बुधवार, 4 सितंबर 2019

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के क्षेत्र में 600 साल पुराना बड़ा अखाड़ा मठ को ध्वस्त किया गया जनता में रोष और विरोध


ढहाया जा रहा है ६०० साल पुराना ‘बडा अखाडा’ मठ, राजनीतिक दल विरोध पर उतरे
भुवनेश्वर : पुरी के जगन्नाथ मंदिर के ७५ मीटर के दायरे में आने वाले मठों व अन्य ढांचों को गिराने का मुद्दा राजनीतिक बनता जा रहा है। एमार मठ के बाद अब साधुओं के ‘बडे अखाडे’ का नंबर है। मठों के ध्वस्तीकरण का राजनीतिक लोगों के साथ ही अन्य वर्ग भी विरोध करने लगे हैं।

१२वीं शताब्दी के श्रीजगन्नाथ मंदिर की सुरक्षा के मद्देनजर ७५ मीटर के दायरे में आने वाले वाले निर्माण को अवैध बताकर ढहाया जा रहा है। मठों को ढहाने की कार्रवाई के विरोध में पुरी के शंकराचार्य समेत भाजपा और कांग्रेस ( Odisha Congress ) विरोध कर रही है जबकि बीजेडी ( BJD ) पक्ष में माहौल बनाने में जुटी है। बीते दिनों इस दायरे में आने वाले एमार मठ को ध्वस्त किया गया। एमार मठ लगभग ९०० साल पुराना है। इसका थोडा हिस्सा बाकी है जहां पर मठ के महंत ध्यान मुद्रा में बैठे बताए जाते हैं। मठ ढहाने का विरोध करने का उनका अपना तरीका है। हालांकि गणेश चतुर्थी की छुट्टी के कारण ध्वस्तीकरण बंद है पर राजनीति में हलके में मुद्दा गरम है। श्रीमंदिर की मेघनाद दीवार से लगे लांगुली मठ और एमार मठ गिराने के बाद ओडिशा की धार्मिक राजधानी पुरी में मठ संस्कृति प्रभावित हुई है।
मठ ढहाना बडा दु:खद

एमार मठ के बाद बडा अखाडा मठ गिराया जाएगा। बडा अखाडा मठ के महंत हरिनारायण दास का कहना है कि मठों के ढहाए जाने का दृश्य देखकर दुख होता है। जनता मौन होकर तमाशा देख रही है और मठ तोडे जा रहे हैं। मठों की प्राचीन संस्कृति और परंपरा के संरक्षण को खत्म किया जा रहा है और लोग चुप हैं। इस मठ के लोग शिफ्टिंग की तैयारी में जुटे हैं।
कांग्रेस ने बताया निंदनीय

सत्ताधारी दल बीजू जनता दल को छोडकर बाकी दल पुरी में चलाए जा रहे ध्वस्तीकरण अभियान को लेकर राज्य में नवीन पटनायक सरकार को घेरने में जुट गए हैं। कांग्रेस के विधायक सुरेश राउत कहते हैं कि हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा खंडित की जा रही है, यह निंदनीय है।
रोजगार पर संकट

मठों से हजारों लोगों की रोजी रोटी जुड़ी है जिसे समाप्त किया जा रहा है। सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। पुरी से भाजपा विधायक जयंत षाडंगी ने मठ ध्वस्तीकरण कार्रवाई की निंदा की। उन्होंने इसे सरकार का अनुचित कार्य बताया। विधायक जयंत का कहना है कि नवीन सरकार को मठों को गिराने से पहले लोगों से राय मशविरा करना चाहिए था। राज्य सरकार के विधि मंत्री प्रताप जेना ने कहा कि लोगों को श्रीमंदिर की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के लिए की जा रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का स्वागत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि श्रीमंदिर पर किसी तरह की राजनीति करना उचित है।
नागा साधुओं ने स्थापित किया था बडा अखाडा

इतिहासकारों का कहना है कि ‘बडा अखाडा’ मठ १४०२ में नागा साधुओं द्वारा स्थापित किया गया था। इस मठ का उद्देश्य बाहरी आक्रांताओं से श्रीजगन्नाथ मंदिर को बचाना था। यह पुरी तीर्थस्थल आने वाले साधुओं के लिए प्रमुख पवित्र स्थल माना जाता है। बताते हैं कि १४ शताब्दी में श्रीरामानंद का पुरी आना हुआ। उन्होंने मंदिरों की रक्षा के लिए कुछ केंद्र स्थापित किए जिन्हें अखाडा कहा जाता है। यहां पर स्थापना के बाद से ही रीतिनीति और नाम संकीर्तन नियमित होता रहता है। जगन्नाथ संस्कृति और रीतिनीति का यह भी हिस्सा बन चुका है।

बुधवार, 28 अगस्त 2019

लुप्त हो चुकी 133 चिकित्सा पद्धतियों को पुनर्स्थापित करने का समय आ गया है


आयुर्वेद सप्ताह में मैंने वादा किया था आपसे कि कुछ आयुर्वेद का उन्नत विज्ञान, वर्तमान मॉडर्न साइंस में चोरी हो रहा आयुर्वेद और सनातन विज्ञान पर कुछ पोस्ट रखूँगा। कुल 157 चिकित्सा पद्धति हैं अभी 21वीं सदी में उनमें कुछ 65 चिकित्सा पद्धतियों पर मैंने खुद रीसर्च किये हैं जो कहीं ना कहीं आयुर्वेद से ही चोरी हुयीं हैं। वर्तमान भविष्य और हमारे पुरखो का विज्ञान, अभी हो रहें रिसर्च, भविष्य में होने वाली साईड ईफेक्ट और कैसे वापस आयुर्वेद पर आयेंगें उनका ठप्पा लगाकर उनके संदर्भ में कुछ टॉपिक पर बात करूँगा। बचपन में मैं सोचता था कि आखिर भारत 250 साल गुलाम रहा तब भी मॉडर्न सायन्स की इतनी तरक्की क्यूँ हुई। सवाल हमें बहुत आगे ले जाते हैं। एक प्रयास है आप सबको इस उन्नत सनातन विज्ञान से रुबरु करवाना और एक सोच देना। अनंत द्वार खुलेंगे आपके सामने नये संशोधन के जो हमारे पूर्वज अनंत खजाना छोडकर गये हैं हमारे लिये। जो मॉडर्न साइन्स इतना चोरी करने के बावजूद भी अभी सिर्फ 2% हैं उनके आगे। आईये मिलवाता हूँ एक छछूँदर से। Dr. OTTO HEINRICH WARBERG करके एक भाई साहब हुए जिसने एक संशोधन किया(ऐसा गुगल बताता है)कि अगर "मानव शरीर अलक्लाईन है तो उसे कैंसर तो क्या सर्दी भी नहीं हो सकती।" इस बात पर भाईसाहब को नोबेल मिला सन् 1931 में और ठप्पा अपने नाम कर गये। विदेशों में खासकर यूरोपियन और अमेरिकन देशों में आज इस सिद्धांत का बहुत बडा चलन हैं. लोग आचरण भी कर रहे हैं और वहाँ के डॉक्टर भी अपनी अच्छी जेब भरते हैं। आइये समझाता हूँ एसिड अल्कलाइन क्या है? चरक, सुश्रुत और कश्यप ऋषि हुए आज से करीब 4500 से 5000 साल पहले जिनके ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और कश्यप संहिता को आयुर्वेद के आधार स्तंभ माना जाता हैं। अब चरक ऋषि ने वात पित्त कफ का सिद्धांत दिया और सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही "दोष धातु मलमूत्रम् ही शरीरम्।" तीन दोष, सात धातु और तीन दुष्य ही शरीर हैं। इतना सरल समझाया शरीर को अगर कोई इनसे आगे शरीर को, समझा दे तो मैं उनका गुलाम हो जाऊँगा। तीन दोष-- वात, पित्त, कफ,, सात धातु-- रस, रक्त, माँस, मज्जा, चरबी, हड्डी और शुक्र,, तीन दुष्य-- मल, मूत्र और पसीना। जरा देखना अपने शरीर को इनसे आगे कुछ है? अब सबसे जटिल है तीन दोष को समझना--- वात, पित्त, कफ। आज के आयुर्वेद वाले लगभग इनको कोई नहीं समझ पाए हैं. इसलिये सटीक ईलाज भी नहीं कर पाते। अब तीन दोष को समझ लिया तो सात धातु आसान हो जाती है। सात धातु संतुलित है तो मल मूत्र पसीना संतुलित ही रहेगा। हम तीन दोष को समझना सामान्य मनुष्य के बस की बात नहीं थी। थोड़े जटिल हैं जो कोई उन्नत आयुर्वेदाचार्य ही समझ सकता हैं। फिर चरक ऋषि के शिष्य हुए वागभट्ट जी जिसने आयुर्वेद को जन सामान्य और खासकर गरीब लोगों के लिये एक सिद्धांत स्थापित किया (याद रखना बायोलोजिकल सूट को संचालित करने के बहुत माध्यम हैं जिसमें कुछ माध्यम को #MD सिरिज़ में रुबरु करवा चुका हूँ।)। क्या था? ......अम्ल-क्षार अम्ल यानी एसिड और क्षार यानी अलक्लाईन। वह भी आज से 4000 साल पहले। जो ऊपर जो बताया छछूँदर उनसे 4000 साल पहले। एसिड-अलक्लाईन अब यह सिद्धांत इतना सरल क्यूँ है? क्योंकि आपको दोष और बाकी जटिल ज्ञान में नहीं पड़ना सिर्फ देखना है एसिड यानी अम्ल बढ़ा है तो अल्कलाइन वाली चीजें प्रयोग करो.... अल्कलाइन यानी क्षार बढ़ा है तो अम्लीय चीजें इस्तेमाल करो। अब अम्ल क्षार का सिद्धांत वागभट्ट जीने दिया 4000 साल पहले... तो तब कोई ज्यादा बीमार नहीं होते थे.... बस कभी ऋतु परिवर्तन के दौरान कुछ छोटी मोटी समस्याएं और समाधान तुरंत यानी इंस्टन्ट आयुर्वेद जो OTTO WARBERG चुरा गया एलोपैथी भी इनसे निकला हुआ इनका एक अलग हिस्सा(गुगल करना समझ जाओगे) भाई साहब नोबेल ले गये ठप्पा लगा दिया पर एसिड अल्कलाइन और आयुर्वेद के तीन दोष को पूरी तरह समझ नहीं पाये। जो वागभट्ट जी आयुर्वेद के तीन दोष को समझने के बाद दिया था अम्ल क्षार का सिद्धांत और पूरी दुनिया झूल रही है इस भूलभुलैया में। 10 में से 9 बीमार.... भारत की बात नहीं कर रहा हूँ.... भारत में तो इतने बीमार भी नहीं जितने बड़े बड़े रोगी यूरोप और अमेरीका में हैं.... जरा स्वास्थ्य बजट देख लेना गुगल में.... कौन सा देश प्रति व्यक्ति कितना खर्च करता है स्वास्थ्य के पीछे समझ जाओगे। अब अम्ल-क्षार हैं क्या? साभार अनन्त मांगलिया

