शुक्रवार, 11 मई 2018




 महामृत्युंजय मंत्र ऊर्जा के सामने क्वांटम मसीन  का मीटर हुआ बेबस

चेतना, जो कि ऊर्जा की विवेकपूर्ण व संपूर्ण अभिव्यक्ति है, आज भी विज्ञान के लिए एक अबूझ पहेली है। कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस तो विज्ञान ने रच ली है, लेकिन चेतना को पढ़ पाना भी अभी दूर की बात है, इसकी रचना का तो प्रश्न भी नहीं उठता।
चेतना को समझा अवश्य जा सकता है, भारतीय योगी-मनीषी इसका अभ्यास सदियों से करते आए हैं। मुंगेर, बिहार स्थित दुनिया के प्रथम योग विश्वविद्यालय में मानसिक ऊर्जा के विविध आयामों को पढ़ने के लिए उच्चस्तरीय शोध जारी है। 

जुटे हैं दुनिया के 50 विश्वविद्यालयों के 500 वैज्ञानिक-

दुनिया के चुनिंदा 50 विश्वविद्यालयों और क्वांटम फिजिक्स पर शोध करने वाली वैश्विक शोध संस्थाओं के 500 वैज्ञानिक इस शोध पर एक साथ काम कर रहे हैं, विषय है- टेलीपोर्टेशन ऑफ क्वांटम एनर्जी, यानी मानसिक ऊर्जा का परिचालन व संप्रेषण।

इस शोध के केंद्र में भारतीय योग व ध्यान परंपरा का नादानुसंधान अभ्यास भी है, जिसे नाद रूपी प्राण ऊर्जा यानी चेतना के मूल आधार तक पहुंचने का माध्यम माना जाता है। बिहार योग विश्वविद्यालय के परमाचार्य पदम भूषण परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती इस शोध में मुख्य भूमिका में हैं।
मंत्रों में निहित ऊर्जा को पढ़ने का प्रयत्न-

स्वामी निरंजन बताते हैं कि यह मंत्र विज्ञान भी शोध के केंद्र में है। प्रत्येक मंत्र के मानसिक व बाह्य उच्चारण से उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के जरिये मापा गया है। मानसिक संवाद, परह्रद संवेदन या दूरानुभूति जिसे अंग्र्रेजी में टेलीपैथी कहते हैं, यह विधा भारतीय योग विज्ञान का विषय रही है। मानसिक ऊर्जा के परिचालन और संप्रेषण को वैज्ञानिक आधार पर समझने का प्रयास किया जा रहा है।

स्वामी निरंजन कहते हैं, संभव है कि आने वाले कुछ सालों में एक ऐसा मोबाइल सेट प्रस्तुत कर दिया जाए, जिसमें न तो नंबर मिलाने की आवश्यकता होगी, न बोलने की और न ही कान लगाकर सुनने की।

महामृत्युंजय मंत्र में सर्वाधिक ऊर्जा-

57 वर्षीय स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बताते हैं कि क्वांटम मशीन में विविध मंत्रों के मानसिक और बाह्य उच्चारण के दौरान उनसे उत्पन्न ऊर्जा को क्वांटम मशीन के माध्यम से मापा गया। स्वामी निरंजन बताते हैं कि इस शोध के लिए विशेष रूप से तैयार की गई क्वांटम मशीन विज्ञान जगत में अपने lतरह का अनूठा यंत्र है, जिसे मुंगेर स्थित योग विश्वविद्यालय के योग रिसर्च सेंटर में लाया गया।

इसके सम्मुख जब महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण किया गया तो इतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न हुई कि इसमें लगे मीटर का कांटा अंतिम बिंदु पर पहुंचकर फड़फड़ाता रह गया। गति इतनी तीव्र थी कि यह मीटर यदि अर्द्धगोलाकार की जगह गोलाकार होता तो कांटा कई राउंड घूम जाता। सामूहिक उच्चारण करने पर तो स्थिति इससे भी कई गुना अधिक आंकी गई। महामृत्युंजय मंत्र के अलावा, गायत्री मंत्र और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला का स्त्रोत अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न करने वाला साबित हुआ।

