बुधवार, 4 अप्रैल 2018

पुरी शंकराचार्य, अजय कर्मयोगी के अलावा संदीप माहेश्वरी, विवेक बिंद्रा और कैरी minati जैसे सनातन संस्कृति द्रोही धन पशु और मां बहन को गालियां देने वाले 100 करोड़ से ऊपर देखने वाले क्यों

मैं अभी 20 वर्ष का हूँ। पुरी शंकराचार्य जी को मात्र डेढ़ वर्ष से सुन रहा हूँ।
सोचता हूँ कि यदि 2010-2012 में ही यूट्यूब और अथाह इंटरनेट आज जितना सामान्य होता और पुरी शंकराचार्य जी भी यूट्यूब पर होते, तो हो सकता है कम से कम मैं सनातन धर्म का एक छोटा सा वैचारिक सैनिक तो बन ही जाता। बचपन से आचरण भी शुद्ध स्मार्त द्विज वाला होता।
आज जो बच्चे हैं, उनके लिए यह सब अत्यंत सुलभ है। परन्तु स्वयं को हिन्दू कहने वाले कितने लोग अपने बच्चों को पुरी शंकराचार्य जी के उपदेश सुनाते हैं?
संदीप माहेश्वरी, संस्कृत का मजाक उड़ाने वाले पाखण्डी, के चैनल पर 101 करोड़ से अधिक Views हैं। विवेक बिंद्रा, जो लोगों को धनपशु पूँजीवादी बनाकर छोड़ेगा, के चैनल पर 85 करोड़ से अधिक Views हैं। यही नहीं, माँ-बहन की गालियाँ देने वाले Carry Minati के 187 करोड़ Views हैं।
लेकिन Govardhan Math, Puri नामक चैनल के कुल Views हैं मात्र 2 करोड़ 56 लाख। Views मतलब चैनल के सभी वीडियो के Views का योग।

(गोवर्द्धन मठ, पुरी के चैनल की लिंक – https://www.youtube.com/c/GovardhanMathPuri )
 वहीं श्री अजय कर्मयोगी जी योगी जी जो धर्म संस्कृति गाय गांव गुरुकुल और अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र को सामने लाने का कार्य जान की बाजी लगा कर एक अद्वितिय अनुपम कार्य कर रहे हैं इस चैनल को कोई रैंकिंग ही नहीं है
https://m.youtube.com/c/9336919081gurukulam/featured
  इस देश में 100 करोड़ से भी ऊपर हिंदू हैं। 74 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जिसमें 39 करोड़ के पास Jio है। और, श्री विष्णु, ब्रह्माजी इत्यादि से भी अधिक कट्टर "हिंदूवादी" पार्टी BJP के 18 करोड़ सदस्य हैं।

कितने लोग "शंकराचार्य" शब्द को गूगल करते हैं? कितनों को सब मठों और आचार्यों के नाम याद है? आदि शंकराचार्य जी का जन्म कब हुआ यह पता है?
 कितने लोगों को पता है कि कश्मीर में शारदा सर्वज्ञ पीठ भी है
Google Trends पर देख लीजिए भारत में "Porn" और "Shankaracharya" दोनों कितना सर्च होता है।

देखिये, सीधा सा सूत्र है– जानाति इच्छति अथ करोति।

व्यक्ति पहले विषय का ज्ञान लेता है, फिर उसे उस विषय को प्राप्त करने की इच्छा होती है, उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए वह व्यक्ति कर्म करता है।
जिसे धन ही धन का ज्ञान दिया जायेगा, वह धन के लिए अपने पिता की भी हत्या कर देगा। जिसे स्वर्ग के बारे में सिखाया जाएगा, वह स्वर्ग के लिए कठोर तपस्या भी कर लेगा। जन्नत और हूर की तालीम वाले बम बांधकर स्वयं को उड़ा लेते हैं, जबकि वे भी ऋषियों, राजर्षियों के ही वंशज हैं।
सोचिये! वे बम बांधकर उड़ने के लिए तैयार हैं।
लेकिन हम तो कहते हैं कि हमें नागरिकों से कोई युद्ध, कोई संघर्ष, कोई क्रांति, कोई आंदोलन नहीं चाहिए। कारण है कि यह सनातन धर्म की विधि नहीं कि प्रजा को संघर्ष में झोंके। इसके लिए शुद्ध वैदिक-स्मार्त आचरण वाले लोगों में भी जो श्रेष्ठ हैं, वे योद्धा पृथक् से होते हैं।
आप केवल वैचारिक रूप से धार्मिक अर्थात् धर्मनिष्ठ, शास्त्रनिष्ठ, परम्परावादी बनिये, इतना ही अपेक्षित है। यदि इतना भी ना कर सकें, तो स्वयं पतित मत होइए और दूसरों को भ्रमित मत कीजिये।
इसके लिए कम से कम मूलभूत जानकारी तो प्राप्त कीजिये। यदि आप अयोग्य हैं, तो अब अपने बच्चों को जानकारी के स्रोत और सनातन परम्परा से जोड़िए।
हर हर महादेव।
साभार : क्षितिज सोमानी
 