सोमवार, 26 अगस्त 2019

अंतर्राष्ट्रीय साजिशों का शिकार भोजन में साइनाइड का जहर


जनसंख्या वृद्धि रोकने का रास्ता !!! **********************
सावधान आपके खाने और दवाइयों में
साइनाइड नामक प्राणघातक जहर
मिलाकर खिलाया जा रहा है

जानिए क्या है साइनाइड (Cyanide) नामक जहर !!!
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शायद आपने पहले कभी SIDE EFFECT OF CYANIDE के बारे में ना सुना हो,लेकिन यह एक अंतर्राष्ट्रीय साजिस है जिसका शिकार लगभग पच्चास प्रतिशत भारतीय है.दोस्तों आप से निवेदन है की यह पोस्ट सभी लोग सम्पुर्ण ध्यान से पढ़ें और इसे समझें , जो नहीं समझना चाहता वह जहर खाओ.सावधान आपके अन्न और दवाओं में साइनाइड प्राणघातक जहर मिलाया जा रहा है.यह एक घातक जहर है.चौंकिए मत ..यह बिलकुल सत्य है ,आजकल आपने देखा होगा के एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति कुछ काम करते करते अचानक मर जाता है और मृत्यु का कारण पता नहीं चलता ,ऐसी घटनाएं आम हो रही है.आइये देखते है ऐसे खाद्य पदार्थ और दवाएं जिसमे साइनाइड विष मिलाया जा रहाहै.
1) नमक .. आपके नमक के पैकेट को ध्यान से देखिये यदि उस पर crystal modifier या E-536 लिखा हुआ है तो नमक में पोटेशियम फेरो साइनाइड मिला हुआ है जिसके एक केमिकल अणु में 6 साइनाइड के परमाणु है जिसका केमिकल फार्मूला (K4Fe(CN)6) है .
यद्यपि यह अल्प मात्रा में होता है जैसे ही यह हमारे पेट में पहुँचता है उदर में उपस्थित पाचक अम्ल hcl से रिएक्ट कर के पोटेशियम और फेरोसाईनाइड के पोसिटिव और नेगेटिव आयन बनाता है और फेरोसाइनाइड पेट में उत्पन्न hcl से रिएक्ट कर के फेर्रस क्लोराइड और हाइड्रोजन साइनाइड बनाता है जो अत्यंत जहरीला विष है इस विष को डीटॅक्सीफाई या प्रभावहीन बनाने के लिए लिवर पर अत्यधिक दबाव पडता है प्रतिदिन इस धीमे जहर मिले हुए नमक खाने से कुछ महीनो या वर्षो में आप मृत्यु के निकट पहुँच सकते है.
2) विटामिन बी सबसे ज्यादा खाया जाने वाला विटामिन है इस बी काम्प्लेक्स विटामिन में एक जहरीला पदार्थ है साईनाकोबलामिन या b12 (cyanocobalamin) ये आपके पेट या खून में पहुँच कर साइनाइड के अणु छोड़ता है ..सावधान यदि आपके बी काम्प्लेक्स कैप्सूल टैबलेट या इंजेक्शन में b12 सैनकोबाल्मिन है तो मत लीजिये चाहे डॉक्टर कितना भी आश्वाशन दे ।मार्किट में 99% बी काम्प्लेक्स विटामिन में बी12 cyanocobalamin होता है केवल 1 % दावा कम्पनियाँ ही methylcobalamin b12 बनाती है जो खाने में सेफ है सुरक्षित है , इसीलिए विटामिन बी खरीदते समय केवल methylcobalamin b12 युक्त ही ख़रीदे
3) मार्च 2017 में सरकार ने नया फरमान जारी किया है अब गेहूँ के आटे जैसे आशीर्वाद पिल्सबरी पतंजलि आदि में साइनाइड मिला हुआ b12 cyanocobalamin विटामिन डालना अनिवार्य कर दिया है (फोर्टिफाइड आटा)
सरकार ने सुरक्षित b12 methylcobalamin को प्रस्तावित क्यों नहीं किया ? क्या सरकार को नहीं मालूम के तवे के ताप में गेहू की रोटियाँ सेकने पर गर्मी से विटामिन बी पूरी तरह नष्ट हो जाता है और बचते है सिर्फ जहरीले साइनाइड के अणु जो गर्मी से नष्ट नहीं होते ..तो आटे के फोर्टीफिकेशन का क्या फायदा और उपयोग है ? … या सरकार जानबूझ कर अन्न पदार्थो में जहर मिला रही है ?
चौकिये मत सरकार पर छुपी हुई अंतरराष्ट्रीय वैश्विक दानवी सरकार (hidden world government) का दबाव है कि भारत की जनसँख्या कम करने के लिए ये एक कोवर्ट डीपापुलेशन प्रोग्राम है जिसे विस्तार पूर्वक बताऊंगा पढ़ कर होश उड़ जाएंगे,आइये देखते है कुछ और डी-पापुलेशन केमिकल पदार्थ .
आयोडीन नमक विश्व का सबसे बड़ा जंनसंख्याविहिनिकरण (डीपापुलेशन) षड्यंत्र
आज से लगभग 30-40 साल पहले जनता को आयोडीन नमक के बारे में बिलकुल पता नहीं था , जनता में आयोडीन की कमी नहीं थी,यदि मानव इतिहास देखे तो जीसस क्राइस्ट काल या उससे भी पहले पाँच हज़ार वर्ष पूर्व महाभारत या दस लाख वर्ष पूर्व रामायण पुराण आदि में एक भी उदहारण प्राप्त नहीं होता जहां आयोडीन के कमी के लक्षण दिखाई देवे।अचानक ही लगभग 30 साल पहले सरकार ने लाखों करोडो का टीवी और समाचार पत्र में विज्ञापन दे दे कर ब्रेनवाश शुरू किया कि भारत में आयोडीन की कमी है बच्चो के मानसिक विकास के लिए आयोडीन युक्त नमक ही खाये और भोली भारत की जनता ने इसे आदर्श मान लिया, तब भारत में बर्थ रेट 40 प्रति 1000 था.
यही प्रोपेगंडा पकिस्तान में किया गया लेकिन पाकिस्तानी जनता होशियार थी उसने सरकारी आयोडीन नमक को नही ख़रीदा और बाजार में खुला समुद्री नमक ही खरीदने लगी जिसमे आयोडीन जहर नहीं मिलाया गया था, नतीजा पाकिस्तान में सरकार द्वारा प्रायोजित आयोडीन नमक प्रोग्राम फैल हो गया ।आज तीस वर्ष बाद भारत में आयोडीन नमक के कारण बर्थ रेट लगभग 8 प्रति 1000 है. ठीक है जनसँख्या कम होनी चाहिए लकिन ये तरीका ??
भारत में आयोडीन की बिलकुल कमी नहीं है और इसकी पूर्ति दूध और हरी सब्जियों से पूरी हो जाती है आवश्यकता से अधिक आयोडीन खाने से कंठ में स्थित थाइरॉइड ग्रंथि अधिक हार्मोन बनाती है जिससे स्त्रियों में बाँझपन pco अनियमित मासिक स्राव इत्यादि रोग होते है
आज भारत में 70% स्त्रियों में बाँझपन और बच्चे नहीं होने का कारण आयोडीन नमक से उत्पन्न थाइरॉयड समस्या है.
वहीँ पुरुषों में भी आयोडीन नमक से hyperthyroidism के कारण उच्च रक्तचाप मानसिक तनाव अनिद्रा ह्रदय में तेज़धड़कन नपुंसकता आदि रोग होते है आज भारत की जनता को गिनी पिग बना कर आयोडीन नमक के एक्सपेरीमेन्ट के कारण कई परिवारों के अस्तित्व समाप्त हो गए है जनता अब जागरूक हो रही है और धीरे धीरे सब पता चल रहा है इसीलिए अब सरकार सारा दोष टाटा कंपनी पर डाल रही है के टाटा कम्पनी ने सरकार पर दबाव बना कर टाटा नमक में आयोडीन जहर मिलाया,वास्तव में इसे एक फाल्सफ्लैग आपरेशन कहते है जिससे जनता का गुस्सा सरकार से हट कर टाटा पर जाए और जनता टाटा को ही दोषी समझे।
लेकिन अब सत्य का पता चल गया है सरकार ने आयोडीन जहर के एक्सपेरीमेन्ट के लिए टाटा को बलि का बकरा बनाया ।
यदि भारत में आयोडीन नमक (इसका विकल्प सादा खुला बिकने वाला समुद्री नमक और सेन्धा नमक है) , रिफाइंड तेल (इसका विकल्प मूंगफली सरसो जैतून तिल आदि खरीद कर तेल निकलवाए) फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट , अंग्रेजी दर्दनिवारक दवाएं जैसे ब्रूफिन डिक्लोफेनेक असेक्लोफेनेक, आटे और ब्रेड में ब्रोमाइड ,पेप्सी कोला आदि कूलड्रिंक ,पानी में क्लोरीन ब्लीच (इसका विकल्प ओज़ोन है)और एंडोसल्फान जैसे कीटनाशक बन्द हो गए तो भारत में कैंसर ह्रदय थाइरॉइड और किडनी रोग ख़त्म और भारत के 80-90% अस्पताल बन्द हो जाएंगे
1) फ्लोराइड जो टूथपेस्ट में मिलाया जाता है वह जहर है आप केवल बिना फ्लोराइड के टूथपेस्ट का ही इस्तेमाल कीजिये
2) ओरल पोलियो वेक्सीन जिसमे sv40 नामक कैन्सर उत्पन्न करने वाले वाइरस को मिलाया गया है (गूगल सर्च कीजिये)
3)टेटनस टैक्सओइड वेक्सीन (टीटी इंजेक्शन) में स्त्रियों को बाँझ बनाने की दवा की मिलावट .. अपनी लाडली बेटियों को कभी भी टीटी का इंजेक्शन न दिलाये शायद वे जिंदगी में कभी माँ न बन पायेगी क्योकि उसमे anti -HCG antibody की मिलावट की गयी है,विश्वास नहीं हो रहा है tetanus HCG Kenya लिख कर गूगल कीजिये अभी तो केन्या की रिपोर्ट आई है लेकिन भारत में बीस साल पहले यह प्रयोग हो चुका है अब भी जारी है.
*Health-Tips*
*हमेशा काम आने वाले 51 अचूक नुस्खे*
हमारे जीवन में रोगों का प्रभाव पड़ता ही रहता है -हम छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज स्वयं कर सकते है आज हम आप के लिए लाये हैं साधारण छोटे-छोटे प्रयोग जिनको आप अवश्य अपनाए कुछ प्रयोग नीचे दिए गए है जो आपके घर में ही उपलब्ध है अजमाए और लाभ ले –
*1.दमे के लिये तुलसी और वासा:-*
दमे के रोगियों को तुलसी की १० पत्तियों के साथ वासा (अडूसा या वासक) का २५० मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर दें। लगभग २१ दिनों तक सुबह यह काढ़ा पीने से आराम आ जाता है-
*2.मौसमी खाँसी के लिये सेंधा नमक:-*
सेंधा नमक की लगभग 5 ग्राम डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी से आराम मिलता है। नमक की डली को सुखाकर रख लें एक ही डली का बार बार प्रयोग किया जा सकता है-

