शनिवार, 26 सितंबर 2020

वर्षा का पूर्वानुमान में चिड़ियों की भूमिका भारत की परंपरा में प्रकृति के साथ संमभाव की संस्कृति वही भारत की सरकारों ने विदेशी सोच और नीति से प्रकृति के साथ टकराव


छब्बीस को परबा, 27 को दूज, 28 को तीज… अपनी अंगुलियों पर तिथि गिनते-गिनते दद्दा अपने छोटे बेटे पर अचानक ही बरस पड़े – ‘क्यों रे तीज सर पे आ गई और गांव वालों को कोई होश नहीं है। गर्मी और बरखा का इंतजाम हर बरस का काम है; इन्द्र देवता पानी दें, तो कटोरा झाड़-पोंछ के तैयार रखना पड़ेगा कि नहीं? ये कोई पहली बार है क्या… पर देखो तो जैसे सबके सब भांग खा के सो रहे हैं; न राय, न मशविरा, न तैयारी, ऐसा अंधेर कब हुआ? सत्यानाश।Ó
दद्दा ने अपनी लाठी उठाई और चल पड़े गांव जगाने। उसी शाम गांव में बैठक हुई। हर साल की तरह तय हुआ – ‘अक्षया तृतीया के दिन हर घर में बेटियों को शर्बत पिलाया जाएगा। राहगीरों की खातिर जेठ अंत तक प्याऊ लगेगी। गांव के पांचों तालाबों की सफाई और मरम्मरत की शुरुआत होगी। खेत भी एक छोटा-मोटा तलाब ही है। सो, खेतों के मेड़ दुरुस्त करने होंगे। सबका इंतज़ाम होगा, तो गोरु-बछरू और चिडिय़ों की प्यास बुझेगी? उनका भी इंतजाम करना होगा। कौन-कौन क्या-क्या करेगा, इसकी जिम्मेदारी तय कर दी गयी।
तैयारी परम्परा
अवध के एक गांव में यह जो कुछ हुआ; भारत के हर इलाके में गर्मी और बारिश आने से पूर्व तैयारी करने की कमोबेश ऐसी ही पानी परम्परा है। पहले दद्दा थे, वे जगा देते थे। समुद्र ने मेघ देवता को भेजा है, हम सभी को पानी पिलाने। पानी अधिकतम साठ दिन बरसेगा। उसी से सालभर काम चलाना है। अगले साल समुद्र ने पानी नहीं भेजा तो उसके लिए भी धरती की तिज़ोरी में Óवाटर बैलेंसÓ सुरक्षित रखना है। एक साल नहीं भेजा तो अकाल, दो साल नहीं भेजा तो दुष्काल और तीन साल नहीं भेजा तो त्रिकाल। अकाल यानी पानी की कमी, दुष्काल यानी पानी और अन्न का संकट और त्रिकाल यानी पानी, अन्न और चारे.. तीनो का संकट अर्थात गऊमार अकाल। माता पर संकट तो संतान पर भी संकट।
त्रिकाल में भी जीवन पर संकट न आये; इसका इंतजाम रहे; हर बारिश में इतना पानी संजोना है। अपने उपयोग हेतु तालाब ऐसी जगह बनाना है, जहां धरती का पेट फटा न हो। ऐसी जगह बनाये तालाब में सालभर पानी रुका रहेगा। कुछ तालाब ऐसी जगह पर बनाने हैं, जहां धरती का पेट फटा हुआ हो। ऐसे तालाब का पानी बहुत जल्दी धरती की तिजोरी में सुरक्षित हो जायेगा। शेष पानी को समुद्र को वापस लौटाना है; तभी तो समुद्र अगले बरस पानी भेजेगा। समुद्र को पानी लौटाने का काम नदियों के जिम्मे है। नदी को अपनी बाढ़ से मिट्टी और भूजल का शोधन करना है। बाढ़ में साथ लाई गाद से मैदान और डेल्टा बनाने हैं। उन्हे शोधित कर उपजाऊ बनाना है। अत: नदियों को उनका काम करने देना है। भारत के पौराणिक ग्रंथ, महात्मा विदुर से लेकर ज्ञानी चाणक्य तक का ज्ञान उठाकर उठाकर देख लीजिए नदियों से छेड़छाड़ की अनुमति कभी किसी को नहीं दी गई। बुंदेलखण्ड की अर्धचन्द्राकार घाटी में नदियां भी कम हैं और भूमि के नीचे चट्टानी परत की वजह से धरती का पेट भी बेहद छोटा है। यहां ज्यादा तालाब बनाने पड़ेंगे। चारागाहों के लिए ज्यादा जगह छोडऩी पड़ेगी। कम पानी की संभावना हो, तो कम पानी की फसल और सिंचाई का तकनीक का चुनाव करना होगा। बुंदेलखण्ड की महत्ता धर्मक्षेत्र, वनक्षेत्र और साधना क्षेत्र के रूप में है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने अपने वनवास में बुंदेलखण्ड के चित्रकूट को इसी रूप में चुना। इसे इसी रूप संरक्षित और विकसित करना पड़ेगा। योगी श्री आदित्यनाथ जी परम्परा के निर्देश को समझें। बुदेलखण्ड में बड़े उद्योग ले जाने की गलती न करें।
खैर, गौरतलब है कि भारत के हर इलाके में मौजूद ऐसा लोकज्ञान पारम्परिक है। यह कागज़ी ग्रंथ की बजाय, श्रव्यशास्त्र बनकर एक पीढी़ से दूसरी पीढ़ी तक जाता था। कुण्ड, टांके, खेत तलाई, खड़ीन, चाल, खाल, आहर-पाइन..कहां क्या बनाना ठीक है; दद्दा सब जानता है और सब बताता है। दद्दा अनपढ़ भले ही हो, पानी के मामले में अज्ञानी कभी नहीं था। भारत की पानी परम्परा ने उसे कभी अज्ञानी रहने ही नहीं दिया। दद्दा अभी भी हैं, लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं है। पहले दद्दा और बूढ़ी अम्मा ही ग्रामगुरु थे। पहले ग्रामगुरु का कहा राजा भी मानता था। जैसलमेर का राजा भी घड़ीसर के तालाब की गाद निकासी के काम में सम्मिलित होता था। जलसंकट आये, तो जनक जैसा राजा भी हल-बैल लेकर खेत में उतर जाता था। अब सरकार है। नेता, अफसर, ठेकेदार, कर्जदाता और बाज़ार का गठजोड़ है। तब राजा जनता के और ऋषि प्रकृति के प्रतिनिधि थे। अब प्रधान, विधायक, सांसद, वैज्ञानिक… सब के सब बाज़ार के प्रतिनिधि होते जा रहे मालूम होते हें। वे कहते हैं कि कोई कुछ मत करो; सरकार सभी के पानी का इंतज़ाम करेगी; बाज़ार करेगा। दुर्योग से सुश्री उमाजी भी यही कह रही हैं। वह बुंदेलखण्ड में केन-बेतवा को जोडऩे की जिद्द कर रही हैं। वह भूल गई हैं कि भारत की पानी मंत्री होने के साथ-साथ एक साध्वी के रूप में भारतीय देशज ज्ञान, परम्परा और संस्कार की प्रतिनिधि भी हैं।

