मंगलवार, 13 अगस्त 2019

राम के वंशज का यह देश अपने पूर्वजों को भूल चुका है आज इसकी यथार्थ से परिचित होने के लिए अपने पुराणों का सहारा लेना पड़ेगा जिसमें अभी भी विकृति नहीं


भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।
राम ने कुश को दक्षिण कौशल, कुशस्थली (कुशावती) और अयोध्या राज्य सौंपा तो लव को पंजाब दिया। लव ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। आज के तक्षशिला मेँ तब भरत पुत्र तक्ष और पुष्करावती (पेशावर) मेँ पुष्कर सिंहासनारुढ़ थे। हिमाचल में लक्ष्मण पुत्रों अंगद का अंगदपुर और चंद्रकेतु का चंद्रावती में शासन था। मथुरा में शत्रुघ्‍न के पुत्र सुबाहु का तथा दूसरे पुत्र शत्रुघाती का भेलसा (विदिशा) में शासन था।

राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।
राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बड़गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह राजपूतों का वंश चला।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लवपुरी नगर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं।

कुश के वंशज कौन?
राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।

कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।

इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। माना जाता है कि जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं।

तो यह सिद्ध हुआ कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कछवाह), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वे सभी भगवान प्रभु श्रीराम के वंशज है। जयपूर राजघराने की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे।

इस घराने के इतिहास की बात करें तो 21 अगस्त 1921 को जन्में महाराज मानसिंह ने तीन शादियां की थी। मानसिंह की पहली पत्नी मरुधर कंवर, दूसरी पत्नी का नाम किशोर कंवर था और माननसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से की थी। महाराजा मानसिंह और उनकी पहली पत्नी से जन्में पुत्र का नाम भवानी सिंह था। भवानी सिंह का विवाह राजकुमारी पद्मिनी से हुआ। लेकिन दोनों का कोई बेटा नहीं है एक बेटी है जिसका नाम दीया है और जिसका विवाह नरेंद्र सिंह के साथ हुआ है। दीया के बड़े बेटे का नाम पद्मनाभ सिंह और छोटे बेटे का नाम लक्ष्यराज सिंह है। साभार वेबदुनिया
  #श्रीराम_जी_के_वंशज_हैं_रघुवंशी_सूर्यवंशी  #रघुवंशी :- रघुवंशी (इक्षवाकु) राजवंश (1000 ईपू. से 364 ईपू. तक) यह भारत का प्राचीन क्षत्रिय कुल है जो भारतवर्ष के सभी क्षत्रीय कुलों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकुल माना जाता है ऐतिहासिक दृष्टि से रघुकुल मर्यादा, सत्य, चरित्र, वचनपालन, त्याग, तप, ताप व शौर्य का प्रतीक रहा है अयोध्या के सूर्यवंशी सम्राट रघु ने इस वंश की नींव रखी थी रघुवंशी का अर्थ है रघु के वंशज।

अर्थात :- सम्राट रघु के वंशज रघुवंशी कहलाते है बौद्ध काल तक रघुवंशियो को इक्ष्वाकु, रघुवंशी तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाता था मूलरुप से यह वंश भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रारम्भ हुआ था जो सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, ककुत्स्थ वंश व रघुवंश नाम से जाना जाता है आदिकाल में ब्रह्मा जी ने भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को पृथ्वी का प्रथम राजा बनाया था।

भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनु जी सूर्यवंशी कहलाये तथा इनसे चला यह वंश सूर्यवंश कहलाया अयोध्या के सूर्यवंश में आगे चल कर प्रतापी राजा रघु हुये राजा रघु से यह वंश रघुवंश कहलाया इस वंश मे इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ, हरिश्चंद्र, मांधाता, सगर, भगीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी राजा हुये हैं रघुवंशियों के कुछ राजाओं कावर्णन रघुवंशकाव्य में दिया गया है।

भारत का इतिहास 700 ई॰पू॰ से प्रमाणिक व सतत् रूप से प्राप्त होता है इस समय का विवरण अष्टाध्यायी सूत्र,अंगूतर निकाय, भगवती सूत्र आदि गृंथो में मिलता 700 ई॰पू॰ में भारत जनपदों में बँटा था इस समय भारत में १६ महाजनपद और इनके अंतर्गत बहुत से छोटे छोटे जनपद थे।

इनमें अवंती, मगध, वत्स और कौशल महाजनपद प्रमुख थे कौशल जनपद पर इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी राजा राहुल (महाकौशला) का शासन था राजा राहुल महाकौशला ने काशी, लुम्बनी, कपिलवस्तु, कौलिय आदि राज्यों को जीत कर एक विशाल सामृाज्य की स्थापना की थी।

कौशल राज्य की राजधानी साकेत (अयोध्या) थी साकेत
(अयोध्या), श्रावस्ती व वाराणसी कौशल राज्य के प्रमुख नगर थे साकेत(अयोध्या) व श्रावस्ती दोनो नगर चारो ओर से चौड़ी चौड़ी दीवारों से घिरे थे चारो दिशाओ में बड़े बड़े दरवाजे थे दरवाजे बड़े बड़े चोड़े व ऊँचे थे जिन पर सुन्दर नक्काशी थी नगरो में चौड़े चौड़े मार्ग थे।

जब रघुवंशी क्षत्रिय हाथी घोड़ो पर सवार होकर इन मार्गो पर निकलते थे तो रघुवंशी क्षत्रियों का वैभव देखते ही बनता था इस समय के साहित्य में कौशल राज्य के वैभव का जो वर्णन मिलता है वह इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी क्षत्रियों के उत्कर्ष की कहानी को व्यक्त करता है।

जो यह बताने के लिये काफी है कि कौशल जनपद पर रघुवंशी क्षत्रिय का शासन बहुत पहले से रहा है महाकौशला के बाद प्रसेनजित, क्षुदृक, रणक, सुरथ, सौमित्र कौशल(अयोध्या) के राजा हुये सौमित्र कौशल(अयोध्या) के अंतिम रघुवंशी राजा थे मगध (नंदवंश) के शासक महापदमनंद ने सौमित्र को हराकर रघुवंशी किंगडम को समाप्त कर दिया था।
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गुरुवार, 8 अगस्त 2019

भारत में कई ऐसी चिकित्सा प्रणाली जो अब विलुप्त सी हो चुकी है उसी में यह सुर्य चिकित्सा या रंग चिकित्सा भी है



सूर्य चिकित्सा एक बहुत पुरानी प्राकृतिक रासायनिक तत्त्वों वाली चिकित्सा है। सूर्य स्नान, सतरंगी किरणों के सातो रंग, लाल, हरे एवं नीले रंगों के गुण ही इस चिकित्सा की मुख्य विशेषताएँ हैं। सूर्य की किरणें एवं इसके सात रंगों द्वारा हमारे शरीर को लाभ देने की उत्तम एवं लाभकारी तकनीक है। सूर्य की किरणों के सातों रंग हरेक रोग में सफल इलाज के अतिरिक्त रोगी को तंदुरस्ती प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसीलिए ‘क्रोमोपैथी’ हानिरहित, बिना लागत, प्राकृतिक रासायनिक तत्त्व सूर्य देव के अमूल्य आशीर्वाद से सुसज्जित है। इस पुस्तक में सूर्य चिकित्सा द्वारा आसान तरीके से विभिन्न रोगों के उपचार बताए गए हैं। एक साधारण व्यक्ति भी इस निःशुल्क चिकित्सा से लाभ प्राप्त कर सकता है।
 सूर्य किरण चिकित्सा एवं इसका महत्व
महर्षि चरक जी आयुर्वेद के मर्मज्ञ ज्ञानी थे। इसके अलावा वह सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। उन्होंने सूर्य किरण तथा रंग चिकित्सा का बड़ी ही विस्तार से वर्णन किया है। उन्हीं के आशीर्वाद से उनका दर्शन, विचार, सांख्य दर्शन ही हमारा प्रतिनिधित्व करता है।
बहुत से रोगों का इलाज खान-पान से जैसे अंकुरित चना, ताजे फल, हरी सब्जियां लेने से ही हो जाता है। चिकने और मसालेदार वस्तुओं को अपने भोजन में से हटा देने से, विश्राम, व्यायाम (टहलना), विशेष व्यायाम जैसे व्यायाम आदि करने से तथा वायु परिवर्तन आदि से हो जाता है। मेरा तो एक ही फर्ज है कि रोगी को पीड़ा से मुक्ति मिले। रोग दूर हों व हर मनुष्य सुखी जीवन जी सकें।
इस किताब को लिखने का उद्देश्य केवल रोगियों को निरोगी बनाने का ही है तथा समाज के कल्याण के लिए सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के बारे में जाग्रत करना है।
सूर्य किरण और रंग चिकित्सा
क्रोमोपैथी क्या है ?
   सूर्य किरण और रंग चिकित्सा एक पुरानी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है। जिसके अन्तर्गत आयुर्वेद पद्धति के मूल सिद्धान्त वात, पित्त तथा कफ की तरह ही शरीर में रंगों के घटने-बढ़ने से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। रोग ज्ञात होने पर जिस रंग की शरीर में कमी हो उस रंग के पूर्ण हो जाने पर रोगों से छुटकारा पाया जाता है। इन रंगों की उत्पत्ति के मूल स्रोत भगवान सूर्य स्वयं हैं। सूर्य की तेजस्वनी किरणें भिन्न-भिन्न रंगों को लिये हुए होती हैं। जिनको उसी रंग की पारदर्शी बोतलों में जल के द्वारा अवशोषित किया जाता है।
जिस रंग की बोतल होती है उसमें भरे जल में सूर्य की किरणें उसी रंग के चिकित्सकीय गुण छोड़ देती है। जिसके कारण वह जल साधारण चल न होकर एक औषधि के रूप में तैयार हो जाता है। यद्यपि यह जल दिखने में साधारण ही लगता है परन्तु जिस रंग की बोतल में यह सूर्य की रोशनी में चार्ज किया हुआ होता है उस रंग के पूर्ण चिकित्सकीय गुण इसमें समाहित होते हैं।
यह चिकित्सा सभी जगह सुलभ व निःशुल्क प्राप्त होती है। जिसके प्राप्त करने में किसी भी व्यक्ति को कोई कठिनाई नहीं होती है। इस चिकित्सा से असाधारण से असाधारण रोग भी ठीक किए जा सकते हैं। इसके लिए रोगी को अपने मनोबल और चिकित्सा पर विश्वास कायम रखना चाहिए।