*3.बैठे हुए गले के लिये मुलेठी का चूर्ण:-*

मुलेठी के चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर खाने से बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है। या सोते समय एक ग्राम मुलेठी के चूर्ण को मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर वैसे ही मुँह में रखकर जाएँ। प्रातः काल तक गला साफ हो जायेगा। गले के दर्द और सूजन में भी आराम आ जाता है-

*4.मुँह और गले के कष्टों के लिये सौंफ और मिश्री:-*

भोजन के बाद दोनों समय आधा चम्मच सौंफ चबाने से मुख की अनेक बीमारियाँ और सूखी खाँसी दूर होती है, बैठी हुई आवाज़ खुल जाती है, गले की खुश्की ठीक होती है और आवाज मधुर हो जाती है-
*5.खराश या सूखी खाँसी के लिये अदरक और गुड़:-*
गले में खराश या सूखी खाँसी होने पर पिसी हुई अदरक में गुड़ और घी मिलाकर खाएँ। गुड़ और घी के स्थान पर शहद का प्रयोग भी किया जा सकता है। आराम मिलेगा-
*6.पेट में कीड़ों के लिये अजवायन और नमक:-*
आधा ग्राम अजवायन चूर्ण में स्वादानुसार काला नमक मिलाकर रात्रि के समय रोजाना गर्म जल से देने से बच्चों के पेट के कीडे नष्ट होते हैं। बडों के लिये- चार भाग अजवायन के चूर्ण में एक भाग काला नमक मिलाना चाहिये और दो ग्राम की मात्रा में सोने से पहले गर्म पानी के साथ लेना चाहिये-
*7.अरुचि के लिये मुनक्का हरड़ और चीनी:-*
भूख न लगती हो तो बराबर मात्रा में मुनक्का (बीज निकाल दें), हरड़ और चीनी को पीसकर चटनी बना लें। इसे पाँच छह ग्राम की मात्रा में (एक छोटा चम्मच), थोड़ा शहद मिला कर खाने से पहले दिन में दो बार चाटें-
*8.बदन के दर्द में कपूर और सरसों का तेल:-*
10 ग्राम कपूर, 200 ग्राम सरसों का तेल – दोनों को शीशी में भरकर मजबूत ठक्कन लगा दें तथा शीशी धूप में रख दें। जब दोनों वस्तुएँ मिलकर एक रस होकर घुल जाए तब इस तेल की मालिश से नसों का दर्द, पीठ और कमर का दर्द और, माँसपेशियों के दर्द शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं-
*9.जोड़ों के दर्द के लिये बथुए का रस:-*
बथुआ के ताजा पत्तों का रस पन्द्रह ग्राम प्रतिदिन पीने से गठिया दूर होता है। इस रस में नमक-चीनी आदि कुछ न मिलाएँ। नित्य प्रातः खाली पेट लें या फिर शाम चार बजे। इसके लेने के आगे पीछे दो-दो घंटे कुछ न लें। दो तीन माह तक लें-
*10.पेट में वायु-गैस के लिये मट्ठा और अजवायन:-*
पेट में वायु बनने की अवस्था में भोजन के बाद 125 ग्राम दही के मट्ठे में दो ग्राम अजवायन और आधा ग्राम काला नमक मिलाकर खाने से वायु-गैस मिटती है। एक से दो सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दिन के भोजन के पश्चात लें-
*11.फटे हाथ पैरों के लिये सरसों या जैतून का तेल:-*
नाभि में प्रतिदिन सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते और फटे हुए होंठ मुलायम और सुन्दर हो जाते है। साथ ही नेत्रों की खुजली और खुश्की दूर हो जाती है-
*12.सर्दी बुखार और साँस के पुराने रोगों के लिये तुलसी:-*
तुलसी की 21 पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भाँति पीस लें और 10 से 30 ग्राम मीठे दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खाएँ। दही खट्टा न हो। यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम तुलसी की चटनी शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भूलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं-
*13.अधिक क्रोध के लिये आँवले का मुरब्बा और गुलकंद:-*
बहुत क्रोध आता हो तो सुबह आँवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन खाएँ और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दूध पी लें। क्रोध आना शांत हो जाएगा-