सगुन परम्परा
पानी परम्परा के इलाकाई ज्ञान की दृष्टि से भारत में 500 से ज्यादा भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। इन्हे देशज भाषा में ‘देसÓ कहा जाता था। हर देस के अपने-अपने घाघ, भड्डरी, भोपा और भगत थे। आषाढ़ से लेकर भादों तक बारिश कैसी होगी; इसका सगुन फागुन में ही ले लिया जाता था। राजस्थान, गुजरात जैसे कम पानी के इलाकों में सगुन देखने का काम सालभर होता था। अपने समय पर खेजड़ी यानी शमी वृक्ष समय से पुष्पित, पल्लवित और फलित हो। कैर यानी टेंटी में समय से फल आये, तो इस बार जमाना होगा। जमाना यानी अच्छी बारिश। लेकिन जून शुरु में सुबह-सुबह ठण्डी पछुवा हवा चलने लगे, तो सुगुन लेने वाले मारवाड़ी देशजों का माथा ठनक जाता था। वे सभी लक्षण सामने रख पुन: सगुन लेते थे। कब चांद उगा, कैसा उगा, कब छिपा ? कौन सा नक्षत्र कब उगा, कब छिपा ? कैर की झाड़ी पुन: पुष्पित होकर यदि जुलाई माह में पुन: फलित होने लगी, तो मारवाड़ी देशज सावधान कर देते थे – भाई लोगो, अब जमाना नहीं होगा यानी अच्छी बारिश नहीं होगी।
बचपन में एक कविता पढ़ी थी – यह कदम्ब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे..। महाकवि रसखान ने भी पक्षी के रूप में जगत में वापसी की स्थिति में कदम्ब के पेड़ पर वास की इच्छा जाहिर की है। गौरतलब है कदम्ब की छांव, कृष्ण के बालपन की छत्र है। स्वर्गीय श्री अरुण कुमार पानी बाबा ने अपनी पुस्तक ‘भारत का जल धमÓ में श्रीमद्भागवत पुराण में पानी परम्पराओं का उल्लेख करते हुए ब्रजक्षेत्र में कदम्ब की पारिस्थितिकी को सामने रखा है। भरतपुर के घना को कदम्ब की पारिस्थिति का प्रतीक और स्मृति चिन्ह बताया है।
उन्होने वर्षा के पुर्वानुमान की पारम्परिक तकनीक की दृष्टि से उल्लेख किया है कि कदम्ब में विशेष तौर पर कौवे वास करते हैं। कौवों का प्रजनन काल सामान्यत: चैत्र-बैसाख यानी मार्च-अप्रैल में माना जाता है। यूं तो माना जाता है कि कौवे अपना घोसला बनाते ही नहीं। किंतु इसमें उल्लेख है कि कौवे कदम्ब पर घोसला बनाते थे। घोसला यदि कदम्ब के शिखर पर बनाया हो, तो समझा जाता था कि उस वर्ष मामूली बारिश होगी। शिखर से थोड़ा नीचे घोसला बनाये तो सामान्य वर्षा होगी। यदि दो डालों के बीच में सुरक्षित कोटर ढूंढकर घोसला बनाया गया हो तो इसका मतलब है कि उस साल सामान्य से अधिक वर्षा होगी और आंधी-तूफान भी आयेंगे। ऐसे ही बताया गया कि सारस अंडे दे और बिना सेये छोड़कर अन्यत्र उड़ जाये, तो समझो कि अकाल आयेगा।
अलग-अलग इलाकों के घाघ, भगत, भोपा और भड्डरियों के पास सगुन देखने के ऐसे अलग-अलग आधार थे। अलग इलाकों के अलग पंचांग थे। अब एक मौसम विभाग है। अपनी स्थापना से लेकर 2010 तक जिसका वर्षा अनुमान कभी भरोसेमंद नहीं रहा। पिछले छह-सात वर्षों से उसकी आधुनिक तकनीकी क्षमता पर कुछ भरोसा होना शुरु हुआ था, तो इस बार इसने पिछले तीन माह में तीन बार अनुमान बदले। पहले सामान्य से कम वर्षा, फिर सामान्य वर्षा और अब सामान्य से अधिक वर्षा का अनुमान पेश किया। उसकी क्षमता अभी सगुन दृष्टाओं से पीछे ही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग को अभी और अधिक दूरदृष्टि हासिल करनी होगी।

सदुपयोग परम्परा
वर्षा, वृक्ष, कृषि, स्थानीय व्यंजन और जीवनशैली के अंतर्संबंध जगजाहिर हैं। अंतर्संबंध की दृष्टि से इस बारे में भी भारतीय परम्पराओं की सीख स्पष्ट है। जिन खेतों में खर-पतवार ज्यादा हों, बारिश आने से पहले उन्हे जोतकर सूखने के लिए खुला छोड़ देने की परम्परा है। जिन नमक बढऩे से जो खेत ऊसर हो गये हों, उनका नमक निकालने का काम भी बारिश पहले ही करना है। जहां कम पानी बरसे, वहां मोटा अनाज बोने और ज्यादा मवेशी रखने की परम्परा है। कम पानी वाले इलाकों में साग-भाजी से ज्यादा घी, दूध और छाछ के साथ रोटी खाने की परम्परा है। जहां ज्यादा पानी बरसे, वहां ज्यादा भात खाने की परम्परा है। और देखिए, जहां भरपूर पानी होता है, वहां एक हथेली की अंजुली बनाकर पानी पीने की परम्परा है। जहां सामान्य पानी बरसे, उन इलाकों में दोनो हथेलियों की दोना बनाकर पानी पीने की परम्परा है। जहां कम पानी बरसता है, वहां लुटिया को बिना जूठा किए सीधे मुंह में पानी गटकने की परम्परा है। कम पानी वाले इलाकों में आप देखेंगे कि चार-पांच जन एक साथ बैठकर एक ही बर्तन में खाने की परम्परा है। भरपूर पानी वाले इलाकों में एक बर्तन में दूसरा खाये-पीये, तो जूठा मानते हैं। पानी संकट वाले इलाकों में सभी वर्णों की औरतें खेतों में काम करती हैं। पानी की ज्यादा उपलब्धता वाले इलाकों में सिर्फ शूद्र वर्ण की औरतों को काम के लिए खेत में भेजने की परम्परा रही है।

धराड़ी परम्परा
राजपूताना, बरखा के पानी को संचित करने में पेड़ का महत्व जानता था। राजपूताना यानी वर्तमान राजस्थान। राजपूताने ने पेड़ की रक्षा के लिए ‘धराड़ी परम्पराÓ बनाई। इसे कुलगोत्र से जोड़ा। अलग-अलग गोत्र की अलग-अलग धराड़ी। जिस गोत्र की जो धराड़ी मान ली गई, उस गोत्र का व्यक्ति अपने प्राण देकर भी धराड़ी की रक्षा करे। परम्परा का यही निर्देश था। हर मान्यता के पीछे कोई कथानक है। पूछा तो मालूम हुआ कि पोसवाल, जोठवाल, जाड़वाल, ऊंचवाल और पांचाल गोत्र की कदम्ब, कसाना गोत्र की कदम्ब, डाब और बरगद, डोई और कोली गोत्र की बरगद, दडग़स गोत्र की धराड़ी – बेलपत्र और कोली गोत्र की रोहेड़ा है। उपाध्याय गोत्र की धराड़ी – नीम, भारद्वाज, वत्स, जोजादिया और बेनीवाल गोत्र की धराड़ी – पीपल, मीणा और चैहानों की धराड़ी – अशोक, सिसोदिया राजपूतों की खेजड़ी, मेवाल मीणाओं की कदम्ब और उदासीन संप्रदाय के साधुओं की धराड़ी – चिनार है।

धन्यवाद परम्परा
अब जरा पेंसिल उठाइये और निशान लगाइये कि उक्त परम्पराओं में से कोई एक परम्परा ऐसी है, जिसका बरखा से रिश्ता न हो? दरअसल, भारत की पानी परम्परायें, कोई अनसमझी, अनजानी हरकतें नहीं थीं; वे सभी सदियों के अनुभव के जांचा-परखा ऐसा पानी प्रबंधन थीं, जो मेघ, पवन, सूर्य को भी समझती थीं और नदी, समुद्र व धरती के पेट को भी। भारतीय पानी परम्पराओं को सूक्ष्म जीव व वनस्पतियों की भूमिका का भी ज्ञान तथा ध्यान था। इसीलिए भारतीय परम्परा ने पंचतत्वों में हर तत्व को दैविक शक्ति मानकर पूजा। परम्परा जानती थी कि पंचतत्वों से निर्मित होने वाले जीवों का पंचतत्वों से संपर्क बने रहना जरूरी है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने प्रकृति से ज्यादा से ज्यादा नजदीक रखने वाली जीवनशैली को सर्वोत्तम माना और उसे अपनाया।
ज्ञानी होना, किसी के अच्छा होने की गारंटी नहीं हो जाता। ज्ञान, कभी-कभी अहंकार को भी जन्म देता है। किंतु पानी के परम्परागत ज्ञानी अहंकारी नहीं थे। वे जानते थे कि तिब्बत का जल अमृत है। तिब्बत का पानी, वर्तमान एशिया के 11 देशों के अनेक इलाकों को समृद्ध करता है; लिहाजा, उन्होनेे तिब्बत स्थित कैलाश के नाथ का धन्यवाद करने के लिए अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य जाने की विनम्र परम्परा बनाई।

निवेदन परम्परा
बहुत संभव है कि इस नये कालखण्ड में कई पुरानी पानी परम्पराओं ने अपना महत्व खो दिया हो; फिर भी मेरा निवेदन है कि वर्तमान में महत्वपूर्ण पानी-परम्पराओं को लिपिबद्ध कर समाज तक पहुंचाये और उसे अपनाने को प्रेरित करें। क्यों ? क्योंकि भारत के पानी प्रबंधन को शासन आधारित अथवा केन्द्रीकृत होने की बजाय, विकेन्द्रित और लोकपहल पर आधारित बनाने की आज काफी ज्यादा ज़रूरत महसूस हो रही है। इस दृष्टि से भी पानी परम्पराओं को ज्ञानसरोवर अथवा भारतीय धरोहर के रूप सहेजना और प्रचार में लाना ज्यादा जरूरी है। कृपया करें। यह निवेदन कर मैं भी समय पूर्व चेत जाने की भारतीय परम्परा का ही निर्वाहन कर रहा हूं; आप भी करें।
 भारतीय धरोहर व अरुण तिवारी और कई अन्य विद्वानों से संकलित

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

भारत को सांस्कृतिक आर्थिक और नैतिक समृद्धि का आधार ग्राम्य व्यवस्था

 

 अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बांटी जा सकती है:-1.नगरीय अर्थव्यवस्था  2.ग्रामीण अर्थव्यवस्था

