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भारतीय दर्शन का प्रभाव
_________________________...: भारतीय दर्शन का प्रभाव _________________________________________ भारतीय दर्शन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रचलित दर्शनों में एक...
रविवार, 21 अप्रैल 2019
रविवार, 14 अप्रैल 2019
भारत के बाहर जहां आज भी रामराज्य है
भगवान् श्रीराम की जन्म तिथि
यद्यपि पुराणों के अनुसार श्रीराम का जन्म ७वे मन्वतर के २४वे त्रेतायुग में हुआ है । फिर भी पाश्चात्यों ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शताब्दियों या सहस्राब्दियों में ही माना है ।
वैन्थली ने ई पू ९५० में
कर्नल टाड ने ई पू ११०० में
विल्फ़र्ड ने ई पू १३६० में
और विलियम जोन्स ने २०२९ ई पू में माना है । पाश्चात्यों की तरह आधुनिक भारतीय विद्वान भी पाश्चात्यों के इस विचारधारा से बाहर नही निकल सके और वो भी अपनी अटकलों से ई पू के कुछ सहस्राब्दियों पू ही निर्धारित करते हैं ।
प्रो कानूनगो ने ई पू ४४३३ में
सरोज बाला ने ई पू ५११४ में और पी वी वर्तक ने ई पू ७३२३ में निर्धारित किया है ।
पाश्चात्य जिनके बाइबिल के अनुसार सृष्टि ही ४००४ ई पू में उत्पन्न हुई वो भगवान् श्रीराम का जन्म ईसा के आसपास ही सिद्ध करेंगे । जबकि भारतीय वैदिक परम्परा में सृष्टि की उत्पत्ति दो सौ करोड़ पर्व पहले हुई थी । सूर्य ,गुरु और शनि के विचार से पाँचो उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से श्रीराम का जन्म काल १८५११४ वर्ष पू हुआ था किन्तु हम यहां अटकल नहीं लगाएंगे क्योकि शास्त्र ही प्रमाण हैं और शास्त्रों के अनुसार २४ वें त्रेतायुग की द्वापर की संध्यांश में हुआ था ।
"चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा ।
सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः ।। (वायुपु०१८/७२)
'सन्ध्यंशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च ।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पति: ।।' (म०भा०१२/३३९)
इस शास्त्र वचन के अनुसार गणना करने पर भगवान् श्रीराम का जन्म १८१६०१५६ वर्ष पू २४ वे त्रेतायुग की द्वापरयुग की संध्यांश में हुआ था और श्रीराम-जानकीका विवाह १३ वर्ष की आयु में हुआ था और विवाह के १२ वर्ष बाद २५ वर्ष की आयु में वनवास हुआ था । १४ वर्ष वनमें रहकर ३९ वर्ष की आयु में ४०वें वर्ष में राजाधिराज बने । भगवान् श्रीराम ने ११००० वर्ष ११मास ११दिन तक अखण्ड भूमण्डल का राज्य किया था ।
मित्रो हमारे आराध्य देव पुरुषोत्तम राम की भी ध्वजा पूरे दुनिया मे है ।
दुनिया का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो पुरुषोत्तम राम के बारे में नहीं जनता हो , सभी भारतीय धर्मग्रंथों में राम का नाम आदर से लया गया है , राम के बिना हिन्दू धर्म और संस्कृति अधूरी है , जैसे हिन्दू अभिवादन के लिए "राम राम " शब्द का प्रयोग करते है मृत्यु बाद भी राम नाम सत्य है कहते हैं ।
भारत के बाहर भी थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है , यूनेस्को मे संरक्षित शहर की स्थापना 1351 मे राजा यू थोंग द्वारा हुई थी जिसे की 1767 मे बर्मा द्वारा तबाह करने के बाद खण्डहर रूप मे छोड दिया गया।
उसका नाम भी क्रुंग काओ था। इसका अयोध्या नामकरण 1919 मे तत्कालीन थाई राजा वजिरावुद्ध ने किया है।
ये नामकरण शाही गजट मे दिया है वहा ।
और वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट " भूमिबल अतुल्य तेज " राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम ( Rama 9 th ) कहा जाता है ।
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंगरेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है ।
थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों
का प्रयोग किया गया है , इस नाम की एक और विशेषता है , इसे बोला नहीं बल्कि गाकर कहा जाता है . कुछ लोग आसानी के लिए इसे "महेंद्र अयोध्या " भी कहते है , अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या , थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं ।
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है ,जिसे थाई भाषा में " राम कियेन " कहते हैं , जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है , इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था , थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ ,क्योंकि भारत की तरह वहां के नागरिक अपने पूर्वजों और प्राचीन परम्पराओं का उपहास नहीं करते, गर्व करते हैं।
थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है ,
बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने " गरुड़ " को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है , यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है ।
(2) कंपूचिया नामक देश में राम कथा रामकेर्ति नाम से प्रसिद्ध है । मलयेशिया की राम कथा और हिकायत सेरी राम है । फिलिपींस की राम कथा महालादिया लावन है । नेपाल की राम कथा भानुभक्त कृत रामायण है ।
कंपूचिया की राजधानी फ्नाम-पेंह में एक बौद्ध संस्थान है जहाँ ख्मेर लिरामायण की प्रति भी है। फ्नाम-पेंह बौद्ध संस्थान के तत्कालीन निदेशक एस. कार्पेल्स द्वारा रामकेर्ति के उपलब्ध सोलह सर्गों (१-१० तथा ७६-८०) का प्रकाशन अलग-अलग पुस्तिकाओं में हुआ था। इसकी प्रत्येक पुस्तिका पर रामायण के किसी न किसी आख्यान का चित्र है।१ कंपूचिया की रामायण को वहाँ के लोग 'रिआमकेर' के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य जगत में यह 'रामकेर्ति' के नाम से विख्यात है।
'रामकेर्ति' ख्मेर साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 'ख्मेर' कंपूचिया की भाषा का नाम है। इसके प्रथम खंड की कथा विश्वामित्र यज्ञ से आरंभ होती है और इंद्रजित वध पर आकर अंटक जाती है, दूसरे खंड में सीता त्याग से उनके पृथ्वी प्रवेश तक की कथा है। 'रामकेर्ति' का रचनाकार कोई बौद्ध भिक्षुक ज्ञात होता है, क्योंकि वह राम को नारायण का अवतार मानते हुए उनको 'बोधिसत्व' की उपाधि प्रदान करता है। इसके बावजूद 'रामकेर्ति' और वाल्मीकि रामायण में अत्यधिक साम्य है।
बर्मा में राम Rama (Yama) और Sita (Thida) को Yama Zatdaw नामक रामायण ग्रन्थ में लोप्रियता प्राप्त है ।
(3) इसके अतिरिक्त Java, Bali, Malaya, Burma, Thailand, Cambodia and Laos सहित कई बुद्धिस्ट देशो में रामायण अति लोकप्रिय है । दुनिया के सबसे ज्यादा मुस्लिमो वाले देश इंडोनेशिया में रामलीला मुस्लिम करते है और वह विश्व प्रसिद्ध है ।
नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार में वाल्मीकि रामायण की दो प्राचीन पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं। इनमें से एक पांडुलिपि के किष्किंधा कांड की पुष्पिका पर तत्कालीन नेपाल नरेश गांगेय देव और लिपिकार तीरमुक्ति निवासी कायस्थ पंडित गोपति का नाम अंकित है। इसकी तिथि सं. १०७६ तदनुसार १०१९ई. है। दूसरी पांडुलिपि की तिथि नेपाली संवत् ७९५ तदनुसार १६७४-७६ई. है।
नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेपाल के लोग इसे ही अपना आदि रामायण मानते हैं। यद्यपि भनुभक्त के पूर्व भी नेपाली राम काव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ भ का नाम उल्लेखनीय है। रघुनाथ भ कृत रामायण सुंदर कांड की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुआ था।
एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एच.डब्लू. बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर प्रकाश में लाया। उनकी गणना के अनुसार इसकी तिथि नौवीं शताब्दी है।१ खोतानी रामायण अनेक स्थलों पर तिब्बीती रामायण के समान है, किंतु इसमें अनेक ऐसे वृत्तांत हैं जो तिब्बती रामायण में नहीं हैं।
(4) चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को राम कथा की विस्तृत जानकारी है। वहाँ के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएँ मिली हैं। वानर पूजा का संबंध राम के प्रिय पात्र हनुमान से स्थापित किया गया है।१ मंगोलिया में राम कथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियाँ भी उपलबध हुई हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि बौद्ध साहित्य के साथ संस्कृत साहित्य की भी बहुत सारी रचनाएँ वहाँ पहुँची। इन्हीं रचनाओं के साथ रामकथा भी वहाँ पहुँच गयी। दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार राम कथाओं की खोज की है।२ इनमें राजा जीवक की कथा विशेष रुप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है।
जीवक जातक की कथा का अठारहवीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था जिसके मूल तिब्बती ग्रंथ की कोई जानकारी नहीं है। आठ अध्यायों में विभक्त जीवक जातक पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ता है। इसमें सर्वप्रथम गुरु तथा बोधिसत्व मंजुश्री की प्रार्थना की गयी है। जीवक पूर्व जन्म में बौद्ध सम्राट थे। उन्होंने अपनी पत्नी तथा पुत्र का परित्याग कर दिया। इसी कारण उन्हें दोनों ने शाप दे दिया कि अगले जन्म में वे संतानहीन हो जायेंगे। जीवक की भेंट भगवान बुद्ध से हुई। उन्होंने श्रद्धा के साथ उनका प्रवचन सुना और उन्हें अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया। इस घटना के बाद जीवक की भेंट दस हज़ार मछुआरों से हुई। उन्होंने उन्हें अहिंसा का उपदेश दिया।
जीवक नामक राजा को तीन रानियाँ थीं। तीनों को कोई संतान नहीं थी। राजा वंशवृद्धि के लिए बहुत चिंतित थे। एक बार उन्होंने पुत्र का स्वप्न देखा। भविष्यवस्ताओं के कहने पर वे उंदुबरा नामक पुष्प की तलाश में समुद्र तट पर गये। वहाँ से पुष्प लाकर उन्होंने रानी को दिया। पुष्प भक्षण से रानी को एक पुत्र हुआ जिसका नाम राम रखा गया। कालांतर में राम राजा बने। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी। उन्होंने अपने राज्य में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु कुकुचंद को आमंत्रित किया। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं। 'अनामकं जातकम्' और 'दशरथ कथानम्'। फादर कामिल लुल्के के अनुसार तीसरी शताब्दी ईस्वी में 'अनामकं जातकम्' का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। चीनी अनुवाद लियेऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।