*14.घुटनों में दर्द के लिये अखरोट:-*

सवेरे खाली पेट तीन या चार अखरोट की गिरियाँ खाने से घुटनों का दर्द मैं आराम हो जाता है-
*15.काले धब्बों के लिये नीबू और नारियल का तेल:-*
चेहरे व कोहनी पर काले धब्बे दूर करने के लिये आधा चम्मच नारियल के तेल में आधे नीबू का रस निचोड़ें और त्वचा पर रगड़ें, फिर गुनगुने पानी से धो लें-
*16.कोलेस्ट्राल पर नियंत्रण सुपारी से:-*
भोजन के बाद कच्ची सुपारी 20 से 40 मिनट तक चबाएँ फिर मुँह साफ़ कर लें। सुपारी का रस लार के साथ मिलकर रक्त को पतला करने जैसा काम करता है। जिससे कोलेस्ट्राल में गिरावट आती है और रक्तचाप भी कम हो जाता है-
*17.मसूढ़ों की सूजन के लिये अजवायन:-*
मसूढ़ों में सूजन होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूँदें पानी में मिलाकर कुल्ला करने से सूजन में आराम आ जाता है-
*18.हृदय रोग में आँवले का मुरब्बा:-*
आँवले का मुरब्बा दिन में तीन बार सेवन करने से यह दिल की कमजोरी, धड़कन का असामान्य होना तथा दिल के रोग में अत्यंत लाभ होता है, साथ ही पित्त, ज्वर, उल्टी, जलन आदि में भी आराम मिलता है-
*19.शारीरिक दुर्बलता के लिये दूध और दालचीनी:-*
दो ग्राम दालचीनी का चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ लेने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है और शरीर स्वस्थ हो जाता है। दो ग्राम दालचीनी के स्थान पर एक ग्राम जायफल का चूर्ण भी लिया जा सकता है-
*20.हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये दूध और काली मिर्च:-*
हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये 10 ग्राम दूध में 250 ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर रख लें। 2-2 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार मक्खन के साथ मिलाकर खाएँ-
*21.श्वास रोगों के लिये दूध और पीपल:-*
एक पाव दूध में 5 पीपल डालकर गर्म करें, इसमें चीनी डालकर सुबह और ‘शाम पीने से साँस की नली के रोग जैसे खाँसी, जुकाम, दमा, फेफड़े की कमजोरी तथा वीर्य की कमी आदि रोग दूर होते हैं-
*22.अच्छी नींद के लिये मलाई और गुड़:-*
रात में नींद न आती हो तो मलाई में गुड़ मिलाकर खाएँ और पानी पी लें। थोड़ी देर में नींद आ जाएगी-
*23.कमजोरी को दूर करने का सरल उपाय:-*
एक-एक चम्मच अदरक व आंवले के रस को दो कप पानी में उबाल कर छान लें। इसे दिन में तीन बार पियें। स्वाद के लिये काला नमक या शहद मिलाएँ-
*24.घमौरियों के लिये मुल्तानी मिट्टी:-*
घमौरियों पर मुल्तानी मिट्टी में पानी मिलाकर लगाने से रात भर में आराम आ जाता है-
*25.पेट के रोग दूर करने के लिये मट्ठा:-*
मट्ठे में काला नमक और भुना जीरा मिलाएँ और हींग का तड़का लगा दें। ऐसा मट्ठा पीने से हर प्रकार के पेट के रोग में लाभ मिलता है। यह बासी या खट्टा नहीं होना चाहिये-
*26.खुजली की घरेलू दवा:-*
फटकरी के पानी से खुजली की जगह धोकर साफ करें, उस पर कपूर को नारियल के तेल मिलाकर लगाएँ लाभ होगा-
*27.मुहाँसों के लिये संतरे के छिलके:-*
संतरे के छिलके को पीसकर मुहाँसों पर लगाने से वे जल्दी ठीक हो जाते हैं। नियमित रूप से ५ मिनट तक रोज संतरों के छिलके का पिसा हुआ मिश्रण चेहरे पर लगाने से मुहाँसों के धब्बे दूर होकर रंग में निखार आ जाता है-
*28.बंद नाक खोलने के लिये अजवायन की भाप:-*
एक चम्मच अजवायन पीस कर गरम पानी के साथ उबालें और उसकी भाप में साँस लें। कुछ ही मिनटों में आराम मालूम होगा-
*29.चर्मरोग के लिये टेसू और नीबू:-*
टेसू के फूल को सुखाकर चूर्ण बना लें। इसे नीबू के रस में मिलाकर लगाने से हर प्रकार के चर्मरोग में लाभ होता है-
*30.माइग्रेन के लिये काली मिर्च, हल्दी और दूध:-*
एक बड़ा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण एक चुटकी हल्दी के साथ एक प्याले दूध में उबालें। दो तीन दिन तक लगातार रहें, माइग्रेन के दर्द में आराम मिलेगा।
*31.गले में खराश के लिये जीरा:-*
एक गिलास उबलते पानी में एक चम्मच जीरा और एक टुकड़ा अदरक डालें ५ मिनट तक उबलने दें। इसे ठंडा होने दें। हल्का गुनगुना दिन में दो बार पियें। गले की खराश और सर्दी दोनों में लाभ होगा-
*32.सर्दी जुकाम के लिये दालचीनी और शहद:-*
एक ग्राम पिसी दालचीनी में एक चाय का चम्मच शहद मिलाकर खाने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है-
*33.टांसिल्स के लिये हल्दी और दूध:-*
एक प्याला (200 मिलीली.) दूध में आधा छोटा चम्मच (2 ग्राम) पिसी हल्दी मिलाकर उबालें। छानकर चीनी मिलाकर पीने को दें। विशेषरूप से सोते समय पीने पर तीन चार दिन में आराम मिल जाता है। रात में इसे पीने के बात मुँह साफ करना चाहिये लेकिन कुछ खाना पीना नहीं चाहिये-
*34.ल्यूकोरिया से मुक्ति:-*
ल्यूकोरिया नामक रोग कमजोरी, चिडचिडापन, के साथ चेहरे की चमक उड़ा ले जाता हैं। इससे बचने का एक आसान सा उपाय- एक-एक पका केला सुबह और शाम को पूरे एक छोटे चम्मच देशी घी के साथ खा जाएँ 11-12 दिनों में आराम दिखाई देगा। इस प्रयोग को 21 दिनों तक जारी रखना चाहिए-
*35.मधुमेह के लिये आँवला और करेला:-*
एक प्याला करेले के रस में एक बड़ा चम्मच आँवले का रस मिलाकर रोज पीने से दो महीने में मधुमेह के कष्टों से आराम मिल जाता है-
*36.मधुमेह के लिये कालीचाय:-*
मधुमेह में सुबह खाली पेट एक प्याला काली चाय स्वास्थ्यवर्धक होती है। चाय में चीनी दूध या नीबू नहीं मिलाना चाहिये। यह गुर्दे की कार्यप्रणाली को लाभ पहुँचाती है जिससे मधुमेह में भी लाभ पहुँचता है-
*37.उच्च रक्तचाप के लिये मेथी:-*
सुबह उठकर खाली पेट आठ-दस मेथी के दाने निगल लेने से उच्चरक्त चाप को नियंत्रित करने में सफलता मिलती है-
*38.माइग्रेन और सिरदर्द के लिये सेब:-*
सिरदर्द और माइग्रेन से परेशान हों तो सुबह खाली पेट एक सेब नमक लगाकर खाएँ इससे आराम आ जाएगा-
*39.अपच के लिये चटनी:-*
खट्टी डकारें, गैस बनना, पेट फूलना, भूक न लगना इनमें से किसी चीज से परेशान हैं तो सिरके में प्याज और अदरक पीस कर चटनी बनाएँ इस चटनी में काला नमक डालें। एक सप्ताह तक प्रतिदिन भोजन के साथ लें, आराम आ जाएगा-
*40.मुहाँसों से मुक्ति:-*
जायफल, काली मिर्च और लाल चन्दन तीनो का पावडर बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। रोज सोने से पहले 2-3 चुटकी भर के पावडर हथेली पर लेकर उसमें इतना पानी मिलाए कि उबटन जैसा बन जाए खूब मिलाएँ और फिर उसे चेहरे पर लगा लें और सो जाएँ, सुबह उठकर सादे पानी से चेहरा धो लें। 15 दिन तक यह काम करें। इसी के साथ प्रतिदिन 250 ग्राम मूली खाएँ ताकि रक्त शुद्ध हो जाए और अन्दर से त्वचा को स्वस्थ पोषण मिले। 15-20 दिन में मुहाँसों से मुक्त होकर त्वचा निखर जाएगी-
*41.जलन की चिकित्सा चावल से:-*
कच्चे चावल के 8-10 दाने सुबह खाली पेट पानी से निगल लें। 21 दिन तक नियमित ऐसा करने से पेट और सीन की जलन में आराम आएगा। तीन माह में यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी-
*42.दाँतों के कष्ट में तिल का उपयोग:-*
तिल को पानी में 4 घंटे भिगो दें फिर छान कर उसी पानी से मुँह को भरें और 10 मिनट बाद उगल दें। चार पाँच बार इसी तरह कुल्ला करे, मुँह के घाव, दाँत में सड़न के कारण होने वाले संक्रमण और पायरिया से मुक्ति मिलती है-
*43.विष से मुक्ति:-*
10-10 ग्राम हल्दी, सेंधा नमक और शहद तथा 5 ग्राम देसी घी अच्छी तरह मिला लें। इसे खाने से कुत्ते, साँप, बिच्छु, मेढक, गिरगिट, आदि जहरीले जानवरों का विष उतर जाता है-
*44.खाँसी में प्याज:-*
अगर बच्चों या बुजुर्गों को खांसी के साथ कफ ज्यादा गिर रहा हो तो एक चम्मच प्याज के रस को चीनी या गुड मिलाकर चटा दें, दिन में तीन चार बार ऐसा करने पर खाँसी से तुरंत आराम मिलता है-
*45.स्वस्थ त्वचा का घरेलू नुस्खा :-*
 नमक, हल्दी और मेथी तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, नहाने से पाँच मिनट पहले पानी मिलाकर इनका उबटन बना लें। इसे साबुन की तरह पूरे शरीर में लगाएँ और 5 मिनट बाद नहा लें। सप्ताह में एक बार प्रयोग करने से घमौरियों, फुंसियों तथा त्वचा की सभी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही त्वचा मुलायम और चमकदार भी हो जाती है-
*46.पेट साफ रखे अमरूद:-*
कब्ज से परेशान हों तो शाम को चार बजे कम से कम 200 ग्राम अमरुद नमक लगाकर खा जाएँ, फायदा अगली सुबह से ही नज़र आने लगेगा। 10 दिन लगातार खाने से पुराने कब्ज में लाभ होगा। बाद में जब आवश्यकता महसूस हो तब खाएँ-
*47.बीज पपीते के स्वास्थ्य हमारा:-*
पके पपीते के बीजों को खूब चबा-चबा कर खाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। इन बीजों को सुखा कर पावडर बना कर भी रखा जा सकता है। सप्ताह में एक बार एक चम्मच पावडर पानी से फाँक लेन पर अनेक प्रकार के रोगाणुओं से रक्षा होती है-
*48.मुलेठी पेप्टिक अलसर के लिये:-*
मुलेठी के बारे में तो सभी जानते हैं। यह आसानी से बाजार में भी मिल जाती है। पेप्टिक अल्सर में मुलेठी का चूर्ण अमृत की तरह काम करता है। बस सुबह शाम आधा चाय का चम्मच पानी से निगल जाएँ। यह मुलेठी का चूर्ण आँखों की शक्ति भी बढ़ाता है। आँखों के लिये इसे सुबह आधे चम्मच से थोड़ा सा अधिक पानी के साथ लेना चाहिये-
*49.सरसों का तेल केवल पाँच दिन:-*
रात में सोते समय दोनों नाक में दो दो बूँद सरसों का तेल पाँच दिनों तक लगातार डालें तो खाँसी-सर्दी और साँस की बीमारियाँ दूर हो जाएँगी। सर्दियों में नाक बंद हो जाने के दुख से मुक्ति मिलेगी और शरीर में हल्कापन मालूम होगा-
*50.भोजन से पहले अदरक:-*
भोजन करने से दस मिनट पहले अदरक के छोटे से टुकडे को सेंधा नमक में लपेट कर [थोड़ा ज्यादा मात्रा में ] अच्छी तरह से चबा लें। दिन में दो बार इसे अपने भोजन का आवश्यक अंग बना लें, इससे हृदय मजबूत और स्वस्थ बना रहेगा, दिल से सम्बंधित कोई बीमारी नहीं होगी और निराशा व अवसाद से भी मुक्ति मिल जाएगी-
*51.अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग:-*
सुबह खाली पेट सप्ताह में एक बार एक चाय का चम्मच अजवायन मुँह में रखें और पानी से निगल लें। चबाएँ नहीं। यह सर्दी, खाँसी, जुकाम, बदनदर्द, कमर-दर्द, पेटदर्द, कब्जियत और घुटनों के दर्द से दूर रखेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना चाह
-खेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