ऊर्जा को संकल्प शक्ति की ओर मोड़ दें-

परमहंस स्वामी निरंजन कहते हैं इन तीन मंत्रों का जप प्रतिदिन सुबह उठकर और रात्रि में सोने से पहले सात-सात बार अवश्य करना चाहिये। इनके पाठ या जप से उत्पन्न ऊर्जा को मानसिक संकल्प लेकर संकल्प शक्ति में परिवर्तित कर देने से वांछित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से पूर्व सतत आरोग्य का संकल्प, गायत्री मंत्र से पहले प्रज्ञा के सुप्त क्षेत्रों को जागृत करने का संकल्प और दुर्गा द्वात्रिंश नाम माला के तीन बार स्त्रोत से पूर्व जीवन से दुर्गति को दूर करने, जीवन में शांति, प्रेम व सद्भाव की स्थापना का संकल्प लेना चाहिये।

तब हम चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं...-

स्वामी निरंजन कहते हैं, जहां ऊर्जा है, वहां गति होगी, वहां कंपन होगा, और कंपन से ध्वनि होगी। कुछ ध्वनियां हैं, जो हमारे कानों के श्रवण परास से नीचे हैं, तो कुछ उससे ऊपर। ये कंपन भौतिक या प्राणिक शरीर तक ही सीमित नहीं होते हैं, ये मन, भावना और बुद्धि जगत में भी विद्यमान होते हैं। जब हम चिंतन करते हैं तो मन के अंदर तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो कंपन और ध्वनियां पैदा करती हैं। भारतीय योग विज्ञान में इसे नाद कहा गया है। नाद का अर्थ है चेतना का प्रवाह।

विज्ञान भी इससे पूर्णतः सहमत है-

कि संसार की सभी चीजें कंपनीय ऊर्जा की सतत क्रियाएं हैं। यदि हम मानसिक-तरंग-प्रतिरूप को पुनर्संयोजति, पुनर्स्थापित और प्रेषित कर सकें, तब हम चेतना को अभिव्यक्त कर सकते हैं। अजय कर्मयोगी