सच्चे संत-महात्मा वासना, कामना, ममता, आसक्ति एवं दर्प-अभिमानसे सर्वथा रहित होते हैं, इससे न तो उन्हें स्वयं अपने संतपनका स्मरण रहता है और न वे दूसरोंको ही इसकी स्मृति दिलाते हैं । अतः उनके द्वारा ऐसा कुछ कार्य होता ही नहीं, जिसमें संत कहलानेकी उनकी छिपी वासना भी हो । कहलाना वही चाहते हैं, जो हैं नहीं, जो हैं, वे तो हैं ही । अतएव इन सच्चे संत-महात्माओंका आदर्श सामने रखकर तुम सच्चे संत-महात्मा बनो ।

(‘कल्याण’ पत्रिका; वर्ष – ६६, संख्या – ६ : गीताप्रेस, गोरखपुर)
साभार ईश्वर त्रिपाठी जी


शुक्रवार, 30 मार्च 2018



खतरे की घंटी और अरबपतियों का भारत से पलायन ।
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हकिकत में भारत में अरबपति के लिए भाषा और समज की गरबडी है । खर्चिली लाईफस्टाईल और कुछ आंकडे से ही अरबपति बता दिए जाते हैं । आंकडे प्लस है या मायनस है वो देखा नही जाता है । जो खूद की कमाई, खूद के पैसे से अरबपति बने हैं वो ही सच्चे अरबपति है, प्लस साईड में है । उधार के पैसे से बने है वो तो मायनस साईड के अरबपति है । ऐसे अरबपति को पहले अरबों कमाकर उधार चुकाकर जिरो में आना पडता है और फिर सच्चा अरबपति बनने के लिए दुसरीबार अरबों कमाना पडता है ।
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एक प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2017 में भारत से करीब 7000 अमीर देश छोड़कर विदेशों की ओर पलायन कर गये हैं । 135 करोड़ की आवादी वाले देश से कुछ हजार लोगों का पलायन करना भले ही छोटी बात हो लेकिन यह घटना बहुत गंभीर है । क्योंकि जहाँ भारत की 73 प्रतिशत संपत्ति 1 प्रतिशत लोगों के पास है और वही लोग पलायन करने लगे तो उनके साथ भारत का कितना धन वो ले जा रहे हैं । साल 2017 में देश से करीब 7000 अमीरों ने पलायन किया, साल 2016 में यह आकड़ा 6000 था, 2015 में 4,000, साल दर साल यह आकड़ा बढ़ता ही जा रहा है । इन लोगों ने देश छोड़कर अन्य देशों में शरण ली है। ये आंकडे चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा है।
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रिपोर्ट के अंतमें कहा गया है कि देश से बढ़ता पलायन भारत के लिए बड़े खतरे की घंटी मान जा सकता है।
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खतरे की घंटी बजी इसलिए अमीर भागे, या भागे इसलिए खतरेकी घंटी बजी?
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जहां सरकार विदेशी निवेश के लिए मरी जा रही हो वहां देश के ही निवेशक अपना निवेश लेकर अन्य देशों में चले जाए वो खतरे की ही घंटी है । और उधारी अरबपति दुसरों का पैसा लेकर भाग जाए वो तो डबल खतरे की घंटी है । खूदका पैसा लेकर जानेवाले को कोइ रोक नही सकता, लेकिन देश के अर्थतंत्र को नूकसान ही है । चोर अरबपति को रोका जा सकता है लेकिन ऐसे लोग सरकारी तंत्रकी सांठगांठ से भागने में सफल हो जाते हैं । ये देश को लूटकर ही भागे हैं तो देश के अर्थतंत्र को नूकसान ही नूकसान है । मान लें कि चोर तो अपनी गरदन बचाने के लिए भागे हैं । अन्य क्यों जा रहे हैं वो सोचना होगा । चोर अपनी गरदन बचाने के लिए और अन्य अपना धन बचाने के लिए । यही बात लगती है ।
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भारत से अधिक चीनी अरबपति चीन छोडकर भाग रहे हैं । खतरे की घंटी चीनी अमीरोंने पहचान ली थी, वो सही थे, चीन के प्रमुख को आजीवन प्रमुखपद मिल गया, अब वो चीन में कितनी भी लूटमार चलाए कोइ उसे पद से उतार नही सकता ।
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अमीर आम नागरिक से अधिक बुध्धिमान होते हैं, तभी तो अरबपति बन जाते हैं । सरकार बदलते ही खतरेकी घंटी उन्होंने सुन ली थी, जब कि आम नागरिक घर घर मोदी और हिन्दुत्व के नारे बोलने सुनने में व्यस्त था । भारत से भाग रहे अमीरों की आशंका सही सिध्ध हुई है । मोदी जेटली ने भारतके अर्थतंत्र का कबाडा कर दिया है । और आनेवाले सालों में से मोदी का विकल्प मिटा दिया गया है । चाहे कितनी भी लूट मचा दे मोदी ही मोदी होगा...मोदी जैसे सनकी राजनेता का राजपाट ही खतरे की घंटी बन गया है तो अमीरों का डर जाना स्वाभाविक है । अमीरों में देशभावना या देश का मोह नही होता । जहां उनका धन सलामत रहे, धंधे में एक का दो हो सके ऐसे देश में जान उनको ठीक लगता है । भारत में धंधे की कोइ गेरंटी ही नही रही हो तो वो करे भी क्या ..एक ओर बात भी है ...चीन और भारत जैसे देशों में जो सरकारों के पिठ्ठु नही है ऐसे धनवानों के धनकी कोइ सलामति नही रही है, क्योंकि न्यु वर्ड ऑर्डर का नया साम्यवाद अजगर की तरह देशों को निगालने के लिए तैयार हो गया है ।