राम के वंशज का यह देश अपने पूर्वजों को भूल चुका है आज इसकी यथार्थ से परिचित होने के लिए अपने पुराणों का सहारा लेना पड़ेगा जिसमें अभी भी विकृति नहीं


भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।
राम ने कुश को दक्षिण कौशल, कुशस्थली (कुशावती) और अयोध्या राज्य सौंपा तो लव को पंजाब दिया। लव ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। आज के तक्षशिला मेँ तब भरत पुत्र तक्ष और पुष्करावती (पेशावर) मेँ पुष्कर सिंहासनारुढ़ थे। हिमाचल में लक्ष्मण पुत्रों अंगद का अंगदपुर और चंद्रकेतु का चंद्रावती में शासन था। मथुरा में शत्रुघ्‍न के पुत्र सुबाहु का तथा दूसरे पुत्र शत्रुघाती का भेलसा (विदिशा) में शासन था।

राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।
राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बड़गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह राजपूतों का वंश चला।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लवपुरी नगर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं।

कुश के वंशज कौन?
राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।

कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।

इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। माना जाता है कि जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं।

तो यह सिद्ध हुआ कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कछवाह), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वे सभी भगवान प्रभु श्रीराम के वंशज है। जयपूर राजघराने की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे।

इस घराने के इतिहास की बात करें तो 21 अगस्त 1921 को जन्में महाराज मानसिंह ने तीन शादियां की थी। मानसिंह की पहली पत्नी मरुधर कंवर, दूसरी पत्नी का नाम किशोर कंवर था और माननसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से की थी। महाराजा मानसिंह और उनकी पहली पत्नी से जन्में पुत्र का नाम भवानी सिंह था। भवानी सिंह का विवाह राजकुमारी पद्मिनी से हुआ। लेकिन दोनों का कोई बेटा नहीं है एक बेटी है जिसका नाम दीया है और जिसका विवाह नरेंद्र सिंह के साथ हुआ है। दीया के बड़े बेटे का नाम पद्मनाभ सिंह और छोटे बेटे का नाम लक्ष्यराज सिंह है। साभार वेबदुनिया
  #श्रीराम_जी_के_वंशज_हैं_रघुवंशी_सूर्यवंशी  #रघुवंशी :- रघुवंशी (इक्षवाकु) राजवंश (1000 ईपू. से 364 ईपू. तक) यह भारत का प्राचीन क्षत्रिय कुल है जो भारतवर्ष के सभी क्षत्रीय कुलों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकुल माना जाता है ऐतिहासिक दृष्टि से रघुकुल मर्यादा, सत्य, चरित्र, वचनपालन, त्याग, तप, ताप व शौर्य का प्रतीक रहा है अयोध्या के सूर्यवंशी सम्राट रघु ने इस वंश की नींव रखी थी रघुवंशी का अर्थ है रघु के वंशज।

अर्थात :- सम्राट रघु के वंशज रघुवंशी कहलाते है बौद्ध काल तक रघुवंशियो को इक्ष्वाकु, रघुवंशी तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाता था मूलरुप से यह वंश भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रारम्भ हुआ था जो सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, ककुत्स्थ वंश व रघुवंश नाम से जाना जाता है आदिकाल में ब्रह्मा जी ने भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को पृथ्वी का प्रथम राजा बनाया था।

भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनु जी सूर्यवंशी कहलाये तथा इनसे चला यह वंश सूर्यवंश कहलाया अयोध्या के सूर्यवंश में आगे चल कर प्रतापी राजा रघु हुये राजा रघु से यह वंश रघुवंश कहलाया इस वंश मे इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ, हरिश्चंद्र, मांधाता, सगर, भगीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी राजा हुये हैं रघुवंशियों के कुछ राजाओं कावर्णन रघुवंशकाव्य में दिया गया है।

भारत का इतिहास 700 ई॰पू॰ से प्रमाणिक व सतत् रूप से प्राप्त होता है इस समय का विवरण अष्टाध्यायी सूत्र,अंगूतर निकाय, भगवती सूत्र आदि गृंथो में मिलता 700 ई॰पू॰ में भारत जनपदों में बँटा था इस समय भारत में १६ महाजनपद और इनके अंतर्गत बहुत से छोटे छोटे जनपद थे।

इनमें अवंती, मगध, वत्स और कौशल महाजनपद प्रमुख थे कौशल जनपद पर इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी राजा राहुल (महाकौशला) का शासन था राजा राहुल महाकौशला ने काशी, लुम्बनी, कपिलवस्तु, कौलिय आदि राज्यों को जीत कर एक विशाल सामृाज्य की स्थापना की थी।

कौशल राज्य की राजधानी साकेत (अयोध्या) थी साकेत
(अयोध्या), श्रावस्ती व वाराणसी कौशल राज्य के प्रमुख नगर थे साकेत(अयोध्या) व श्रावस्ती दोनो नगर चारो ओर से चौड़ी चौड़ी दीवारों से घिरे थे चारो दिशाओ में बड़े बड़े दरवाजे थे दरवाजे बड़े बड़े चोड़े व ऊँचे थे जिन पर सुन्दर नक्काशी थी नगरो में चौड़े चौड़े मार्ग थे।

जब रघुवंशी क्षत्रिय हाथी घोड़ो पर सवार होकर इन मार्गो पर निकलते थे तो रघुवंशी क्षत्रियों का वैभव देखते ही बनता था इस समय के साहित्य में कौशल राज्य के वैभव का जो वर्णन मिलता है वह इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी क्षत्रियों के उत्कर्ष की कहानी को व्यक्त करता है।

जो यह बताने के लिये काफी है कि कौशल जनपद पर रघुवंशी क्षत्रिय का शासन बहुत पहले से रहा है महाकौशला के बाद प्रसेनजित, क्षुदृक, रणक, सुरथ, सौमित्र कौशल(अयोध्या) के राजा हुये सौमित्र कौशल(अयोध्या) के अंतिम रघुवंशी राजा थे मगध (नंदवंश) के शासक महापदमनंद ने सौमित्र को हराकर रघुवंशी किंगडम को समाप्त कर दिया था।
✍🏼विकिपीडिया

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

भारत में कई ऐसी चिकित्सा प्रणाली जो अब विलुप्त सी हो चुकी है उसी में यह सुर्य चिकित्सा या रंग चिकित्सा भी है