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018




संभवामि युगे युगे तो भगवानने खूदके लिए कहा है लेकिन वो बात सच होती दिखती नही है, क्योंकि आज उनकी सर्वाधिक जरूरत है और उनका कोइ अतापता नही है ।
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भगवान न सही लेकिन उनके प्रतिनिधि जरूर आते रहते है ।
२०० साल पहले एक राजपूत का बेटा संत दादा मेकरण कच्छ की भूमि पर आए थे, आज सौराष्ट्र की भूमि पर पटेल का बेटा देवाभाई मानो मेकरण बन के आ गए हैं ।
मेकरण दादाने गुजरात और सिन्ध को जोडते रास्ते जो कच्छ के रण से गुजरते थे उसी रण में अपनी झोपडी बनाकर रहते थे और भूले भटके राहदारियों के लिए पानी और बाजरे की रोटी से भरी कावड लेकर दूर दूर तक घुमते रहते थे । खूद का शरीर चला तब तक कावड लेकर खूद जाते थे, शारीर ने जवाब दे दिया तो उनका काम उनके पालतु गधे और कुत्ते ने उठा लिया था । अधिक जानकारी के लिए दादा की ऐतिहासिक कहानी राष्ट्रिय शायर झवेरचन्द मेघाणी लिखी है जीसका यहां लिन्क दे रहा हूं ।
https://www.facebook.com/…/a.831176416893…/867093879968431/…
देवाभाई साधन संपन्न किसान है । उनक कहना है कि मेरे जीवनकी संघर्ष रूपी प्यास भोलेनाथने बुजाई है अब में जनता की प्यास बुजाने निकल पडा हूं, भोएनाथ का ऋण चुका रहा हूं । सौराष्ट्र के गोंडल शहर के धोमधखते ताप में देवाभाई पिछले तीन साल से अपनी सायकल रथ पर 50 जीतनी मशक (पानी की थेली ) रखकर शहर भर में घुमते हैं और प्यासे राहदारियों को फोगट में थंडा पानी पीलाते हैं । खूद सुखी किसान है, काफी जमीन और मिल्कत है, वो कहते हैं भगवानने उनके जीवन की सभी जरूरियात पूरी की है, अब वो जनसेवा करके बाकी का जीवन बीताना चाहते हैं ।
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देवाभाईका पानी के लिए जीवन मंत्र (सुत्र) है, "ठंडा, मिठा और फोगट" । ये सुत्र तो सरकार को याद होना चाहिए लेकिन २० रुपिए में बोटल बीकवाने वाली सरकार ये याद भी क्यों करें ! हर स्टेशन पर फोगट के प्याउ होते थे वो भी गायब हो गए, या है तो उसमें पानी नही भरते, या पानी है भी तो फॅशन जनता की जेब में घुसकर नाचती है और बोतल का २० रुपिया निकाल ही लेती है ।
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"ठंडा, मिठा और फोगट", इस सुत्र के साथ देवाभाई सुबह ७ बजे निकल जाते हैं और शाम सात बजे तक 2000 लीटर पानी राहदारियों को पिला देते हैं । गोंडल से पसार होते बसवाले भी देवाभाई को देखकर रुक जाते है और अपने मुसाफिरों को पानी पिलाते हैं और उनकी खाली बोटलों को भरवाते हैं । बिलकुल मुफ्त में ।
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गोंडल में और सौराष्ट्र के पूरे क्षेत्र में पानी की तंगी है । देवाभाई को 4 कि.मी दूर रहे कुएं तक जाना पडता है । दिन में तीन से चार बार जाना पडता है । सायकल पर पानी लादकर हर दिन 25 कि.मी चलना आसान नही होता है । देवाभाई की सेवा से पूरे शहर में उनका नाम हो गया है, बच्चा बच्चा जानता है कि पानीवाले देवाभाई कौन है । वैसे तो सेवाभावि लोग पानी के प्याउ बनवाते थे/हैं, देवाभाई चलता फिरता प्याउ है ।
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पिछले 25 साल से चैत्री नवरात्री में देवाभाई रामजी मंदिर पर बीना कोइ पैसे लिए छास वितरण करते आए हैं । नव दिन तक गांव में से दुध एकत्रित करते हैं और खूद छास बनाते हैं ।
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असली या नकली, सेवा के अनेक क्षेत्र है .....उनमे से सही सेवक, या प्रधान सेवक को ढुंढना ढेर में सुई ढुंढना बराबर है...

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

वैदिक समाधान गुरुकुलम vadik samadhan gurukulm : Scientist Believes the Human Microchip Will Beco...

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Scientist Believes the Human Microchip Will Become “Not Optional”

Technologies designed specifically to track and monitor human beings have been in development for at least two decades.
In the virtual realm, software programs are now capable of watching us in real time, going so far as to make predictions about our future behaviors and sending alerts to the appropriate monitoring station depending on how a computer algorithm flags your activities. That is in and of itself a scary proposition.
What may be even scarier, however, is what’s happening in the physical realm. According to researches working on human-embedded microchips it’s only a matter of time before these systems achieve widespread acceptance.
“Chances are you’re carrying a couple of RFID microchips now. And if you are, they’re sending out a 15-digit number that identifies you. That number can be picked up by what’s called an ISO compliant scanner. And they’re everywhere, too. […]

वैदिक समाधान गुरुकुलम vadik samadhan gurukulm :

Scientist Believes the Human Microchip Will Beco...
: Scientist Believes the Human Microchip Will Become “Not Optional” Technologies designed specifically to track and monitor human ...

पुरी शंकराचार्य, अजय कर्मयोगी के अलावा संदीप माहेश्वरी, विवेक बिंद्रा और कैरी minati जैसे सनातन संस्कृति द्रोही धन पशु और मां बहन को गालियां देने वाले 100 करोड़ से ऊपर देखने वाले क्यों

