यदि चैत्र का महीना लगते ही बारिश हो गई। कहीं कम, कहीं ज्यादा और कहीं तो अंधड़ में ओले-ओले हो। पकी-पकाई फसल की मूंछे नोच गई है ये बारिश...। सोचिए, ये क्यों हुआ, ये तो मौसम विज्ञान वाले ही जाने और क्या हुआ ये हम देख ही रहे हैं मगर क्या होगा ये उन किसानों को मालूम है जिनके चेहरे पर मुस्कान के बीच फसल के मोल-भाव तक तय हो रहे थे मगर पानी ने बालियों के पेट में पड़े गेहूं को भी भीगोकर कंपा दिया हो...।
हां, मुझे 'वृष्टिविज्ञान' और 'कृषि पराशर' ग्रंथों की याद आ गई। उस जमाने में भी चैत्र में बारिश होती रही होगी और इसी बारिश से वे आने वाले मौसम को देखते रहे होंगे... और ऐसी स्मृतियों के आधार पर ही मौसम का अनुमान लिया गया होगा। ऐसे ही योग भोजराजकृत मेघमाला, घाघ भड़डरी, डाक वचनार आदि में भी लिखे गए हैं...। इस मास में महीना, वार और तिथि को समान फलदायक कहा गया है : अथान्त्यत् प्रवक्ष्यामि फलं योगं समुद्भवम्। मास वार तिथीनां च समं ज्ञान प्रकाशनम्।। अपने आसपास कब और किस योग में बारिश हुई है, हमारे पुरातन ज्ञान के आधार को यहां देखकर आप स्वयं अनुमान लगा लीजिएगा :
इस बार चेत्र 6 मार्च से लगा है, कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को वार था- शुक्रवार और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र था। इसके बाद द्वितीया से क्रमश : उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शततारका और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र 20 मार्च, अमावस्या तक होंगे।
नारद अपने मयूर चित्रकम् या वृष्टि विज्ञान में कहते हैं : यदि चेत्र मास में प्रतिपदा को सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार हो तो पावस काल में बारिश खूब होती है, खूब सस्य का योग होता है किंतु प्रतिपदा को शनिवार व मंगलवार हो तो चारा तक नहीं हो पाता, शासकों के बीच भी क्लेश होता है। कृष्ण पक्ष में पंचमी व बुधवार को मंगल यदि वक्री हो तो तैलीय पदार्थ महंगे होते हैं। अनाज भी महंगाई का रुख करता है। यदि शुक्ल पक्ष की पंचमी को बारिश हो जाए तो पावस काम में मेघ कम ही जल बरसाते हैं। इसी प्रकार यदि कृष्ण पक्ष में तिथि बढ़ जाए व शुक्ल पक्ष में घटती हों तो अन्न का संकट होता है, मगर इस बार विपरीत योग बना है। कृष्ण पक्ष में तिथि कम हुई है, 10 व 11 एक साथ आ रही है... हां, पराशर के श्लोकों का अनुवाद करने की जरूरत नहीं क्योंकि पढ़कर स्वयं ही सोचियेगा :
अवनि तनय वारे वारिवृष्टिर्न सम्यग् बुध गुरु भृगुजानां शस्य सम्पत् प्रमोद:।
जलनिधिरपि शोषं याति वारे च शौरेर्भवति खलु धरित्री धूलिजालैरदृश्या।।
चैत्राद्यभागै चित्रायां भवेच्च चित्तला क्षिति:।
शेषे नीचैर्न वात्यर्थं क्ष्मामध्ये बहुवर्षिणी।।
मूलस्यादौ यमस्यान्ते चैत्रे वायुरहर्निशम्।
आर्द्रादीनि च ऋक्षाणि वृष्टिहेतोर्विशोधयेत्।। (कृषि पराशर 45-47)
चैत्र में बारिश के आधार पर अनुमान का यह ऋषि ज्ञान आपके सम्मुख है.. सोचियेगा और चैत्रीय विक्रम संवत्सर के अनुसार योजनाएं बना लीजिएगा,,, जय जय।
खेत-खेत में रास
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चैत के पूरा होते होते फसलें कट गईं। अब दानें निकालने के लिए मेधि रोपण होता है न बैलों से दंवाई होती है। न हवा चलने का इंतजार और न साड़ी चद्दरों से हवा कर सूपडों से धान को गिरकर भूसे को अलग किया जाता है।
