🙏🏻 *तथाकथित कोरोना से मुक्त बनाये ये उपाय*
हमारी मजबुत रोग प्रतिरोधक क्षमता हमे कोरोना से बचाती है। इस काढ़े का सेवन करे व अन्य लोगो से भी साझा करे ।
हल्दी 100 ग्राम
सौंठ 50 ग्राम
कालीमिर्च 10 ग्राम
गीलोय 200 ग्राम
कालमेध 100 ग्राम၊ चिरायता 50 ग्राम कुटकी 50 ग्राम पारिजात 50 ग्राम
सभी चीजो को साफ करके चूरन बनां लिजिए आैर मिक्स कर दिजिए । दो गिलास पानी मे एक चम्मच चूर्ण लेकर धीमी आंच पर काढ़ा बनाए जब आधा गिलास पानी बचे तब ठंडा होने पर खाली पेट सुबह सेवन करे । https://youtu.be/DqMPeeXUJ3E
कृपया इस संकट की घड़ी मे ऐसी जानकारी को सभी तक पहुंचाने की सेवा जरूर करे ।
अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान
*इस वक्त सिर्फ एक चीज जो आपके घर और हॉस्पिटल में अंतर पैदा कर रही है, वो 'वेंटिलेटर' है..*
बाकी आपके पास दवाइयों की जानकारी/लिस्ट है, होम आइसोलेशन गाइड है, डॉक्टर्स भी किसी ना किसी संपर्क से फोन पर अवेलबल हो जाते होंगे, लेकिन बस वो वेंटिलेटर ही है, जो अभी तक घरों में मौजूद नहीं है।
उस वेंटीलेटर की आपको कभी जरूरत ही नही पड़ेगी अगर आप एक्सटर्नल सेनिटाइजर के साथ-साथ 'इंटर्नल सेनिटाइजर' भी इस्तेमाल करें। ये सेनिटाइजर है 'अजवायन के पानी की भाप' लेना और ये भाप मुहँ से अंदर लेनी है। अजवाइन के पानी की भाप आपके फेफड़ों के लिए सेनिटाइजर का काम करती है। ये भाप ना केवल ऑक्सीजन का लेवल बढ़ाती है बल्कि इससे हमारी बॉडी ब्लॉट भी नहीं करती। इसके अलावा ऑक्सीजन का लेवल बॉडी में बनाये रखने के लिए हमें ठीक मात्रा में पानी भी पीते रहना चाहिए ताकि शरीर में इसकी कमी नहीं हो।
इसके अतिरिक्त एक चीज और कर लें - हम सबने ABCD पढ़ी ही होगी। कोविड की इस स्ट्रेन में हम उसमें से A हटा दें और सिर्फ BCD का ध्यान रख लें। विटामिन B हरी सब्जियों और मौसमी फल में मिल जाएगा। विटामिन C खट्टी चीजों - नींबू, संतरा, अंगूर, टमाटर में मिल जाएगा और विटामिन D सुबह की धूप में 10 मिनट की एक वॉक से मिल जाएगा।
अब अगर हम एक मौसमी फल, एक नींबू पानी का गिलास, 10 मिनट की छत पर एक वॉक और अजवाइन के पानी की भाप ले रहे हैं तो कोविड हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
हॉस्पिटल और घर के बीच जो वेंटिलेटर आ रहा है उसे ऊपर बताए तरीकों से मार कर हम स्वस्थ्य रह सकते हैं। बाकी मास्क, सेनेटाइजर और वैक्सीन अति-आवश्यक है। उसे तो बिल्कुल भी नहीं भूलना है।
चाहे इस विश्व के कण कण में hospital खोल दो , चाहे हर मनुष्य क्या , हर जीव के कोख से Doctor पैदा करवा दो ,
चाहे दवाईयों के पेड़ या फसल ही बोने लग जाओ , तब भी सब बीमारियों से मरते ही रहेंगे ।
क्यों ????
क्योंकि
*काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।*
*निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।।*
जब तक हमारे खान पान की शैली , खाद्य अखाद्य की मर्यादा , नियम संयम की ऐसी तैसी रहेगी तब तक हम लोग मरते रहेंगे ।
इस विश्व के शारीरिक रोग का एकमात्र कारण यह छोटी सी मांसल जीभ है ।
इसी जीभ के स्वाद के लिए लोगों ने भोजन के नियम संयम , आचार , व्यवहार सब खत्म कर दिया और आज hospital में doctors के पैरों पर नाक रगड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं।
चिल्ला रहे हैं हॉस्पिटल hospital कर के ।
जब बोला जाता है कि अपने शरीर में कुछ भी कूड़ा कर्कट मत डालो , तो सब गुस्से से सामने वाले को देखते हैं । असंयमित खाना , असंयमित पीना , बाहर का चाटना , घर घर अशुद्धता शुद्धता का विचार किये चाटना , पैकेट बन्द सामग्रियों को खाना , pesticides, insecticides, रासायनिक उर्वरक खा खा कर रक्त, धमनियों और dna तक भरना , पानी को इतना फ़िल्टर कर लेना कि उसमें से सब minerals और essentials nutrients निकाल कर पीना , सुबह सवेरे शाम दोपहर रात जब चाहे तब मुँह चलाना , कोई समय नहीं , कोई नियम नहीं कि कब खाना , क्या खाना , कितना खाना , कैसे खाना , क्यों खाना ।
बस भगवान ने मुँह दे दिया तो उसमें कुछ भी कभी भी कैसे भी डाल लो ।
ठंड़ीयों तक में गधे लोगों को मैंने आम खाते देखा है और Ice Cream खाते देखा है । उनके चेहरे पर दर्प भाव रहता है कि वो ऐसा फल खा रहे हैं जो उपलब्ध नहीं है ।
लेकिन उन मूर्खाधिराजों को यही नहीं पता कि यही दर्प भाव हॉस्पिटल और doctors लाखों का तुमसे लूट कर तुम्हे जीवन भर रोगी बनाकर तोड़ेंगे ।
जब बोला जाता है कि Maid से सब काम करवा लो लेकिन भोजन स्वयं बनाओ तो उसमें नारी सशक्तिकरण घुस कर और आधुनिकता का हवाला देकर hospital में एक bed book करवा लेते हैं।
मर जायेंगे , आह माई आह माई करते रहेंगे लेकिन भोजन maid ही बनाएगी जिसका पता नहीं किस विचार , कौन से तरंगों से , कौन से energy लेवल से , कौन से भावना डालकर , किज शुद्धता से वह भोजन तैयार करेगी या करेगा ।
बस लोलुप जीभ को स्वाद मिलना चाहिए और मोटी चमड़ी को आराम ।
भले ही इससे पूरा परिवार का स्वास्थ्य हाशिये पर ही क्यों न आ जाये ।
Sauce, बंद buiscuits , नमकीन , cold drinks , पिज़्ज़ा , burger , गंदे बासी canned juices सबके घर में पड़े होंगे और लैपटॉप पर काम करते भक्षण चलता रहेगा लेकिन अजवाईन , हरड़ , सौंफ , मेथी दाना , पीपली , गोंद, इत्यादि शायद ही कोई महीने में खाता हो ।
यह सब खाने में सबकी नानी मर जाती है लेकिन नानी के साथ साथ यह भी जल्दी hospital के bed पर मरे पाए जाते हैं।
ग़लत काम करेंगे सब खुद लेकिन चिल्लायेंगे Hospital और Doctors को।
जिस दिन इस जीभ को संयमित कर लिया तो उसी दिन समझिये कि आप स्वस्थ्य होते चले जायेंगे ।
जिस दिन अपने kitchen या रसोई को शरीर के मंदिर के तौर पर बनाकर उस रसोई घर को घर का एक औषधालय बना लेंगे तो उसी दिन से आप स्वस्थ्य होते जाएंगे ।
जिस दिन आपकी रसोई में आपके घर की स्त्रियों के अलावा किसी अन्य का प्रवेश वर्जित होगा , उसी दिन से आपका Hospitals और Doctors से नाता टूटने लगेगा ।
जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे बाहर का नहीं खाना और सबके घर घर का नहीं चाटना , उसी दिन से आपके घर से रोग अपनी गठरी बांधने लगेंगे ।
बहुत ही आवश्यक हो तभी इस व्रत या नियम को तोड़े ।
जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे एकमात्र मौसमी फल और सब्जियों का ही सेवन करना है , ठीक उसी दिन से वैभव और लक्ष्मी अपना बोरिया बिस्तर लेकर आपके घर में ठिकाना बनाने आ जाएंगी ।
और एक अन्य महत्वपूर्ण बात
*तन को बली बना लो ऐसा , सह ले सर्दी वर्षा घाम ।*
*मन को बलि बना लो ऐसा , टेक न छाड़े आठों याम ।।*
मन को ऐसा बलिष्ठ बना लो कि कोई तुम्हें अपने नियम से डिगा न सके ।
ऐसा नहीं कि यार दोस्तों ने कहा दिया तो तुम भी अपने घर का संस्कार भुलाकर पीने और मांस सेवन करने लगे ।
मतलब तुम्हारे माँ बाप का संस्कार इतना गिरा था कि अन्य दोस्तों के संस्कार उस पर हावी हो गए ।
तुम इतने कमजोर निकले कि उनकी गलत बातें तुमने ग्रहण कर ली लेकिन अपनी अच्छी बातों या आदतों का प्रभाव तुम उन पर नहीं डाल सके । धिक्कार है तुम्हें ।
तो तुम उनके गुलाम हो।
मैं बार बार कहता रहूँगा कि जिस दिन तुमने अपने रहन सहन , आचार , विचार , खान पान , नियम संयम को संयमित एवं नियमित कर लिया , उसी दिन से सब ठीक हो जाएगा ।
वरना तो हॉस्पिटल और डॉक्टर भले ही कोई अपने दोनों जेब में लेकर घूमो या अपने नौ द्वार स्थान में ही घुसेड़ कर क्यों न रखे , वह मरेगा और रोगों से ही मरेगा । कोरोना ही नहीं कोरोना से भी बड़ी बड़ी बीमारियों से मरेगा ।
फिर एक बार सुन लो समझ लो
गुरुवार, 22 अप्रैल 2021
जन सामान्य का क रोना का इलाज और बेन्टीलेटर सब फ्री जिन्होंने लूटा है उन्हें लुटवाने दें
सोमवार, 22 मार्च 2021
प्राचीन गुरुकुल का दंड उठक बैठक आज विदेशों में लोकप्रिय हो रहा है
विदेशी भी अपना रहे हैं...........
