मंगलवार, 25 जून 2019

पुणे में एक नए गुरुकुल की स्थापना हेतु विशेष सेमिनार व विचार विमर्श


वंदे मातरम् साथियों

आचार्य अजय कर्मयोगी जी विश्वप्रसिद्ध 'गुरुकुलम' गुजरात से पधार रहे हैं और पुरे भारत में गुरुकुलीय शिक्षा को स्थापित करने के लिए कार्य कर रहे है वो 26 तारीख को पुणे पधार रहे हैं , हम आचार्य जी के तत्वाधान में 26 तारीख को एक संगोष्ठी का आयोजन करने जा रहे हैं I

गुरुकुल शिक्षा क्या है ? देश में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को क्यों पुनः स्थापित करना चाहिए ? और आधुनिक शिक्षा प्रणाली (लॉर्ड मैकाले शिक्षा प्रणाली) से यह कैसे उत्तम है गुरुकुल से  भूख, बीमारी, बेरोजगारी  सहित  सभी समस्याओं का समाधान कैसे हो? आदि विषयों पर विचार विमर्श करने के लिए व इससे संबंधित अन्य जिज्ञासाओं के समाधान के लिए इस संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है I आचार्य श्री 'अजय कर्मयोगी जी' इस संगोष्ठी को संबोधित करेंगे I इस शुभ अवसर का लाभ उठाने के लिए आप सभी जागरूक देशभक्त सादर आमंत्रित हैं I और 26 तारीख सुबह 3:00 बजे के करीब हम बैठक रखना चाहते है जिसमें हम उनसे गुरुकुल और अन्य विषयों पर चर्चा कर सकते है तो जो जो साथी पुणे या आस पास से है कृप्या सुचित करें ....

सम्पर्क सूत्र :-
श्री दयानंद जी इंगले--9881110267
श्री अजय कर्मयोगी जी - 9336919081

शनिवार, 22 जून 2019

भारतीय योग दर्शन में प्रदर्शन नहीं इस सिद्धांत से दुनिया का कल्याण का विशिष्ट विश्लेषण

    
योग रोग भगाने का एक टूल बन गया किसी को पता भी नहीं चलने पाया। जीवन में जब भोग बढ़ता है तब रोग की उत्पत्ति होती है जब मन अनियंत्रित होता है तब भोग की तरफ भागता है और वही भोग रोग का कारण बनता है और आजकल इसी भोग को भोगने के हेतु शरीर को सक्षम बनाने का योग एक टूल बन गया है अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों का कल एक प्रमुख दिन है लोगों के मानस पटल पर डे संस्कृति अंकित करने में विशेष योगदान करेगा अनेक प्लेटफार्म पर शारीरिक प्रदर्शन किए जाएंगे जबकि योग मन की क्रिया होती है। धन्य हो डे संस्कृति पूरे विश्व को त्रिषंकू बना दिया जो योग मोक्ष का मार्ग था वह अधो गति की और अग्रसर होकर भोग का मार्ग बन गया बहुत सारे लोग दवा की पुड़िया के साथ योग के आसन बेच रहे हैं  योग के प्रथम और अंतिम चरण गायब है प्रथम यम नियम और अंतिम धारणा ध्यान समाधि जो अंतस्थ की क्रियाएं हैं जिसके बिना योग कभी पूर्ण नहीं हो सकता शारीरिक प्रदर्शन के हेतु कई विशिष्ट आयोजन होंगे अजय कर्मयोगी          ‼‼‼‼‼
योग गुरु बाबाओं  के भी गुरु मिल गये
या कहै सेर को सवा सेर मिला
बाबा जो कर सकते हैं वो ये कर सकता है किन्तु जो ये कर सकता है वो बाबा  नहीं कर सकते
तो हुआ योग में उनका बाप
https://youtu.be/MWw1-h-d5MI
 अब बस एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081
दर्शनशास्त्र में योगदर्शन का विशेष महत्व है। इसीलिए भारतीय या वैदेशिक अथवा आस्तिक या नास्तिक समस्त दार्शनिक संप्रदाय किसी न किसी रूप में योग साधना करते हैं। इसका कारण है कि योगसाधना समस्त दर्शनों और विशेषकर सांख्यदर्शन का व्यवहारिक पक्ष है। योग दर्शन और साधना उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी मानव सृष्टि। भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान मानव सृष्टि का आरंभ एक अरब, सतानवे करोड़, उन्तीस लाख, सैतालीस हजार एक सौ एक ईसा पूर्व हुआ। आधुनिक भौतिकी, खगोल, भूगोल, नृवैज्ञानिक भी मानते हैं कि पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति दो से तीन अरब वर्ष पूर्व हुई। भारतीय वांङमय के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्वप्रथम योगसिद्ध ॠषियों को गहन ध्यानावस्था में वैदिक ॠचाओं के दर्शन हुए। अतः योग का इतिहास सृष्टि के आरंभकाल से वैदिक ॠषियों से प्रारंभ होता है। वेद और वेदांग साहित्य में योग के अनेकों संदर्भ मिलते हैं। वेदांत अर्थात् वेदों के अंतिम भाग ब्राह्मण, उपनिषद, आरण्यक तो साधना को लक्ष्य क रके ही लिखे गए ग्रंथ हैं। कठोपनिषद, श्वेताश्वर और मैत्रायणी उपनिषदों तथा छह वैदिक शास्त्रों में योग और साधना से संबंधित संदर्भ प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

 हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्मा को योगशास्त्र का आदि प्रवक्ता कहा गया है। योगशास्त्र को प्राचीनकाल में ‘हैरण्यगर्भशास्त्र’ कहा जाता था। प्राचीन भारतीय इतिहास की आधारशिला पुराणों के अनुसार सृष्टि के आदि में सनकादि ॠषियों, मरीच्यादि प्रजापतियों ने योगसिध्दि प्राप्त की। स्वयंभू मंवंतर में महर्षि कपिल महायोगी थे। उन्होंने अपनी माता देवहूति को ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तियोग तथा अपने शिष्य आसुरि को सांख्यदर्शन का उपदेश दिया। इसी काल में स्वयंभू मनु की पांचवी पीढ़ी में भगवान शिव महायोगी हैं और वे ही तंत्रशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। उनकी पत्नि दक्षपुत्री सती एवं उमा (पावर्ती) भी योगविद्या निष्णात थीं। इस प्रकार सृष्टि के आदिकाल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, शिव, ॠषभदेव, सनत्कुमार, नारद, कर्दम, कपिल तथा वेद ॠचाओं के दृष्टा अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप आदि अनेकों योगसिद्ध साधकों आदि महर्षियों के योगशास्त्र का विस्तार किया।

 वैवस्वत मन्वंतर में योगदर्शन के आदि प्रवक्ता भगवान विवस्वान् अर्थात् सूर्य कश्यप थे। उन्होंने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को, मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को योगशास्त्र का उपदेश दिया। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययं, विवस्वान्मनवे प्राह, मनुरिक्ष्वाकवे ब्रवीत्।
 एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः, स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप॥
 अर्थात् हे अर्जुन! आदि में इस योग को विस्वान् सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे मनु को कहा, मनु ने इक्ष्वाकु को कहा और इस प्रकार परंपरा से प्राप्त योग को राजर्षि ने जाना जो कि बहुत काल तक नष्ट हो गया था उसे मैं तुझे कह रहा हूं।
 इस प्रकार योगशास्त्र के अध्ययन एवं प्रयोग शिष्य परंपरा के द्वारा सूर्यवंश में हजारों वर्षों तक चला। वैवस्वत मन्वतंर के 24 वें त्रेतायुगांत में महर्षि बाल्मिकी ने भगवान् राम को योगशास्त्र की शिक्षा दी। उस काल में विश्व के आदिकाल महर्षि बाल्मिकी ने भी योगसाधना के ग्रंथ योग-वशिष्ठ और इतिहास ग्रंथ रामायण की रचना की। इसी प्रकार सहस्रबाहू के गुरु भगवान दत्तात्रेय भी योगसिद्ध महात्मा थे जो कि आज भी समस्त वानप्रस्थ-संयासी समुदाय के गुरु माने जाते हैं। छठे अवतार भगवान परशुराम ने योग साधना कर अनेकों सिध्दियां प्राप्त की थी जिनमें मन की गति से यात्रा करना भी शामिल है। इस काल में शेषावतार महर्षि पतंजलि ने हिरण्यगर्भशास्त्र को क्रमबद्ध कर योगसूत्र की रचना की जो कि योगदर्शन के इतिहास में युगांतकारी उपलब्धि थी।