सूर्य चिकित्सा एक बहुत पुरानी प्राकृतिक रासायनिक तत्त्वों वाली चिकित्सा है। सूर्य स्नान, सतरंगी किरणों के सातो रंग, लाल, हरे एवं नीले रंगों के गुण ही इस चिकित्सा की मुख्य विशेषताएँ हैं। सूर्य की किरणें एवं इसके सात रंगों द्वारा हमारे शरीर को लाभ देने की उत्तम एवं लाभकारी तकनीक है। सूर्य की किरणों के सातों रंग हरेक रोग में सफल इलाज के अतिरिक्त रोगी को तंदुरस्ती प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसीलिए ‘क्रोमोपैथी’ हानिरहित, बिना लागत, प्राकृतिक रासायनिक तत्त्व सूर्य देव के अमूल्य आशीर्वाद से सुसज्जित है। इस पुस्तक में सूर्य चिकित्सा द्वारा आसान तरीके से विभिन्न रोगों के उपचार बताए गए हैं। एक साधारण व्यक्ति भी इस निःशुल्क चिकित्सा से लाभ प्राप्त कर सकता है।
 सूर्य किरण चिकित्सा एवं इसका महत्व
महर्षि चरक जी आयुर्वेद के मर्मज्ञ ज्ञानी थे। इसके अलावा वह सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। उन्होंने सूर्य किरण तथा रंग चिकित्सा का बड़ी ही विस्तार से वर्णन किया है। उन्हीं के आशीर्वाद से उनका दर्शन, विचार, सांख्य दर्शन ही हमारा प्रतिनिधित्व करता है।
बहुत से रोगों का इलाज खान-पान से जैसे अंकुरित चना, ताजे फल, हरी सब्जियां लेने से ही हो जाता है। चिकने और मसालेदार वस्तुओं को अपने भोजन में से हटा देने से, विश्राम, व्यायाम (टहलना), विशेष व्यायाम जैसे व्यायाम आदि करने से तथा वायु परिवर्तन आदि से हो जाता है। मेरा तो एक ही फर्ज है कि रोगी को पीड़ा से मुक्ति मिले। रोग दूर हों व हर मनुष्य सुखी जीवन जी सकें।
इस किताब को लिखने का उद्देश्य केवल रोगियों को निरोगी बनाने का ही है तथा समाज के कल्याण के लिए सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के बारे में जाग्रत करना है।
सूर्य किरण और रंग चिकित्सा
क्रोमोपैथी क्या है ?
   सूर्य किरण और रंग चिकित्सा एक पुरानी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है। जिसके अन्तर्गत आयुर्वेद पद्धति के मूल सिद्धान्त वात, पित्त तथा कफ की तरह ही शरीर में रंगों के घटने-बढ़ने से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। रोग ज्ञात होने पर जिस रंग की शरीर में कमी हो उस रंग के पूर्ण हो जाने पर रोगों से छुटकारा पाया जाता है। इन रंगों की उत्पत्ति के मूल स्रोत भगवान सूर्य स्वयं हैं। सूर्य की तेजस्वनी किरणें भिन्न-भिन्न रंगों को लिये हुए होती हैं। जिनको उसी रंग की पारदर्शी बोतलों में जल के द्वारा अवशोषित किया जाता है।
जिस रंग की बोतल होती है उसमें भरे जल में सूर्य की किरणें उसी रंग के चिकित्सकीय गुण छोड़ देती है। जिसके कारण वह जल साधारण चल न होकर एक औषधि के रूप में तैयार हो जाता है। यद्यपि यह जल दिखने में साधारण ही लगता है परन्तु जिस रंग की बोतल में यह सूर्य की रोशनी में चार्ज किया हुआ होता है उस रंग के पूर्ण चिकित्सकीय गुण इसमें समाहित होते हैं।
यह चिकित्सा सभी जगह सुलभ व निःशुल्क प्राप्त होती है। जिसके प्राप्त करने में किसी भी व्यक्ति को कोई कठिनाई नहीं होती है। इस चिकित्सा से असाधारण से असाधारण रोग भी ठीक किए जा सकते हैं। इसके लिए रोगी को अपने मनोबल और चिकित्सा पर विश्वास कायम रखना चाहिए।

सूर्य किरण और रंग चिकित्सा (क्रोमोथेरेपी) की उपयोगिता

महर्षि आचार्य चरक के अनुसार जिस संगति में सभी औषधियाँ एक संग रहती हैं वह सूर्य किरण और रंग चिकित्सा ही है। इस पद्धति की औषधियों के माध्यम से सभी रोगों से बड़ी आसानी से मुक्ति मिल जाती है।
1. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से औषधि बनाने की विधि एकदम सरल है। उसी प्रकार सूर्य तप्त तथा सूर्य चार्ज से बनने वाली औषधियों को बनाने की विधि भी एकदम सरल है।
2. इस पद्धति से उपचार करते समय न तो दर्द होता है और न किसी प्रकार का कोई कष्ट होता है ।
3. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से इस पद्धति में जहरीला प्रयोग नहीं होता और न ही बुरा प्रभाव (रियैक्शन) पड़ता है।
4. इस पद्धति में बेहोश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और न ही चीर-फाड़ करने की आवश्यकता होती है।
5. उसी प्रकार जख्म और घाव का निशान तक नहीं पड़ता है। सूर्य की किरणों में रोगों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है।

सूर्य किरणों में सात रंगों के गुण

1. बैगनी (Violet):

शीतल, लाल कणों का वर्धक, क्षय रोग का नाशक है तथा विविधता का प्रतीक है।

2. गहरा नीला (Indigo) :

शीतल, पित्त रोगों का नाशक, ज्वर नाशक तथा शान्ति प्रदान करने वाला है। सूर्य शरीर को निरोगिता प्रदान करता है।

3. आसमानी (Blue) :

शीतल, पित्त रोगों का नाशक तथा ज्वरनाशक, आशा का प्रतीक होता है।

4. हरा (Green) :

समृद्धि और बुद्धि का प्रतीक है। समशीतोष्ण, वात रोगों का नाशक और रक्त शोधक है। ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति और शीतलता का प्रतीक होता है।

5. पीला (Yellow) :

यश तथा बुद्धि का प्रतीक होता है। ऊष्ण, कफ, रोगों का नाशक, हृदय और पेट रोगों नाशक होता है। संयम, आदर्श, परोपकार का प्रतीक होता है।

6. नारंगी (Orange) :

आरोग्य तथा बुद्धि का प्रतीक है। ऊष्ण, कफ रोगों का नाशक मानसिक रोगों में शक्तिवर्धक है तथा दैवी महत्वाकांक्षा का प्रतीक होता है।

7. लाल (Red) :

प्रेम भावना का प्रतीक होता है। अति गर्म, कफ रोगों का नाशक, उत्तेजना देने वाला और केवल मालिश के लिए उत्तम होता है।
आप की गाड़ी में हीटर पर लाल एवं ठंडक पर नीला निशान क्यों ? जी है, यह क्रोमोपैथी ही है।

रंग के तीन परिवारों का महत्त्व

1. पीला, नारंगी लाल—इन तीनों रंगों में से नारंगी रंग ही ठीक रहता है।
2. हरा रंग—यह रंग शीतोष्ण होने के कारण सबसे उत्तम होता है।
3. बैंगनी रंग, गहरा नीला रंग और आसमानी नीला रंग इन तीन रंगों में गहरा नीला रंग ही ठीक रहता है।

2.
रोगी के दोष के अनुसार रंगों द्वारा चिकित्सा
नीले रंग के गुण धर्म

पित्त दोषों में शरीर में गर्मी बढ़ जाती है। इसका सन्तुलन नीले रंग की ठंडक देने वाला सूर्य तप्त नीले पानी और सूर्य चार्ज वायु आदि से होता है। यह हर प्रकार के पित्त जन्य प्रधान रोगों को दूर करता है तथा शान्तिवर्धक है। संदल, कासमी, संतरा, नीबू, क्लोरोफार्म, हाइड्रोजन, अल्युमिनिय, नीलम आदि में नीले रंग की किरणों के तत्व समाए होने के साथ-साथ ही चुम्बकीय शक्ति भी विद्यमान हैं।
1. सूर्य चार्ज नीली बोतल का पानी सारे शरीर को ठण्डक देने वाला होता है।
2. शरीर की अग्नि को कम करता है। तेज बुखार को कम करता है। ज्वर में ज्यादा प्यास लगने को संतुलित करता है। प्यास बुझाता है। चोट के कारण बहने वाले खून को बंद करता है।
3. सूर्य चार्ज किए नीले तेल को सिर में, तालू और कनपटी पर मालिश करने से सिर दर्द ठीक हो जाता है और बुखार भी कम हो जाता है।
4. दस्त तथा खूनी पेचिश में प्रयोग करने से यकीनन आराम आ जाता है।
5. गर्मी से शरीर पर दाने, चेहरे के कील-मुहासे, फोड़े-फुंसी आदि होने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल से ठीक हो जाते हैं और अच्छा लाभ होता है।
6. मच्छर, बिच्छू तथा ततैया आदि के काटने पर सूर्य चार्ज नीला तेल लगाने से तुरन्त फायदा होता है।
7. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा से तैयार नारियल के नीले तेल को लगाने से तुरन्त लगाने से जल जाने की जगह पर तुरन्त आराम आ जाता है। फफोला भी नहीं पड़ता। नीला तेल लगाना बहुत लाभकारी है।
8. टांसिल बढ़ने पर सूर्य तप्त नीले पानी से गरारे करें और सूर्य चार्ज नीली ग्लिसरीन का गले में लेप करने से लाभ मिलता है।
9. दांत दर्द, मसूड़ों की सूजन, दांतों में भोजन या पानी गर्म-सर्द लगना तथा मुंह में छालों के पड़ने पर सूर्य तप्त नीले पानी से गरारे करें और सूर्य चार्ज नीली ग्लिसरीन का मुंह में लेप करने से तुरन्त आराम मिलता है।
10. बच्चों का काग लटकने (घिन्डी) पर सूर्य चार्ज ग्लिसरीन मुंह में लगाने से कुछ ही दिन में आराम आ जाता है।
11. कील-मुहासे, फोड़े-फुंसियां और सूजन हो जाने पर सूर्य चार्ज नीला तेल लगाने से लाभ मिलता है।
12. कान में दर्द होने पर सूर्य चार्ज नारियल का तेल हल्का गर्म करके कान में डाला जाए तो तुरन्त आराम आ जाता है।
13. तेज बुखार में अर्थात एक सौ एक डिग्री से ज्यादा अगर बुखार हो जाए तो सिर में, तालू पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की धीर-धीरे मालिश करने से और पीने के लिए सूर्य तप्त नीला पानी देने से रोगी को लाभ होता है। लेकिन अगर एक सौ एक डिग्री से कम बुखार हो तो नीला पानी बंद कर दें और सूर्य तप्त हरा पानी देने से लाभ होता है।
14. स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) के उत्तेजित होने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की सिर पर, तालू में हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे मालिश करने से शांति मिलती है।
15. बवासीर के मस्सों या अर्श पर सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल कुछ दिन लगाने से बहुत लाभ होता है।
16. बच्चों के दांत निकलने पर सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की तालू पर तीन-चार बूँदें डाल कर हाथ की अगली पोरों से मालिश करने से बच्चों के दांत आसानी से निकल आते हैं।
17. दिमागी काम करने वालों के लिए सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की तालू पर हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे दस-पन्द्रह मिनट मालिश करें। यह दिमाग के लिए बहुत अच्छी औषधि है।
18. तेज ज्वर में सूर्य चार्ज नारियल के नीले तेल की सिर पर मालिश करने से तेज ज्वर में फायदा होता है।
19. सूखी खुजली, दाद-खाज आदि पर सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल लगाने से ठण्डक और शांति मिलती है।
20. सूर्य चार्ज नीले तेल से तैयार की हुई दवाई सब प्रकार की ठण्डक देने वाली दवाइयों से सर्वश्रेष्ठ होता है।
21. जो लोग नींद की गोली खाकर नींद लेते हैं वे अब सूर्य चार्ज नारियल का नीला तेल सिर में तालू पर लगाकर हाथ की अगली पोरों से धीरे-धीरे मालिश करने से गहरी व मीठी नींद का आनन्द ले सकते हैं।