उठक बैठक की सजा ............
भारत में गुरुकुल के ज़माने से आक स्कूल, विद्यालयों में बच्चों को उठक बैठक की सजा देने की परम्परा चली आ रही है. दोनों हाथों को आपस में क्रॉस करके बाएं हाथ से दाहिने कान और दहिने हाथ से बाये कान को पकड़कर उठना बैठना होता था. जिस बच्चे को यह सजा मिलती वो तो शर्मसार हो जाता था. लेकिन हाल में हुई रिसर्च से पता चला है कि इस कसरत के लाभ अद्धभुत हैं.
कान पकड़ कर उठक बैठक करना यह प्राचीन योग है, जोकि दिमाग के लिए बहुत लाभदायक है. हमारे भारतीय स्कूलों में यह सजा अक्सर पढाई में कमजोर बच्चों को दी जाती है, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा नहीं था. उस समय गुरुकुलों में सभी को यह योग कराया जाता था. अब विदेशों में यह योग Super Brain Yoga के नाम से प्रसिद्ध हो रहा है.
हम भारतीयों का तो ऐसा है कि जब कोई ये न बोले – वैज्ञानिक रिसर्च में पता चला है…विदेशी इसका पेटेंट करना चाहते हैं…फॉरेन साइंटिस्ट ने कहा, हम किसी बात का विश्वास ही नहीं करते.
उठक बैठक के लाभ ............
यह योग करते समय ध्यान दें कि कान के उपरी हिस्से को नहीं बल्कि निचले हिस्से (Earlobe) को पकड़ा जाता है. कान के इस हिस्से में विशेष एक्यूप्रेशर पॉइंट होते हैं, जिसे दबाने से दिमाग की विशेष तंत्रिकाओं में सक्रियता बढती है, मस्तिष्क कार्यक्षमता बढ़ती है.
इस पोस्चर में उठने बैठने से मस्तिष्क की मेमोरी सेल्स में तेजी से रक्त प्रवाह होता है. दिमाग के बाये और दायें हिस्सों की कार्यप्रणाली में सामंजस्य स्थापित होता है, जिससे कि मन शांत और केन्द्रित होता है. फलस्वरूप याददाश्त तेज होती है और दिमाग तेज होता है.
यह योग करने से Autism, Asperger’s syndrome जैसी दिमागी बीमारियाँ, सीखने और व्यवहार सम्बन्धित रोग में भी लाभ मिलता है. इसी लाभ के कारण कक्षा के कमजोर और शरारती बच्चों को यह योग करवाया जाता था, लेकिन इसे कोई भी करे उसे लाभ ही मिलेगा.
उठक-बैठक कैसे करें .............
सामने देखते हुए सीधे खड़े हों, ठुड्डी जमीन के समानांतर हो. दोनों पैर कंधो की चौड़ाई जितना दूरी पर हो और पंजे सीधे हों. अब सीने के सामने से दोनों हाथो को क्रॉस करते हुए बाएं हाथ से दाहिने कान का निचला हिस्सा और दाहिने हाथ से बाएं कान का निचला हिस्सा पकड़ें. कान न बहुत तेजी से दबाएँ कि एकदम लाल ही हो जाएँ न एकदम हल्के से. मध्यम प्रेशर लगाते हुए पकड़ें. कान के सिरे को अंगूठे और पहली ऊँगली के बीच पकड़ें. अंगूठे ऊपर की तरफ हो और ऊँगली पीछे जाये. हाथ सीने के ऊपर हों, जिसमें दाहिना हाथ ऊपर आये. सामने देखते हुए धीरे-धीरे बैठना शुरू करें. आराम से जितना झुक सकें झुकें, फिर धीरे-धीरे उठ खड़े हों. बैठक लगाते समय सांस छोड़ें और उठक लगाते समय सांस लें. एक बार में 1 से 3 मिनट तक यह करें. उठक बैठक के तुरंत बाद आप अनुभव करेंगे कि दिमाग शांत होता है और फ्रेश ऊर्जा महसूस होती है. इस योग को करने से तुरंत लाभ तो मिलते हैं, लेकिन करीब 3 हफ्ते तक करने से ही बड़े बदलाव महसूस होंगे. यह योग करते समय जीभ को तालू से सटाकर रखें, अधिक लाभ मिलेगा.
सोमवार, 8 मार्च 2021
जत् पिंडे तत् ब्रहमांन्डेे केे रहस्यमयी शरीर व ब्रहमांड जहॉं भूहीनता का प्रभाव रहता है शंगरिला घाटी व कुंडलिनी जागरण का रहस्य
मनुष्य शरीर में देवत्व का वास ...................
#वैदिक-समाधान-गुरुकुल
चीन का सन् 1962 में भारत पर आक्रमण करने का वास्तविक कारण क्या था ?