सिंधु घाटी सभ्यता का अद्भुत और अनोखा इतिहास बताता है कि विश्व में सबसे पहले नगरीय व्यवस्था का विकास भारत में हुआ। और ये व्यवस्था बहुत सुव्यवस्थित थी।
जिन अंग्रेजों ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अध्ययन किया है व जिन अंग्रेजों ने इसका सत्यानाश किया है,उनके आधार पर इसे समझते हैं।इनमें एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है "भारत के गांवों में केवल एक चीज बाहर से आती है वो है नमक"।अर्थात अन्य सभी बुनियादी चीजें गाँव से नगर में निर्यात होती थी।यानि नगरीय व्यवस्था,ग्रामीण व्यवस्था पर निर्भर थी। एक इतिहासकार ने बड़ी मेहनत से सूचि बनाई की गांव में कितने तरह के उत्पादन होते हैं,तो आप हैरान होंगे सुनकर कि भारत के अधिकांश गाँवों में 2000 से भी अधिक वस्तुएं पैदा हुआ करती थी।और लगभग साढ़े सात लाख गाँव थे। कपास/रेशम से सूत,सूत से कपड़ा बनता था और बाजारों में बिकता था।दाल ,गेहूँ,चावल इत्यादि ग्रामीणों को तो पर्याप्त थे ही ,नगरवासियों की भी जरुरत पूरी होती थी।भारत के गाँवों की खदानों से लगभग 90 तरह के खनिज निकलते है। जंगल गांव की सम्पति थी  जहाँ फल-फूल व अनेकों औषधियाँ दुनियाभर के बाजारों में बिकती थी।सब वस्तुएं के विस्तार में जाएंगे तो यह सिलसिला बहुत देर तक चलेगा। इसके अतिरिक्त गांवों में कारीगरों की भरमार थी। लोहे का काम करने वाले लुहार ,सोने का काम करने वाले सुनार,कपड़े को बुनने वाले बुनकर,रुई को सूत बनाने वाले धुनकर,तैल निकालने वाले तेली,लकड़ी का काम करने वाले बढई... ऐसे 18 किस्म के कारीगर तो सब गाँवों में होते थे।वस्तु के बदले वस्तु यानि वस्तु-विनिमय होता था।कोई मोची है तो दूसरे को जूती बनाकर दे देगा और अनाज वगेरा ले लेगा,कोई सुनार है वो किसी की पत्नी को गहने दे देगा और बदले में कुछ ले लेगा। इस प्रकार कर्म चलता था और इस वस्तु-विनिमय की सबसे बड़ी खाशियत यह थी की हर व्यक्ति के पास हर चीजें होती थी।

न्याय व्यवस्था पंचायत आधारित थी। झगड़ा जितना बड़ा होता पंचायत उतने  ही ज्यादा गाँव साथ बैठकर करते।जयपुर के निकट एक गांव बस्सी का इतिहास पढ़ने से पता चला की एक हत्या के मामले की सुनवाई २० दिन चली थी। अर्थात गंभीर मामलों को पूरी गंभीरता से लिया जाता था।पंचायत लगती थी मंदिर में। जहाँ सरपंच धर्म की गद्दी पर बैठकर भगवान को साक्षी मानकर न्याय देते। गजब बात ये थी की पंचायत के लगभग 99 फीसदीफैसलों से वादी भी संतुष्ट होता और प्रतिवादी भी।क्योंकी न्याय देने वाला धर्म की कसम खाकर धर्म के आधार पर न्याय करता था।यह वो धर्म नहीं जो कर्म काण्ड वाला ,बल्कि वह धर्म जो आचरण में उतारा जा सके।वो धर्म जो महऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने बताया था।

लगभग हर गांव में एक वैद्य होता था और हर पाँच गाँव में एक सर्जन होता था। और सर्जन ऐसा जो गंभीर से गंभीर सर्जरी करदे।हाथ कट गया हो या कोई अन्य अंग ,शरीर कहीं से जल गया हो ,खराब हो गया हो -सबका इलाज। हड्डी जोड़ने वाले हाड़-वैद्य हुआ करते थे। माताएं गर्भवती माँ को बच्चा इतनी आसानी से जन्मा देती जितना आज भी सरल नहीं। अंग्रेज लैंकेस्टर जिसने भारतीय शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था पर अध्ययन किया कहता है कि इतनी अच्छी और सुव्यवस्थित व्यवस्था देखकर हम अभिभूत हैं-जो पूरी तरह निःशुल्क भी है। वैद्य जी की जीविका चलाने हेतु हर कोई स्वेच्छा से मदद करता था। हमारे यहाँ भारत में कहा गया है कि चिकित्सक,गुरु व बेटी के घर जाओ तो कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।

कम से कम एक गुरुकुल तो हर गाँव में होता ही था।आज से तुलना करें तो 7 लाख से ज्यादा ऐसे गुरुकुल थे जिनमें 12वीं तक की शिक्षा दी जाती थी। उच्च शिक्षा हेतु तक़रीबन 14 हजार केंद्र थे। और साक्षरता दर 97% थी पुरे भारत में। कुछ अंग्रेज इतिहासकार लिखते है कि हमारे यहाँ तो पहला स्कूल 1868 में शुरू हुआ लंदन में भारत में तो हजारों साल पहले से 732000 से ज्यादा स्कूल चल रहे हैं। और इन गुरुकुलों में वेद और शास्त्रों की अनिवार्यता के साथ ऐस्ट्रो-फिजिक्स,ऐस्ट्रोनोमी,मेटलर्जी जैसे 18 मुख्य विषय पढ़ाए जाते थे।

दूध,दही,मखन,घी और छाछ इतना होता था कि लोग पानी की जरुरत भी इन्हीं से पूरी करते थे।और ये सब बेचा नहीं जाता था,बाकी तो हमारे गांव में बिकना शुरू हो गया पर दही व छाछ अब भी अधिक होने पर पड़ोसियों में बाँट दी जाती है।उसके बाद भी बच जाए तो जानवरों को दे दिया जाता था।
भारत में श्रम/मेहनत/परिश्रम हमेशा से अनमोल रहा। श्रम का विभाजन इस तरह से था कि जो काम कोई व्यक्ति अकेले स्तर पर कर सकता है वह वो खुद करता और जिसके लिए श्रमिकों की आवश्यकता होती तो गाँव के सभी जन सहायता करने को तैयार रहते।ऐसे ही उनको जरुरत होती तो वह व्यक्ति उनकी मदद करता।यही कारण था कि भारत का प्रत्येक घर बिना श्रम-लागत के बना।

सब स्वदेशी/स्वावलम्बी तो थे ही ईज्जत और हैसियत सबकी बराबर थी। सम्मान सबका बराबर था। छोटे से छोटे कारीगर का भी वही ईज्जत-सत्कार था जो सुनार का या अन्य का था। इसका एक उदाहरण है बच्चे के जन्म पर होने वाले संस्कार। जैसे सुनार आया,बच्चे के कान में सोने की बाली डाल गया,सबने उसका सम्मान किया। शहद बनाने वाले ने एक बून्द मंगलकामनाओं से बच्चे की जीभ पर डाली,सबने उसका सम्मान किया। मोची आएगा उसके जूते दे गया ,सबने उसका सम्मान किया।यहाँ तक वर्तमान में सबसे उपेक्षित व पिछड़े माने जाने वाले हिजड़ों के सम्मान हेतु ,बच्चा जन्मते ही सबसे पहले उनकी गोद में दिया जाता था। विवाह के सबसे मुख्य संस्कार ,यानि मंगलसूत्र को हिजड़े,वेश्या या गणिकाओं के घर भेजकर ,उनके घर से  माटी लगाकर,वधु के गले में डाला जाता था।एक और तबका जिनका शोषण हुआ -डोम,डोम्ब या डोमा जो लाश को जलाते थे। तो किसी भी मर्ग पर ये मिट्टी की हाण्डी लेकर सबसे आगे चलते बाकी सब इनके पीछे अर्थी लेकर।अग्नि देने का कार्य तो पुत्र-पुत्रियाँ करती ,पर केवल डोम उनके बराबर खड़ा होकर सम्पूर्ण कार्य करवाता था। इसी प्रकार हर किसी का सहयोग व सहभागिता जन्म से मृत्यु तक हर छोटी से बड़ी घटना में होती थी।अंग्रेजों के आने से पहले भारत में जो 565 जो रियासतें रही ,उनमें से 70 से ज्यादा रियासतों के राजा डोम थे।कहीं तैली थे ,कहीं धुनकर,कहीं बुनकर।तो ये काम के आधार पर बनी जातियां के आधार जन्म पर थी इसपर भी कोई ग़लतफ़हमी में मत रहिएगा।ये तो यह सामाजिक वर्गीकरण था। अंग्रेजों के षड्यंत्र व कुछ स्वार्थी लोगों के भेदभाव व पक्षपात रवैया इस दुर्दशा का कारण है।
आज आवश्यकता है कि हम आवश्यक बदलावों के साथ अपनी उसी स्वावलम्बी व्यवस्था को वापिस लाएं। और भारत को फिरसे 'सोने का शेर' बनाएं।
और जिसने सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रहित को समर्पित कर हमारा सोया हुआ स्वाभिमान जगाया उस अमर शहीद भाई राजीव दीक्षित जी के गुरु आदरणीय रविंद्र शर्मा गुरु जी के सपनों को यथार्थ की धरातल पर उतारता यह राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान के  सहभागी बने  9336919081 पर केवल whatsap करें।धन्यबाद