सूर्य किरण और रंग चिकित्सा (क्रोमोथेरेपी) की उपयोगिता

महर्षि आचार्य चरक के अनुसार जिस संगति में सभी औषधियाँ एक संग रहती हैं वह सूर्य किरण और रंग चिकित्सा ही है। इस पद्धति की औषधियों के माध्यम से सभी रोगों से बड़ी आसानी से मुक्ति मिल जाती है।
1. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से औषधि बनाने की विधि एकदम सरल है। उसी प्रकार सूर्य तप्त तथा सूर्य चार्ज से बनने वाली औषधियों को बनाने की विधि भी एकदम सरल है।
2. इस पद्धति से उपचार करते समय न तो दर्द होता है और न किसी प्रकार का कोई कष्ट होता है ।
3. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से इस पद्धति में जहरीला प्रयोग नहीं होता और न ही बुरा प्रभाव (रियैक्शन) पड़ता है।
4. इस पद्धति में बेहोश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही चीर-फाड़ करने की आवश्यकता होती है।
5. उसी प्रकार जख्म और घाव का निशान तक नहीं पड़ता है। सूर्य की किरणों में रोगों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है।

सूर्य किरणों में सात रंगों के गुण

1. बैगनी (Violet):

शीतल, लाल कणों का वर्धक, क्षय रोग का नाशक है तथा विविधता का प्रतीक है।

2. गहरा नीला (Indigo) :

शीतल, पित्त रोगों का नाशक, ज्वर नाशक तथा शान्ति प्रदान करने वाला है। सूर्य शरीर को निरोगिता प्रदान करता है।

3. आसमानी (Blue) :

शीतल, पित्त रोगों का नाशक तथा ज्वरनाशक, आशा का प्रतीक होता है।

4. हरा (Green) :

समृद्धि और बुद्धि का प्रतीक है। समशीतोष्ण, वात रोगों का नाशक और रक्त शोधक है। ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति और शीतलता का प्रतीक होता है।

5. पीला (Yellow) :

यश तथा बुद्धि का प्रतीक होता है। ऊष्ण, कफ, रोगों का नाशक, हृदय और पेट रोगों नाशक होता है। संयम, आदर्श, परोपकार का प्रतीक होता है।

6. नारंगी (Orange) :

आरोग्य तथा बुद्धि का प्रतीक है। ऊष्ण, कफ रोगों का नाशक मानसिक रोगों में शक्तिवर्धक है तथा दैवी महत्वाकांक्षा का प्रतीक होता है।

7. लाल (Red) :

प्रेम भावना का प्रतीक होता है। अति गर्म, कफ रोगों का नाशक, उत्तेजना देने वाला और केवल मालिश के लिए उत्तम होता है।
आप की गाड़ी में हीटर पर लाल एवं ठंडक पर नीला निशान क्यों ? जी है, यह क्रोमोपैथी ही है।

रंग के तीन परिवारों का महत्त्व

1. पीला, नारंगी लाल—इन तीनों रंगों में से नारंगी रंग ही ठीक रहता है।
2. हरा रंग—यह रंग शीतोष्ण होने के कारण सबसे उत्तम होता है।
3. बैंगनी रंग, गहरा नीला रंग और आसमानी नीला रंग इन तीन रंगों में गहरा नीला रंग ही ठीक रहता है।

2.
रोगी के दोष के अनुसार रंगों द्वारा चिकित्सा
नीले रंग के गुण धर्म

पित्त दोषों में शरीर में गर्मी बढ़ जाती है। इसका सन्तुलन नीले रंग की ठंडक देने वाला सूर्य तप्त नीले पानी और सूर्य चार्ज वायु आदि से होता है। यह हर प्रकार के पित्त जन्य प्रधान रोगों को दूर करता है तथा शान्तिवर्धक है। संदल, कासमी, संतरा, नीबू, क्लोरोफार्म, हाइड्रोजन, अल्युमिनिय, नीलम आदि में नीले रंग की किरणों के तत्व समाए होने के साथ-साथ ही चुम्बकीय शक्ति भी विद्यमान हैं।
1. सूर्य चार्ज नीली बोतल का पानी सारे शरीर को ठण्डक देने वाला होता है।
2. शरीर की अग्नि को कम करता है। तेज बुखार को कम करता है। ज्वर में ज्यादा प्यास लगने को संतुलित करता है। प्यास बुझाता है। चोट के कारण बहने वाले खून को बंद करता है।
3. सूर्य चार्ज किए नीले तेल को सिर में, तालू और कनपटी पर मालिश करने से सिर दर्द ठीक हो जाता है और बुखार भी कम हो जाता है।
4. दस्त तथा खूनी पेचिश में प्रयोग करने से यकीनन आराम आ जाता है।
5. गर्मी से शरीर पर दाने, चेहरे के कील-मुहासे, फोड़े-फुंसी आदि होने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल से ठीक हो जाते हैं और अच्छा लाभ होता है।
6. मच्छर, बिच्छू तथा ततैया आदि के काटने पर सूर्य चार्ज नीला तेल लगाने से तुरन्त फायदा होता है।
7. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा से तैयार नारियल के नीले तेल को लगाने से तुरन्त लगाने से जल जाने की जगह पर तुरन्त आराम आ जाता है। फफोला भी नहीं पड़ता। नीला तेल लगाना बहुत लाभकारी है।
8. टांसिल बढ़ने पर सूर्य तप्त नीले पानी से गरारे करें और सूर्य चार्ज नीली ग्लिसरीन का गले में लेप करने से लाभ मिलता है।
9. दांत दर्द, मसूड़ों की सूजन, दांतों में भोजन या पानी गर्म-सर्द लगना तथा मुंह में छालों के पड़ने पर सूर्य तप्त नीले पानी से गरारे करें और सूर्य चार्ज नीली ग्लिसरीन का मुंह में लेप करने से तुरन्त आराम मिलता है।
10. बच्चों का काग लटकने (घिन्डी) पर सूर्य चार्ज ग्लिसरीन मुंह में लगाने से कुछ ही दिन में आराम आ जाता है।
11. कील-मुहासे, फोड़े-फुंसियां और सूजन हो जाने पर सूर्य चार्ज नीला तेल लगाने से लाभ मिलता है।
12. कान में दर्द होने पर सूर्य चार्ज नारियल का तेल हल्का गर्म करके कान में डाला जाए तो तुरन्त आराम आ जाता है।
13. तेज बुखार में अर्थात एक सौ एक डिग्री से ज्यादा अगर बुखार हो जाए तो सिर में, तालू पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की धीर-धीरे मालिश करने से और पीने के लिए सूर्य तप्त नीला पानी देने से रोगी को लाभ होता है। लेकिन अगर एक सौ एक डिग्री से कम बुखार हो तो नीला पानी बंद कर दें और सूर्य तप्त हरा पानी देने से लाभ होता है।
14. स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) के उत्तेजित होने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की सिर पर, तालू में हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे मालिश करने से शांति मिलती है।
15. बवासीर के मस्सों या अर्श पर सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल कुछ दिन लगाने से बहुत लाभ होता है।
16. बच्चों के दांत निकलने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की तालू पर तीन-चार बूँदें डाल कर हाथ की अगली पोरों से मालिश करने से बच्चों के दांत आसानी से निकल आते हैं।
17. दिमागी काम करने वालों के लिए सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की तालू पर हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे दस-पन्द्रह मिनट मालिश करें। यह दिमाग के लिए बहुत अच्छी औषधि है।
18. तेज ज्वर में सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की सिर पर मालिश करने से तेज ज्वर में फायदा होता है।
19. सूखी खुजली, दाद-खाज आदि पर सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल लगाने से ठण्डक और शांति मिलती है।
20. सूर्य चार्ज नीले तेल से तैयार की हुई दवाई सब प्रकार की ठण्डक देने वाली दवाइयों से सर्वश्रेष्ठ होता है।
21. जो लोग नींद की गोली खाकर नींद लेते हैं वे अब सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल सिर में तालू पर लगाकर हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे मालिश करने से गहरी व मीठी नींद का आनन्द ले सकते हैं।

