कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... सुर-असुर व देवासुर संग्राम वेद और महाभारत के अनुसार आदिकाल में पृथ्वी पर - देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि प्रमुख जातियां थीं । देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। ऋषि कश्यप की विभिन्न पत्नियों -- देवताओं की अदिति से, दैत्यों की दिति से, दानवों की दनु से, राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह अन्य पत्नियों से यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। सृष्टि के विकास की नींव में ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने कुल का विस्तार किया था| ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र ऋषि कश्यप जिन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है, इनकी माता का नाम 'कला' था जो कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी पुराणों अनुसार सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर स्थित था जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा कि तपस्या में लीन रहते थे | कश्यप सागर ..केस्पियन सी.... कश्यप मेरु प्रदेश .. कश्मीर प्रदेश उन्हीं के नाम पर कहे जाते हैं प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक से जुड़े हुए थे। इस दूसरे धरती को प्राचीन काल में सात द्वीपों में बांटा गया था – जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित था। जम्बू द्वीप के 9 खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसी क्षेत्र में सुर और असुरों का साम्राज्य था। चित्र-१ .रामायण कालीन भारत असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में गिने जाते थे। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। एक ही पितामह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं एक ही पिता कश्यप मुनि की विभिन्न पत्नियों से संतान- देव ‘अदिति’ के पुत्र, दैत्य 'दिति' के पुत्र एवं दानव 'दनु' के पुत्र अर्थात भाई भाई होने पर भी बड़े भाइयों दैत्य व दानवों ने देवों के विरुद्ध दुश्मनी / प्रतियोगिता के कारण श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु पहले तो अति कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के नहीं थे। उन्होंने धरती पर आक्रमण करके मधु और कैटभ नाम के दैत्यों का वध कर धरती पर अपने कुल का विस्तार किया था। बस, यहीं से धरती के दैत्यों और स्वर्ग के देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। देवताओं से संघर्ष देवता और असुरों की यह लड़ाई चलती रही। जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षेत्र ( रशिया=रूस) में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। असुरों ने वर्चस्व के लिए लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। असुरों में भी बड़े बड़े प्रसिद्द राज्याध्यक्ष, बलवान-शक्तिशाली, वीर, भक्त, धार्मिक, विद्वान् हुए | उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया जब तक कि उनका संहार इन्द्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया। देवों, मूलतः इंद्र व विष्णु के शत्रु होने के कारण ही उन्हें असुर, दुष्ट, दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे। उनके गुरु भृगु के पुत्र शुक्राचार्य थे, जो देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनयिक थे। महादेव शिव सुर–असुर दोनों के प्रति समभाव रखते थे यद्यपि वे दैत्यों के अति-भौतिकता की संस्कृति एवं देवों की सुखलिप्ततापूर्ण जीवनचर्या की अपेक्षा वनान्चली प्राकृतिक जीवन शैली के समर्थक थे| असुर भी प्रायः प्रकृति-पूजक थे। देव गुरु बृहस्पति के भाई दैत्य गुरु शुक्राचार्य स्वयँ शिव के शिष्य, भक्त व उपासक थे | वे उशना नाम से प्रसिद्द कवि-विद्वान् एवं मृतक को पुनः जीवित कर देने वाली मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता थे जो भगवान शिव ने उन्हें देवों को अमृत द्वारा अमरता प्राप्त होने पर दोनों वर्गों के समानुपातिक समन्वय व शक्तिसंतुलन के स्वरुप प्रदान की थी | इस प्रकार ब्रहस्पति के शिष्य व समर्थक देव, सुर तथा शुक्राचार्य के शिष्य व समर्थक दैत्य आदि असुर कहे जाने लगे | यद्यपि दोनों संस्कृतियों में प्रेम व विवाह आदि अंतर्संबंध प्रतिबंधित नहीं थे दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद के विष्णु भक्त होने के बाद असुर भी मानवीयता एवं भक्तिभावयुत होने लगे एवं विद्याधरों की कोटि में आने लगे एवं असुरों में भी देवताओं के समर्थक होने लगे ---– देव केवल स्वर्ग, देवलोक, भरत-खंड ( मध्य एशिया, उत्तरापथ, उत्तराखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त ) तक सिमट गए समुद्र मंथन में निकली हुई वारुणी को असुरों ने ले लिया। असुरों ने अमृत कलश को भी छीन लिया। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा कि पहले कौन पिए। कुछ दुर्बल दैत्य ही बलवान दैत्यों का ईर्ष्यावश विरोध करने तथा न्याय की दुहाई देने लगे कि ‘देवताओं ने हमारे बराबर परिश्रम किया, इसलिए उनको यज्ञभाग समान रूप से मिलना चाहिए। नशा उतरने पर असुरों ने देखा कि उनके साथ धोखा हुआ। उन्होंने देवताओं पर धावा बोल दिया। पुनः देवासुर संग्राम हुआ। इस बार असुरराज बेहोश हो गए पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से उन्हें फिर ठीक कर दिया। नारदजी के आग्रह पर कि देवताओं को अभीष्ट प्राप्त हो चुका है, युद्ध बंद हुआ। देवता और असुर अपने-अपने लोक को पधारे। परस्पर सहयोग तथा एकजुट प्रयत्न से एक राष्ट्रीय जीवन की खोज हुई। पशुपालन भी समाज ने सीखा और खेती व्यापक बनी। इस प्रकार एक ओर जहॉं सामाजिकता के सर्वश्रेष्ठ भावों का निर्माण हुआ दूसरी ओर वहॉं लौकिक उन्नति भी हुई। यह सभ्यता के दोहरे कार्य की ओर पहला प्रयत्नपूर्वक उठाया गया कदम था। सबका समन्वय करता हुआ, सहिष्णु,एकरस सामाजिक जीवन के निर्माण से समाज मे स्थायित्व एवं अमरत्व आया। इस मंथन से एश्वर्य तथा संपदा के साथ मानव को वारूणी भी प्राप्त हुई। असुर व असुरों के उपासक, जो प्राकृतिक शक्तियों के ज्ञान में आगे थे, पर रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान थे, वारूणी पीकर मदहोश हो गए। इसलिए उनके पल्ले अमृत नहीं पड़ा। वे एकरस सांस्कृतिक जीवन के अंग न बन बसे। फिर भी एक विशाल प्रयत्न सभी प्रकार के लोगों को मिलाकर साथ चलने का अध्यवसाय हुआ और इसी से प्रारंभिक समृद्धि, सामर्थ्य और लौकिक संपदा एकरस सामाजिक जीवन की खोज में मिलीं। तदुपरांत ब्रह्मा, शिव एवं विष्णु ने वामन-अवतार संधि द्वारा बलि को एवं उसके समर्थक असुरों को पाताल - अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि-- भेज दिया गया एवं देव व उनके समर्थक - मानव, असुर, दैत्य व नाग आदि अन्य मानवेतर जातियां समस्त यूरेशिया, अफ्रीका में फ़ैल गए| इस काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ, वीर, योद्धा, भक्त एवं महान व्यक्तित्वों को अर्ध-देव व देव श्रेणी में आने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था | यथा इंद्र का मित्र वृषाकपि, बलि को इंद्र पद प्राप्त होना, हनुमान का पूज्य देवों में सम्मिलित होना सुर-असुर का अर्थ एवं ग्रंथों में उनका उल्लेख प्रारंभिक ऋग्वेदिक मंडलों में सृष्टि उत्पत्ति सूक्तों में सुर का अर्थ तात्विक अर्थ पदार्थ रचना के सृजनशील मूल प्राकृतिक सृष्टि कणों (शक्तियों) को कहा गया है एवं असृजनशील व सृजन में बंधता बाधा उत्पन्न करने वाले कठोर रासायनिक बंधनों को बनाने वाले कणों को ( शक्तियों को ) असुर कहा गया है | –-ऋग्वेद १/२२/२२६ में मन्त्र है..तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यति सूरय: दिबीव चक्षुराततम |---अर्थात ..सूरयः (सुर) = विद्वान्, ज्ञानी जन अपने सामान्य नेत्रों ( ज्ञान चक्षुओं ) से अदृष्ट देव ईश्वर विष्णु को देखते हैं| तथा “ ---मद्देवानाम सुरत्वेकम || ( ऋक.3/५५) ..सभी महान देवों का सुरत्व, अर्थात अच्छे कार्य हेतु बल संयुक्त है, एक ही है असुर शब्द 'असु' अर्थात 'प्राण', और 'र' अर्थात 'वाला' (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। ऋग्वेद में 'असुर' वरुणतथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके रहस्यमय गुणों का पता लगाता है। असुर देवों के बड़े भ्राता हैं एवं दोनों प्रजापति के पुत्र हैं। आर्यों के मूल धर्म में सर्वशक्तिमान भगवान के अंशस्वरूप प्राकृतिक शक्तियों की उपासना होती थी। ऋग्वेद में सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश और इंद्र से ऋद्धि-सिद्धियां मांगी जाती थीं। यही देवता हैं। उक्त देवताओं के ऊपर विष्णु और विष्णु से ऊपर ब्रह्म ही सत्य माना जाता था। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्पना हुई जिन्हें ‘असुर’ कहा गया। जो प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन भी कर सकते थे, मानवता एवं सांसारिक हित एवं भौतिक प्राप्ति हेतु | ‘देव’ तथा ‘असुर’ ये दोनों शब्द पहले देवताओं के अर्थ में प्रयोग होते थे। ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों में ‘असुर’ इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वेदों में ‘वरुण’ को ‘असुर’ कहा गया और सबके जीवनदाता ‘सूर्य’ की गणना ‘सुर’ तथा ‘असुर’ दोनों में है। कृष्ण को भी ऋग्वेद में कृष्णासुर कहा गया है भो त कृष्णमवत स्थिवांस मिस्यामि वो वृषणो || ----हमने अंशुमती तट ( यमुना तट ) पर गुफाओं में घूमते हुए कृष्णासुर को सूर्य के सदृश्य देख लिया है बाद में कर्म के नियमानुशासन की प्रतिबद्धता से संयुक्त होने पर अति-भौतिकता पर चलने वालों को असुर एवं संस्कारित मानवीय व उच्चकोटि के सदाचरण के गुणों को सुर कहा गया | ‘देव’ शब्द के लिए सुर का प्रयुक्त करने लगे और ‘असुर’ का अर्थ ‘राक्षस’ करने लगे। ऋग्वेद में यम अपनी बहन यमी से उसकी कामेच्छा जनित मांग के अनुचित कार्य हेतु किसी असुर से संपर्क के लिए कहता है न ते सखा सख्यं वष्टये वत्सलक्ष्यामद्वि पुरुषा भवति| महष्पुमान्सो असुरस्य वीरा दिवोध्वरि उर्विया परिख्यानि || --हे सखी! आपका यह सहयोगी आपके साथ इस प्रकार के संपर्क का इच्छुक नहीं है क्योंकि आप सहोदरा बहन हैं| हमें यह अभीष्ट नहीं है परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया। असुर के अन्य अर्थ वैदिक काल में वह जो सुर या देवता न हो, बल्कि उनसे भिन्न और उनका विरोधी हो। ईशोपनिषद में असुर्यानाम ते लोका अन्धें तमावृता ...