'अनामकं जातकम्' में किसी पात्र का नामोल्लेख नहीं हुआ है, किंतु कथा के रचनात्मक स्वरुप से ज्ञात होता है कि यह रामायण पर आधारित है, क्योंकि इसमें राम वन गमन, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंधष लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट संकेत मिलता है। नायिका विहीन 'अनामकं जातकम्', जानकी हरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं के अभाव के बावजूद वाल्मीकि रामायण के निकट जान पड़ता है। अहिंसा की प्रमुखता के कारण चीनी राम कथाओं पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है।
(5) तिब्बती रामायण की छह प्रतियाँ तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई है। उत्तर-पश्चिम चीन स्थित तुन-हुआंग पर ७८७ से ८४८ ई. तक तिब्बतियों का आधिपत्य था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसी अवधि में इन गैर-बौद्ध परंपरावादी राम कथाओं का सृजन हुआ।१ तिब्ब्त की सबसे प्रामाणिक राम कथा किंरस-पुंस-पा की है जो 'काव्यदर्श' की श्लोक संख्या २९७ तथा २८९ के संदर्भ में व्याख्यायित हुई है।२
किंरस-पुंस-पा की राम कथा के आरंभ में कहा गया है कि शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण द्वारा दसों सिर अर्पित करने के बाद उसकी दश गर्दनें शेष रह जाती हैं। इसी कारण उसे दशग्रीव कहा जाता है। महेश्वर स्वयं उसके पास जाते हैं और उसे तब तक के लिए अमरता का वरदान देते हैं, जब तक कि उसका अश्वमुख मंजित नहीं हो जाता।
(6) इंडोनेशिया और मलयेशिया की तरह फिलिपींस के इस्लामीकरण के बाद वहाँ की राम कथा को नये रुप रंग में प्रस्तुत किया गया। ऐसी भी संभावना है कि इसे बौद्धों की तरह जानबूझ कर विकृत किया गया। डॉ. जॉन आर. फ्रुैंसिस्को ने फिलिपींस की मारनव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम मसलादिया लाबन है। इसकी कथावस्तु पर सीता के स्वयंवर, विवाह, अपहरण, अन्वेषण और उद्धार की छाप स्पष्ट रुप से दृष्टिगत होता है।
(7) मलयेशिया का इस्लामीकरण तेरहवीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्रा
मंगलवार, 9 अप्रैल 2019
भारत की श्रेष्ठ परंपरा का वैज्ञानिक दृष्टिकोण व नवरात्र का महत्व
ये तय करना लगभग नामुमकिन है कि एक चक्र (सर्किल) शुरू कहाँ से हुआ और ख़त्म कहाँ पर। इस कारण शाक्त परम्पराओं को देखेंगे तो कठिनाई होगी। बरसों मैकले मॉडल की पढ़ाई और ईसाई नियमों पर बने कानूनों के कारण अवचेतन मन विविधता को स्वीकार करने में आनाकानी शुरू कर सकता है। शाक्त परम्पराओं में कुछ आदि काल से चली आ रही लोक-परम्पराएं हैं, कुछ तांत्रिक मत से आती हैं, और कुछ सनातन वैदिक। देवी की उपासना भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे लम्बे समय से जीवित है। स्त्री भी देवी हो सकती है, ऐसा मानने वाली दूसरी सभ्यताएं मिट गयीं, या मिटा डाली गयीं।
सबसे लम्बे समय तक परम्पराएं कैसे चलती हैं इसका उदाहरण आपको लोटे में दिख जाएगा। भारत के कई क्षेत्रों में पानी पीने या रखने के लिए जो लोटा होता है, उसके सबसे पुराने नमूने हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सिन्धु घाटी सभ्यता में मिलते हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने का जो तरीका सिन्धु घाटी सभ्यता में इस्तेमाल होता था, वही तरीका असम के माजुली द्वीप के निवासी आज भी प्रयोग करते हैं। सभ्यता के लगातार होने के प्रमाण अगर अभी तक ढूंढें नहीं जा सके हैं तो सभ्यता लगातार जीवित नहीं थी, इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं। पहले सरस्वती नदी का अस्तित्व था कहने पर मजाक उड़ाया जाता था, अब आक्रमणकारी इसपर चुप्पी साधते भी दिख ही जायेंगे।
रोबर्ट रेडफील्ड नाम के मानव विज्ञानी (अन्थ्रोपोलोगिस्ट) ने भारत की धार्मिक मान्यताओं को बड़ी और छोटी धारा में बांटने की कोशिश की थी, जिसे बाद में मिल्टन सिंगर और एम.एन. विश्वास जैसे मानव विज्ञानियों ने बढ़ावा भी दिया। उनके हिसाब से बड़ी धारा वो होती थी जिसके लिखित ग्रन्थ थे, उन ग्रंथों को पढ़ने-समझने और समझाने वाला एक वर्ग था। उनके बड़े नेता होते थे जो उसके भाव को जन-जन तक पहुंचाते, धार्मिक तीर्थ होते थे और तिथियों का अपना पंचांग (कैलेंडर) भी होता था। जाहिर है विदेशी चश्मे से देखने के कारण उनसे समझने में कई गलतियाँ हुई हैं। छोटी धारा में वो अनगढ़ प्रथाओं और अंधविश्वासों वाली अलिखित ग्रामीण परम्पराओं को रखते थे।
शाक्त परम्पराओं में देखने पर उनकी अवधारणा की कमियां और स्पष्ट दिखती हैं। ग्रामीण भक्ति भाव का प्रयोग वैदिक रीतियों में भी होगा और संस्कृत में लिखे वैदिक मन्त्रों का प्रयोग तांत्रिक रीतियों में भी स्पष्ट दिख जाता है। दुर्गा पूजा और नवरात्रि का महत्व इसमें भी है कि जरा सा ध्यान देते ही ये आपकी आँख से सेकुलरिज्म का टिन का चश्मा उतार देती है। यहाँ कर्म और वचन तक ही नियम शेष नहीं होते (बांग्ला में “शेष होना” मतलब ख़त्म होना होता है)। यहाँ नियम मन और विचारों पर भी लागू होते हैं। ये कुछ कुछ वैसा है, जैसा भारतीय कानूनों में होने लगा है।
अदालतों में मंदिर के देवी-देवता को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया जाता है, उसकी ओर से कोई मित्र-बान्धव बनकर मुकदमा लड़ता है। शास्त्रों में भी कुछ ऐसा ही कहा जाता है। विशेषकर भक्तियोग सम्बन्धी अवधारणाओं में ये निर्देश होते हैं कि किस देवी या देवता को क्या माना जा सकता है। जैसे श्री कृष्ण के लिए सखा भाव बिलकुल मान्य होगा, लेकिन देवी दुर्गा का उपासक कोई पुरुष, देवी को सखा नहीं मान सकता, वो माता के ही भाव में रहेंगी। ये किसी “बड़ी धारा” में ढूंढना जरूरी नहीं, ये साधारण ग्रामीण नियमों में भी दिख जाएगा। कई मंदिरों में पुरुषों के अकेले साड़ी-चूड़ी जैसी चीज़ें चढ़ाने के प्रयास को अजीब सी हेय दृष्टि का सामना करना पड़ सकता है।
आयातित विचारधारा ने एक राजा के दूसरे से युद्ध को शैव और वैष्णव या शाक्तों के वैमनस्य के रूप में भी दिखाने की कोशिश की है। मंदिरों में जाने और दुर्गा पूजा करने का एक फायदा ये भी है कि इस अवधारणा में भी दर्जनों छेद नजर आ जायेंगे। शैव मंदिर हों या राम मंदिर, शायद ही कोई ऐसी जगह होगी जहाँ एक देवी-देवता के मंदिर में दूसरे को स्थान न दिया गया हो। अजंता-एल्लोरा के चित्र हों, कैलाश मंदिर या शिव के अन्य रूपों के नाम से जाने जाने वाले मंदिर हों, या फिर हजार राम मंदिर, देवी दुर्गा हर जगह दिखती हैं। शारदीय नवरात्र कभी कभी अकाल बोधन के नाम से तो इसलिए ही जाना जाता है क्योंकि श्री राम ने रावण पर विजय पाने के लिए इसी समय देवी उपासना की थी।
पर्व-त्यौहार उनके तर्कों में कई छेद दिखा देते हैं, इसलिए भारत की विविधता पर हमला करने वालों को परम्पराओं से विशेष चिढ़ रहती है। नाम और हुलिए से धोखा देने और भेष बदलने में वो माहिर हैं, ऐसे में सवाल ये भी है कि उन्हें पहचानें कैसे? ये बहुत आसान है। वो आपमें बिना वजह अपराध-बोध पैदा करना चाहेंगे। जैसे बिहार में मौसम अति के करीब होता है। गर्मी में लगातार पसीना पोंछने की जरूरत होगी और ठण्ड में कान ढकना होगा। यहाँ बाढ़ की वजह से आद्रता भी रहती है इसलिए मोटा तौलिया इस्तेमाल करने पर वो सूखेगा नहीं। गरीबी की वजह से सभी मोटा फर वाला तौलिया खरीदने में भी समर्थ नहीं है।
इसलिए बिहारियों के गले में आपको अक्सर “गमछा” टंगा मिल जाएगा। आयातित विचारधारा वाला तुरंत इसे “प्रतीकवाद” घोषित करके आपको वैचारिक रूप से नीचा दिखाने लगेगा। खुद वो गले में कोई महंगा दुपट्टा (जिसका पसीना पोछने या कान बांधने में उपयोग न हो) लपेटे सकता है। उस स्थिति में वो बिना बोले ही आपकी गरीबी के लिए आपको नीचा दिखाना चाहता है। ये जो अकारण ही आपको अपराधी सिद्ध करने की कोशिश है इसमें आक्रमणकारी सबसे आसानी से पहचान में आता है। नाज़ी गोएबेल्स के “नेम कालिंग” से सीखकर उन्होंने इसके लिए नारीवाद, भक्त, ब्राह्मणवाद, दलित चिंतन, ट्रोल जैसे कई शब्द भी बना रखे हैं।
भारत में “आप रुपी भोजन, पर रुपी श्रृंगार” की कहावत भी चलती है। आपको अपराधबोध करवाने के लिए वो आपके मांसाहारी होने का मजाक उड़ाएगा। अगर कहीं आप शाकाहारी हुए तो खाने-पीने की निजी स्वतंत्रता छीन रहे हो, ये कहकर आपको नीचा दिखायेगा। उन्हें असली दिक्कत भारत की विविधता से है। भारत उनके सामने इतने रूपों में आता है कि इतने वर्षों के हमलों में भी वो इसे नष्ट नहीं कर पाए हैं। एक तरीका होता तो वो उसे निम्न-नीच-निकृष्ट कहकर ख़त्म भी कर पाते। एक रूप को अनुचित कहने पर उनके सामने दूसरा प्रकट हो जाता है। दुर्गा पूजा और नवरात्र उनके लिए बड़ी समस्या है।
कहीं तीन महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में देवी दिखती हैं, तो कहीं नव दुर्गा में उनके नौ रूप हो जाते हैं। वो चौंसठ योगिनी के रूप में भी पूजी जाती हैं और ललिता सहस्त्रनाम के हज़ार नामों से भी। कोस कोस पर बदलते पानी और वाणी की ही तरह हर भक्त के लिए देवी का रूप भी बदल जाता है। उन्हें दस तरीके से पहनी जाने वाली साड़ी की विविधता जनता में तो क्या मूर्तियों में भी अच्छी नहीं लगती। उन्हें सब एक ही बोरे जैसे परिधान में चाहिए।
बाकी नवरात्रि दुष्टों के दलन का पर्व भी है। भारत की विविधता के शत्रुओं के दमन के पर्व के रूप में भी इसे मना ही सकते हैं।
#नवरात्रि
दुर्गा सप्तशती का पाठ कुंजिका स्तोत्र के बिना हीन माना जाता है। अब ये कुंजिका स्तोत्र कौन किसे सिखा रहा होता है? इसका जवाब उसके अंत में है जहाँ “श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वती संवादे” लिखा हुआ है। अगर स्त्रियों के लिए पाठ वर्जित होता तो भगवान शिव खुद ही अपनी पत्नी को सिखाने जैसी हरकत क्यों करते?