मैं अभी 20 वर्ष का हूँ। पुरी शंकराचार्य जी को मात्र डेढ़ वर्ष से सुन रहा हूँ।
सोचता हूँ कि यदि 2010-2012 में ही यूट्यूब और अथाह इंटरनेट आज जितना सामान्य होता और पुरी शंकराचार्य जी भी यूट्यूब पर होते, तो हो सकता है कम से कम मैं सनातन धर्म का एक छोटा सा वैचारिक सैनिक तो बन ही जाता। बचपन से आचरण भी शुद्ध स्मार्त द्विज वाला होता।
आज जो बच्चे हैं, उनके लिए यह सब अत्यंत सुलभ है। परन्तु स्वयं को हिन्दू कहने वाले कितने लोग अपने बच्चों को पुरी शंकराचार्य जी के उपदेश सुनाते हैं?
संदीप माहेश्वरी, संस्कृत का मजाक उड़ाने वाले पाखण्डी, के चैनल पर 101 करोड़ से अधिक Views हैं। विवेक बिंद्रा, जो लोगों को धनपशु पूँजीवादी बनाकर छोड़ेगा, के चैनल पर 85 करोड़ से अधिक Views हैं। यही नहीं, माँ-बहन की गालियाँ देने वाले Carry Minati के 187 करोड़ Views हैं।
लेकिन Govardhan Math, Puri नामक चैनल के कुल Views हैं मात्र 2 करोड़ 56 लाख। Views मतलब चैनल के सभी वीडियो के Views का योग।

(गोवर्द्धन मठ, पुरी के चैनल की लिंक – https://www.youtube.com/c/GovardhanMathPuri )
 वहीं श्री अजय कर्मयोगी जी योगी जी जो धर्म संस्कृति गाय गांव गुरुकुल और अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र को सामने लाने का कार्य जान की बाजी लगा कर एक अद्वितिय अनुपम कार्य कर रहे हैं इस चैनल को कोई रैंकिंग ही नहीं है
https://m.youtube.com/c/9336919081gurukulam/featured
  इस देश में 100 करोड़ से भी ऊपर हिंदू हैं। 74 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जिसमें 39 करोड़ के पास Jio है। और, श्री विष्णु, ब्रह्माजी इत्यादि से भी अधिक कट्टर "हिंदूवादी" पार्टी BJP के 18 करोड़ सदस्य हैं।

कितने लोग "शंकराचार्य" शब्द को गूगल करते हैं? कितनों को सब मठों और आचार्यों के नाम याद है? आदि शंकराचार्य जी का जन्म कब हुआ यह पता है?
 कितने लोगों को पता है कि कश्मीर में शारदा सर्वज्ञ पीठ भी है
Google Trends पर देख लीजिए भारत में "Porn" और "Shankaracharya" दोनों कितना सर्च होता है।

देखिये, सीधा सा सूत्र है– जानाति इच्छति अथ करोति।

व्यक्ति पहले विषय का ज्ञान लेता है, फिर उसे उस विषय को प्राप्त करने की इच्छा होती है, उस इच्छा को पूर्ण करने के लिए वह व्यक्ति कर्म करता है।
जिसे धन ही धन का ज्ञान दिया जायेगा, वह धन के लिए अपने पिता की भी हत्या कर देगा। जिसे स्वर्ग के बारे में सिखाया जाएगा, वह स्वर्ग के लिए कठोर तपस्या भी कर लेगा। जन्नत और हूर की तालीम वाले बम बांधकर स्वयं को उड़ा लेते हैं, जबकि वे भी ऋषियों, राजर्षियों के ही वंशज हैं।
सोचिये! वे बम बांधकर उड़ने के लिए तैयार हैं।
लेकिन हम तो कहते हैं कि हमें नागरिकों से कोई युद्ध, कोई संघर्ष, कोई क्रांति, कोई आंदोलन नहीं चाहिए। कारण है कि यह सनातन धर्म की विधि नहीं कि प्रजा को संघर्ष में झोंके। इसके लिए शुद्ध वैदिक-स्मार्त आचरण वाले लोगों में भी जो श्रेष्ठ हैं, वे योद्धा पृथक् से होते हैं।
आप केवल वैचारिक रूप से धार्मिक अर्थात् धर्मनिष्ठ, शास्त्रनिष्ठ, परम्परावादी बनिये, इतना ही अपेक्षित है। यदि इतना भी ना कर सकें, तो स्वयं पतित मत होइए और दूसरों को भ्रमित मत कीजिये।
इसके लिए कम से कम मूलभूत जानकारी तो प्राप्त कीजिये। यदि आप अयोग्य हैं, तो अब अपने बच्चों को जानकारी के स्रोत और सनातन परम्परा से जोड़िए।
हर हर महादेव।
साभार : क्षितिज सोमानी
 