अन्धकार के अज्ञान में रहने वाले लोग असुर प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्य या राक्षस। इतिहास और पुरातत्त्व से आधुनिक असीरिया देश के उन प्राचीन निवासियों की संज्ञा जिन्हें उन दिनों असुर कहते थे और जिनके देश का नाम पहले असुरिय आधुनिक असीरिया था। वे ही ईरान के अहुर कहलाये| नीच वृत्ति वाला और असंस्कृत पुरूष। भारत में रामायण काल तक दो तरह के लोग हो गए। एक वे जो सुरों को मानते थे और दूसरे वे जो असुरों को मानते थे। अर्थात एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है। साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं। वस्तुतः रामायण काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ व्यक्तियों, वीर, योद्धा, एवं महान व्यक्तित्वों व देवों के सहायकों, मित्रों, भक्त आदि को अर्ध-देव व देव श्रेणी में सम्मिलित किये जाने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। उसने यादव व आभीरों को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था, जो प्रजा का अनेक प्रकार से उत्पीड़न करते थे। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही आभीर युवकों को संगठित करके इनसे टक्कर ली थी। ब्रज के विभिन्न भागों में इन असुरों को जागीरें देकर कंस ने सम्मानित किया। मथुरा के समीप दहिता क्षेत्र में दंतवक्र की छावनी थी, पूतना खेंचरी में, अरिष्ठासुर अरोठ में तथा व्योमासुर कामवन में बसे हुए थे। परंतु कंस वध के फलस्वरूप यह असुर समूह या तो मार दिया गया या फिर ये इस क्षेत्र से भाग गये। 'कथासरित्सागर' में एक प्रेम पूर्ण कथा में किसी असुर का वर्णन नायक के साथ हुआ है। संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, किंतु प्रारम्भिक अवस्था में दैत्य एवं दानव, असुर जाति के दो विभाग समझे गये थे। परवर्ती काल में ‘देव’ तथा ‘असुर’ -आर्यों की ही दो शाखाऍं थीं। बाद के काल में सुर–असुर को ही आर्य-अनार्य कहा जाने लगा किसी समुदाय की प्रारंभिक त्रुटियाँ होती हैं मस्तीभरा जीवन, उपभोग्या नारी का स्वरूप, अनेक स्त्रियों के साथ अवैध संबंध आदि अतिशय भोगपूर्ण व विलासी जीवन | इस उन्नत सभ्यता व संस्कृति देव-असुर संस्कृति में भी यही त्रुटियाँ आयीं | सोमरस का देवों द्वारा और सुरा का असुरों द्वारा पान, उन्मुक्त जीवन आदि | इन्हीं त्रुटियों का निराकरण करते हुए महान् चिंतक एवं सिद्धांतनिष्ठ व्यक्तित्व के धनी परमश्रद्धेय वैवस्वत मनु ने जल प्रलयोपरांत मन-मानव संस्कृति की स्थापना की जो मानव त्रुटियों की संस्कृति, विनष्ट देव-संस्कृति का ही संस्कारित रूप था | मानव रक्त में विद्रोह करने की क्षमता पुराकाल से ही चली आ रही है। देव व असुरों के आपसी विद्रोह के पश्चात जब महर्षि अत्रि ने वैवस्वत मनु एवं अपने शिष्य ऋषि उतथ्य के साथ इस मानव स्थापना की संस्कृति की इसकी जड़ों को शक्तिशाली और बलवती बनाने का अदम्य प्रयास किया तब भी इसके विरोध के लिये विरोध हुआ। पुलस्त्य और विश्रवा ने अपनी पूर्ण शक्ति से इसकी स्थापना का विरोध किया तथा रक्ष संस्कृति की स्थापना की क्या देवासुर संग्राम...नियंडरथल व होमोसेपियंस मानवों के द्वंद्व नहीं थे ? प्रारम्भिक शैव प्रारम्भिक वैष्णव – विष्णु के अनुयायी –मैदान व गर्म प्रदेश वासी विक्सित नगरीय सभ्यता के उन्नत निवासी –होमो सेपियंस ...देव – इनके मध्य चलने वाला वर्ग भेद, विभाजन एवं संघर्ष ही शायद प्रारम्भिक देवासुर संग्राम थे समस्त सुमेरु या जम्बू द्वीप देव-सभ्यता का प्रदेश था | यहीं स्वर्ग में गंगा आदि नदियाँ बहती थीं,यहीं ब्रह्मा-विष्णु व शिव, इंद्र आदि के देवलोक थे...शिव का कैलाश, कश्यप का केश्पियन सागर, स्वर्ग, इन्द्रलोक आदि ..यहीं थे जो अति उन्नत सभ्यता थी –-- जीव सृष्टि के सृजनकर्ता प्रथम मनु स्वयंभाव मनु व कश्यप की सभी संतानें ..भाई-भाई होने पर भी स्वभाव व आचरण में भिन्न थे | विविध मानव एवं असुर आदि मानवेतर जातियां साथ साथ ही निवास करती थीं | विकासवाद के विचार से नियंडरथल मानव ....देव संस्कृति की स्थापना से प्रथम उन्नत आदि-मानव थे जो हिमालय उद्भव एवं महाजलप्रलय से पूर्व समस्त पुरानी दुनिया—जम्बू द्वीप....में फैले हुए थे साथ ही साथ अधिक उन्नत नवीन मानव क्रोमेग्नन-मानव व होमो सेपियंस भी थे | यही असुर व सुर कहलाये| सह अस्तित्व के साथ साथ संघर्ष भी रहते थे शायद यही संघर्ष देवासुर संग्राम कहलाये | भारतीय भूखंड में स्थित उन्नत मानव..... स्वर्ग – शिवलोक कैलाश अदि आया जाया करते थे ...देवों से सहस्थिति थी ...जबकि अमेरिकी भूखंड (पाताल लोक) व अन्य सुदूर एशिया –अफ्रीका के असुर आदि मानवेतर जातियों को अपने क्रूर कृत्यों के कारण अधर्मी माना जाता था |....अंतिम हिमयुग में टेथिस सागर के विलुप्तीकरण की जलप्रलय में वे अधिकांशतः विनष्ट होगये एवं इधर-उधर फ़ैल गए ..हिमालय के उद्भव एवं वैवस्वत मनु द्वारा पुनः नवीन मानववंश (होमो सेपियंस ) की स्थापना एवं समस्त विश्व में विस्तार के साथ नियंडर्थल मानव धीरे-धीरे विलीन होते गए कालांतर में देवों और देव समर्थक असुरों में पुनः धार्मिक एवं सांस्कृतिक मतभेद उत्पन्न हुए असुर जनजाति प्रोटो-आस्ट्रेलाइड समूह के अंतर्गत आती है, ऋग्वेद तथा ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद्, महाभारत आदि ग्रन्थों में असुर शब्द का अनेकानेक स्थानों पर उल्लेख हुआ है। विभिन्न स्थानों पर असुरों की वीरता का वर्णन किया गया है है कि वे पूर्ववैदिक काल से वैदिक काल तक अत्यन्त शक्तिशाली समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित थे। शायद असुर साम्राज्य का अन्त आर्यों के साथ संघर्ष में हो गया। प्रागैतिहासिक संदर्भ में असुरों को असीरिया नगर के निवासियों के रूप में वर्णन किया है, जिन्होंने मिस्र और बेबीलोन की संस्कृति अपना ली थी और बाद में उसे भारत और इरान तक फैलाया,जहां उन्हें अहुर कहा गया ईरान या फारस में असुरों को अहुर कहा गया -- असुरों में मूल भिन्नता थी चित्र २, हुविश्क ( कुषाण पूर्व मथुरा शासक ?) –बाह्लीक या बेक्त्रिया या बलख ( मध्य-एशिया ) उत्तरापथ, चक्षु नदी या ओक्सस के आस-पास ..कश्मीर...स्वर्ग मथुरा तक के शासक (? त्रिमूर्ति जरथुस्त्र के अनुसार ईश्वर एक ही है (उस समय फारस में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी ...सुर या देव, प्रकृति पूजकों का वर्चस्व था )। इस ईश्वर को जरथुस्त्र ने 'अहुरा मजदा' कहा अर्थात 'महान जीवन दाता'। जरथुस्त्र चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर तुल्य बने, जीवनदायी ऊर्जा को अपनाए तथा निर्माण, संवर्द्धन एवं प्रगति का वाहक बने। मठवाद, ब्रह्मचर्य, व्रत-उपवास, आत्म दमन आदि की मनाही है। इनसे मनुष्य कमजोर होता है और बुराई से लड़ने की उसकी ताकत कम हो जाती है। मानव इस विश्व का पूरा आनंद उठाए, खुश रहे। वह जो भी करे बस एक बात का ख्याल अवश्य रखे और वह यह कि सदाचार के मार्ग से कभी विचलित न हो। भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न जीवन की मनाही नहीं है, किसी का हक मारकर या शोषण करके कुछ पाना दुराचार है। जो हमसे कम सम्पन्न हैं, उनकी सदैव मदद करना चाहिए। दैहिक मृत्यु को बुराई की अस्थायी जीत माना गया है। विश्व का अंतिम उद्देश्य अच्छाई की जीत को मानता है, बुराई की सजा को नहीं। अतः यह मान्यता है आत्माओं का अंतिम फैसला होगा। इसके बाद भौतिक शरीर का पुनरोत्थान होगा| चित्र५ – जरथुस्त्र – गूगल से.. शुद्ध अद्वैतवाद के प्रचारक जोरोस्ट्रीय धर्म ने यहूदी धर्म को प्रभावित किया और उसके द्वारा ईसाई और इस्लाम धर्म को। इस धर्म ने एक बार हिमालय पार के प्रदेशों तथा ग्रीक और रोमन विचार एवं दर्शन को प्रभावित किया था किंतु 600 वर्ष AD के लगभग इस्लाम ने इसका स्थान ले लिया। सनातन वैदिक धर्म से प्रकारंतारिता द्वारा धर्मों का क्रमिक विकृतीकरण-----सनातन वैदिक धर्म ,ब्रह्म ईश्वर सुर से àपारसी, जरथुस्त्र, अहुरा-मज़्दा, अहुर àयहोवा, यहूदी à बाइबल ईसा ईसाई à मोहम्मद इस्लाम मुस्लिम...... अहुरा मज्दा के सिद्धांत प्राचीन असुरों के भौतिकवाद एवं मनुष्य की केन्द्रीय भूमिका पर आधारित हैं, जो वेद व देव-सभ्यता या आर्य मतों से मूलरूप में समान होते हुए भी भिन्नता एवं अपभ्रष्ट रूप है आधुनिक काल में असुर- विश्वभर में कबीलाई, जनजाति एवं वनवासी जातियों को अपितु सभी विदेशियों को उनके आचरण, व्यवहार व सभ्यता-संस्कृति के कारण अनार्य या असुर समझा जा सकता है शताब्दियों से अधिक पूर्व भारत भाग आए थे, उन्होंने यहाँ शरण ली। तबसे आज तक पारसियों ने भारत के उदय मे बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनमें उस महान प्रभु की वाणी अब भी जीवित है और आज तक उनके घरों और चित्र ६ - अफगान शासक –विष्णु की पूजा करते हुए उपासनागृहों में सुनी जाती है। गीतों के रूप में गाथा नाम से उनके उपदेश सुरक्षित हैं जिनका सांराश है अच्छे विचार, अच्छी वाणी, अच्छे कार्य। भारतवर्ष में असुर कहलाई जाने वाली जातियां यूं तो सारे देश में फ़ैली हुई हैं| प्रायः जनजातियों, आदिवासियों, वन वासियों, वनांचल के निवासियों, गोंड, भील आदि को असुर कह दिया जाता है| आजकल वे संगठित होकर स्वयं को असुर व अनार्य मानने भी लगे हैं एवं अगदी जाती या आर्य विरोधी स्वर भी उठाने लगे हैं आदिम जनजाति असुर की भाषा मुण्डारी वर्ग की है जो आग्नेय (आस्ट्रो एशियाटिक) भाषा परिवार से सम्बद्ध है। परन्तु असुर जनजाति ने अपनी भाषा की आसुरी भाषा की संज्ञा दी है। अपनी भाषा के अलावे ये नागपुरी व हिन्दी का भी प्रयोग करते हैं। असुर जनजाति में पारम्परिक शिक्षा हेतु युवागृह की परम्परा थी जिसे ‘गिति ओड़ा’ कहा जाता था। असुर बच्चे अपनी प्रथम शिक्षा परिवार से शुरू करते थे और 8 से 10 वर्ष की अवस्था में ‘गिति ओड़ा’ के सदस्य बन जाते थे। जहाँ वे अपनी मातृभाषा में जीवन की विभिन्न भूमिकाओं से सम्बन्धित शिक्षा, लोकगीतों और कहावतों के माध्यम से सीखा करते थे असुर प्रकृति-पूजक होते हैं। ‘सिंगबोंगा’ उनके प्रमुख देवता है। ‘सड़सी कुटासी’ इनका प्रमुख पर्व है, जिसमें यह अपने औजारों और लोहे गलाने वाली भट्टियों की पूजा करते हैं। असुर महिषासुर को अपना पूर्वज मानते है। पिछले कुछ सालों से एक पिछड़े वर्ग के संगठन ने ‘महिषासुर शहीद दिवस’ मनाने की शुरुआत भी की है।हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में दिखाया गया है जिसकी हत्या दुर्गा ने की थी। पश्चिमी बंगाल व झारखंड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते है। यद्यपि यह गोंड समुदाय की एक भ्रमपूर्ण गाथा के कारण उत्पन्न हुआ है कि – उनके देवता शंभू सेक( जो वास्तव में शिव-शंभू महादेव ही हैं ) को आर्यों द्वारा पार्वती के रूपजाल में फंसाकर उनके समुदाय को पराजित कर दिया | परन्तु वास्तव में यह तथ्य उस कथा व घटना का मिथ्याकरण एवं विकृतीकरण है जब दक्षिण भारत के देवता शिव ने समुद्र मंथन से निकला कालकूट विषपान एवं स्वर्ग से गंगावतरण आदि के उपरांत ब्रह्मा, विष्णु से मैत्री के साथ ही देवलोक, जम्बूद्वीप एवं विश्व के अन्य समस्त खण्डों एवं द्वीपों तथा देव-असुर आदि सभी को एक सूत्र में बांधने हेतु दक्षिण भारत की बजाय कैलाश को अपना आवास बनाया एवं दक्ष की पुत्री सती से विवाह किया और कालांतर में देवाधिदेव कहलाये अतः निश्चय ही देव या सुर व असुर एक ही पिता की संतानें हैं, राजनैतिक द्वेष के कारण ही प्रागैतिहासिक युग में भी हमें आपस में बांटा व लड़ाया गया और आज भी अपनी रोटी सेंकने वालों का यही मंतव्य है | हमें बांटने वाली शक्तियों से सावधान रहकर सम्मिलित रूप से देश व राष्ट्र के विकास व उन्नति में योगदान करना
शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019
सह अस्तित्व के साथ साथ संघर्ष भी रहते थे शायद यही संघर्ष देवासुर संग्राम कहलाये
कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... सुर-असुर व देवासुर संग्राम वेद और महाभारत के अनुसार आदिकाल में पृथ्वी पर - देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि प्रमुख जातियां थीं । देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। ऋषि कश्यप की विभिन्न पत्नियों -- देवताओं की अदिति से, दैत्यों की दिति से, दानवों की दनु से, राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह अन्य पत्नियों से यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। सृष्टि के विकास की नींव में ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने कुल का विस्तार किया था| ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र ऋषि कश्यप जिन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है, इनकी माता का नाम 'कला' था जो कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी पुराणों अनुसार सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर स्थित था जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा कि तपस्या में लीन रहते थे | कश्यप सागर ..केस्पियन सी.... कश्यप मेरु प्रदेश .. कश्मीर प्रदेश उन्हीं के नाम पर कहे जाते हैं प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक से जुड़े हुए थे। इस दूसरे धरती को प्राचीन काल में सात द्वीपों में बांटा गया था – जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित था। जम्बू द्वीप के 9 खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसी क्षेत्र में सुर और असुरों का साम्राज्य था। चित्र-१ .रामायण कालीन भारत असुर देवताओं के सबसे प्रबल शत्रुओं में गिने जाते थे। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी असुरों और देवों में सदा युद्ध होता रहा। एक ही पितामह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं एक ही पिता कश्यप मुनि की विभिन्न पत्नियों से संतान- देव ‘अदिति’ के पुत्र, दैत्य 'दिति' के पुत्र एवं दानव 'दनु' के पुत्र अर्थात भाई भाई होने पर भी बड़े भाइयों दैत्य व दानवों ने देवों के विरुद्ध दुश्मनी / प्रतियोगिता के कारण श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु पहले तो अति कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के नहीं थे। उन्होंने धरती पर आक्रमण करके मधु और कैटभ नाम के दैत्यों का वध कर धरती पर अपने कुल का विस्तार किया था। बस, यहीं से धरती के दैत्यों और स्वर्ग के देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। देवताओं से संघर्ष देवता और असुरों की यह लड़ाई चलती रही। जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षेत्र ( रशिया=रूस) में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। असुरों ने वर्चस्व के लिए लगातार देवों के साथ युद्ध किया और इनमें से कई युद्धों में वे प्राय: विजयी भी होते रहे। असुरों में भी बड़े बड़े प्रसिद्द राज्याध्यक्ष, बलवान-शक्तिशाली, वीर, भक्त, धार्मिक, विद्वान् हुए | उनमें से कुछ ने तो सारे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया जब तक कि उनका संहार इन्द्र, विष्णु, शिव आदि देवों ने नहीं किया। देवों, मूलतः इंद्र व विष्णु के शत्रु होने के कारण ही उन्हें असुर, दुष्ट, दैत्य कहा गया है, किंतु सामान्य रूप से वे दुष्ट नहीं थे। उनके गुरु भृगु के पुत्र शुक्राचार्य थे, जो देवगुरु बृहस्पति के तुल्य ही ज्ञानी और राजनयिक थे। महादेव शिव सुर–असुर दोनों के प्रति समभाव रखते थे यद्यपि वे दैत्यों के अति-भौतिकता की संस्कृति एवं देवों की सुखलिप्ततापूर्ण जीवनचर्या की अपेक्षा वनान्चली प्राकृतिक जीवन शैली के समर्थक थे| असुर भी प्रायः प्रकृति-पूजक थे। देव गुरु बृहस्पति के भाई दैत्य गुरु शुक्राचार्य स्वयँ शिव के शिष्य, भक्त व उपासक थे | वे उशना नाम से प्रसिद्द कवि-विद्वान् एवं मृतक को पुनः जीवित कर देने वाली मृतसंजीवनी विद्या के ज्ञाता थे जो भगवान शिव ने उन्हें देवों को अमृत द्वारा अमरता प्राप्त होने पर दोनों वर्गों के समानुपातिक समन्वय व शक्तिसंतुलन के स्वरुप प्रदान की थी | इस प्रकार ब्रहस्पति के शिष्य व समर्थक देव, सुर तथा शुक्राचार्य के शिष्य व समर्थक दैत्य आदि असुर कहे जाने लगे | यद्यपि दोनों संस्कृतियों में प्रेम व विवाह आदि अंतर्संबंध प्रतिबंधित नहीं थे दैत्यराज हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद के विष्णु भक्त होने के बाद असुर भी मानवीयता एवं भक्तिभावयुत होने लगे एवं विद्याधरों की कोटि में आने लगे एवं असुरों में भी देवताओं के समर्थक होने लगे ---– देव केवल स्वर्ग, देवलोक, भरत-खंड ( मध्य एशिया, उत्तरापथ, उत्तराखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त ) तक सिमट गए समुद्र मंथन में निकली हुई वारुणी को असुरों ने ले लिया। असुरों ने अमृत कलश को भी छीन लिया। उनमें आपस में झगड़ा होने लगा कि पहले कौन पिए। कुछ दुर्बल दैत्य ही बलवान दैत्यों का ईर्ष्यावश विरोध करने तथा न्याय की दुहाई देने लगे कि ‘देवताओं ने हमारे बराबर परिश्रम किया, इसलिए उनको यज्ञभाग समान रूप से मिलना चाहिए। नशा उतरने पर असुरों ने देखा कि उनके साथ धोखा हुआ। उन्होंने देवताओं पर धावा बोल दिया। पुनः देवासुर संग्राम हुआ। इस बार असुरराज बेहोश हो गए पर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से उन्हें फिर ठीक कर दिया। नारदजी के आग्रह पर कि देवताओं को अभीष्ट प्राप्त हो चुका है, युद्ध बंद हुआ। देवता और असुर अपने-अपने लोक को पधारे। परस्पर सहयोग तथा एकजुट प्रयत्न से एक राष्ट्रीय जीवन की खोज हुई। पशुपालन भी समाज ने सीखा और खेती व्यापक बनी। इस प्रकार एक ओर जहॉं सामाजिकता के सर्वश्रेष्ठ भावों का निर्माण हुआ दूसरी ओर वहॉं लौकिक उन्नति भी हुई। यह सभ्यता के दोहरे कार्य की ओर पहला प्रयत्नपूर्वक उठाया गया कदम था। सबका समन्वय करता हुआ, सहिष्णु,एकरस सामाजिक जीवन के निर्माण से समाज मे स्थायित्व एवं अमरत्व आया। इस मंथन से एश्वर्य तथा संपदा के साथ मानव को वारूणी भी प्राप्त हुई। असुर व असुरों के उपासक, जो प्राकृतिक शक्तियों के ज्ञान में आगे थे, पर रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान थे, वारूणी पीकर मदहोश हो गए। इसलिए उनके पल्ले अमृत नहीं पड़ा। वे एकरस सांस्कृतिक जीवन के अंग न बन बसे। फिर भी एक विशाल प्रयत्न सभी प्रकार के लोगों को मिलाकर साथ चलने का अध्यवसाय हुआ और इसी से प्रारंभिक समृद्धि, सामर्थ्य और लौकिक संपदा एकरस सामाजिक जीवन की खोज में मिलीं। तदुपरांत ब्रह्मा, शिव एवं विष्णु ने वामन-अवतार संधि द्वारा बलि को एवं उसके समर्थक असुरों को पाताल - अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि-- भेज दिया गया एवं देव व उनके समर्थक - मानव, असुर, दैत्य व नाग आदि अन्य मानवेतर जातियां समस्त यूरेशिया, अफ्रीका में फ़ैल गए| इस काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ, वीर, योद्धा, भक्त एवं महान व्यक्तित्वों को अर्ध-देव व देव श्रेणी में आने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था | यथा इंद्र का मित्र वृषाकपि, बलि को इंद्र पद प्राप्त होना, हनुमान का पूज्य देवों में सम्मिलित होना सुर-असुर का अर्थ एवं ग्रंथों में उनका उल्लेख प्रारंभिक ऋग्वेदिक मंडलों में सृष्टि उत्पत्ति सूक्तों में सुर का अर्थ तात्विक अर्थ पदार्थ रचना के सृजनशील मूल प्राकृतिक सृष्टि कणों (शक्तियों) को कहा गया है एवं असृजनशील व सृजन में बंधता बाधा उत्पन्न करने वाले कठोर रासायनिक बंधनों को बनाने वाले कणों को ( शक्तियों को ) असुर कहा गया है | –-ऋग्वेद १/२२/२२६ में मन्त्र है..तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यति सूरय: दिबीव चक्षुराततम |---अर्थात ..सूरयः (सुर) = विद्वान्, ज्ञानी जन अपने सामान्य नेत्रों ( ज्ञान चक्षुओं ) से अदृष्ट देव ईश्वर विष्णु को देखते हैं| तथा “ ---मद्देवानाम सुरत्वेकम || ( ऋक.3/५५) ..सभी महान देवों का सुरत्व, अर्थात अच्छे कार्य हेतु बल संयुक्त है, एक ही है असुर शब्द 'असु' अर्थात 'प्राण', और 'र' अर्थात 'वाला' (प्राणवान् अथवा शक्तिमान) से मिलकर बना है। बाद के समय में धीरे-धीरे असुर भौतिक शक्ति का प्रतीक हो गया। ऋग्वेद में 'असुर' वरुणतथा दूसरे देवों के विशेषण रूप में व्यवहृत हुआ है, जिसमें उनके रहस्यमय गुणों का पता लगाता है। असुर देवों के बड़े भ्राता हैं एवं दोनों प्रजापति के पुत्र हैं। आर्यों के मूल धर्म में सर्वशक्तिमान भगवान के अंशस्वरूप प्राकृतिक शक्तियों की उपासना होती थी। ऋग्वेद में सूर्य, वायु, अग्नि, आकाश और इंद्र से ऋद्धि-सिद्धियां मांगी जाती थीं। यही देवता हैं। उक्त देवताओं के ऊपर विष्णु और विष्णु से ऊपर ब्रह्म ही सत्य माना जाता था। बाद में अमूर्त देवताओं की कल्पना हुई जिन्हें ‘असुर’ कहा गया। जो प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन भी कर सकते थे, मानवता एवं सांसारिक हित एवं भौतिक प्राप्ति हेतु | ‘देव’ तथा ‘असुर’ ये दोनों शब्द पहले देवताओं के अर्थ में प्रयोग होते थे। ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों में ‘असुर’ इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वेदों में ‘वरुण’ को ‘असुर’ कहा गया और सबके जीवनदाता ‘सूर्य’ की गणना ‘सुर’ तथा ‘असुर’ दोनों में है। कृष्ण को भी ऋग्वेद में कृष्णासुर कहा गया है भो त कृष्णमवत स्थिवांस मिस्यामि वो वृषणो || ----हमने अंशुमती तट ( यमुना तट ) पर गुफाओं में घूमते हुए कृष्णासुर को सूर्य के सदृश्य देख लिया है बाद में कर्म के नियमानुशासन की प्रतिबद्धता से संयुक्त होने पर अति-भौतिकता पर चलने वालों को असुर एवं संस्कारित मानवीय व उच्चकोटि के सदाचरण के गुणों को सुर कहा गया | ‘देव’ शब्द के लिए सुर का प्रयुक्त करने लगे और ‘असुर’ का अर्थ ‘राक्षस’ करने लगे। ऋग्वेद में यम अपनी बहन यमी से उसकी कामेच्छा जनित मांग के अनुचित कार्य हेतु किसी असुर से संपर्क के लिए कहता है न ते सखा सख्यं वष्टये वत्सलक्ष्यामद्वि पुरुषा भवति| महष्पुमान्सो असुरस्य वीरा दिवोध्वरि उर्विया परिख्यानि || --हे सखी! आपका यह सहयोगी आपके साथ इस प्रकार के संपर्क का इच्छुक नहीं है क्योंकि आप सहोदरा बहन हैं| हमें यह अभीष्ट नहीं है परवर्ती युग में असुर का प्रयोग देवों (सुरों) के शत्रु रूप में प्रसिद्ध हो गया। असुर के अन्य अर्थ वैदिक काल में वह जो सुर या देवता न हो, बल्कि उनसे भिन्न और उनका विरोधी हो। ईशोपनिषद में असुर्यानाम ते लोका अन्धें तमावृता ...अन्धकार के अज्ञान में रहने वाले लोग असुर प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्य या राक्षस। इतिहास और पुरातत्त्व से आधुनिक असीरिया देश के उन प्राचीन निवासियों की संज्ञा जिन्हें उन दिनों असुर कहते थे और जिनके देश का नाम पहले असुरिय आधुनिक असीरिया था। वे ही ईरान के अहुर कहलाये| नीच वृत्ति वाला और असंस्कृत पुरूष। भारत में रामायण काल तक दो तरह के लोग हो गए। एक वे जो सुरों को मानते थे और दूसरे वे जो असुरों को मानते थे। अर्थात एक वे जो ऋग्वेद को मानते थे और दूसरे वे जो अथर्ववेद को मानते थे। महाभारत एवं अन्य प्रचलित दूसरी कथाओं के वर्णन में असुरों के गुणों पर प्रकाश डाला गया है। साधारण विश्वास में वे मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों की कोटि में आते हैं। वस्तुतः रामायण काल तक असुरों व अन्य देवेतर जातियों के समर्थ व्यक्तियों, वीर, योद्धा, एवं महान व्यक्तित्वों व देवों के सहायकों, मित्रों, भक्त आदि को अर्ध-देव व देव श्रेणी में सम्मिलित किये जाने का सम्मान मिलना प्रारम्भ होचुका था पुराणों में आये उल्लेखों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के उदय से पूर्व कंस ने यादव गणतंत्र के प्रमुख अपने पिता और मथुरा के राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर निरंकुश एकतंत्र की स्थापना करके अपने को सम्राट घोषित किया था। उसने यादव व आभीरों को दबाने के लिए इस क्षेत्र में असुरों को भारी मात्रा में ससम्मान बसाया था, जो प्रजा का अनेक प्रकार से उत्पीड़न करते थे। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही आभीर युवकों को संगठित करके इनसे टक्कर ली थी। ब्रज के विभिन्न भागों में इन असुरों को जागीरें देकर कंस ने सम्मानित किया। मथुरा के समीप दहिता क्षेत्र में दंतवक्र की छावनी थी, पूतना खेंचरी में, अरिष्ठासुर अरोठ में तथा व्योमासुर कामवन में बसे हुए थे। परंतु कंस वध के फलस्वरूप यह असुर समूह या तो मार दिया गया या फिर ये इस क्षेत्र से भाग गये। 'कथासरित्सागर' में एक प्रेम पूर्ण कथा में किसी असुर का वर्णन नायक के साथ हुआ है। संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव में कोई अंतर नहीं दिखाया गया है, किंतु प्रारम्भिक अवस्था में दैत्य एवं दानव, असुर जाति के दो विभाग समझे गये थे। परवर्ती काल में ‘देव’ तथा ‘असुर’ -आर्यों की ही दो शाखाऍं थीं। बाद के काल में सुर–असुर को ही आर्य-अनार्य कहा जाने लगा किसी समुदाय की प्रारंभिक त्रुटियाँ होती हैं मस्तीभरा जीवन, उपभोग्या नारी का स्वरूप, अनेक स्त्रियों के साथ अवैध संबंध आदि अतिशय भोगपूर्ण व विलासी जीवन | इस उन्नत सभ्यता व संस्कृति देव-असुर संस्कृति में भी यही त्रुटियाँ आयीं | सोमरस का देवों द्वारा और सुरा का असुरों द्वारा पान, उन्मुक्त जीवन आदि | इन्हीं त्रुटियों का निराकरण करते हुए महान् चिंतक एवं सिद्धांतनिष्ठ व्यक्तित्व के धनी परमश्रद्धेय वैवस्वत मनु ने जल प्रलयोपरांत मन-मानव संस्कृति की स्थापना की जो मानव त्रुटियों की संस्कृति, विनष्ट देव-संस्कृति का ही संस्कारित रूप था | मानव रक्त में विद्रोह करने की क्षमता पुराकाल से ही चली आ रही है। देव व असुरों के आपसी विद्रोह के पश्चात जब महर्षि अत्रि ने वैवस्वत मनु एवं अपने शिष्य ऋषि उतथ्य के साथ इस मानव स्थापना की संस्कृति की इसकी जड़ों को शक्तिशाली और बलवती बनाने का अदम्य प्रयास किया तब भी इसके विरोध के लिये विरोध हुआ। पुलस्त्य और विश्रवा ने अपनी पूर्ण शक्ति से इसकी स्थापना का विरोध किया तथा रक्ष संस्कृति की स्थापना की क्या देवासुर संग्राम...नियंडरथल व होमोसेपियंस मानवों के द्वंद्व नहीं थे ? प्रारम्भिक शैव प्रारम्भिक वैष्णव – विष्णु के अनुयायी –मैदान व गर्म प्रदेश वासी विक्सित नगरीय सभ्यता के उन्नत निवासी –होमो सेपियंस ...देव – इनके मध्य चलने वाला वर्ग भेद, विभाजन एवं संघर्ष ही शायद प्रारम्भिक देवासुर संग्राम थे समस्त सुमेरु या जम्बू द्वीप देव-सभ्यता का प्रदेश था | यहीं स्वर्ग में गंगा आदि नदियाँ बहती थीं,यहीं ब्रह्मा-विष्णु व शिव, इंद्र आदि के देवलोक थे...शिव का कैलाश, कश्यप का केश्पियन सागर, स्वर्ग, इन्द्रलोक आदि ..यहीं थे जो अति उन्नत सभ्यता थी –-- जीव सृष्टि के सृजनकर्ता प्रथम मनु स्वयंभाव मनु व कश्यप की सभी संतानें ..भाई-भाई होने पर भी स्वभाव व आचरण में भिन्न थे | विविध मानव एवं असुर आदि मानवेतर जातियां साथ साथ ही निवास करती थीं | विकासवाद के विचार से नियंडरथल मानव ....देव संस्कृति की स्थापना से प्रथम उन्नत आदि-मानव थे जो हिमालय उद्भव एवं महाजलप्रलय से पूर्व समस्त पुरानी दुनिया—जम्बू द्वीप....में फैले हुए थे साथ ही साथ अधिक उन्नत नवीन मानव क्रोमेग्नन-मानव व होमो सेपियंस भी थे | यही असुर व सुर कहलाये| सह अस्तित्व के साथ साथ संघर्ष भी रहते थे शायद यही संघर्ष देवासुर संग्राम कहलाये | भारतीय भूखंड में स्थित उन्नत मानव..... स्वर्ग – शिवलोक कैलाश अदि आया जाया करते थे ...देवों से सहस्थिति थी ...जबकि अमेरिकी भूखंड (पाताल लोक) व अन्य सुदूर एशिया –अफ्रीका के असुर आदि मानवेतर जातियों को अपने क्रूर कृत्यों के कारण अधर्मी माना जाता था |....अंतिम हिमयुग में टेथिस सागर के विलुप्तीकरण की जलप्रलय में वे अधिकांशतः विनष्ट होगये एवं इधर-उधर फ़ैल गए ..हिमालय के उद्भव एवं वैवस्वत मनु द्वारा पुनः नवीन मानववंश (होमो सेपियंस ) की स्थापना एवं समस्त विश्व में विस्तार के साथ नियंडर्थल मानव धीरे-धीरे विलीन होते गए कालांतर में देवों और देव समर्थक असुरों में पुनः धार्मिक एवं सांस्कृतिक मतभेद उत्पन्न हुए असुर जनजाति प्रोटो-आस्ट्रेलाइड समूह के अंतर्गत आती है, ऋग्वेद तथा ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद्, महाभारत आदि ग्रन्थों में असुर शब्द का अनेकानेक स्थानों पर उल्लेख हुआ है। विभिन्न स्थानों पर असुरों की वीरता का वर्णन किया गया है है कि वे पूर्ववैदिक काल से वैदिक काल तक अत्यन्त शक्तिशाली समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित थे। शायद असुर साम्राज्य का अन्त आर्यों के साथ संघर्ष में हो गया। प्रागैतिहासिक संदर्भ में असुरों को असीरिया नगर के निवासियों के रूप में वर्णन किया है, जिन्होंने मिस्र और बेबीलोन की संस्कृति अपना ली थी और बाद में उसे भारत और इरान तक फैलाया,जहां उन्हें अहुर कहा गया ईरान या फारस में असुरों को अहुर कहा गया -- असुरों में मूल भिन्नता थी चित्र २, हुविश्क ( कुषाण पूर्व मथुरा शासक ?) –बाह्लीक या बेक्त्रिया या बलख ( मध्य-एशिया ) उत्तरापथ, चक्षु नदी या ओक्सस के आस-पास ..कश्मीर...स्वर्ग मथुरा तक के शासक (? त्रिमूर्ति जरथुस्त्र के अनुसार ईश्वर एक ही है (उस समय फारस में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी ...सुर या देव, प्रकृति पूजकों का वर्चस्व था )। इस ईश्वर को जरथुस्त्र ने 'अहुरा मजदा' कहा अर्थात 'महान जीवन दाता'। जरथुस्त्र चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर तुल्य बने, जीवनदायी ऊर्जा को अपनाए तथा निर्माण, संवर्द्धन एवं प्रगति का वाहक बने। मठवाद, ब्रह्मचर्य, व्रत-उपवास, आत्म दमन आदि की मनाही है। इनसे मनुष्य कमजोर होता है और बुराई से लड़ने की उसकी ताकत कम हो जाती है। मानव इस विश्व का पूरा आनंद उठाए, खुश रहे। वह जो भी करे बस एक बात का ख्याल अवश्य रखे और वह यह कि सदाचार के मार्ग से कभी विचलित न हो। भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न जीवन की मनाही नहीं है, किसी का हक मारकर या शोषण करके कुछ पाना दुराचार है। जो हमसे कम सम्पन्न हैं, उनकी सदैव मदद करना चाहिए। दैहिक मृत्यु को बुराई की अस्थायी जीत माना गया है। विश्व का अंतिम उद्देश्य अच्छाई की जीत को मानता है, बुराई की सजा को नहीं। अतः यह मान्यता है आत्माओं का अंतिम फैसला होगा। इसके बाद भौतिक शरीर का पुनरोत्थान होगा| चित्र५ – जरथुस्त्र – गूगल से.. शुद्ध अद्वैतवाद के प्रचारक जोरोस्ट्रीय धर्म ने यहूदी धर्म को प्रभावित किया और उसके द्वारा ईसाई और इस्लाम धर्म को। इस धर्म ने एक बार हिमालय पार के प्रदेशों तथा ग्रीक और रोमन विचार एवं दर्शन को प्रभावित किया था किंतु 600 वर्ष AD के लगभग इस्लाम ने इसका स्थान ले लिया। सनातन वैदिक धर्म से प्रकारंतारिता द्वारा धर्मों का क्रमिक विकृतीकरण-----सनातन वैदिक धर्म ,ब्रह्म ईश्वर सुर से àपारसी, जरथुस्त्र, अहुरा-मज़्दा, अहुर àयहोवा, यहूदी à बाइबल ईसा ईसाई à मोहम्मद इस्लाम मुस्लिम...... अहुरा मज्दा के सिद्धांत प्राचीन असुरों के भौतिकवाद एवं मनुष्य की केन्द्रीय भूमिका पर आधारित हैं, जो वेद व देव-सभ्यता या आर्य मतों से मूलरूप में समान होते हुए भी भिन्नता एवं अपभ्रष्ट रूप है आधुनिक काल में असुर- विश्वभर में कबीलाई, जनजाति एवं वनवासी जातियों को अपितु सभी विदेशियों को उनके आचरण, व्यवहार व सभ्यता-संस्कृति के कारण अनार्य या असुर समझा जा सकता है शताब्दियों से अधिक पूर्व भारत भाग आए थे, उन्होंने यहाँ शरण ली। तबसे आज तक पारसियों ने भारत के उदय मे बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनमें उस महान प्रभु की वाणी अब भी जीवित है और आज तक उनके घरों और चित्र ६ - अफगान शासक –विष्णु की पूजा करते हुए उपासनागृहों में सुनी जाती है। गीतों के रूप में गाथा नाम से उनके उपदेश सुरक्षित हैं जिनका सांराश है अच्छे विचार, अच्छी वाणी, अच्छे कार्य। भारतवर्ष में असुर कहलाई जाने वाली जातियां यूं तो सारे देश में फ़ैली हुई हैं| प्रायः जनजातियों, आदिवासियों, वन वासियों, वनांचल के निवासियों, गोंड, भील आदि को असुर कह दिया जाता है| आजकल वे संगठित होकर स्वयं को असुर व अनार्य मानने भी लगे हैं एवं अगदी जाती या आर्य विरोधी स्वर भी उठाने लगे हैं आदिम जनजाति असुर की भाषा मुण्डारी वर्ग की है जो आग्नेय (आस्ट्रो एशियाटिक) भाषा परिवार से सम्बद्ध है। परन्तु असुर जनजाति ने अपनी भाषा की आसुरी भाषा की संज्ञा दी है। अपनी भाषा के अलावे ये नागपुरी व हिन्दी का भी प्रयोग करते हैं। असुर जनजाति में पारम्परिक शिक्षा हेतु युवागृह की परम्परा थी जिसे ‘गिति ओड़ा’ कहा जाता था। असुर बच्चे अपनी प्रथम शिक्षा परिवार से शुरू करते थे और 8 से 10 वर्ष की अवस्था में ‘गिति ओड़ा’ के सदस्य बन जाते थे। जहाँ वे अपनी मातृभाषा में जीवन की विभिन्न भूमिकाओं से सम्बन्धित शिक्षा, लोकगीतों और कहावतों के माध्यम से सीखा करते थे असुर प्रकृति-पूजक होते हैं। ‘सिंगबोंगा’ उनके प्रमुख देवता है। ‘सड़सी कुटासी’ इनका प्रमुख पर्व है, जिसमें यह अपने औजारों और लोहे गलाने वाली भट्टियों की पूजा करते हैं। असुर महिषासुर को अपना पूर्वज मानते है। पिछले कुछ सालों से एक पिछड़े वर्ग के संगठन ने ‘महिषासुर शहीद दिवस’ मनाने की शुरुआत भी की है।हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में दिखाया गया है जिसकी हत्या दुर्गा ने की थी। पश्चिमी बंगाल व झारखंड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते है। यद्यपि यह गोंड समुदाय की एक भ्रमपूर्ण गाथा के कारण उत्पन्न हुआ है कि – उनके देवता शंभू सेक( जो वास्तव में शिव-शंभू महादेव ही हैं ) को आर्यों द्वारा पार्वती के रूपजाल में फंसाकर उनके समुदाय को पराजित कर दिया | परन्तु वास्तव में यह तथ्य उस कथा व घटना का मिथ्याकरण एवं विकृतीकरण है जब दक्षिण भारत के देवता शिव ने समुद्र मंथन से निकला कालकूट विषपान एवं स्वर्ग से गंगावतरण आदि के उपरांत ब्रह्मा, विष्णु से मैत्री के साथ ही देवलोक, जम्बूद्वीप एवं विश्व के अन्य समस्त खण्डों एवं द्वीपों तथा देव-असुर आदि सभी को एक सूत्र में बांधने हेतु दक्षिण भारत की बजाय कैलाश को अपना आवास बनाया एवं दक्ष की पुत्री सती से विवाह किया और कालांतर में देवाधिदेव कहलाये अतः निश्चय ही देव या सुर व असुर एक ही पिता की संतानें हैं, राजनैतिक द्वेष के कारण ही प्रागैतिहासिक युग में भी हमें आपस में बांटा व लड़ाया गया और आज भी अपनी रोटी सेंकने वालों का यही मंतव्य है | हमें बांटने वाली शक्तियों से सावधान रहकर सम्मिलित रूप से देश व राष्ट्र के विकास व उन्नति में योगदान करना
सोमवार, 30 सितंबर 2019
भारत के गौरवशाली अतीत के सारे प्रतीकों को कैसे कैसे नष्ट किया जा रहा है धीरे धीरे महाभारत में विकृति चाणक्य सीरियल में भी विकृति मां शेरावाली को जगह बाघा वाली बनाया जा रहा है
माँ_शेरावालिये_या_बाघावालिये। देश आज़ाद हुआ, राष्ट्रीय पशु के लिए किसी को सोचना नहीं पड़ा, सीधे शेर को चुन लिया। फिर राष्ट्रीय चिन्ह भी अशोक चक्र जिस में चार शेर हैं। बाकि विष्णु जी के अवतार नरसिंह भी शेर ही हैं। 1972 में राष्ट्रीय पशु शेर के स्थान पर बाघ को अपना लिया गया। वैसे बाघ भी अच्छा जानवर है मगर शेर के मुक़ाबले कहीं नहीं टिकता। तो बात ये है की राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हो गया, टीपू सुल्तान ने बाघ को अपने राज्य का प्रतीक बनाया, अपने झंडे में बाघ का चित्र लगाया। इस के अलावा शायद ही किसी राजा ने बाघ को राजप्रतीक बनाया हो। इस टीपू सुल्तान को सम्मान देने के लिए उस के वंशजों ने बाघ को राष्ट्र पशु घोषित कर दिया। 46 साल हो गए, मगर देश के किसी सरकारी ग़ैर सरकारी प्रतीकों में बाघ नहीं है। केवल RBI को छोड़ कर। RBI आज़ादी से पहले अंगरेजो ने बनाया था। पिछले साल 5 Oct को गिर में 23 शेरों को मौत हो गयी थी। अभी लास्ट जहाँ तक मेरे को याद है इस समय 2200 बाघ हैं और केवल 411 शेर, जिस में से 23 ये निपट गए थे। टाइगर रिज़र्व प्रोजेक्ट चलता है भारत में UN और वर्ल्ड बैंक की मदद से। इस को बोलते है ग़ुलामी नस नस में भर देना। जिस वस्तु से हिंदू धर्म जूड़े गा उस को मिटा दिया जाएगा। अब भारत के किसी प्रतीक में बाघ नहीं लगा पाए मगर........ पहला नवरात्रा है। ओ माँ शेरावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ शेरावाली शेरावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, अब इस में से शेर हटा दो बाघ लगा दो, टीपू सुल्तान का बाघ। ओ माँ बाघावाली, ओ माँ मेहरावली मेरी बिगड़ी तू बनादे, ओ माँ बाघावाली बाघावाली करती बेड़ा पार है, सबसे बड़ी मेरी मैया की सरकार है, 1972 से ये खेल चालू है आज माँ की फ़ोटो से शेर ग़ायब हो गया वहाँ बाघ आ गया। दुर्गा माँ का वाहन शेर है बाघ नहीं। 1972 के आस पास ही संतोषी माता प्रकट हुयी थी अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में, उस ही समय साई प्रकट हुए ऋषि कपूर की क़व्वाली में इस ही समय राष्ट्रीय पशु शेर से बाघ हुआ। टीपू सुल्तान का बाघ। आज दुर्गा माँ को भी बाघ में बैठा दिया। दुर्गा माँ संतोषी माँ नहीं है। जय माँ दुर्गा, जय माँ शेरावाली
बुधवार, 11 सितंबर 2019
शासन व समाज व्यवस्था के विकृतिकरण से संपूर्ण व्यवस्था का ढांचा चरमराया
अब्राह्मिक संस्कृतियों क्रिश्चियनिटी और इस्लाम वअंग्रेजों के आक्रमण के पहले का भारत का विवेचन करें तो आपको दो सत्ताए से भारत का संचालन होता रहा है एक धर्म सत्ता और दूसरी राज सत्ता है जिसमें धर्म सत्ता का राज्य सत्ता के ऊपर हमेशा ही प्रभुत्व रहा है और समाज को मार्गदर्शन करने वाली धर्म सत्ता से समाज और पुष्पित पल्लवित होता था और समाज की व्यवस्थाएं निर्बाध रूप से चलता रहा पर आज यहां इस देश में दो धाराएं चल रही है
एक तरह समाज दूसरी तरफ है शासन, समाज व्यवस्थाओं के द्वारा, मूल्यों के द्वारा संचालित किया जाता है और शासन कानून के द्वारा, भय के द्वारा संचालित होता है।
अब विचार ना आपको है कि आप व्यवस्था चाहते हो या शासन,मूल्य चाहते हो या कानून। समाज को जीवित करना चाहते हो या शासन को लादना, क्योंकि आज मैं देख रहा हूं कि समाज धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, मुल्य मिटते जा रहे हैं, व्यवस्थाएं तोड़ी जा रही है और शासन, कानून के द्वारा पूरे मानव समाज को कंट्रोल करने की कोशिश हो रही है।
बहुत कोशिश कर चुके पर दिन पर दिन आतंकवाद, हिंसा,तनाव, युद्ध रुके क्या? खासतौर से भारत देश में।क्योकि भारत की प्रजा आस्थाओं के साथ, धार्मिक मान्यताओं के साथ, मूल्य के साथ जीती आई है। मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ और फिर अगर आवश्यकता पड़ी तो शासन और कानून का उपयोग करो नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि हर आदमी एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखेगा। चारों तरफ अविश्वास तनाव नफरत व भय होगा।, आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना पर यह कंट्रोल नहीं होने का और पूरा मानव समाज एक विकृत अवस्था में पहुंच जाएगा।
आज समाज में मूल्य तो रहे नहीं, देखो ना ध्यान से एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को ईमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उसकी हालत क्या है? पांच से ₹10000 महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं है, विचार करो 5 से 10000 में एक परिवार का केवल और केवल भोजन का खर्च भी नहीं निकल सकता पढ़ाई का, दवाई का और अन्य खर्चे की बात तो अलग। दूसरी तरफ इसी देश में एक लाख दो लाख ₹500000 रोज के भी कमाने वाले लोग हैं। यह इतनी बड़ी विषमता की खाई कंहा ले जायेगी हमे?
हमारे यहां एक व्यक्ति हुआ जिसने आदिवासियों का, ग्रामीण वासियों का, मेहनतकश का, किसानों का धन लूट लूट कर सोने की लंका बनाई थी,पर उसे हम आज भी जलाते हैं और राक्षस की श्रेणी में रखते हैं। पर आज यह राक्षस क्या हमारी समझ में आ रहे हैं? मैं मानता हूं की नहीं, इसीलिए नए कानून के द्वारा समाज को कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है पर जब समाज में मूल्य नहीं होंगे सब समाज में ठीक व्यवस्था ही नहीं होगी तो रावण की तरह मानव समाज को कंट्रोल कर पाओगे? समझ लेना बिल्कुल नहीं। उसमें ना तो आज के रावण सुखी होंगे और ना ही पूरी प्रजा, हम लेते जरूर है राम का नाम पर समझे कहां है राम को?
राम का मतलब है जो आम आदमी के साथ जीता हो, जो अंतिम आदमी के बारे में सोचता हो, जो बनवासीयों के साथ अपनेपन के भाव से जीता हो।और उनके अंदर जीने का विश्वास भरता हो, वह है राम।और जो अंत में उपभोक्तावादी शोषण पर आधारित विकास के माड़ल को नाकारता हो।
मित्रों पहले समाज को बचाओ, मूल्यों को बचाओ, फिर अगर आवशकता पड़ी तब कानूनो का उपयोग करो, नहीं तो धीरे-धीरे स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी कि आदमी एक दूसरे को शंका की भय की दृष्टि से देखेगा, चारों तरफ अविश्वास व नफरत ही होगी। आप कानून के द्वारा कितना भी कंट्रोल कर लेना फिर भी कंट्रोल नहीं होने का और मानव समाज अव्यवस्था में पहुंच जाएगा । आज समाज में मुल्यों की क्या दशा है, देख ध्यान से, एक तरफ किसान कारीगर छोटा-मोटा दुकानदार जो मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार को इमानदारी के साथ पालने का प्रयास करता था आज उस की हालात क्या है? 5 से 10 हजार रुपए महीने की भी इस महंगाई के युग में उसको गारंटी नहीं, तब जियेगा कैसे? और जब जी नहीं पाएगा तो जाने अनजाने में अपराध करने के लिए मजबूर होगा और यह अपराधी धीरे धीरे मानव समाज के अंदर विकृती पैदा करेंगे, युद्धों को आतंकवाद को हिंसा को जन्म देंगे। क्या हम यही चाहते हैं मैं मानता हूं बिल्कुल नहीं।
इसलिए हमको विचार करना होगा कि हम विकास किसे कहेंगे? हमें किस तरफ आगे बढ़ना है, हमें समाज को भी जीवित करना है या नहीं? सरकार ने अब हिंदुओं की परिवार व्यवस्था का तो भोग डाल दिया । गर्ल फ्रेंड को सुरक्षा देनें के लिये भी सरकार यह कानून लाये कि हिन्दू युवक केवल एक गर्ल फ्रेंड ही बना सकता है लेकिन हिन्दू युवती कितने मर्ज़ी बॉय फ्रेंड बना सकती है । यह असली वीमेन एम्पावरमेंट होगी ।