जहाँ तक पाठ की विधि का प्रश्न है चिदम्बर संहिता में पहले अर्गला फिर कीलक और अंत में कवच पढ़ने का विधान है। योगरत्नावाली में पाठ का क्रम बदल जाता है और वहां पहले कवच (बीज), फिर अर्गला (शक्ति) और अंत में कीलक पढ़ने का विधान है। गीता प्रेस वाली दुर्गा सप्तशती में ठीक से देखने पर ये मिल जायेगा।
उसके अलावा पाठ विधि के अंतर देखेंगे तो मेरु तंत्र, कटक तंत्र, मरिचिकल्प आदि में भी थोड़े बहुत अंतर मिल जायेंगे। दुर्गा सप्तशती के लिए कई विधियाँ तंत्रों में हैं और करीब उतनी ही वैदिक रीतियों में भी हैं। कोई दिन में एक चरित्र पढ़े, कोई केवल एक अध्याय, कोई पूरी ही हर दिन पाठ करे, ये सभी संभव हैं।
सकाम और निष्काम के पक्ष से देखें तो सुरथ और समाधी नाम के दो लोगों पर इसकी कहानी शुरू होती है। राजा सुरथ को इस जन्म में राज्य और आगे सावर्णिक (जिनके नाम से मन्वन्तर है) ऐसे राजा होने का वरदान मिला था। समाधी ने अहंकार आदि से मुक्ति मांगी तो उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए अलग अलग फल भी संभव हैं।
हाँ, जैसे स्कूल में गणित (मैथ्स) के शिक्षक से हिंदी व्याकरण के सवाल पूछने नहीं पहुँच जाते थे, वैसे ही हर ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे से सलाह मत लीजिये। पूछना ही हो तो जो कोई 10-20 साल से पूजा करता करवाता आ रहा हो, ऐसे किसी को ढूँढने का प्रयास कीजिये। घर से निकल कर कुर्सी छोड़कर ढूंढना मुश्किल लगे तो फिर अपने मन की कीजिये।
अपराध क्षमा पाठ के अंत में “एवं ज्ञात्वा महादेवी यथायोग्यं तथा कुरु” लिखा होता है। जो होगा, सही ही होगा।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |
रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |
अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?
लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?
आम तौर पर आपको दल हित चिन्तक और एक आयातित विचारधारा के प्रवर्तक ये बताएँगे कि भारत में स्त्री शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं था | लड़कियों को कहने के लिए तो दुर्गा-काली कहा जाता था लेकिन उन्हें हथियार चलाना नहीं सिखाया जाता था | अगर आप रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देंगे तो वो कहेंगे वो तो रानी थी | जब आप बताएँगे कि उन्होंने कुछ ही दिनों में 5000 स्त्री सैनिक कैसे जमा कर लिए थे तो वो कोई और कुतर्क गढ़ेंगे |
ऐसा करते समय वो एक बुरी सी चीज़ भूल जाते हैं | भारत श्रुति की परम्पराओं से चलता है | अब किताबें लिखने के बदले अगर लोगों ने उसे पूरा का पूरा याद ही कर रखा हो तो उसे मिटाना संभव नहीं होता | हर याद कर चुके व्यक्ति की हत्या कर डालेंगे तभी वो पूरी तरह ख़त्म होगा | एक भी अगर बचा रह गया तो वो किसी ना किसी को सिखा देने में कामयाब हो जायेगा | गुरुकुलों और अखाड़ों की परम्पराओं को तोड़ने के लिए हर घृणित षडयंत्र रचने के वाबजूद गोर साहब और उनके ये भूरे गुलाम नाकाम ही रहे |
इन तथाकथित दल हित चिंतकों और आयातित विचारधारा वाले प्रख्यात कहे जाने वाले नारीवादियों ने बड़े प्यार से जिनका नाम मनु-स्मृति इरानी रखा है उन्होंने कुछ दिन पहले एक फोटो लगाने का अभियान और चला दिया | उन्होंने हस्तशिल्प और हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए हथकरघा से निर्मित साड़ी में अपनी तस्वीर डाल दी | सोशल मीडिया पर ये एक मुहीम की तरह जब शुरू हुआ तो कई महिलाओं ने इसमें शिरकत की | इसी कड़ी में चेन्नई के लॉयला कॉलेज की एक शिक्षिका ऐश्वर्या मानिवान्नन ने तस्वीर के बदले अपना विडियो डाला | वो सिलम्वम नाम से जाने जाने वाली लाठी चलाने की कला में भी अभ्यस्त हैं | उनका विडियो वायरल हो गया था
शनिवार, 6 अप्रैल 2019
पौराणिक भूगोल के अनुसार भूलोक के सप्त महाद्वीपों में एक द्वीप है जिसका नाम है जम्बू द्वीप। यह जम्बू द्वीप धरती के केंद्र में स्थित है और इस जम्बू द्वीप में 9 देश है:- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। पुराणों में जम्बू द्वीप के 6 पर्वत बताए गए हैं - हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान।
;जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंक पुरुषं स्मृतम्,
हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।- (विष्णु पुराण)
मनुस्मृति में वर्णित दरद, खस आदि पर्वतीय जातियां हैं जो चीन, कोरिया और मंगोलिया तक फैली हुई हैं। बौद्ध धर्म का प्रचार इन देशों में खूब हुआ। चंगेज खां आकाश की पूजा करता था। मंगोलियाई मध्य एशिया में बसने के बाद इस्लाम के प्रभाव के चलते मुसलमान बन गए। मंगोल, मुघन हुआ और मुघल ही मुगल हो गया। कभी मंगोलिया मौद्गलिक था। वहां बौद्ध संगति हुई थी। मध्य एशिया के लोगों का मूल धर्म बौद्ध ही है।
जम्बू द्वीप में 9 देश है:- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। पुराणों में जंबूद्वीप के 6 पर्वत बताए गए हैं- हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान। इलावृत जम्बू द्वीप के बीचोबीच स्थित है।
इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत। इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), उत्तर में रम्यक वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), हिरण्यमय वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) और उत्तर कुरुवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) नामक देश हैं।
पुराणों के अनुसार इलावृत चतुरस्र है। वर्तमान भूगोल के अनुसार पामीर प्रदेश का मान 150X150 मील है अतः चतुरस्र होने के कारण यह पामीर ही इलावृत है। इलावृत से ही ऐरल सागर, ईरान आदि क्षेत्र प्रभावित हैं।
आज के किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, मंगोलिया, तिब्बत, रशिया और चीन के कुछ हिस्से को मिलाकर इलावृत बनता है। मूलत: यह प्राचीन मंगोलिया और तिब्बत का क्षेत्र है। एक समय किर्गिस्तान और तजाकिस्तान रशिया के ही क्षेत्र हुआ करते थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद ये क्षेत्र स्वतंत्र देश बन गए।
आज यह देश मंगोलिया में अतलाई नाम से जाना जाता है। अतलाई शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में बस गया था। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।इस देश का नाम महाभारतकाल में ‘इलावृत’ ही था। जैसा कि महाभारत में लिखा है कि श्रीकृष्णजी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय प्राप्त करके ‘इलावृत’ देश में पहुंचे। इस स्थान को देवताओं का निवास-स्थान माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं से ‘इलावृत’ को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की।
इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।
सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देशों में स्थित हैं।
पहले इल : ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से चंद्रमा का जन्म हुआ। चंद्रमा से बुध का जन्म हुआ। बुध का विवाह स्वायंभुव मनु की पुत्री इल से हुआ। इल-बुध सहवास से पुरुरवा हुए। पुरुरवा के कुल में ही भरत और कुरु हुए। कुरु से कुरुवंश चला। भारत के समस्त चन्द्रवंशी क्षत्रिय पुरुरवा की ही संतति माने जाते हैं।
इतिहाकारों के अनुसार आर्यों की पहली टोली मान्व-आर्य नाम से भारत में आई। दूसरी टोलीइलावृत देश से भारत में आई। इस तरह पहली टोली के मान्व-आर्य और दूसरी टोली के ऐल-आर्य एक ही महादेश के निवासी सिद्व होते हैं, किंतु ऐल लोगों के साथ उत्तर कुरु लोगों का भी एक बड़ा भाग था। ऐल ही कुरु देश (पेशावर के आसपास का इलाका) में बसने के कारण कुरु कहलाते थे। इतिहासकारों के अनुसार ये ऐल ही पुरुरवा (पुरु) था। यूनान और यहूदियों के पुराने ग्रंथों में ऐल के पुत्रों का जिक्र मिलता है। इस ऐल के नाम पर ही इलावृत देश रखा गया।
दूसरे इल : इस देश (इलावृत) का नाम दक्ष प्रजापति की पुत्री इला के क्षत्रिय पुत्रों से आवृत होने के कारण इलावृत रखा गया। आज यह देश मंगोलिया में अतलाई नाम से जाना जाता है। अतला शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में आबाद हो गया। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।
तीसरे इल : वायु पुराण के अनुसार त्रेतायुग के प्रारंभ में ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियवृत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था। प्रियवृत के पुत्र जम्बू द्वीप के राजा अग्नीन्ध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल। राजा आग्नीध ने उन सब पुत्रों को उनके नाम से प्रसिद्ध भूखंड दिया। इलावृत को मिला हिमालय के उत्तर का भाग। नाभि को मिला दक्षिण का भाग।
चौथे इल : वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। पुराणों में वैवस्वत मनु का भी स्थान सुमेर पर्वत बताया जाता है, जो कि इलावृत के मध्य में कहा गया है। पहले पुत्र इल के नाम पर ही इलावृत रखा गया।
