शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

हरितालिका व्रत और त्योहार ही ईस सनातन संस्कृति को बचा रहे हैं दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने हेतु हरतालिका तीज व्रत का बड़ा महत्व है


 भारतीय सनातन संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत सारे अब्राहमिक संस्कृतियों के  दानव राक्षस और यहां के अल्प शिक्षित पढ़े-लिखे मूर्ख अपने ही जड़ों को खोद रहे हैं जिसके परिणाम स्वरुप पूरा सनातन परंपराएं नष्ट हो कर पूरा समाज और घर बिखर रहे हैं ।स्त्री पुरुष की एकता व सात जन्मों तक का साथ निभाने वाला दांम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने वाली भारतीय सांस्कृतिक के छरण से एक हजार प्रतिशत से ज्यादा तलाक के केस बढ़ गये हैं और घर और समाज विखंडित हो रहा है 
वहीं कामी वामी और इस देश के दुश्मन स्त्री और पुरुष को अलग करने में और ऐसे त्यौहारों को हेय दृष्टि या निम्न स्तर का दकियानूसी विचार कहकर  ऐसे व्रत त्यौहारों की निंदा करते हैं फिर भी इस समाज ने धर्म की  जड़े बड़ी गहरी है आप सबको हरि तालिका तीज पर महादेव जी की कृपा बनी रहे और परिवार आपका सुगठित संगठित बना रहे शिव परिवार की तरह

हरतालिका तीज व्रत इस साल 21 अगस्त, शुक्रवार को रखा जाएगा। सभी सुहागन स्त्रियां इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और #स्वास्थ्य_की_कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन जो कोई भी स्त्री अपने पति का हित सोचकर व्रत रखती है, उसका #पति_दीर्घायु होता है। मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती व्रतियों को सुख-संपत्ति, धन-धान्य, पुत्र-पौत्र और स्वस्थ जीवन का वरदान देते हैं।

👉 हरतालिका तीज व्रत का महत्व
इस व्रत को फलदायी माना जाता है। उत्तर भारत में इस व्रत की बहुत अधिक मान्यता है। कहते हैं अगर कोई कुंवारी कन्या अपने #विवाह की कामना के साथ इस व्रत को करती है तो भगवान शिव के आशीर्वाद से उसका विवाद जल्द हो जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि अगर कोई कुंवारी कन्या मनचाहे पति की इच्छा से हरतालिका तीज व्रत रखती है तो भगवान शिव के वरदान से उसकी इच्छा पूर्ण होती है।

👉 मान्यता है जो स्त्रियां इस व्रत को
सच्चे मन से करती हैं उसे #अखंड_सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।यह त्योहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में मनाया जाता है। वहीं, कुछ दक्षिणी राज्यों में इस व्रत को गौरी हब्बा कहा जाता है
👉 हरतालिका तीज व्रत का इतिहास
माना जाता है कि देवी पार्वती के पिता हिमालय ने उनका विवाह श्रीहरि विष्णु के साथ तय कर दिया था। लेकिन उन्होंने तो मन ही मन शिव जी को #अपना_पति मान लिया था। महादेव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती जंगल में तपस्या करना चाहती थीं। तब माता पार्वती की एक सखी उन्हें हर कर घन घोर जंगलों में ले आई। तब से हरतालिका तीज मनाई जाती है।

👉 इस विधि से करें पूजा
इस व्रत में पूजन रात भर किया जाता है. इसके बाद बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती का मूर्ति बनाकर पूजा करें. एक चौकी पर शुद्ध मिट्टी में #गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सहेली की प्रतिमा बनाई जाती है. ध्यान रहें कि प्रतिमा बनाते समय भगवान का स्मरण करते रहें और पूजा करते रहें. इस दिन पूजन-पाठ करने के बाद महिलाएं रात भर भजन-कीर्तन करती हैं. हर प्रहर को पूजा करते हुए बेल पत्र, आम के पत्ते आदि अर्पण करें. फिर शिव-गौरी की आरती करें।

👉 भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें
ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शंभवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

👉 माता पार्वती की पूजा करते वक्त पढ़ें ये मंत्र
ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:
👉 पूजन विधि
हरितालिका तीज पर #मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इसके बाद इन्हें लकड़ी की चाैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर आसन दिया जाता है। चाैकी को फूलों व केले के पत्तों से सजाया जाता है। चाैकी के सामने एक कलश भी रखा जाता है। इस दाैरान शिव-पार्वती पर जल छिड़ककर उन पर फूल व फल चढ़ाए जाते है। धूप, दीप, मेवा, पंचामृत, पान, मिठाई आदि अर्पण किया जाता है। माता पार्वती पर मेंहदी, चूड़ी, सिंदूर, महवर, बिंदी समेत सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। इसके बाद हरतालिक तीज की कथा पढ़ी व सुनी जाती है।

👉 हरतालिका तीज की परंपरा-
हरतालिका तीज व्रत का प्रचलन अति प्राचीन काल से है. कब और कहां से इसका प्रारंभ हुआ, इस बारे में विशेष विवरण नहीं मिलता. लेकिन व्रत का संबंध शिव औऱ पार्वती से है, ऐसा सब मानते हैं. मान्यता है कि भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए सबसे पहले माता पार्वती ने #हरतालिका तीज व्रत का अनुष्ठान किया था. कुछ लोग इसे शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और कुछ लोग इसे शिव को अमरता प्रदान कराने वाले व्रत के तौर पर भी मानते हैं.

👉 ऐसे किया जाता है व्रत
व्रत वाले दिन महिलएं #सुहाग की सारी वस्‍तुएं माता पार्वती को अर्पित करती हैं। सुबह पूजा के बाद महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत करती हैं। पूजन के लिए गौरी-शंकर की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है।

👉 हरतालिका तीज की कथा
हरतालिका तीज के व्रत की कथा भी माता पार्वती और शिवजी से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि पिता द्वारा कराए गए यज्ञ में जब माता पार्वती से शिवजी का अपमान बर्दाश्‍त नहीं हुआ तो उन्‍होंने उसी #यज्ञ_की_अग्नि में कूदकर आत्‍मदाह कर लिया। फिर अगले जन्‍म में वह राजा हिमाचल की पुत्री उमा के रूप में जन्‍मी और इस जन्‍म में भी उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन अपना पति मान लिया।

👉 गौरी-शंकर की होती है पूजा
इस व्रत में मुख्‍य रूप से भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्‍त रूप से पूजा होती है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्‍नान करने के बाद 16 श्रृंगार करती हैं। मान्‍यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए भी कठोर तपस्‍या की थी, तब जाकर भगवान शिव उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे। सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत किया था और इसके प्रभाव से शिवजी उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे।
👉 महिलाएं रखती हैं निर्जला व्रत
सौभाग्‍य की कामना और पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत हरतालिका तीज #भाद्र_मास_के_शुक_पक्ष की तृतीया को रखा जाता है। इस साल यह व्रत 21 अगस्‍त को है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ती हैं और पति का आशीर्वाद लेकर इस व्रत को पूर्ण करती हैं। कुछ स्‍थानों पर कुंवारी कन्‍याएं भी सुयोग्‍य वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं।

👉 हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त
पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 21 अगस्त को पड़ रही है. इस दिन #उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा. इस दिन सिद्ध योग का निर्माण हो रहा है. इस दिन सूर्य सिंह राशि और चंद्रमा कन्या राशि में रहेगा. 21 अगस्त को प्रात: काल मुहूर्त 05 बजकर 53 मिनट 39 सेकेंड से 08 बजकर 29 मिनट 44 सेकेंड तक. प्रदोष काल मुहूर्त 18 बजकर 54 मिनट 04 सेकेंड से 21 बजकर 06 मिनट 06 सेकेंड तक रहेगा. हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त शाम 6 बजकर 54 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगा

👉 हरतालिका तीज: निर्जला एवं फलहारी
हर​तालिका तीज व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह बेहद ही #कठिन_व्रत होता है। इसे दो प्रकार से किया जाता है। एक निर्जला और दूसरा फलहारी। निर्जला व्रत में पानी नहीं ​पीते हैं और न ही अन्न या फल ग्रहण करते हैं, वहीं फलाहारी व्रत रखने वाले लोग व्रत के दौरान जल पी सकते हैं और फल का सेवन करते हैं। जो कन्याएं निर्जला व्रत नहीं कर सकती हैं तो उनको फलाहारी व्रत करना चाहिए।

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

दुनिया का एकमात्र शाकाहारी मगरमच्छ जो आज भी सेवा और पहरेदारी करता है श्रीकृष्ण गुफा की