इस घटिया संविधान में हिन्दू परिवार व्यवस्था की सरकार ,संविधान और अदालतें कैसे जड़ें काट रहीं हैं । उसकी एक बानगी देखिये
1. आपकी पत्नी चाहे जितने मर्ज़ी जुल्म ढाए ,चाहे तलाक ना देकर जितनी मर्ज़ी गुलछर्रे उड़ाएं आप दूसरी शादी नहीं कर सकते । लेकिन आप गर्ल friend जितनी मर्ज़ी रख सकते हो ।
2. 16 वर्ष का हिन्दू युवक और युवती शादी नहीं कर सकते लेकिन sex कर सकतें हैं ।
3.यहाँ पर गर्भपात करवाना अधिकार है और हिन्दू औरत को धर्म युक्त सनातन पैदा करने के लिये कहना अपराध है ।
4.यहां हिंदुओं के विवाह को सरकार ने अपराध बना दिया है और live in relation को कानूनी मान्यता दे दी है ।
5.हिंदुओं का विवाह illegal है और वेश्यावृत्ति legal । सरकार ने कोर्ट की मार्फ़त यह कानून बनवा दिया है ।
6 .जल्द ही martial rape का कानून सरकार कोर्ट के माध्यम से पास करवाने जा रही इसके बाद शादी बलात्कार बन जाएगी जिसके बाद हर हिन्दू पति सरकार द्वारा certified बलात्कारी बना दिया जाएगा ।
अगर स्वतंत्रता के बाद ये सरकारें हिन्दुओं के हित में काम कर रही है तो हिन्दू विरोधी सरकार की परिभाषा क्या है ।
अगर हिंदुओं को अब भी लगता है कि यह आज़ादी उनकी है तो वह नितांत मूर्ख हैं । यह संविधान ,सरकार और व्यवस्था केवल हिंदुओं की जड़ें काटने पर तुली है । हिंदुओं के लिये इस आज़ादी का कोई मतलब नहीं ।संपादन अजय कर्मयोगी
बुधवार, 4 सितंबर 2019
पुरी के जगन्नाथ मंदिर के क्षेत्र में 600 साल पुराना बड़ा अखाड़ा मठ को ध्वस्त किया गया जनता में रोष और विरोध
ढहाया जा रहा है ६०० साल पुराना ‘बडा अखाडा’ मठ, राजनीतिक दल विरोध पर उतरे
भुवनेश्वर : पुरी के जगन्नाथ मंदिर के ७५ मीटर के दायरे में आने वाले मठों व अन्य ढांचों को गिराने का मुद्दा राजनीतिक बनता जा रहा है। एमार मठ के बाद अब साधुओं के ‘बडे अखाडे’ का नंबर है। मठों के ध्वस्तीकरण का राजनीतिक लोगों के साथ ही अन्य वर्ग भी विरोध करने लगे हैं।
१२वीं शताब्दी के श्रीजगन्नाथ मंदिर की सुरक्षा के मद्देनजर ७५ मीटर के दायरे में आने वाले वाले निर्माण को अवैध बताकर ढहाया जा रहा है। मठों को ढहाने की कार्रवाई के विरोध में पुरी के शंकराचार्य समेत भाजपा और कांग्रेस ( Odisha Congress ) विरोध कर रही है जबकि बीजेडी ( BJD ) पक्ष में माहौल बनाने में जुटी है। बीते दिनों इस दायरे में आने वाले एमार मठ को ध्वस्त किया गया। एमार मठ लगभग ९०० साल पुराना है। इसका थोडा हिस्सा बाकी है जहां पर मठ के महंत ध्यान मुद्रा में बैठे बताए जाते हैं। मठ ढहाने का विरोध करने का उनका अपना तरीका है। हालांकि गणेश चतुर्थी की छुट्टी के कारण ध्वस्तीकरण बंद है पर राजनीति में हलके में मुद्दा गरम है। श्रीमंदिर की मेघनाद दीवार से लगे लांगुली मठ और एमार मठ गिराने के बाद ओडिशा की धार्मिक राजधानी पुरी में मठ संस्कृति प्रभावित हुई है।
मठ ढहाना बडा दु:खद
एमार मठ के बाद बडा अखाडा मठ गिराया जाएगा। बडा अखाडा मठ के महंत हरिनारायण दास का कहना है कि मठों के ढहाए जाने का दृश्य देखकर दुख होता है। जनता मौन होकर तमाशा देख रही है और मठ तोडे जा रहे हैं। मठों की प्राचीन संस्कृति और परंपरा के संरक्षण को खत्म किया जा रहा है और लोग चुप हैं। इस मठ के लोग शिफ्टिंग की तैयारी में जुटे हैं।
कांग्रेस ने बताया निंदनीय
सत्ताधारी दल बीजू जनता दल को छोडकर बाकी दल पुरी में चलाए जा रहे ध्वस्तीकरण अभियान को लेकर राज्य में नवीन पटनायक सरकार को घेरने में जुट गए हैं। कांग्रेस के विधायक सुरेश राउत कहते हैं कि हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा खंडित की जा रही है, यह निंदनीय है।
रोजगार पर संकट
मठों से हजारों लोगों की रोजी रोटी जुड़ी है जिसे समाप्त किया जा रहा है। सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। पुरी से भाजपा विधायक जयंत षाडंगी ने मठ ध्वस्तीकरण कार्रवाई की निंदा की। उन्होंने इसे सरकार का अनुचित कार्य बताया। विधायक जयंत का कहना है कि नवीन सरकार को मठों को गिराने से पहले लोगों से राय मशविरा करना चाहिए था। राज्य सरकार के विधि मंत्री प्रताप जेना ने कहा कि लोगों को श्रीमंदिर की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के लिए की जा रही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का स्वागत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि श्रीमंदिर पर किसी तरह की राजनीति करना उचित है।
नागा साधुओं ने स्थापित किया था बडा अखाडा
इतिहासकारों का कहना है कि ‘बडा अखाडा’ मठ १४०२ में नागा साधुओं द्वारा स्थापित किया गया था। इस मठ का उद्देश्य बाहरी आक्रांताओं से श्रीजगन्नाथ मंदिर को बचाना था। यह पुरी तीर्थस्थल आने वाले साधुओं के लिए प्रमुख पवित्र स्थल माना जाता है। बताते हैं कि १४ शताब्दी में श्रीरामानंद का पुरी आना हुआ। उन्होंने मंदिरों की रक्षा के लिए कुछ केंद्र स्थापित किए जिन्हें अखाडा कहा जाता है। यहां पर स्थापना के बाद से ही रीतिनीति और नाम संकीर्तन नियमित होता रहता है। जगन्नाथ संस्कृति और रीतिनीति का यह भी हिस्सा बन चुका है।
बुधवार, 28 अगस्त 2019
लुप्त हो चुकी 133 चिकित्सा पद्धतियों को पुनर्स्थापित करने का समय आ गया है
सोमवार, 26 अगस्त 2019
अंतर्राष्ट्रीय साजिशों का शिकार भोजन में साइनाइड का जहर
जनसंख्या वृद्धि रोकने का रास्ता !!! **********************
सावधान आपके खाने और दवाइयों में
साइनाइड नामक प्राणघातक जहर
मिलाकर खिलाया जा रहा है
जानिए क्या है साइनाइड (Cyanide) नामक जहर !!!
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शायद आपने पहले कभी SIDE EFFECT OF CYANIDE के बारे में ना सुना हो,लेकिन यह एक अंतर्राष्ट्रीय साजिस है जिसका शिकार लगभग पच्चास प्रतिशत भारतीय है.दोस्तों आप से निवेदन है की यह पोस्ट सभी लोग सम्पुर्ण ध्यान से पढ़ें और इसे समझें , जो नहीं समझना चाहता वह जहर खाओ.सावधान आपके अन्न और दवाओं में साइनाइड प्राणघातक जहर मिलाया जा रहा है.यह एक घातक जहर है.चौंकिए मत ..यह बिलकुल सत्य है ,आजकल आपने देखा होगा के एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति कुछ काम करते करते अचानक मर जाता है और मृत्यु का कारण पता नहीं चलता ,ऐसी घटनाएं आम हो रही है.आइये देखते है ऐसे खाद्य पदार्थ और दवाएं जिसमे साइनाइड विष मिलाया जा रहाहै.
1) नमक .. आपके नमक के पैकेट को ध्यान से देखिये यदि उस पर crystal modifier या E-536 लिखा हुआ है तो नमक में पोटेशियम फेरो साइनाइड मिला हुआ है जिसके एक केमिकल अणु में 6 साइनाइड के परमाणु है जिसका केमिकल फार्मूला (K4Fe(CN)6) है .
यद्यपि यह अल्प मात्रा में होता है जैसे ही यह हमारे पेट में पहुँचता है उदर में उपस्थित पाचक अम्ल hcl से रिएक्ट कर के पोटेशियम और फेरोसाईनाइड के पोसिटिव और नेगेटिव आयन बनाता है और फेरोसाइनाइड पेट में उत्पन्न hcl से रिएक्ट कर के फेर्रस क्लोराइड और हाइड्रोजन साइनाइड बनाता है जो अत्यंत जहरीला विष है इस विष को डीटॅक्सीफाई या प्रभावहीन बनाने के लिए लिवर पर अत्यधिक दबाव पडता है प्रतिदिन इस धीमे जहर मिले हुए नमक खाने से कुछ महीनो या वर्षो में आप मृत्यु के निकट पहुँच सकते है.
2) विटामिन बी सबसे ज्यादा खाया जाने वाला विटामिन है इस बी काम्प्लेक्स विटामिन में एक जहरीला पदार्थ है साईनाकोबलामिन या b12 (cyanocobalamin) ये आपके पेट या खून में पहुँच कर साइनाइड के अणु छोड़ता है ..सावधान यदि आपके बी काम्प्लेक्स कैप्सूल टैबलेट या इंजेक्शन में b12 सैनकोबाल्मिन है तो मत लीजिये चाहे डॉक्टर कितना भी आश्वाशन दे ।मार्किट में 99% बी काम्प्लेक्स विटामिन में बी12 cyanocobalamin होता है केवल 1 % दावा कम्पनियाँ ही methylcobalamin b12 बनाती है जो खाने में सेफ है सुरक्षित है , इसीलिए विटामिन बी खरीदते समय केवल methylcobalamin b12 युक्त ही ख़रीदे
3) मार्च 2017 में सरकार ने नया फरमान जारी किया है अब गेहूँ के आटे जैसे आशीर्वाद पिल्सबरी पतंजलि आदि में साइनाइड मिला हुआ b12 cyanocobalamin विटामिन डालना अनिवार्य कर दिया है (फोर्टिफाइड आटा)
सरकार ने सुरक्षित b12 methylcobalamin को प्रस्तावित क्यों नहीं किया ? क्या सरकार को नहीं मालूम के तवे के ताप में गेहू की रोटियाँ सेकने पर गर्मी से विटामिन बी पूरी तरह नष्ट हो जाता है और बचते है सिर्फ जहरीले साइनाइड के अणु जो गर्मी से नष्ट नहीं होते ..तो आटे के फोर्टीफिकेशन का क्या फायदा और उपयोग है ? … या सरकार जानबूझ कर अन्न पदार्थो में जहर मिला रही है ?
चौकिये मत सरकार पर छुपी हुई अंतरराष्ट्रीय वैश्विक दानवी सरकार (hidden world government) का दबाव है कि भारत की जनसँख्या कम करने के लिए ये एक कोवर्ट डीपापुलेशन प्रोग्राम है जिसे विस्तार पूर्वक बताऊंगा पढ़ कर होश उड़ जाएंगे,आइये देखते है कुछ और डी-पापुलेशन केमिकल पदार्थ .
आयोडीन नमक विश्व का सबसे बड़ा जंनसंख्याविहिनिकरण (डीपापुलेशन) षड्यंत्र
आज से लगभग 30-40 साल पहले जनता को आयोडीन नमक के बारे में बिलकुल पता नहीं था , जनता में आयोडीन की कमी नहीं थी,यदि मानव इतिहास देखे तो जीसस क्राइस्ट काल या उससे भी पहले पाँच हज़ार वर्ष पूर्व महाभारत या दस लाख वर्ष पूर्व रामायण पुराण आदि में एक भी उदहारण प्राप्त नहीं होता जहां आयोडीन के कमी के लक्षण दिखाई देवे।अचानक ही लगभग 30 साल पहले सरकार ने लाखों करोडो का टीवी और समाचार पत्र में विज्ञापन दे दे कर ब्रेनवाश शुरू किया कि भारत में आयोडीन की कमी है बच्चो के मानसिक विकास के लिए आयोडीन युक्त नमक ही खाये और भोली भारत की जनता ने इसे आदर्श मान लिया, तब भारत में बर्थ रेट 40 प्रति 1000 था.
यही प्रोपेगंडा पकिस्तान में किया गया लेकिन पाकिस्तानी जनता होशियार थी उसने सरकारी आयोडीन नमक को नही ख़रीदा और बाजार में खुला समुद्री नमक ही खरीदने लगी जिसमे आयोडीन जहर नहीं मिलाया गया था, नतीजा पाकिस्तान में सरकार द्वारा प्रायोजित आयोडीन नमक प्रोग्राम फैल हो गया ।आज तीस वर्ष बाद भारत में आयोडीन नमक के कारण बर्थ रेट लगभग 8 प्रति 1000 है. ठीक है जनसँख्या कम होनी चाहिए लकिन ये तरीका ??
भारत में आयोडीन की बिलकुल कमी नहीं है और इसकी पूर्ति दूध और हरी सब्जियों से पूरी हो जाती है आवश्यकता से अधिक आयोडीन खाने से कंठ में स्थित थाइरॉइड ग्रंथि अधिक हार्मोन बनाती है जिससे स्त्रियों में बाँझपन pco अनियमित मासिक स्राव इत्यादि रोग होते है
आज भारत में 70% स्त्रियों में बाँझपन और बच्चे नहीं होने का कारण आयोडीन नमक से उत्पन्न थाइरॉयड समस्या है.
