टॉलमी (90 AD - 168 AD) ने इनके निर्धारण हेतु विभिन्न स्थलों पर हुए चन्द्र-ग्रहण के समय का उपयोग किया और ग्रीक पुराणों में वर्णित “फॉर्चुनेट द्वीपसमूह”   (Fortunate isles) के किसी रेखांश को ०° रेखांश मानने का प्रस्ताव किया। ऐसी मान्यता है कि उक्त द्वीपसमूह आधुनिक “केनैरी द्वीपसमूह” (Canary islands) और “केप वर्ड द्वीपसमूह” (Cape Verde islands) में से कोई एक था। उनके पश्चात् भी अन्य विद्वानों द्वारा यह कार्य किया जाता रहा। आधुनिक काल में फ्रांस, इंग्लैण्ड व अमेरिका ने इस पर सर्वाधिक कार्य किया किन्तु यही कार्य अति प्राचीन काल में अधिक न्यायोचितरूपेण हो चुका था किन्तु विस्मृत कर दिया गया! तब पृथ्वी को रेखांशों के समानान्तर पूर्वी व पश्चिमी २ गोलार्धों में विभक्त न कर ४ गोलपादों में विभक्त किया गया था जिनका आरम्भ क्रमश: ०°, ९०°, १८०° व २७०° रेखांशों पर होता था और विषुव दिवस में इन रेखांशों पर एक ही समय में क्रमश: मध्यरात्र, सूर्योदय, मध्याह्न व सूर्यास्त हो रहा होता था।

अति प्राचीन काल में ही यह ज्ञात हो चुका था कि एशिआ, योरोप व ऍफ्रीका जुड़े हुए हैं और इन तीनों में ऍफ्रीका ही सर्वाधिक पश्चिम में है। अत: ऍफ्रीका की मुख्यभूमि के सर्वाधिक पश्चिमी बिन्दु (westernmost point of African mainland) के रेखांश को ही ०° रेखांश मानने का निश्चय किया गया और “उस स्थल की पहचान कर ली गई थी।”

आधुनिक भूगोलवेत्ताओं के अनुसार ऍफ्रीका के सेनेगल (Senegal) देश का कैप-वर्ट (Cap-Vert) ही ऍफ्रीका का सर्वाधिक पश्चिमी बिन्दु है और यह टॉलमी द्वारा प्रस्तावित केनैरी द्वीपसमूह अथवा केप वर्ड द्वीपसमूह से अधिक उपयुक्त है। इसके अक्षांश व रेखांश क्रमश: हैं –
१४°·७४०२ उत्तर व १७°·५१८८ पश्चिम।

कैप-वर्ट (Cap-Vert) से ९०° पूर्व का रेखांश भारतवर्ष से गुजरता है। अत: उसी रेखांश को भारतवर्ष का मानक रेखांश (Standard longitude) माना गया।

भारतवर्ष में स्वतन्त्रतया रेखांशों पर कार्य हो रहा था और इस कार्य के केन्द्र ज्योतिर्लिंगों के रूप में विख्यात थे। इनमें से उज्जयिनी का ज्योतिर्लिंग मुख्यतम था क्योंकि यहीं से तत्कालीन ९०° रेखांश गुजरता था। ९०° रेखांश पर स्थित होने के कारण यह कुम्भ पर्व-स्थल भी था क्योंकि इस रेखांश के पूर्व का भारतीय भूभाग द्वितीय गोलपाद में था तथा पश्चिम का प्रथम गोलपाद में। कालनिर्णायक रेखांश का स्थल होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम “महाकाल” था। किन्तु कैप-वर्ट व उज्जयिनी (२३°·१७९३ उत्तर व ७५°·७८४९ पूर्व) के रेखांशों में ९०° से अधिक (९३°·३०३७) का अन्तर है और इसी में कुम्भ पर्व-स्थलों की अनेकता का रहस्य अन्तर्निहित है!