थ्रेसर वाले ने सब काम और परंपराएं खत्म कर दी।
बाकी रहा तो बस रास।
रास यानी निकले हुए अनाज का ढेर। रस दर रस ठोस हुआ दाना और दानों का पहाड़ रास। अन्न राशि। यही शब्द आज तक प्रचलित है। इससे भक्ति यानी विभाजन का बड़ा संबंध रहा है, हालांकि बहुत प्रयास, काल से वह शब्द अलग ही अर्थ देता है :
गहवां रचिया रास, खेतां अर खडियाना।
भगती भुगते आस, पांती होयां रामजी।।
ताज़ा निकला अनाज! जाजम की बिछात पर अन्नदेव को विराजित किया जाता है। अलग अलग रासें लगाई जाती हैं और फिर हिस्से किए जाते हैं। कभी रास सीधे अपने कोठार या भंडार को नहीं जाती। पहले छठवां हिस्सा राजा को तौला जाता। अन्य अंश हिस्सेदार को, रखवाली करता को दिए जाते। यहीं पर घर के सेवाधर्मियों, आयतों को अपनी-अपनी सुंकड़ी का हिस्सा दिया जाता। संत, सेवक, महाराज, मठ, मन्दिर, कबूतर, किडी कुंजर... सबका भाग। स्मृतियों में तो और भी शेष अंशों का जिक्र है। इतने भागों की भक्ति और भुगतान...फिर अपना अपना भाग्य। क्योंकि, उधारी के चुकतान-भुगतान के लिए भी सुक्खीलाला ऐसे वक्त पर पहुंचते हैं न! "मदर इंडिया" याद कीजिए।
"रास आया भक्ते" यानी रास जब लगे तो सबको मिलेगा अपना - अपना हिस्सा। यह रास जीवन का बड़ा सच है। भूखे भजन न ही हि गोपाला... रास पर भक्ति से वंचित किए की पीड़ा को भी कह सकता है। रास पर खेतरपाल (क्षेत्रपाल) की कृपा भी कम नहीं होती और भूमिया (भौमिया जी) की भूमिका भी पूरी होती है। इनके हिस्से में धूप, फल आदि आते हैं और फिर अन्न अपना।
भाई मनोज व्यास ने एक चित्र भेजा तो रास के मायने याद आ गए। जय जय।
चौरा की रचना : पेड़ की साक्षी
देहात की अपनी परंपराएं अौर नियोजनाएं होती है।
किसी सामूहिक मुद्दे, मसले पर विचार करने और सह
निर्णय के लिए जन जातीय इलाकों, लोकांचलों में जो जगह तय होती है, वह हामेती (सहमति, समिति) और उसमें राय रखने वाले गमेती या गामेती होते हैं।
जगह पर कुलगत आस्था का सूचक पेड़ होता है। यह नीम, लिसौड़ा, पीपल, बरगद, करंज आदि का हो सकता है। पेड़ वही होगा जो ग्राम्य वृक्ष हो, जंगली पेड़ नहीं। जैसे कि इमली, जिसके नीचे बैठने से सुस्ती आती है। इसलिए वृक्ष सचेत रखे, चैतन्य रखे। वह चैत्य वृक्ष इसीलिए कहलाता है। इसे कोई काटता नहीं। काटने की मनाही होती है, जरूरी होने पर छंटाई हो सकती है।
शास्त्रों में चैत्य वृक्ष का नाम मिलता है और उसे श्मशान का पेड़ लिखा जाता है जबकि असल में वह समूह के बैठने व निर्णय के साक्षी होने से महत्व का है और इसीलिए अकाट्य है। पेड़ की गवाही जैसा आख्यान और मुहावरा भी तो है। वास्तु में लकड़ी के चुनाव के प्रयोजन से चैत्य वृक्ष के काटने का निषेध किया गया है। चाणक्य आदि ने चैत्य से कृत गतिविधियों का जिक्र किया है। ( अन्य सूचनाएं : समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा संहिता)
पेड़ की छाया के नीचे आलवाल की तरह विस्तृत जगह बैठकी है। यहां एकी-बेकी, गंगाजली उत्त्थापन, शपथ, देव चौखट गमन, जल संकल्प आदि विधियों से सामाजिक पक्षों पर निर्णय आदि होते हैं। अधिक समय नहीं हुआ, जब चौरों या चवरों का इतना सम्मान था कि कोई उस पर जूते पहने नहीं जाता। यकीन नहीं होता है कि नारियां उधर से गुजरती तो पर्दा रखती...।
एक प्रकार से यह प्रणाली गण व्यवस्था की सूचक है और इसकी जड़ें बहुत गहरी और हरी है... है न।