भारत ऐसे अनेकों चमत्कार और रहस्य से भरा हुआ है इसके कण कण में भगवान का बास माना जाता है पदम्नाभ स्वामी मंदिर का यह रहस्य आपको चौका देगा  या मंदिर के प्रांगण में ही स्थित श्री कृष्ण गुफा की  पहरेदारी

करता हुआ यह शाकाहारी चमत्कारी मगरमच्छ   

श्रीकृष्ण का पहरेदार,
दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ
मगरमच्छ पानी में रहने वाला एक खतरनाक जानवर जो एक इंसानी शरीर को बिना चबाए आराम से निगल सकता है और जिसके शरीर के ऊपर की त्वचा इतनी सख्त होती है कि इस पर बंदूक की गोली का भी कोई असर नहीं होता है
लेकिन आज हम जिस मगरमच्छ के बारे में बात करने वाले हैं वह दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है यह जानकर आपको हैरानी जरूर होगी दोस्तों लेकिन यह एक सच है
केरल के कासरगोड जिले में स्थित है भगवान विष्णु के अवतार श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मंदिर है इसी मंदिर के किनारे बनी झील में रहता है यह शाकाहारी मगरमच्छ जिसका नाम है “बबिया”.
बबिया मगरमच्छ खाने में केवल मंदिर का बना प्रसाद ही खाता है इसके अलावा कुछ नहीं खाता इस झील में उसके साथ रहने वाली मछलियाँ उससे बिल्कुल भी भयभीत नहीं होती है बल्कि आराम से उसके पास तैरती है बिना किसी डर के
अनंत पदमनाभ स्वामी मंदिर
तिरुवंतपुरम में श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का एक बहुत विशाल एवं भव्य मंदिर है लेकिन स्थानीय लोगों के हिसाब से अनंतपुर में स्थित मंदिर ही श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मूल स्थान है
अनंतपुर में यह मंदिर करीब 2 एकड़ जितनी जगह में फैला हुआ है इस मंदिर के पास में एक झील भी है
पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रभु अनंत पद्मनाभस्वामी इसी झील के अंदर स्थित एक गुफा से होकर तिरुवंतपुरम गए थे इसी वजह से दोनों जगहों का नाम एक जैसा ही है
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
मंदिर में पूजा करने वाले स्थानीय पुजारियों के अनुसार लगभग 3000 साल पहले दिवाकर मुनि विल्व मंगलम स्वामी अनंतपुर के इसी मंदिर मे रहा करते थे एवं विष्णु भगवान की पूजा किया करते थे
उनकी पूजा से प्रसन्न होकर एक दिन विष्णु भगवान स्वयं एक छोटे बालक के रूप में उनके सामने प्रकट हुए एवं उनके साथ इसी आश्रम में रहने लगे
धीरे धीरे यह बालक विल्व मंगलम स्वामी के साथ घुल मिल गया एवं वह आश्रम की कार्यों में भी मुनि का हाथ बटाने लगा
समय बीतता गया और एक दिन जब विल्व मंगलम स्वामी अपने दैनिक पूजा का कार्य कर रहे थे उस समय वह बालक उनके कार्य में विघ्न उत्पन्न कर रहा था
इस बात से परेशान होकर उन्होंने उस बालक को डाँटा और उसे पीछे की ओर धकेल दिया
मुनि के इस व्यवहार से आहत होकर वह बालक यह कहते हुए पास स्थित झील मे अदृश्य हो गया कि जब भी विल्व मंगलम स्वामी उनसे मिलना चाहे वे अनंतकट के जंगलों में उसे पाएंगे
जब तक मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ कि जिस नन्हे बालक को उन्होंने डांटा है वह स्वयं भगवान विष्णु का रूप है तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वह बालक झील मे बनी गुफा मे अद्रश्य चुका था
झील मे बनी गुफा
विल्व मंगलम स्वामी स्वयं से हुई भूल का पश्चाताप करने के लिए एवं बालक से माफी मांगने के लिए उसी गुफा में प्रवेश करते हैं और वे गुफा के दूसरी और समुद्र के पास में निकलते हैं वहां पर वह देखते हैं कि समुद्र में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान है उनके चारों और विशाल नाग लिपटे हुए हैं
बबिया मगरमच्छ के अस्तित्व का इतिहास
स्थानीय पुजारियों के अनुसार बबिया मगरमच्छ उसी गुफा में रहता है जहां पर भगवान श्री विष्णु के बाल अवतार श्री कृष्ण अदृश्य हुए थे
उनके अनुसार बबिया मगरमच्छ श्री कृष्ण के द्वार की पहरेदारी करता है
बबिया के बारे में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है मंदिर के पुजारियों द्वारा इसे दिन में दो बार चावल का प्रसाद भोजन के रूप में दिया जाता है
मंदिर में पूजा करने वाले चंद्र प्रकाश जी के अनुसार वे पिछले 10 सालों से बबिया को भोजन करा रहे हैं वे कहते हैं कि वे प्रतिदिन 1 किलो चावल स्वयं अपने हाथों से बबिया को खिलाते हैं
और वह बिना उन पर आक्रमण किए या किसी अन्य मछलियों पर आक्रमण किए प्रसाद का भोजन करता है एवं अपनी गुफा में चला जाता है
बबिया पिछले 75 सालों से इसी झील में रह रहा है
बबिया का इतिहास
स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 75 साल पहले एक ब्रिटिश सैनिक ने बबिया से पहले इस गुफा की सुरक्षा कर रहे मगरमच्छ को मार दिया था
इस घटना के कुछ दिनों बाद ही उसे सैनिक की रहस्यमयी तरीके से सांप के काटने के कारण मृत्यु हो गई. स्थानीय लोगों का मानना है कि सर्प देवता ने उसे उसके अपराध की सजा दी है
पहले वाले मगरमच्छ की मृत्यु हो जाने के बाद बबिया मगरमच्छ उसकी जगह पर उस गुफा की पहरेदारी करने के लिए उपस्थित हो गया.
ऐसा हर बार होता है जब भी गुफा की सुरक्षा में लगा हुआ मगरमच्छ मृत्यु को प्राप्त होता है उसकी जगह पर दूसरा मगरमच्छ अपने आप ही उसका स्थान ले लेता है यह कहां से आते हैं कोई नहीं जानता
यहां पर ऐसी मान्यता है कि अगर आप इस झील में बबिया मगरमच्छ को तैरता हुआ देख लेते हैं तो आपकी किस्मत बदल सकती है बबिया अच्छे भाग्य का प्रतीक माना जाता है
ये हमारा यह श्री कृष्ण का पहरेदार दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ
जय श्री कृष्ण।

बुधवार, 19 अगस्त 2020

आदृश्य गुलामी की प्रमुख हथियार न्याय प्रणाली और मीडिया

    



सुप्रीम कोर्ट के पेत्रिक संपत्ति वाले निर्णय ने कई घरो में घमासान बढ़ा दिया होगा | कोर्ट ने अधिकार की बात तो कर दी , पर जिमेदारी की नहीं की | बिना जिमेदारी के अधिकार नहीं होना चाहिए | जो सेवा करे उसे ही मेवा मिले निर्णय एसा होना चाहिए था |

ये निर्णय हिन्दुओ( सिख जैन बौध भी ) पर ही लागू होता है , कई परिवारों में इस के कारन झगडे बढ़ेंगे और हिन्दू एकता पर भी बुरा असर ही पड़ेगा |   

क्या यह लोकतंत्र है ? जिसमे एक वकील और एक जज बन्द कमरे में बैठ कर करोड़ों लोगों पर अपनी मनमर्जी थोपते हैं । उदहारण के लिये एक वकील कोरट में एक petition दायर करता है ।कि अगर एक हिन्दू अपनी पत्नी के साथ सहवास करता है तो उसे अपनी पत्नी को 10000 रुपये देने पड़ेंगे । जज इसके हक में फ़ैसला दे देता है । अब इस केस में यह फैसला करोड़ों लोगों को प्रभावित करेगा । उनसे बिना पूछे उनपर यह फैसला थोप दिया गया । क्या यह लोकतंत्र है? जिसका गुणगान सारी मीडिया करती रहती है कि अंगरेज हमें लोकतंत्र देकर चला गया । क्या यह अँगरेजों के स्थान पर संविधान ,अदालतों की गुलामी नहीं है । ऐसा ही संसद में होता है 270 व्यक्ति आपकी किस्मत का फैसला करते रहते है वह भी आपको पूछे बिना ।