बुधवार, 23 सितंबर 2020

बैचलर ऑफ आर्ट एंड मास्टर ऑफ आर्ट के बाद भी विभिन्न कला केंद्र बने जिहादी केंद्र


  



 भारतीय सनातन परंपरा नसिर्फ जीवन के आर्थिक पक्ष को ही पूर्ण मानती है बल्कि जीवन की प्रत्येक क्षेत्र में एक अनुपम संगम इस सामाजिक जीवन में भी देखने मिलता था इसमें कला का एक बड़ा महत्व होता था  इसलिए शिक्षा में भी जो डिग्री BAया MA मिलती जिसे अंग्रेजों ने क्लास में बैठा कर देना शुरु कर दिया था जिसेमें कला का बड़ा  महत्व  को अंग्रेज भी नहीं नकार पाए थे पर कला के व्यवहारिक पक्षों से दूर कर दिया ।

  अंग्रेजो पुरी शिक्षा को इसाई और इस्लामिक संस्कृति की तरफ मोड़ दिया रही कसर तो आजादी के बाद इन काले अंग्रेजों ने भी वहीं राह पकड़ ली और देश का सांस्कृतिक चेतना का पतन आज चारों तरफ दिखाई दे रहा है। 

सन 1948 में भारत के चार पेंटर मिलकर एक ग्रुप बनाते हैं...प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (PAG)।
शुजा, रजा, हैदर और फिदा। और इत्तेफाक देखिए....चारों मुसलमान। वैसे कला का कोई धर्म नहीं होता...आमफहम जुमला।

देखते-देखते पैग आधुनिक भारतीय कला का परचम बन गया। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट, महाराष्ट्र स्कूल ऑफ आर्ट, कांगड़ा स्कूल ऑफ आर्ट, ओडिसा की पटुआ कला, राजस्थान की चित्रकला...अनगिनत भारतीय कला की धाराएं नेपथ्य में चली गईं। खत्म सी ही हो गई।
आज की युवा पीढ़ी में से ऐसे कितने हैं जो यामिनी राय, नन्दलाल बसु, डॉ आनन्द कुमार स्वामी, गणेश पाइन, विवान सुंदरम, यशवंत होलकर, विकास भट्टाचार्य जैसे बेशुमार नामों से, उनके काम से परिचित हैं ? या कभी सुना भी है ?

आज शायद ही इन भारतीय स्कूल्स की कला की खूबियों और इनके चितेरों के नाम हम भारतीयों की स्मृतियों में हों। जैसे-तैसे जीवित भले हैं, पर वैश्विक क्या राष्ट्रीय स्तर की कला में कहीं कोई जगह नहीं। कोई सम्मान या पहचान नहीं।

संभव है, कला जगत की व्यावसायिकता से अनजान नादान मित्र मधुबनी पेंटिंग का नाम लें...ऐसे मित्रों से एक छोटी सी जानकारी साझा कर लूं..पेरिस में जब मॉर्डन पेंटिंग प्रदर्शनी में पिकासो और डॉली के समानांतर एशियन पेंटर्स की कृति लगाने की बारी आई तो भारत से सिर्फ एक नाम चुना गया...मकबूल फिदा हुसैन का।

मित्रों की जानकारी के लिए यह भी बता दूं...इंदौर से निकला फिदा शुरुआत में कोलकाता में फ़िल्म के होर्डिंग पेंट किया करते थे।

पेंटिंग, सोने से भी बड़ा निवेश का क्षेत्र है। जैसे आमजन सोने से अपनी समृद्धि तौलते हैं...वैसे संसार का सबसे धनाढ्य समाज दुर्लभ पेंटिंग में निवेश करता है। सन 1990 में फिदा का यह हाल था, यदि मुंह में पान की पीक भरके कनवास पर थूक दे तो जहां तक छींटे जाए, 5000 ₹ प्रति स्कावयर इंच पेंटिंग की प्राइस लगती थी। वह भी न्यूनतम बता रहा हूँ।

खैर मूल मुद्दा है, क्या पैग के पेंटर अपनी खूबियों से वैश्विक पटल पर छा गए ? क्या भारत के तमाम "स्कूल ऑफ आर्ट्स" वैश्विक योग्यता नहीं रखते थे ? तो दोनों सवालों पर अपन कहेंगे...नहीं पता। क्योंकि यह कलाजगत की अंतहीन बहस का विषय है।

पर एक बात जरूर जानता हूँ...पैग जैसे ग्रुप को नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी सरीखे राजनेताओं और टाटा जैसे उद्योगपतियों ने खूब संरक्षण दिया। बाकी किसी को नहीं। यह दीगर है, दिवंगत ललित नारायण मिश्र ने मधुबनी को एक पहचान दिलाई। लेकिन इसे कला के विशाल सागर में एक नन्ही सी बूंद ही समझिए।

संस्कृति और सभ्यता के संघर्ष का पटल बहुत व्यापक होता है मित्रों। आप जब धर्म-धर्म की हुंकार लगाते हैं तो मेरी नजर खोखली बुनियाद पर रहती है। निष्क्रिय समाज पर रहती है।

वामपन्थ ने सिर्फ जीवन या राजसत्ता को ही नहीं, रचनाधर्मिता के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। आपकी तमाम बालसुलभ कल्पनाओं से भी परे जाकर...तमाम मानक ही बदल डाले। फिलहाल तो हम कहीं हैं ही नहीं।

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

ब्रह्मणों की गोत्र शाखा और उनके देवता



 
 

ब्राह्मणों के शाखा-सूत्र एवं देवता...
सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :

गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|

(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|

उपगर्ग (शुक्ल-वंश)

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

गौतम (मिश्र-वंश)

गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

उप गौतम (मिश्र-वंश)

उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है|

वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश)

वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश)

तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी

बशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश)

इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|

(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी

शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश)

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|

(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है|

उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)

इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं|

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश)

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर

भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश)

भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार

कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गददी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें|

सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)

सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं|

(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी)

सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)

सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बताये जाते हैं|

(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ

कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ

ओझा वंश

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां

चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)

इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां

एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है|

🌇ब्राह्मणों की वंशावली🌇
भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से
दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट
पर गये और कण् व चतुर्वेदमय
सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे
एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें
वरदान दिया ।
वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका
क्रमानुसार नाम था -
उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी ।
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने
अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।
फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं
वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -
कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।
इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-
(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाये जाते हैं|
तथा
विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण
(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं।
वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है।
शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है ।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं।
जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के
लगभग है |
तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है।
उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है
81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -
(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरवरिया ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण
सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में शेयर करे हम क्या है
इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये। ब्राह्मण अपने कर्म और धर्म का पालन करते हुए सनातन संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं।

स्वप्न में गौ दर्शन का महात्म शास्त्रों में गौ का महिमा



गौ माता का शास्त्र पुराणों में महात्मय

• स्वप्न में गौ अथवा वृषभ के दर्शनसे कल्याण लाभ एवं व्याधि नाश होता है । इसी प्रकार स्वप्नमे गौ के थन को चूसना भी श्रेष्ठ माना पाया है । स्वप्नमे गौका घरमें ब्याना, वृषभ की सवारी करना, तालाबके बीचमें घृत मिश्रित खीरका भोजन भी उत्तम माना गया है । घी सहित खीर का भोजन तो राज्य प्राप्ति का सूचक माना गया है ।

इसी प्रकार स्वप्न में ताजे दुहे हुए फेनसहित दुग्धका पान करनेवाले को अनेक भोगो की तथा दहीके देखने से प्रसन्नता की प्राप्ति होती है । जो वृषभ से युक्त रथपर स्वप्न में अकेला सवार होता है और उसी अवस्थायें जाग जाता है, उसे शीघ्र धन मिलता है । स्वप्न में दही मिलनेसे धनकी, घी मिलनेसे यशकी और दही खानेस भीे यशकी प्राप्ति निश्चित है ।

यात्रा आरम्भ करते समय दही और दूधका दीखना शुभ शकुन माना गया है । स्वप्नमें दही भातका भोजन करनेसे कार्य सिद्धि होती है तथा बैलपर चढ़नेसे द्रव्य लाभ होता है एवं व्याधिसे छुटकारा मिलता है । इसी प्रवार स्वप्रमे वृषभ अथवा गौ का दर्शन करनेसे कुटुम्ब की वृद्धि होती है । स्वप्नमे सभी काली वस्तुओ का दर्शन निन्द्य माना गया है, केवल कृष्णा गौ का  दर्शन शुभ होता है । (स्वप्न में गोदर्शन का फल, संतो के श्री मुख से सुना हुआ)

• वृषभो को जगत् का पिता समझना चाहिये और गौएं संसार की माता हैं । उनकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण पितरों और देवताओं की पूजा हो जाती है । जिनके गोबरसे लीपने पर सभा भवन, पौंसलेे, घर और देवमंदिर भी शुध्द हो जाते हैं, उन गौओ से बढकर और कौन प्राणी हो सकता है ?जो मनुष्य एक सालतक स्वयं भोजन करनेके पहले प्रतिदिन दूसरे की गायको मुट्ठी भर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौकी सेवा करनेका फल प्राप्त होता है ।(महाभारत, आश्वमेधिकपर्व, वैष्णवधर्म )