 इस काल में मैत्रावारूणि वशिष्ठ कराल जनक, असुरि शिष्य पंचशिख, उनके शिष्य धर्मध्वज जनक, याज्ञवलक्य, उनके शिष्य दैवराजि जनक, विभिन्न ऐक्ष्वाकु जैन तीर्थंकर, कॉम्पिल्यनरेश ब्रह्मदत्त, पतंजलि आदि अनेकों ज्ञात-अज्ञात ॠषियों ने योगदर्शन का विकास किया।
 महाभारत काल में गृहस्थ आश्रम के पश्चात् वानप्रस्थ में योगसाधना करके संन्यास आश्रम में प्रवेश करना सामान्य नियम था। महर्षि वेदव्यास प्रणीत श्रीमद्भगवदगीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग, जपयोग आदि का विस्तार से वर्णन है। पातंजलि योगसूत्र पर उनका ‘व्यासभाष्य’ योगशास्त्र के इतिहास की सार्वकालिक रचना है, जिस पर आगामी पांच हजार वर्षों तक अनेकानेक योगियों, विद्वानों ने टीका, वृत्ति, विवरण आदि अनेकों ग्रंथों की रचना की जिनके माध्यम से आज तक हमें योगशास्त्र का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त होता है।
 अष्टम् अवतार भगवान कृष्ण को योगिराज कहा जाता है जो कि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों विषयों के जगद्गुरू माने जाते हैं। इस काल में महाभारत युद्ध के समय उपदिष्ट उनकी भगवदगीता योग ही नहीं बल्कि मानवता के इतिहास में अद्वितीय उपदेश है जिसका संकलन कर वेदव्यास भी अमर हो गए। श्रीमदभगवदगीता के ज्ञानयोग, भक्तियोग, निष्काम कर्मयोग आदि विभिन्न योगसाधनाएं पांच हजार वर्षों से ज्ञानियों, गृहस्थों, संयासियों, साधकों के लिए मार्गदर्शन हेतु दीपस्तंभ के रूप में स्थापित है। श्री कृष्ण के ही कुलबंध 22वें जैन तीर्थंकर अरिष्टनेमी या नेमिनाथ ने इसी काल में सौराष्ट्र स्थित गिरनार पर्वत पर योग साधना कर मोक्ष प्राप्त किया। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ इस काल में विख्यात योगी हुए। वेदव्यास से लेकर महात्मा बुद्ध के 1500 वर्षों के अंतराल में योगशास्त्र पर अनेकों प्रयोग, शोध हुए तथा अनेकानेक प्रकार की योगपद्धतियों का विकास किया गया। ‘ब्रह्मपुराण’, ‘शिवपुराण’, ‘अग्निपुराण’, ‘विष्णुपुराण’ आदि पुराण एवं ‘पंचरात्र’ आदि तांत्रिक ग्रंथ तथा इनके अनुशांगिक साहित्य में योगसाधना की अनेकों पद्धतियों का वर्णन प्राप्त होता है।

1922 ईस्वी में अविभाजित भारत में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई की गई जिसमें सिंधुघाटी की अति-प्राचीन सभ्यता का उद्धाटन हुआ। बाद में भारतीय पुरातत्वशास्त्रियों ने उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर, पंजाब के रोपड़, हरियाणा के कुणाल, बनावाली, शीशवाल, राखी गढ़ी, राजस्थान के कालीबंगन, गुजरात के धौलावीर, सुरकोटड़ा, लोथल, भेट, द्वारका, रंगपुर, राजड़ी आदि स्थानों पर उत्खनन कर सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता का अन्वेषण किया। 1985 ई. में भारतीय भूगर्भ-वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों ने नासा के एक उपग्रह से प्राप्त भूगर्भीय मानचित्र के आधार पर आदि बद्री, हिमाचल प्रदेश से लेकर कच्छ के रण तक 4500 किमी क्षेत्र का सर्वेक्षण कर विलुप्त सरस्वती नदी का उद्धाटन किया। इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता के उत्खनन में विलुप्त पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई जिसमें पशुपति शिव, कार्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े साधक आदि अनेकों योगमुद्राओं में साधकों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी योगशास्त्र को लगभग 3000 ईसापूर्व प्राचीन सिद्ध करती है। अतः महाभारतकालीन साहित्यिक स्रोत एवं सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाण योगशास्त्र की प्राचीनता को समान रूप से प्रमाणित करते हैं।
 भारतीय ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार भगवान बुद्ध एवं स्वामी महावीर का काल लगभग कलि संवत् 1500 अर्थात् 1600 ईसा पूर्व है। बौद्ध और जैन दर्शन संयास और मोक्षोपाय के दर्शन हैं। अतः इस काल में चार आश्रमों की जीवनशैली के स्थान पर संन्यास और मोक्ष का महत्व बढ़ गया और इस काल में मंत्रयोग, यंत्रयोग की योगसाधना का बहुत विकास हुआ। इस क ाल में शाक्तमुनि सिध्दार्थ, मेघंकल, शरणंकर, दीपंकर, कौडिन्य, मंगल, सुमन, रैवत, शोभित, अनामदर्शी, पद्म, नारद, सुमेध, सुजात, प्रियदर्शी, अर्थदर्शी, पुष्य, विपश्यिन, विश्वभू, कुसंधि, कनकमुनि, काश्यप और गौतम चौबीस बुध्दों ने योग साधनाओं के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया। हीनयानी बौद्ध ध्यानमार्ग और महायानी बौद्ध अष्टांग योग की साधना करते थे। बोधिसत्व मैत्रेय का ‘सूत्रालंकार’, असंग का ‘योगाचार भूमिशास्त्र’, और वसुबंधु का ‘विज्ञप्तिमात्रतासिध्दि’ आदि इस काल में उल्लेखनीय साधना ग्रंथ है। इन्होंने एक अलग बौद्ध संप्रदाय योगाचार की स्थापना की।
    24 वें जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी उनके शिष्य आर्य सुधर्मा, स्थविर संभूति विजय, भद्रबाहू आदि जैन मुनि योगसाधक इसी काल में हुए। गणधर गौतम इंद्रभूति ने जैनसाधना के बारह अंगों और 14 पूर्वों को उपनिबद्ध किया। इस काल में श्वेतांबर और दिगंबर जैन साधकों ने योग विद्या में अनेकों प्रयोग किए और तांत्रिक और शुद्ध यौगिक साधनाओं का विकास किया। बौद्धसंघ की विपश्यना और जैनसंघ की प्रेक्षाध्यान पद्धति का प्रादुर्भाव इसी काल में हुआ। योग-तंत्र मार्ग के अनेकों बौद्ध, जैन साधु इस काल में हुए। भारत की योग दर्शन के
 आस्तिक दर्शन के ईश्वर कृष्ण, उद्योतकर आदि सांख्य एवं योग के आचार्य इसी काल की विभूतियां थे। इसी काल में महर्षि गौड़पाद, भाष्यकार पतंजलि एवं गोविंद भागवतपाद ने साधना मार्ग की अनेकों सिध्दियां प्राप्त कीं। ‘जाबालोपनिषद’, ‘योगशिखोपनिषद’, ‘अद्वयतारकोउपनिषद’, ‘तेजबिन्दु उपनिषद’, ‘योगतत्वोपनिषद’, ‘अमृतबिन्दोपनिषद’ आदि योगशास्त्र के ग्रंथों का प्रणयन इस काल में किया गया।

 आद्य शंकराचार्य भगवत्पाद का प्रादुर्भाव कलिसंवत् 2593, युधिष्ठिर संवत् 2629 अर्थात् 374 विक्रमपूर्व तदनुसार 509 ईसापूर्व में हुआ। उन्होंने न केवल तत्कालीन भारत में प्रचलित अनेकों दर्शनिक मतों, संप्रदायों, पाखंडों को शास्त्रार्थ से पराजित किया तथा भारत में प्रचलित अनेकों प्रकार की साधना पद्धतियों का समन्वय कर आधुनिक सर्वपंथ-समभाव की आधारशिला रखी। आदिशंकर ने आस्तिक और नास्तिक दर्शनों में प्रचलित, निराकार एवं साकार साधना, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, बुद्धयोग, जैनयोग आदि को समन्वित कर भविष्य के भारतीय दार्शनिक चिंतन, समन्वित कर्मकांड, मोक्ष साधना, संन्यास की मार्गदर्शिका का निर्माण कर मानवता अभियान का सूत्रपात किया। उन्होंने वेदांत, सांख्य तंत्रशास्त्र, स्त्रोत तथा अनेकों साधना ग्रंथों के साथ-साथ योगसूत्र के वेदव्यास पर लिखकर योगशास्त्र की महत्ता को प्रमाणित किया। उन्होंने दशनामी संप्रदाय तथा चार शंकरमठों की स्थापना कर योग साधना परंपरा को स्थायी कर दिया जो कि पूज्य शंकराचार्यों द्वारा आज तक प्रचलित है।
          