यूराल-पर्वत से ’यूराल’ नाम की एक नदी भी निकलती है। का अर्थ जल होने से इरालय का अर्थ नदी हो जाता है। आर्यों की योरपीय शाखा सम्भवतः यूराल-पर्वत-श्रेणी के आसपास के प्रदेशों से ही अलग हुई और उनमें से एक ने इलावर्त की स्थापना की।
इसके अनन्तर वायुपुराण में हिरण्मयवर्ष का होना बतलाया गया है। हिरण्मय के बाद श्वेत-पर्वत और उसके बाद रम्यक-वर्ष है। रम्यकवर्ष के बाद नीलपर्वत और तत्पश्चात् इलावृत है। हम एशिया के मानचित्र में इन पाञ्च स्थानों का क्रमिक निर्देश करते हुए इलावृत का निर्देशElburz (एलबर्ज़)-पर्वत से कर सकते हैं। यह एलबर्ज़ कास्पियन-सागर के उत्तर पश्चिम तक फैला हुआ है। इन पहाड़ी प्रदेशों के उत्तर काकेसस पर्वत है। काकेसस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश की भूमि, लोकमान्य तिलक के पूर्व आर्यों की आदि-भूमि मानी जाती थी। यदि एलबर्ज़ के आसपास (कास्पियन-सागर के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्व तक) आर्यों के इलावृत-देश को मान लें तो काकेसस, जो नील-सागर के उत्तर-पूर्व है, नील-पर्वत का स्थान ग्रहण कर सकता
;जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंक पुरुषं स्मृतम्,
हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।- (विष्णु पुराण)
मनुस्मृति में वर्णित दरद, खस आदि पर्वतीय जातियां हैं जो चीन, कोरिया और मंगोलिया तक फैली हुई हैं। बौद्ध धर्म का प्रचार इन देशों में खूब हुआ। चंगेज खां आकाश की पूजा करता था। मंगोलियाई मध्य एशिया में बसने के बाद इस्लाम के प्रभाव के चलते मुसलमान बन गए। मंगोल, मुघन हुआ और मुघल ही मुगल हो गया। कभी मंगोलिया मौद्गलिक था। वहां बौद्ध संगति हुई थी। मध्य एशिया के लोगों का मूल धर्म बौद्ध ही है।
जम्बू द्वीप में 9 देश है:- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। पुराणों में जंबूद्वीप के 6 पर्वत बताए गए हैं- हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान। इलावृत जम्बू द्वीप के बीचोबीच स्थित है।
इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत। इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), उत्तर में रम्यक वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), हिरण्यमय वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) और उत्तर कुरुवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) नामक देश हैं।
पुराणों के अनुसार इलावृत चतुरस्र है। वर्तमान भूगोल के अनुसार पामीर प्रदेश का मान 150X150 मील है अतः चतुरस्र होने के कारण यह पामीर ही इलावृत है। इलावृत से ही ऐरल सागर, ईरान आदि क्षेत्र प्रभावित हैं।
आज के किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, मंगोलिया, तिब्बत, रशिया और चीन के कुछ हिस्से को मिलाकर इलावृत बनता है। मूलत: यह प्राचीन मंगोलिया और तिब्बत का क्षेत्र है। एक समय किर्गिस्तान और तजाकिस्तान रशिया के ही क्षेत्र हुआ करते थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद ये क्षेत्र स्वतंत्र देश बन गए।
आज यह देश मंगोलिया में अतलाई नाम से जाना जाता है। अतलाई शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में बस गया था। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।इस देश का नाम महाभारतकाल में ‘इलावृत’ ही था। जैसा कि महाभारत में लिखा है कि श्रीकृष्णजी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय प्राप्त करके ‘इलावृत’ देश में पहुंचे। इस स्थान को देवताओं का निवास-स्थान माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं से ‘इलावृत’ को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की।
इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।
सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देशों में स्थित हैं।
पहले इल : ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से चंद्रमा का जन्म हुआ। चंद्रमा से बुध का जन्म हुआ। बुध का विवाह स्वायंभुव मनु की पुत्री इल से हुआ। इल-बुध सहवास से पुरुरवा हुए। पुरुरवा के कुल में ही भरत और कुरु हुए। कुरु से कुरुवंश चला। भारत के समस्त चन्द्रवंशी क्षत्रिय पुरुरवा की ही संतति माने जाते हैं।
इतिहाकारों के अनुसार आर्यों की पहली टोली मान्व-आर्य नाम से भारत में आई। दूसरी टोलीइलावृत देश से भारत में आई। इस तरह पहली टोली के मान्व-आर्य और दूसरी टोली के ऐल-आर्य एक ही महादेश के निवासी सिद्व होते हैं, किंतु ऐल लोगों के साथ उत्तर कुरु लोगों का भी एक बड़ा भाग था। ऐल ही कुरु देश (पेशावर के आसपास का इलाका) में बसने के कारण कुरु कहलाते थे। इतिहासकारों के अनुसार ये ऐल ही पुरुरवा (पुरु) था। यूनान और यहूदियों के पुराने ग्रंथों में ऐल के पुत्रों का जिक्र मिलता है। इस ऐल के नाम पर ही इलावृत देश रखा गया।
दूसरे इल : इस देश (इलावृत) का नाम दक्ष प्रजापति की पुत्री इला के क्षत्रिय पुत्रों से आवृत होने के कारण इलावृत रखा गया। आज यह देश मंगोलिया में अतलाई नाम से जाना जाता है। अतला शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में आबाद हो गया। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।
तीसरे इल : वायु पुराण के अनुसार त्रेतायुग के प्रारंभ में ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियवृत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था। प्रियवृत के पुत्र जम्बू द्वीप के राजा अग्नीन्ध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल। राजा आग्नीध ने उन सब पुत्रों को उनके नाम से प्रसिद्ध भूखंड दिया। इलावृत को मिला हिमालय के उत्तर का भाग। नाभि को मिला दक्षिण का भाग।
चौथे इल : वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। पुराणों में वैवस्वत मनु का भी स्थान सुमेर पर्वत बताया जाता है, जो कि इलावृत के मध्य में कहा गया है। पहले पुत्र इल के नाम पर ही इलावृत रखा गया।
यूराल-पर्वत से ’यूराल’ नाम की एक नदी भी निकलती है। का अर्थ जल होने से इरालय का अर्थ नदी हो जाता है। आर्यों की योरपीय शाखा सम्भवतः यूराल-पर्वत-श्रेणी के आसपास के प्रदेशों से ही अलग हुई और उनमें से एक ने इलावर्त की स्थापना की।
इसके अनन्तर वायुपुराण में हिरण्मयवर्ष का होना बतलाया गया है। हिरण्मय के बाद श्वेत-पर्वत और उसके बाद रम्यक-वर्ष है। रम्यकवर्ष के बाद नीलपर्वत और तत्पश्चात् इलावृत है। हम एशिया के मानचित्र में इन पाञ्च स्थानों का क्रमिक निर्देश करते हुए इलावृत का निर्देशElburz (एलबर्ज़)-पर्वत से कर सकते हैं। यह एलबर्ज़ कास्पियन-सागर के उत्तर पश्चिम तक फैला हुआ है। इन पहाड़ी प्रदेशों के उत्तर काकेसस पर्वत है। काकेसस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश की भूमि, लोकमान्य तिलक के पूर्व आर्यों की आदि-भूमि मानी जाती थी। यदि एलबर्ज़ के आसपास (कास्पियन-सागर के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्व तक) आर्यों के इलावृत-देश को मान लें तो काकेसस, जो नील-सागर के उत्तर-पूर्व है, नील-पर्वत का स्थान ग्रहण कर सकता
भारत में काल गणना की श्रेष्ठ पद्धति और नववर्ष का निर्धारण
वर्ष आरम्भ-वर्ष गणना की भारत में दो पद्धति हैं। दिनों की क्रमागत गणना के अनुसार दिन (सूर्योदय से आगामी सूर्योदय) तथा सौर मास-वर्ष की गणना को शक कहते हैं। इसमें प्रत्येक सूर्योदय में (या मध्यरात्रि, सूर्यास्त, मध्याह्न) में १ दिन बदल जाता है, अतः गणना में सुविधा होती है। १-१ की गणना कुश द्वारा होती है, हर भाषा में १ का चिह्न कुश है। उनको मिलाने से वह शक्तिशाली होता है अतः उसे शक कहते हैं।
पूजा या अन्य पर्व (सौर संक्रान्ति को छोड़ कर) चान्द्र तिथि के अनुसार होते हैं क्यों कि यह मन का कारक है-चन्द्रमा मनसो जातः (पुरुष सूक्त)। तिथि निर्णय के लिये शक दिनों के अनुसार तिथि की गणना होती है। १२ चान्द्र मास का वर्ष प्रायः ३५४ दिन का होता है, अतः ३० या ३१ मासों के बाद १ अधिक मास जोड़ते हैं, जिस मास में सूर्य की संक्रान्ति (राशि परिवर्तन नहीं होता है। यह दीर्घ काल में सौर मास वर्ष के अनुसार चलता है, या इसके अनुसार समाज चलता है, अतः इसे सम्वत्सर (सम्+ वत्+ सरति) कहते हैं।
बार्हस्पत्य संवत्सर २ प्रकार का होता है। गुरु (बृहस्पति) ग्रह १२ वर्ष में सूर्य की १ परिक्रमा करता है। मध्यम गुरु १ राशि जितने समय में पार करता है वह ३६१.०२६७२१ दिन (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १४) का गुरु वर्ष कहा जाता है। यह सौर वर्ष से ४.२३२ दिन छोटा है। अतः ८५+ ६५/२११ सौर वर्ष में ८६ + ६५/२११ बार्हस्पत्य वर्ष होते हैं। दक्षिण भारत में पैतामह सिद्धान्त के अनुसार सौर वर्ष को ही गुरु वर्ष कहा गया है। रामदीन पण्डित द्वारा संग्रहीत-बृहद्दैवज्ञरञ्जनम्, अध्याय ४-