• देवता, ब्राह्मण, गो, साधु और साध्वी स्त्रीयोंके बलपर यह सारा संसार टिका हुआ है, इसीसे वे परम पूजनीय हैं । गौए जिस स्थानपर जल पीती हैं, वह स्थान तीर्थ है । गंगा आदि पवित्र नदियाँ गोस्वरूपा ही हैं ।

 



जहा जिस मार्ग से गो माताए जलराशि को लांघती हुई नदी आदि को पार करती है,वहां गंगा, यमुना, सिंधु, सरस्वती आदि नदियाँ या तीर्थ निश्चित रूप से विद्यमान रहते है।(विष्णुधर्मोत्तर पुराण . द्वी.खं ४२। ४९-५८)

• हे ब्राह्मणो ! गायके खुरसे उत्पन्न धूलि समस्त पापो को नष्ट कर देनेवाली है । यह धूलि चाहे तीर्थकी हो चाहे मगध कीकट आदि निकृष्ट देशोंकी ही क्यो न हो । इसमें विचार अथवा संदेह करने की कोई आवश्यकता नहीं । इतना ही नहीं वह सब प्रकार की मङ्गलकारिणी, पवित्र करनेवाली और दुख दरिद्रतारूप अलक्ष्मी को नष्ट करनेवाली है ।

गायो के निवास करनेसे वहाँक्री पृथिवी भी शुद्ध हो जाती है । जहां गायें बैठती हैं वह स्थान, वह घर सर्वथा पवित्र हो जाता है । वहां कोई दोष नहीं रहता । उनके नि: श्वास की हवा देवताओंके लिये नीराज़न के समान है । गौओ को स्पर्श करना बडा पुण्यदायक है और उससे समस्त दु-स्वप्न, पाप आदि भी नष्ट हो जाते हैं । गौओ के गरदन और मस्तकके बीच साक्षात् भगवती गंगा का निवास है । गौएं सर्वदेेवमयी  और सर्वतीर्थमयी हैं । उनके रोएँ भी बड़े ही पवित्रताप्रद और पुण्यदायक हैं । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

• ब्राह्मणो! गौओ के शरीरको खुजलानेसे या उनके शरीरके कीटाणुओ को दूर करनेसे मनुष्य अपने समस्त पापोंको धो डालता है । गौओ को गोग्रास दान करनेसे महान् पुण्य की प्राप्ति होती है । गौओं को चराकर उन्हें जलाशयतक घुमाकर जल पिलानेसे मनुष्य अनन्त वर्षोतक स्वर्गमे निवास करता है । गौओ के प्रचारणके लिये गोचरभूमि की व्यवस्था कर मनुष्य नि:संदेह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है । गौओ के लिये गोशालाका निर्माणकर मनुष्य पूरे नगरका स्वामी बन जाता है और उन्हें नमक खिलाने से मनुष्य को महान सौभाग्यकी प्राप्ति होती है । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

•विपत्तिमें या क्रीचड़मे फंसी हुई या चोर तथा बाघ आदिके भयसे व्याकुल गौ को क्लेशस्ने मुक्त कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है । रुग्णावस्थामे गौओ को औषधि प्रदान करनेसे स्वयं मनुष्य सभी रोगोंसे मुक्त को जाता है । गौओ को भयसे मुक्त करनेपर मनुष्य स्वयं भी सभी भयोसे मुक्त हो जाता है ।

चांडाल के हाथसे गौ को खरीद लेने पर गोमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है तथा किसी अन्य के हाथसे गाय को खरीदकर उसका पालन करनेसे गोपालक को गोमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है । गौओंकी शीत तथा धूपसे रक्षा करनेपर स्वर्गकी प्राप्ति होती है । (विष्णुधर्मोत्तर पुराण ,भगवान् हंस ब्राह्मणों से)

•गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत और कुशोदक यह पञ्चगव्य स्नानीय और पेयद्रव्योंमें परम पवित्र कहा गया है । ये सब मङ्गलमय पदार्थ भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस आदिसे रक्षा करनेवाले परममङ्गल तथा कलिके दुख-दोषो को नाश करनेवाले हैं । गोरोचना भी इसी प्रकार राक्षस, सर्पविष तथा सभी रोगों को नष्ट करनेवाली एवं परम धन्य है ।जो प्रात:काल उठकर अपना मुख गोघृतपात्रमें रखे घीमे देखता है उसकी दुख: दरिद्रता सर्वदाके लिये समाप्त हो जाती है और फिर पाप का बोझ नहीं ठहरता ।
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण, राजनीति एवं धर्मशास्त्रके सम्यक ज्ञाता पुष्कर जी भगवान् परशुराम से)

•गायो,गोकुल, गोमय आदिपर थूक-खखार नहीं छोड़ना चाहिये । (पुष्कर परशुराम संवाद)

•जो गौओ के चलनेके मार्गमें, चरागाहमें जलकी व्यवस्था करता है, वह वरुणलोक को प्राप्तकर वहां दस हजार वर्षोंतक विहार करता है और जहां जहां उसका आगे जन्म होता है वह वहां सभी आनन्दो से परितृप्त रहता है । गोचरभूमि को हल आदिसे जोतनेपर चौदह इन्द्रों पर्यन्त भीषण नरक की प्राप्ति होती है ।हे परशुराम जी ! जो गौओ के पानी पीते समय विघ्न डालता है, उसे यही मानना चाहिये कि उसने घोर ब्रह्महत्या की । सिंह, व्याघ्र आदिके भयसे डरी हुई गायकी जो रक्षा करता है और कीचड़में फंसी हुई गायका जो उद्धार करता है, वह कल्पपर्यन्त स्वर्गमें स्वर्गीय भोगो का भोग करता है । गायों को घास प्रदान करनेसे वह व्यक्ति अगले जन्ममे रूपवान हो जाता है और उसे लावण्य तथा महान सौभाग्यकी प्राप्ति होती है । (पुष्कर परशुराम संवाद)

•हे परशुरामजी ! गायों को बेचना भी कल्याणकारी नहीं है। गायोंका नाम लेने से भी मनुष्य पापो से शुद्ध हो जाता है । गौओका स्पर्श सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा सभी प्रकारका सौभाग्य एवं मङ्गलका विधायक है । गौओका दान करनेसे अनेक कुलोंका उद्धार को जाता है ।

मातृकुल, पितृकुल और भार्याकुलमे जहां एक भी गो माता निवास करती है वहां रजस्वला और प्रसूतिका आदिकी अपवित्रता भी नहीं आती और पृथ्वी में अस्थि, लोहा होनेका, धरतीके आकार प्रकार की विषमताका दोष भी नष्ट हो जाता है । गौओ के श्वास प्रश्वास से घरमे महान् शान्ति होती है । सभी शास्त्रो में  गौओके श्वास प्रश्वास को महानीराजन कहा गया है । हे परशुराम ! गौओ को छु देने मात्रसे मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं ।(पुष्कर परशुराम संवाद)

• जिसको गायका दूध, दही और घी खानेका सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, उसका शरीर मल के समान है । अन्न आदि पाँच रात्रितक, दूध सात रात्रितक, दही बीस रात्रितक और घी एक मासतक शरीरमे अपना प्रभाव रखता है । जो लगातार एक मासतक बिना गव्यका(बिना गौ के दूध से उत्पन्न पदार्थ)भोजन करता है उस मनुष्यके भोजनमें प्रेतों को भाग मिलता है, इसलिये प्रत्येक युुग में सब कार्योंके लिये एकमात्र गौ ही प्रशस्त मानी गयी है । गौ सदा और सब समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाली है ।(पद्मपुराण, ब्रह्माजी और नारद मुनि संवाद)

•गायो से  उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और रोचना-ये छ: अङ्ग (गोषडङ्ग) अत्यन्त पवित्र हैं और प्राणियोंके सभी भापों को नष्ट कर उन्हें शुद्ध करनेवाले हैं । श्रीसम्पन्न बिल्व वृक्ष गौओके गोबरसे ही उतपन्न हुआ है । यह भगवान् शिवजी को अत्यन्त प्रिय है । चूँकि उस वृक्षमें पद्महस्ता भगवती लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, इसीलिये इसे श्रीवृक्ष भी कहा गया है । बादमें नीलकमल एवं रक्तकमलके बीज भी गोबरसे ही उत्पन्न हुए थे । गौओ के मस्तकसे उत्पन्न परम पवित्र गोरोचना है समस्त अभीष्टो की सिद्धि करनेवाली तथा परम मङ्गलदायिनी है ।

अत्यन्त सुगन्धित गुग्गुल नामका पदार्थ गौओ के मूत्रसे ही उत्पन्न हुआ है । यह देखनेसे भी कल्याण करता है । यह गुग्गुल सभी देवताओं का आहार है, विशेषरूप भगवान् शंकर का प्रिय आहार है । संसारके सभी मङ्गलप्रद बीच एवं सुन्दर से सुन्दर आहार तथा मिष्टान्न आदि सब के सब गौके दूधसे ही बनाये जाते हैं । सभी प्रक्रार की मङ्गल कामनाओ को सिद्ध करनेके लिये गायका दही लोकप्रिय है । देवताओ को तृप्त करनेवाला अमृत नामक पदार्थ गायके घीसे ही उत्पन्न हुआ है । (भविष्यपुराण, उत्तरपर्व, अ.६९, भगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठीर संवाद)