इसका असल कारण बहुत ही रोमांचक आध्यात्मिक और दिलचस्प कारण था ।
जानिए एक महत्वपूर्ण जानकारी।
इस संसार में ऐसा बहुत कुछ है जो कि हम नहीं जानते, यदा कदा कुछ तथ्य सामने आते रहते हैं जो कभी-कभी सत्य को प्रकट कर ही देते हैं
सन् 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध का एक ऐसा कारण है, जिसे तत्कालीन भारत सरकार नहीं जानती थी।
हो सकता है कि परिवर्तित सरकारें भी न जानती हों। आज की NDA सरकार भी जानती हो,,,,
यह भी आवश्यक नहीं।
सन् 1962 के चीन के भारत पर आक्रमण का वास्तविक कारण था--
#शंगरी_ला_घाटी'।
यह घाटी
#तवांग_मठ के निकट वह घाटी है जहां तृतीय और चतुर्थ आयामों की संधि स्थली है।
यह वह दिव्य घाटी है जहाँ कोई साधारण व्यक्ति भी अचानक पहुंच जाए तो वह अमर हो जाता है।
उस शंगरी ला घाटी की दिव्यता का रहस्य चीन के शासकों को 'हिब्रू ग्रंथों' और 'भारतीय ग्रंथों' से पता चल गया था।
तिब्बत पर अधिकार करना चीन की उसी मंशा का परिणाम था।
जब तिब्बत पर अधिकार करने के बाद वहाँ वह घाटी नहीं मिली तो सन् 1962 में अरुणाचल प्रदेश स्थित तवांग मठ के नजदीक हमला कर वहाँ के भूभाग पर कब्जा करना उनकी उसी योजना का हिस्सा था।
लेकिन
उन्हें तब भी 'शंगरी ला घाटी' नहीं मिलनी थी न ही मिली। आज जो
चीन भारत को आंखें दिखा रहा है, उस के पीछे भी एकमात्र कारण वही 'शंगरी ला घाटी' है। भूटान के पास का वह क्षेत्र तो मात्र बहाना है। उसे तो वही दिव्य 'शंगरी ला घाटी' चाहिए।
'शंगरी ला घाटी' वह घाटी है जहाँ भारत के 64 तंत्र, योग और भारत की प्राच्य विद्याओं को सिखाने के लिए संसार के कोने कोने से पात्र व्यक्तियों को खोज खोज कर बुलाया जाता है और शिक्षा-दीक्षा देने के बाद उस के विस्तार के लिए आचार्यों को घाटी के बाहर भेज दिया जाता है।
उस घाटी की सब से बड़ी विशेषता है कि वह चतुर्थ आयाम में स्थित होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होती।
वहाँ उस घाटी में सैकड़ों हज़ारों की संख्या में उच्चकोटि के योगी, साधक, सिद्ध तपस्यारत हैं। वहाँ हमारे इस तीन आयामों वाले संसार की तरह समय की गति तेज नहीं है, बल्कि वह समय मन्द है।
वहाँ पहुंच जाने वाला व्यक्ति हज़ारों साल तक वैसा का वैसा ही बना रहता है युवा, स्वस्थ और अक्षुण्ण।
यही कारण है कि उस विशेषता के कारण चीनियों की नीयत उस क्षेत्र के लिये हमेशा से कब्जा करने की रही है।
और आज भी वह भूटान के बहाने से वही निशाना साधने पर आमादा है।
वैसे एक मिथक ये भी है कि भगवान परशुराम, कृपाचार्य और रुद्रांश बजरंग बली यहीं निवास करते हैं विष्णु के कल्कि अवतार को यहाँ 'शांग्रीला घाटी' में लाने वाला व्यक्ति अश्वथामा होगा इसी घाटी में कल्कि अवतार की शिक्षा दीक्षा होगी।
हम जिक्र कर रहे हैं शंगरी ला घाटी का।
ये तिब्बत और अरुणाचल की सीमा पर है। तंत्र मंत्र के कई जाने माने साधकों ने अपनी किताबों में इस का जिक्र किया है।
लोगों का ऐसा मानना है कि ये जगह किसी खास धर्म या संस्कृति की नहीं है, जो भी इसके लायक होता है, वह इसे ढूंढ सकता है।
1942 में एक अंग्रेज अफसर LP फरैल को इस जगह पर कुछ खास अनुभव हुए थे, जिसके बारे में उन्होंने 1959 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में लेख प्रकाशित करवाए थे। तिब्बती बुद्धिस्ट्स का मानना है कि जब दुनिया में युद्ध होगा, शंभाला का 25वां शासक इस धरती को बचाने आएगा।
प्रसिद्ध योगी परमहंस विशुद्धानंद जी ने भी इस आश्रम की शक्तियों को महसूस किया था, जिस का उन के शिष्य पद्म विभूषण और साहित्य अकादमी से नवाजे गए और गर्वनमेंट संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ. गोपीनाथ कविराज जी ने बड़े विस्तार से अपनी पुस्तक में वर्णन किया है।
तिब्बती साधक भी इसके बारे में कहते रहे हैं। इस घाटी को उस बरमूडा ट्राएंगल की तरह ही दुनिया की सबसे रहस्यपूर्ण जगह माना जाता है।
कहा जाता है कि भू-हीनता का प्रभाव रहता है। ये भी कहा जाता है कि इस घाटी का सीधा संबंध दूसरे लोक से है।
जाने माने तंत्र साहित्य लेखक और विद्वान अरुण कुमार शर्मा ने भी अपनी किताब तिब्बत की वह रहस्यमय घाटी में इस जगह का विस्तार से जिक्र किया है। बकौल उन के दुनिया में कुछ ऐसी जगहें हैं जो भू-हीनता और वायु-शून्यता वाली हैं, ये जगहें वायुमंडल के चौथे आयाम से प्रभावित होती हैं। माना जाता है इन जगहों पर जा कर वस्तु या व्यक्ति का अस्तित्व दुनिया से गायब हो जाता है। माना जाता है ये जगहें देश और काल से परे होती हैं
शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है.................
१. आँख — चन्द्र, सूर्य
२. कान —दशो दिशाएँ
३. नाक —अश्विनी कुमार
४. मुँह — अग्निदेव
५. जिभ्या — वरुण
६. हाथ — इन्द्र
७. पैर — उपेन्द्र
८. गुदा — गणेश
९. लिंग —ब्रह्मा
१०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी
११. हृदय — शिव-पार्वती
१२. कंठ — सरस्वती
१३. आज्ञाचक्र-- शिव
व्यक्ति को गणेश जी की शक्तियां प्राप्त होती हैं जिससे वह रिद्धि सिद्धि का स्वामी बन जाता है । प्रारम्भ गणेश जी से होता है इसी कारण गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं प्रथम पूजा का कारण यह नहीं है कि वह सबसे बड़े हैं । इनसे बड़े तो इंद्र है जिन का वास स्वाधिष्ठान में है ।
इसके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जिस के देवता इंद्र है और देवी ब्रह्मचारिणी । इस स्थान पर तभी पहुंचा जा सकता है जब ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए । यहां तक पहुंचने से पहले साधकों के लिए इंद्र अप्सराएं भेज दिया करता है जिससे उनका ब्रह्मचर्य टूट जाए वह पतित हो जाए । ऐसे प्रमाण बहुत से ग्रंथों में हैं । जो इस स्थान तक पहुंच जाता है उसके पास इंद्र की शक्तियां आ जाती हैं । इंद्र की पूरी परिषद और सभी देवी देवता उसके अधीन हो जाते हैं l
उससे ऊपर मणिपुरक चक्र है इसके देवता ब्रह्माजी है । यहां की देवी सरस्वती है ब्रह्मा जी की उत्पत्ति नाभि कमल से हुई है । वह इस स्थान में रहकर गर्भ में रहने वाले बच्चे की रचना करते हैं । यह स्थान पूरे शरीर का केंद्र माना जाता है इस स्थान पर पहुंचने वाले साधक के पास ब्रह्मा जी की शक्ति आ जाती हैं और उस के आशीर्वाद से किसी को भी संतान की प्राप्ति हो सकती है
इससे ऊपर अनहद चक्र है जिसमें जिसमें हर समय विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों की आवाज आती रहती है l इस चक्र के देवता विष्णु जी हैं जो छीर सागर में लेटे हुए हैं l जब ब्रह्मा जी किसी बच्चे की निर्माण (रचना ) कार्य पूरा कर देते हैं और उसकी उत्पत्ति (जन्म) हो जाती है तब उनका कार्य पूर्ण हो जाता है और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी विष्णु जी पर आ जाती है । जिससे मां के स्तनों में दूध आ जाता है यह स्तन छीर सागर का प्रतीक है l यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास विष्णु जी की शक्तियां आ जाती हैं ।.वह अपने शरीर को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से स्थूल बना सकता है और किसी भी लोक में जा सकता है ।
विष्णु जी को ही सर्वोच्च देव और पालनहार माना जाता है इसीलिए लोग कहते हैं कि वह भगवान सबके ह्रदय में किंतु ऐसा नहीं है भगवान विष्णु और देव विष्णु में अंतर है।
अनहद से ऊपर विशुद्ध चक्र है इसके देवता शंकर जी है और देवी उमा जी है यहां तक पहुंचने वाले साधक के पास शंकर जी की शक्ति आ जाती है और मृत्यु उसकी इच्छा पर निर्भर हो जाती है ।
इससे ऊपर आज्ञा चक्र है जहां पर तीसरा नेत्र होता है यह आत्मा का क्षेत्र है यहां पहुंचने पर कुंडली भी जो शक्ति रूपा थी वह इस आत्मा ईश्वर ब्रह्म शिव क्षेत्र में पहुंचकर शिव से मिलती है यहां पर पहुंचने वाला साधक अर्धनारीश्वर बन जाता है । शंकर जी ध्यान साधना योग आध्यात्म के द्वारा यहां तक पहुंचे ,वह शिव बन गए, उन्हें शिव कहा जाने लगा ।