उदहारण:- communal violence bill , sc st एक्ट ,domestic violence act ,आदि
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विकल्प:- सनातन लोकतंत्र प्रणाली , देश की सरकार के पास मुद्रा ,defense ,interstate transport , आदि को छोड़ कर बाकि सब अधिकार जैसे न्याय ,शिक्षा ,चिकित्सा आदि सब सनातन पंचायतों के पास होना चाहिये । जिसमे आप को तवरित न्याय बिना किसी डाक्यूमेंट्स के ,बिना किसी वकील के ,बिना किसी खर्चे के तुरंत मिल जाता था ।
उदहारण के लिए मान लीजिए किसी गावँ पंचायत में किसी बदचलन औरत ने किसी शरीफ आदमी पर यह आरोप लगा दिया कि यह मुझे आते जाते छेड़ता है । उसका मामला पंचायत में पहुँचा । तो इस शरीफ आदमी के हक में सारा गांव गवाही देगा । सरपंच भी अकेला फैसला नही कर सकता । 1 या 2 घण्टे में मामला निपट जाएगा ।
अब यही मामला अदालत में पहुँच जाए तो पहले आजकल व्यवस्था में एक presumptive evidence की अवधारणा चलती है जिसमे एक व्यक्ति को पहले ही दोषी मान लिया जाता है ।जैसे sc st act में नॉन sc st वर्ग को , दहेज उत्पीड़न के मामले में पति को ,ससुराल को पहले ही दोषी मान लिया जाता है । फिर उस मान लिए दोषी व्यक्ति को यह साबित करना पड़ता है कि वह दोषी नहीं । अब उस मान लिये दोषी व्यक्ति को अनन्त डाक्यूमेंट्स एकत्र करने पड़ेंगे ,जमानत, वकील का इंतजाम करना पड़ेगा । गवाहों को 2000 देकर ,बढ़िया खाने का लालच देकर पांच दस साल , 100- 200 किलोमीटर दूर किसी ac गाड़ी में बिठाकर 500 600 का टूल कटवा कर कोरट में पेश करना पड़ेगा । हो सकता है इस दौरान फ़ैसले का इंतजार करते करते उसकी मौत हो जाये ।
भारत की अंग्रेजी न्यायपालिका के कारनामे"

"1961 में मेरे पिताजी PWD में चतुर्थ श्रेणी के तकनीकी पद पर नोहर (राजस्थान) में पोस्टेड थे। उस समय तक मेरा जन्म नहीं हुआ था। एक दिन उनके अधिशासी अभियंता ने उनको कहा कि कल सालासर टूर पर चलना है, सो वो सुबह सुबह आफिस पंहुचे और वहाँ से जीप में बैठकर चालक सहित नौ व्यक्ति रवाना हो गये। सालासर पहुँच कर कोई सरकारी काम तो ना हो सका लेकिन दर्शन करने के पश्चात खाना पीना हुआ और इस दरमियान चालक की मान मनौवल में कोई कमी रह गयी और उसने वापस आकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में जीप के दुरुपयोग की शिकायत कर दी। इस पर एसीडी ने भी अदालत में जीप के दुरुपयोग का तत्कालीन गंगानगर जिले की अदालत में चालक के अलावा शेष सभी आठ लोगों के विरुद्ध दावा कर दिया और कालांतर में इस केस को बीकानेर सिफ्ट कर दिया गया।

मेरे पिताजी 1995 में रिटायर हो गये, सन 2004 में पिताजी ने मुझे कहा कि आज मेरी कोर्ट में तारीख है और तबीयत खराब है सो कोर्ट मेरे साथ चलना है। मेरी उम्र 2004 में 42 वर्ष हो चुकी थी। कोर्ट जाने पर पिताजी अपनी बारी पर पेश हुए तो पता चला कि आज सरकारी वकील साहब व्यस्त है और मुकदमे की पैरवी करने के लिए हाज़िर नहीं हो सकते। जज साहब नयी तारीख देने लगे तो पिताजी ने कहा, "साहब इजाजत हो तो मैं कुछ अर्ज करता हूँ" और जज साहब के इजाजत देने के बाद पिताजी के बयान के शब्दश: उद्गार मैं नीचे लिख रहा हूँ।

"मान्यवर 42 साल पहले जिस जीप के दुरुपयोग का ये मुकदमा है मैं उस जीप में सवार नौ लोगों में से पद व आयु में सबसे छोटा कर्मचारी था, और 1995 में वो अंतिम व्यक्ति था जो रिटायर हुआ और आज के दिन उन नौ लोगों में इकलौता जीवित व्यक्ति भी हूँ। इस मुकदमे की पेशियों में हाज़िर होने के लिए विभाग आज तक मुझे ₹ 1,30,000/- का TA/DA के रूप में भुगतान कर चुका है। और चूंकि मैं सबसे छोटा कर्मचारी था अत: मुझे ही सबसे कम मिला है लेकिन यदि बराबर भी मान लिया जाए तो लगभग ₹ 1,30,000 X 9 = 11,70,000/- का भुगतान राजकोष से हो चुका है। और हर पेशी पर सरकारी वकील की फीस व हमारे वकील की फीस व न्यायालय के वक्त की बर्बादी अलग से।

"मान्यवर जैसा कि मैंने अर्ज किया कि मेरे सभी सह अभियुक्तों कि मृत्यु हो चुकी है और मै भी अब 70 वर्ष का हूँ और अब मैं भी अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ। अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि चूंकि जीप दुरूपयोग का ही मामला है और आर्थिक दंड से शायद न्याय हो जाये, तो मैं अपने गुनाह को स्वीकार करता हूँ और अगर जेल भी जरूरी है तो जेल भेजो। मेरा क्या भरोसा, मैं अब पका आम हूँ, कभी भी टपक सकता हूँ। फिर आपकी अदालत किसको जेल भेजेगी? "

जज साहब ने तुरंत सरकारी वकील साहब को बुलाया और उसको कहा कि अगर अभियुक्त गुनाह कबुल कर रहा है तो आप इसमें क्या साबित करना चाहते हैं?

और जीप के दुरुपयोग का अनुमानित खर्च ₹ 36/- किया गया। यद्यपि पिताजी अपने अफसर के निर्देशों का पालन कर रहे थे लेकिन चूंकि उनके द्वारा अपने अधिकारी के गलत आदेशों का विरोध नहीं किया गया इसलिए 160/- का अर्थ दंड लगाया गया।

इस प्रकार कुल लगभग 20 लाख रुपये स्वाहा होने के बाद 196/- रूपये की वसूली से हमारी न्याय व्यवस्था ने अपने न्याय के फर्ज को पूरा किया।

हाँ पिताजी अभी भी जीवित हैं और जब भी कोई कोर्ट जाने की बात करता है तो वो मजे ले कर इस किस्से को सुनाते हैं।

गोरखनाथ दुसाने की मूल पोस्ट

बुधवार, 12 अगस्त 2020

गवाँम् मध्ये वसाम्यहम् के श्रेष्ठभाव से अनुप्राणित संपूर्ण कला से युक्त योगेश्वर कृष्ण की जन्मदिन की शुभकामना कैसे दूं जब जन्माष्टमी के दिन गौ माता की लाशें निकल रही है

 

 

 

श्रीकृष्णजन्माष्टम्यां हार्दाः शुभाशयाः।
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
सत्पुरुषों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वालों दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं (श्रीकृष्ण) प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।, for the destruction of the evil-doers, for the enthroning of the Right, I am born from age to age.
🙏🙏🙏🙏🙏
किसी वस्तु में ईश्वर नहीं होता , ईश्वर होता है आपकी बुद्धि में ।
और जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तब वह शालिग्राम और नर्मदा शंकर में पत्थर नहीं देखता ।
जब बुद्धि में ईश्वर आरूढ़ होता है तो गंगा नर्मदा यमुना में नदी नहीं देखता , ईश्वर (देवी) देखता है ।
वह ईश्वर को पीपल और बरगद में देखता है , वह स्त्री में माँ को देखता है वह पुरूष में पिता को देखता है, वह गुरू में ईश्वर देखता है ।
वह गाय में पशु नहीं देवी देखता है ।
और जब बुद्धि ईश्वराकार होने लगेगी तब सर्वत्र श्रीकृष्ण दिखने लगेंगे ।
निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों के सर्वांग रूप साक्षात् श्री हरि , भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी आपके इसी जीवन को कल्याणकारी बनाए , ऐसी मनोभावना करता हूँ ।
मथुरा सहित संपूर्ण विश्व राक्षसों से मुक्त हो , शुद्ध हो !
जय श्री कृष्णा