•गौओ को खुजलाना तथा उन्हें स्नान कराना भी गोदानके समान फल वाला होता है । जो भयसे दुखी (भयग्रस्त) एक गायकी रक्षा करता है, उसे सौं गोदानका फल प्राप्त होता है । पृथ्वी में समुद्रसे लेकर जितने भी बड़े तीर्थ-सरिता-सरोवर आदि हैं, वे सब मिलकर भी गौ के सींग के जलसे स्नान करनेके षोडशांश के तुल्य भी नहीं होते।(बृहत्पराशर स्मृति, अध्याय ५)

• राम-वनवास के समय भरत १४ वर्षतक इसी कारण स्वस्थ रहकर आध्यात्मिक उन्नति करते रहे, क्योंकि वे अन्न के साथ गोमूत्रका सेवन करते थे ।

गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्कलाम्बरम्।।
(श्रीमद्भागवत ९ । १० । ३४)

• गोमाताका दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा केरे । ऐसा करने से सातों द्विपोसहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है । गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देनेवाली हैं । वृद्धिकी आकांक्षा करनेवाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये ।

• जिस व्यक्तिकें पास श्राद्धके लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्धका फल मिल जाता है । (निर्णयसिंधुु)

• गौ माताए समस्त प्राणियोंकी माता हैं और सारे सुखों को देनेवाली हैं, इसलिये कल्याण चाहनेवाले मनुष्य सदा गोओंकी प्रदक्षिणा करें । गौओ को लात न मारे । गौओ के बीचसे होकर न निकले। मङ्गलकी आधारभूत गो-देवियोंकी सदा पूजा को । (महा ,अनु ६९ । ७-८)

• जब गौए चर रही हों या एकांत में बैठी हों, तब उन्हें तंग न करें । प्यास से पीडित होकर जब भी क्रोध से अपने स्वामी की ओर देखती है तो उसका बंधुबांधवोसहित नाश हो जाता है । राजाओ को चाहिये कि गोपालन और गोरक्षण करे । उतनी ही संख्यामे गाय रखे, जितनीका अच्छी तरह भरण-पोषण हो सके । गाय कभी भी भूखसे पीडित न रहे, इस बातपर विशेष ध्यान रखना चाहिये ।

• जिसके घरमें गाय भूखसे व्याकुल होकर रोती है, वह निश्चय ही नरक में जाता है । जो पुरुष गायोंके घरमें सर्दी न पहुँचने का और जलके बर्तन को शुद्ध जलसे भर रखनेका प्रबन्ध कर देता है, वह ब्रह्मलोकमे आनन्द भोग करता है ।

• जो मनुष्य सिंह, बाघ अथवा और किसी भयसे डरी हुई, कीचड़ में धसी हुई या जलमें डूबती हुई गायको बचाता है वह एक कल्पतक स्वर्ग-सुख का भोग करता है । गायकी रक्षा, पूजा और पालन अपनी सगी माताके समान करना चाहिये । जो मनुष्य गायों को ताड़ना देता है, उसे रौरव नरक की प्राप्ति होती है । (हेभाद्रि)

• गोबर और गोमूत्र से अलक्ष्मी का नाश होता है,  इसलिये उनसे कभी घृणा न करे। जिसके घरमें प्यासी गाय बंधी रहती है, रजस्वला कन्या अविवाहिता रहती है और देवता बिना पूज़नके रहते हैं, उसके पूर्वकृत सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं । गायें जब इच्छानुसार चरती होती हैं, उस समय जो मनुष्य उन्हें रोकता है, उसके पूर्व पितृगण पतनोन्मुख होकर काँप उठते हैं । जो मनुष्य मूर्खतावश गायों को लाठी से मारते हैं उनको बिना हाथके होकर यमपुरीमें जाना पड़ता है ।(पद्मपुराण, पाताल .अ १८)

• गायको यथायोग्य नमक खिलाने से पवित्र लोककी प्राप्ति होती है और जो अपने भोजनसे पहले गाय को घास चारा खिलाकर तृप्त करता है, उसे सहस्त्र गोदानका फल मिलता है । (आदित्यपुराण)

• अपने माता पिताकी भांती श्रद्धापूर्वक गायोंका पालन करना चाहिये । हलचल, दुर्दिन और विप्लवके अवसर पर  गायों को घास और शीतल जल मिलता रहे, इस बातका प्रबन्ध करते रहना चाहिये । (ब्रह्मपुराण)

• गोमाताका दर्शन एवं उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा केरे । ऐसा करने से सातों द्विपोसहित भूमण्डल की प्रदक्षिणा हो जाती है । गौएँ समस्त प्राणियो की माताएँ एवं सारे सुख देनेवाली हैं । वृद्धिकी आकांक्षा करनेवाले मनुष्य को नित्य गो माताओ की प्रदक्षिणा करनी चाहिये ।

•जिस व्यक्तिकें पास श्राद्धके लिये कुछ भी न हो वह यहि पितरो का ध्यान करके गो माता को श्रद्धापूर्वक घास खिला दे तो उसको श्राद्धका फल मिल जाता है । (निर्णयसिंधुु)

•महर्षि वसिष्ठ जी ने अनेक प्रकार से गो माता की महिमा तथा उनके दान आदिकी महिमा बताते हुए मनुष्यो के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपदेश तथा एक मर्यादा स्थापित करते हुए कहा –

नाकीर्तयित्वा गा: सुप्यात् तासां संस्मृत्य चोत्पतेत्। सायंप्रातर्नमस्येच्च गास्तत: पुष्टिमाप्नुयात्।।
गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येेत तास्तथा ।
अनिष्ट स्वप्नमालक्ष्य गां नर: सम्प्रकीर्तयेत्।।
(महाभा, अनु ७८। १६, १८)

अर्थात् ‘ गौओ का नामकीर्तन किये बिना न सोये । उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्य को बल और पुष्टि प्राप्त होती है । प्रतिदिन गायो का जाम ले, उनका कभी अपमान न को । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो माता का नाम ले ।

इसी प्रकार वे आगे कहते हैं की जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक रात-दिन निम्न मन्त्रका बराबर कीर्तन करता है वह सम अथवा विषम किसी भी स्थितिमें भयसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और सर्वदेवमयी गोमाताका कृपा पात्र बन जाता है ।

मन्त्र इस प्रकार है –
गा वै पश्याम्यहं नित्यं जाब: पश्यन्तु मां सदा ।
गावोsस्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम्।।
(महाभा, अनु ७८ । २४)

अर्थात् मैं सदा गौओका दर्शन करू और गौए मुझपर कृपा दृष्टि करें । गौए हमारी हैं और हम गौओकै हैं । जहां गौए रहें, वहीं हम रहें, चूँकी गौए हैं इसीसे हमलोग भी हैं।w


रविवार, 23 अगस्त 2020

चमत्कारी वनस्पति ब्रह्मांड की खगोलीय ऊर्जा के साथ इस वनस्पति जगत भी कई रहस्यमयी ऊर्जा छिपाये हुए हैं हमारे पूर्वज इन रहस्य को जानकर उसका सदुपयोग अपने स्वास्थ्य के लिए करते थे

  


किसी भी व्यक्ति का शरीर का तापमान की जानकारी लेना हो बिना किसी भी थर्मामीटर या किसी भी अन्य यंत्र के तो नीचे लिखे तरीके से जानकारी ले सकते है ।

पुरुष की नाड़ी परीक्षण हमेशा दाहिनी हाथ से किया जाता है और महिला की बायी हाथ से।

अगर किस भी व्यक्ति का शरीर का
60-65 पल्स है तो शरीर का तापमान 98 डिग्री फ़रेनहाएट
70 पल्स है तो 99 डिग्री फ़रेनहाएट तापमान
80 पल्स है तो 100 डिग्री तापमान
90 पल्स = 101 डिग्री फ़रेनहाएट
100 पल्स = 102 डिग्री फ़रेनहाएट
110 पल्स = 103 डिग्री फ़रेनहाएट
120 पल्स = 104 डिग्री फ़रेनहाएट
130 पल्स = 105 डिग्री फ़रेनहाएट
140 पल्स = 106 डिग्री फ़रेनहाएट

यानि हर 10 स्पंदन बढ़ने पर 10 डिग्री तापमान शरीर का बढ़ेगा गर्भ में बच्चा का पल्स 140 से 150 होगा