वस्तुत: भारतवर्ष एक स्वतन्त्र भूप्लेट (tectonic plate) पर स्थित है जो पहले भारतीय महासागर (Indian ocean) के पश्चिम-दक्षिणी भाग में थी और पूर्वोत्तर दिशा में गति करती हुई तिब्बत से आ टकराई। इसी सचल प्लेट के कारण भारतवर्ष को “भरतखण्ड” (Indian plate) भी कहा गया है। उक्त टक्कर के फलस्वरूप भारत व तिब्बत के मध्य का भूभाग ऊपर उठा जिससे हिमालय का उद्भव हुआ। अब भी हिमालय उठ रहा है अर्थात् अब भी भरतखण्ड पूर्वोत्तर दिशा में गति कर रहा है यद्यपि टक्कर के उपरान्त यह गति मन्द अवश्य होती गई। भरतखण्ड की गति की उक्त दिशा के कारण ही हिमालय का पूर्वी भाग पश्चिमी भाग की अपेक्षा ऊँचा व सँकरा है जिससे पता लगता है कि पूर्वी भाग पर पश्चिमी भाग की अपेक्षा अधिक धक्का पड़ रहा है।

भरतखण्ड की पूर्वोत्तर दिशा में गति होने के कारण भारतीय स्थलों के रेखांशीय मान (longitudinal value) में वृद्धि हुई। टक्कर के उपरान्त उत्तर के स्थलों के रेखांशीय मान में दक्षिण के स्थलों की अपेक्षा न्यून वृद्धि हुई क्योंकि पूर्व समुद्र (बंगाल की खाड़ी) भरतखण्ड के दक्षिणी भाग को गति करने हेतु अवकाश प्रदान करता है जबकि उत्तरी भाग तिब्बत में अटका हुआ है।

अस्तु पहले उज्जयिनी कैप-वर्ट से ९०° पूर्व के रेखांश पर ही थी किन्तु भरतखण्ड की गति के कारण वह इस रेखांश से पूर्व की ओर हट गई और नासिक इस रेखांश पर आ गया‌, अत: नासिक कुम्भ पर्व-स्थल बन गया। अब प्राचीन से नवीन के क्रम में कुम्भ पर्व-स्थलों, उनके अक्षांशों, रेखांशों व कैप-वर्ट से उनकी रेखांशीय दूरियों को देखें –

प्रयाग          २५°·४३५८ उत्तर
८१°·८४६३ पूर्व    ९९°·३६५१
हरद्वार         २९°·९४५७ उत्तर
७८°·१६४२ पूर्व    ९५°·६८३
उज्जयिनी    २३°·१७९३ उत्तर
७५°·७८४९ पूर्व    ९३°·३०३७
नासिक        १९°·९९७५ उत्तर
७३°·७८९८ पूर्व    ९१°·३०८६

अर्थात् कैप-वर्ट से ९०° पूर्व के रेखांश पर उज्जयिनी के पहले हरद्वार था और उसके भी पहले प्रयाग था।

अर्थात् कुम्भ पर्व की परम्परा न्यूनतम तब से है जब प्रयाग उक्त रेखांश पर था।

प्रयाग, हरद्वार, उज्जयिनी व नासिक उक्त रेखांश से पूर्व दिशा की ओर क्रमश: ९, ५, ३ व १ अंश (पूर्णांक में) हट चुके हैं। स्पष्ट है कि नासिक भी उक्त रेखांश से हट चुका है और भविष्य में सोमनाथ उक्त रेखांश पर आ सकता है। अब भरतखण्ड की गति मन्द हो गई है, अत: ऐसा होने में पहले की तुलना में अधिक समय लगेगा। सोमनाथ के अक्षांश, रेखांश व कैप-वर्ट से उसकी रेखांशीय दूरी को देखें –

सोमनाथ      २०°·९०६० उत्तर
७०°·३८४३ पूर्व    ८७°·९०३१

सम्प्रति सोमनाथ उक्त रेखांश से २° (पूर्णांक में) दूर है!