कृष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत का अंकुरण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है कर्मयोगी श्रीकृष्ण* वह कृष्ण नीति आज भी प्रासंगिक जान पड़ती है

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की स्थापना होती है। इसी राष्ट्र धर्म के अनुसार लौकिक-पारलौकिक-नीति, शत्रु-मित्र-व्यवहार, कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय व्यक्ति और समाज तथा देश-देशांतर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है। इसकी क्रियात्मकता और आचरण में त्रुटि होने पर ,प्रमाद होने पर राष्ट्र पतित हो कर नष्ट हो जाते हैं। महापुरुष उसी तत्वज्ञान को अपने पराक्रम, पुरुषार्थ, बुद्धिमत्ता, कुशलता और व्यावहारिकता के द्वारा पतन के गर्त में जाते हुए राष्ट्र में पुनः प्रतिष्ठित कर नवीन स्फूर्ति प्रदान करते हैं। वे राष्ट्र धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। पश्चात लोग उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते हैं। श्री कृष्ण जी ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में आते हैं।
श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है " चोर जार शिखामणि " अर्थात चोरों और व्यभिचारियों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लम्पट चरित्र जिसे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का अवतार ही क्यों न हो। उसे महापुरुष तो क्या एक साधारण अच्छा नागरिक भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दूसरा चरित्र है - एक हाथ मे पाञ्चजन्य शंख और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए योगेश्वर का। यह है तत्कालीन भारत का भाग्य विधाता, वैदिक संस्कृति का उद्गाता और त्राता, महाराज युधिष्ठिर का मंत्री, पांडव साम्राज्य का निर्माता और महाभारत का श्रेष्ठपुरुष श्रीकृष्ण।
पहले चरित्र का चित्रण पुराणों ने किया है और दूसरे का चित्रण महाकवि कृष्ण द्वैपायन व्यास के महाभारत ने। विचारणीय यह है कि हमारे लिए कौन सा स्वरूप आदर्श और अनुकरणीय हो सकता है ? दोनों स्वरूपों में से श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप इन प्रश्नों का समाधान करते हैं।  " श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण , कर्म , स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिसमें अधर्म का आचरण अर्थात श्रीकृष्ण जी ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा। परन्तु इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं। इस को पढ़ - पढ़ा और सुन-सुना कर अन्य मत वाले लोग श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओ की झूठी निंदा क्यों कर होती ? " अतः सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण चरित्र सर्वथा झूठा है और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय नहीं है अतः त्याज्य है।
*श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और वंश*
भारत मे सूर्य और चंद्र वंश के नाम से दो क्षत्रियकुल विख्यात हैं। चंद्र वंश में ययाति नाम के बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। ययाति के बड़े पुत्र यदु राजा हुए। उन्हीं के वंश में उत्पन्न होने के कारण श्रीकृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय कहे जाते हैं। कालांतर में इसी वंश में मधु नामक राजा हुए, इनके वंशज होने से यादव माधव कहलाए। आगे चलकर इसी वंश में सत्वत नाम के बड़े प्रसिद्ध राजा हुए। सत्वत के पुत्रों से दो उपवंश चले एक अंधक और दूसरा वृष्णि। श्रीकृष्ण वृष्णि वंशी थे इसलिए उनका नाम वार्ष्णेय भी है।
राजा अंधक जिन्हें भोज या महाभोज भी कहते थे, उनके दो पुत्र हुए कुकुर और भजमान। श्रीकृष्ण की माता देवकी कुकुर वंश की थी और पिता वासुदेव वृष्णि वंश के थे। श्रीकृष्ण के पितामह का नाम शुर, पिता का नाम वासुदेव तथा माता का नाम देवकी था। इनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में यमुना के किनारे पर बसे मथुरा नामक नगर में हुआ था। मथुरा और उसके आस पास यादवों के कुल सत्रह उपवंश बसे हुए थे और इनके पुरुषों की संख्या अठारह हजार थी, ऐसा महाभारत के सभा पर्व में लिखा है।
श्रीकृष्ण के समान बुद्धिमान, कर्मकुशल, अद्भुत सूझबूझ वाला, उपयज्ञ, व्यवहार कुशल, निश्चिंत और पराक्रमी पुरुष आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ। धर्मशास्त्र एवं वैदिक राजनीति का इतना बड़ा पंडित अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। यह एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है जिसने अपने स्वप्न को जीते जी साकार होते हुए देखा, जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया और जीवन को सफल व धन्य किया। एक ऐसा व्यक्तित्व जो सदा मुस्कराता है, भारी से भारी संकटों का सामना करते हुए भी जो न कभी टूटता है, न झुकता है और न ही मोहग्रस्त होता है। वह कभी जय-पराजय की चिंता नहीं करता , सांसारिक पदार्थो की आसक्ति छू तक नहीं गई, निजी पीड़ा का कभी ध्यान ही नहीं करता। इसे अपनी योजना और अपने बुद्धि कौशल पर पूरा भरोसा है, निराशा और पलायन की प्रव्रत्ति को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देता। सचमुच अद्वितीय आदर्श पुरुष है यह, इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है।
*रुक्मिणी से विवाह*-- जरासंध का एक साथी बड़ा राजा था विदर्भराज भीष्मक। उसकी पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्ण के शील गुणों पर आसक्त थी परन्तु उसका पिता व भाई श्रीकृष्ण के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहते थे। श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी पर मुग्ध थे। जरासंध ने रुक्मिणी का विवाह अपने सेनापति चेदिराज शिशुपाल से करवाने का निश्चय किया। सम्बन्ध तय हो गया, बारात आ पहुँची। परन्तु इससे पूर्व ही श्रीकृष्ण रुक्मिणी को उसके पिता के घर से किसी प्रकार निकाल लाए। जब बाराती राजाओं को पता लगा तो उन्होंने श्रीकृष्ण का रास्ता रोकना चाहा परन्तु श्रीकृष्ण ने सबको अपने युद्ध कौशल से परास्त कर दिया। रुक्मिणी के भाई रुक्मी पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि वह सदा के लिए श्रीकृष्ण का होकर रह गया। इस प्रकार एक और बड़ा राज्य यादव संघ के साथ मिल गया और श्रीकृष्ण की शक्ति सुदृढ़ हुई। श्रीकृष्ण ने घर आकर रुक्मिणी से विधिवत विवाह किया।
जरासन्ध ने छियासी राजाओं को कैद में डाल रखा था। श्रीकृष्ण ने जरासन्ध की मृत्यु के तत्काल बाद उन सभी राजाओं को मुक्त करा दिया। वे बड़े प्रसन्न हुए और श्रीकृष्ण जी से अपने योग्य सेवा कार्य बताने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित होने का आदेश देकर उन्हें विदा दी। इस प्रकार छियासी राजा तो श्रीकृष्ण के साथ आ ही गए और भी बहुत से राजे जो जरासन्ध की अधीनता भयवश स्वीकार कर चुके थे, वे भी युधिष्ठिर के पक्ष में आ मिले। धर्म का पक्ष और अधिक सुदृढ़ हुआ और खंड-खंड भारत अखंडता की ओर अग्रसर हुआ।
प्राग्ज्योतिष ( वर्तमान असम ) का राजा नरक जो जरासन्ध का मित्र था, उसने सोलह हजार से अधिक सुंदर स्त्रियों का अपहरण करके बन्दी बना रखा था और उनके साथ बलात्कार करता, करवाता था। श्रीकृष्ण ने उसे मारकर सभी युवतियों को मुक्त करा दिया। इस कार्य से संसार भर की नारी जाति के दिल में अपना आदर पूर्ण स्थान बना लिया और भारत को अखंड बनाने में योगदान प्राप्त किया।
श्रीकृष्ण का जीवन जैसा महाभारत में मिलता है उससे उनके चरित्र और शील का पता चलता है। उनकी दिनचर्या वैदिक धर्म के अनुसार थी। वे प्रतिदिन संध्या और हवन दोनों समय करते थे। दूत बन कर हस्तिनापुर गए तब मार्ग में सायंकाल सन्ध्या, हवन का वर्णन है। इसी प्रकार दूसरे दिन कौरव सभा में जाने से पूर्व संध्या हवन करते हैं। जिस दिन अभिमन्यु मारा गया उस दिन भी सायंकाल सन्ध्या वन्दन करके शोक संतप्त पांडवों से जाकर मिलने का वर्णन है। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण आस्तिक ईश्वर भक्त थे तथा वैदिक कर्मकांड में पूर्णतया निष्ठा रखते थे।
शिष्टाचार और वृद्धजनों को सम्मान देने में भी वे अत्यंत विनीत और शिष्ट थे। व्यास, धृतराष्ट्र, कुंती तथा युधिष्ठिर आदि से जब मिले तब चरण छूकर नमस्ते बोल कर अभिवादन करने का वर्णन मिलता है। माता - पिता के प्रति भी बहुत प्रेम और आदरभाव रखते थे। जब भी घर जाते हैं, पहले माता-पिता के दर्शन करते हैं, चरण छूकर अभिवादन करके पश्चात पत्नी से मिलते है। बड़ो को झुककर अभिवादन और छोटो को गले लगाकर मिलते है। युधिष्ठिर के राजसूय में प्रथम पूज्य होकर भी जब कार्य बांटा गया तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों, विद्वानों के चरण धोने का कार्य अपने लिए आग्रह करके ग्रहण किया। विद्या में वे सांगोपांग वेद तथा विज्ञान के ज्ञाता थे। स्वंय भीष्म पितामह ने उन्हें उस समय के सब पुरुषों में श्रेष्ठ स्वीकार किया है। भीष्म श्रीकृष्ण का बहुत ही आदर करते थे।
रुक्मिणी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थी उसके साथ विवाह के पश्चात श्रीकृष्ण उसे लेकर बद्रिकाश्रम चले गए और वहाँ बारह वर्ष तक दोनों ने घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। इसके पश्चात शास्त्रविधि से गर्भाधान करके सनत कुमार जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम प्रद्युम्न था। भला ऐसा तपस्वी और संयमी पुरुष व्यभिचारी और परस्त्रीगामी कैसे हो सकता है
*श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं ने कहा है*--
*यद यद आचरति श्रेष्ठस्तत तदेवेतरे जनः। स यत प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*
अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते है। वह प्रमाण मान लेता है, संसार भी उसी का अनुवर्तन करने लगता ष्ण का  वह स्वरूप एक कुशल रणनीतिकार और युद्ध संचालक के साथ एक श्रेष्ठ राज्य संचालक गीता के ज्ञान से पुरुषार्थ को जगा कर धर्म की स्थापना का कार्य पूर्ण किया हमारे मानस पटल पर आज भी अंकित है जहां चारों तरफ अन्याय अधर्म के ताने-बाने में पूरा समाज बर्बाद हो चुका था वही योगेश्वर कृष्ण ने अधर्म को नाश करके धर्म की स्थापना  का कार्य हमें प्रेरणा जगाता है कि आज गौ हत्या दंगा बलवा के बीच से ही श्रेष्ठ भारत निर्माण का दायित्व हम सभी कृष्ण के चाहने वालों की एक प्रमुख आवश्यकता है योगेश्वर श्रीकृष्ण*
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बना कर राष्ट्र धर्म की....
आप शायद सो गए होंगे पर मुझे आज उसी कृष्ण की जन्म का इंतजार है  जिनके  जन्म से ही  सारेबंधन टूट जाते हैं अभी भी है क्योंकि दीन दुखी भारत नर नारी दुष्टन करत उपद्रव भारी अब जात है हिंद की लाज यही अवसर आओ भारत में जन्म के कुछ क्षण पूर्व यह लेख आपको भेजा है राष्ट्रीय स्वतंत्रत गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क 7984113987
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सभी को ह हार्दिक शुभकामनाएं