सबसे अच्छा पल्स 70 से 74 के बीच होना चाहिए ।

आयु के अनुसार रक्‍तचाप (Blood Pressure) नापने का अद्भुत तरीका।
गर्भ में बच्चा का बी पी माँ के बी पी के बराबर होगा
जन्म से 5 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 81 और लोअर लिमिट 45
5 साल से 10 साल तक बी पी का हाईयर लिमिट 90 और लोअर 50
10 साल से 15 साल तक हाई 100 और लोअर 62
15 साल से 20 साल तक हाई बी पी 110 और लोअर बी पी 71
20 साल से 30 साल तक हाई बी पी 120 और लोअर बी पी 80
30 साल से 35 साल तक हाई बी पी 124 और लोअर बी पी 82
35 साल से 40 साल तक हाई बी पी 126 और लोअर बी पी 83
40 साल से 50 साल तक हाई बी पी 128 और लोअर बी पी 84
50 साल से 60 साल तक हाई बी पी 132 और लोअर बी पी 86
60 साल से 65 साल तक हाई बी पी 136 और लोअर बी पी 88
65 साल से 80 साल तक हाई बी पी 140 और लोअर बी पी 90
80 साल से ऊपर तक हाई बी पी 145 और लोअर बी पी 92

किसी किसी का बी पी में + 5 या – 5 का अंतर हो सकता है तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी । उस से ज्यादा अंतर आने पर व्यक्ति बीमार कहलाएगा

  भारत भूमि का प्रकृति के साथ जीवन जीने की पद्धति एक सनातन पद्धति रही है प्रकृति ने जीव और वनस्पति दोनों  के हम अपने जीवन में सदुपयोग करें उनके साथ कैसे सहजीवन जीयें यह एक बहुत चमत्कारिक विज्ञान रहा है जो अब विलुप्त सा हो रहा है यह पोस्ट बहुत  पढ़े-लिखे मूर्खलोगों के लिए तो नहीं है पर कुछ लोग और हमारे आदिवासी बनवासी भाई अभी भी इन चमत्कारों का उपयोग अपने जीवन में करते हैं और अभी कुछ ग्रामीण भाई भी  इसका उपयोग करते हैं  यह पोस्ट उन्हीं लोगों के लिए है ।  इस नई आधुनिक शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा डालने के बादऔर नए और आज के आधुनिक समाज के लोग बड़े-बड़े हॉस्पिटलों की शोभा बढ़ाते हैं जब तक उनका शोषण किया हुआ पूरा धन लूट नहीं जाता है तब तक वो  किसी सामान्य  और बिना पैसे की चिकित्सा का  वह सहारा नहीं लेते इसी संदर्भ में आपको आज कुछ चमत्कारिक वनस्पतियों का और ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ हमारे पर क्या प्रभाव पड़ता है एक लेख आपको भेज रहा हूं कहीं कहीं आपको उलझन भी होगी पर आप अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल जरूर करेंगे कि 100 प्रतिशत कोई प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता पर बहुत सारा रहस्य भी इसमें छिपा हुआ है आप अपनी क्षमता का उपयोग करें
१. श्वेत पुनर्नवा की जड़ को दूध के साथ घिसकर पिलाने से स्त्री को गर्भ ठहरता है।
२. श्वेत रांगणी मूल पुष्य नक्षत्र में लेकर एक वर्ण की गाय के दूध में पिए तो बंध्या भी पुत्रवती होती है।
३. श्रवण नक्षत्र में आँवली की जड़ नागर बेल के रस में पिए तो स्त्री नवयौवन होती है।
४. अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ को लाकर सर पर रखे तो शत्रु भी मित्र हो जाते हैं।
५. हस्त नक्षत्र में चम्पा की जड़ लाकर गले में पहनने से भूत-प्रेत नहीं .......
https://ajaykarmyogi1.blogspot.comमाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 93369 19081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क करें

अनुराधा नक्षत्र में चमेलीमें चम्पा की जड़ लाकर गले में पहनने से भूत-प्रेत नहीं लगता।
६. पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर दूध में घिसकर पिलाने से बाँझ स्त्री को संतान की प्राप्ति होती है।

७. पुनर्वसु नक्षत्र में मेहँदी की जड़ लाकर पास में रखने पर शरीर से अच्छी सुगंध आती है।
८. अश्विनी नक्षत्र में अर्धरात्रि में नग्न होकर अपामार्ग की जड़ को लाए।
फिर उसे गले में ताबीज के अंदर धारण करने पर राज्य अधिकारी तथा उच्चाधिकारी अनुकूल होते है।
९. श्वेतसरपंखा की जड़ को नाभि पर लेप वीर्य का स्तम्भन होता है।
१०. मयूरशिखा की जड़ को तीन दिन दूध के साथ पीने से स्त्री पुत्रवती होती है।
११. मातुलिंग (बिजौरा) के बीज के दूध के साथ खीर बनाकर घी के साथ पीने पर स्त्री को निश्चय ही गर्भधारण होता है।
१२. लक्ष्मणा तीन भाग, उभयलिंगी चार भाग, बिहाली छः भाग सब मिलाकर गाय के दूध में पीसकर ऋतुकाल में स्त्री को पिलाने से पुत्र उत्पन्न होता है।
१३. ज्येष्ठ नक्षत्र में जामुन की जड़ लाकर पास रखने पर राज्य सम्मान मिलता है।
१४. स्वाति नक्षत्र में मोगरा की जड़ लेकर भैंस के दूध में घिसकर पीने से रंग में निखार आता है व गोरापन बढ़ता है।
१५. मघा नक्षत्र को पीपल की जड़ लेकर अपने पास रखने पर रात में दुःस्वप्न नहीं आते है।
१६. भरणी नक्षत्र में संखाहोली की जड़ लाकर चांदी अथवा सोने के ताबीज में लगवाकर पहनने से परस्त्री वशीभूत होती है...
  *मघा नक्षत्र के फायदे...*
*जिस दिन मघा नक्षत्र में होने वाली बारिश के पानी को एकत्र करके जब भी आंख लाल हो या आपको किसी भी कारणवश आपके आंखों कों थकान हुई हो अथवा आंख संबंधित किसी भी रोग में इस पानी के बूंदो को आंखों में डालने से आंखों के रोग मिटते हैं।*

*जब एलोपैथी उपचार पद्धति का अस्तित्व नहीं था तब मघा नक्षत्र के इसी जल का प्रयोग आंखों के इलाज के लिए हुआ करता था।*

*सोशल मीडिया की सेवा करने वाले ततपर भाई बहन इसका फायदा ज़रूर लेवें  कांच की शीशी में गंगाजल मिला कर रख लेवें ताकि इसका लम्बे समय तक उपयोग कर पाएं ।

आज ऋषिपंचमी पर्व हैं.....आज महिलाये व बालिकायें उपवास कर अपामार्ग की 108 ठंठल की गठरी बनाकर सिर पर रखती है और 108 लौटे या मग पानी सिर पर डालकर स्नान करती है ... कहीं कहीं इसकी दातुन भी की जाती है .....इसकी दातून करने से दांत काफी मजबूत होते है और कई वर्षों तक उनमें किसी प्रकार का कीड़ा नही लगता....वहीं इसके डंठल से स्नान करने पर मस्तिष्क में जमा हुआ कफ निकल जाता है साथ ही बालों में छिपे कीड़े भी निकल जाते है...।।

अपामार्ग को #चिरचिटा, #लटजीरा, #चिरचिरा, #चिचड़ा आदि नामों से जाना जाता हैं...।

इस समय सड़क हो या नदी-तालाब किनारे या बंजर भूमि हर कहीं आपको अपामार्ग का पौधा आसानी से दिख जावेगा....हमारे मालवांचल में तो हर गांव कस्बे में यह बड़ी मात्रा में पैदा होता हैं.... पर इसको अपामार्ग के नाम से कोई नही जानता,,हर कोई #आंधीझाड़ा कहता हैं,जो कहीं न कहीं इसका अपमान ही है क्योंकि आंधीझाड़ा का मतलब हमारे इधर बेकार की झाड़ी से लगाया जाता हैं....।

गुणों की खान "अपामार्ग"

अपामार्ग एक बहुओषधिय पौधा हैं, जिसका तना,जड़,पत्ते,बीज सभी का औषधीय मूल्य है....
अपामार्ग को अघाडा ,लटजीरा या चिरचिटा आदि नामों से जाना जाता हैं....।
आंधीझाड़ा के पत्ते ऋषिपंचमी ,गणेश पूजा , हरतालिका पूजा,मंगला गौरी पूजा आदि समय काम आते है .शायद पूजा में इस्तेमाल ही इसलिए होता होगा ताकि हम इनके आयुर्वेदिक रूप को पहचान सके और ज़रुरत के समय इनका सदुपयोग करना ना भूले....।

इसके पत्तों को पीसकर लगाने से फोड़े फुंसी और गांठ तक ठीक हो जाती है ...अपामार्ग की जड़ को कमर में धागे से बाँध देने से प्रसव सुख पूर्वक हो जाता है, प्रसव के बाद तुरन्त इसे हटा देना चाहिए....।
ज़हरीले कीड़े काटने पर इसके पत्तों को पीसकर लगा देने से आराम मिलता है ...वहीं इसकी ५-१० ग्राम जड़ को पानी के साथ घोलकर लेने से पथरी निकल जाती है ....इसके बीज चावल की तरह दीखते है ,जिन्हें #तंडुल कहते है .....यदि स्वस्थ व्यक्ति इस तंडुल की खीर खा ले तो उसकी भूख-प्यास आदि समाप्त हो जाती है ,पर इसकी खीर उनके लिए वरदान है जो भयंकर मोटापे के बाद भी भूख को नियंत्रित नहीं कर पाते,कालांतर में ऋषि-मुनि इस प्रकार की खीर का उपयोग कर लंबी साधना को पूर्ण करते रहे है......।