 इसी काल में आगे चलकर गुरू मत्स्येन्द्रनाथ आदि तांत्रिक, गुरू गोरखनाथ आदि योगी, भर्तृहरि आदि नाथपंथी, बौद्ध योगी, व्रजयानी तांत्रिक, सिद्ध सरहपाद आदि नवनाथ-चौरासी सिध्दों की परंपरा, जैनमुनि कुंदकुंदाचार्य, उमास्वाति, हरिभद्रसूरि में अनेकों योगियों ने योगशास्त्र का विस्तार किया। सातवीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के वैष्णव आळवार एवं शैव नयन्नार संतो ने भक्तियोग की स्थापना की। इसी काल में वाचस्पति मिश्र ने योगशास्त्र के व्यासभाष्य पर ‘तत्ववैशारदी टीका’ लिखकर विद्वत् समाज में योगदर्शन को प्रतिष्ठापित किया। इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता हठयोग का प्रचलन थी। ‘शिवसंहिता’, ‘घेरंडसंहिता’, ‘सिद्ध-सिध्दांत-पद्धति’, ‘योगसिध्दांत पद्धति’, ‘अवधूतगीता’, ‘हठसंहिता’, ‘हठदीपिका’, ‘कौलज्ञान निर्णय’, ‘कुलार्णव-तंत्र’, ‘विद्यार्णव-तंत्र’ आदि योग-तंत्र के अनेकों ग्रंथ इस काल में रचे गए।

 आदि शंकराचार्य के समन्वित दर्शन की आधारशिला पर ही मध्यकालीन निर्गुण और सगुण भक्ति आंदोलन रूपी मानवता से प्रेम की विश्व की अद्वितीय अट्टालिका निर्मित की जा सकी। सातवीं शताब्दी ईस्वी में 12 वैष्णव अलवार संत और 63 शैव नयनार संत भक्तियोग के प्रवर्तक थे। इसी परंपरा में कलियुग की पंचम सहस्राब्दि के आरंभ में रामानुज के सभी जातियों के लिए भक्तियोग की दीक्षा के द्वार खोल दिए। उत्तर भारत में उनके शिष्य स्वामी रामानंद ने भक्ति मार्ग का प्रचार किया। रामानंद के दो शिष्य ज्ञानयोगी संत कबीर और भक्ति मार्गी संत तुलसीदास विश्व प्रसिद्ध संत हुए। इसके साथ ही यमुनाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, निंबार्काचार्य, बल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, गरू नानकदेव, गुरू रामदास, समर्थ श्री रामदास, गुरू अर्जुनदेव, दशमेश गरू गोविन्द सिंह, संत रविदास, गरीबदास, दादु दयाल, नरसी मेहता, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत सुरदास, मीराबाई, रहीम आदि अनेक भक्तों ने भक्तियोग का प्रचार किया। यहां तक कि भारतीय भक्तियोग ने इस्लाम को भी आकर्षित किया और सूफीमत का प्रादुर्भाव हुआ जो कि विपरित मतों के समन्वय का प्रतीक बन गया। शेख मोइनुद्दीन चिश्ती, शेख निजामुदीन औलिया आदि सूफी संत इसकी काल में हुए। मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ अर्थात् रानी पद्मावती तथा ‘कान्हावत्’ अर्थात् भगवान कृष्ण का चरित्र इस काल की उच्चतम योग-दार्शनिक रचनाएं हैं।

 इस कालखंड में योगसाधना में ज्ञानयोग और भक्तियोग अपने चरमोत्कर्ष पर था। एेंद्रीय शक्ति को सिद्धकर भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गुप्त साधनाएं और घोर तपस्याओं को छोड़कर भारतीय समाज शुद्ध आचरण और प्रेम साधना की ओर अग्रसर हुआ। इसके साथ ही योगसाधना केवल संयासियों तक सीमित न रहकर समाज में गृहस्थ जीवन में ही निष्काम भाव से मोक्ष की प्राप्ति के लिए सहज साधना का काल आरंभ हुआ। इस काल की सबसे बड़ी विशेषता मानव-मानव में समानता का उद्धोष था।

  सके क्यो के अतिरिक्त हिरण्यगर्भ की पातंजल योग परंपरा में भी इसी काल में योगशास्त्र का विस्तार होता रहा। योगसूत्र पर राजा भोज प्रणीत ‘राजमार्तण्ड’, हेमचंद्राचार्य के ‘योगशास्त्र’, विज्ञानभिक्षु प्रणीत ‘योगभाष्य’ और ‘योगस्तर संग्रह’, श्रीनिवास भट्ट की ‘हठसंकेत चंद्रिका’, सुंदरदेव की ‘हठतत्वकौमुदी’, हर्षकीर्ति की ‘हठयोग प्रणाली’, आत्माराम की ‘हठयोग प्रदीपिका’, भोगेश्वरमुनि की ‘योगरत्न’ प्रदीपिका आदि योग साहित्य इसी काल के ग्रंथरत्न हैं।

 पुनर्जागरण काल में अनेकों युगपुरूषों ने जन्म लिया। स्वामी दयानंद जैसे उद्भट वैदिक विद्वान, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविंद, महर्षि रमण, स्वामी विशुध्दानंद, तैलंग स्वामी, योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी, गोपीनाथ कविराज, आदि अनेकों योगसाधक इस काल में हुए। ईसा की 20वीं सदी के द्वितीय विभूति महात्मा गांधी ने तो निष्काम कर्मयोग और अहिंसा का प्रयोग न केवल सक्रिय राजनीति में किया बल्कि उनके सत्याग्रह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान दिया। ईसा की 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में श्रीपद प्रभुपाद, आचार्य रजनीश, महर्षि महेश योगी, जैन आचार्य श्री महाप्रज्ञ, बाबा रामदेव आदि महान विभूतियों ने भारतीय योगसाधना और दर्शन का जोर-शोर से प्रचार किया है।

परिणामस्वरूप योगदर्शन और साधना ने भारत से बाहर निकलकर विश्वव्यापी साधना का रूप ले लिया। आज विश्व के सभी मतों, संप्रदायों, पूजा पद्धतियों के मानने वालों आस्तिकों, नास्तिकों ने योगसाधना की ओर आकर्षित होकर मोक्ष प्राप्ति या शारीरिक-मानसिक शांति-संतोष की प्राप्ति के लिए प्रयासरत हैं। इस प्रकार सृष्टि के आरंभ से उदय हुए योग-साधना रूपी दीपक अब सभी मतों के समन्वय रूपी सूर्य बनकर अपनी आभा से विश्व को आलोकित कर रहा है।
  संकलन अजय कर्मयोगी