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि
कुम्भ पर्व भरतखण्ड की उक्त अविराम यात्रा में हुए पूर्वी विस्थापन के सद्योगत ९° का रिकॉर्ड है!

और यह वैश्विक ज्योतिष की प्राचीनता का रिकॉर्ड भी है!

*धर्मस्य मूलम् ज्ञानम्*
वंदे मातरम जय गौ माता
अजय कर्मयोगी

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

व्यक्ति निर्माण क्या होता है भाई? ये भी एक अज्ञानता है


व्यक्ति निर्माण क्या होता है भाई?
 समाज निर्माण, व्यक्ति निर्माण, राष्ट्र निर्माण, संस्कार निर्माण -- यह तब भारत की भाषा नहीं है।ये सब अंग्रेजी के शब्दों की नकल है जो सर्वथा त्याज्यहै।
 व्यक्ति का निर्माण परमेश्वर करता है और वह स्वयं उस जीवात्मा के पूर्व के कर्मों का फल होता है।  स्वयं को ईश्वर मानकर व्यक्ति निर्माण का दावा करना तो नास्तिकता है। यद्यपि भारत में भारतीय भाषाओं में यह शब्द अज्ञान के कारण प्रयोग में आता है ,किसी दंभ के कारण नहीं।
 संस्कार भी हर व्यक्ति के जन्म जन्मांतर के होते हैं ।
माता पिता और सामाजिक परिवेश तथा शिक्षा उनमें से श्रेष्ठ संस्कारों का पोषण करती है ,,उनको बल देती है ,आगे बढ़ने में सहयोग देती है।बस।
 संस्कारों का भी निर्माण नहीं होता। केवल श्रेष्ठ संस्कारों का पोषण और अनुचित संस्कारों पर अंकुश ।
इतना ही हो सकता है ।
संस्कारों का निर्माण मनुष्य के बस का नहीं।
 यह 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी के आरंभ में यांत्रिक भौतिकी के द्वारा विकसित शब्दों की समाज विज्ञान के क्षेत्र में की गई नकल है जो अब बासी हो चुकी है और  विज्ञान की नई खोज इन सब धारणाओं को निरस्त कर चुकी हैं।
भारत की हिंदू धर्म और सनातन धर्म की तो यह भाषा है ही नहीं।
 इसी प्रकार समाज का निर्माण अज्ञान से उपजा ईसाइयों का दम्भ है।
 प्रत्येक व्यक्ति और संगठन स्वयं समाज का अंग है ।
वह समाज का निर्माण  कैसे कर सकता है?
 राष्ट्र का निर्माण तो भयंकर दर्प है।इसी दर्प से राष्ट्रपिता जैसी गंदी धारणा निकली।
हम राष्ट्र समाज और व्यक्ति में धर्म चेतना का धर्म भावना का धर्म बोध का और धर्म संस्कारों का पोषण कर सकते हैं और यह काम विद्या तथा आचरण के द्वारा होता है।
 राष्ट्र निर्माण ,समाज निर्माण, व्यक्ति निर्माण ,संस्कार निर्माण आदि अनुचित दावे हैं और इनका भारत की चेतना से ,सनातन धर्म के ज्ञान से कोई संबंध नहीं है। 
 