 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

प्रधानमंत्री मोदी के चुनावक्षेत्र काशी के श्मशान जहां चिता की आग कभी बुझती नहीं वही नगरवधू के नृत्य की अद्भुत परंपरा



# काशी का # मणिकर्णिका श्मशान घाट के बारे में मान्यता है कि यहां # चिता पर लेटने वाले को सीधे # मोक्ष मिलता है। दुनिया का ये इकलौता श्मशान जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। जहां लाशों का आना और चिता का जलना कभी नहीं थमता। यहाँ पर एक दिन में करीब
# 300_शवों का अंतिम संस्कार होता है।
*
बहुत से लोग भारत की इस प्राचीन परंपरा से अनभिज्ञ हैं लेकिन ये सच है कि सदियों से बनारस के इस श्मशान घाट पर # चैत्र_माह में आने वाले नवरात्रों की सप्तमी की रात पैरों में घुंघरू बांधी हुई # वेश्याओं का जमावड़ा लगता है। एक तरफ
# जलती_चिता_के_शोले आसमान में उड़ते हैं तो दूसरी ओर घुंघरू और तबले की आवाज पर नाचती वेश्याएं दिखाई देती हैं।
*
मौत के मातम के बीच श्मशान महोत्सव का रंग बदल देते हैं तबले की आवाज, घुंघरुओं का संगीत, और मदमस्त नाचती नगरवधुएं। जो व्यक्ति इस प्रथा से अनजान होगा उसके लिए यह मंजर बेहद हैरानी भरा हो सकता है कि रात के समय श्मशान भूमि पर इस जश्न का क्या औचित्य है?
*
# भगवान_भोलेनाथ को समर्पित, काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। यही वजह है कि वेश्याएं भी यहां नाच-नाचकर भोलेनाथ से यह प्रार्थना करती हैं कि उन्हें इस तुच्छ जीवन से मुक्ति मिले और अगले जन्म में वे भी समाज में सिर उठाकर जी सकें

शनिवार, 4 जुलाई 2020

सुपात्र शिष्य को सुपात्र गुरु ईश्वर की प्रेरणा और आपका अनुराग ही तय करता है गुरु शिष्य की महिमा और मर्यादा

 