शनिवार, 3 अगस्त 2019

धर्म ग्रंथ जो राष्ट्र को समृद्धि सशक्त और श्रेष्ठता पाठ पढ़ा कर पुरुषार्थ को जागृत करते हैं श्रेष्ठ ज्ञान का समन्वय हमारे धर्म ग्रंथों में है इसरो और नासा के खगोल वैज्ञानिक श्री ओम प्रकाश पांडे जी


रुद्राष्टाध्यायी का एक पूरा अध्याय
जो सेना को समर्पित है

यजुर्वेद में सबसे प्रभावशील देवता हैं - रुद्र । रुद्रदेवता
से  सम्बन्धित कुछ चुने  हुए मंत्रों से 'रुद्राष्टाध्यायी' का गठन हुआ है जिसका घर - घर में पूजाभाव से सस्वर पाठ किया जाता है। कई बटुकों को आज भी सम्पूर्ण 'रुद्राष्टाध्यायी' कंठस्थ होती है । 'रुद्राष्टाध्यायी'  में आठ अध्याय हैं । तीसरा अध्याय राष्ट्र की  सेना और सेनापति को समर्पित है । इस तीसरे अध्याय में  सत्रह मंत्र हैं , जो  वाजसनेयी शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अध्याय 17  ( कंडिका 33 से 49 )  से लिये गये हैं ।आश्चर्य की बात केवल यह कि रुद्राष्टाध्यायी का पाठ जिन्हें आरोह -अवरोह के साथ कंठस्थ होता है ,वे भी इन मंत्रों के अर्थ की गम्भीरता से प्राय: परिचित नहीं होते। अर्थ ज्ञात न हो , तो मंत्र का प्रभाव कैसे जागृत हो।
आशु: शिशानो वृषभो न भीमो
घनाघन: क्षोभणश्चर्षषणीनाम्।
संक्रन्दनो  निमिष ऽ एक वीर:
शत सेनाऽअजयत्साकमिन्द्र:।।
_____________________
शुक्लयजुर्वेद.17.33.1
एक ही वीर सेनापति हो ,
जो भयानक सिंह की तरह दहाड़ कर
टूट पड़े शत्रुओं पर ।
एक ही सेनानायक हो ऐसा
कि हम विजयी हों ,
और काँपने लगे शत्रु की सेना।।1।
योद्धाओं ! शस्त्र उठाओ ,
अपना पराक्रम दिखाओ रणभूमि में ।
शत्रुओं का संहार करो
और विजय-पताका फहरा दो।।2।।
हे सेनानायक !
वीर सैनिकों के साथ प्रयाण करो ।
शत्रुओं को बलपूर्वक 
अपने वश में कर डालो ,
और राष्ट्र की रक्षा करो ।।3।।
अमर्त्य वीरपुत्रों !
तुम रिपुदल का नाश करने में निपुण हो ।
समर में अपना महारथ दिखाओ ,
सब ओर से शत्रुओं का भञ्जन करो ,
सब ओर से उन्हें नष्ट कर
हमारी रक्षा करो।।4।।
सेनापति !
तुम जानते हो उन अजेय सैनिकों को
जो रिपुदमन में हैं कुशल ,
उन्हें साथ में ले कर
प्रस्थान के लिये
रथ पर आरूढ होओ।।5।।
वज्र जैसे हाथों वाला सेनापति
बस , जीतने ही वाला है शत्रुओं की भूमि ।
लोगों ! सब मिल कर
उसका उत्साह-वर्द्धन करो।।6।।
हमारा सेनापति वही हो
जो दया छोड़ कर
नष्ट कर डाले शत्रुओं के समूह ,
किन्तु उन्हें अभय दे
जो हथियार डाल कर
आत्मसमर्पण कर दे।।7।।
हमारा सेनापति समर में
आगे-पीछे , दाँयें-बाँयें और मध्य में
शत्रुओं को परास्त कर
वायु के वेग से झपट कर
विजय प्राप्त करे।।8।।
ओ सेना के अधिपति !
पराक्रमी योद्धाओं !
अपने तन-मन में उत्साह जगाओ,
संयत हो कर उद्घोष करते हुए
विजय के लिये हुंकार भरो ।।9।।
 हमारे आयुध उन्नत हों ,
वेगवान् हों , संहार के लिये समर्थ हों ।
अश्वारोही , रथी कुशल हों ,
गगनभेदी जयघोष हो ।।10।।
ध्वजाएँ फहराती हों ,
शस्त्र हवा में ऊँचे लहराते हों ,
सेनापति के मन में
विजय का दृढ निश्चय हो
देववृंद युद्ध में सहायक हों।।11।।
ओ भयजन्य व्याधियों !
शत्रुओं के चित्त को लुभा कर
उनके अंगों को शिथिल कर दो ।
उनके हृदयों में घुस जाओ ,
जला-जला कर उन्हें
अज्ञान के अंधेरे में घोल दो।।12।।
ओ बाणों ! अस्त्र-शस्त्रों !
शत्रुसेना पर जा कर गिरो ।
एक-एक का विनाश करो ,
किसी को मत छोड़ो।।13।।
ओ वीर योद्धाओं ! जाओ ,
शीघ्र ही शत्रु पर आक्रमण करो।
तुम्हारी भुजाएँ हृष्ट-पुष्ट हों ,
तुम्हें दिव्य सहायताएँ सुलभ हों।।14।।
हे मरुद्गण !
शत्रु सेना बढी चली आ रही
हमसे स्पर्धा करती हुई ,
इसे प्रचंड वायु के वेग से ढँक दो इस तरह
कि ये एक-दूसरे को पहचान भी न सकें।।15।।
शिखाविहीन कुमारों की तरह
तीक्ष्ण बाण गिरते समरभूमि में यहाँ-वहाँ ,
सेनापति ! सबकी रक्षा करो।।16।।
हे राजन् !
तुम्हारी सेना के मर्मांगों को
ढँक देता हूँ कवच से ,
सोम उन अंगों को अमृत से भर दे,
वरुण उन्हें श्रेष्ठता दे ,
समस्त देवता विजय पर प्रसन्न हों।।17।।
वेदों में राष्ट्रभक्ति-
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लेख का प्रारम्भ अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की श्रीसूक्त के पद की व्याख्या से करते हैं, फिर आगे बात करेंगे -
उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।
अर्थात् हे देव, हमें देवों के सखा कुबेर, और उनके
मित्र मणिभद्र तथा दक्ष
प्रजापति की कन्या कीर्ति (यश)
उपलब्ध करायें, जिससे हमें और राष्ट्र
को कीर्ति-समृद्धि प्राप्त हो।
ऋग्वेद के परिशिष्ट में प्राप्त श्रीसूक्त का यह सातवाँ मन्त्र है ।
उपैतु मां देवसख : कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
७॥
हे महादेव सखा कुबेर ! मुझे मणि के साथ
कीर्ति भी प्राप्त हो । मैं इस राष्ट्र में
जन्मा हूँ । इसलिए यह मुझे कीर्ति और धन दें ।

प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः॥
--कर्णपर्व ४४
. आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीका नाम ते जनाः |
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायो विकुत्सिताः ||(पाठान्तर)

धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के
रूप में जाना जाता रहा है। यही कारण रहा है
कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार माननेकी सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने
का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और
राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र ईसीलिए कही जाती है
कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए
इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है।
 मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ
हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।
तस्मिन्देशे  य  आचार:  पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां  सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
एतद्देशप्रसूतस्य  सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां  सर्वमानवा:  ।।
--मनुस्मृति  १/१३६,१३७,१३९ 

 इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है।
 महाभारत के भीष्म पर्व में भारत
की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।
प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥
अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-
 उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद्
भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।
इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त  और  भारतवर्ष है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