शुक्रवार, 23 मार्च 2018



वीरशैव लिंगायत प्राचीन शिवभक्त थे ।
इस सम्प्रदाय को विदेशियों ने मूर्ख बनाया और ये अपने मृतकों को दफ़नाने लगे ।
विदेशियों ने सिखों को भी बहकाना चाहा ( कि वे भी अपने मुर्दों को दफनाएं ) , पर जमीन से जुड़ा सिख समुदाय उनके झांसे में नहीं आया !!
आज वीरशैव लिंगायत नाम का ये सम्प्रदाय अपने मृतकों के शरीर दफ़नाता है , अतएव ये हिन्दू नहीं है।
कडप्पा का कलेक्टर चार्ल्स फिलिप ब्राउन जायोनिस्टों का वह एजेंट था, जिसकी वजह से लिंगायत अपने मृतकों का दाह-संस्कार नहीं कराते -- वे मृतकों को दफ़नाते हैं -- अतएव हिन्दू नहीं हैं।
(हिन्दू होने की एकमात्र शर्त है -- मृतकों का दाह-संस्कार करना)
धूर्त CP ब्राउन ने #वेमना के नकली #बासव_पुराण का अनुवाद किया और इसका इतना प्रचार करवाया कि आज तेलुगु की स्कूली किताबों में वेमना के नकली पद पढ़ाए जाते हैं ।
जैसे महाराष्ट्र में चितपावन यहूदियों को सत्ता की मलाई खाने को मिली -- कर्नाटक/ आंध्र में लिंगायतों को दी गई । इनमें से अधिकतर देशद्रोही थे ।
1832 - 1833 का कुख्यात गुंटूर- अकाल ( जो जान बूझकर उत्पन्न किया गया, ताकि वहाँ से लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर विदेश भेजा जा सके) , जिसके बाद किसानों पर अत्यधिक टैक्स लगाया गया -- उस समय गुंटूर का कलक्टर कौन था -- वही CP ब्राउन, रोथ्सचिल्ड का एजेंट … पर कमाल देखिये, तेलुगू लोग इसे अपना सबसे बड़ा हमदर्द मित्र मानते हैं ...
और बनाओ - मूर्तियाँ , यूनिवर्सिटी , पोस्टेज स्टाम्प -- पूजा भी करो साले की !
बोलो कर्नाटक वालो -- CP ब्राउन की . . . जै !