शनिवार, 3 अगस्त 2019

धर्म ग्रंथ जो राष्ट्र को समृद्धि सशक्त और श्रेष्ठता पाठ पढ़ा कर पुरुषार्थ को जागृत करते हैं श्रेष्ठ ज्ञान का समन्वय हमारे धर्म ग्रंथों में है इसरो और नासा के खगोल वैज्ञानिक श्री ओम प्रकाश पांडे जी


रुद्राष्टाध्यायी का एक पूरा अध्याय
जो सेना को समर्पित है

यजुर्वेद में सबसे प्रभावशील देवता हैं - रुद्र । रुद्रदेवता
से  सम्बन्धित कुछ चुने  हुए मंत्रों से 'रुद्राष्टाध्यायी' का गठन हुआ है जिसका घर - घर में पूजाभाव से सस्वर पाठ किया जाता है। कई बटुकों को आज भी सम्पूर्ण 'रुद्राष्टाध्यायी' कंठस्थ होती है । 'रुद्राष्टाध्यायी'  में आठ अध्याय हैं । तीसरा अध्याय राष्ट्र की  सेना और सेनापति को समर्पित है । इस तीसरे अध्याय में  सत्रह मंत्र हैं , जो  वाजसनेयी शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अध्याय 17  ( कंडिका 33 से 49 )  से लिये गये हैं ।आश्चर्य की बात केवल यह कि रुद्राष्टाध्यायी का पाठ जिन्हें आरोह -अवरोह के साथ कंठस्थ होता है ,वे भी इन मंत्रों के अर्थ की गम्भीरता से प्राय: परिचित नहीं होते। अर्थ ज्ञात न हो , तो मंत्र का प्रभाव कैसे जागृत हो।
आशु: शिशानो वृषभो न भीमो
घनाघन: क्षोभणश्चर्षषणीनाम्।
संक्रन्दनो  निमिष ऽ एक वीर:
शत सेनाऽअजयत्साकमिन्द्र:।।
_____________________
शुक्लयजुर्वेद.17.33.1
एक ही वीर सेनापति हो ,
जो भयानक सिंह की तरह दहाड़ कर
टूट पड़े शत्रुओं पर ।
एक ही सेनानायक हो ऐसा
कि हम विजयी हों ,
और काँपने लगे शत्रु की सेना।।1।
योद्धाओं ! शस्त्र उठाओ ,
अपना पराक्रम दिखाओ रणभूमि में ।
शत्रुओं का संहार करो
और विजय-पताका फहरा दो।।2।।
हे सेनानायक !
वीर सैनिकों के साथ प्रयाण करो ।
शत्रुओं को बलपूर्वक 
अपने वश में कर डालो ,
और राष्ट्र की रक्षा करो ।।3।।
अमर्त्य वीरपुत्रों !
तुम रिपुदल का नाश करने में निपुण हो ।
समर में अपना महारथ दिखाओ ,
सब ओर से शत्रुओं का भञ्जन करो ,
सब ओर से उन्हें नष्ट कर
हमारी रक्षा करो।।4।।
सेनापति !
तुम जानते हो उन अजेय सैनिकों को
जो रिपुदमन में हैं कुशल ,
उन्हें साथ में ले कर
प्रस्थान के लिये
रथ पर आरूढ होओ।।5।।
वज्र जैसे हाथों वाला सेनापति
बस , जीतने ही वाला है शत्रुओं की भूमि ।
लोगों ! सब मिल कर
उसका उत्साह-वर्द्धन करो।।6।।
हमारा सेनापति वही हो
जो दया छोड़ कर
नष्ट कर डाले शत्रुओं के समूह ,
किन्तु उन्हें अभय दे
जो हथियार डाल कर
आत्मसमर्पण कर दे।।7।।
हमारा सेनापति समर में
आगे-पीछे , दाँयें-बाँयें और मध्य में
शत्रुओं को परास्त कर
वायु के वेग से झपट कर
विजय प्राप्त करे।।8।।
ओ सेना के अधिपति !
पराक्रमी योद्धाओं !
अपने तन-मन में उत्साह जगाओ,
संयत हो कर उद्घोष करते हुए
विजय के लिये हुंकार भरो ।।9।।
 हमारे आयुध उन्नत हों ,
वेगवान् हों , संहार के लिये समर्थ हों ।
अश्वारोही , रथी कुशल हों ,
गगनभेदी जयघोष हो ।।10।।
ध्वजाएँ फहराती हों ,
शस्त्र हवा में ऊँचे लहराते हों ,
सेनापति के मन में
विजय का दृढ निश्चय हो
देववृंद युद्ध में सहायक हों।।11।।
ओ भयजन्य व्याधियों !
शत्रुओं के चित्त को लुभा कर
उनके अंगों को शिथिल कर दो ।
उनके हृदयों में घुस जाओ ,
जला-जला कर उन्हें
अज्ञान के अंधेरे में घोल दो।।12।।
ओ बाणों ! अस्त्र-शस्त्रों !
शत्रुसेना पर जा कर गिरो ।
एक-एक का विनाश करो ,
किसी को मत छोड़ो।।13।।
ओ वीर योद्धाओं ! जाओ ,
शीघ्र ही शत्रु पर आक्रमण करो।
तुम्हारी भुजाएँ हृष्ट-पुष्ट हों ,
तुम्हें दिव्य सहायताएँ सुलभ हों।।14।।
हे मरुद्गण !
शत्रु सेना बढी चली आ रही
हमसे स्पर्धा करती हुई ,
इसे प्रचंड वायु के वेग से ढँक दो इस तरह
कि ये एक-दूसरे को पहचान भी न सकें।।15।।
शिखाविहीन कुमारों की तरह
तीक्ष्ण बाण गिरते समरभूमि में यहाँ-वहाँ ,
सेनापति ! सबकी रक्षा करो।।16।।
हे राजन् !
तुम्हारी सेना के मर्मांगों को
ढँक देता हूँ कवच से ,
सोम उन अंगों को अमृत से भर दे,
वरुण उन्हें श्रेष्ठता दे ,
समस्त देवता विजय पर प्रसन्न हों।।17।।
वेदों में राष्ट्रभक्ति-
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लेख का प्रारम्भ अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी की श्रीसूक्त के पद की व्याख्या से करते हैं, फिर आगे बात करेंगे -
उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।
अर्थात् हे देव, हमें देवों के सखा कुबेर, और उनके
मित्र मणिभद्र तथा दक्ष
प्रजापति की कन्या कीर्ति (यश)
उपलब्ध करायें, जिससे हमें और राष्ट्र
को कीर्ति-समृद्धि प्राप्त हो।
ऋग्वेद के परिशिष्ट में प्राप्त श्रीसूक्त का यह सातवाँ मन्त्र है ।
उपैतु मां देवसख : कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
७॥
हे महादेव सखा कुबेर ! मुझे मणि के साथ
कीर्ति भी प्राप्त हो । मैं इस राष्ट्र में
जन्मा हूँ । इसलिए यह मुझे कीर्ति और धन दें ।

प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः॥
--कर्णपर्व ४४
. आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीका नाम ते जनाः |
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायो विकुत्सिताः ||(पाठान्तर)

धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के
रूप में जाना जाता रहा है। यही कारण रहा है
कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार माननेकी सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने
का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और
राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र ईसीलिए कही जाती है
कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए
इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है।
 मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ
हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।
तस्मिन्देशे  य  आचार:  पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां  सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
एतद्देशप्रसूतस्य  सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां  सर्वमानवा:  ।।
--मनुस्मृति  १/१३६,१३७,१३९ 

 इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है।
 महाभारत के भीष्म पर्व में भारत
की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।
प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥
अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-
 उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद्
भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।
इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त  और  भारतवर्ष है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

अर्थववेद में ऋषियों ने कहा- भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः / तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे/ ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम्/ तदस्मै देवाः उपसं नमन्तु यानि आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के आरंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया था, उससे राष्ट्र-निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिये सब विबुध होकर इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।