अर्थववेद में ऋषियों ने कहा- भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः / तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे/ ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम्/ तदस्मै देवाः उपसं नमन्तु यानि आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के आरंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया था, उससे राष्ट्र-निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिये सब विबुध होकर इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।

इस राष्ट्र का सीमांकन करते हुये ऋग्वेद में ऋषि में कहा था- यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः। यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।। अर्थात् हिमवान हिमालय जिसका गुण गा रहा है, नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही है, उस राष्ट्र-देव को हम अपना हविष्य अर्पित करें।

ऋषियों ने बार-बार जिस राष्ट्र-देव के आराधना और सेवा की बात की उसकी भगौलिक सीमाओं के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि वेदों में वर्णित नगर, नदी और स्थान जहाँ भी पायें जायें उसे ही हम वृहत्तर भारत की सीमा मान लें और अगर हम ऐसा करते हैं तो पश्चिम में हमें मिलता है आज का अफगानिस्तान जो कम से कम सातवीं-आठवीं सदी तक वृहत्तर भारत का हिस्सा था और पूर्ण हिन्दू था और जहाँ के अफ़रीदी और पख्तून लोगों का विशद वर्णन हमारे ऋग्वेद में मिलता है, जहाँ की नदियों, शहरों और पहाड़ों के नाम हमारे वेदों में बहुतायत से आयें हैं। जिन नदियों को आजकल हम आमू और काबुल नामों से जानते हैं, उन्हें वेदों में वक्षु और कुभा नदी कहा गया है। आमू दरिया वही है जिसे पार कर ह्वेनसांग भारत आये थे। इसी तरह वर्तमान काबुल संस्कृत साहित्य में कुभा नाम से जाना जाता था, आज का कांधार कभी गांधार था और स्वात को हम सुवास्तु नाम से जानते थे। बुद्ध अफगानिस्तान में लगभग 6 माह ठहरे थे। 843 ईस्वी में कल्लार नामक राजा ने अफगानिस्तान में हिन्दूशाही की स्थापना की थी और उन हिन्दू राजाओं को ‘काबुलशाह' या ‘महाराज धर्मपति' कहा जाता था। इन राजाओं में जयपाल और आनंदपाल का नाम तो इतिहास में रूचि रखने वाले लोग अवश्य जानते होंगे क्योंकि इन राजाओं ने लगभग 350 साल तक अरब आततायियों से मोर्चा लिया और उनको कभी सिंधु नदी पार करके भारत में  घुसने नहीं दिया, लेकिन 1019 में महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल की हार के साथ अफगानिस्तान का हिन्दू इतिहास समाप्त हो गया और आज हालत ये है कि कभी हिन्दू राज्य रहे अफगानिस्तान में आज कुछेक हज़ार हिन्दू भी नहीं बचे हैं। देवी-देवताओं की भव्य-प्रतिमाएं किसी अजायबघर की धूल फाँक रहीं हैं तो बामियान की बुद्ध प्रतिमायें तालिबान के ध्वंस चिन्हों को सजाये अपनी संततियों को लज्जित कर रही है।

ये सब लिखने का हेतू ये नहीं है कि अफगानिस्तान के लिये आँसू बहाये जाये बल्कि ये है कि उन बिन्दुओं पर विमर्श हो जिसने अफगानिस्तान का ये हाल कर दिया। हिन्दुशाही राजा वीर थे, राष्ट्रभक्त थे और उनका राज्य उन सब मानकों पर खड़ा उतरता था जिस आधार पर किसी राज्य को आदर्श राज्य कहा जाये। मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हिन्दूशाही राजाओं के खजाने को जब लूटा गया और लूट के माल को गजनी में प्रदर्शित किया गया तो पड़ोसी मुल्कों के राजदूतों की आंखें फटी की फटी रह गईं कि कोई राज्य इतना वैभवशाली भी हो सकता है। अलबरूनी और अल-उतबी ने लिखा है कि हिन्दूशाहियों के राज में मुसलमान, यहूदी, बौद्ध और हिन्दू सभी लोग मिल-जुलकर रहते थे और शासन द्वारा उनमें भेदभाव नहीं किया जाता था बल्कि उन्हें भी वो तमाम अधिकार प्राप्त थे जो किसी हिन्दू प्रजा को थे।

ये सब लिखने का हेतू ये है कि हमें इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने हैं कि क्या खंडित राष्ट्रदेव की प्रतिमा की उपासना की जा सकती है? क्या राष्ट्र के अंदर सभी नागरिकों को भले ही उसकी राष्ट्रीय निष्ठा कुछ भी हो एक समान माना जा सकता है? क्या राष्ट्र-हित में स्वजन और परकीय मानसिकता का भेद नहीं मानना चाहिये? अगर सबके विकास और सबके हित की भावना से राष्ट्र की जड़े और उसके मूल नागरिकों की सुरक्षा संदिग्ध होती हो तो भी केवल "पोलिटिकल करेक्टनेस" के चलते उसे करते चले जाना सही है? मुहम्मद बिन क़ासिम सिंध को लूटने नहीं आया था बल्कि राजा दाहिर की शरणागत वत्सलता ने उसे आने पर मजबूर किया था। खोखले आदर्शवाद, इतिहास में अमर होने की चाह और पोलिटिकल करेक्टनेस की बीमारी ने दाहिर को तो मृत्यु के मुख में पहुँचाया ही साथ ही उसकी मासूम बेटियों को न जाने कितने दर्द झेलने पड़े और भारत के लिये अनवरत आक्रमणों का द्वार खुल गया। यही गलती अफगानिस्तान के भी हिन्दू राजाओं ने की थी जिसने नतीजे में कभी हिन्दू सूर्य से आलोकित होने वाला अफगानिस्तान आज भारत जीतने की मंशा रखने वाले लोगों की

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

एकमात्र ऐसा वृक्ष जिसे भारत सरकार का संरक्षण प्राप्त है इसे पौराणिक पारिजात भी कहते हैं




#पारिजात_वृक्ष (किन्तूर)
#पौराणिक_पारिजात
#महाभारतकालीन_पारिजात
पारिजात वृक्ष (किन्तूर) उत्तर प्रदेश राज्य (भारत) के बाराबंकी जिला अंतर्गत किन्तूर ग्राम में स्थित पारिजात का वृक्ष है। भारत सरकार द्वारा संरक्षित यह वृक्ष सांस्कृतिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोकमत इसका संबंध महाभारतकालीन घटनाओं से जोड़ता है।
#भौगोलिक_स्थिति
ग्राम किन्तूर बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित है। इसी ग्राम में विश्व प्रसिद्ध पारिजात वृक्ष स्थित है। यह वृक्ष सरकार द्वारा संरक्षित है।

#पौराणिक_महत्व

माना जाता है कि किन्तूर गांव का नाम पाण्डवों की माता कुन्ती के नाम पर है। जब धृतराष्ट्र ने पाण्डु पुत्रों को अज्ञातवास दिया तो पांडवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ यहां के वन में निवास किया था। इसी अवधि में ग्राम किन्तूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना हुयी थी। भगवान शिव की पूजा करने के लिए माता कुंती ने स्वर्ग से पारिजात पुष्प लाये जाने की इच्छा जाहिर की। अपनी माता की इच्छानुसार अर्जुन ने स्वर्ग से इस वृक्ष को लेकर यहां स्थापित कर दिया

दूसरी पौराणिक मान्यता यह है कि एक बार श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी के साथ व्रतोद्यापन समारोह में रैवतक पर्वत पर आ गए। उसी समय नारद अपने हाथ में पारिजात का पुष्प लिए हुए आए। नारद ने इस पुष्प को श्रीकृष्ण को भेंट कर दिया। श्रीकृष्ण ने इस पुष्प को रुक्मिणी को दे दिया और रुक्मिणी ने इसे अपने बालों के जूड़े में लगा लिया इस पर नारद ने प्रशंसा करते हुए कहा कि फूल को जूड़े में लगाने पर रुक्मिणी अपनी सौतों से हजार गुना सुन्दर लगने लगी हैं। पास में खडी हुयी सत्यभामा की दासियों ने इसकी सूचना सत्यभामा को दे दी। श्री कृष्ण जब द्वारिका में सत्यभामा के महल में पहुंचे तो सत्यभामा ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए हठ किया। सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए स्वर्ग में स्थित पारिजात को लाने के लिए देवराज इंद्र पर आक्रमण कर पारिजात वृक्ष को पृथ्वी पर द्वारिका ले आये और वहां से अर्जुन ने इस पारिजात को किन्तूर में स्थापित कर दिया।

#विशेषताएं

लोकमत इस वृक्ष की आयु 1000 -5000 वर्ष के बीच मानता है। इसके तने का परिमाप 50 फ़ीट और ऊंचाई लगभग 45 फ़ीट होगी।