गुरुवार, 15 मार्च 2018




भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति में योग और संगीत का समावेश भी प्राचीन काल से है। स्‍वर साधना स्‍वयं एक यौगिक क्रिया है जिसमें मन, शरीर व प्राण तीनों में शुद्धता एवं चैतन्‍यता आती है। भारतीय संस्‍कृति में योग के साथ संगीत का गहरा रिश्‍ता रहा है। योग के सिद्धान्‍त के अनुसार श्‍वासों से जुड़ना अर्न्‍तमन से जुड़ना है और व्‍यक्‍ति जब अन्‍तर्मन से जुड़ जाता है तो ऋणात्‍मक संवेग कम हो जाता है और धनात्‍मक संवेग स्‍थायी होने लगते हैं। ये धनात्‍मक संवेग मनोविकारों से व्‍यक्‍ति को दूर रखते हैं।
किंवदन्‍ती है कि समुद्र गुप्‍त जब वीणा वादन करता था तो उसके उपवन में बसंत ऋतु का आभास होता था। संगीत द्वारा पेड़ पौधों को रोग-ग्रस्‍त होने से बचाया जा सकता है। पं0 ओम्‌कार नाथ ठाकुर जी ने भैरवी के प्रभाव को पौधों पर महसूस किया। विद्वानों के मत से चारूकेशी राग से धान का उत्‍पादन बढ़ता है। भरतनाट्‌यम्‌ नृत्‍य फूलों के बढ़ने में सहायक है। अन्‍नामलाई विश्‍वविद्यालय के वनस्‍पति शास्‍त्र के विशेषज्ञ डा0 टी0सी0एन0 सिंह ने ध्‍वनि तरंगों के प्रयोग द्वारा पौधों की उत्‍पादन क्षमता में वृद्धि की बात स्‍वीकार की है। संगीत के मधुर स्‍वर से पौधों में प्रोटोप्‍लाज़्‍म कोष में उपस्‍थित क्‍लोरोप्‍लास्‍ट विचलित व गतिमान हो जाता है।
बहेलियों के बीन तथा सपेरे के बीन बजाने पर मृग व सर्प मोहित हो जाते हैं। कनाडा में संगीत सुनाकर अधिक दूध गायों से प्राप्‍त किया जाता है। पं0 ओमकार नाथ ठाकुर जी ने नाद की महत्ता को स्‍वीकार करते हुये कहा है कि- ‘‘मैंने नाद की मधुरता से हिंसक जानवर शेर, चीतों आदि की आँखों में कुत्ते सी मोहब्‍बत पलते देखी है।''
स्‍पष्‍ट है कि संगीत कला ऐसी कला है जो मन की गहराईयों को छूकर परमानन्‍द की प्राप्‍ति कराती है। यह रोगी को निरोगी और संवेदनाशून्‍य को संवेदनशील बनाती है। भारतीय संगीत प्रेरणा व प्राण शक्‍ति को पहचान कर पाश्‍चात्‍य विद्वानों की मान्‍यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्‍टि करने लगी हैं। संगीत के माध्‍यम से विभिन्‍न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किये जा रहे हैं वे अत्‍यन्‍त चमत्‍कारिक एवं सम्‍भावनाओं से परिपूर्ण हैं।
भारतीय संगीत की प्रमुख विशिष्‍टता ‘रागदारी संगीत' है। राग भारतीय संगीत की आधारशिला है। इसके अर्न्‍तनिहित स्‍वर-लय, रस-भाव अपने विशिष्‍ट प्रभाव से व्‍यक्‍ति के मन-मस्‍तिष्‍क को प्रभावित करता है। स्‍वर तथा लय की भिन्‍न-भिन्न प्रक्रिया उसकी शारीरिक क्रियाओं, रक्‍त संचार, मान्‍सपेशियों, कंठ ध्‍वनियों आदि में स्‍फूर्ति उर्जा उत्‍पन्‍न करते हैं तथा व्‍याधियों को दूर करते हैं।
विभिन्‍न रोगों के लिये संगीतज्ञों एवं संगीत चिकित्‍सकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने कुछ राग निश्‍चित किये हैं, जो उन रोगों को दूर करने में सहायक सिद्ध हुये हैं, हो रहे हैं।