अतः कलि आरम्भ (१७-२-३१०२ ई.पू. उज्जैन मध्य रात्रि) के समय सूर्य सिद्धान्त मत से विजय सम्वत्सर (२७ वां) चल रहा था। उसके ६ मास ११ दिन (१८८ दिन बाद, २९.५ दिन का चान्द्र मास) २५-८-३१०२ ई.पू. को जय संवत्सर आरम्भ हुआ तो परीक्षित को राज्य दे कर पाण्डव अभ्युदय के लिये हिमालय गये। इस दिन से युधिष्ठिर जयाभ्युदय शक आरम्भ हुआ। दक्षिण भारत के पितामह सिद्धान्त के अनुसार कलि आरम्भ से प्रमाथी (१३वां) संवत्सर आरम्भ हुआ। इसके १२ वर्ष पूर्व से प्रभव वर्ष का चक्र आरम्भ हुआ था। अतः मेक्सिको के मय पञ्चाङ्ग का आरम्भ १२ वर्ष पूर्व ३११४ ई.पू. से हुआ था। दोनों प्रकार के बार्हस्पत्य वर्ष चक्र ५१०० (८५x ६०) वर्ष में मिल जाते हैं अतः मय पञ्चाङ्ग ५१०० वर्ष का था।
वर्त्तमान विक्रम संवत् का आरम्भ ६ अप्रैल २०१९ को हो रहा है। इस दिन परिधावी (४६वां) सम्वत्सर है जो ७ अप्रैल २०१९ तक चलेगा। उसके बाद प्रमादी (५७ वां) संवत्सर आरम्भ होगा। अधिकांश पञ्चाङ्ग निर्माता विक्रम संवत् तथा बार्हस्पत्य संवत्सर का अन्तर भूल गये हैं तथा लिख रहे हैं कि विक्रम संवत् के साथ ही परिधावी संवत्सर भी आरम्भ हो रहा है। वाराणसी के हृषीकेश पञ्चाङ्ग ने लिखा है कि वर्ष आरम्भ में परिधावी संवत्सर है, पर कितने दिन तक रहेगा यह नहीं लिखा है। केवल पण्डित मदनमोहन पाठक (लखनऊ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के ज्योतिष विभागाध्यक्ष) के जगन्नाथ पञ्चाङ्ग में लिखा है कि इस वर्ष मेष संक्रान्ति (१४ अप्रैल, १५-०५ बजे) परिधावी के गत मास आदि ११/०७/२०/३९ दिन तथा भोग्य मास आदि ०/२२/३९/२१ हैं (कुल ३६० दिन मान कर गणना)। अतः प्रमादी संवत्सर (४७वां) ७ अप्रैल २०१९ को २०-३० बजे आरम्भ हो रहा है।
गणना की कठिनाई के कारण अधिकतर पञ्चाङ्ग पूरे वर्ष यही संवत्सर मान लेते हैं तथा सङ्कल्प में भी यही पढ़ा जाता है। प्रमादी (४७ वां) है, इसे भूल से प्रमाथी लिख देते हैं जो १३ वां है।
दक्षिण भारत के लिये विकारी (३३वां) संवत्सर है जो पूरे वर्ष रहेगा।
बार्हस्पत्य वर्ष को फल की दृष्टि से ५-५ वर्ष के १२ युगों में बांटा गया है। अन्य विभाजन है २०-२० वर्षों के ३ खण्ड-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र विंशतिका।
ब्रह्मा-१. प्रभव, २. विभव, ३ शुक्ल, ४. प्रमोद, ५. प्रजापति, ६. अङ्गिरा, ७. श्रीमुख, ८. भाव, ९. युवा, १०. धाता, ११. ईश्वर, १२. बहुधान्य, १३. प्रमाथी, १४. विक्रम, १५. वृष, १६. चित्रभानु, १७. सुभानु, १८. तारण, १९. पार्थिव, २०. व्यय।
विष्णु-२१. सर्वजित्, २२. सर्वधारी, २३. विरोही, २४. विकृत, २५. खर, २६. नन्दन, २७. विजय, २८. जय, २९. मन्मथ, ३०. दुर्मुख, ३१. हेमलम्ब, ३२. विलम्ब, ३३. विकारी, ३४. शर्वरी, ३५. प्लव, ३६. शुभकृत्, ३७. शोभन, ३८. क्रोधी, ३९. विश्वावसु, ४०. पराभव।
रुद्र-४१. प्लवङ्ग, ४२. कीलक, ४३. सौम्य, ४४. साधारण, ४५. विरोधकृत्, ४६. परिधावी, ४७. प्रमादी, ४८. आनन्द, ४९. राक्षस, ५०. नल, ५१. पिङ्गल, ५२. कालयुक्त, ५३. सिद्धार्थ, ५४. रौद्र, ५५. दुर्मति, ५६. दुन्दुभि, ५७. रुधिरोद्गारी, ५८. रक्ताक्ष, ५९. क्रोधन, ६०. क्षय।
सिद्धार्थ बुद्ध के जन्म समय (३१-३-१८८७ ई.पू.) सिद्धार्थ (५३वां) संवत्सर था। विक्रमादित्य का शासन ८२ ई.पू. आरम्भ हो गया था। पर २५ वर्ष बाद जब विक्रम संवत् आरम्भ किया, उस समय विक्रम (१४वां) संवत्सर चल रहा था।
गुरुवार, 7 मार्च 2019
केवल एक महीने में लगभग , 25 करोड़ लोगों ने एक महीने में सनातन सिद्धान्त और मान्यताओं के अनुसार चलते हुए प्रयाग में कुम्भ मेले में भाग लिया ।
केवल धर्म के विषय को हटाकर , मैं आपको कुछ डेटा प्वाइंट देता हूँ और आप समझिए की क्यों आपका देश सोने की चिड़िया था और अब आप क्यो दलिद्र बन गए हैं ।
25 करोड़ लोगों के उपर, राष्ट्रवादी सरकार ने 4200 करोड़ रूपए ख़र्च किए जिस पर कामी वामी आपियों ने हल्ला भी मचाया पर एक अनुमान के अनुसार केवल लोकल इकॉनमी 1,20,000 करोड़ रूपए जेनेरेट हुई । और यह केवल लोकल इकॉनमी का अनुमान है , अर्थात लगभग 30 गुना केवल लोकल इकॉनमी का उत्पादन । भारत को केंद्रीय स्तर पर क्या मिला यह आने वाले समय का डेटा बताएगा । फिर भी लगभग 50 गुना , सनातन ने देश को दे दिया ।
यह वह सनातन था जिसने धर्म किया , अर्थ का उत्पादन किया, यज्ञ किया , योग किया , दान दिया ( दान के स्वरूप को मैं पहले भी समझा चुका हूँ ) और मोक्ष की कामना की ।
पिछले एक महीने में सनातन के मेले कुम्भ में नगण्य अपराध हुए और अद्भुत शान्ति के साथ यह सब कुछ हुआ । यह थी सोने के चिड़िया की कथा ।
और इसी बीच , उसी एक महीने लगभग 19 करोड़ पाकिस्तानियों ने , बीस तीस आतंकवादी वारदात , 2 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ा, अनगिनत हत्या लूट बलात्कार और केवल प्रोपेगण्डा किया और उस प्रोपेगण्डा में आपके ही देश के कुछ तत्व भी उसके साथ खड़े रहे। यह है जीवन को नर्क बनाने वाली अब्राहमिक व्यवस्था ।
चूँकि यह मैं बेबोलेनिया या सुमेरु सभ्यता के बारे में नहीं बल्कि पिछले महीने की ही घटना के अनुसार बता रहा हूँ और यह सब आपके “ चित्त “ में अंकित ही है अत: आपको समझने में कोई कष्ट नहीं होना चाहिए ।
तय , आपको करना है की आप शुद्ध सनातन के मार्ग पर चलना चाहते हैं , अपने बच्चों को पुन: सोने की चिड़िया देना चाहते हैं या अब्राहमिक फेथ जो केवल आपको भिखारी बनाकर छोड़ेंगा उसके चंगुल में पड़ना चाहते हैं ।
यह एक संक्रमण काल है , और आपको और चौकन्ना हो जाना है ..
आदि शंकराचार्य ने भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में दो व्यवस्थाएं दी।
प्रथम, प्रभु का भोग रोज मिट्टी के नए पात्र में बनेगा, दूसरे, प्रभु का रथ यात्रा हर वर्ष नए रथ से होगी। ढाई हजार वर्ष पहले स्थापित इस परंपरा ने करोड़ो कुंभकार और काष्ठकार परिवार की जीविका सुरक्षित कर दी। आज भी है। दुनिया कोई कारपोरेट, हुकूमत यह कार्य ना कर सकी है और ना कर पाएगी।
यह ब्राह्मणवाद है।
बिहार कॉडर के सीनियर आईपीएस मित्र की एक पोस्ट पढ़ रहा था। जो मेरे इस विचार आरम्भ को व्यापक आधार दे रही है। हालांकि इस विषय पर कभी कोई संस्थागत शोध नहीं हुआ। पर मुझे लगता है होना चाहिए। तभी हिन्दू समाज,गिरोहबंद लंपटों का मुंहतोड़ जवाब दे पाएगा। नैतिक अपराधबोध से मुक्त हो सकेगा।
अब पढ़िए मित्र अरविंद जी की पोस्ट..और देखिए, समझिए अपने आसपास के समाज को। सत्य आपके सामने बिखरा हुआ है।
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#ब्राह्मण_प्रदत्त अर्थव्यवस्था : त्योहार और GDP :
... देश भर में वर्ष पर्यन्त ब्राह्मणों द्वारा प्रवर्तित 60 महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं... इन त्योहारों में लगभग 10 लाख करोड़ का व्यापार पूरे देश में होता है और वर्ष पर्यन्त इन त्योहारों की अर्थव्यवस्था से लगभग 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है...
.... इसीतरह देश में छोटे बड़े मिलाकर कुल 5 लाख हिंदू मंदिर हैं जिनमें प्रत्येक मन्दिर से औसतन 1000 परिवारों का व्यवसाय चलता है और भरण पोषण होता है...!
..... इन त्योहारों और मंदिरों से जुड़े व्यवसायों से 90% लाभ कमज़ोर वर्गों के लोगों को ही मिलता है....
...... ब्राह्मण प्रणीत धर्म समाप्त हो जाय तो इन 25 करोड़ लोगों का भरण पोषण नेता और अधिकारी करेंगे क्या ??
.. शौचालय बनाइए मगर “देवालय से पहले शौचालय” जैसी विकास विरोधी बातें दिमाग़ से निकाल दीजिए !!
....... इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाने वाले और समाज के कमज़ोर वर्गों को वर्ष पर्यन्त रोज़गार दिलाने वाले #ब्रह्मवाद को प्रणाम करना भी सीखिए !!
... एते ब्रह्मवादिन: वदंति !!
आपने फेसबुक पर बहुत सुना होगा पंडे-पुरोहित समाज को लूट रहे हैं ,इनका बहिष्कार करो आदि आदि । आइये जानते हैं पंडे-पुरोहित सदियों से क्या करते आये हैं । किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होता है अर्थ और पुरोहित इसी अर्थ को मजबूती प्रदान करते आये हैं ,आप कह सकते हैं पुरोहित एक तरह मार्केटिंग का कार्य करते हैं । सत्यनारायण की कथा हो या नूतनगृहप्रतिष्ठा हो अथवा विवाहादि मांगलिक संस्कार पुरोहित आपके अर्थ को मजबूती प्रदान करने का कार्य करते हैं । भगवान् सत्यनारायण की कथाका उद्देश्य आत्मरंजन करना है ,इससे हम भगवान् की भक्ति तो करते ही हैं ,साथ ही अर्थ को मजबूती भी प्रदान करते हैं। एक पुरोहित से जब सत्यनारायण की कथा कराते हैं ,तब वे जो सामग्री की सूची देते हैं ,उस पर कभी ध्यान दिया आपने ? सबसे पहले नवीन मिट्टी के कलश लेकर आओ ,उसके ढँकने के लिये मिट्ठी का पात्र लेकर आओ । सत्यनारायण की कथा में ऐसे पांच कलशों की स्थापना होती है - "पञ्चभि: कलशैर्जुष्टं कदलीतोरणान्वितम् ।" (भविष्यपुराण ) जब ये नवीन कलश खरीदे जाएँगे तब किसका लाभ होगा ? कुम्भकार का । तो पुरोहित ने किसके अर्थ की मार्केटिंग की ? अब पुरोहितजी कह काष्ठ की चौकी लेकर आओ । किसका अर्थ लाभ होगा उससे ? काष्ठकरको । तो किसकी मार्केटिंग की पुरोहित ने ?