ध्यान - योग - नियम
यमनियमासनप्राणायाम प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोष्टावङ्गानि ।।
आजकल बहोत लोग कहते है कि हम आज्ञाचक्रमे ध्यान करते है । हमे प्रकाशपुंज के दर्शन होते है । एक घंटा दो घंटे समाधि लगती है । ऐसे कही गुरु भी है जो मंत्र देकर कहे देते है ये मंत्र का जाप करो और ध्यान लगाओ । पर कोई उपासना इतनी आसान नही होती । पुस्तक पढ़कर या किसी गुरु के कहे देने से ऐसे ध्यान लग जाय और समाधि अवस्था प्राप्त होती तो पूरी दुनिया योगियो से भरी होती और सतयुग आ गया होता।
किसी भी विषयमे निपुण होना हो तो उन विषय को साध्य करने के अनेक नियम ओर पूरक अभ्यास होते है । ऐसे ही ध्यान समाधि जैसे उच्च उपासना के अष्ट नियम साधना बताई गई है । ये सारे नियम उपासना साध्य करने के बाद ही सालों के बाद योगियो को ध्यान समाधि अवस्था प्राप्त होती है । किसी सम्प्रदाय की शिबिर में गए और ध्यान समाधि लग गई ये तो कोई मूर्ख व्यक्ति की कल्पना मात्र है । कोई भी व्यक्ति आंखे बंद करे और दोनों आंख आज्ञाचक्र की ओर खिंचे तो चित्र विचित्र कलर या कल्पना स्वरूप प्रकाश दिखना वो तो मनुष्य देह की आँख का दृष्टि विज्ञान है , कोई ध्यान समाधि नही । जहाँ सच्चे साधको को साधक गुरु के सनिध्यमे सालों के अभ्यास के बाद साध्य होता है वो आपको बस आंखे बंद करते ही साध्य हो गया ये तो मात्र भ्रामक कल्पना है ।
पंतजलि ऋषिने अष्टांग योग साध्य करने जो मार्ग दिखाया है , संक्षिप्तमे देखते है । यम , नियम , आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग है । इस हरेक विषय को साध्य करे तब समाधि अवस्था प्राप्त होती है ।
1   यम :-
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहा:यमा ।।
पांच सामाजिक नैतिकता
(क) अहिंसा - अहिंसाप्रतिष्ठायांतत्सन्निधौ वैरत्याग: ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अहिंसा से प्रतिष्ठित हो जाने पर उस योगी के  वैरभाव छूट जाता है ।
शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना ये अहिंसा है ।
(ख) सत्य -सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफ़लाश्रययत्वम् ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात सत्य से प्रतिष्ठित (वितर्क शून्यता स्थिर) हो जाने पर उस साधक में क्रियाओं और उनके फलों की आश्रयता आ जाती है ।
अर्थात जब साधक सत्य की साधना में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके किए गए कर्म उत्तम फल देने वाले होते हैं और इस सत्य आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर कल्याणकारी होता है ।
विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना ये सत्य की उपासना है
(ग) अस्तेय - अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।।  पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अस्तेय के प्रतिष्ठित हो जाने पर सभी रत्नों की उपस्थति हो जाती है ।
अस्तेय अर्थात चोर-प्रवृति का न होना । सद्विचार , सदवानी , सद्कर्म , दान , पुण्य , जप जाप भक्ति स्वयम करो । स्वयं पुण्य ऊर्जा प्राप्त करो । न कि कोई सिद्ध गुरु कृपा करदे ओर सब हो जाय ये तो चोरी हुई ।
(घ) ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभ: ।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात ब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित हो जाने पर वीर्य(सामर्थ्य) का लाभ होता है ।
ब्रह्मचर्य दो अर्थ हैं-
चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम बरतना ये ब्रह्मचर्य है ।
(च) अपरिग्रह - अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध :।। पातंजलयोगदर्शन
अर्थात अपरिग्रह स्थिर होने पर (बहुत, वर्तमान और भविष्य के ) जन्मों तथा उनके प्रकार का संज्ञान होता है । अपरिग्रह का अर्थ आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना । बिना महेनत किय्या ओरो का हक्क नही छिनना ।
2  ;- नियम
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा: ।। पातंजलयोगदर्शन
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान - नियम कहे जाते हैं ।
पाँच व्यक्तिगत नैतिकता
(क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि ।
(ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना ।
(ग) तप - स्वयं से अनुशाषित रहना ।
(घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना ।
(ड़) ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए । इच्छित फल न मिले की मंत्र , गुरु , इष्ट बदलते रहना वो तो मूर्खता मात्र है ।
3  ;- आसन
योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण
आसन शरीर को साधने का तरीका है।
पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है (स्थिरसुखमासनम्। पतंजलि के योगसूत्र में ने आसनों के नाम नहीं गिनाए हैं। लेकिन परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे सम्बंधित ‘हठयोगप्रदीपिका’ ‘घेरण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद’ में विस्तार से वर्णन मिलता है। किसी भी एक आसनमे 3 -4 घंटे तक सुखपूर्वक बैठना वो है आसन सिद्ध होना ।
4  ;- प्राणायाम
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।। पातंजलयोगदर्शन
उस ( आसन) के सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना प्राणायाम है ।
योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।
5  ;- प्रत्याहार
इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। अतः चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैं, जिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं।
6  ;- धारणा
मन को एकाग्रचित्त करके ध्येय विषय पर लगाना पड़ता है। किसी एक विषय का ध्यान में बनाए रखना। एक ईश्वर के स्वरूप में पूर्ण भाव स्थिर करना ।
7  ;- ध्यान
किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है। जब ध्येय वस्तु का चिन्तन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
8  ;- समाधि
यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है। समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं : सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाताहै।

ध्यान योग उपासना की ये सब प्राथमिक समज है । बाकी तो सद्गुरु के सनिध्यमे सालों तक के अभ्यास के बाद ही ये अवस्था प्राप्त होती है । नेति धोती नाड़ी शोधन सहित अनेक क्रिया है जो सद्गुरु के सनिध्यमे की जाती है । कुंडलिनी जागरण या सप्तचक्र जागृति उपसनामे भी ये सब साध्य होना चाहिए । बिनाकोइ सद्गुरु के मात्र पुस्तक या अन्य माहिती के आधार पर या लेभागु व्यापारी संस्थानों के गुरुओं से अगर ये क्रिया करते हो तो आंख , दिमाग और नाड़ियों के अनेक रोग भी संभव है , इसलिए सोच समझ कर ही ये क्रिया करे

शुक्रवार, 21 जून 2019

योग अपने मार्ग से भटक कर भोग का मार्ग पकड़ा

   

भारतीय जीवन दर्शन और उसका मार्गदर्शन करने वाली ज्ञान परंपरा में जीव का लक्ष्य निर्धारित है-मोक्ष। योग, मोक्ष प्राप्ति का ही एक मार्ग है। यह इतनी ऊंची और श्रेष्ठ विधा र्थी  परंतु  आज इसका पतन हो कर  भोग का मार्ग बन गई है जो शरीर और इंद्रियों के सुख के लिए  इसका  उपयोग  उपभोग  किया जा रहा है  भोग से ही  रोग की उत्पत्ति  होती है आज  इसी योग के सहारे भोगों को भोगने के लिए पुनः शरीर और मन को तैयार कराया जा रहा है जिससे योग अपने मार्ग से भटक कर भोग का मार्ग बन गया है
           योग का एक अन्य अर्थ है आत्मा का परमात्मा से योग।
प्रश्न उठता है मोक्ष प्राप्ति या आत्मा के परमात्मा से मिलने की प्रक्रिया क्या है ? इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि ने किया, जिसे अष्टांग योग कहा। अष्टांग योग यानि-यम,नियम,आसन प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान और समाधि। जो मानव शरीर या आत्मा इन प्रक्रियाओं को पूरा करेगी वही मोक्ष या परमात्मा से मिलने की अधिकारी है।
यम- अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह।
नियम- शौच,संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिनिधान।
आसन- शारीरिक यौगिक क्रियाओं की विविध श्रंखला। प्राणायाम-श्वास-प्रश्वांस की विभिन यौगिक क्रियाएं।

जब मानव शरीर या आत्मा इतनी प्रक्रियाएं पूरी करती है तब वह प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि के लिए तैयार होती है। तब योग पूर्ण होता है।

अष्टांग योग की कुछ प्रक्रियाएं, आसन-प्राणायाम आदि सिर्फ मनुष्य को शारीरिक रूप से स्वस्थ रखती हैं।

शेष जो कुछ है वह वैश्विक बाजार में सिर्फ एक चिकित्सकी प्रोडक्ट है।


मंगलवार, 18 जून 2019

साइटिका रोग का कारण व निवारण


पीठ के रोगों में शियाटिका सबसे आम रोग माना जाता है। यह पीठ का ऐसा तेज दर्द है जो तंत्रिका तंतु की सीध में उठता है। यह शरीर के जांघों, नितंब, पिंडलियों, पैरों के कुछ भागों या कभी-कभी पूरे भागों को प्रभावित करता है

कारण
शियाटिका का रोग तंत्रिका के सिरे पर दबाव पड़ने से उत्पन्न होता है। इस प्रकार का दबाव स्लिप डिस्क या जोड़ों में चोट लगने या खिसकने के कारण होता है। शियाटिका का दर्द ज्यादा भारी वजन उठाने, सही तरीके से न बैठने या फिर बैठे-बैठे से अचानक ही उठ जाने के कारण होता है। टयूमर, मवाद, खून के थक्के या आस-पास की मांसपेशियों में खिंचाव आदि की अवस्था में भी तंत्रिका पर दबाव पड़ सकता है।