कुंडलिनी यहीं पर रुक जाती है इस कुंडलिनी शक्ति के द्वारा मूलाधार में रहने वाला जीव इन चक्रों से होता हुआ शिवव बनता है जो पहले शिव ही था जिसे माया ने जीव बना दिया था । जो जीव इस स्थिति में पहुंच कर अपने पूर्व के स्वरूप को प्राप्त करता है इसे ही स्वरूप की प्राप्ति, आत्मज्ञान की प्राप्ति आत्मज्ञान आदि नामों से जाना जाता है । जहां पर साधक लिखा है वहां जीव पढ़ा जाए । आप शरीर नहीं है जीव हैं , प्राप्ति जीव को ही होती है शरीर सिर्फ माध्यम है ।
दुनिया के जितने भी गुरु जी लोग हैं उन्हें जीव की जानकारी नहीं है कि जीव क्या है ? कैसा है ? कहां रहता है ? वह सिर्फ कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक पहुंचने का विवरण बताते है । जब जीव शिव बन जाता है तब वह नीचे वाले संपूर्ण देवताओं और देवियों से श्रेष्ठ बन जाता है । इसीलिए कहा है बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा ।
मानव शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है और कितनी प्रसन्नता की बात है कि वह मानव तन आपके पास है । यहां दिव्य ज्योतिर्मय प्रकाश और चिदानंद है । जीव शिव बनते ही चिदानंद और ज्योतिर्मय हो जाता है । यहाँ पर जीव का पहुंचना ही समाधि कहलाता है क्योंकि वह शिव से अथवा शिव के समत्व प्राप्त कर लेता है या शिव के समक्ष हो जाता है ।शंकर जी अपने आप को यही स्थित रखते है । इसलिए अधिकतर वह समाधि में रहते हैं ।
यहां तक पहुंचने वाले गुरु स्वयं को भगवान मानने लगते हैं क्योंकि ब्रह्मा विष्णु महेश उससे नीचे होते हैं । वह इसी आत्मा ईश्वर ब्रह्म और दिव्य चेतन ज्योति को ही परमात्मा घोषित कर देते हैं । ध्यान साधना का अभीष्ट यही है । इससे आगे ना तो कुंडलिनी जा सकती है और ना ही कोई गुरु
आज के संसार में जितने भी गुरु है उन्हें महात्मा कहलाने पर संशय है क्योंकि जिसका इष्ट, अभीष्ट आत्मा ही है वह आत्मा से महान अर्थात् महात्मा कैसे हो सकता है ? कोई भी गुरु इस क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ा सकता क्योंकि गुरु भी ज्योतिर्मय शिव ही है। इसे ही कैवल्य कहते हैं । इससे ऊपर सहस्त्र सार है । महावीर स्वामी बुद्ध भी आज्ञा चक्र से आगे नहीं पहुंचे क्योंकि इससे ऊपर जाने की ना तो कोई क्रिया है और ना ही कोई कर्म यह सिर्फ़ भगवान की कृपा पर आधारित है। यह स्वयं को ही भगवान मानने लगते हैं जिससे भगवान से इनका संबंध नहीं रहता ।
जिसका इष्ट और अभीष्ट परमात्मा है जो आत्मा से ऊपर और परमात्मा से नीचे होता है वह महात्मा कहलाता है । वही असली गुरु है वह सहस्त्र सार में साकार रूप में अभय मुद्रा में बैठे होते हैं ,और यहीं से पूरे शरीर पर नियंत्रण करते हैं । संसारी गुरु ने इस स्थान को परमात्मा का स्थान बता दिया है जबकि सच्चाई यह है परमात्मा ना तो इस शरीर में है और ना ही ब्रह्मांड में । वह परमधाम में रहता है । वह युग युग में एक बार किसी शरीर विशेष में अवतरित होता है।
यह संपूर्ण शरीर सूक्ष्म ब्रह्मांड है जो कुछ ब्रह्मांड में है वह इस शरीर में भी है जिस प्रकार एक ग्लोब संपूर्ण पृथ्वी का प्रतिरूप होता है उसमें सभी चीजें सूक्ष्म रूप में होती हैं । उसी प्रकार इस शरीर में भी सभी चीजें हैं जो इस ब्रह्मांड में है किंतु सूक्ष्म रूप में । जितने भी देवी देवता इस ब्रह्मांड में हैं वह सूक्ष्म रूप से शरीर में है यथार्थ रूप में वह अपने लोक में है ।
यह लोग अपने शिष्यों को भ्रमित करके कुछ क्रियाएं बता देते हैं कहते हैं करते रहो सच्चाई नहीं बताते। जबकि यम नियम का पालन किए बिना कोई भी क्रिया नहीं हो सकती जिसमें ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है । यदि यह ब्रह्मचर्य का पालन करवाने लगेंगे तो कोई भी शिष्य इनके पास नहीं रुकेगा, जो इन्हें रुपये देना तो दूर एक गिलास पानी भी नहीं देगा । इन्हें शिष्यों के कल्याण से मतलब नहीं है उसके धन से मतलब है क्योंकि इन्हें शिष्य के पैसे से अपने बेटा बेटी पालने हैं ।
ये स्वयं मूलाधार में पड़े हुए हैं । जो मूलाधार में पड़ा हुआ है वह किसी को आज्ञा चक्र अथवा सहस्त्र सार में क्या पहुंचाएगा ? यह साधन किसी दुर्लभ गुरु के सानिध्य में रहकर संयमित जीवन जीकर ही की जा सकती है अन्यथा नहीं ।
आप सभी लोग इस कुंडलिनी के चक्कर में मत पड़े भगवान की भक्ति करें जो उपलब्धि कुंडलिनी की अंतिम उपलब्धि है भगवान के भक्तों को उससे भी आगे सहज ही प्राप्त होती है क्योंकि भक्त क्रिया पर नहीं कृपा पर आधारित है । भगवान किस को क्या दे देगा कोई भी नहीं जानता ? यह संसार के गुरु आप का भला नहीं कर सकते यह सिर्फ अपना भला करने में लगे हुए हैं भगवान भला नहीं करता परम कल्याण करता है उस पर विश्वास रखिए
गुरुवार, 4 मार्च 2021
रोग आने के संकेत पंच महाभूतों के द्वारा
*पंचभूत का शरीर पर संकेत -२?*
माघ का मास चल रहा है, इधर कई लोगों के शरीर में दर्द बढ़ चुका है, सुबह - सुबह उठने की इच्छा नहीं होती, जागकर कम्बल या रजाई में पड़े रहते है खासकर तब और देरी से उठते है जब छुट्टी या रविवार हो।
आजकल के बच्चे तो बिल्कुल सुबह नहीं उठाना चाहते, जब हम छोटे थे तो सुबह उठाना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था, और आकर अलाव के पास बैठ जाते थे, हमें कोई मतलब नहीं कि आज छुट्टी का दिन है। त्योहार के दिन तो और भी जल्दी उठ जाते थे। पर हम खुद परेशान है कि आजकल के युवाओं के इस आदत से? गाँव में अपना हाथ फैलाने पर दिखायी नहीं पड़ता था, ऐसे समय में भी गन्ने पिराई (गुड़ बनाने वाले) जगह पहुँचकर बैलों को हाँकते थे। आलस था ही नही।
*शरीर के चिकित्सीय लक्षण -१*
पर जब हम बाहर जाते है, या छुट्टी के दिन घर पर होते है, या ज्यादा थके हुए होते हैं तो सुबह उठते समय हमारी मनोदशा व शारीरिक स्थति भिन्न होती है। कभी तो हम बड़े उत्साह के साथ उठते है, कभी हमें सुबह थकान सा अनुभव होता है, कभी दर्दयुक्त शरीर व अनबूझे मन से उठते है। कभी हम हल्के शरीर व चैतन्य मन से उठते है, ऐसा आपने भी अनुभव किया होगा। सुबह हमारे भीतर इस भाव व ऊर्जा के संचरण का बहुत बड़ा कारण होता है हमारी सोच व पंचभूत।
आपने देखा होगा जब हम एलार्म का प्रयोग नहीं करते थे, और सुबह तीन बजे, चार बजे उठकर हमें कहीं आना जाना होता था तो हम अपने बुजुर्गों को बोलते थे कि हमे इतने बजे जगा देना, तो वह जगा देते थे। या कई बार ऐसा हुआ है कि जब हमें सुबह पढ़ना होता था, या फिर किसी पर्व पर सूर्योदय के पूर्व स्नान करना होता या सुबह बस/गाड़ी से यात्रा करनी होती तो हम सीने पर हाथ रखकर बोलते हे प्रभु! मुझे इतने बजे जगा देना, कल मुझे इस कार्य के लिए जल्दी उठना है, हमारी यह संकल्प शक्ति इतनी मजबूत होती कि हम उस समय से पूर्व ही अपने आप जग जाया करते थे। यह संकल्प शक्ति इतनी प्रगाढ़ होती है कि जब भी हम सुबह उठते हैं बिना आलस्य के बिना खराब मनोदशा के हम उठ बैठते हैं। हममें एक जोश होता है, शरीर हल्का होता है। इस स्थति को मनोदशा की होती है।
दूसरी बात ~ आप सब जानते हैं कि हम श्वांस द्वारा वायु रूप में जो कुछ भी ग्रहण करते है या छोड़ते है उसमें हम वायु रूप में अन्य पंचभूतों को भी ग्रहण करते है। आप कहेंगे हम तो सिर्फ वायु रूप में आक्सीजन ग्रहण करते है, पर सत्य तो यह है जब हम साँस लेते है तो नाक के भीतर हमारा मर्म किसको जाने देना है, किसको नहीं काफी हद उसे भी नियंत्रित करता है। अन्यथा वायुमंडल में अनगिनत फैले जीवाणुओं के हम शिकार हो जायेंगे।