पुरोहित कहते हैं चौकी पर बिछाने के लिये पीला वस्त्र मँगाते हैं । किसको वृत्ति का लाभ होगा ? जुलाहे या बुनकर का । अग्निहोत्र करने के लिये ब्राह्मणोंके लिये सबसे पवित्र अन्न क्या है ? दान में प्राप्त अन्न इतना पवित्र नहीं है ,शिलोच्छवृत्ति (फसल कट जाने पर खेत से अनाज चुनकर लाना ) का अन्न ही अति पवित्र है ,फिर भण्डारगृह (अनाज मंडी) आदि का अन्न अग्निहोत्रके लिये पवित्र कैसे हो सकता है ? इसीलिये भगवत् आराधनके लिये वस्त्र भी बुनकरके यहाँ से लाया हुआ पवित्र है ,न कि किसी बजाज के यहाँ लाया हुआ । पीले वस्त्र से पुरोहित ने किसकी वृत्ति की मार्केटिंग की ? पुरोहितजी भगवान् शालग्रामके अभिषेक के लिये पंचामृत के लिये दूध ,दही ,मधु आदि मँगाते हैं । दूध से किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ? गोपालकों को । मधु आजकल की तरह चासनी वाला तो पूजा में प्रयोग होता नहीं है ,तो मधु निकालने वाले से मधु मंगाया जाता है ,तब किसको वृत्ति का लाभ हुआ ? पुरोहित ने किसकी वृत्तिकी मार्केटिंग की ? पुरोहितजी भगवान् सत्यनारायण के लिये कच्चा सूत और मोली मंगाते हैं । इससे किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ?सूतकातने वाले का । पुष्प और मालाओं को मंगाकर किसके वृत्ति की व्यवस्था की पुरोहित ने ? माली की । धूप-दीप से अर्चन कर पुरोहित जी नैवेद्य मंगाते हैं । उससे किसको लाभ हुआ ? हलवाई को । सत्यनारायण भगवान् को ताम्बूल निवेदन कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? पान बेचने वाले की । ऋतुफल समर्पित कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? फलों वाले की । षोडशोपचार के बाद हवन करते हैं ,हवन के लिये समिधा (आम आदि की लकड़ी) मंगाते हैं ,किसको लाभ होता है उससे ? लक्कड़हारे को । सत्यनारायण की कथा में एक भील जातिके लक्कड़हारे का चरित्र सुनाया जाता है ,जो काशी में शतानन्द नामके ब्राह्मण जो कि सत्यनारायणकी कथा कर रहे होते हैं ,के घर अपनी लकड़ी बेचने जाता है - "वनात्काष्ठानि विक्रेतुं पुरीं काशीं ययु: क्वचित् ।
एकस्तृषाकुलो यातो विष्णुदासाश्रमं तदा ।।"(भविष्यपुराण ) सारी लकड़ी बिक जाने पर वह भिल्ल लक्कड़हारा भी भगवान् सत्यनारायण की कथा करवाता है । तो हवन की लकड़ी से किसकी वृत्ति की मार्केटिंग हुई ?
अब बताइये सत्यनारायण भगवान् की छोटी सी पूजा से कितनों की वृत्ति की मार्केटिंग की पुरोहित ने ? क्या पुरोहित इन सबसे कमीशन लेते हैं ? ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्क बिना कमीशन के लिये सबकी वृत्ति की व्यवस्था करते हैं । यही नहीं जो ब्राह्मण पुरोहित धनके लालच में कर्मकाण्ड का आश्रय लेते हैं ,उनके अन्न को तो शास्त्र ने अपवित्र घोषित कर ही दिया है साथ में ऐसे पुरोहितों को श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन के भी अयोग्य ठहरा दिया है । चारों वर्णों की वृत्ति की व्यवस्था करने वाले ब्राह्मण पुरोहितका पालन यथासामर्थ्य दान-दक्षिणा देकर करना चाहिये । यज्ञ-पूजापाठके मण्डप स्थल पर गोबरसे लीपकर चौक बनाने और सर्वसमाज को यज्ञ-पूजापाठ में बुलावा देने की वृत्ति नापित पुरोहित कराते हैं । तुलादानके द्वारा चांडाल की वृत्ति पुरोहित कराता है । बच्चे के जन्मके समय मूल उतारने की वृत्ति ,तेल दान की वृत्ति भड्डरी को पुरोहित कराता है । यह सब सङ्केत मात्र हैं ,यह व्यवस्था बहुत विस्तृत है ,जिसका एक लेख में लिख पाना सम्भव ही नहीं । वर्णाश्रम व्यवस्था में कोई किसी की वृत्ति का हरण नहीं करता है ,अपितु सभी वर्ण एक दूसरे का भरण-पोषण करते हैं ,जिससे सभी की वृत्ति निर्धारित होती है ,समाज को वृत्ति लाभ होने पर राष्ट्रकी अर्थव्यवस्था सुदृढ होती है । अर्थव्यवस्था सुदृढ होने पर धर्म की रीढ़ सुदृढ होती है ।
जब किसी राष्ट्र को दासिता की जंजीरों में जकड़ना हो ,तो उसकी रीढ़ अर्थव्यवस्था को मिटा दे ,अर्थव्यवस्था मिटती है उस राष्ट्र की संस्कृति और परम्परा से जिससे समाज का भरण-पोषण सहस्राब्दियों से होता आया हो । अँग्रेजों ने भी यही किया ,भारत पर राज्य करने के लिये भारत की रीढ़ भारतकी अर्थव्यवस्था पर प्रहार किया ,अर्थव्यवस्था पर प्रहार करने के लिये संस्कृति को मिटाना आवश्यक था । भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति के मूल पुरोहितों को मिटाना आवश्यक था । तो अँग्रेजों ने पुरोहितों के प्रति समाज के मन में घृणा भर दी ,जिससे पुरोहित नष्ट हुए । फिर समाज के अन्य वर्गों की वृत्ति नष्ट की ,जो हस्तशिल्पी-कारीगर थे ,उनको नष्ट करके । हस्तशिल्पियों को उन्हें नष्ट किया आधुनिक मसीनों के द्वारा । पुरोहितों के नष्ट होने से अर्थ व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया ,सबकी वृत्ति की मार्केटिंग बन्द हुई ,फिर सबकी वृत्ति के साधन भी छीन लिये गये । परिणाम स्वरूप भारतमें आर्थिक विपन्नताका संकट उत्पन्न हो गया । आज युवा बेरोजगार क्यों है ? क्योंकि जो वृत्ति सभी वर्गों को हमारी संस्कृति में नैसर्गिक प्राप्त थी ,वह विदेशी षड्यन्तकारियों ने नष्ट करके एक दूसरे वर्ग के प्रति ऐसी घृणा भरी की उसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है । हस्तशिल्पी-कारीगरों को नष्ट कर बड़े-बड़े यन्त्रों वाले कारखानों को जन्म दिया गया ,जिससे अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से चरमरा गई ,अब भी उन्ही उद्योगों की मार्केटिक बड़े बड़े क्रिकेटरों-अभिनेताओं के द्वारा होती है ,जिसके लिये वे करोड़ो-अरबों कम्पनियों से बसूलते हैं । हस्तशिल्पियों - कारीगरों के द्वारा निर्मित उत्पादनों की यही मार्केटिंग ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्कके करते थे ,तब उन पुरोहितों को अत्याचारी ,लुटेरे पंडे-पुरोहित बनाकर समाजमें उनके प्रति घृणा भर दी गयी । उत्पादन आज भी है ,मार्केटिंग आज भी है ,लेकिन आज अर्थव्यवस्था भी कमजोर है और ज्यादातर समाज वृत्तिविहीन बेरोजगार हैं । सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है आज भी स्वयं को धार्मिक हिन्दू कहने वाले कोई सत्यनारायण की कथा को पाखण्ड के नामपर तो कोई शोषणके नाम पर अर्थ व्यवस्था आधार ,सबकी वृत्तिकी मार्केटिंग करने वाले ब्राह्मण पुरोहितों का दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं । भारतकी रीढ़ अर्थ व्यवस्था पर प्रहार करने वाले ,भारत को विपन्नता की युवाओं को वित्तिविहीनता की भीषण चपेट में लाने वालों में आपका भी योगदान होगा । मिटा दीजिए पंडे-पुरिहितों को ,शतप्रतिशत रोजगारी का प्रकल्प कहाँ से लाएँगे ?
एक तरफ पुरोहित भगवान् की कथाके माध्यम से समाज के आत्मरंजन में लगे थे ,तो वहीं दूसरी तरफ वे सबकी वृत्ति की व्यवस्था करके अर्थ को मजबूत बना रहे थे । आज पुरोहितों को नष्ट करके आत्मरंजन को भूल मनोरंजन के नाम पर सिनेमा जगत् को करोड़ो-अरबों रुपये का व्यापार कराते हैं ,फिर बेरोजगारी नहीं मिटा सकते हैं ,लेकिन गाली पंडे-पुरोहितों को देंगे। आश्चर्य है ।
बुधवार, 13 फ़रवरी 2019
वामी कामी जिहादी ईसाई सेकुलर दोगले एजेंटों को यह जरूर देखना चाहिए कि ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति। लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 का लेख
#सामाजिक_न्याय_की_ढोल_में_पोल: पार्ट 1
"The Beautiful Tree" में धरमपाल जी ने ब्रिटेन की संसद ( House of Common Papers) तथा इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन के हवाले से लिखा :
●भारत में कलेक्टर्स के द्वारा प्रेषित रिपोर्टस् का अध्ययन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस मुनरो ने निर्णीत किया कि स्कूलों और प्राइवेट ट्यूटर्स के यहां शिंक्षा पाने वाले 5 से 10 साल के लड़कों का प्रतिशत लगभंग एक चौथाई से एक तिहाई के बीच है अर्थात 25 से 35% के बीच।
● वर्ण क्रम ( लेखक ने कास्ट वाइज लिखा है) में स्कूल में शिंक्षा प्राप्त करने वालो में बालको की तुलना में बालिकाओं की संख्या बहुत कम है।
● ऐसा माना जाता है कि प्राचीन भारत से लेकर ब्रिटिश पीरियड के शुरुवात तक शिक्षा सिर्फ तथाकथित द्विजो को ही उपलब्ध थी। ( मद्रास प्रेसीडेंसी में उस समय 95% आबादी हिंदुओ की थी)
लेकिन टेबल 2 में 1822-25 के उपलब्ध डेटा के अनुसार स्थिति प्रायः इसके बिल्कुल विपरीत थी। यह विपरीत स्थिति तमिल भाषी क्षेत्रो में अधिक प्रगल्भता के साथ दिखाई देता है जहां शिंक्षा ग्रहण करने वाले तथाकथित द्विजो की संख्या साउथ Arcot में 13%, मद्रास में लगभंग 23%, मुसलमानों का प्रतिशत साउथ arcot में 3% और सलेम में 10% है वहीं शिंक्षा ग्रहण करने वाले शूद्रों तथा अन्य जातियों का प्रतिशत सलेम और टिनवेली में 70% और साउथ Arcot में 84℅ है।
● टेबल 3 में इसको और स्पष्ट किया गया है।
★ मलयालम भाषी मालाबार में द्विज छात्रों का प्रतिशत 20% है क्योंकि यहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 27% है। जबकि शूद्र छात्रों की संख्या 54% है।
★ कन्नड़ भाषी बेल्लारी में द्विज छात्रों की संख्या 33% और शूद्र छात्रों की संख्या 63% है।
★इसी तरह उड़िया भाषी गंजम में द्विज छात्रों की संख्या 35% और शूद्र छात्रों की संख्या 63.5% है।
ये तो थी ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति।
लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 में अपनी पुस्तक "The Case For India" में लिखा:
● जब ब्रिटिश भारत आये तो सम्पूर्ण भारत मे सामुदायिक स्कूल थे, जो ग्रामीण समुदायों द्वारा चलाये जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन ग्रामीण समुदायों को विनष्ट करके उंनको स्कूलों से विस्थापित किया। जिनमे मात्र 7% लड़को और 1.5 लड़कियां शिंक्षा पाती हैं, अर्थात् कुल मिलाकर मात्र 4℅।
● 1911 में गोखले जी ने भारत मे सबको शिक्षित करने हेतु यूनिवर्सल कंपल्सरी एजुकेशन बिल प्रस्तावित किया जिसको ब्रिटिश द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया। 1916 में पटेल ने भी वैसा ही बिल प्रस्तावित किया, जिसको ब्रिटिश निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया।
( P - 44 - 46)
● 1917 में डिप्रेस्ड क्लास के लिये ब्रिटिश शिंक्षा का प्रस्ताव लाते हैं।
( आगे की कहानी अन्य पोस्टों में लिखी हुई है)
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मात्र 100 साल पहले ब्राम्हणो द्वारा चलाये जा रहे गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या इतनी अधिक थी तो 100 साल में ऐसा क्या हुवा कि एक डिप्रेससेड क्लास उतपन्न हो गया?