इसके अलावा शियाटिका रोग होने के और भी कई कारण हो सकते है जैसे-

रीढ़ की हड्डी के किसी भाग में खराबी आ जाने या हडि्डयों का कोई भाग ऊपर-नीचे खिसक जाने के कारण शियाटिका रोग हो सकता है।
रीढ़ की हड्डी के किसी भाग के पास फोड़ा आदि हो जाने के कारण भी शियाटिका रोग हो जाता है।
रीढ़ की हड्डी के पास के भाग में रसौली या गिल्टी रोग हो जाने के कारण भी शियाटिका रोग हो सकता है।
हडि्डयों में किसी प्रकार से सूजन आ जाने के कारण भी शियाटिका रोग हो सकता है।
स्त्रियों की डिम्बग्रंथि या गर्भाशय में किसी प्रकार का कोई रोग हो जाने के कारण शियाटिका रोग हो सकता है।
मूत्राशय प्रणाली में कोई खराबी आ जाने के कारण भी शियाटिका रोग हो सकता है।
नितम्ब की हड्डी या पेट के नीचे के भाग में किसी प्रकार से सूजन आ जाने के कारण भी शियाटिका रोग हो सकता है।

शियाटिका रोग के कारण रोगी को बहुत तेज दर्द होता है जिसको सहना रोगी के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। रोगी के शरीर में शियाटिका रोग के कारण होने वाला दर्द पीठ के निचले भाग से शुरु होकर नितम्ब तथा टांगों से होता हुआ पैर के तलुवों तक पंहुच जाता है। जिन व्यक्तियों को शियाटिका रोग बार-बार होता है उन व्यक्तियों का दर्द ठंड के मौसम में और भी तेज हो जाता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ठंडे मौसम के कारण शरीर की मांस-पेशियां सिकुड़ जाती हैं।

शियाटिका रोग से पीड़ित व्यक्ति यदि शारीरिक रूप से स्वस्थ भी है तो भी दर्द के कारण उसे बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस रोग के कारण व्यक्ति को उठने-बैठने, चलने-फिरने, गाड़ी चलाने, सोने, करवट लेने, तथा सीढ़ियां चढ़ने में बहुत दिक्कत होती है। कभी-कभी तो रोगी कुछ दूर तक पैदल चल लेता है लेकिन कुछ दूर चलने के बाद ही उसे इस रोग के कारण दर्द और भी तेज हो जाता है तथा रोगी को लगता है कि वह अब एक कदम भी नहीं चल सकता है। कुछ रोगियों को तो सीधे चलने में भी कठिनाई होती है। यदि इस रोग से पीड़ित कोई व्यक्ति लेट भी जाए तो उसे उठने में दिक्कत होती है।

इस रोग के कारण रोगी को ऐसा लगता है कि उसकी टांगे काफी भारी हो चुकी हैं। इस रोग के कारण रोगी को सुबह के समय बिस्तर से उठने का मन नहीं करता है और यदि रोगी को दर्द शुरू हो जाता है तो उसे चलने-फिरने में भी दिक्कत होने लगती है।

बहुत से रोगी ऐसे भी होते हैं, जिनका एक बार उपचार करने के बाद उन्हें दुबारा से शियाटिका रोग नहीं होता है। बहुत से ऐसे रोगी भी होते हैं जिनका एक बार उपचार करने के बाद दुबारा से उन्हें कुछ महीनों या कुछ वर्षों के बाद शियाटिका रोग हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ व्यक्ति उठने-बैठने, चलने-फिरने, वजन उठाने तथा किसी कार्य को करने में ध्यान नहीं देते हैं तथा जब कोई व्यक्ति इनमें से कोई भी काम गलत तरीके से करता है तो कुछ समय के बाद उसे यह रोग दुबारा से हो जाता है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा शियाटिका रोग का उपचार करने के लिए दिए चित्र के अनुसार रोगी के पैरों में पाए जाने वाले लम्बर, मूत्राशय, गुर्दे, तथा सैक्रम से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर प्रेशर देना चाहिए। इस प्रकार के बिन्दु पैर के तलुवों में, जिस भाग से एड़ी शुरू होती है, उस भाग के आस-पास के क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इस रोग को जल्द ठीक करने के लिए चित्र में दिए गए सारे काले निशान वाले केन्द्र बिन्दुओं पर प्रेशर देना चाहिए। अगर इन भागों को दबाने पर दर्द हो रहा हो तब भी इन बिन्दुओं पर प्रेशर देना चाहिए। इन बिन्दुओं पर प्रेशर अंगूठों के द्वारा देना चाहिए (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है)। वैसे तलुवे के ये भाग काफी सख्त होते हैं इसलिए आवश्यक हो तो किसी सख्त रबड़, प्लास्टिक या फिर किसी लकड़ी से बनाये गये गोल मुलायम उपकरण द्वारा चित्र में दिये गए काले बिन्दुओं को देखकर रोगी के पैर के तलुवों में पाए जाने वाले बिन्दुओं पर प्रेशर देना चाहिए।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

एड़ियों का यह भाग काफी सख्त होता है इसलिए किसी रबड़ या लकड़ी के उपकरण के द्वारा चित्र में दिये गए प्रतिबिम्ब बिन्दुओं को देखकर रोगी के तलुवों पर प्रेशर देना चाहिए। इस प्रकार से प्रेशर देते वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि जो भाग दबाने पर दर्द कर रहा हो वही भाग इस रोग का केन्द्र बिन्दु होता है।

शियाटिका रोग का उपचार करने के लिए पैर के टखने पर एक प्रमुख केन्द्र बिन्दु होता है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

टखने पर पाए जाने वाले यह केन्द्र बिन्दु बहुत ही नाजुक होते हैं इसलिए इन केन्द्रों पर चित्र के अनुसार प्रेशर रोगी की सहनशक्ति के हिसाब से देना चाहिए और सबसे अच्छा यह रहता है कि टखने के साथ-साथ टखने के आस-पास पाये जाने वाले सभी केन्द्र बिन्दुओं पर भी दबाव दिया जाए।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

शियाटिका के दर्द को रोकने के लिए टांगों के निचले भाग, हाथों तथा पैरों के ऊपर के भाग में पाए जाने वाले बिन्दुओं पर प्रेशर देना चाहिए।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

इस रोग को ठीक करने के लिए इस चित्र के अनुसार हथेलियों के निचले भाग तथा हाथों के अंगूठे तथा पहली अंगुली के पास दबाव देने से दर्द में आराम मिलता है। प्रत्येक बिन्दु पर रोगी की सहनशक्ति के अनुसार कम से कम 2 मिनट तक प्रेशर दे सकते हैं।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

इस चित्र में दिए गए एक्यूप्रेशर बिन्दु के अनुसार रोगी के शरीर पर एक्यूप्रेशर दबाव देकर शियाटिका के दर्द का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से शियाटिका के दर्द से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। इस प्रकार शरीर के भाग पर प्रेशर देने से इस रोग के दर्द से राहत मिल सकती है।

शियाटिका के साथ सहायक प्रतिबिम्ब केन्द्र बिन्दु-

इन सभी दिए गए चित्रों के अनुसार केन्द्र बिन्दुओं पर प्रेशर देने से इस रोग के दर्द से राहत मिल सकती है लेकिन इस रोग के दर्द को दूर करने के लिए इसके कुछ और भी सहायक केन्द्र बिन्दु हैं जो शियाटिका के रोग को दूर करने में सहायक हो सकते हैं।
(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

दिए गए चित्र के अनुसार हाथ की हथेलियों पर प्रेशर देने से इस रोग का दर्द काफी कम हो जाता है और रोगी को शियाटिका रोग से काफी हद तक छुटकारा मिल जाता है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

दिये गये चित्र के अनुसार रोगी की रीढ़ की हड्डी से थोडा सा हटकर प्रेशर देने से शियाटिका के दर्द में काफी आराम मिलता है। यदि किसी रोगी के इस प्रकार के केन्द्रों पर प्रेशर देने से दर्द बढ़ने लगे तो तुरंत ही इन केन्द्रों पर प्रेशर देना बंद कर देना चाहिए।

आंखों की भौहों के ठीक नीचे के केन्द्र बिन्दु पर अगर प्रेशर दिया जाए तो शियाटिका के रोग से छुटकारा मिल सकता है। इन केन्द्रों पर प्रेशर कुछ सेकेण्ड के लिए देना चाहिए।