#पुष्प

इसका पुष्प श्वेत रंग का और सूखने पर सुनहले रंग का हो जाता है। इस वृक्ष में पुष्प बहुत ही कम संख्या में और कभी-कभी ही गंगा दशहरा (जून के माह) के अवसर पर लगते हैं। पुष्प सदैव रात्रि में ही पुष्पित होते हैं और प्रातः काल मुरझा जाते हैं। रात्रि के समय पुष्प पुष्पित होने पर इसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है।

यह तो बात रही पौराणिक पारिजात वृक्ष की जोकि महाभारत काल में माता कुंती के शिव उपासना हेतु शूरवीर अर्जुन ने स्वर्ग से लाकर धरती पर रोपा था अगली पोस्ट में हम वर्तमान पारिजात अर्थात हरश्रृंगार के विषय...क्रमशः

बुधवार, 24 जुलाई 2019

इंटरनेशनल ड्रग माफियाओं की मकड़जाल में भांग अफीम प्रतिबंधित

इंटरनेशनल ड्रग माफियाओं की साजिश और विश्व को गुलाम बनाने की योजनाओं को क्रियान्वित करने वाले लोगों की एक मिलीभगत से संसार के ऐसे महत्वपूर्ण औषधियों को प्रतिबंधित कर दिया गया उसके बदले इन्हीं औषधियों से कोकीन चरस हीरोइन अफीम सिगरेट व अन्य मादक द्रव्य सप्लायरों की मकड़जाल से पूरे विश्व भर में मादक द्रव्य सप्लाई की जा रही है  इन गिरोहों की गिरफ्त में संसार के बहुत सारे देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं और ये उन्हीं के लिए अनेक विशेष कानून बनाकर प्राकृतिक व्यवस्थाओं को तहस-नहस करने में  इन ड्रग माफियाओं को अपना योगदान कर रहे हैं इनका काकस बहुत बड़ा है  करोड़ों मिलियन का यह व्यापार आज भी बड़े तरीके से और कानून सम्मत ढंग से फल फूल रहा है
शिवप्रिया, विजया अर्थात भंग- - - -
भारत में एलोपैथी और शराब का धंधा जमाने के लिए अंग्रेजों ने भांग को बदनाम कर प्रतिबंधित कर दिया। आइए इनके बदरंग में भंग करे, भंग का रंग जमा कर
- इसके पत्ते मसल कर कान में दो दो बूंद रस डालने से दर्द गायब हो जाता है।
- सिरदर्द में इसके पत्ते पीस कर सूंघे या इसका दो दो बूंद रस नाक में डाले।
- इसके चुटकी भर चूर्ण में पीपर, काली मिर्च व सौंठ डाल कर लेने से खांसी में लाभ होता है।
- नपुंसकता और शारीरिक क्षीणता के लिए भांग के बीजों को भूनकर चूर्ण बना कर एक चम्मच नित्य सेवन करे।
- अफगानी पठान इसके बीज फांकते है तभी लंबे चौड़े होते है। भारतीय दिन पर दिन लंबाई में घट रहे है।
- संधिवात में भी इसके भूने बीजों का चूर्ण लाभकारी है।
- यह वायु मंडल को शुद्ध करता है।
- इससे पेपर, कपड़ा आदि बनता है।
- इसका कपड़ा एंटी कैंसर होता है।
- यह टीबी, कुष्ठ, एड्स, कैंसर, दमा, मिर्गी, मानसिक रोग जैसे 100 रोगों का इलाज करता है।
- सिद्ध आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व है। यह सूक्ष्म शरीर पर पहले कार्य करता है।
- तपस्वी, ऋषि मुनि इसका सेवन साधना में लाभ के लिए करते है।
- इसके सेवन से भूख प्यास , डिप्रेशन नहीं होता।
- शरीर के विजातीय तत्वों या टॉक्सिंस को यह दूर करता है।
- इसके बीजों का चूर्ण , ककड़ी के बीजों के साथ शर्बत की तरह पीने से सभी मूत्र रोग दूर होते है।
- यह ग्लूकोमा में आंख की नस से दबाव हटाता है।
- अलझेइमर में भांग का तेल लाभकारी है।
- भांग का तेल कैंसर के ट्यूमर के कोशिकाओं की वृद्धि रोक देता है।
- इसके प्रयोग से कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट दूर हो जाते है।
- डायबिटीज से होने वाले नर्वस के नुकसान से भांग बचाता है।
- भांग हेपेटाइटिस सी के इलाज में सफल है।
- गाजर घास जैसी विषैली जड़ियों को रोक सकता है।
- डायरिया और डिसेंट्री के लिए प्रयोग में आने वाले बिल्वादी चूर्ण में भांग भी होता है।
- इसके पत्तियों के चूर्ण को सूंघने मात्र से अच्छी नींद आती है।
- संग्रहनी या कोलाइटिस में इसका चूर्ण सौंफ और बेल की गिरी के साथ लिया जाता है।
- हाइड्रोसिल में इसके पत्ते पीस कर बांधने से लाभ होता है।
- भांग के बीजों को सरसो के तेल में पका कर छान ले। यह तेल दर्द निवारक होता है।
- इसके पत्ते डाल कर उबाले पानी से घाव धोने से इंफेक्शन नहीं होता और घाव जल्दी भर जाता है।
- इतने सारे गुण होते हुए भी अंग्रजों ने षड़यंत्र कर इसे प्रतिबंधित कर दिया। जिसे भारतीय अंग्रजों ने आगे बढ़ाया।
- यह ज्योतिर्लिंगों और कुछ राज्यों में प्रतिबंधित नहीं है। शिवरात्रि , श्रावण आदि में यह शिव पूजा के लिए मिलता है। इसके बिना शिवपूजा अपूर्ण है।
- गुणों के कारण इसे काला सोना भी कहा गया है।
- विदेशों में इस पर बहुत शोध हुआ है और इसका प्रयोग हो रहा है।
-(प्रिया मिश्रा नाम की एक 21 वर्षीय युवती को लिंफ नोड्स का असाध्य टीबी हुआ था। वह बहुत ही कष्ट में थी।डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। तब एक कामवाली बाई ने उन्हें भांग फूंकने को दी। आश्चर्यजनक रूप से कुछ दिनों में वह ठीक हो गई। तब से प्रिया मिश्रा ने अपना जीवन भांग के महत्व को सभी को बताने में समर्पित कर दिया। येभारत की एकमात्र महिला एक्टिविस्ट है जो भांग के लिए कार्यरत है। भारत में इस पर से प्रतिबंध हटना चाहिए और इसका तथा आयुर्वेद का महत्व बढ़े इसके लिए ये प्रतिबद्ध है, कार्यरत है। इसे अंग्रेज़ी में हेंप कहते है। इनका संस्थान हेंपवती भांग के औषधीय , शोध, पोषक और अन्य उत्पादों के लिए कार्यरत है। )

- यह ड्रग्स की श्रेणी में नहीं आता। यह एक औषधि है।
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सोमवार, 8 जुलाई 2019

कृष्णानंद राय केस: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन हत्यारा कोई नहीं

 कृष्णन्द राय, मुख़्तार अंसारी

  मुसलमान, भाजपा, न्याय व्यवस्था और भारत में कौन मजबूर और कौन मजबूत, कौन डर रहा है कौन डरा रहा है!?

कृष्णानंद राय केस: 400 राउंड गोलियाँ, गवाहों की रहस्यमयी मौत लेकिन हत्यारा कोई नहीं

विधायक कृष्णानंद राय लोकप्रिय थे। उनकी हत्या के बाद जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ था। राजनाथ ने 14 दिनों तक धरना दिया था। उसके बाद 5 वर्षों तक वही राजनाथ सिंह देश के गृह मंत्री रहे, जाँच तब भी चली ही होगी, लेकिन हत्यारा कोई नहीं!