वसंत ऋतु स्वस्थ रहने के लिए पंचकर्म कराईए


कम से कम पांच हज़ार वर्ष पूर्व का एक गहन विचार-विमर्श है, जो भारत के दो धुरंधर आयुर्वेदाचार्यों के मध्य हो रहा था। देखिये ”हे भगवन! निश्चित ही आपने सभी रोगों की चिकित्सा के रूप में पूरे पंचकर्म या इसके अलग-अलग घटकों को कहा है। लेकिन, हे चिकित्सक श्रेष्ठ! क्या ऐसा कोई रोग है जो चिकित्सा से तो साध्य है, पर पंचकर्म से ठीक नहीं होता हो?”—अग्निवेश ने अपने महान गुरु आत्रेय से पूछा। ”हाँ, है। ऊरुस्तम्भ।”—आत्रेय का उत्तर था।
यहां दो स्पष्ट संदेश हैं। ऊरुस्तम्भ के बारे में तो उत्तर स्पष्ट ही है और उस पर हम कभी और चर्चा करेंगे। पर अग्निवेश और आत्रेय की इस चर्चा में एक गहरा सन्देश तमाम रोगों के विरुद्ध पंचकर्म और इसकी घटक क्रियाओं की विशाल प्रयोज्यता और उपयोगिता के बारे में है। जब रोगों के उपचार या स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की बात आती है, तो आयुर्वेदिक पंचकर्म के टक्कर की और कोई विधि नहीं है। सभ्यताओं के विनाश काल में भी, अगर आदमी मौत के मुंह में जाने का काम ही न कर रहा हो, तो पंचकर्म सबसे दुरुस्त चिकित्सा है। (च.वि.3.13)
वसंत ऋतु आने वाली है और यह समय होगा जब आप पंचकर्म या ऋतुचर्या के अनुसार कम से कम पंचकर्म के एक घटक, वमन का प्रयोग कर सकते हैं। इस पर आगे चर्चा करते हैं। आइये वसंत के कुछ लक्षण देखते हैं। हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में शरीर में संचित कफ, वसन्त ऋतु में सूर्य की गर्मी से कुपित होकर, जठराग्नि को बाधित करता है जिसके कारण उनके कफज व्याधियां उत्पन्न हो सकती हैं। अत: कफ को निकालने के लिए वसन्त ऋतु में शिरो विरेचन, वमन, कवल-धारण आदि का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये लाभकारी रहता है। इसके साथ ही उबटन, गुनगुने पानी का प्रयोग, उद्यानों एवं वनों में घूमना, पैदल चलना तथा शारीरिक व्यायाम भी बसंती-ऋतुचर्या के उपयोगी आयाम हैं। पुष्पित पल्लवित वनों में इनका अनुभव लेना चाहिये।
वसन्त ऋतु में बहुत मीठा, स्निग्ध, अम्ल, देर से पचने वाले गुरू आहार तथा दिन में सोना ठीक नहीं रहता। इसका मूल कारण यह है कि हेमन्त और शिशिर ऋतु में संचित कफ अपने आप में एक समस्या है, और यदि कफ वृद्धि करने वाले ये सभी कार्य किये जायें तो आगे चलकर बीमार होने की आशंका रहती है।
वसन्त ऋतु में खाद्य पदार्थ के रूप में सबसे उत्तम जौ, गेहूं, शहद, ईख, अंगूर आदि उत्तम हैं। अंगूर या महुवा से बने हुये स्वच्छ औषधीय-आसव व अरिष्ट वसन्त ऋतु में लिये जा सकते हैं। साठी के चावल, शीत द्रव्य, मूंग, निवारी के चावल, कोदो तथा मूंग की दाल के सूप, बैंगन, पटोल आदि तिक्त रस वाले द्रव्यों का उपयोग उत्तम रहताहै। वसन्त ऋतु में तीक्ष्ण, रुक्ष, कटु, क्षार, कषाय रस वाले पदार्थो में जौ, मूंग और मधु मिलाकर भोजन के रूप में लेना उपयोगी है।