रविवार, 2 जून 2019

चोरी हुई भगवान राम की अष्टधातु की प्रतिमा को चोर स्वयं लौटाने आया


भगवान राम की अष्टधातु की प्रतिमा को चोर खुद लौटाने आया

बता दें कि, रामजन्मभूमि थाना क्षेत्र के नजरबाग मोहल्ले में स्थित माधुरी कुंज के मंदिर से पांच दिन पहले भगवान राम की मूर्ति चोरी हुई थी। यह मूर्ति 140 साल से यहां थी। मगर, बीते सोमवार की दोपहर मंदिर के गर्भगृह का ताला तोड़कर यह चुरा ली गई। अब शुक्रवार की दोपहर चोर खुद ही मूर्ति लौटाने मंदिर आ गया। मूर्ति वापस मिलने पर महंत राजबहादुर शरण ने कहा कि ये भगवान की दिव्य शक्ति का चमत्कार है। ऐसा कम ही होता है जब इतनी कीमती वस्तु कोई चोर लौटाए।

1898 में बने मंदिर में स्थापित थी 9 इंच की ये प्रतिमा
1898 में बने मंदिर में स्थापित थी 9 इंच की ये प्रतिमा

बकौल राजबहादुर शरण, 'भीष्मपुर स्टेट बख्शी का तालाब लखनऊ द्वारा यह मंदिर वर्ष 1898 में बना। उसी समय मंदिर के गर्भगृह में 3 जोड़ी मूर्तियां स्थापित की गईं। इनमें संगमरमर से बने बड़े युगल सरकार, अष्ट धातु से बने मधु सरकार और राजीव लोचन सरकार की छोटी मूर्तियां विराजमान थीं। मगर, सोमवार की शाम को भगवान की पूजा अर्चना करने के लिए मंदिर के पट खुले तो गर्भगृह में रखी मधु सरकार (राम जी) की 9 इंच की अष्टधातु से बनी एक मूर्ति वहां नहीं दिखी। वह चोरी हो गई।'


डॉग स्क्वायड से खोजा जा रहा था, मगर अब चोर पुलिस की गिरफ्त में
डॉग स्क्वायड से खोजा जा रहा था, मगर अब चोर पुलिस की गिरफ्त में

महंत ने यह भी बताया कि बहरहाल चोर मूर्ति के साथ हिरासत में है। पुलिस तय करेगी कि उस पर क्या कार्रवाई करनी है। बता दें कि, सोमवार को पुलिस को सूचना दिए जाने के बाद एसओजी व डॉग स्क्वायड ने गहन छानबीन की थी। थाना राम जन्मभूमि के एसओ राजेश कुमार गुप्ता ने कहा था कि अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर छानबीन की जा रही है। मगर, अब मामला सुलझ गया है।
  

शुक्रवार, 31 मई 2019


पीएम मोदी ने नोटबंदी करके इस घोटाले को रोक तो दिया, मगर उसके बाद ये बात निकल कर सामने आयी कि देश में बिलकुल असली जैसे दिखने वाले एक ही नंबर के कई नोट चल रहे थे. ये ऐसे नोट थे, जिन्हे पहचानना लगभग नामुमकिन था क्योकि ये उसी कागज़ पर छपे थे जिसपर भारत सरकार नोट छपवाती है.

#खबर के मुताबिक़ डे ला रू जोकि एक ब्रिटिश कंपनी है, इसके साथ मिलकर तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम एक बड़ा खेल खेल रहे थे, जिसमे उनके एडिशनल सचिव अशोक चावला और वित्त सचिव अरविंद मायाराम भी शामिल थे.

*कैसा खेला गया घोटाले का खेल?

*"कहा जा रहा है कि घपले की शुरुआत 2005 में तब हुई जब वित्त मंत्रालय में अरविन्द मायाराम वित्त सचिव के पद पर थे और अशोक चावला एडिशनल सचिव के पद पर थे. कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद 2006 में सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मींटिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड एक कंपनी बनाई गयी, जिसके मैनेजिंग डायरेक्टर अरविंद मायाराम थे और चेयरमैन अशोक चावला थे, यानी दो सरकारी अधिकारी पद पर रहते हुए इस कंपनी को चला रहे थे.

बिना एसीसी के अनुमोदन के एमडी और चेयरमैन की नियुक्ति

**इस प्रकार नियुक्तियों के लिए अपॉइंटमेंट्स कमिटी ऑफ़ कैबिनेट (ACC) के सामने मामले को रखकर उसके अनुमोदन की जरुरत होती है, मगर चिदंबरम ने भला कब नियम-कायदों की परवाह की, जो अब करते, लिहाजा ACC के सामने इन नियुक्तियों का मामला लाया ही नहीं गया और ऐसे ही इनकी नियुक्ति कर दी गयी.

#इसके बाद असली खेल शुरू हुआ. इस घपले में चिदंबरम के दाएं व् बाएं हाथ बताये जाने वाले अशोक चावला व् अरविंद मायाराम ने भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL), जोकि नोटों की छपाई का काम देखती है, उससे कहा कि उनकी कंपनी के साथ मिलकर सिक्योरिटी पेपर प्रिंटिंग के सप्लायर को ढूंढो. जिसके बाद पहले से ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी डे ला रू कंपनी से नोटों की छपाई में इस्तमाल होने वाले सिक्योरिटी पेपर को लेना जारी रखा गया.

क्या इसके लिए चिदंबरम को घूस दी गयी थी इस ब्रिटिश कंपनी द्वारा या पाकिस्तान के आईएसआई द्वारा चिदंबरम को पैसा दिया जा रहा था? ये जांच का विषय है. बहरहाल पहले जानते हैं कि डे ला रू को क्यों बैन किया गया था और पाक आईएसआई का इस घपले में क्या रोल है?

डे ला रू कंपनी का खेल

दरअसल वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान नकली मुद्रा रैकेट का पता लगाने के लिए सीबीआई ने भारत नेपाल सीमा पर विभिन्न बैंकों के करीब 70 शाखाओ पर छापेमारी की, तो बैंकों से ही नकली करेंसी पकड़ी गयी. #जब पूछताछ के गयी तो उन बैंक शाखाओं के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि जो नोट सीबीआई ने छापें में बरामद किये हैं वो तो खुद रिजर्व बैंक से ही उन्हें मिले हैं.

ये एक बेहद गंभीर खुलासा था क्योकि इसके मुताबिक़ आरबीआई भी नकली नोटों के खेल में शामिल लग रहा था! हांलाकि इतनी अहम् खबर को इस देश की मीडिया ने दिखाना जरूरी नहीं समझा क्योकि उस वक़्त कांग्रेस सत्ता में थी.

#इस खुलासे के बाद सीबीआई ने भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में भी छापेमारी की और आश्चर्यजनक तरीके से भारी मात्रा में 500 और 1000 रुपये के जाली नोट पकडे गए. हैरानी की बात ये थी कि लगभग वैसे ही समान जाली मुद्रा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में तस्करी से पहुँचाया जाता था.

अब सवाल उठा कि यह जाली नोट आखिर भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में कैसे पहुंच गए? आखिर ये सब देश में चल क्या रहा था?

*#जांच के लिए शैलभद्र कमिटी का गठन हुआ और 2010 में कमिटी उस वक़्त चौंक गयी जब उसे पता चला कि भारत सरकार द्वारा ही पूरे देश की आर्थिक संप्रभुता को दांव पर रख कर कैसे अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी को 1 लाख करोड़ की छपाई का ठेका दिया गया था!

**जाँच हुई तो पता चला कि डे ला रू कंपनी में ही घपला चल रहा था. एक साजिश के तहत भारतीय करेंसी छापने में इस्तमाल होने वाले सिक्योरिटी पेपर की सिक्योरिटी को घटाया जा रहा था ताकि पाकिस्तान आसानी से नकली भारतीय करेंसी छाप सके और इसका इस्तमाल भारत में आतंकवाद फैलाने में किया जा सके!

*"इस खबर के सामने आते ही भारत सरकार द्वारा डे ला रू कंपनी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. मगर अरविन्द मायाराम ने इस ब्लैकलिस्टेड कंपनी से सिक्योरिटी पेपर लेना जारी रखा. इसकी इजाजत लेने के लिए उसने गृह मंत्रालय से इजाजत ली. कहा गया कि ये फाइल चिदंबरम को दिखाई ही नहीं गयी, जबकि ये बात मानने लायक ही नहीं क्योकि वित्त मंत्रालय से यदि गृहमंत्रालय को कोई भी पत्र भेजा जाता है तो पहले अप्रूवल के लिए वित्तमंत्री के सामने पेश किया जाता है.

क्या है पाक आईएसआई की भूमिका?

#खबर के मुताबिक़ डे ला रू कंपनी से भारत को दिए जाने वाले सिक्योरिटी पेपर के सिक्योरिटी फीचर को कम किया जा रहा था, ये कंपनी पाकिस्तान के लिए भी सिक्योरिटी पेपर छापने का काम करती है. जिसके बाद ये आरोप लगे कि इस कंपनी द्वारा भारत का सिक्योरिटी पेपर पाकिस्तान को गुपचुप तरीके से दिया जा रहा था ताकि भारत के नकली नोट छापने में पाक को आसानी हो.