राज्य में भाजपा की सरकार। केंद्र में भाजपा की सरकार। लेकिन मार दिए गए एक भाजपा विधायक को न्याय नहीं मिल पाया। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। 2005 में हुई हत्या के मामले में आज तक कोई अपराधी नहीं! किस पर दोष लगाया जाए? क्या सरकारें अपना काम करने में विफल रहीं? क्या न्यायपालिका को सच नहीं दिख पाया? या फिर मुख़्तार अंसारी और उसके परिवार का रसूख सब पर भारी पर गया? आज इसकी चर्चा हम इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि मुख़्तार अंसारी और उसके भाई बसपा सांसद अफ़ज़ल अंसारी को इस मामले में दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया। आरोपितों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी किया गया।
सबसे पहले इस ख़बर की बात करेंगे। उसके बाद हम इस घटना को रीविजिट करने 15 वर्ष पीछे जाएँगे और फिर हम वापस लौट कर यह देखने की कोशिश करेंगे कि आख़िर इतनी बड़ी हत्या के मामले में आरोपितों के बरी हो जाने, या फिर दोषियों के पकड़ में न आने के पीछे का कारण क्या है? जिम्मेदारी किसकी है? कृष्णनंदन राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर इस केस को दिल्ली ट्रांसफर किया गया था क्योंकि यूपी में इसके निष्पक्ष सुनवाई होने की उम्मीद परिजनों को नहीं थी। दिल्ली की अदालत ने ‘साक्ष्य के अभाव’ में उन आरोपितों को भी बरी कर दिया।
कोर्ट का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपितों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। अदालत 2 अन्य आरोपितों को पहले ही बरी कर चुकी है। सीबीआई ने मामले की लम्बी जाँच की लेकिन दोष नहीं साबित कर पाई। ये थी ख़बर। अब आते हैं अपने सवाल पर। मुख़्तार अंसारी, उसके भाई व बहनोई के ख़िलाफ़ कोई भी अपराध साबित करने में सीबीआई व पुलिस नाकाम क्यों रही? यह सवाल इसीलिए जायज हो जाता है क्योंकि दिसंबर 2005 को एसटीएफ एसएसपी अखिल कुमार ने साफ़-साफ़ कहा था कि ये हत्या मुख़्तार अंसारी ने कराई है। अब जरा पीछे जाकर इस हत्या की वारदात के बारे में जानते हैं।

गवाहों की रहस्यमयी मौतें

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लेकिन उससे पहले इस घटना से जुड़ी कुछ रहस्यमयी बातों को जानते हैं, जिसके बाद आपको पता चलेगा कि क़ानून की देवी की आँखों में सचमुच पट्टियाँ बंधी होती हैं, जिसके पार उन्हें कुछ नहीं दिखता। जब कृष्णानंद राय व उनके सहयोगियों की हत्या हुई, उस समय कोई ऐसा भी था जो बच गया था। उस व्यक्ति का नाम था- शशिकांत राय। वह एक तरह से इस घटना के मुख्य चश्मदीद गवाह थे। थे इसलिए, क्योंकि अब वो नहीं रहे। सैंकड़ों राउंड गोलियों के बीच ज़िंदा बच जाने वाला शख़्श शराब पीने के बाद संदिग्ध स्थिति में सड़क पर बेहोश पड़ा पाया गया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
एक और गवाह था, उनका नाम था- मनोज गौड़। यह भी था, क्योंकि अब ये भी नहीं रहे। सितंबर 2006 को मनोज गौड़ की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इन दोनों घटनाओं के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ उन्हें डॉक्टरों ने ‘ब्रांको न्यूमोनिया’ की वजह से मृत करार दिया। जब वो अस्पताल में भर्ती थे, तब प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई। दो अन्य गवाह भी थे- संजीव राय और मुन्ना राय। ये दोनों अभी भी हैं, लेकिन गाज़ीपुर में नहीं है। दोनों ही रहस्यमयी तरीके से किसी अन्य ज़िले में जाकर बस गए। और दोनों ने अपने बयान भी अदालत में दर्ज नहीं कराए

क्या हुआ था उस दिन?

वह 29 नवंबर 2005 का दिन था, जिसे गाज़ीपुर वाले आज भी ‘ब्लैक डे’ कहते हैं। कृष्णानंद राय मुहम्मदाबाद से विधायक थे। वह पिछली केंद्र सरकार में 5 वर्षों तक मंत्री रहे मनोज सिन्हा के क़रीबी भी थे। वही मनोज सिन्हा, जिन्हें गाज़ीपुर से हरा कर मुख़्तार अंसारी का भाई अफ़ज़ल अंसारी इस वर्ष सांसद बना है। यह बात बहुत कम ही लोगों को पता है कि कृष्णानदान राय इस घटना में मारे जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे बल्कि उनके साथ उनके 6 अन्य सहयोगियों की भी जान गई थी। ये हत्या इतनी वीभत्स थी और इतने बेख़ौफ़ तरीके से अंजाम दिया गया था, जिससे कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि इसके पीछे कितनी बड़ी ताक़तें थीं।
शासन से बेख़ौफ़ हत्यारों ने 400 राउंड गोलियाँ चलाईं थीं। घटना के बाद पोस्टमॉर्टम के दौरान मृतकों के शरीर से 67 गोलियाँ निकाली गईं। इतनी ज्यादा संख्या में बुलेट अंदर धँसने के बाद शायद ही कोई ज़िंदा बचे, वो भी तब जब ये गोलियाँ एके-47 दागी गई हों। विधायक राय लोगों में लोकप्रिय थे, इस कारण जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। विरोध प्रदर्शन करने वालों में कई ऐसे लोग भी शामिल थे, जो आज यूपी व दिल्ली में सत्ता के सर्वेसर्वा हैं। आपको बता दें कि देश के वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उस वक़्त इस हत्या के विरोध में धरना दिया था। राजनाथ ने एक-दो दिन नहीं बल्कि 14 दिनों तक धरना दिया था और उनका धरना ख़त्म कराने के लिए ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आना पड़ा था।
5 वर्षों तक राजनाथ सिंह देश के गृह मंत्री रहे और उनके कार्यकाल के दौरान भी यह जाँच अहम प्रक्रियाओं से गुजरी लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोषियों को न बख्शने की बात करते हैं और क़ानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए पुलिस को उन्होंने सशक्त किया है लेकिन हत्यारा कोई नहीं! सीबीआई जैसी एजेंसियाँ कथित बाहुबलियों और बड़ी मछलियों पर हाथ डालने से न हिचकने का दावा करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! 15 वर्षों तक 7 आरोपितों पर मामला चलता है और विभिन्न संस्थाएँ अपने-अपने स्तर से जाँच करती हैं लेकिन हत्यारा कोई नहीं! उस समय की सपा सरकार का दौर गया, मनोज सिन्हा 5 साल मंत्री रहे लेकिन हत्यारा कोई नहीं!

कृष्णानंद राय हत्याकांड: नहीं मिला न्याय

तो फिर 400 राउंड गोलियाँ किसने चलाई? नहीं पता चल पाएगा। शायद इसलिए नहीं चल पाएगा क्योंकि सलमान ख़ान ने हिरन मारा या नहीं, यही मामला 20 वर्षों से अटका पड़ा है। 1998 में एक काला हिरन का शिकार कर लिया जाता है और ग्लैमर वर्ल्ड के आरोपितों के ख़िलाफ़ दो दशक तक चली जाँच के बाद भी मामले में क्या डेवलपमेंट्स हुए हैं, कुछ भी क्लियर नहीं है। ऐसे कैसे मिलेगा न्याय? जिस देश की न्याय व्यवस्था एक जानवर के शिकारी को सज़ा देने में नाकाम रही है, उससे एक नेता के कातिलों को सज़ा दिलाने की उम्मीद ही बेमानी है। सवाल सिर्फ़ विधायक का नहीं है बल्कि उनके साथ मारे गए 6 अन्य लोगों का भी है।
हो सकता है विधायक का परिवार संपन्न रहा हो और न्याय के लिए वह आगे की प्रक्रिया में जा सकता है लेकिन उनके साथ मारे गए उनके 6 सहयोगियों के परिजनों की आशाएँ भी इसी मामले से जुड़ी हैं। विधायक की पत्नी अलका राय ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि प्रदेश में सुनवाई होने से जवानों की जान को ख़तरा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया, तभी मामला प्रदेश से बाहर ट्रांसफर किया गया। इससे समझा जा सकता है कि कृष्णनंदन राय के हत्यारों के पीछे कितनी बड़ी ताक़तें काम कर रही थीं। जिसके कारण मामले को यूपी से दिल्ली भेजा जा सकता है, वो कुछ भी कर सकते हैं, कम से कम सज़ा से तो बच ही सकते हैं!
गाज़ीपुर की जनता भी उन्हें भूल जाएगी। ऐसा ही होता आया है। भले ही उनकी शवयात्रा में 5 किलोमीटर लम्बी लाइन लगी हो, जनता क्यों इस पचड़े में पड़ना चाहेगी क्योंकि उसे भी पता है कि जो अदालत और जाँच एजेंसियों को धता बता सकता है वो कुछ भी कर सकता है। क्या कृष्णनंदन राय ने ख़ुद को ही गोली मार ली? क्या उन्होंने 67 बुलेट्स ख़ुद अपने और अपने सहयोगियों के शरीर में घुसेड़ दिए? अफसोस, इन सवालों के जवाब शायद फाइलों में धूल फाँकते रह जाएँगे न्याय के इंतजार में।

संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे

    