आयुर्वेद में वसंत ऋतुचर्या का बड़ा रोचक वर्णन है जो आधुनिक आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्ण साम्यता रखता है। वनों और कानन में जहां ठण्डी हवा, जल से भरे हुये तालाब, विविध प्रकार की जैव-विविधता वाले पुष्प-वृक्षों की प्रजातियाँ एवं विविध प्रजातियों के पक्षियों की कलरव ध्वनि हो, वहां समय बिताने के लिये वसन्त ऋतु सर्वोत्तम है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध में उपवन, हरियाली, पार्कों या बागीचों के स्वास्थोपयोगी प्रभाव पर पूरी दुनिया में बहुत शोध हुये हैं। परन्तु प्राकृतिक-तन्त्रों, वनों एवं जैव विविधता क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर पडऩे वाले प्रभाव पर सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन निष्कर्ष चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय में ही उपलब्ध हैं। इस विषय में आधुनिक शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है परन्तु जो कुछ भी उपलब्ध हैए उससे आयुर्वेद में दी गयी सलाह की पुष्टि ही होती है। अत: वसंत ऋतु में प्राकृतिक स्थलों का आनद लेना स्वास्थ्यवर्धक है।
जहाँ तक पंचकर्म का प्रश्न है,क्या आपको सचमुच इसकी जरूरत है? इसका दुरुस्त आंकलन आपके आयुर्वेदाचार्य आपके लिये कर सकते हैं। लगभग पांच वर्ष पूर्व एक माह से अधिक समय तक चलने वाली पंचकर्म चिकित्सा का आनंद मैंने लिया था। हाल ही में चक्रपाणि आयुर्वेदा जयपुर में लम्बे समय के कार्यरत आयुर्वेदाचार्य डॉ. लक्ष्मी अनूप, जिन्हें आयुर्वेद की उत्तर-भारतीय और दक्षिण-भारतीय विधाओं की गहरी समझ है, और उनकी टीम के साथ विचार-विमर्श हुआ। इस गहन परामर्श से मुझे पुन: लगा कि मैं भी उस श्रेणी में अपने आपको गिन सकता हूँ जिन्हें पंचकर्म से स्वास्थ्य को यथावत बनाये रखने और उम्र-आधारित रोग-जनन को दूर रखने में मदद मिलेगी। मेरी तरह आप भी उनमें से एक हो सकते हैं।
पंचकर्म वैसे तो शारीरिक-मानसिक शोधन और रोग शमन दोनों में मददगार है, पर पहली बात यह है कि आप सबकी तरह मैं भी निरंतर स्वस्थ रहना चाहता हूँ। अन्य शब्दों में, मैं बार बार बीमार होकर दवाओं में अपना धन नष्ट नहीं करना चाहता। बीमारी में धन की बर्बादी के साथ जो शारीरिक-मानसिक पचड़ा-परेशानी होती है वह तो अतिरिक्त है। अत: सदैव स्वस्थ बने रहने के लिये साल में एक बार पंचकर्म करना सबसे उपयुक्त है।
दूसरी बात यह है कि सघन चिकित्सा इकाई में कोई नहीं मरना चाहता। जीवन के अंतिम दिन तक, स्वस्थ रहना है तो आयुर्वेद के रसायन बड़ी मदद करते हैं। पर बिना शोधन क्रिया कराए रसायनों को लेने का मतलब वैसा ही है जैसा पुराने कम्बल को रंगना। रसायन उम्र-आधारित रोग-जनन रोकने या दर्द-निवारण में तभी सक्षम होते हैं जब पहले पंचकर्म से शोधन कराया जाये। नियमानुसार पंचकर्म, रसायन और वाजीकर का प्रयोग करने से धातुसाम्य बना रहता है, रोग नहीं होते, धातुयें बढ़ती हैं इसलिये बूढ़े होने की गति धीमी हो जाती है। (च.सू.7.48-49)
तीसरी बात यह है कि वैसे तो पंचकर्म की कुछ क्रियाएं दिनचर्या और ऋतुचर्या का अंग हैं, पर हम प्राय: उन्हें भुला देते हैं। जीवन शैली ऐसी हो गई है कि तीनों दोष कुपित रहते हैं। जानबूझ कर लापरवाही करना और इंद्रियों के सामंजस्य के विरुद्ध संयोग हमारी आदत हो गये हैं। हमारा समय त्रिदोष-भड़काऊ काल है। ऐसी स्थिति में अनेक रोगों की रोगों की शुरुआती अवस्था दिखने लगती है, तब होश आता है कि पंचकर्म तो हमारे लिये ही है।