     चाहे हम कांग्रेस और भाजपा या अन्य पार्टियों को धिक्कार कर कितना भी संतोषकर लो पर यह ज्वलंत सच्चाई है चाहे राजस्थान का जीरो पाने वाली लेक्चरर का मामला हो या चाहे BHU का एक मुस्लिम का इनका अपॉइंटमेंट कोई हवा में नहीं हुआ है यह सरकारी फॉर्मेलिटी और उसके मापदंड को पूर्ण करके ही इन्होंने यह पद हासिल किया है एक मुस्लिम, हिंदू धर्मशास्त्र का प्रोफ़ेसर बनकर आपको संध्या बंदन भी सिखाने का चमत्कार इस शिक्षा व्यवस्था से ही संभवहो रहा सब का केंद्र यह अंग्रेजी व्यवस्था ही है जिससे
 जो भारत ज्ञान में रत देश आज वही भारत दुनिया का लेबर सप्लायर है और भारत की सबसे बड़ी समस्या प्रतिभा पलायन है आज वह शिक्षा पेट पालने के साधन बन चुकी है
शिक्षा लेकर भिक्षा मांगे की भाव से आज भारत पूरी दुनिया का लेबर सप्लायर बन गया है अब इस व्यवस्था का अंतिम परिणाम भी दिखने लगा है उस देश का पतन निश्चित है जब प्रतिभाओं का हनन होता है और हंस पर कौवा राज करते हैं तो यह बर्बादी का अंतिम चरण होगा अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान
  अगर आपको पता चले कि जो टीचर आपके बच्चे को पढ़ा रहा है, खुद उसे, उसके अपने ही विषय़ में ज़ीरो नंबर मिला था तो आपको कैसा लगेगा? और अगर आपसे कोई ये कहे कि फिजिक्स जैसे जटिल विषय में भी कोई शून्य नंबर पाकर फिजिक्स का ही लेक्चरार बन सकता है तो आप शायद ही यकीन करें. जब हमने देखा कि तमाम लोग सोशल मीडिया पर ठीक ऐसा ही होने का दावा कर रहे हैं तो हमें भी यकीन नहीं हुआ.

सोशल मीडिया पर ये खबर खूब फैली हुई है कि राजस्थान में सविता मीणा नाम की एक लड़की फिजिक्स में तीन सौ में से 0.68 नंबर, यानि एक से भी कम नंबर लाकर लेक्चरार बन गयी है. यही नहीं, इन खबरों के मुताबिक, सविता सिर्फ फिजिक्स में ही शून्य नंबर नहीं लायी थी, बल्कि जनरल स्टडीज में भी उसे कुल सोलह नंबर आए थे. लोग न सिर्फ इस खबर को खूब शेयर कर रहे हैं, बल्कि इसपर चटखारे भी ले रहे हैं

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018


Explanation Based on
 *Einstein Pain Wave (EPW)*

मांसाहार पर वैज्ञानिकों का शोध

प्राकृतिक आपदाओं पर हुई नई खोजों के नतीजें मानें तो इन दिनों बढ़ती मांसाहार की प्रवृत्ति भूकंप और बाढ़ के लिए जिम्मेदार है। आइंस्टीन पेन वेव्ज के मुताबिक मनुष्य की स्वाद की चाहत- खासतौर पर मांसाहार की आदत के कारण प्रतिदिन मारे जाने वाले पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है।

सूजडल (रूस) में पिछले दिनों हुए भूस्खलन और प्राकृतिक आपदा पर हुए एक सम्मेलन में भारत से गए भौतिकी के तीन वैज्ञानिकों ने एक शोधपत्र पढ़ा। डा. मदन मोहन बजाज, डा. इब्राहीम और डा. विजयराजसिंह के अलावा दुनियाँ भर के 23 से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा  तैयार किए शोधपत्र के आधार पर कहा गया कि भारत जापान नेपाल अमेरिका जार्डन अफगानिस्तान अफ्रीका में पिछले दिनों आए तीस बड़े भूकंपों में आइंस्टीन पैन वेव्ज (इपीडबल्यू) या नोरीप्शन वेव्ज बड़ा कारण रही है।

इन तरंगों की व्याख्या यह की गई है कि कत्लखानों में जब पशु काटे जाते हैं तो उनकी अव्यक्त कराह, फरफराहट, तड़प वातावरण में तब तक रहती है जब तक उस जीव का  माँस, खून, चमड़ी पूरी तरह नष्ट नही होती. उस जीव की कराह खाने वालों से लेकर पूरे वातवरण मे भय रोग और क्रोध उत्पन्न करती है। यों कहें कि प्रकृति अपनी संतानों की पीड़ा से विचलित होती है। अध्ययन मे बताया गया है कि प्रकृति जब ज्यादा क्षुब्ध होती है तो मनुष्य आपस में भी लड़ने भिड़ने लगते हैं चिड्चिडे हो जाते हैं और विभिन्न देश प्रदेशों में दंगे होने लगते हैं।