हर स्थान व हर ऋतुओं में यह पंचमहाभूत भिन्न - भिन्न होते सकते है। जैसे आप ऊँचे - ऊंचे पहाड़ों पर घूमने जाइये जैसे - जैसे शिखर की ऊंचाइयों पर जायेंगे, आपको वायु कम मिलेगी आकाश पंचभूत ज्यादा मिलेगा। साधना, ध्यान के लिये आकाश महाभूत सबसे अच्छा है, आप देखोगे योगियों में आकाश महाभूत सर्वाधिक होगा। आपने देखा होगा कि पहाड़ों पर सूर्योदय जल्दी निकलता है, पहाड़ों पर रहने वाले लोग जल्दी उठते है, या जिनके भीतर आकाश तत्व की प्रमुखता अधिक होगी उन्हें कितनी भी जल्दी उठना पड़े, शरीर भारी नहीं लगेगा, उनकी मनोदशा व शरीर हल्का होगा।
आकाश का गुण है शब्द। आप शब्द से नाद और योग की उस अवस्था पर बढ़ेंगे जहाँ नाद उस योग की स्थति में उस स्पस्ट सुनाई पड़ता है उसे अनाहद नाद कहते है, वह एक अलग मार्ग है, अभी उधर नहीं चलना सिर्फ इतना समझ लें कि जब हमारे भीतर *आकाश तत्व* बढ़ जाता है तो शरीर में अजीब मदहोशी महसूस होती है, मन् के भीतर शांति महसूस होती है, अकेलेपन में रहने का मन् कहता है, जीवन आजादी चाहता है, व्यक्ति अलग - थलग रहता है। यह कुछ लक्षण आकाश तत्व के होते हैं।
यदि ऋतुओं की बात करूँ तो वर्षा ऋतु के बाद पृथ्वी पर वायु तत्व की न्यूनता सर्वाधिक होती है, उस समय अपनी शारीरिक स्थति का विश्लेषण कर सकते है, पर इसमे कई और भी कारण होते है।
*वायु तत्व प्रधान शरीर* वायु का गुण है शब्द और स्पर्श पर जब वायु तत्व के कारण सुबह उठेंगे तो हममें चंचलता, गतिशीलता अधिक होगी। व्यक्ति कन्फ्यूज्ड होगा, आशंकित रहेगा। कन्फ्यूजन में रहेगा। थोड़ा घबराया, डरा हुआ रहेगा, भावुकता (fluctuate of emotion) कभी अच्छे विचार कभी बुरे विचार बदलते रहेंगे। भविष्य को लेकर मन अनेक आशंकाएं घिरी रहेगी। कुछ लोग कहते हैं कि उनका बच्चा बच्चे हाइपर एक्टिव है, तो समझ लीजिए वायु तत्व बढ़ा हुआ है। इसे षटकोण (हेक्साजोनल) से प्रदर्शित करते है। आप ऋतुओं की बात करें तो शरद ऋतु के बाद यह स्थति अधिकांश लोगों में देखने को मिलेगी, या फिर जो फिर जो प्रकृति के उस भाग में रहते हैं जहाँ वायु तत्व सर्वाधिक होता हो। ऐसा व्यक्ति सुबह हर कार्य का जल्दबाजी में करने की कोशिश करेगा, वीपी भी बढ़ा हुआ हो सकता है, बार - बार नींद खुलेगी।
*अग्नि तत्व प्रधान-* अग्नि तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, रूप जिसमें दृश्य या रूप प्रमुख है। जब शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता बढ़ जाती है तो व्यक्ति सुबह के समय जब उठेगा तो शरीर गर्म होगा, मुँह थोड़ा कडुआ होगा, शरीर चिपचिपा, ऊर्जावान होगा। अग्नि तत्व की अधिकता में उस व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा अधिक होगा, दूसरों से तुलना करेगा, गुस्सा जल्द आएगा, एक विषय को बड़ी गगराई से जजमेंट्स करेगा, उसमें वायलेंस भी दिखायी देगा। हो सकता है उठते ही भोजन भी माँग ले। ऋतुओं की बात करें तो आप इसे गर्मी का मौसम भी मान कर परीक्षण कर सकते है।
*जल तत्व -* जल तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति व स्वाद। जल तत्व अधिकता में व्यक्ति दूसरों से प्रेम अधिक करेगा वह थोड़ा धीरे उठेगा, शरीर में दर्द भी हो सकता है।
थोड़ा भारीपन महसूस होगा, हो सकता है वह एक बार में ना भी उठे। मुस्कराते हुए उठेगा, वह हर वस्तु को बड़े गौर से देखेगा, उसमें उसकी आसक्ति भी निर्मित होने लगे। थोड़ा लालच भी करे।
आपने देखा होगा समुद्र के किनारे जल महाभूत अधिक होता है आप उनके जीवन पर एक विश्लेषण कीजिये।
*पृथ्वी तत्व-* पृथ्वी तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति, स्वाद, गंध।
आपने देखा होगा कि वृक्ष सबसे अधिक पृथ्वी से जुड़े रहते है। उसमें गतिशीलता नहीं होती, एक जगह स्थिर होते है। यदि मनुष्य में पृथ्वी तत्व बढ़ जाये तो उसे उठते समय भारीपन महसूस होगा, हर कार्य को बहुत धीरे - धीरे, अटक - अटक कर करेगा, बार - बार याद दिलाना पड़ेगा। वह जल्द डिप्रेशन में चला जाता है।
इस तरह हम सुबह उठते समय अपने शरीर व मनोदशा को आराम से देख सकते है। उसके अनुसार प्राणायम करके या कुछ विन्दुओं को उत्प्रेरित करके उन्हें ठीक भी कर सकते हैं।
आपसे प्रार्थना है इसे अनुभव करके इसमें सुधार करके हमारा भी मार्ग प्रशस्त करें
*शरीर के लक्षण*
जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर ही कुछ लक्षणों को इंगित करता है हमें निकट भविष्य में क्या समस्या आने वाली है। इन लक्षणों से पूर्व शरीर की सूक्ष्म इन्द्रियों को इसका आभास भी हो जाता है और मनुष्य के व्यवहार व स्वरूप मे वह परिलक्षित भी होने लगता है।
जैसे - किसी को जुकाम होना होता है तो उसके पहले नाक या कान में खुजली होनी शुरू हो जाती है, वहीं सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा उसकी प्यास अतृप्त हो जाती है, और वह बार - बार पानी भी पीने लगता है। गर्म पानी से उसकी प्यास नहीं बुझती है, जुकाम का यह लक्षण 36 से 48 घंटे पहले ही सुक्षिन्द्रियों को दृष्टिगोचर हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें बीमार होने से पूर्व व्यक्ति की भूख बढ़ जाती है, प्रसन्नता बढ़ जाती है। जैसे - मरने से पूर्व व्यक्ति की एक बार समस्त चेतना वापस लौट आती है और वह सभी से बात करता है, हँसेगा भी है, चलेगा भी, भोजन भी माँग लेता है। और खाते खाते राम - राम सत्य। एक और उदाहरण से समझे जब आँतो में गर्मी बढ़ जाती है तो व्यक्ति बहुत अधिक खाने को माँगता है, बार - बार भूख का आभास होने लगता है, अपानवायु ज्यादा खुलने लगती है यही गति बनी रहने पर 24 से 36 घण्टो में उसे दस्त लग जाते है। माताएं कहती है अब खाना नहीं मिलेगा तेरा पेट खराब होने वाला है। वैसे यह लक्षण सभी में उत्पन्न नहीं होते, लेकिन स्वप्न व व्यवहार में परिवर्तन को आप समझ पाए तो बहुत अच्छी बात है।
चिकित्सक शरीर के कई लक्षणों, विकारों को बीमारी मानकर चिकित्सीय लैब में टेस्ट करके ज्ञात करने का प्रयास करते है, कई बार रिपोर्ट्स सही भी नहीं होती हैं या रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं, "लेकिन उस व्यक्ति को तकलीफ वैसे के वैसे बनी रहती है।" कई बार दो अलग-अलग लैब की रिपोर्ट भी अलग-अलग आ जाती हैं। पर बीमारी वहीं के वहीं बनी रहती है, क्योंकि उस टेस्ट में व्यक्ति की मनोस्थति का आँकलन का जाँच नहीं किया जाता है, उसका कोई आधुनिक यंत्र नहीं ।
पहले के समय में लोग एक दूसरे से खूब बातचीत करते थे, एक दूसरे से आत्मीयता गहरी होती थी, इसलिए दूसरे की मनस्थति को आसानी से पढ़ लिया करते थे, पर आज संयुक्त परिवारों में भी इसका अभाव देखने को मिलता है। बूढ़े माँ - बाप को हंसते हुए जमाने गुजर चुके होते हैं। व्यक्ति अकेलेपन के अवसाद ग्रस्त हो जाता है, जिससे शरीर में अनेकानेक विकार उत्तपन्न होने लगते है। इनको वही व्यक्ति पढ़ सकता है जिसकी औरा शक्ति उसकी औरा शक्ति को प्रभावित कर सके।
आप किसी के घर पर प्रसन्नचित होकर बेटे या बेटी का शादी का कार्ड लेकर जाइये उस घर में पति - पत्नी में खूब लड़ाई- झगड़ा चल रहा हो, आप डोर बेल बजायेंगे तो वह झगड़ा बन्द करके मुस्काते हुए आपका स्वागत करने आएंगे।, लेकिन आपको 5 मिनट बाद ही आभास होने लगेगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है। गलती से उन्होंने चाय के लिए बोलकर बैठा दिया तो जिस पर कुछ देर पहले पति - पत्नी बैठकर झगड़ा कर रहे तो दो मिनट में ही आपकी प्रसन्नता अविछिन्न होने लगेगी, और आप में भी क्रोध का संचार शुरू हो जाएगा। यदि कोई साधु पुरुष यानि सतोगुणी होगा तो उसे दरवाजे पर कदम रखते ही यह आभास हो जायेगा कि यहाँ तो मेरी मनस्थति विकृति हो रही है।
तो यह सूक्ष्मन्द्रियों के विषय होते है जिसे आपकी सतोगुणी संवेदनशीलता आसानी से पकड़ लेती है। कई बार आपसे जिसकी आत्मीयता ज्यादा होती है उसकी फोन पर आवाज से ही पता कर लेते हैं कि यह कुछ बात अवश्य छिपा रहा है। तो यह तो संक्षेप में सुक्षिन्द्रियों का रहा विषय कहा ...