  शिष्य गुरु का चयन नहीं करता अपितु गुरु शिष्य का चयन स्वयं करता हैं।
शिष्य अपने अंदर स्वार्थ लेकर गुरु ढूंढेगा तो उसे केवल कालनेमि गुरु मिलेगे।
यदि आपके मन में उपासना करने की,  परमात्मा को पाने की तीव्र इच्छा या तड़प होगी तो परमात्मा आपको स्वयं ही किसी सक्षम गुरु से आपको दीक्षा दिलवा देगा।
इसीलिए अपने अंदर पात्रता उत्पन्न करें।
दीक्षा के उपरांत गुरु द्वारा दिये गये आज्ञा आदेश को मंत्र की तरह का विधिवत स्वयं  ध्यान रख कर उसे साधना की अग्नि में तपाये, मंत्र जप से भी श्रेष्ठ कर्म को आधार बना कर धर्म राष्ट्र और मानवता की साधना के द्वारा मनुष्य यात्रा के शिखर पर पहुच जाता हैं।
यदि आपको सही में आपको इस जीवन से मुक्त होना हैं तो आपके पास गुरु हैं अथवा नहीं, इसका कोई बड़ा महत्व नहीं हैं। परमात्मा सम्पूर्ण जगत का गुरु हैं। गुरु बनाने से पहले स्वयं के अंदर पात्रता अर्जित करों, गुरु स्वयं मिल जायेगा, नहीं तो निरा भटकाव हैं, ये माया गुरु तत्व को देखने ही नहीं देंगी।
गुरु के पास बैठो,
आँसू आ जाएँ, बस इतना ही काफी है।
चरण छूना गुरु के, बस याद रहे भविष्य की कोई आकांक्षा ना हो।
मौन प्रार्थना जल्दी पहुँचती हैं गुरु तक, क्योंकि मुक्त होतीं हैं शब्दों के बोझ से।
गुरु का होना ही आशीर्वाद है, मांगना नहीं पड़ता, गुरु के पास होने से ही सब मिल जाता है।
जैसे फूल के पास जाओ खुशबू बिन मांगे मिल ही जाती है
कुछ मांगना मत गुरु से सिर्फ जाना उसकी शरण में, सब स्वयं ही मिल जायेगा।।
-गुरु शिष्य सम्बन्ध की आवश्यक बाते*
*गुरु दीक्षा क्या है -*
दीक्षा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द दक्ष से हुई है जिसका अर्थ है कुशल होना। समानार्थी अर्थ है - *विस्तार*। इसका दूसरा स्रोत दीक्ष शब्द है जिसका अर्थ है - *समर्पण* : अतः दीक्षा का सम्पूर्ण अर्थ हुआ - *स्वयं का विस्तार*।
दीक्षा के द्वारा शिष्य में यह सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि गुरु से प्राप्त ऊर्जा के द्वारा शिष्य के अंदर आतंरिक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है , जिसके प्रकाश में वह अपने अस्तित्व् के उद्देश्य को देख पाने में सक्षम होता है। दीक्षा से अपूर्णता का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है।
गुरु का ईश्वर से साक्षात सम्बन्ध होता है। ऐसा गुरु जब अपनी आध्यात्मिक / प्राणिक ऊर्जा का कुछ अंश एक समर्पित शिष्य को हस्तांतरित करता है तो यह प्रक्रिया गुरु दीक्षा कहलाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की सबसे प्रारम्भिक पग है। गुरु दीक्षा के उपरांत शिष्य गुरु की आध्यात्मिक सत्ता का उत्तराधिकारी बन जाता है। गुरु दीक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे गुरु और शिष्य के मध्य आत्मा के स्तर पर संबंद्ध बनता है जिससे गुरु और शिष्य दोनों के मध्य ऊर्जा का प्रवाह सहज होने लगता है। गुरु दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य दोनों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। गुरु का उत्तरदायित्व समस्त बाधाओं को दूर करते हुए शिष्य को आध्यात्मिकता की चरम सीमा पर पहुचाना होता है। वहीं शिष्य का उत्तरदायित्व हर परिस्थिति में गुरु के द्वारा बताये गए नियमों का पालन करना होता है।
*दीक्षा के प्रकार-*
स्पर्श दीक्षा, दृग दीक्षा, मानस दीक्षा
शक्ति, शाम्भवी, मांत्रिक दीक्षा
*गुरु दीक्षा कौन दे सकता है -*
गुरु शब्द का अर्थ है जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये। एक सम्पूर्ण जागृत गुरु, जो की सहस्त्र्सार चक्र में स्थित हो वही दीक्षा देने का अधिकारी होता है . ऐसे गुरु की पहचान उनके व्यवहार से होती है। ऐसे गुरु सबके लिए करुणामय होते है. उनका ज्ञान अभूतपूर्व होता है . जागृत गुरु अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और मोह से दूर रहते है. वह शिष्य की किसी भी समस्या और परिस्थिति का समाधान निकालने में सक्षम होते है. ऐसे गुरु का ध्यान अत्यंत उच्च कोटि का होता है।
*गुरु दीक्षा किसको दी जाती है -*
शिव पुराण में भगवान् शिव माता पार्वती को योग्य शिष्य को दीक्षा  देने के महत्त्व को इस प्रकार समझाते है - हे वरानने ! आज्ञा हीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन तथा विधि के पालनार्थ दक्षिणा हीन जो जप किया जाता है वह निष्फल होता है।
इस वाक्य से गुरु दीक्षा का महत्त्व स्थापित होता है। दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य एक दूसरे के पाप और पुण्य कर्मों के भागी बन जाते है। शास्त्रो के अनुसार गुरु और शिष्य एक दूसरे के सभी कर्मों के दसवे हिस्से के फल के भागीदार बन जाते है, यही कारण है कि दीक्षा सोच समझकर ही दी जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि दीक्षा के योग्य कौन होता है? धर्म अनुरागी, उत्तम संस्कार वाले और वैरागी व्यक्ति को दीक्षा दी जाती है। दीक्षा के उपरान्त आदान प्रदान की प्रक्रिया गुरु और शिष्य दोनों के सामर्थ्य पर निर्भर करती है। दीक्षा में गुरु के सम्पूर्ण होने का महत्व तो है ही किन्तु सबसे अधिक महत्व शिष्य के योग्य होने का है। क्योंकि दीक्षा की सफलता शिष्य की योग्यता पर ही निर्भर करती है। शिष्य यदि गुरु की ऊर्जा और ज्ञान को आत्मसात कर अपने जीवन में ना उतार पाये अर्थात क्रियान्वित ना करे तो श्रेष्ठ प्रक्रिया भी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए अधिकांशतः गुरु शिष्य के धैर्य, समर्पण और योग्यता का परीक्षण एक वर्ष तक विभिन्न विधियों से करने के उपरान्त ही विशेष दीक्षा देते है। ऐसी दीक्षा मन, वचन और कर्म जनित पापों का क्षय कर परम ज्ञान प्रदान करती है।
शिष्य को किस प्रकार की दीक्षा दी जाए इसका निर्धारण गुरु शिष्य की योग्यता और प्रवृत्ति के अनुसार करता है। दीक्षा का प्रथम चरण है मंत्र द्वारा दीक्षा। जब शिष्य अपनी मनोभूमि को तैयार कर, सामर्थ्य, योग्यता, श्रद्धा, त्यागवृत्ति के द्वारा मंत्रो को सिद्ध कर लेता है तो दीक्षा के अगले चरण में पहुंच जाता है। अगला स्तर प्राण दीक्षा / शाम्भवी दीक्षा का होता है।
कभी कभी गुरु स्वयं ही अपने शिष्य का चुनाव करते है। शिष्य का गुरु से जब पिछले जन्म से ही सम्बन्ध होता है और जागृत गुरु को इसका ज्ञान होता है, ऐसी परिस्थिति में गुरु स्वयं शिष्य का चुनाव करते है।
जब व्यक्ति की योग्यता अच्छी हो और गुरु पाने की तीव्र अभिलाषा हो तो योग्य गुरु को योग्य शिष्य से मिलाने में इश्वर स्वयं सहायता करते है। ऐसा श्री राम कृष्ण परमहंस के साथ हुआ था। उनके गुरु तोताराम को माँ काली ने स्वप्न में दर्शन देकर रामकृष्ण के गुरु बनने का आदेश दिया था।
तीसरी परिस्थिति में शिष्य अपनी बुद्धिमत्ता से गुरु की योग्यता की पहचान कर दीक्षा को धारण करता है और गुरु शिष्य की योग्यता को समझकर दीक्षा के प्रकार का निर्धारण करता है।
*अच्छे शिष्य के लक्षण -*
* गुरु के वचनों पर पूर्ण विश्वास करने वाला
* आज्ञाकारी
* आस्तिक और सदाचारी
* सत्य वाणी का प्रयोग करने वाला