जिसको बाबा साइमन कमीशन से मिलकर अछूत होने का सर्टिफिकेट देंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजते ही सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों को ही श्मशान का मुंह देखना पड़ेगा।
पड़ेगा कि नहीं?
तो भैया चलती हुई दुकान बंद करवाने को कौन तैयार है ?
#सामाजिक_न्याय वाले या #सामाजिक_समरसता वाले?
मेरे प्रश्न का उत्तर कौन देगा?
वे तीन हजार साल का हल्ला मचा रहे है कितने वर्षों से। भारत की सरकार ने 1000 साल का एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दिया है।
मैं 200 से कम समय का समयकाल प्रमाण के साथ दे रहा हूँ।
लेकिन कारण तो बताओ कि क्या वही कारण है इनके अछूत पने का जो तुमको तुम्हारा ही नाश करने वालो ने बताया है ?
#सामाजिक_न्याय_और_समरसता की पोल खोल: पार्ट 2
यह पुस्तक प्रथम बार 1971 में छपी थी।
50 वर्ष हो गए इसको छपे हुए।
लेकिन यह भारत के किसी भी विद्यालय के पुस्तकालय में नही उपलब्ध होगी।
यदि इस पुस्तक को पढ़कर ही यदि इतिहास का आकलन किया जाय तो #सामाजिक_न्याय और सामाजिक समरसता का सारा खेल नष्ट हो जाय।
इसी पुस्तक के छपने के आस पास ईसाई एजेंटो ने एक फैंटेसी के आधार पर लेखन शुरू किया जिसको सबाल्टर्न लेखन कहते हैं। इन एजेंटो को पूरे विश्व मे सम्मानीति किया जाता है। क्यों ?
जिससे भारत के विरुद्ध अंदुरुनी सॉफ्ट पावर तैयार किया जा सके।
धरमपाल जी ने यह सिद्ध किया है कि 1800 के पूर्व ब्रिटेन में आम किसान मजदूर और शिल्पी के बच्चे को शिक्षा उपलब्ध नही थी। शिंक्षा मात्र एलीट क्लास को उपलब्ध थी।
फिर भारत की गुरुकुल प्रणाली को चुराकर उन्होंने अपने आमजन को शिक्षित करना शुरू किया जिसका नाम मोनीटोरिअल या एंड्रू बेल लंकास्टर सिस्टम का नाम दिया गया। धरमपाल जी ने बताया कि 1792 में ब्रिटेन में स्कूल जाने वालों की संख्या 40,000 थी जो 1818 में बढ़कर 6,74,883 और 1851 में 21,44,377 हो गयी।
इनमें भी स्कूल अटेंड करने का एवरेज समय काल 1835 मे एक घण्टा और 1851 में दो घण्टा था।
धरमपाल जी ने उस झूंठ का भी पर्दाफाश किय्या है जो ईसाइयो और वामपंथियों ने फैलाया है कि शूद्रों को 3000 साल से शिंक्षा से वंचित रखा गया था।
1820 से 1835 तक भारत मे स्कूलों और छात्रों के बारे में एकत्रित आंकड़ों के द्वारा धरमपाल जी ने यह प्रमाणित किया है कि भारत के लगभंग हर गाँव मे एक या एक से अधिक स्कूल थे। जिनमें पढ़ने वाले शूद्र छात्रों की संख्या अन्य वर्ण के छात्रों की संख्या से बहुत अधिक थी। और यह बात सम्पूर्ण भारत मे सर्वत्र एक समान रूप से लागू होती है।
ज्ञातव्य है कि मैकाले के पूर्व शिंक्षा व्यवस्था ब्राम्हणो के हाँथ में थी और वे वेतन भोगी शिक्षक नही थे। पढ़ने वाले छात्र यथाशक्ति जो भी गुरु सेवा में अर्पित करते थे वही उनके जीवन यापन का साधन था।
( पुस्तक के इंट्रोडक्शन से उद्धरित)
अब इस बात का विश्लेषण होना चाहिये कि यदि ऐसा था तो आने वाले दिनों में ऐसा क्या हुवा जिसके कारण 2 से 3 करोड़ लोग 1850 और 1900 के बीच मे मौत के मुहं में समा गये। या उनकी सोच समझ कर हत्या कर दी गयी। और बंचे हुए लोगों में से करोड़ो लोग उस स्थिति में रहने को बाध्य हुए जिनको अछूत ठहराया गया। यहां तक कि वह आज भी संविधान में अछूत घोसित होने के कारण स्वयं को अछूत ही समझते है ?
इसका जिम्मेदार कौन था?
क्या वेद शास्त्र पुराण या दस्यु ईसाइयो की लूटनीति फूटनीति और कूटनीति ?
इस पर राजनैतिक पार्टियां क्या बहस करने को तैयार हैं?
क्या आप बहस करने को तैयार हैं?
इंटरनेट युग मे सूचनाओं का प्रसारण ही सत्य की खोज है।
इसको कॉपी पेस्ट करके हर आदमी तक यह सच पहुंचाइये।
पुस्तक की पीडीएफ लिंक।
http://bit.ly/1RxnrsC
PDF direct download linkत
#सामाजिक_न्याय_के_ढोल_में_पोल: पार्ट 3
आधुनिक इतिहासकार और संविधान सामाजिक न्याय का आधार 3000 साल से शूद्रों पर सवर्णो द्वारा किये गए अत्याचार के झूंठ को एक सच की तरह प्रसारित करता आया है। विशेष तौर पर उंनको शिंक्षा न देने को वह इसका सबसे बड़ा कारण मानता है। Dr. UditRaj NewDelhi जैसे लोग कहते हैं कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नही है वरन यह सामाजिक न्याय का मसला है जो कि हजारों वर्ष से किये गए शोषण के कारण दिया जा रहा है।
लेकिन प्रामाणिक इतिहास बताते हैं कि यह झूंठ कुसूचनाओं को आधार बना कर रचा गया है।
धरमपाल जी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1820 से 1830 के बीच एकत्रित किये डेटा के अनुसार मैकाले शिंक्षा के पूर्व जब शिंक्षा मुख्यत: ब्राम्हणो के हाँथ में थी तो शिंक्षा पाने वाले छात्रों में शूद्रों का नंबर ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्यों से अधिक थी।
उन्होंने अपनी पुस्तक "The Beautiful Tree" में ब्रिटिश कलेक्टर के द्वारा मालाबार के डेटा का विश्लेषण करते हुए लिखा :
" एस्ट्रोनॉमी पढ़ने वाले 808 छात्रों में ब्रामहण मात्र 78 छात्र थे। मेडिसिन पढ़ने वाले 194 छात्रों में ब्रामहण छात्र मात्र 31 थे। राजमुंदरी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में 5 छात्र शूद्र वर्ण के थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वे के अनुसार मेडिसिन और सर्जरी की प्रक्टिस करने वाले लोगों में कई जातियों के लोग थे। ब्रिटिश डॉक्टरों के अनुसार उन सबमे सबसे अच्छे सर्जन नाई ( बार्बर) थे।
मालाबार में ही प्राइवेट ट्यूटर्स के द्वारा दी जा रही उच्च शिक्षा में एस्ट्रोनॉमी की शिक्षा पाने वाले कुल 496 छात्र थे, जिनमे 78 ब्राम्हण वर्ण से थे और 195 छात्र शूद्र वर्ण से थे। उसी तरह मेडिकल साइंस की शिक्षा पाने वाले कुल 100 छात्र थे जिसमें 31 छात्र ब्राम्हण वर्ण से थे और 59 छात्र शूद्र वर्ण से थे।"
( प्रमाण भी है तथ्यात्मक)
यह डॉक्यूमेंट इस बात का प्रमाण है कि भारत का समाजशास्त्र और इतिहास झूंठ का पुलिंदा मात्र है।
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यदि यह एक सच्चाई है तो आने वाले 100 वर्षो में क्या हुवा कि 1850 से 1900 के बीच 2 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं। और करोड़ों लोग अछूत की भांति जीने को बाध्य हो गए?
जब पेट की आग न बुझ सके तो शिंक्षा को कौन खोजेगा?
इन प्रश्नों के उत्तर कौन देगा?