यहाँ पाक आईएसआई का नाम सामने आया कि आईएसआई की ओर से कंपनी के कर्मचारियों को घूस दी जाती थी. मगर इस खेल में अरविंद मायाराम क्यों शामिल थे? क्यों वो ब्लैकलिस्टेड कंपनी से पेपर लेते रहे?

मोदी सरकार ने लिया एक्शन

जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी, तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ये बात पता चली की इतना बड़ा गोलमाल चल रहा था. इसके बाद उन्होंने सिक्योरिटी पेपर डे ला रू कंपनी से लेना बंद करवाया. ये भी सामने आया कि इस कंपनी से सिक्योरिटी पेपर काफी महंगे दाम पर खरीदा जा रहा था, यानी ये कंपनी देश को लूट रही थी और देश का वित्तमंत्रालय इस काम में विदेशी कंपनी की मदद कर रहा था!

मायाराम के इस कालेकारनामे की खबर पीएमओ को हुई तो पीएमओ ने गंभीरता पूर्वक इस मामले को उठाया और मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा इसकी जांच करवाई. मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा वित्तमंत्रालय से इससे जुडी फाइल मांगी गयी. इस वक़्त वित्तमंत्री अरुण जेटली बन चुके थे, मगर इसके बावजूद वित्तमंत्रालय द्वारा फाइल देने में देर की गयी.

इसके बाद ये मामला पीएमओ से होता हुआ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संज्ञान में आया और फिर मोदी ने खुद एक्शन लिया तब जाकर मुख्य सतर्कता आयुक्त के पास फाइल पहुंची. क्या जेटली ने फाइलें देने में देर करवाई या फिर कोंग्रेसी चाटुकारों ने जो वित्तमंत्रालय तक में बैठे हैं? ये बात साफ़ नहीं हो पायी.

नोटबंदी ना करते मोदी तो नकली करेंसी का ये खेल चलता ही रहता. डे ला रू से सिक्योरिटी पेपर लेना बंद किया गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने और पीएम मोदी ने की नोटबंदी, जिसके कारण पाकिस्तान द्वारा नकली करेंसी की छपाई बेहद कम हुई और यही कारण है कि कांग्रेस के दस वर्षों में आतंकवादी घटनाएं जो आम हो गयी थी, वो मोदी सरकार के काल में ना के बराबर हुई.

कश्मीर के अलावा देश के किसी भी राज्य में बम ब्लास्ट नहीं हो पाए. आतंकियों तक पैसा पहुंचना जो बंद हो गया था. पीएम मोदी ने जांच करवाई और मायाराम के खिलाफ मुख्य सतर्कता आयुक्त और सीबीआई द्वारा आरोप तय किये गए.

आपको यहाँ ये भी बता दें कि जिस मायाराम के खिलाफ चार्ज फ्रेम किये गए हैं, उसी को राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनते ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने आर्थिक सलाहकार के पद पर नियुक्त कर लिया. यानी एक घपलेबाज को अपना आर्थिक सलाहकार बना लिया.

वहीँ अशोक चावला का नाम चिदंबरम के एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में भी सामने आया. जिसके बाद ने नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड के बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर्स के चेयरमैन व पब्लिक इंटरेस्‍ट डायरेक्‍टर पद से अशोक चावला को इस्तीफा देना पड़ा.

जुलाई 2018 में सीबीआई ने चिदंबरम को एयरसेल-मैक्सिस मामले में आरोपी बनाया था। सीबीआई ने चिदंबरम, उनके बेटे कार्ति और 16 अन्‍य के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी, जिसमें आर्थिक मामलों के पूर्व केंद्रीय सचिव अशोक कुमार झा, तत्‍कालीन अतिरिक्‍त सचिव अशोक चावला, संयुक्‍त सचिव कुमार संजय कृष्‍णा और डायरेक्‍टर दीपक कुमार सिंह, अंडर सेक्रेटरी राम शरण शामिल हैं।

इस पूरे मामले से ये बात तो साफ़ हो जाती है कि चिदंबरम ने देश में केवल एक या दो नहीं बल्कि जहाँ-जहाँ से हो सका, वहां-वहां से देश को लूटा. चदम्बरम व् उसके बेटे कार्ति चिदंबरम ने मिलकर खूब लूटा और इस खेल में ना केवल नौकरशाह शामिल रहे बल्कि न्यायपालिका में भी कई चिदंबरम भक्त बैठे हैं, जो आज भी उसे जेल जाने से बचाते आ रहे हैं.

कहा जा रहा है कि सभी में लूट का माल मिलकर बंटता था और यदि चिदंबरम जेल गए तो सीबीआई व् ईडी की कम्बल कुटाई उनसे एक दिन भी नहीं झेली जायेगी और वो सब उगल देंगे. यदि ऐसा हुआ तो सभी जेल जाएंगे. यही कारण है कि चिदंबरम को हर बार अग्रिम जमानत दे दी जाती है.

मगर ये भी तय माना जा रहा है कि यदि मोदी इस बार भी चुनाव जीतकर पीएम बन गए तो चिदंबरम का जेल जाना तय है और फिर कई अन्य गड़े मुर्दे भी बाहर आएंगे. देश को कैसे-कैसे और किस-किस ने लूटा, सबको एक-एक करके सजा होगी. कोंग्रेसी चाटुकार नौकरशाहों समेत माँ-बेटे व् कई कोंग्रेसी नेता सलाखों के पीछे पहुंचेंगे.

भारत की संस्कृति कैसे विश्व को बिनास से बचा सकती है?

आचार्य कुमारिल भट्ट  ~~~

भारतीय वैदिक इतिहास में कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य जी दोनों ही वेदों के परमोद्धारक हुए।

कुमारिल ने कर्मकांड पर किये जाने वाले आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर तथा भगवान् शंकर ने ज्ञानकाण्ड के आक्षेपों का समाधान किया।

कुमारिल की जन्मभूमि के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।
तिब्बती विद्वान तारानाथ जी ने इन्हें बौद्ध पण्डित धर्मकीर्ति का चाचा बताया है।

कुछलोग कहते है इनका जन्म दक्षिण भारत के "त्रिमलयक" नामक स्थान में हुआ, किन्तु इसमें संदेह है।

आनंद गिरी जी ने अपने दिग्विजय में इनका जन्म उद्ग्देश (उत्तर भारत) में बताया है ।
उद्ग्देश कश्मीर या पंजाब हो सकता है।

पूर्व मीमांसक सालिकनाथ ने इन्हें वार्तिककार भिक्षु कहा है, यह उपाधी उत्तर भारतीय ब्राह्मणों में ही पायी जाती है।
सालिकनाथ कुमारिल से ३०० वर्ष बाद पैदा हुए।

मिथिला के लोग इन्हें मैथिल ब्राह्मण कहते हैं।

कुमारिल धनाढ्यतम गृहस्थ थे। पांच सौ दास तथा दासियां थीं। चूड़ामणि देश के राजा के कुलगुरु थे।

बौद्ध दर्शन के विद्वान धर्मकीर्ति के साथ शास्त्रार्थ तथा उनके हारने की बात आती है।
धर्मकीर्ति त्रिमलय के निवासी थे, यह कुमारिल के पास वेदाध्ययन करने गये किन्तु बौद्घ समझकर इनको नहीं पढ़ाया।

तब ये दास के रूप में उनके घर में रहने लगे। वे इनकी परम् श्रद्धा से इतनी सेवा करने लगे कि पचास आदमी मिलकर भी इतनी सेवा नहीं कर सकते थे।

कुमारिल इनकी सेवा से इतने प्रभावित हुए कि इनको ब्राह्मण विद्यार्थियों के साथ दर्शन शास्त्र सुनने की आज्ञा मिली।

इन्होंने वैदिक दर्शनों के रहस्यों को अतिशीघ्र जान लिया।
तब वह अपने वास्तविक रूप में आये और ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। इन्होंने अनेकों दार्शनिकों को परास्त किया।

तब कुमारिल से शास्त्रार्थ किया, कुमारिल भट्ट भी परास्त हो गये।

इससे क्षुब्ध होकर कुमारिल ने बौद्धों को परास्त करने के उद्दयेश्य से बौद्ध भिक्षु का रूप धारण किया तथा बौद्ध सिद्धांतो का खंडन करने के लिए बौद्ध बनकर उनके शास्त्रों का अध्ययन करने लगे।