इस राष्ट्र का सीमांकन करते हुये ऋग्वेद में ऋषि में कहा था- यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः। यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।। अर्थात् हिमवान हिमालय जिसका गुण गा रहा है, नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही है, उस राष्ट्र-देव को हम अपना हविष्य अर्पित करें।

ऋषियों ने बार-बार जिस राष्ट्र-देव के आराधना और सेवा की बात की उसकी भगौलिक सीमाओं के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि वेदों में वर्णित नगर, नदी और स्थान जहाँ भी पायें जायें उसे ही हम वृहत्तर भारत की सीमा मान लें और अगर हम ऐसा करते हैं तो पश्चिम में हमें मिलता है आज का अफगानिस्तान जो कम से कम सातवीं-आठवीं सदी तक वृहत्तर भारत का हिस्सा था और पूर्ण हिन्दू था और जहाँ के अफ़रीदी और पख्तून लोगों का विशद वर्णन हमारे ऋग्वेद में मिलता है, जहाँ की नदियों, शहरों और पहाड़ों के नाम हमारे वेदों में बहुतायत से आयें हैं। जिन नदियों को आजकल हम आमू और काबुल नामों से जानते हैं, उन्हें वेदों में वक्षु और कुभा नदी कहा गया है। आमू दरिया वही है जिसे पार कर ह्वेनसांग भारत आये थे। इसी तरह वर्तमान काबुल संस्कृत साहित्य में कुभा नाम से जाना जाता था, आज का कांधार कभी गांधार था और स्वात को हम सुवास्तु नाम से जानते थे। बुद्ध अफगानिस्तान में लगभग 6 माह ठहरे थे। 843 ईस्वी में कल्लार नामक राजा ने अफगानिस्तान में हिन्दूशाही की स्थापना की थी और उन हिन्दू राजाओं को ‘काबुलशाह' या ‘महाराज धर्मपति' कहा जाता था। इन राजाओं में जयपाल और आनंदपाल का नाम तो इतिहास में रूचि रखने वाले लोग अवश्य जानते होंगे क्योंकि इन राजाओं ने लगभग 350 साल तक अरब आततायियों से मोर्चा लिया और उनको कभी सिंधु नदी पार करके भारत में  घुसने नहीं दिया, लेकिन 1019 में महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल की हार के साथ अफगानिस्तान का हिन्दू इतिहास समाप्त हो गया और आज हालत ये है कि कभी हिन्दू राज्य रहे अफगानिस्तान में आज कुछेक हज़ार हिन्दू भी नहीं बचे हैं। देवी-देवताओं की भव्य-प्रतिमाएं किसी अजायबघर की धूल फाँक रहीं हैं तो बामियान की बुद्ध प्रतिमायें तालिबान के ध्वंस चिन्हों को सजाये अपनी संततियों को लज्जित कर रही है।

ये सब लिखने का हेतू ये नहीं है कि अफगानिस्तान के लिये आँसू बहाये जाये बल्कि ये है कि उन बिन्दुओं पर विमर्श हो जिसने अफगानिस्तान का ये हाल कर दिया। हिन्दुशाही राजा वीर थे, राष्ट्रभक्त थे और उनका राज्य उन सब मानकों पर खड़ा उतरता था जिस आधार पर किसी राज्य को आदर्श राज्य कहा जाये। मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हिन्दूशाही राजाओं के खजाने को जब लूटा गया और लूट के माल को गजनी में प्रदर्शित किया गया तो पड़ोसी मुल्कों के राजदूतों की आंखें फटी की फटी रह गईं कि कोई राज्य इतना वैभवशाली भी हो सकता है। अलबरूनी और अल-उतबी ने लिखा है कि हिन्दूशाहियों के राज में मुसलमान, यहूदी, बौद्ध और हिन्दू सभी लोग मिल-जुलकर रहते थे और शासन द्वारा उनमें भेदभाव नहीं किया जाता था बल्कि उन्हें भी वो तमाम अधिकार प्राप्त थे जो किसी हिन्दू प्रजा को थे।

ये सब लिखने का हेतू ये है कि हमें इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने हैं कि क्या खंडित राष्ट्रदेव की प्रतिमा की उपासना की जा सकती है? क्या राष्ट्र के अंदर सभी नागरिकों को भले ही उसकी राष्ट्रीय निष्ठा कुछ भी हो एक समान माना जा सकता है? क्या राष्ट्र-हित में स्वजन और परकीय मानसिकता का भेद नहीं मानना चाहिये? अगर सबके विकास और सबके हित की भावना से राष्ट्र की जड़े और उसके मूल नागरिकों की सुरक्षा संदिग्ध होती हो तो भी केवल "पोलिटिकल करेक्टनेस" के चलते उसे करते चले जाना सही है? मुहम्मद बिन क़ासिम सिंध को लूटने नहीं आया था बल्कि राजा दाहिर की शरणागत वत्सलता ने उसे आने पर मजबूर किया था। खोखले आदर्शवाद, इतिहास में अमर होने की चाह और पोलिटिकल करेक्टनेस की बीमारी ने दाहिर को तो मृत्यु के मुख में पहुँचाया ही साथ ही उसकी मासूम बेटियों को न जाने कितने दर्द झेलने पड़े और भारत के लिये अनवरत आक्रमणों का द्वार खुल गया। यही गलती अफगानिस्तान के भी हिन्दू राजाओं ने की थी जिसने नतीजे में कभी हिन्दू सूर्य से आलोकित होने वाला अफगानिस्तान आज भारत जीतने की मंशा रखने वाले लोगों की

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

एकमात्र ऐसा वृक्ष जिसे भारत सरकार का संरक्षण प्राप्त है इसे पौराणिक पारिजात भी कहते हैं




#पारिजात_वृक्ष (किन्तूर)
#पौराणिक_पारिजात
#महाभारतकालीन_पारिजात
पारिजात वृक्ष (किन्तूर) उत्तर प्रदेश राज्य (भारत) के बाराबंकी जिला अंतर्गत किन्तूर ग्राम में स्थित पारिजात का वृक्ष है। भारत सरकार द्वारा संरक्षित यह वृक्ष सांस्कृतिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोकमत इसका संबंध महाभारतकालीन घटनाओं से जोड़ता है।
#भौगोलिक_स्थिति
ग्राम किन्तूर बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित है। इसी ग्राम में विश्व प्रसिद्ध पारिजात वृक्ष स्थित है। यह वृक्ष सरकार द्वारा संरक्षित है।

#पौराणिक_महत्व

माना जाता है कि किन्तूर गांव का नाम पाण्डवों की माता कुन्ती के नाम पर है। जब धृतराष्ट्र ने पाण्डु पुत्रों को अज्ञातवास दिया तो पांडवों ने अपनी माता कुन्ती के साथ यहां के वन में निवास किया था। इसी अवधि में ग्राम किन्तूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना हुयी थी। भगवान शिव की पूजा करने के लिए माता कुंती ने स्वर्ग से पारिजात पुष्प लाये जाने की इच्छा जाहिर की। अपनी माता की इच्छानुसार अर्जुन ने स्वर्ग से इस वृक्ष को लेकर यहां स्थापित कर दिया

दूसरी पौराणिक मान्यता यह है कि एक बार श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी के साथ व्रतोद्यापन समारोह में रैवतक पर्वत पर आ गए। उसी समय नारद अपने हाथ में पारिजात का पुष्प लिए हुए आए। नारद ने इस पुष्प को श्रीकृष्ण को भेंट कर दिया। श्रीकृष्ण ने इस पुष्प को रुक्मिणी को दे दिया और रुक्मिणी ने इसे अपने बालों के जूड़े में लगा लिया इस पर नारद ने प्रशंसा करते हुए कहा कि फूल को जूड़े में लगाने पर रुक्मिणी अपनी सौतों से हजार गुना सुन्दर लगने लगी हैं। पास में खडी हुयी सत्यभामा की दासियों ने इसकी सूचना सत्यभामा को दे दी। श्री कृष्ण जब द्वारिका में सत्यभामा के महल में पहुंचे तो सत्यभामा ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए हठ किया। सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए स्वर्ग में स्थित पारिजात को लाने के लिए देवराज इंद्र पर आक्रमण कर पारिजात वृक्ष को पृथ्वी पर द्वारिका ले आये और वहां से अर्जुन ने इस पारिजात को किन्तूर में स्थापित कर दिया।

#विशेषताएं

लोकमत इस वृक्ष की आयु 1000 -5000 वर्ष के बीच मानता है। इसके तने का परिमाप 50 फ़ीट और ऊंचाई लगभग 45 फ़ीट होगी।

#पुष्प

इसका पुष्प श्वेत रंग का और सूखने पर सुनहले रंग का हो जाता है। इस वृक्ष में पुष्प बहुत ही कम संख्या में और कभी-कभी ही गंगा दशहरा (जून के माह) के अवसर पर लगते हैं। पुष्प सदैव रात्रि में ही पुष्पित होते हैं और प्रातः काल मुरझा जाते हैं। रात्रि के समय पुष्प पुष्पित होने पर इसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है।

यह तो बात रही पौराणिक पारिजात वृक्ष की जोकि महाभारत काल में माता कुंती के शिव उपासना हेतु शूरवीर अर्जुन ने स्वर्ग से लाकर धरती पर रोपा था अगली पोस्ट में हम वर्तमान पारिजात अर्थात हरश्रृंगार के विषय...क्रमशः

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...