सिर्फ स्वाद के लिए बेकसूर जीव जंतुओं की हत्या ही  इस तरह के दंगों का कारण बनती है और  कभी कभी आत्महत्या का भी ।

ज्यादातर मामलों में प्राकृतिक उत्पात जैसे अज्ञात बीमारियाँ, हार्टअटेक, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी के विस्फोट जैसे संकट आते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक एक कत्लखाने से जिसमें औसतन पचास जानवरों को मारा जाता है 1040 मेगावाट ऊर्जा फेंकने वाली इपीडब्लू पैदा होती है।

दुनिया के करीब 50 लाख छोटे बड़े कत्लखानों में प्रतिदिन 50 लाख करोड़ मेगावाट की मारक क्षमता वाली शोक तरंगे या इपीडव्लू पैदा होती है। विश्व के  700 से अधिक वैज्ञानिकों सहित अनेक डाक्टरों के  सम्मेलन में माना गया कि कुदरत कोई डंडा ले कर तो इन तंरगों के गुनाहगार लोगों को दंड देने नहीं निकलती। उसकी एक ठंडी सांस भी धरती पर रहने वालों को कंपकंपा देने के लिए काफी है।

कत्लखानों में जब जानवरों को कत्ल किया जाता है तो बहुत बेरहमी के साथ किया जाता है बहुत हिंसा होती है बहुत अत्याचार होता है। जानवरों का कतल होते समय उनकी जो चीत्कार निकलती है, उनके शरीर से जो स्ट्रेस हारमोन निकलते है और उनकी जो शोक वेभ निकलती है वो पूरी दुनिया को तरंगित कर देती है कम्पायमान कर देती है। परीक्षण के दौरान लैबरोट्री में भी जानवरों पर ऐसा हीं वीभत्स अत्याचार होता है।

जानवरों को जब कटा जाता है तोह बहुत दिनों तक उनको भूखा रखा जाता है और कमजोर किया जाता है फिर इनके ऊपर ७० डिग्री सेंट्रीगेड गर्म पानी की बौछार डाली जाती है उससे शरीर फूलना शुरु हो जाता है तब गाय भैंस बकरी तड़पना और चिल्लाने लगते हैं तब जीवित स्थिति में उनकी खाल को उतारा जाता है और खून को भी इकठ्ठा किया जाता है | फिर धीरे धीरे गर्दन काटी जाती है, एक एक अंग अलग से निकला जाता है।

आज का आधुनिक विज्ञानं ने ये सिद्ध किया है के मरते समय जानवर हो या इन्सान अगर उसको क्रूरता से या उम्र पूरी होने के पहले  मारा जाता है तो उसके शरीर से निकलने वाली जो चीख पुकार है उसकी बाइब्रेशन में जो नेगेटिव वेव्स निकलते हैं वो पूरे वातावरण को बुरी तरह से प्रभावित करता है और उससे सभी मनुष्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, खासतौर पर सबसे ज्यादा असर ऐसे जीव का उन मनुष्यों पर पड़ता है जो उसका माँस खाते है और ये दुष्प्रभाव एक बार खाने के बाद कम से कम 18 महीने तक रहता है बड़ी बात ये है कि  खाने वाले के परिजन और अधिक तनावग्रस्त, दुखी व  भयंकर  रोगॊ से पीडित होते जाते  है । इससे मनुष्य में जिद करने गाली देने, चोरी करने, दूसरो का धन हड़पने, के साथ अत्यंत क्रोध व  हिंसा करने की प्रवृत्ति बढ़ती है जो अत्याचार और पाप पूरी दुनिया में बढ़ा रही है |