वहीँ पुरुषों में भी आयोडीन नमक से hyperthyroidism के कारण उच्च रक्तचाप मानसिक तनाव अनिद्रा ह्रदय में तेज़धड़कन नपुंसकता आदि रोग होते है आज भारत की जनता को गिनी पिग बना कर आयोडीन नमक के एक्सपेरीमेन्ट के कारण कई परिवारों के अस्तित्व समाप्त हो गए है जनता अब जागरूक हो रही है और धीरे धीरे सब पता चल रहा है इसीलिए अब सरकार सारा दोष टाटा कंपनी पर डाल रही है के टाटा कम्पनी ने सरकार पर दबाव बना कर टाटा नमक में आयोडीन जहर मिलाया,वास्तव में इसे एक फाल्सफ्लैग आपरेशन कहते है जिससे जनता का गुस्सा सरकार से हट कर टाटा पर जाए और जनता टाटा को ही दोषी समझे।
लेकिन अब सत्य का पता चल गया है सरकार ने आयोडीन जहर के एक्सपेरीमेन्ट के लिए टाटा को बलि का बकरा बनाया ।
यदि भारत में आयोडीन नमक (इसका विकल्प सादा खुला बिकने वाला समुद्री नमक और सेन्धा नमक है) , रिफाइंड तेल (इसका विकल्प मूंगफली सरसो जैतून तिल आदि खरीद कर तेल निकलवाए) फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट , अंग्रेजी दर्दनिवारक दवाएं जैसे ब्रूफिन डिक्लोफेनेक असेक्लोफेनेक, आटे और ब्रेड में ब्रोमाइड ,पेप्सी कोला आदि कूलड्रिंक ,पानी में क्लोरीन ब्लीच (इसका विकल्प ओज़ोन है)और एंडोसल्फान जैसे कीटनाशक बन्द हो गए तो भारत में कैंसर ह्रदय थाइरॉइड और किडनी रोग ख़त्म और भारत के 80-90% अस्पताल बन्द हो जाएंगे
1) फ्लोराइड जो टूथपेस्ट में मिलाया जाता है वह जहर है आप केवल बिना फ्लोराइड के टूथपेस्ट का ही इस्तेमाल कीजिये
2) ओरल पोलियो वेक्सीन जिसमे sv40 नामक कैन्सर उत्पन्न करने वाले वाइरस को मिलाया गया है (गूगल सर्च कीजिये)
3)टेटनस टैक्सओइड वेक्सीन (टीटी इंजेक्शन) में स्त्रियों को बाँझ बनाने की दवा की मिलावट .. अपनी लाडली बेटियों को कभी भी टीटी का इंजेक्शन न दिलाये शायद वे जिंदगी में कभी माँ न बन पायेगी क्योकि उसमे anti -HCG antibody की मिलावट की गयी है,विश्वास नहीं हो रहा है tetanus HCG Kenya लिख कर गूगल कीजिये अभी तो केन्या की रिपोर्ट आई है लेकिन भारत में बीस साल पहले यह प्रयोग हो चुका है अब भी जारी है.
*Health-Tips*
*हमेशा काम आने वाले 51 अचूक नुस्खे*
हमारे जीवन में रोगों का प्रभाव पड़ता ही रहता है -हम छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज स्वयं कर सकते है आज हम आप के लिए लाये हैं साधारण छोटे-छोटे प्रयोग जिनको आप अवश्य अपनाए कुछ प्रयोग नीचे दिए गए है जो आपके घर में ही उपलब्ध है अजमाए और लाभ ले –
*1.दमे के लिये तुलसी और वासा:-*
दमे के रोगियों को तुलसी की १० पत्तियों के साथ वासा (अडूसा या वासक) का २५० मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर दें। लगभग २१ दिनों तक सुबह यह काढ़ा पीने से आराम आ जाता है-
*2.मौसमी खाँसी के लिये सेंधा नमक:-*
सेंधा नमक की लगभग 5 ग्राम डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी से आराम मिलता है। नमक की डली को सुखाकर रख लें एक ही डली का बार बार प्रयोग किया जा सकता है-
*3.बैठे हुए गले के लिये मुलेठी का चूर्ण:-*
मुलेठी के चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर खाने से बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है। या सोते समय एक ग्राम मुलेठी के चूर्ण को मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर वैसे ही मुँह में रखकर जाएँ। प्रातः काल तक गला साफ हो जायेगा। गले के दर्द और सूजन में भी आराम आ जाता है-
*4.मुँह और गले के कष्टों के लिये सौंफ और मिश्री:-*
भोजन के बाद दोनों समय आधा चम्मच सौंफ चबाने से मुख की अनेक बीमारियाँ और सूखी खाँसी दूर होती है, बैठी हुई आवाज़ खुल जाती है, गले की खुश्की ठीक होती है और आवाज मधुर हो जाती है-
*5.खराश या सूखी खाँसी के लिये अदरक और गुड़:-*
गले में खराश या सूखी खाँसी होने पर पिसी हुई अदरक में गुड़ और घी मिलाकर खाएँ। गुड़ और घी के स्थान पर शहद का प्रयोग भी किया जा सकता है। आराम मिलेगा-
*6.पेट में कीड़ों के लिये अजवायन और नमक:-*
आधा ग्राम अजवायन चूर्ण में स्वादानुसार काला नमक मिलाकर रात्रि के समय रोजाना गर्म जल से देने से बच्चों के पेट के कीडे नष्ट होते हैं। बडों के लिये- चार भाग अजवायन के चूर्ण में एक भाग काला नमक मिलाना चाहिये और दो ग्राम की मात्रा में सोने से पहले गर्म पानी के साथ लेना चाहिये-
*7.अरुचि के लिये मुनक्का हरड़ और चीनी:-*
भूख न लगती हो तो बराबर मात्रा में मुनक्का (बीज निकाल दें), हरड़ और चीनी को पीसकर चटनी बना लें। इसे पाँच छह ग्राम की मात्रा में (एक छोटा चम्मच), थोड़ा शहद मिला कर खाने से पहले दिन में दो बार चाटें-
*8.बदन के दर्द में कपूर और सरसों का तेल:-*
10 ग्राम कपूर, 200 ग्राम सरसों का तेल – दोनों को शीशी में भरकर मजबूत ठक्कन लगा दें तथा शीशी धूप में रख दें। जब दोनों वस्तुएँ मिलकर एक रस होकर घुल जाए तब इस तेल की मालिश से नसों का दर्द, पीठ और कमर का दर्द और, माँसपेशियों के दर्द शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं-
*9.जोड़ों के दर्द के लिये बथुए का रस:-*
बथुआ के ताजा पत्तों का रस पन्द्रह ग्राम प्रतिदिन पीने से गठिया दूर होता है। इस रस में नमक-चीनी आदि कुछ न मिलाएँ। नित्य प्रातः खाली पेट लें या फिर शाम चार बजे। इसके लेने के आगे पीछे दो-दो घंटे कुछ न लें। दो तीन माह तक लें-
*10.पेट में वायु-गैस के लिये मट्ठा और अजवायन:-*
पेट में वायु बनने की अवस्था में भोजन के बाद 125 ग्राम दही के मट्ठे में दो ग्राम अजवायन और आधा ग्राम काला नमक मिलाकर खाने से वायु-गैस मिटती है। एक से दो सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दिन के भोजन के पश्चात लें-
*11.फटे हाथ पैरों के लिये सरसों या जैतून का तेल:-*
नाभि में प्रतिदिन सरसों का तेल लगाने से होंठ नहीं फटते और फटे हुए होंठ मुलायम और सुन्दर हो जाते है। साथ ही नेत्रों की खुजली और खुश्की दूर हो जाती है-
*12.सर्दी बुखार और साँस के पुराने रोगों के लिये तुलसी:-*
तुलसी की 21 पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भाँति पीस लें और 10 से 30 ग्राम मीठे दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खाएँ। दही खट्टा न हो। यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम तुलसी की चटनी शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भूलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं-
*13.अधिक क्रोध के लिये आँवले का मुरब्बा और गुलकंद:-*
बहुत क्रोध आता हो तो सुबह आँवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन खाएँ और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दूध पी लें। क्रोध आना शांत हो जाएगा-
*14.घुटनों में दर्द के लिये अखरोट:-*
सवेरे खाली पेट तीन या चार अखरोट की गिरियाँ खाने से घुटनों का दर्द मैं आराम हो जाता है-
*15.काले धब्बों के लिये नीबू और नारियल का तेल:-*
चेहरे व कोहनी पर काले धब्बे दूर करने के लिये आधा चम्मच नारियल के तेल में आधे नीबू का रस निचोड़ें और त्वचा पर रगड़ें, फिर गुनगुने पानी से धो लें-
*16.कोलेस्ट्राल पर नियंत्रण सुपारी से:-*
भोजन के बाद कच्ची सुपारी 20 से 40 मिनट तक चबाएँ फिर मुँह साफ़ कर लें। सुपारी का रस लार के साथ मिलकर रक्त को पतला करने जैसा काम करता है। जिससे कोलेस्ट्राल में गिरावट आती है और रक्तचाप भी कम हो जाता है-
*17.मसूढ़ों की सूजन के लिये अजवायन:-*
मसूढ़ों में सूजन होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूँदें पानी में मिलाकर कुल्ला करने से सूजन में आराम आ जाता है-
*18.हृदय रोग में आँवले का मुरब्बा:-*
आँवले का मुरब्बा दिन में तीन बार सेवन करने से यह दिल की कमजोरी, धड़कन का असामान्य होना तथा दिल के रोग में अत्यंत लाभ होता है, साथ ही पित्त, ज्वर, उल्टी, जलन आदि में भी आराम मिलता है-
*19.शारीरिक दुर्बलता के लिये दूध और दालचीनी:-*
दो ग्राम दालचीनी का चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ लेने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है और शरीर स्वस्थ हो जाता है। दो ग्राम दालचीनी के स्थान पर एक ग्राम जायफल का चूर्ण भी लिया जा सकता है-
*20.हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये दूध और काली मिर्च:-*
हकलाना या तुतलाना दूर करने के लिये 10 ग्राम दूध में 250 ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर रख लें। 2-2 ग्राम चूर्ण दिन में दो बार मक्खन के साथ मिलाकर खाएँ-
*21.श्वास रोगों के लिये दूध और पीपल:-*
एक पाव दूध में 5 पीपल डालकर गर्म करें, इसमें चीनी डालकर सुबह और ‘शाम पीने से साँस की नली के रोग जैसे खाँसी, जुकाम, दमा, फेफड़े की कमजोरी तथा वीर्य की कमी आदि रोग दूर होते हैं-
*22.अच्छी नींद के लिये मलाई और गुड़:-*
रात में नींद न आती हो तो मलाई में गुड़ मिलाकर खाएँ और पानी पी लें। थोड़ी देर में नींद आ जाएगी-
*23.कमजोरी को दूर करने का सरल उपाय:-*
एक-एक चम्मच अदरक व आंवले के रस को दो कप पानी में उबाल कर छान लें। इसे दिन में तीन बार पियें। स्वाद के लिये काला नमक या शहद मिलाएँ-
*24.घमौरियों के लिये मुल्तानी मिट्टी:-*
घमौरियों पर मुल्तानी मिट्टी में पानी मिलाकर लगाने से रात भर में आराम आ जाता है-
*25.पेट के रोग दूर करने के लिये मट्ठा:-*
मट्ठे में काला नमक और भुना जीरा मिलाएँ और हींग का तड़का लगा दें। ऐसा मट्ठा पीने से हर प्रकार के पेट के रोग में लाभ मिलता है। यह बासी या खट्टा नहीं होना चाहिये-
*26.खुजली की घरेलू दवा:-*
फटकरी के पानी से खुजली की जगह धोकर साफ करें, उस पर कपूर को नारियल के तेल मिलाकर लगाएँ लाभ होगा-
*27.मुहाँसों के लिये संतरे के छिलके:-*
संतरे के छिलके को पीसकर मुहाँसों पर लगाने से वे जल्दी ठीक हो जाते हैं। नियमित रूप से ५ मिनट तक रोज संतरों के छिलके का पिसा हुआ मिश्रण चेहरे पर लगाने से मुहाँसों के धब्बे दूर होकर रंग में निखार आ जाता है-
*28.बंद नाक खोलने के लिये अजवायन की भाप:-*
एक चम्मच अजवायन पीस कर गरम पानी के साथ उबालें और उसकी भाप में साँस लें। कुछ ही मिनटों में आराम मालूम होगा-
*29.चर्मरोग के लिये टेसू और नीबू:-*
टेसू के फूल को सुखाकर चूर्ण बना लें। इसे नीबू के रस में मिलाकर लगाने से हर प्रकार के चर्मरोग में लाभ होता है-
*30.माइग्रेन के लिये काली मिर्च, हल्दी और दूध:-*
एक बड़ा चम्मच काली मिर्च का चूर्ण एक चुटकी हल्दी के साथ एक प्याले दूध में उबालें। दो तीन दिन तक लगातार रहें, माइग्रेन के दर्द में आराम मिलेगा।
*31.गले में खराश के लिये जीरा:-*
एक गिलास उबलते पानी में एक चम्मच जीरा और एक टुकड़ा अदरक डालें ५ मिनट तक उबलने दें। इसे ठंडा होने दें। हल्का गुनगुना दिन में दो बार पियें। गले की खराश और सर्दी दोनों में लाभ होगा-
*32.सर्दी जुकाम के लिये दालचीनी और शहद:-*
एक ग्राम पिसी दालचीनी में एक चाय का चम्मच शहद मिलाकर खाने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है-
*33.टांसिल्स के लिये हल्दी और दूध:-*
एक प्याला (200 मिलीली.) दूध में आधा छोटा चम्मच (2 ग्राम) पिसी हल्दी मिलाकर उबालें। छानकर चीनी मिलाकर पीने को दें। विशेषरूप से सोते समय पीने पर तीन चार दिन में आराम मिल जाता है। रात में इसे पीने के बात मुँह साफ करना चाहिये लेकिन कुछ खाना पीना नहीं चाहिये-
*34.ल्यूकोरिया से मुक्ति:-*