* चपलता, कुटिलता, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या इत्यादि अवगुणों से दूर रहने वाला
* जितेन्द्रिय
* पर निंदा, छिद्रान्वेषण, कटु भाषण और सिगरेट मद्य इत्यादि व्यसनों से दूर रहने वाला
* गुरु के सदुपदेशों पर चिंतन मनन करने वाला
* नियमों का पालन श्रद्धा और विश्वास से करने वाला
* गुरु की सेवा में उत्साह रखने वाला
* गुरु की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति दोनों परिस्थितियों में उनके आदेशों का पालन करना
*चेतना के जागरण के लिए तीन पक्षों का सामंजस्य अनिवार्य है -*
१- शिष्य का पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास
२- गुरु की सामर्थ्य
३- दैवीय कृपा
*गुरु की आवश्यकता क्यों -*
गुरु की चेतना इश्वर से निरंतर संयुक्त रहने के कारण इश्वर तुल्य होती है , जबकि साधारण मनुष्य की चेतना संसार से जुडी रहने के कारण वाह्य्मुखी और अधोगामी होती है। चेतना के वाह्य मुखी और अधोगामी होने के कारण इश्वर से हमारा संपर्क टूट जाता है जिसके कारण अविद्या का प्रभाव बढ़ जाता है। अविद्या के प्रभाव के कारण मनुष्य की प्रवृत्ति छोटी छोटी बातों में दुखी होने की, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, अनिर्णय और अविवेक की स्थिति से घिर जाता है। फलस्वरूप निम्न कर्मों की ओर प्रवृत होकर चेतना के स्तर से गिर कर मनुष्य योनी को छोड़कर निम्न योनियों को प्राप्त हो जाता है।
गुरु को प्रकृति और ईश्वर के नियमों का ज्ञान होने के कारण उनमे अज्ञानता के भंवर से निकलने की क्षमता होती है। वह शिष्य को धीरे धीरे ज्ञान देकर , कर्मों की गति सही करवाकर और सामर्थ्य की वृद्धि करवाकर अज्ञान के इस भंवर से निकाल कर ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करवा देते है।
*क्या हमारा विकास सृष्टि और हमारे परिवारजनों को प्रभावित करता है -*
हम सभी एक चेतना के अंश है, चाहे वह कोई भी वनस्पति हो, जीव हो, नदी हो, पहाड़ पर्वत हो अथवा पशु पक्षी हो. इसका अर्थ यह है कि ईश्वर सृष्टि के हर कण में विद्यमान है। यह एक अलग बात है की मनुष्य पौधों और जंतुओं में चेतना का प्रतिशत भिन्न भिन्न होता है। चेतना के प्रतिशत के अनुपात के अनुसार कार्य और विचार की क्षमता प्राप्त होती है। मनुष्यों में सृष्टि के अन्य व्यक्त रूपो से चेतना का प्रतिशत अधिक होता है। इसी कारण मनुष्य को इच्छा, कर्म और ज्ञान की सामर्थ्य प्राप्त है। चेतना का स्तर मनुष्य अपने प्रयासों के द्वारा बढ़ा कर परम चेतना को प्राप्त कर सकता है। जब एक चेतना अपना विकास कर परम चेतना को प्राप्त करती है तो सकारात्मक ऊर्जा की सृष्टि में वृद्धि हो जाती है और विभिन्न अनुपातों में अन्य प्राणियों के विकास में सहायक होती है...गुरु दक्षिणा किसे ?? और कैसी ?? कौन गुरु ?? भारत में हजारों साल से कुलगुरु की परंपरा रही है जो उच्च कुल से और कुलीन होते   जो पशुवत जीवन आहार निद्रा भय मैथुन से ऊपर मानवीय संवेदना जगाते हैं आप जीवन में अनेक अन्य लोगों से भी कुछ श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त होता है उनमें से किसी एक के प्रति श्रद्धा होती है जिनके विचार आपके अपनी भाव विचार से अनुप्राणीत होकर आप अपना गुरु वरण करते हैं कभी-कभी सही गुरु की पहचान ना होने से या अपनी तृष्णा वासना की पूर्ति के चक्कर में बनावटी बाजारु मिडिया मैनेजमेंट कालनेमि गुरुघंटाल मास्टर जो चारों तरफ बहुतायत से दिख जाते हैं और आप उन्हीं में उलझ जाते हैं जिनके वजह से जीवन लक्ष्य भटक जाता है और जीवन नीरस और  बोझिल होकर शोक अभाव मैं डूबा रहता है पहले परंपरागत गुरु के लिए आपको कोई खोज नहीं करनी होती है पर व्यवहारिक जीवन में दूसरे गुरु को बड़े सावधानी से खोज की जाती है जिससे आप आपका जीवन श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है
जीवन में जो भी ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन उन्नत किया है इस गुरु पूर्णिमा पर्व पर आपका गुरु के प्रति कुछ पुष्प पत्र फल फूल गुरु दक्षिणा योगदान अर्पण समर्पण सानिध्य करते हैं तो जरुर करें अन्यथा अभिमान भारी पड़ेगा और यह ज्ञान भी समय पर कोई काम आने वाला नहीं अजय कर्मयोगी
13 - जुलाई को -पूर्णिमा है, न जाने कितने शिष्य जिंहोंने अपने गुरु से मंत्र लिया हुआ है उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करेंगे। गुरुजी तो शिष्यों की श्रद्धा देखकर गदगद हो जाएँगे। शिष्यों की शिष्यता देखते ही बनेगी।
यदि बिना विकार के देखा जाए तो अपने से अधिक गुणवान और मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धा रखना बहुत अच्छी बात है, परंतु क्या सच्ची में ऐसा है? मेरे विचार से नहीं । अभी तक लोग केवल गुरु की बातें करते आए हैं। गुरु ढोंगी होता है शिष्यों को बहकाकर अपना बुकचा भरता है, अपने ऐशो-आराम के लिए बहुरुप रखता है, यह सच है, परंतु सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कई शिष्यों द्वारा भी गुरु का फ़ायदा उठाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा के पर्व पर गुरु और शिष्य दोनों को यह सोचना चाहिए। गुरु जो सम्मोहन फैलाकर अबोधजनों को अपनी ओर खींच रहे हैं, क्या सचमुच गुरु हैं? उनमें गुरुता है? शिष्य जो गुरु के नाम पर मज़े कर रहे हैं क्या यही श्रद्धा है? नहीं।
न आज कोई गुरु है न शिष्य। सभी अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। सबसे बड़ा गुरु अपना मन है, अपनी आत्मा है, अपना विवेक है, जिसकी आज्ञा से हम चलते हैं। मन को नियँत्रित किए बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता और आत्म-ज्ञान के बिना विवेक जागृत नहीं होता। हमारा विवेक हमें कभी ग़लत कार्य करने की सलाह नहीं देता। विवेक से चलने के लिए मनोबल बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए बाहरी थपेड़ों से अप्रभावित रहने का अभ्यास करना पड़ता है, जो अत्यंत कठिन है। चारों ओर फैले भौतिक सुख जो इंद्रियों को तृप्त करते हैं मन को पीछे धकेलते रहते हैं। इतना पीछे कर देते हैं कि इंद्रिय-सुख ही मन का सुख लगने लगता है। पर असल में आत्मा और परमात्मा का सुख ही असली सुख होता है। विवेक एक सुंदर नियँत्रक हैं। हमें हमेशा ग़लत कार्य करने से रोकता हैं। गुरु भी तो यही करता है तो फिर शरीर के अंदर छिपे गुरु को पहचानना और उसकी बात मानना ही सर्वश्रेष्ठ है।
जब आत्म गुरु मर जाता है या कुपोषित हो जाता है तो हम बाहर की ओर भागते हैं। जहाँ तक गृहण करने की बात है तो उसके लिए ज़रुरी नहीं कि एक ही व्यक्ति सिखा सकता है। मन तो हमारा है उसे स्वयं ही समझना होगा, रही बात संसार की तो सजीव और निर्जीव, त्याज्य और स्वीकार्य सभी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। अनुभव मार्गदर्शन का कार्य भी करता है, पर मन मारकर तो किसी भी गुरु से कुछ नहीं सीखा जा सकता। आज मन को जागृत करके उसी को बलवान बनाने की महती आवश्यकता है। पर कमज़ोर मन ही भ‍टकता फिरता है। एक श्रेष्ठ गुरु के सानिध्य से यह उच्चता श्रेष्ठता प्राप्त करता है
     बरना यहां बहुत सारे कालनेमि मजमा लगाए बैठे आपको भटकाने के लिए