अफ्रीका  के दो प्रोफेसर, दो जर्मनी, दो अमेरिका के,  एक भारतीय  मदनमोहन  और चार जर्मनी के वैज्ञानिकों ने अपने अपने हेड  मार्क फीस्ट्न, डेविड थामस, जुँनस अब्राहम व क्रिओइबोँद फिलिप् के साथ बीस साल इस विषय पर रिसर्च किया है और उनकी रिसर्च ये कहती है कि जानवरों का जितना ज्यादा कत्ल किया जायेगा जितना ज्यादा हिंसा से मारा जायेगा उतना ही अधिक दुनिया में भूकंप आएंगे, जलजले आएंगे, प्राकृतिक आपदा आयेगी उतना ही दुनिया में संतुलन बिगड़ेगा और लोग दुखी, तनाव्युक्त व हार्टअटेक से पीडित होंगे.

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018



बहुत ही खूबसूरत पोस्ट लिखी है और बड़े दिल से लिखी है एक बार जरूर नमन कीजिए

*जीवन में 45 पार का मर्द........*
*कैसा होता है ?*

थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के  पास,
खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद,

जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे,
जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ,

अनुभव की पूंजी हाथ में लिए,
परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में,
जो उसे नहीं मिल पाया था,

बस बहे जा रहा है समय की धारा में,
*बीवी और प्यारे से बच्चों में*

पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा,
रात को घर आता है, सुकून की तलाश में,

लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे ?
दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे,

पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था,
नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए,
लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए,

अब वो क्या कहे बच्चों से,
कि जेब में पैसे थोड़े कम थे,

कभी प्यार से, कभी डांट कर,
समझा देता है उनको,

एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है, आँख के कोने में,

लेकिन दिखती नहीं बच्चों को,
उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के,

खाने की थाली में दो रोटी के साथ,
परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं,

*कभी,*

तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है,
कुछ कहते ही नहीं,

*कभी,*

हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को,
कभी प्यार से बात भी कर लिया करो,

लड़की सयानी हो रही है,
तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता,

लड़का हाथ से निकला जा रहा है,
तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है,

पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें,
शिकवे शिकायतें दुनिया भर की,

सबको पानी के घूंट के साथ,
गले के नीचे उतार लेता है,

जिसने एक बार हलाहल पान किया,
वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया,

यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है,
जिंदा रहने की चाह में,
फिर लेटते ही बिस्तर पर,
मर जाता है एक रात के लिए,

*क्योंकि*

सुबह फिर जिंदा होना है,
काम पर जाना है,
कमा कर लाना है,
ताकि घर चल सके,....ताकि घर चल सके.....ताकि घर चल सके।।।।

*दिलसे सभी पिताओं को समर्पित,,,,,,,,,,,,,,,*

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

नागेश्वर / नाग केसर -

नागेश्वर एक वनस्पति है इसे हम नाग केसर के नाम से भी जानते है ।
आप यह नाग केसर किसी भी किराने की दूकान से खरीद सकते है ।
लेकिन याद रहे जिस दिन भी आप यह नाग केशर घर ला रहे हो दिन का वह समय शुभ
होना चाहिए ।
नाग केशर को लाकर आप उसे किसी पवित्र स्थान पर रख दें,
एवं 21 सोमवार तक शिव जी का  पूजन करे और शिवजी को  चन्दन और नाग केसर अर्पण करें एवं पूजन उपरांत शिवजी का मंत्र  ॐ नमः शिवाय जप करके मीठे का भोग लगायें।

सोमबार व्रत भी रखें ...
क्रोध एवं अहम् से दूर रहते हुए अपने सामर्थ्य अनुसार पशु पक्षी एवं भिखारी को भोजन प्रदान करें ।
जरुरत मंद लोगो ( भिखारी, संत , महात्मा ) को कुछ पैसों का दान कर सहायता करें।