ल्यूकोरिया नामक रोग कमजोरी, चिडचिडापन, के साथ चेहरे की चमक उड़ा ले जाता हैं। इससे बचने का एक आसान सा उपाय- एक-एक पका केला सुबह और शाम को पूरे एक छोटे चम्मच देशी घी के साथ खा जाएँ 11-12 दिनों में आराम दिखाई देगा। इस प्रयोग को 21 दिनों तक जारी रखना चाहिए-
*35.मधुमेह के लिये आँवला और करेला:-*
एक प्याला करेले के रस में एक बड़ा चम्मच आँवले का रस मिलाकर रोज पीने से दो महीने में मधुमेह के कष्टों से आराम मिल जाता है-
*36.मधुमेह के लिये कालीचाय:-*
मधुमेह में सुबह खाली पेट एक प्याला काली चाय स्वास्थ्यवर्धक होती है। चाय में चीनी दूध या नीबू नहीं मिलाना चाहिये। यह गुर्दे की कार्यप्रणाली को लाभ पहुँचाती है जिससे मधुमेह में भी लाभ पहुँचता है-
*37.उच्च रक्तचाप के लिये मेथी:-*
सुबह उठकर खाली पेट आठ-दस मेथी के दाने निगल लेने से उच्चरक्त चाप को नियंत्रित करने में सफलता मिलती है-
*38.माइग्रेन और सिरदर्द के लिये सेब:-*
सिरदर्द और माइग्रेन से परेशान हों तो सुबह खाली पेट एक सेब नमक लगाकर खाएँ इससे आराम आ जाएगा-
*39.अपच के लिये चटनी:-*
खट्टी डकारें, गैस बनना, पेट फूलना, भूक न लगना इनमें से किसी चीज से परेशान हैं तो सिरके में प्याज और अदरक पीस कर चटनी बनाएँ इस चटनी में काला नमक डालें। एक सप्ताह तक प्रतिदिन भोजन के साथ लें, आराम आ जाएगा-
*40.मुहाँसों से मुक्ति:-*
जायफल, काली मिर्च और लाल चन्दन तीनो का पावडर बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। रोज सोने से पहले 2-3 चुटकी भर के पावडर हथेली पर लेकर उसमें इतना पानी मिलाए कि उबटन जैसा बन जाए खूब मिलाएँ और फिर उसे चेहरे पर लगा लें और सो जाएँ, सुबह उठकर सादे पानी से चेहरा धो लें। 15 दिन तक यह काम करें। इसी के साथ प्रतिदिन 250 ग्राम मूली खाएँ ताकि रक्त शुद्ध हो जाए और अन्दर से त्वचा को स्वस्थ पोषण मिले। 15-20 दिन में मुहाँसों से मुक्त होकर त्वचा निखर जाएगी-
*41.जलन की चिकित्सा चावल से:-*
कच्चे चावल के 8-10 दाने सुबह खाली पेट पानी से निगल लें। 21 दिन तक नियमित ऐसा करने से पेट और सीन की जलन में आराम आएगा। तीन माह में यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी-
*42.दाँतों के कष्ट में तिल का उपयोग:-*
तिल को पानी में 4 घंटे भिगो दें फिर छान कर उसी पानी से मुँह को भरें और 10 मिनट बाद उगल दें। चार पाँच बार इसी तरह कुल्ला करे, मुँह के घाव, दाँत में सड़न के कारण होने वाले संक्रमण और पायरिया से मुक्ति मिलती है-
*43.विष से मुक्ति:-*
10-10 ग्राम हल्दी, सेंधा नमक और शहद तथा 5 ग्राम देसी घी अच्छी तरह मिला लें। इसे खाने से कुत्ते, साँप, बिच्छु, मेढक, गिरगिट, आदि जहरीले जानवरों का विष उतर जाता है-
*44.खाँसी में प्याज:-*
अगर बच्चों या बुजुर्गों को खांसी के साथ कफ ज्यादा गिर रहा हो तो एक चम्मच प्याज के रस को चीनी या गुड मिलाकर चटा दें, दिन में तीन चार बार ऐसा करने पर खाँसी से तुरंत आराम मिलता है-
*45.स्वस्थ त्वचा का घरेलू नुस्खा :-*
नमक, हल्दी और मेथी तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, नहाने से पाँच मिनट पहले पानी मिलाकर इनका उबटन बना लें। इसे साबुन की तरह पूरे शरीर में लगाएँ और 5 मिनट बाद नहा लें। सप्ताह में एक बार प्रयोग करने से घमौरियों, फुंसियों तथा त्वचा की सभी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही त्वचा मुलायम और चमकदार भी हो जाती है-
*46.पेट साफ रखे अमरूद:-*
कब्ज से परेशान हों तो शाम को चार बजे कम से कम 200 ग्राम अमरुद नमक लगाकर खा जाएँ, फायदा अगली सुबह से ही नज़र आने लगेगा। 10 दिन लगातार खाने से पुराने कब्ज में लाभ होगा। बाद में जब आवश्यकता महसूस हो तब खाएँ-
*47.बीज पपीते के स्वास्थ्य हमारा:-*
पके पपीते के बीजों को खूब चबा-चबा कर खाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। इन बीजों को सुखा कर पावडर बना कर भी रखा जा सकता है। सप्ताह में एक बार एक चम्मच पावडर पानी से फाँक लेन पर अनेक प्रकार के रोगाणुओं से रक्षा होती है-
*48.मुलेठी पेप्टिक अलसर के लिये:-*
मुलेठी के बारे में तो सभी जानते हैं। यह आसानी से बाजार में भी मिल जाती है। पेप्टिक अल्सर में मुलेठी का चूर्ण अमृत की तरह काम करता है। बस सुबह शाम आधा चाय का चम्मच पानी से निगल जाएँ। यह मुलेठी का चूर्ण आँखों की शक्ति भी बढ़ाता है। आँखों के लिये इसे सुबह आधे चम्मच से थोड़ा सा अधिक पानी के साथ लेना चाहिये-
*49.सरसों का तेल केवल पाँच दिन:-*
रात में सोते समय दोनों नाक में दो दो बूँद सरसों का तेल पाँच दिनों तक लगातार डालें तो खाँसी-सर्दी और साँस की बीमारियाँ दूर हो जाएँगी। सर्दियों में नाक बंद हो जाने के दुख से मुक्ति मिलेगी और शरीर में हल्कापन मालूम होगा-
*50.भोजन से पहले अदरक:-*
भोजन करने से दस मिनट पहले अदरक के छोटे से टुकडे को सेंधा नमक में लपेट कर [थोड़ा ज्यादा मात्रा में ] अच्छी तरह से चबा लें। दिन में दो बार इसे अपने भोजन का आवश्यक अंग बना लें, इससे हृदय मजबूत और स्वस्थ बना रहेगा, दिल से सम्बंधित कोई बीमारी नहीं होगी और निराशा व अवसाद से भी मुक्ति मिल जाएगी-
*51.अजवायन का साप्ताहिक प्रयोग:-*
सुबह खाली पेट सप्ताह में एक बार एक चाय का चम्मच अजवायन मुँह में रखें और पानी से निगल लें। चबाएँ नहीं। यह सर्दी, खाँसी, जुकाम, बदनदर्द, कमर-दर्द, पेटदर्द, कब्जियत और घुटनों के दर्द से दूर रखेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना चाह
-खेगा। 10 साल से नीचे के बच्चों को आधा चम्मच 2 ग्राम और 10 से ऊपर सभी को एक चम्मच यानी 5 ग्राम लेना
मंगलवार, 13 अगस्त 2019
राम के वंशज का यह देश अपने पूर्वजों को भूल चुका है आज इसकी यथार्थ से परिचित होने के लिए अपने पुराणों का सहारा लेना पड़ेगा जिसमें अभी भी विकृति नहीं
भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।
राम ने कुश को दक्षिण कौशल, कुशस्थली (कुशावती) और अयोध्या राज्य सौंपा तो लव को पंजाब दिया। लव ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। आज के तक्षशिला मेँ तब भरत पुत्र तक्ष और पुष्करावती (पेशावर) मेँ पुष्कर सिंहासनारुढ़ थे। हिमाचल में लक्ष्मण पुत्रों अंगद का अंगदपुर और चंद्रकेतु का चंद्रावती में शासन था। मथुरा में शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु का तथा दूसरे पुत्र शत्रुघाती का भेलसा (विदिशा) में शासन था।
राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।
राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बड़गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह राजपूतों का वंश चला।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लवपुरी नगर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं।
कुश के वंशज कौन?
राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।
कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।
इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। माना जाता है कि जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं।
तो यह सिद्ध हुआ कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कछवाह), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वे सभी भगवान प्रभु श्रीराम के वंशज है। जयपूर राजघराने की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे।
इस घराने के इतिहास की बात करें तो 21 अगस्त 1921 को जन्में महाराज मानसिंह ने तीन शादियां की थी। मानसिंह की पहली पत्नी मरुधर कंवर, दूसरी पत्नी का नाम किशोर कंवर था और माननसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से की थी। महाराजा मानसिंह और उनकी पहली पत्नी से जन्में पुत्र का नाम भवानी सिंह था। भवानी सिंह का विवाह राजकुमारी पद्मिनी से हुआ। लेकिन दोनों का कोई बेटा नहीं है एक बेटी है जिसका नाम दीया है और जिसका विवाह नरेंद्र सिंह के साथ हुआ है। दीया के बड़े बेटे का नाम पद्मनाभ सिंह और छोटे बेटे का नाम लक्ष्यराज सिंह है। साभार वेबदुनिया
#श्रीराम_जी_के_वंशज_हैं_रघुवंशी_सूर्यवंशी #रघुवंशी :- रघुवंशी (इक्षवाकु) राजवंश (1000 ईपू. से 364 ईपू. तक) यह भारत का प्राचीन क्षत्रिय कुल है जो भारतवर्ष के सभी क्षत्रीय कुलों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकुल माना जाता है ऐतिहासिक दृष्टि से रघुकुल मर्यादा, सत्य, चरित्र, वचनपालन, त्याग, तप, ताप व शौर्य का प्रतीक रहा है अयोध्या के सूर्यवंशी सम्राट रघु ने इस वंश की नींव रखी थी रघुवंशी का अर्थ है रघु के वंशज।
अर्थात :- सम्राट रघु के वंशज रघुवंशी कहलाते है बौद्ध काल तक रघुवंशियो को इक्ष्वाकु, रघुवंशी तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाता था मूलरुप से यह वंश भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रारम्भ हुआ था जो सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, ककुत्स्थ वंश व रघुवंश नाम से जाना जाता है आदिकाल में ब्रह्मा जी ने भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को पृथ्वी का प्रथम राजा बनाया था।
भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनु जी सूर्यवंशी कहलाये तथा इनसे चला यह वंश सूर्यवंश कहलाया अयोध्या के सूर्यवंश में आगे चल कर प्रतापी राजा रघु हुये राजा रघु से यह वंश रघुवंश कहलाया इस वंश मे इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ, हरिश्चंद्र, मांधाता, सगर, भगीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी राजा हुये हैं रघुवंशियों के कुछ राजाओं कावर्णन रघुवंशकाव्य में दिया गया है।
भारत का इतिहास 700 ई॰पू॰ से प्रमाणिक व सतत् रूप से प्राप्त होता है इस समय का विवरण अष्टाध्यायी सूत्र,अंगूतर निकाय, भगवती सूत्र आदि गृंथो में मिलता 700 ई॰पू॰ में भारत जनपदों में बँटा था इस समय भारत में १६ महाजनपद और इनके अंतर्गत बहुत से छोटे छोटे जनपद थे।
इनमें अवंती, मगध, वत्स और कौशल महाजनपद प्रमुख थे कौशल जनपद पर इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी राजा राहुल (महाकौशला) का शासन था राजा राहुल महाकौशला ने काशी, लुम्बनी, कपिलवस्तु, कौलिय आदि राज्यों को जीत कर एक विशाल सामृाज्य की स्थापना की थी।
कौशल राज्य की राजधानी साकेत (अयोध्या) थी साकेत
(अयोध्या), श्रावस्ती व वाराणसी कौशल राज्य के प्रमुख नगर थे साकेत(अयोध्या) व श्रावस्ती दोनो नगर चारो ओर से चौड़ी चौड़ी दीवारों से घिरे थे चारो दिशाओ में बड़े बड़े दरवाजे थे दरवाजे बड़े बड़े चोड़े व ऊँचे थे जिन पर सुन्दर नक्काशी थी नगरो में चौड़े चौड़े मार्ग थे।
जब रघुवंशी क्षत्रिय हाथी घोड़ो पर सवार होकर इन मार्गो पर निकलते थे तो रघुवंशी क्षत्रियों का वैभव देखते ही बनता था इस समय के साहित्य में कौशल राज्य के वैभव का जो वर्णन मिलता है वह इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी क्षत्रियों के उत्कर्ष की कहानी को व्यक्त करता है।
जो यह बताने के लिये काफी है कि कौशल जनपद पर रघुवंशी क्षत्रिय का शासन बहुत पहले से रहा है महाकौशला के बाद प्रसेनजित, क्षुदृक, रणक, सुरथ, सौमित्र कौशल(अयोध्या) के राजा हुये सौमित्र कौशल(अयोध्या) के अंतिम रघुवंशी राजा थे मगध (नंदवंश) के शासक महापदमनंद ने सौमित्र को हराकर रघुवंशी किंगडम को समाप्त कर दिया था।
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