  भारतीय शास्त्रीय संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे :
https://ajaykarmyogi.blogspot.com/2018/05/blog-post_71.html?m=1
1. राग दुर्गा – आत्मविश्वास बढानेवाला.
2. राग यमन – कार्यशक्ति बढानेवाला.
3. राग देसकार – उत्थान व संतुलन साधनेवाला
4. राग बिलावल – अध्यात्मिक उन्नति व संतुलन साधनेवाला.
5. राग हंसध्वनि – सत्य असत्य को परिभाषित करनेवाला राग.
6. राग शाम कल्याण – मुलाधार उत्तेजित करनेवाला और आत्मविश्वास बढानेवाला.
7. राग हमीर – आक्रामकता बढानेवाला, यश देनेवाला, शक्ति और उर्जा निर्माण करनेवाला.
8. राग केदार – स्वकर्तृत्व पर पूर्ण विश्वास, भरपूर उर्जा निर्माण करनेवाला और मुलाधार उत्तेजित करनेवाला.
9. राग भूप – शांति निर्माण,  संतुलन साधकर अहंकार मिटाता है.
10. राग अहिर भैरव – शुद्ध इच्छा, प्रेम एवं भक्ति भाव निर्माण करता है व आध्यात्मिक उन्नति, पोषक वातावरण निर्मित कारक.
11. राग भैरवी – भावना प्रधान राग, सर्व सदिच्छा पूर्ण कर प्रेम सशक्त और वृद्धि करता है.
12. राग मालकौस – अतिशय शांत एवं मधुर राग.  प्रेमभाव निर्माण करता है व संसारिक सुख में वृद्धि करेगा.
13. राग भैरव – शांत वृत्ति व शुध्द इच्छा निर्माण करता है. आध्यात्मिक प्रगति के लिये पोषक एवं शिवत्व जागृत करनेवाला राग.
14. राग जयजयवंती – सुख समृद्धि और यश देने वाला राग. समस्या दूर करनेकी क्षमता.
15. राग भीम पलासी -  संसार सुख व प्रेम देता है.
16. राग सारंग – अति मधुर राग. कल्पना शक्ति व  कार्यकुशलता बढाकर नवनिर्मित ज्ञान प्रदान करता है,  आत्मविश्वास बढाकर परिस्थिति का ज्ञान देता है.
17. राग गौरी – गुण वर्घक राग - शुद्ध ईच्छा, मर्यादाशीलता, प्रेम, उत्थान ,समाधान कारक.

पशु पक्षियों जैसा ही, मनुष्यों के पास भी शुरुआत में सिर्फ बोली थी, कोई भाषा नहीं थी। धीरे धीरे सभ्यता के विकास के साथ शब्दों के स्वरुप तय हुए, व्याकरण तैयार हुआ और अलग अलग सभ्यताओं के लिए अलग अलग भाषाएँ बनी। अभी के भारत की संस्कृति ही देख लें तो कई भाषाओँ के साथ साथ कई बोलियाँ भी मिल जायेंगी। जैसे ये भाषा के साथ होता है, वैसे ही ये संगीत के लिए भी होता है। एक सरगम और संगीत के एक प्रारूप के तय होने के साथ ही लोकगीतों से अलग, भारतीय शास्त्रीय संगीत का उदय हुआ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का भी भेद होता है, राग कम हैं और रागिनियाँ अधिक। रागों के लिए भाव भी होते हैं, परिवार भारत में महत्वपूर्ण इकाई है, इसलिए हर राग का परिवार भी होता है। धर्म से भारतीय संस्कृति के जुड़े होने के कारण हर राग, नटनागर यानि भगवान शिव से भी जुड़ा है। पांच राग भगवन शिव के पांच मुख से निकले बताये जाते हैं। सुबह की शुरुआत का राग भैरव (भूमि तत्व), हिंडोल (आकाश तत्व), दीपक (अग्नि तत्व), श्री (वायु तत्व) और मेघ (जल तत्व) शिव के हैं और छठा मालकौंस राग पार्वती का है।

उन्नीसवीं सदी के शुरुआत तक यही राग-रागिनी पद्दति भारतीय शास्त्रीय संगीत के वर्गीकरण के लिए इस्तेमाल होती थी। ऐसे चार मत होते थे, जिनमें से ये भरत मत के रागों के नाम हैं। भरत मत में हरेक राग की पांच पांच रागिनियाँ, आठ पुत्र राग और आठ वधु मानी जाती थी। हनुमत मत में भी रागों के नाम यही थे। रागिनियों, पुत्र रागों इत्यादि की गिनती बदलती थी। शिव मत के अनुसार भी छः राग माने जाते थे। प्रत्येक की छः-छः रागिनियाँ तथा आठ पुत्र मानते थे। इस मत में राग भैरव, राग श्री, राग मेघ, राग बसंत, राग पंचम, और राग नट नारायण होते थे।

सन 1810-20 के बीच इस पद्दति की आलोचना शुरू हुई और सुधार की जरूरत महसूस की जाने लगी। ये काम पचास साल बाद शुरू होना था। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म ही 1860 में हुआ (देहावसान-1936)। अधिकांश उत्तर भारत में जो आधुनिक थाट पद्दति आज जानी जाती है, उसके जन्मदाता पंडित भातखंडे थे। उन्होंने 1640 के आस पास के कर्णाटक शैली के विद्वान पंडित वेंकटमखिन की शैली के आधार पर वर्गीकरण का प्रयास शुरू किया। इस काम के लिए वो उत्तर भारत के कई शास्त्रीय घरानों में घुमते रहे।

बरसों की मेहनत से वो दस प्रमुख थाट में भारतीय शास्त्रीय संगीत को बाँट पाए। बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावारी, भैरवी और तोडी थाट में आज संगीत बांटा जा सकता है। जैसे मालकौंस को भैरवी थाट में डाल सकते हैं, राग श्री को पूर्वी थाट में डालेंगे। थाट को परिवार के उपनाम की तरह समझिये। जैसे किसी के घर शादी का कार्ड देने आया कोई व्यक्ति पारिवारिक उपनाम से फलां परिवार को सादर आमंत्रण लिखकर छोड़ सकता है। उस आमंत्रण के उपनाम से कई लोग पहचाने जाते हैं इसलिए परिवार के कई लोगों में से एक या कुछ व्यक्ति चले जायेंगे।

थाट का बनना गणित पर आधारित है। सरगम के सात स्वरों में से पांच को विकृति दी जा सकती है, यानि कोमल और तीव्र स्वर भी होते हैं। इस तरह कुल सात शुद्ध स्वर और पांच विकृत, बारह स्वर होते हैं। अब अगर पर्मुटेशन-कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करें और सा, पा को केवल शुद्ध स्वर, और रे, गा, म, धा, और नी का एक (कोमल या तीव्र) रूप इस्तेमाल करें तो कुल 32 स्वरुप बनेंगे। अपनी तलाश में पंडित भातखंडे को जो दस थाट प्रबल दिखे, उन्होंने उसमें ही सबको बांटा।

ये जो ज्यादातर थाट हैं, इनसे मिलते जुलते से पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के चर्च मॉड भी मिल जाते हैं। एक अंतर ये कहा जा सकता है कि हाई ऑक्टेव पिच के लिए चर्च बच्चों का बंध्याकरण करके उनसे गवाता था। ऐसे एक गाने लायक किन्नर बच्चे के बंध्याकरण में कई बच्चों की मौत भी हो जाती थी। बाद में ये वहशी हरकत ख़त्म हुई तो ऑपेरा के कई हिस्से ही दोबारा तैयार करने पड़े। जो पुरानी पद्दति थी उसे गाने लायक बचपन से बंध्याकरण करके बच्चों को आज तैयार नहीं किया जा सकता। खुशकिस्मती से भारतीय परम्पराओं में ऐसी अमानवीयता नहीं होती, इसलिए रागों को गायब नहीं करना पड़ा।

ये जरूर है कि एक ही व्यक्ति का इतने वृहदाकार संगीत शास्त्र पर काम पूर्ण हो, ऐसा थोड़ा कठिन है। इस वजह से पंडित भातखंडे का वर्गीकरण भी पूरा नहीं माना जाता। दस थाटों में उनके वर्गीकरण पर आगे क्या प्रयास हुए, उन प्रयासों को कितनी सफलता मिली ये भी बहस का मुद्दा हो जाता है। अब आप अगर यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो देखिये कि जो बात संगीत पर होनी थी वो धर्म से शुरू होकर गणित तक पहुँच गई। इतने पे भी स्थिति ये है कि हम ये बताने की कोशिश करें कि राग हिंडोल मारवा थाट का है, या कल्याण थाट का, तो एक बड़ी बहस खड़ी हो सकती है।

तो आप ये भी समझ सकते हैं कि माला की तरह, धर्म से होते हुए, संगीत को जोड़ते जो गणित तक पहुंचा है, वो सबको जोड़ता धागा ही संस्कृति है। हरेक हिस्से की अपनी महत्ता है, साथ आये तो और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