मंगलवार, 30 जून 2020

गीताप्रेस शस्त्रों गोली पिस्तौल की सप्लाई करता था शास्त्रों के बीच में रखकर

    

  आपके लिए गीता प्रेस कि यह चौकाने वाली जानकारी एक अकल्पनीय रहस्यमई बात हो सकती है कि शास्त्रों के बीच में शस्त्रों को रखकर सशस्त्र क्रांति का एक शंखनाद अंग्रेजो के विरुद्ध हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के नेतृत्व में गीता प्रेस की पत्रिका कल्याण के द्वारा द्वारा चलाई जा रही थी
हिंदुओं के हृदय के प्राण ~ हनुमान प्रसाद पोद्दार 'भाई जी'
आज से लगभग छः महीना पहले मैनें BBC में गीताप्रेस परएक लेख पढा था। लेख में यह कुतर्क गढा गया था कि, किस तरह गीताप्रेस नामक छापखाना हिंदू भारत बनाने के मिशन पर काम कर रहा है। उसके बाद मैनें एक और “गीताप्रेस की महिलाओं पर तालिबानी सोच” शीर्षक से एक लेख पढा। दोनों लेख पढकर मेरे दिमाग की घंटी बज उठी थी।आखिर BBC गीताप्रेस जैसे विशुद्ध धार्मिक प्रेस का विरोध क्यों कर रही है? अवश्य ही इसके पिछे कोई न कोई रहस्य छिपा हुआ है। क्योंकि BBC भारत में उसी का विरोध करता आया है, जो अंग्रेजी सत्ता का विरोधी था। तभी मेरे दिमाग ने कहा, “अवश्य ही गीताप्रेस भी अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध रहा होगा।”
तब से लेकर मैं खोज करता रहा, और कल मेरी खोज पूरी हुई और आज BBC के उस पुराने लेख को काउंटर कर रहा हूँ। आगे बढने से पहले बता दूँ, गीताप्रेस के विरूद्ध कम्युनिस्टों का अलग षडयंत्र चल रहा है। गीताप्रेस पर एक वामपंथी पत्रकार ने भी किताब लिखी है जिसका नाम है, “Gita Press And The Making Of Hindu India”.
ऐसे तो गीताप्रेस की स्थापना 1924 में हुई है, उसके पहले कलकत्ता में 1920 में “गोविंद भवन कार्यालय” की स्थापना हुई थी। और उससे पहले ‘कल्याण’ पत्रिका शुरू हुई थी। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि गीताप्रेस के संस्थापक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार एक क्रांतिकारी थे। और उनके क्रांतिकारी संगठन का नाम था ‘अनुशीलन समिति’। कलकत्ता में बन्दूक, पिस्तौल और कारतूस की शस्त्र कंपनी थी जिसका नाम “रोडा आर.बी. एण्ड कम्पनी” था। यह कंपनी जर्मनी, इंग्लैण्ड आदि देशों से बंदरगाहों से शस्त्र पेटियाँ मंगाती थी।
देशभक्त क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लङने के लिए पिस्तौल और कारतूस की जरूरत थी। लेकिन उनके पास धन नहीं था कि खरीद सकें। तब ‘अनुशीलीन समिति’ के क्रांतिकारियों ने शस्त्र चुराने की योजना बनाई। और इस काम को हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को सौंप दिया गया। हनुमान प्रसाद जी ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस रोडा बी.आर.डी. कंपनी में एक शिरीष चंद्र मित्र नाम का बंगाली क्लर्क था, जो अध्यात्मिक प्रवृति का था। वह हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का बहुत आदर करता था। पोद्दार जी ने इसका फायदा उठाकर उस क्लर्क को अपने पक्ष में कर लिया।
हनुमान प्रसाद पोद्दार जी
एक दिन कंपनी ने शिरीष चंद्र मित्र को कहा समुद्र चुंगी से जिन बिल्टीओं का माल छुङाना है वह छुङा कर ले आएं। उसने यह सूचना तत्काल हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को दे दी। सूचना पाते ही पोद्दार जी कलकत्ता बंदरगाह पर पहुंच गये। यह बात है 26 अगस्त 1914 बुधवार के दिन की। बंदरगाह पर रोडा कम्पनी की 202 शस्त्र पेटीयां आई हुईं थी। जिसमें 80 माउजर पिस्तौल और 46 हजार कारतूस थे, जिसे कंपनी के क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र ने समुंद्री चुंगी जमा कर छुङा लिया।
इधर बंदरगाह के बाहर हनुमान प्रसाद पोद्दार जी शिरिष चंद्र का इंतजार कर रहे थे। इसमें से 192 शस्त्र पेटीयां कंपनी में पहुंचा दी गईं और बाकी के 10 शस्त्र पेटीयां हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के घर पर पहुंच गई। आनन-फानन में पोद्दार जी ने अपने संगठन के क्रांतिकारी साथियों को बुलाया और सारे शस्त्र सौंप दिये। उस पेटी में 300 बङे आकार की पिस्तौल थी। इनमें से 41 पिस्तौल बंगाल के क्रांतिकारीयों के बीच बांट दिया गया। बाकी 39 पिस्तौल बंगाल के बाहर अन्य प्रांत में भेज दी गई। काशी गई, इलाहाबाद गई, बिहार, पंजाब, राजस्थान भी गई।
आगे जब अगस्त 1914 के बाद क्रांतिकारियों ने सरकारी अफसरों, अंग्रेज आदि को मारने जैसे 45 काण्ड इन्हीं माउजर पिस्तौलों से सम्पन्न किये थे। क्रांतिकारियों ने बंगाल के मामूराबाद में जो डाका डाला था उसमें भी पुलिस को पता चला की रोडा कम्पनी से गायब माउजर पिस्तौल से किया गया है। थोङा आगे बढ गये थे खैर पीछे लौटते हैं।
हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को पेटीयों के ठौर-ठिकाने पहुंचाने-छिपाने में पंडित विष्णु पराङकर (बाद में कल्याण के संपादक ) और सफाई कर्मचारी सुखलाल ने भी मदद की थी। बाद में मामले के खुलासा होने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार, क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र, प्रभुदयाल, हिम्मत सिंह, कन्हैयालाल चितलानिया, फूलचंद चौधरी, ज्वालाप्रसाद, ओंकारमल सर्राफ के विरूद्ध गिरफ्तारी के वारंट निकाले गये। 16 जुलाई 1914 को छापा मारकर क्लाइव स्ट्रीव स्थित कोलकाता के बिरला क्राफ्ट एंड कंपनी से हनुमान प्रसाद पोद्दार जी को गिरफ्तार कर लिया गया। शेष लोग भी पकङ लिये गये। सभी को कलकता के डुरान्डा हाउस जेल में रखा गया। पुलिस ने 15 दिनों तक सभी को फांसी चढाने, काला पानी आदि की धमकी देकर शेष साथियों को नाम बताने और माल पहुंचाने की बात उगलवाना चाहा, लेकिन किसी ने सच नही उगला। पोद्दार जी के गिरफ्तार होते ही माङवारी समाज में भय व्याप्त हो गया। पकङे जाने के भय से इनके लिखे साहित्य को लोगों ने जला दिया था।

पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार जी छूट गये। इसके दो कारण थे, पहला कि शस्त्र कंपनी के क्लर्क शिरीष चंद्र मित्र बंगाल छोङ चुके थे। इसलिए गिरफ्तार नही किये गये। दूसरा कारण तमाम अत्याचार के बाद भी किसी ने भेद नही उगला था।
इस घटना से छः साल पूर्व 1908 में जो बंगाल के मानिकतला और अलीपुर में बम कांड हुआ था, उसमें भी अप्रत्यक्ष रूप से गीताप्रेस गोरखपुर के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार शामिल रहे थे। उन्होनें बम कांड के अभियुक्त क्रांतिकारियों की पैरवी की। पोद्दार जी का भूपेन्द्रनाथ दत्त, श्याम सुंदर चक्रवर्ती, ब्रह्मबान्धव उपाध्याय, अनुशीलन समिति के प्रमुख पुलिन बिहारी दास, रास बिहारी बोस, विपिन चंद्र गांगुली,अमित चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारीयों से सदस्य होने के कारण निकट संबध था।अपने धार्मिक कल्याण पत्रिका बेचकर क्रांतिकारियों की पैरवी करते थे। बाद में कोलकता में गोविंद भवन कार्यालय की स्थापना हुई तो पुस्तकों और कल्याण पत्रिका के बंडलों के नीचे क्रांतिकारियों के शस्त्र छुपाये जाते थे।
इतना ही नहीं खुदीराम बोस, कन्हाई लाल, वारीन्द्र घोष, अरबिंद घोष, प्रफुल्ल चक्रवर्ती के मुकदमे में भी ‘अनुशीलन समिति’ की ओर से हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने ही पैरवी की थी। उन दिनों क्रांतिकारियों की पैरवी करना कोई साधारण बात नहीं थी।
भारत विभाजन के मांग पर कांग्रेसी नेता जिन्ना के सामने चुप रहते थे पर गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका पुरजोर आवाज में कहती थी, “जिन्ना चाहे देदे जान, नहीं मिलेगा पाकिस्तान”। कल्याण यह कहकर ललकारता था। यह पंक्ति कल्याण के आवरण पृष्ठ पर छपती थी। पाकिस्तान निर्माण के विरोध में कल्याण महीनों तक लिखता रहा था।
गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका ऐसी निडर पत्रिका थी कि कल्याण ने अपने एक अंक में प्रधानमंत्री नेहरू को हिंदू विरोधी तक बता दिया था। इसने महात्मा गांधी को भी एक बार खरी-खोटी सुनाते हुए कह डाला था, “महात्मा गांधी के प्रति मेरी चिरकाल से श्रद्धा है, पर इधर वे जो कुछ कर रहे हैं और गीता का हवाला देकर हिंसा-अहिंसा की मनमानी व्याख्या वे कर रहे हैं, उससे हिंदूओं की निश्चित हानि हो रही है और गीता का भी दुरपयोग हो रहा है।”
जब मालवीय जी हिंदूओं पर अमानवीय अत्याचारों की दिल दहला देने वाली गाथाएं सुनकर द्रवित होकर 1946 में स्वर्ग सिधार गए, तब गीताप्रेस ने मालवीय जी की स्मृति में कल्याण का श्रद्धांजली अंक निकाला। इसमें नोआखली, खुलना, तथा पंजाब सिंध में हो रहे अत्याचारों पर मालवीय जी की ह्रदय विदारक टिप्पणी प्रकाशित की गई थी। जिस कारण उत्तरप्रदेश और बिहार की कांग्रेसी सरकार ने कल्याण के श्रद्धांजली अंक को आपतिजनक घोषित करते हुए जब्त कर लिया था।
जब भारत विभाजन के समय दंगा शुरू हो गया था और पाकिस्तान से हिंदूओं पर अत्याचारों की खबर आ रही थी, तब भी गीताप्रेस ने कांग्रेस नेताओं पर खूब स्याही रंगी थी। तब कल्याण ने अपने सितम्बर-अक्टूबर 1947 के अंक में यह लिखना शुरू कर दिया था, “हिंदू क्या करें?” इन अंको में हिंदूओं को आत्मरक्षा के उपाय बताए जाते थे। ऐसे गीताप्रेस और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी से BBC और कम्युनिस्टों की चिढन स्वाभाविक ही है।
 

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...