अब बात आती है शरीर की जिन्हें तमो व रजोगुणी संवेदनाये नहीं पकड़ पाती तो उनके विकार शरीर पर रोग के रूप प्रकट होने लगते हैं।
हर आने वाले रोग या शरीर में होने वाले परिवर्तन को या तो स्वयं अपनी सूक्ष्मन्द्रियों से समझ लो अन्यथा शरीर के इन संकेतों को समझ लीजिए।
पर फिर भी कहूँगा कि शरीर से अधिक जरूरी है मनस्थति को समझना। शरीर एक आईना की तरह बीमारियों को परिलक्षित कर सकता है। पर ध्यान रहे रोग की स्थति में किसी भी लक्षण के जाँच के कई प्रकार के अन्य विकल्प भी होते है।
*जिह्वा पर सफेद या भूरे रंग का मैल जमना* ~ पेट की खराबी इंगित करता है।
*नथुनों का तेजी से फड़कना* ~ निमोनिया, प्लूरिसी आदि रोग की तरफ इंगित करता है।
*आँखों के नीचे कालापन* ~ अधिक थकावट या पुराने कब्ज को इंगित करता है।
*आँखों के चारो तरफ कालापन ~ कमजोरी, खून की कमी, ल्यूकोरिया (श्वेत-प्रदर) आदि की तरफ इंगित करता है।
*आँखों के नीचे सूजन ~ किडनी के कार्य में रुकावट की तरफ इंगित करता है।
*होठों के कोने पर सफेद छाले* ~ बुखार आने की तरफ इंगित करता है।
*गालों ओर झाइयाँ* ~ पीरियड्स कम व आयरन आने की तरफ इंगित करता है।
*रक्तार्भ कपोत* ~ फेफड़ों (lungs) में इन्फेक्शन की तरफ इंगित करते हैं।
*शाम को एक डिग्री ताप बढ़ना* ~ टायफाइड की तरफ इंगित।
*सोते समय दाँत किटकिटाना या बिस्तर पर पेशाब करना* ~ बच्चों के पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते हैं।
*नाक व मलद्वार में खुजली* ~ पेट में कीड़े होने होने के लक्षण इंगित करते है।
*जीभ का सफेद रंग* ~ तिल्ली बढ़ने की तरफ इंगित करता है।
*जीभ पर छाले व घाव* ~ आंतों और पेट के रोग की तरफ इंगित करता है।
*चेहरे पर हल्के सफेद रंग के धब्बे* ~ पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते है।
*आँखों के सामने अंधेरा छा जाना* ~ निम्न रक्तचाप व खून की कमी होने का इंगित करता है।
*हाथ की उंगलियों के पीछे कालापन* ~महिलाओं में यूट्रस (बच्चेदानी) में रोग की तरफ इंगित करता है।
*हाथ पैर चेहरे पर सूजन* ~ रज दोष की तरफ इंगित करती है।
*गालो का पिचकना* ~ अधिक वीर्यनाश की तरफ इंगित करता है।
*ओंठ के फटने* ~ पेट के रोग या किसी लंबी बीमारी की तरफ इंगित करता है।
*गले में सूजन* ~ हाइपोथायरॉइडिज्म (थाइरॉइड ग्लैंड का हार्मोन कम निकलना) की तरफ इंगित करता है।
*नाखून पर सफेद धब्बे* ~ कैल्शियम की तरफ इंगित करता है।
*जाँघों पर सूजन, हाथों का सुन्नपन्न* ~ हृदय बीमारी की तरफ इंगित करता है।
ऐसे अनेक लक्षण जो धातु विकारों, कमजोरी, यकृत की समस्या, साँस फूलने, पैरों में सुन्नपन्न, आदि आपको महसूस होते होंगे। आप भी अपने शरीर व मानसिक लक्षणों को इसमें जोड़िए।
धन्यवाद
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021
चावल एकादशी व्रत में निषेध है क्यों
एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?
वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’ यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है।j
पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है।
मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं।
एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था।
आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।
चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई।
वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है।
आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021
आज की धनदायी विद्या संतानको आर्थिक सक्षमता तो दे रही है पर संस्कार नहीं

संतान को कैसे उत्कृष्ट बनायें **
*-बीज का विशाल वृक्ष होना,कलभ (हाथी का बच्चा) का महागजराज होना,वत्स का महोक्ष( ककुद युक्त सांढ) होना वामन से विराट होने की प्रक्रिया का लघु निदर्शन है।विराटता चैतन्य पुरुष या संचारिणी प्रकृतिकी बढ़ने वाली प्रवृत्ति है।प्रतिभा चाहे जितनी भी हो उसे अनुभव के संग विराटता मिलती है।
*- गर्भ संस्कार के अतिरिक्त भी संतान को श्रेष्ठ बनाने की अनेक प्रक्रियायें होती हैं।इनमें माता-पिता द्वारा दिये जाने वाले संस्कार,शिक्षक-प्रोफेसर द्वारा दिये जाने वाले
संस्कार तथा वातावरण से उत्पन्न होने वाले संस्कार का महत्त्व बहुत अहं होता है।मनुस्मृति में माता को प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है।जागरूक पिता भी संस्कार गढ़ता है।आजकल नब्बेप्रतिशत माता-पिता निजसन्तानको उस विद्या को पढ़ाना ही अपना उत्तरदायित्व मानते हैं जिससे अधिक से अधिक धन घर में आ सके।आज की धनदायी विद्या संतानको आर्थिक सक्षमता तो दे रही है पर संस्कार नहीं।संस्कारसे हमारासीधाअर्थहै पारिवारिक,सामाजिक, राष्ट्रीय तथा धर्म-संस्कृति का बोध होना। इस मामले में शिक्षापद्धति ईसाईयतके निकट है। सनातनबोध या भारत की परम्परा के निकट नहीं है।अतःआज यदि श्रेष्ठ डॉक्टर, इंजीनियर, वकील,सी ए , पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी संस्कारित दिख रहा हैतो समझ लीजिए उसके
ऊपर परिवार या गुरु का व्यापक प्रभाव है। शिक्षाअवधि का वातावरण तो आज मांस, मदिरा, ड्रग और निशाचरी जीवन पद्धति का हो गया है।
*- इस विषय पर चिंतन करते हुए मैंने २०१२ में हिन्दू जीवन पद्धति का छात्र संस्करण निकाला था पर उसे अंग्रेजी में अनुवादित नहीं करा सका।तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षा वल्ली का व्यापक व्याख्यान भारतके नवयुवकों
में युगबोध के साथ अभिनव संस्कार जागृत कर सकता है।माता पिता को देश में मरने के लिए छोड़ कर विदेश में बसने वाली संतान को पढा कर क्या लाभ जहां न आत्म लाभ हो न राष्ट्र लाभ हो और धर्म लाभ की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।अतः संतान को उत्कृष्ट बनाने केलिए हमें पारिवारिकस्तर परही बाल्यकालसे सन्तान को गढ़ना
पड़ेगा।
*- १ सत्यं वद ,१ धर्मम् चर ,३ मा अनृतं वद, ४ प्रियं वद,५ अप्रियं सत्यं मा वद,६ मातृ देवो भव, ७ पितृ देवो भव,८ आचार्य देवो भव, ९ अतिथि देवो भव,१० जयैषी भव,११ आस्तिक्यं भज १२ अहिंसको भव १३ धूर्तान् मा परिष्वज१४ परुषवाक्यं मा वद,१५दृढव्रत भव,१६ योगे रमष्व १७ सर्वथा मा विश्वसेत् १८ आत्मरक्षा परायणो भव आदि का उपदेश बच्चों को बचपन से ही देना चाहिए।यदि शिशु बचपन से ही बड़े वृद्धों का चरण स्पर्श करेगा तब उसे माता पिता को प्रणाम करनेमें लज्जा की थोड़ी भी अनुभूति नहीं होगी।यदि कोई मैकाले का शिष्य नमस्ते, प्रणाम कहने पर हंसे, श्रीमान, महोदय ,महोदया कहने पर मुंह बिदकाये तो कहना चाहिए कि ये सर और मैडम क्या है? यदि प्रोफेसर कहे कि चरण स्पर्श करना दकियानूसी हैतो उसे उत्तर मिलना चाहिये कि गुड मॉर्निंग फादर ,गुड मॉर्निंग सिस्टर कहना तो महा मूर्खता है।