ऋतुचर्या में पंचकर्म की क्रियायें तो उपयोगी हैं ही, पर साथ ही आयुर्वेद का सिद्धांत यह है कि बहुदोष के लक्षण दिखें तो समझिये पंचकर्म की जरूरत आ पड़ी। या तो बीमार होइये या पंचकर्म कराइये और स्वस्थ रहिये। तात्पर्य यह समझिये कि अपच, आहार-अरुचि, मोटापा, पांडुता, भारीपन, थकावट, पिडका कोठ और कंडू (तरह तरह की फुंसियाँ), स्तम्भ, अरति, आलस, श्रम, कमजोरी, शारीरिकदुर्गन्ध, अवसाद, कफ व पित्त का भड़कना (उत्क्लेश),नींद उड़ जाना या खूब नींद आना, तन्द्रा (उनींदापन या हमेशा औंघाते रहना), क्लैब्य, अबुद्धि की स्थिति, उल्टे-पुल्टे सपने आना, और पौष्टिक आहार लेते रहने के बावजूद बल और रंग उडऩा बहुदोष के लक्षण हैं। ऐसे लोगों के लिये पंचकर्म या संशोधन हितकारी होता है। अनुभवी और कुशल चिकित्सक रोगी के दोष स्थिति एवं बल को समझकर चिकित्सा की सलाह देगा एवं शोधन करायेगा। (च.सू.16.13-16)
एक और सिद्धांत है। मेरे विचार से जीवन और मृत्यु के मध्य सात रक्षा दीवारें हैं: आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन/वाजीकर, औषधि। इनमें से शुरू की छ: दीवारें स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य-रक्षण में मदद करती हैं। और सभी सात दीवारें या सुरक्षा कवच मिलकर रोगी को स्वस्थ करने में मदद करती हैं। जब आहार, विहार, सद्वृत्त वस्वस्थवृत्त की सुरक्षा दीवार को ठीक से प्रतिदिन न सम्हाला गया हो तो पंचकर्म की जरूरत पड़ जाती है। इसके बाद, जीवन और मृत्यु के बीच रसायन और औषधि की दीवारें ही शेष बचती हैं।
जहाँ तक पंचकर्म में अभी तक प्रकाशित शोध का प्रश्न है, शोधकर्ताओं को पंचकर्म की समग्रता में शोध करना होगा। अभी प्राय: जो शोध हो रही है उसमें पंचकर्म की समग्रता और अखंडता की उपेक्षा ही दिखाई पड़ती है। पंचकर्म पर वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु ऐसी विधियां अभी तक विकसित नहीं हो पायी हैं, जिनका उपयोग कर पंचकर्म के सभी पहलुओं की विविधता और प्रत्येक पहलू के क्रियान्वयन को समाहित कर वाञ्छित प्रश्नों के निर्विवाद उत्तर प्राप्त किये जा सकें। इसके बावजूद अभी तक जो शोध है वह निर्विवाद रूप से रोगों के उपचार और स्वास्थ्यरक्षण में पंचकर्म की उपयोगिता यथावत सिद्ध करती है। संहिताओं, विज्ञान और अनुभव में कोई विरोधाभासी प्रमाण नहीं मिलते।
अंत में पांच हजार साल पहले हुए गुरु-शिष्य संवाद का एक रोचक दृष्टांत पुन: देखते हैं। अग्निवेश ने पूछा: ”भगवन्! मनुष्य की आयु निश्चित होती है या नहीं?ÓÓ (किन्नु खलु भगवन्! नियतकालप्रमाणमायु: सर्वं न ति)। आत्रेय का उत्तर था: ”अग्निवेश! समस्त प्राणियों की आयु युक्ति की अपेक्षा करती है।ÓÓ हम सबके लिये सन्देश यह है कि जल, वायु, मिट्टी और ऋतुओं के प्रदूषण काल में भी मृत्यु की तिथि तय नहीं है। आयु युक्ति की अपेक्षा करती है। युक्ति से आप स्वस्थ रह सकते हैं। युक्ति से आपकी आयु बढ़ाई जा सकती है।
साभार भारतीय धरोहर