साभार
Tribhuwan Singh संकलन अजय कर्मयोगी
"The Beautiful Tree" में धरमपाल जी ने ब्रिटेन की संसद ( House of Common Papers) तथा इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन के हवाले से लिखा :
●भारत में कलेक्टर्स के द्वारा प्रेषित रिपोर्टस् का अध्ययन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस मुनरो ने निर्णीत किया कि स्कूलों और प्राइवेट ट्यूटर्स के यहां शिंक्षा पाने वाले 5 से 10 साल के लड़कों का प्रतिशत लगभंग एक चौथाई से एक तिहाई के बीच है अर्थात 25 से 35% के बीच।
● वर्ण क्रम ( लेखक ने कास्ट वाइज लिखा है) में स्कूल में शिंक्षा प्राप्त करने वालो में बालको की तुलना में बालिकाओं की संख्या बहुत कम है।
● ऐसा माना जाता है कि प्राचीन भारत से लेकर ब्रिटिश पीरियड के शुरुवात तक शिक्षा सिर्फ तथाकथित द्विजो को ही उपलब्ध थी। ( मद्रास प्रेसीडेंसी में उस समय 95% आबादी हिंदुओ की थी)
लेकिन टेबल 2 में 1822-25 के उपलब्ध डेटा के अनुसार स्थिति प्रायः इसके बिल्कुल विपरीत थी। यह विपरीत स्थिति तमिल भाषी क्षेत्रो में अधिक प्रगल्भता के साथ दिखाई देता है जहां शिंक्षा ग्रहण करने वाले तथाकथित द्विजो की संख्या साउथ Arcot में 13%, मद्रास में लगभंग 23%, मुसलमानों का प्रतिशत साउथ arcot में 3% और सलेम में 10% है वहीं शिंक्षा ग्रहण करने वाले शूद्रों तथा अन्य जातियों का प्रतिशत सलेम और टिनवेली में 70% और साउथ Arcot में 84℅ है।
● टेबल 3 में इसको और स्पष्ट किया गया है।
★ मलयालम भाषी मालाबार में द्विज छात्रों का प्रतिशत 20% है क्योंकि यहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 27% है। जबकि शूद्र छात्रों की संख्या 54% है।
★ कन्नड़ भाषी बेल्लारी में द्विज छात्रों की संख्या 33% और शूद्र छात्रों की संख्या 63% है।
★इसी तरह उड़िया भाषी गंजम में द्विज छात्रों की संख्या 35% और शूद्र छात्रों की संख्या 63.5% है।
ये तो थी ब्रिटिश एजुकेशन के लागू होने के पूर्व की स्थिति।
लगभग 100 साल बाद विल दुरान्त ने 1930 में अपनी पुस्तक "The Case For India" में लिखा:
● जब ब्रिटिश भारत आये तो सम्पूर्ण भारत मे सामुदायिक स्कूल थे, जो ग्रामीण समुदायों द्वारा चलाये जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन ग्रामीण समुदायों को विनष्ट करके उंनको स्कूलों से विस्थापित किया। जिनमे मात्र 7% लड़को और 1.5 लड़कियां शिंक्षा पाती हैं, अर्थात् कुल मिलाकर मात्र 4℅।
● 1911 में गोखले जी ने भारत मे सबको शिक्षित करने हेतु यूनिवर्सल कंपल्सरी एजुकेशन बिल प्रस्तावित किया जिसको ब्रिटिश द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया। 1916 में पटेल ने भी वैसा ही बिल प्रस्तावित किया, जिसको ब्रिटिश निर्वाचित सदस्यों ने खारिज कर दिया।
( P - 44 - 46)
● 1917 में डिप्रेस्ड क्लास के लिये ब्रिटिश शिंक्षा का प्रस्ताव लाते हैं।
( आगे की कहानी अन्य पोस्टों में लिखी हुई है)
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मात्र 100 साल पहले ब्राम्हणो द्वारा चलाये जा रहे गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या इतनी अधिक थी तो 100 साल में ऐसा क्या हुवा कि एक डिप्रेससेड क्लास उतपन्न हो गया?
जिसको बाबा साइमन कमीशन से मिलकर अछूत होने का सर्टिफिकेट देंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजते ही सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों को ही श्मशान का मुंह देखना पड़ेगा।
पड़ेगा कि नहीं?
तो भैया चलती हुई दुकान बंद करवाने को कौन तैयार है ?
#सामाजिक_न्याय वाले या #सामाजिक_समरसता वाले?
मेरे प्रश्न का उत्तर कौन देगा?
वे तीन हजार साल का हल्ला मचा रहे है कितने वर्षों से। भारत की सरकार ने 1000 साल का एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दिया है।
मैं 200 से कम समय का समयकाल प्रमाण के साथ दे रहा हूँ।
लेकिन कारण तो बताओ कि क्या वही कारण है इनके अछूत पने का जो तुमको तुम्हारा ही नाश करने वालो ने बताया है ?
#सामाजिक_न्याय_और_समरसता की पोल खोल: पार्ट 2
यह पुस्तक प्रथम बार 1971 में छपी थी।
50 वर्ष हो गए इसको छपे हुए।
लेकिन यह भारत के किसी भी विद्यालय के पुस्तकालय में नही उपलब्ध होगी।
यदि इस पुस्तक को पढ़कर ही यदि इतिहास का आकलन किया जाय तो #सामाजिक_न्याय और सामाजिक समरसता का सारा खेल नष्ट हो जाय।
इसी पुस्तक के छपने के आस पास ईसाई एजेंटो ने एक फैंटेसी के आधार पर लेखन शुरू किया जिसको सबाल्टर्न लेखन कहते हैं। इन एजेंटो को पूरे विश्व मे सम्मानीति किया जाता है। क्यों ?
जिससे भारत के विरुद्ध अंदुरुनी सॉफ्ट पावर तैयार किया जा सके।
धरमपाल जी ने यह सिद्ध किया है कि 1800 के पूर्व ब्रिटेन में आम किसान मजदूर और शिल्पी के बच्चे को शिक्षा उपलब्ध नही थी। शिंक्षा मात्र एलीट क्लास को उपलब्ध थी।
फिर भारत की गुरुकुल प्रणाली को चुराकर उन्होंने अपने आमजन को शिक्षित करना शुरू किया जिसका नाम मोनीटोरिअल या एंड्रू बेल लंकास्टर सिस्टम का नाम दिया गया। धरमपाल जी ने बताया कि 1792 में ब्रिटेन में स्कूल जाने वालों की संख्या 40,000 थी जो 1818 में बढ़कर 6,74,883 और 1851 में 21,44,377 हो गयी।
इनमें भी स्कूल अटेंड करने का एवरेज समय काल 1835 मे एक घण्टा और 1851 में दो घण्टा था।
धरमपाल जी ने उस झूंठ का भी पर्दाफाश किय्या है जो ईसाइयो और वामपंथियों ने फैलाया है कि शूद्रों को 3000 साल से शिंक्षा से वंचित रखा गया था।
1820 से 1835 तक भारत मे स्कूलों और छात्रों के बारे में एकत्रित आंकड़ों के द्वारा धरमपाल जी ने यह प्रमाणित किया है कि भारत के लगभंग हर गाँव मे एक या एक से अधिक स्कूल थे। जिनमें पढ़ने वाले शूद्र छात्रों की संख्या अन्य वर्ण के छात्रों की संख्या से बहुत अधिक थी। और यह बात सम्पूर्ण भारत मे सर्वत्र एक समान रूप से लागू होती है।
ज्ञातव्य है कि मैकाले के पूर्व शिंक्षा व्यवस्था ब्राम्हणो के हाँथ में थी और वे वेतन भोगी शिक्षक नही थे। पढ़ने वाले छात्र यथाशक्ति जो भी गुरु सेवा में अर्पित करते थे वही उनके जीवन यापन का साधन था।
( पुस्तक के इंट्रोडक्शन से उद्धरित)
अब इस बात का विश्लेषण होना चाहिये कि यदि ऐसा था तो आने वाले दिनों में ऐसा क्या हुवा जिसके कारण 2 से 3 करोड़ लोग 1850 और 1900 के बीच मे मौत के मुहं में समा गये। या उनकी सोच समझ कर हत्या कर दी गयी। और बंचे हुए लोगों में से करोड़ो लोग उस स्थिति में रहने को बाध्य हुए जिनको अछूत ठहराया गया। यहां तक कि वह आज भी संविधान में अछूत घोसित होने के कारण स्वयं को अछूत ही समझते है ?
इसका जिम्मेदार कौन था?
क्या वेद शास्त्र पुराण या दस्यु ईसाइयो की लूटनीति फूटनीति और कूटनीति ?
इस पर राजनैतिक पार्टियां क्या बहस करने को तैयार हैं?
क्या आप बहस करने को तैयार हैं?
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#सामाजिक_न्याय_के_ढोल_में_पोल: पार्ट 3
आधुनिक इतिहासकार और संविधान सामाजिक न्याय का आधार 3000 साल से शूद्रों पर सवर्णो द्वारा किये गए अत्याचार के झूंठ को एक सच की तरह प्रसारित करता आया है। विशेष तौर पर उंनको शिंक्षा न देने को वह इसका सबसे बड़ा कारण मानता है। Dr. UditRaj NewDelhi जैसे लोग कहते हैं कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नही है वरन यह सामाजिक न्याय का मसला है जो कि हजारों वर्ष से किये गए शोषण के कारण दिया जा रहा है।
लेकिन प्रामाणिक इतिहास बताते हैं कि यह झूंठ कुसूचनाओं को आधार बना कर रचा गया है।
धरमपाल जी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1820 से 1830 के बीच एकत्रित किये डेटा के अनुसार मैकाले शिंक्षा के पूर्व जब शिंक्षा मुख्यत: ब्राम्हणो के हाँथ में थी तो शिंक्षा पाने वाले छात्रों में शूद्रों का नंबर ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्यों से अधिक थी।
उन्होंने अपनी पुस्तक "The Beautiful Tree" में ब्रिटिश कलेक्टर के द्वारा मालाबार के डेटा का विश्लेषण करते हुए लिखा :
" एस्ट्रोनॉमी पढ़ने वाले 808 छात्रों में ब्रामहण मात्र 78 छात्र थे। मेडिसिन पढ़ने वाले 194 छात्रों में ब्रामहण छात्र मात्र 31 थे। राजमुंदरी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों में 5 छात्र शूद्र वर्ण के थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वे के अनुसार मेडिसिन और सर्जरी की प्रक्टिस करने वाले लोगों में कई जातियों के लोग थे। ब्रिटिश डॉक्टरों के अनुसार उन सबमे सबसे अच्छे सर्जन नाई ( बार्बर) थे।
मालाबार में ही प्राइवेट ट्यूटर्स के द्वारा दी जा रही उच्च शिक्षा में एस्ट्रोनॉमी की शिक्षा पाने वाले कुल 496 छात्र थे, जिनमे 78 ब्राम्हण वर्ण से थे और 195 छात्र शूद्र वर्ण से थे। उसी तरह मेडिकल साइंस की शिक्षा पाने वाले कुल 100 छात्र थे जिसमें 31 छात्र ब्राम्हण वर्ण से थे और 59 छात्र शूद्र वर्ण से थे।"
( प्रमाण भी है तथ्यात्मक)
यह डॉक्यूमेंट इस बात का प्रमाण है कि भारत का समाजशास्त्र और इतिहास झूंठ का पुलिंदा मात्र है।
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यदि यह एक सच्चाई है तो आने वाले 100 वर्षो में क्या हुवा कि 1850 से 1900 के बीच 2 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं। और करोड़ों लोग अछूत की भांति जीने को बाध्य हो गए?
जब पेट की आग न बुझ सके तो शिंक्षा को कौन खोजेगा?
इन प्रश्नों के उत्तर कौन देगा?
साभार
Tribhuwan Singh संकलन अजय कर्मयोगी
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