घर से जो प्रशिक्षण शुरू होगा वही मृत्युपर्यन्त अभ्यास में बना रहता है। एक परिवार के भीतर कितने प्रकार के सम्बन्ध होते हैं और उनका क्या महत्त्वहै ये बच्चोंको शुरू से बतलाना चाहिये।भाई बहन के सम्बन्ध का क्या महत्त्व है?चाचा चाची क्यों महत्त्वपूर्ण है?सहोदर का क्या महत्त्व है , मामा- मामी ,मौसा-मौसी, फूफा-फूफी का जीवन में क्या भूमिका होती है यह बचपन से बच्चे को मालूम होना चाहिए। माता या घर की ज्येष्ठ महिलाओं द्वारा लड़कियों को वे सभी प्रशिक्षण देने चाहिए जो उसकी रक्षा और चरित्र के लिए अनिवार्य हो।
*- सन्तान को बचपन से ही कोई न कोई कवच पाठ अवश्य याद करादेना चाहिये।उन्हें प्रतिदिन मुह हाथ पैर धोने का अभ्यास कराना चाहिए।स्नान करने का पवित्र कर्म बच्चों को अभ्यास में लाने हेतु प्रेरित करना चाहिए।
व्यंग्य कसने,दूसरे पर हसने की प्रबृत्ति को आरम्भ में ही दबा देना चाहिए। उन्हें व्यायाम करने की आदत डलवानी चाहिए जिससे वे कमजोर न हों।सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या,देश भक्ति और आत्मत्याग का महत्त्व बच्चों को शुरू से ही अवगत कराना चाहिए।प्राणायाम की आदत डलवाने हेतु बच्चों को प्रेरित करना चाहिए।साथ ही जिस दिशा में बच्चा जाना चाहता है उस क्षेत्र की श्रेष्ठता का स्मरण उसे कराना चाहिए।
*- यदि प्रत्येक माता पिता ने अपनी संतान को श्रेष्ठ बनाने हेतु यत्न नहीं किया तो समझिए व्यक्ति,परिवार, देश,धर्म,संस्कृति और स्वयं उस बच्चे का भी भारी अपकार होगा ही।व्यक्ति व्यक्ति में गुणों के आधान से ही राष्ट्र चमकता है।अतः शास्त्रों में व्यक्तित्व निर्माण के जितने भी आचार, शील और व्यवहार बतलाये गए हैं उन्हें एकत्रित कर लोक में लाना चाहिए। लड़के लड़कियों का परिष्कृत नाम रखने का दायित्व माता पिता का होता है और हजारों की संख्या में श्रेष्ठ नामों की सूची तैयार करने का दायित्व शास्त्रज्ञों का होता है।
एक श्रेष्ठ नागरिक, श्रेष्ठ राष्ट्र की धरोहर होता है जिसे माता पिता या गुरु तैयार करता है। इस तैयारी के षोडश चक्रों को वाल्मीकि रामायण और रघुवंशम में बतलाया गया है।
*** इहा प्रात उठी कर रघुनाथा ।
गुरु पितु मात नवावहीँ माथा।।***
***
" कौशल्या सुप्रजा राम ! प्रातः सन्ध्या प्रवर्तते "
का उद्घोष बच्चे को राम बनने की प्रेरणा देता है। हमें यह तय तो करना ही होगा कि क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को
सनातनव्रती बनाना चाहते हैंया पर संस्कृतिजीवी मनुष्य?
बुधवार, 10 फ़रवरी 2021
day या वार की शुरुआत कब से
१. इतिहास-प्रायः यह कहा जाता है कि भारत में वार का प्रचलन नहीं था, यह सुमेरिया से आया था। ६० वर्ष के चक्र को भी कहते हैं कि यह सुमेरिया से आया था। अभी तक सुमेरिया की कोई ऐसी पुस्तक नहीं मिली है जिसमें वार प्रवृत्ति या ६० वर्ष के चक्र का वर्णन हो। यदि कहें कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण में ६० वर्ष के चक्र का विस्तृत वर्णन है, तो उसका उत्तर मिलता है कि यह १२०० ई के बाद की रचना है। भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों का विश्वास है कि दिल्ली पर मुस्लिम अधिकार होने के बाद ही भारत में पुराण लिखे गये। आर्यभट का समय खिसका कर कहा गया कि उन्होंने ग्रीस के हिप्पार्कस की ज्या सारणी की नकल की। एक बार डेविड पिंगरी से मैंने पूछा भी था कि हिप्पार्कस की ज्या सारणा कहां है तो उन्होंने कहा कि यह नहीं है। उनको कहा कि अपने मत के समर्थन में कम से कम अब हिप्पार्कस के नाम पर ग्रीक में ज्या सारणी बना दें। उनहोंने कहा किग्रीक नहीं आती है। आर्यभट ने किस विद्यालय में और क्यों ग्रीक पढ़ा था? ग्रीक में अंक की दशमलव पद्धति नहीं थी, अतः उनकी संख्या पद्धति में कोई गणित सारणी नहीं बन सकती है। इस कारण वहां गणना सम्बन्धी कोई पुस्तक नहीं है।
कहा जाता है कि रामायण, महाभारत में उल्लेख नहीं है अतः भारत में वार का उल्लेख नहीं था। भारत विरुद्ध तर्कों के अनुसार यदि विश्व इतिहास की समीक्षा हो तो अभी तक विश्व में कहीं भी वार प्रवृत्ति आरम्भ नहीं हुई है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ने २० जनवरी को शपथ ली। वह कौन सा वार था या वार के अनुसार इस समय का निर्णय हुआ था? भारत १५अगस्त १९४७ को स्वाधीन हुआ? उस दिन कौन सा वार था तथा यह किस पुस्तक में लिखा है?
वार के प्रयोग कहां तथा क्यों है, इसकी समीक्षा की जा रही है।
२. वैदिक प्रयोग-वेद में वार तथा वासर दोनों शब्दों का प्रयोग है।
वासर का स्पष्ट अर्थ दिन है जो सूर्य के उदय से आरम्भ होता है-
आद् इत् प्रत्नस्य रेतसः ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवा॥
(ऋक्. ८/६/३०, सामवेद १/२०, काण्व सं. २/१४, ऐतरेय आरण्यक, ३/२/४८, छान्दोग्य उपनिषद्, ३/१७/७)
सोम राजन् प्र ण आयूंषि तारीः। अहानीव सूर्यो वासराणि। (ऋक्, ८/४८/७, निरुक्त,४/७)
वार या वाः के अन्य अर्थ भी हैं। वाः या वार् का अर्थ जल है जो सबको अपने में रख लेता है (अवाप्नोति, गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१/२-तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापो ऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति)। कुछ स्थलों पर इसका अर्थ दिन क्रम भी हो सकता है, जो बार-बार आता है।
अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन् देव एक।
अजयो गा अजयः शूर स्सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून्॥ (ऋक्, १/३२/१२)
यहां प्रति अहः (दिन) में सूर्य देव (देव = जो प्रकाशित करे) के उदय से वार का निर्देश है।
विश्वस्मा इदिषुध्यते देवत्रा हव्यमोहिषे। विश्वस्मा इत् सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा व्यृण्वति॥ (ऋक्, १/१२८/६)
यहां एक वार के समाप्त होने पर अन्य वार के उत्पन्न होने का निर्देश है। विश्वस्मै सुकृते वारं ऋण्वति, द्वारा वि-ऋण्वति। विश्वस्मै = सबके लिए। सुकृत -विश्व सृष्टि, जिसमें, कर्ता, कर्म, फल आदि सभी एक ही ब्रह्म हैं( तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७)
वार ७ होने का आधार है-७ प्रकार के चक्र।
स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः। दे॒वा यद्य॒ज्ञन्त॑न्वा॒नाऽअब॑ध्न॒न्पुरु॑षम्प॒शुम्॥१५॥
(पुरुष सूक्त, वाज. सं. ३१/१५)
यहां यज्ञ के लिए ४ प्रकार के सप्त हैं-त्रि-सप्त समिधा, सप्त परिधि। समिधा का अर्थ यज्ञ की सामग्री। परिधि के कई अर्थ हैं-७ लोक, जो परिधि के भीतर सीमित हैं, काल चक्र में ७ प्रकार के युग, या उसकी प्रतिमा रूप ७ वार के चक्र।
सप्त युञ्जन्ति रथमेक चक्रो एको अश्वो वहति सप्तनामा-(अस्य वामीय सूक्त, ऋक्, १/१६४/२)
काल प्रवाह को ही अश्व कहा गया है-
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥१॥
सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः। सा इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत् कालः स ईषते प्रथमो नु देवः॥२॥
(अथर्व, शौनक, १९/५३)
अश्व का अर्थ है गति का साधन। गति या परिवर्तन से काल का ज्ञान तथा उसकी माप होती है।
रूपान्तरं तद् द्विज कालसंज्ञम् (विष्णु पुराण, २/२/२४)