जैसे अब फ़िल्मी गानों में भजन नहीं होते, लोरियां नहीं होती, राखी-दिवाली या फसल की कटनी पर खुश होते किसानों के गाने नहीं होते, वैसे ही अब फ़िल्मी गाने प्रेरक भी नहीं होते। उनसे प्रकृति के बारे में सोचने जानने की कोई उत्सुकता नहीं जागती। संगीत की भारतीय जरूरतों को फ़िल्में अब पूरा नहीं करती, तुलनात्मक रूप से अगर पुराने गाने देखें तो ये अंतर नजर आ जाता है। ऐसा एक पुराना गाना लता मंगेशकर के प्रिय गानों में से एक “ज्योति कलश छलके” भी है। ये गाना १९६१ में आई फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” में था।

जैसा की उस दौर की ज्यादातर फिल्मों में होता था, इसे भी लता मंगेशकर ने ही गाया है। गीत के बोल पंडित नरेंद्र शर्मा के हैं, और संगीत सुधीर फड़के का दिया हुआ है। ये गाना राग भूपाली पर आधारित सबसे प्रसिद्ध गीतों में से एक होगा (और कोई इसपर आधारित हो भी तो हमें याद नहीं)। सुबह एक आम भारतीय घर में कैसे होती थी, या आज भी होती है, वो एक एक कर के गाने में सामने आती जाती है। अब शहरों में, कामकाजी महिलाओं के लिए सुबह ऐसी नहीं होती, माँ के ऑफिस की छुट्टी होना भी बच्चों के लिए उत्सव होता है।

जिस दौर का ये गाना है इसे मीना कुमारी पर फिल्माया गया है और उनके साथ कोई छोटा बच्चा है। इस शरारती से बाल कलाकार का नाम भी पता नहीं। सुबह उठाना, सूर्य को प्रणाम, आँगन में पानी छिड़कना, रंगोली जैसे रोज के कामों में लगी माँ है और वहीँ खेलता शरारत करता उसका बच्चा। कई लोगों के लिए ये नोस्टाल्जिया की फीलिंग भी शायद जगा दे। अगर गाने के बोल सुनेंगे तो भी निरर्थक ठूंसे गए शब्द नहीं मिलते। वो सूरज उगने की प्रक्रिया में आस पास होते बदलाव दर्शाते हैं। बादलों और क्षितिज का रंग बदलना, दूब-घास का ज्यादा हरा नजर आना, ओस की बची बूंदे और फूल, धरती को माँ की तरह सहेजती सहलाती माँ के प्यार जैसी उषा की किरणें।

भारत के शहरों में स्थितियां भले काफी बदल गई हैं, गावों-कस्बों में अब भी कुछ भी रामायण-महाभारत से बाहर नहीं होता। ये गाना भी यशोदा-कृष्ण की पृष्ठभूमि पर ही बनाया गया है। सुबह पर आधारित एक और गाना भी है, जो विजेता फिल्म का था। वो जो “मन आनंद आयो रे” वाला गाना है, वो राग अहीर भैरव पर आधारित है। दोनों देखिएगा, उम्मीद है सुबहें पसंद तो आने लगेंगी।

[ एडिट : मेरा ख़याल था कि राग के बारे में ज्यादा जानकारी पसंद नहीं की जायेगी इसलिए एक पैराग्राफ छोड़ दिया था। फिल्मों में अक्सर जो शास्त्रीय पर आधारित गाने के नाम पर अस्सी के दशक के बाद सुनाई देता रहा वो मुजरा होता था जो किसी तवायफ़ के कोठे पर चल रहा होता था। कोठे पर आम तौर पर ठुमरी चलती है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं होती, इसलिए भी ये बाद की फिल्मों में कम सुनाई दिया। इस राग में सात सुरों में से सिर्फ पांच ही इस्तेमाल होते हैं, सभी सुर नहीं लगते। कोमल और दीर्घ स्वर भी नहीं होते इसलिए ये सीखने के लिए आसान रागों में से एक गिना जाता है। जो शास्त्रीय संगीत सीखते हैं उन्हें शुरू में राग यमन, राग भैरव के साथ राग भूपाली सिखाया जाता है।

संगीत को लिखने का लिहाज देखिये तो भारत में ज्यादातर श्रुति परंपरा रही है, इसलिए इंग्लिश म्यूजिकल नोटेशन की तरह इसे एक ही तयशुदा तरीके से नहीं लिखा जाता। भारत में फ़िलहाल लिखने के दो तरीके, भातखंडे और पालुस्कर दोनों प्रचलन में हैं। राग भूपाली को ही कर्णाटक संगीत में मोहनम कहते हैं और इस से बिलकुल मिलता जुलता एक राग देशकर भी होता है। देशकर और भूपाली में मामूली सा अंतर ये है कि भूपाली कल्याण थाट का होता है और देशकर, बिलावल थाट का। आरोह-अवरोह समझना भी मुश्किल नहीं होता।

सात सुर सा, रे, गा, म, पा, ध, नी एक क्रम में लगभग सबको पता होते ही हैं। राग भूपाली में म और नी इस्तेमाल नहीं किये जाते तो उन्हें हटा कर सीधे यानि बढ़ते क्रम में लिख देते हैं। बढ़ते क्रम में लिखना आरोह (आरोहण यानि उपर चढ़ना) हो जाएगा : सा, रे, गा, पा, ध, सा और अवरोह यानि उतारना होगा : सा, ध, पा, गा, रे, सा। समय के हिसाब से ये रात के पहले पहर का होता है और रस के हिसाब से इसे भक्ति रस का माना जाता है। इसी पर आधारित और फ़िल्मी गाने देखने हों तो एक गाना है “पंख होते तो उड़ आती रे” (सेहरा) या “दिल हुम हुम करे” (रुदाली का) सुन सकते हैं। लेकिन पुराने गाने के बदले बिलकुल ही नए गाने पर तुले हुए हैं तो हाल में एक नए वाले मनोज कुमार यानि अक्षय कुमार की फिल्म आई थी “नमस्ते लन्दन”। उसका एक गाना है “मैं जहाँ रहूँ”, वही तेरी याद साथ है वाला, वो भी इसी राग पर आधारित है। चुनते रहिये। ]

बाजारों चौराहों से गुजरते कभी कंप्यूटर ट्रेनिंग के इश्तेहार देखे हैं ? उनमें अक्सर एक सी शार्प सिखाने का प्रचार होता है | जावा के बगल में ही C # का निशान बना होता है | कभी सोचा है कि ये C# क्या है ? असल में ये एक म्यूजिक नोटेशन होता है | आम तौर पर जो आप हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में सात सुर जानते हैं वैसे ही अंग्रेजी में भी सात ही सुर होते हैं | लेकिन इनके अलावा एक कोमल स्वर के नाम से जाने जाने वाले सुर भी होते हैं |

हिंदी में हम लोग सात सुरों के लिए सा, रे, गा, मा जैसा लिखते हैं वैसे ही ये कोमल स्वर अंग्रेजी में जो होते हैं उनके नाम लिखने के लिए C# या F# इस्तेमाल होते हैं | इसी से प्रेरणा लेकर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का नाम सी शार्प (C#) रखा गया |

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि सुर होते कितने हैं ? भारतीय शास्त्रीय संगीत में इनकी गिनती बारह होती है | अगर आप सोच रहे हैं कि आपने शास्त्रीय संगीत नहीं सुना इसलिए आपने सभी बारह सुर नहीं सुने तो आप फिर से गलत सोच रहे हैं | दूरदर्शन का जो पुराना वाला प्रचार होता था “मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा” वाला ! उसमें ये बारह के बारह इस्तेमाल होते हैं | अब फिर अगर आप कहीं ये सोच रहे हैं कि आपने पुराने ज़माने का ये प्रचार तो सुना ही नहीं इसलिए बारह सुर नहीं सुने तो आपने इश्किया फिल्म का “दिल तो बच्चा है जी” तो सुना ही होगा ? उसमें भी बारह सुर इस्तेमाल होते हैं |

इनके अलावा भी कई गाने हैं जो बारह सुर इस्तेमाल करते हैं | जो भी गाना राग भैरवी पर आधारित होता है उसमें ऐसा होगा | राग भैरवी सुबह के समय गाया जाने वाला राग है | किसी क्लासिकल म्यूजिक कॉन्सर्ट में गए होंगे तो आखरी वाला गाना राग भैरवी का होता है | बिलकुल वैसे ही जैसे बार बंद होते समय कैलिफोर्निया वाला गाना बजता है | इसपर आधारित कई गाने हैं, पुराने में “लागा चुनरी में दाग”, “रमैया वस्ता वैया”, “चिंगारी कोई भड़के” जैसे गाने हैं | नयी फिल्मों में जोधा-अकबर का “मनमोहना”, हेट स्टोरी वाला “आज फिर तुमपे प्यार आया है”, लक बाय चांस का “सपनों से भरे नैना” | बहुत से गाने हैं |

राग भैरवी कैसा होता है तो इसे भी सुन सकते हैं | आनन्द कुमार
 संकलन अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...