मंगलवार, 13 मार्च 2018


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प्राकृतिक घड़ी
प्राकृतिक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या
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प्रातः 4 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहनेवालो का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान कर लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल – त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपयुक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं।
प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम ) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।
दोपहर 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।
दोपहर 3 से 5 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
शाम 5 से 7 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है। इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए। शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
रात्री 7 से 9 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
रात्री 9 से 11 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
रात्री 11 से 1 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।
रात्री 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।
नोट :-- ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे और भोजन करते वक्त जब पेट सिग्नल दे की अब पेट भर गया तो भोजन करना रोक दे ।जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनर से बचना चाहिए।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।
शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।
आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की प्राकृतिक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा।
अजय कर्मयोगी

*गोवंश जनगणना क्यों?*
टारगेट 2050
प्राचीन काल सतयुग से लेकर 1980 तंक, लाखो साल तक गोवंश उत्पाद जैसे दूध , घी,मक्खन, छाछ , खोवा आदि हमारे देश में सबसे अधिक लोकप्रिय आहार रहे है।
अंग्रेजो ने गोउत्पाद का प्रयोग भारत के हर घर में देखा।
अंग्रेज हर उस चीज को तुरंत व्यापारिक नजरिये से ग्रहण कर लेते है जिसको हिन्दू उपयोग करते है। *ताकि उसका बाद में उसको व्यापार कर लाभ कमाया जा सके।* जैसे
टमाटर की चटनी भारत में बहुत खाई जाती थी और है,तो अंग्रेजो ने टोमेटो सास का प्रचलन बाजार में कर दिया।
तो
अंग्रेजो ने गाय का दूध ,घी,खोवा आदि की महिमा जानी और ये समझ गए कि *हिन्दू इनके बिना नहीं रह सकते।*
तो
*अंग्रेजो ने 100 वर्षीय व्यापारिक योजना बनाई*
फिर
1) वर्ष 1991 से देशी गोवंश की जनगणना आरम्भ हुई, ताकि पता लगाया जा सके की भारत्त में जनसंख्या के अनुपात में गाय कितनी है।
*इससे विदेशी कम्पनियो को दूध की कमी मालुम पड़ जाएगी,* यानी नेस्ले दूध पाउडर, क्रीम, आदि का बाजार बढ़ाने हेतु आंकड़े सरकारी सर्वे द्वारा उपलब्ध रहेंगे, कम्पनी का कोई खर्च नही।
2) केवल हिन्दू त्योहारों पर ही नकली खोवा पकड़ने के समाच्चार आते है और भैंस ,कुत्ते तक को ढूंढ लाने वाली पुलिस पिछले 20 सालों में नकली खोवे बनाने वालों को नही पकड़ पा रही, क्योंकि *असली खेल तो केवल नकली खोवे के नाम पर वर्तमान में भयभीत बनाये रखना ही है।* ताकि 2050 में असली का व्यापार किया जा सके।
3) अभी अखबारो में,टीवी पर, और आपके डाक्टर बताते है कि *हिरदय,किडनी ,लकवा से बचना है तो घी मत खाओ।*
तो
आपको मालुम है कि असली गाय, उरुग्वे,ब्राजील में प्राकृतिक धुप, जंगल में पाली जा रही है,बंदूकों की सुरक्षा में ,ताकि 1 भी गोवंश का नुकसान ना हो।
अब खेल शुरू हो रहा है धीऱे धीऱे, समझिये ठीक से।
2015 में फ्रांस की एक कम्पनी दक्षिण की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध दूध फैक्ट्री को खरीद लेती है।
यानी पहले चरण में *दक्षिण में मिलने वाले ताजे दूध,घी, मक्खन,छाछ के व्यापार पर विदेशी कब्जा आरम्भ हो चुका।*
तो *आइये वर्ष 2050 में,* जब पुरे देश में जर्सी गाय या भैंस का इंजेक्शन वाला दूध ही उपलब्ध है, और *इस दूध आदि की भरपूर निंदा* 2050 के भारतीय डाक्टर कर रहे है और उसका उपयोग ना करने की सलाह दे रहे है और *आंकड़े बताये जा रहे है कि 2000 से 2050 तंक किंतने लोग गम्भीर रोगों से ग्रस्त होकर मरे इस जर्सी गाय के दूध के कारण।*
फिर 2050 में टीवी पर नेस्ले कम्पनी का विज्ञापन आता है,
*हम आपके स्वास्थ्य की चिंता करते है, हिन्दू धर्म का सम्मान करते है, इसलिये हम लाये है असली देशी गाय का दूध, घी आदि (ब्राजील ,उरुग्वे वाली ), जोकि सूर्य की रौशनी से विटामिन डी युक्त है, विषनाशक, रोगनाशक है।*
और जो डाक्टर *1980 से 2050 तंक आपको घी खाने से मना कर रहे थे,* वो अब तुरंत विदेशी कम्पनी की भाषा बोलने लगेंगे और कहेंगे कि *देशी गाय का दूध , घी भरपूर खाओ, ये शरीर के लिये अमृत है क्योंकि देशी गाय का है और 50 साल की रिसर्च द्वारा प्रमाणित हैै कि इससे गम्भीर रोग नही होते।*
और
इस घी की कीमत उस समय होगी 10 हजार रूपये किलो आदि, ठीक उसी तरह जैसे मुफ्त के गवारपठे को एलोवेरा बनाकर विदेशी कम्पनियो ने 1000 रूपये किलो तंक बेचा है, योग को योगा बनाकर बेचा, लहसुन को गार्लिक पर्ल्स बनाकर बेचा, इत्र को आदमी औरत को आकर्षित करने वाला परफ्यूम बनाकर बेचा।
तो 2050 में देशी गाय का दुध, घी, खोवा ,मिठाईयां भरपूर बिकेंगी, डाक्टर आगे बढ़कर इनका सेवन करने को कहेंगे, केवल विदेशी कम्पनिया ही बेचेगी क्योंकि सरकार क़ानून बनाकर 2050 में जर्सी गाय, भैंस के दूध को प्रतिबंधित कर् देगी ( ढेले वाले नमक की तरह ), और देश में दूध, मिठाई,खोवा पर एकछत्र अधिकार होगा विदेशी कम्पनियो का।( जैसे आयुर्वेद को बदनाम करके या ख़त्म करते हुए, दवाइयों के बाजार पर 80% विदेशी कम्पनियो कब्जा है )
तो
2050 में
सोना संस्ता होगा और देशी गाय का दुध, घी, महंगा होगा ,एकछत्र व्यापारी केवल यूरोप होगा,जैसे अभी कम्प्यूटर मोबाइल पर कब्जा है उनका।
भारतीय विवश होंन्गे खरीदने को ।
ये है वर्तमान नकली खोवे के मौसमी समाच्चार, आक्सीटोसिज इंजेक्शन,जर्सी गाय को पूरे देश में फैलाये रखने की योजना का योजनाबद्ध इल्लू गीरोह का षड्यंत्र। 
अजय कर्मयोगी

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...