गति या क्रिया से यज्ञ होता है। यज्ञ से निर्मित पदार्थ ऋक् या मूर्ति रूप है। काल अनुसार निर्माण क्रिया यज्ञ है। पिण्ड या दृश्य जात् के अनुसार ऋक् प्रथम वेद है। क्रिया या यज्ञ के अनुसार यजुर्वेद मुख्य है। ज्ञान के अनुसार साम मुख्य है, हम तक किसी वस्तु का साम या प्रभाव पहुंचने पर उसका ज्ञान होता है (वेदानां सामवेदोऽस्मि-गीता, १०/२२)।
कालो ह भूत भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत॥३॥
कालो यज्ञं समैरद् देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः॥४॥
इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधितिश्च पुण्याः।
सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः॥५॥
(अथर्व, शौनक, १९/५४)
काल गणना का यह रूप ब्रह्मा द्वारा निर्धारित हुआ जब अभिजित् नक्षत्र की दिशा में ध्रुव था (३८,००० ईपू)। उस समय अभिजित् से वर्ष आरम्भ होता था। बाद में कार्त्तिकेय के समय से अभिजित् का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष तथा वर्षा का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
३. वेदाङ्ग ज्योतिष- इस नाम के ३ ग्रन्थ हैं-ऋक्, याजुष, अथर्वण। ऋक् तथा यजुर्वेद में लिखा है कि वेद यज्ञ के लिए हैं, यज्ञ काल के अनुसार करते हैं। अतः काल निर्धारण के लिए ज्योतिष है।
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः, कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं, यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्॥
(ऋक् ज्योतिष, ३६, याजुष ज्योतिष, ३)
ऋक् ज्योतिष में काल की गणना है जिसके अनुसार १९ वर्ष का युग होता है, इसमें ५ वर्ष संवत्सर हैं, अन्य १४ वर्ष अन्य ४ प्रकार के हैं-परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर, इद्वत्सर। पर कौन सा यज्ञ कब किया जाय यह कहीं नहीं लिखा है। याजुष ज्योतिष में यज्ञ काल के संक्षिप्त उल्लेख हैं-श्लोक ३२-३४ में नक्षत्र देवताओं की सूची दे कर श्लोक ३५ में कहा है कि इन देवों के अनुसार यज्ञ होना चाहिए। नक्षत्र के अनुसार नाम रखने का भी विधान है, पर किस नक्षत्र या उसके पाद के अनुसार क्या नाम होगा, वह (अवकहडा चक्र) नहीं है। श्लोक ३६ में उग्र तथा क्रूर नक्षत्रों के नाम हैं। श्लोक ३८ में मुहूर्त्त मान, तथा ४२ में उपयुक्त समय अर्थ में मुहूर्त्त उल्लेख है।
आथर्वण ज्योतिष में विभिन्न कामों के लिए शुभ-अशुभ मुहूर्त्त तथा पञ्चाङ्ग के ५ अंग दिये हैं-तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण। इन सभी के अनुसार मुहूर्त्त के शुभ होने का निर्णय दिया है। श्लोक ९३ में वार का वर्तमान क्रम दिया गया है। उसके बाद किस वार में कौन सा काम उपयुक्त है, यह कहा है। तीनों वेदाङ्ग ज्योतिष मिल कर यज्ञ समय के उद्देश्य से वेदाङ्ग हैं
किन्तु ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा है, इस अर्थ में वेद का ज्ञान इनसे नहीं हो रहा है। वेद के ७ लोकों की माप पुराणों के भुवन कोष में है। पौराणिक मापों का मान जैन ज्योतिष में है, तथा इन नामों की परिभाषा यजुर्वेद में है। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी तथा सौरमण्डल का आकार, गति माप तथा युगमान दिया है। ब्रह्माण्ड का आकार दिया है। इसका सृष्टि सिद्धान्त पुरुष सूक्त, सांख्य तथा पाञ्चरात्र दर्शन का समन्वय है। यजुर्वेद वाज. संहिता (१५/१५-१९, १७/५८, १८/४०) तथा कूर्म पुराण (४१/२-८), मत्स्य पुराण (१२८/२९-३३), ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२४-६५-७३) आदि में सूर्य रश्मियों के माध्यम या उसकी गति से मनुष्य पर प्रभाव तथा ग्रह नक्षत्रों द्वारा उसमें परिवर्तन का वर्णन है। यह मनुष्य को विश्व की प्रतिमा रूप में वर्णन करते हैं, जो वेद का आधार है। किन्तु इसकी व्याख्या सम्बन्धी वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ नहीं है। यह होरा का विषय है जिस पर पराशर तथा वराहमिहिर की प्राचीन पुस्तकें हैं। ये सभी वेदाङ्ग हैं।
४. वार की आवश्यकता-ऐतिहासिक कालक्रम या घटना का वर्णन करने के लिए वार की आवश्यकता नहीं है। अतः इतिहास ग्रन्थों में इसका प्रयोग नहीं है।
सूर्य सिद्धान्त में किसी निर्दिष्ट काल से दिन समूह (अहर्गण) की गणना में वार की आवश्यकता है। सौर वर्ष में क्रमागत दिनों की गणना होती है, उसमें भी ऋतुशेष निकालने के लिए दिनों का जोड़ घटाव करना पड़ता है। चाद्र मास का समन्वय करने के लिए लम्बी गणना है। चान्द्र तिथि, मास, वर्ष का क्रमागत दिनों, सौर मास या वर्ष से स्पष्ट सम्बन्ध नहीं है तथा वह बदलता रहता है। उसकी शुद्धि के लिए देखा जाता है कि दिन संख्या के अनुसारआज जो वार आ रहा है, वह ठीक है या नहीं। अशुद्धि होने पर १-२ दिन कम या अधिक करते हैं। इसे वार शुद्धि कहते हैं।
आधुनिक ज्योतिष में भी प्राचीन गणनाके लिए एक काल्पनिक आधार लिया गया है-१-१-४७१३ ईपू, जिस दिन शुक्रवार था। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार सृष्ट्यादि अहर्गण के लिए रविवार से वार आरम्भ करते हैं। सम्भवतः पूरे विश्व में यह स्वीकृत था अतः रविवार की छुट्टी का प्रचलन हुआ। बाइबिल के आरम्भ में सृष्टि का सप्तम दिन (मन्वन्तर) चल रहा है। कलि आरम्भ से गणना के लिए प्रथम वार बुधवार मानते हैं।
सूर्य सिद्धान्त के पूर्व ब्रह्मा द्वारा अभिजित् से या १५८०० ईपू में कार्त्तिकेय द्वारा धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ होने पर वर्ष का प्रथम मास माघ होता था। यह भी चान्द्र मास था जिसमें पूर्णिमा के चान्द्र नक्षत्र के अनुसार मास नाम होता था। अतः उस समय की काल गणना बिना वार शुद्धि के सम्भव नहीं थी।
वार का प्रयोग मुहूर्त्त निर्णय या साप्ताहिक दिनचर्या, शिक्षा का कार्यक्रम (रुटीन) आदि के लिए है।
५. वार क्रम-सूर्य सिद्धान्त, भूगोल अध्याय (७८), आर्यभटीय के कालक्रिया पाद (१६) में वार क्रम का आधार दिया है। मन्द गति से क्रमशः तीव्र गति के ग्रह हैं-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य (पृथ्वी), शुक्र, बुध, चन्द्र। प्रतिदिन पूर्व क्षितिज पर १२ राशियों का क्रमागत उदय होता है जिसे उस स्थान का लग्न कहते हैं। प्रत्येक राशि का आधा भाग होरा (अहो-रात्र का के मध्य अक्षर) है। अतः प्रतिदिन २४ होरा का उदय होता है। होरा से अंग्रेजी में आवर (hour) हुआ है। किसी वार की प्रथम होरा उसी ग्रह की होती है। उसके बाद बढ़ती गति के क्रम से अन्य ग्रहों की होरा होगी। यथा शनि वार को प्रथम होरा शनि ग्रह की होगी। उसके बाद २१ होरा तक ७ ग्रहों का ३ चक्र पूरा हो जायेगा। दिन रूपी समिधा भी त्रि-सप्त है। उसके बाद उस दिन की ३ होरा तथा अगले दिन की प्रथम होरा आयेगी। इनकी गिनती पुनः शनि से होगी-शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य। अतः अगला दिन रविवार होगा।
सूर्य सिद्धान्त का वर्तमान रूप मयासुर द्वारा संशोधित है (९२२३ ईपू) में। इसमें पृथ्वी अक्ष का झुकाव, दिन-वर्ष का अनुपात आदि उसी काल के हैं। अतः कम से कम ११,००० वर्ष से वार प्रवृत्ति चल रही है। साभार अरुण उपाध्याय
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