अपामार्ग से जुड़ी कोई जानकारी हो तो अवश्य साझा करें....।।

 ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆  अभी मघा नक्षत्र चल रहा है
  एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 9336919081 पर केवल व्हाट्सएप संपर्क करें


शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

हरितालिका व्रत और त्योहार ही ईस सनातन संस्कृति को बचा रहे हैं दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने हेतु हरतालिका तीज व्रत का बड़ा महत्व है


 भारतीय सनातन संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत सारे अब्राहमिक संस्कृतियों के  दानव राक्षस और यहां के अल्प शिक्षित पढ़े-लिखे मूर्ख अपने ही जड़ों को खोद रहे हैं जिसके परिणाम स्वरुप पूरा सनातन परंपराएं नष्ट हो कर पूरा समाज और घर बिखर रहे हैं ।स्त्री पुरुष की एकता व सात जन्मों तक का साथ निभाने वाला दांम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने वाली भारतीय सांस्कृतिक के छरण से एक हजार प्रतिशत से ज्यादा तलाक के केस बढ़ गये हैं और घर और समाज विखंडित हो रहा है 
वहीं कामी वामी और इस देश के दुश्मन स्त्री और पुरुष को अलग करने में और ऐसे त्यौहारों को हेय दृष्टि या निम्न स्तर का दकियानूसी विचार कहकर  ऐसे व्रत त्यौहारों की निंदा करते हैं फिर भी इस समाज ने धर्म की  जड़े बड़ी गहरी है आप सबको हरि तालिका तीज पर महादेव जी की कृपा बनी रहे और परिवार आपका सुगठित संगठित बना रहे शिव परिवार की तरह

हरतालिका तीज व्रत इस साल 21 अगस्त, शुक्रवार को रखा जाएगा। सभी सुहागन स्त्रियां इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और #स्वास्थ्य_की_कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन जो कोई भी स्त्री अपने पति का हित सोचकर व्रत रखती है, उसका #पति_दीर्घायु होता है। मान्यता है कि भगवान शिव और देवी पार्वती व्रतियों को सुख-संपत्ति, धन-धान्य, पुत्र-पौत्र और स्वस्थ जीवन का वरदान देते हैं।

👉 हरतालिका तीज व्रत का महत्व
इस व्रत को फलदायी माना जाता है। उत्तर भारत में इस व्रत की बहुत अधिक मान्यता है। कहते हैं अगर कोई कुंवारी कन्या अपने #विवाह की कामना के साथ इस व्रत को करती है तो भगवान शिव के आशीर्वाद से उसका विवाद जल्द हो जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि अगर कोई कुंवारी कन्या मनचाहे पति की इच्छा से हरतालिका तीज व्रत रखती है तो भगवान शिव के वरदान से उसकी इच्छा पूर्ण होती है।

👉 मान्यता है जो स्त्रियां इस व्रत को
सच्चे मन से करती हैं उसे #अखंड_सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।यह त्योहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में मनाया जाता है। वहीं, कुछ दक्षिणी राज्यों में इस व्रत को गौरी हब्बा कहा जाता है
👉 हरतालिका तीज व्रत का इतिहास
माना जाता है कि देवी पार्वती के पिता हिमालय ने उनका विवाह श्रीहरि विष्णु के साथ तय कर दिया था। लेकिन उन्होंने तो मन ही मन शिव जी को #अपना_पति मान लिया था। महादेव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती जंगल में तपस्या करना चाहती थीं। तब माता पार्वती की एक सखी उन्हें हर कर घन घोर जंगलों में ले आई। तब से हरतालिका तीज मनाई जाती है।

👉 इस विधि से करें पूजा
इस व्रत में पूजन रात भर किया जाता है. इसके बाद बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती का मूर्ति बनाकर पूजा करें. एक चौकी पर शुद्ध मिट्टी में #गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सहेली की प्रतिमा बनाई जाती है. ध्यान रहें कि प्रतिमा बनाते समय भगवान का स्मरण करते रहें और पूजा करते रहें. इस दिन पूजन-पाठ करने के बाद महिलाएं रात भर भजन-कीर्तन करती हैं. हर प्रहर को पूजा करते हुए बेल पत्र, आम के पत्ते आदि अर्पण करें. फिर शिव-गौरी की आरती करें।

👉 भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें
ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शंभवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

👉 माता पार्वती की पूजा करते वक्त पढ़ें ये मंत्र
ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:
👉 पूजन विधि
हरितालिका तीज पर #मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इसके बाद इन्हें लकड़ी की चाैकी पर लाल कपड़ा बिछाकर आसन दिया जाता है। चाैकी को फूलों व केले के पत्तों से सजाया जाता है। चाैकी के सामने एक कलश भी रखा जाता है। इस दाैरान शिव-पार्वती पर जल छिड़ककर उन पर फूल व फल चढ़ाए जाते है। धूप, दीप, मेवा, पंचामृत, पान, मिठाई आदि अर्पण किया जाता है। माता पार्वती पर मेंहदी, चूड़ी, सिंदूर, महवर, बिंदी समेत सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। इसके बाद हरतालिक तीज की कथा पढ़ी व सुनी जाती है।

👉 हरतालिका तीज की परंपरा-
हरतालिका तीज व्रत का प्रचलन अति प्राचीन काल से है. कब और कहां से इसका प्रारंभ हुआ, इस बारे में विशेष विवरण नहीं मिलता. लेकिन व्रत का संबंध शिव औऱ पार्वती से है, ऐसा सब मानते हैं. मान्यता है कि भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए सबसे पहले माता पार्वती ने #हरतालिका तीज व्रत का अनुष्ठान किया था. कुछ लोग इसे शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और कुछ लोग इसे शिव को अमरता प्रदान कराने वाले व्रत के तौर पर भी मानते हैं.

👉 ऐसे किया जाता है व्रत
व्रत वाले दिन महिलएं #सुहाग की सारी वस्‍तुएं माता पार्वती को अर्पित करती हैं। सुबह पूजा के बाद महिलाएं दिन भर निर्जला व्रत करती हैं। पूजन के लिए गौरी-शंकर की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है।

👉 हरतालिका तीज की कथा
हरतालिका तीज के व्रत की कथा भी माता पार्वती और शिवजी से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि पिता द्वारा कराए गए यज्ञ में जब माता पार्वती से शिवजी का अपमान बर्दाश्‍त नहीं हुआ तो उन्‍होंने उसी #यज्ञ_की_अग्नि में कूदकर आत्‍मदाह कर लिया। फिर अगले जन्‍म में वह राजा हिमाचल की पुत्री उमा के रूप में जन्‍मी और इस जन्‍म में भी उन्होंने भगवान शिव को मन ही मन अपना पति मान लिया।

👉 गौरी-शंकर की होती है पूजा
इस व्रत में मुख्‍य रूप से भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्‍त रूप से पूजा होती है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्‍नान करने के बाद 16 श्रृंगार करती हैं। मान्‍यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए भी कठोर तपस्‍या की थी, तब जाकर भगवान शिव उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे। सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत किया था और इसके प्रभाव से शिवजी उन्‍हें पति के रूप में प्राप्‍त हुए थे।
👉 महिलाएं रखती हैं निर्जला व्रत
सौभाग्‍य की कामना और पति की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत हरतालिका तीज #भाद्र_मास_के_शुक_पक्ष की तृतीया को रखा जाता है। इस साल यह व्रत 21 अगस्‍त को है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ती हैं और पति का आशीर्वाद लेकर इस व्रत को पूर्ण करती हैं। कुछ स्‍थानों पर कुंवारी कन्‍याएं भी सुयोग्‍य वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं।

👉 हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त
पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 21 अगस्त को पड़ रही है. इस दिन #उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा. इस दिन सिद्ध योग का निर्माण हो रहा है. इस दिन सूर्य सिंह राशि और चंद्रमा कन्या राशि में रहेगा. 21 अगस्त को प्रात: काल मुहूर्त 05 बजकर 53 मिनट 39 सेकेंड से 08 बजकर 29 मिनट 44 सेकेंड तक. प्रदोष काल मुहूर्त 18 बजकर 54 मिनट 04 सेकेंड से 21 बजकर 06 मिनट 06 सेकेंड तक रहेगा. हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त शाम 6 बजकर 54 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक रहेगा

👉 हरतालिका तीज: निर्जला एवं फलहारी
हर​तालिका तीज व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह बेहद ही #कठिन_व्रत होता है। इसे दो प्रकार से किया जाता है। एक निर्जला और दूसरा फलहारी। निर्जला व्रत में पानी नहीं ​पीते हैं और न ही अन्न या फल ग्रहण करते हैं, वहीं फलाहारी व्रत रखने वाले लोग व्रत के दौरान जल पी सकते हैं और फल का सेवन करते हैं। जो कन्याएं निर्जला व्रत नहीं कर सकती हैं तो उनको फलाहारी व्रत करना चाहिए।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...