श्री शंकराचार्य जी से भी कुमारिल ने कहा था ---- " मैं बौद्घ धर्म की धज्जियां उड़ाना चाहता हूं इसीलिए बौद्घ भिक्षु हुआ।"

उस समय धर्मपाल नामक बौद्घ भिक्षु की कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी, वे बौद्घ धर्म के नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यक्ष थे।

क्षणिकविज्ञानवादी होने पर भी उन्होंने योगाचार्य तथा शून्यवाद के मौलिक ग्रन्थों पर पांडित्यपूर्ण टिकाएं लिखी है।
अतः कुमारिल ने धर्मपाल से ही बौद्ध दर्शनों का अध्ययन किया।

एक दिन धर्मपाल ने शिष्यों के प्रति बौद्ध सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए वेदों की घोर निंदा की।

इस निंदा को सुनकर बौद्ध भिक्षु के रूप में बैठे हुए कट्टर वैदिक धर्मावलम्बी कुमारिल के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा।

निकट बैठे हुए भिक्षुओं ने देखा और धर्मपाल को बताया।

धर्मपाल एक बौद्ध भिक्षु को वेदों की निंदा सुनकर आँसू बहाते देखकर आश्चर्य में पड़ गए, तथा पूछा--- "तुम क्यों रोते हो?, क्या वेदनिन्दा सुनकर रोते हो ?"

कुमारिल ने कहा---- "हाँ, यही कारण है। आप वेदों के रहस्यों को बिना जाने ही मनमानी निंदा करते हो।"

इस घटना से कुमारिल का सच्चा रूप प्रगट हुआ। धर्मपाल रुष्ट हुए, इनको हटाने के लिए कहा। परन्तु दुष्ट विद्यार्थियों ने इन्हें वैदिक ब्राह्मण समझकर नालन्दा के ऊँचे शिखर से नीचे गिरा दिया।

वेद विश्वासी कुमारिल जी ने अपने को असहाय जानकर वेदों की शरण ग्रहण की।
राजभवन से नीचे गिरते हुए वह कहने लगे-----

"पतन् पतन् सौधतलान्यरोरुहम्,
यदि  प्रमाणो  श्रुतयो  भवन्ति   ।
जीवेम यास्मिन् पतितोऽसम स्थले
मज्जीवनेतत्श्रुतिमानता गति: ।।

यदीह    सन्देहपदप्रयोगाद्
व्याजेन शास्त्र श्रवणाच्च हेतो:।
ममोच्चदेशात् पतताव्यनंक्षीत्
तदेकचक्षुर्विधिकल्पना  सा ।।"

(यदि श्रुतियाँ प्रमाण है तो इस विषम स्थल पर गिरने से भी मैं जीवित रहूंगा। अर्थात श्रुतियों का प्रमाण ही मेरे जीवन का एकमात्र गति है।
यदि श्रुतियां ही प्रमाण है तो मेरे जीवन की रक्षा होगी , यदि प्रमाण नहीं है तो जीवन की रक्षा नहीं होगी। इसमें संदेहसूचक "यदि" शब्द का प्रयोग करने के कारण मेरा एक नेत्र नष्ट हो गया।)

कुमारिल तथा शंकराचार्य का चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दर्शनों का गम्भीर अध्ययन था, इतना अन्य दार्शनिकों को नहीं था।

इन दोनों की सामर्थ्य केवल संस्कृत ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं थी, किन्तु इन्होंने पाली के ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था।
इन बातों की पुष्टि माधव कृत दिग्विजय के सातवें सर्ग से होती है।

भगवान शंकराचार्य के समान इन्होंने भी दिग्विजय किया था। उत्तर भारतीय पंडितों को पराजित करने के अनन्तर दक्षिण भारत गये।

कुछ लोगों के मतानुसार वहां पर सुधन्वा राजा राज्य करते थे, इनकी राजधानी उज्जैनी थी, जिसका आजकल पता नहीं चलता।

वे वैदिक धर्मानुयायी होने पर भी जैनियों के पंजे में पड़े थे। कुमारिल दिग्विजय करते हुए उनके राज-दरबार में गये।

ज्ञान के भंडार वेद कूड़े में पड़े हुए थे, वैदिक ब्राह्मणों की निंदा हो रही थी, सुधन्वा को भी वेद में अनास्था हो गई थी, परन्तु रानी की अभी भी वेदों में निष्ठा थी। खिड़की पर बैठी रानी चिंता कर रही थी----

"किं करोमि क्व गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति ।"
(मैं क्या करूँ ?, कहाँ जाऊं ?, वेदों का उद्धार कौन करेगा ?)

कुमारिल मार्ग से जा रहे थे। रानी की हीनता भरी पुकार सुनकर खड़े हो गए तथा उच्च स्वर में कहा-----

"मा विषीद वरारोहे भट्टचार्योऽस्मि भूतले।।"
(हे रानी ! खेद मत करो , मैं भट्टाचार्य पृथ्वी पर विद्यमान हूँ।)

और यह कार्य उन्होंने कर दिखाया।

इन्होंने "जैमिनीय पूर्वमीमांसा" पर लिखे गए "शवरस्वामी"  के सुप्रसिद्ध भाष्य पर वार्तिक लिखा है। यह तीन भागों में है---

१.. श्लोक वार्तिक-----     

इसमें तीन हजार निन्यानबे अनुष्टुप्छन्द के श्लोक है। यह ग्रँथ चौखम्बा सीरीज काशी से पार्थ सारथी मिश्र की न्यायरत्नाकर टीका सहित प्रकाशित हुआ है। डॉ. गंगनाथ झा ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है, यह अंग्रेजी अनुवाद "एशियाटिक सोसायटी बंगाल" से प्रकाशित है।

२.. तंत्र वार्तिक----- 

इसके प्रथम अध्याय के दूसरे पाद से लेकर तीसरे अध्याय के अंत तक गद्य व्याख्या है। इसमें भट्टपाद की तार्किकता प्रकट होती है। यह ग्रँथ "आनंदाश्रम पूना" से पांच भागों में प्रकाशित हुआ है।

३.. टुप टीका----

यह बहुत छोटा ग्रँथ है। इसमें चौथे अध्याय से लेकर बाहरवें अध्याय तक के शवर भाष्य पर गद्यात्मक संक्षिप्त टिप्पणियां है।

कृष्णदेव ने "तंत्र चूड़ामणि" में इनकी दो अन्य टीकाओं का भी उल्लेख किया है---

१.. वृहत् टीका  
 २.. मध्यम टीका
 ३... "मानव कल्पसूत्र" पर इनकी टीका।
"शिवमहिम्न स्तोत्र" पर भी इन्होंने टीका किया है।

इनके अनेकों विद्वान मीमांसक शिष्य थे, जिनके प्रचार-प्रसार से भारत में धार्मिक क्रांति आरम्भ हुआ। जिसमें तीन प्रधान थे----

१... प्रभाकर------ इन्होंने मीमांसा के नवीन मत को जन्म दिया, इनका मत "गुरुमत" कहा जाता है। यह कुमारिल के प्रथम शिष्य थे, गुरुजी ने प्रसन्न होकर इन्हें गुरु की उपाधि दी थी, तबसे इनका मत "गुरुमत" नाम से प्रचलित हुआ।

परन्तु आजकल के संशोधकों को इसमें संदेह है। नवीन संशोधक प्रभाकर को कुमारिल से भी प्राचीन मानते हैं। इन्होंने अपने स्वतन्त्र मत का प्रचार करने के लिए शावर भाष्य पर "वृहती" तथा "लाघ्वी" नाम की टीकाएँ की है। जो अप्रकाशित है।

२... मण्डन मिश्र-----  इन्होंने भगवान् शंकराचार्य जी की शिष्यता स्वीकार किया था, इनका चरित्र इस पेज पर पोस्ट किया जा चुका है।

३...  उम्बेक (भवभूति)----- 

यह बात सप्रमाण सिद्ध हो चुका है कि भवभूति कुमारिल के शिष्य थे। 

श्री शंकर पांडुरंग पण्डित को "मालती माधव" नाम की एक प्राचीन हस्तलिखित पुस्तक मिली, जिसके तीसरे अंक के अंत में कुमारिलशिष्य द्वारा विरचित लिखा है।
 
तथा छठे अंक के अंत में कुमारिल के प्रसाद से वाग्वैभव को प्राप्त करने वाले उम्बेकाचार्य की कृति कही है।
इससे सिद्ध होता है कि भवभूति का एक नाम उम्बेक भी था।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...