अंतिम सोमवार के दिन पूजन के उपरांत किसी ब्राह्मीणि माता को घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करें एवं यथा संभव उन्हें नए वस्त्र, भोजन, एवं दक्षिणा प्रदान करें ।
तत्पश्चात उन्हें आदर सहित उनके घर तक छोड़कर आवे या विदा करें ।

इस नागकेशर तंत्र से भगवान् शिव प्रसन्न हो साधक को धन, धान्य, सुख, शान्ति एवं संसार के वैभव प्रदान  करते है ।

नागकेसर के अन्य प्रयोग -
- पीत वस्त्र में नागकेसर, हल्दी, सुपारी, एक सिक्का, ताँबे का टुकड़ा, चावल पोटली बना लें।
इस पोटली को शिवजी के सम्मुख रखकर, धूप-दीप से पूजन करके सिद्ध कर लें फिर आलमारी, तिजोरी, भण्डार में कहीं भी रख दें।
यह धनदायक प्रयोग है।
इसके अतिरिक्त “नागकेसर” को प्रत्येक प्रयोग में “ॐ नमः शिवाय” से अभिमन्त्रित करना चाहिए।

- कभी-कभी उधार में बहुत-सा पैसा फंस जाता है।
ऐसी स्थिति में यह प्रयोग करके देखें।
किसी भी शुक्ल पक्ष की अष्टमी को रुई धुनने वाले से थोड़ी साफ रुई खरीदकर ले आएँ।
उसकी चार बत्तियाँ बना लें। बत्तियों को जावित्री, नागकेसर तथा काले तिल (तीनों अल्प मात्रा में) थोड़ा-सा गीला करके सान लें।
यह चारों बत्तियाँ किसी चौमुखे दिए में रख लें।
रात्रि को सुविधानुसार किसी भी समय दिए में तिल का तेल डालकर चौराहे पर चुपके से रखकर जला दें।
अपनी मध्यमा अंगुली का साफ पिन से एक बूँद खून निकाल कर दिए पर टपका दें।
मन में सम्बन्धित व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम, जिनसे कार्य है, तीन बार पुकारें।
मन में विश्वास जमाएं कि परिश्रम से अर्जित आपकी धनराशि आपको अवश्य ही मिलेगी।
इसके बाद बिना पीछे मुड़े चुपचाप घर लौट आएँ।

अगले दिन सर्वप्रथम एक रोटी पर गुड़ रखकर गाय को खिला दें।
यदि गाय न मिल सके तो उसके नाम से निकालकर घर की छत पर रख दें।

- जिस किसी पूर्णिमा को सोमवार हो उस दिन यह प्रयोग करें।
कहीं से नागकेसर के फूल प्राप्त कर, किसी भी मन्दिर में शिवलिंग पर पाँच बिल्वपत्रों के साथ यह फूल भी चढ़ा दीजिए।
इससे पूर्व शिवलिंग को कच्चे दूध, गंगाजल, शहद, दही से धोकर पवित्र कर सकते हैं तो यथाशक्ति करें।
यह क्रिया अगली पूर्णिमा तक निरन्तर करते रहें।
इस पूजा में एक दिन का भी नागा नहीं होना चाहिए।
ऐसा होने पर आपकी पूजा खण्डित हो जायेगी।
आपको फिर किसी पूर्णिमा के दिन पड़नेवाले सोमवार को प्रारम्भ करने तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

इस एक माह के लगभग जैसी भी श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना बन पड़े, करें।
भगवान को चढ़ाए प्रसाद के ग्रहण करने के उपरान्त ही कुछ खाएँ।

अन्तिम दिन चढ़ाए गये फूल तथा बिल्वपत्रों में से एक अपने साथ श्रद्धाभाव से घर ले आएँ।
इन्हें घर, दुकान, फैक्ट्री कहीं भी पैसे रखने के स्थान में रख दें।
धन-सम्पदा अर्जित कराने में नागकेसर के पुष्प चमत्कारी प्रभाव दिखलाते हैं।

!! ॐ नमः शिवाय !!

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...