सच्चे संत-महात्मा वासना, कामना, ममता, आसक्ति एवं दर्प-अभिमानसे सर्वथा रहित होते हैं, इससे न तो उन्हें स्वयं अपने संतपनका स्मरण रहता है और न वे दूसरोंको ही इसकी स्मृति दिलाते हैं । अतः उनके द्वारा ऐसा कुछ कार्य होता ही नहीं, जिसमें संत कहलानेकी उनकी छिपी वासना भी हो । कहलाना वही चाहते हैं, जो हैं नहीं, जो हैं, वे तो हैं ही । अतएव इन सच्चे संत-महात्माओंका आदर्श सामने रखकर तुम सच्चे संत-महात्मा बनो ।

(‘कल्याण’ पत्रिका; वर्ष – ६६, संख्या – ६ : गीताप्रेस, गोरखपुर)
साभार ईश्वर त्रिपाठी जी


शुक्रवार, 30 मार्च 2018



खतरे की घंटी और अरबपतियों का भारत से पलायन ।
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हकिकत में भारत में अरबपति के लिए भाषा और समज की गरबडी है । खर्चिली लाईफस्टाईल और कुछ आंकडे से ही अरबपति बता दिए जाते हैं । आंकडे प्लस है या मायनस है वो देखा नही जाता है । जो खूद की कमाई, खूद के पैसे से अरबपति बने हैं वो ही सच्चे अरबपति है, प्लस साईड में है । उधार के पैसे से बने है वो तो मायनस साईड के अरबपति है । ऐसे अरबपति को पहले अरबों कमाकर उधार चुकाकर जिरो में आना पडता है और फिर सच्चा अरबपति बनने के लिए दुसरीबार अरबों कमाना पडता है ।
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एक प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2017 में भारत से करीब 7000 अमीर देश छोड़कर विदेशों की ओर पलायन कर गये हैं । 135 करोड़ की आवादी वाले देश से कुछ हजार लोगों का पलायन करना भले ही छोटी बात हो लेकिन यह घटना बहुत गंभीर है । क्योंकि जहाँ भारत की 73 प्रतिशत संपत्ति 1 प्रतिशत लोगों के पास है और वही लोग पलायन करने लगे तो उनके साथ भारत का कितना धन वो ले जा रहे हैं । साल 2017 में देश से करीब 7000 अमीरों ने पलायन किया, साल 2016 में यह आकड़ा 6000 था, 2015 में 4,000, साल दर साल यह आकड़ा बढ़ता ही जा रहा है । इन लोगों ने देश छोड़कर अन्य देशों में शरण ली है। ये आंकडे चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा है।
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रिपोर्ट के अंतमें कहा गया है कि देश से बढ़ता पलायन भारत के लिए बड़े खतरे की घंटी मान जा सकता है।
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खतरे की घंटी बजी इसलिए अमीर भागे, या भागे इसलिए खतरेकी घंटी बजी?
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जहां सरकार विदेशी निवेश के लिए मरी जा रही हो वहां देश के ही निवेशक अपना निवेश लेकर अन्य देशों में चले जाए वो खतरे की ही घंटी है । और उधारी अरबपति दुसरों का पैसा लेकर भाग जाए वो तो डबल खतरे की घंटी है । खूदका पैसा लेकर जानेवाले को कोइ रोक नही सकता, लेकिन देश के अर्थतंत्र को नूकसान ही है । चोर अरबपति को रोका जा सकता है लेकिन ऐसे लोग सरकारी तंत्रकी सांठगांठ से भागने में सफल हो जाते हैं । ये देश को लूटकर ही भागे हैं तो देश के अर्थतंत्र को नूकसान ही नूकसान है । मान लें कि चोर तो अपनी गरदन बचाने के लिए भागे हैं । अन्य क्यों जा रहे हैं वो सोचना होगा । चोर अपनी गरदन बचाने के लिए और अन्य अपना धन बचाने के लिए । यही बात लगती है ।
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भारत से अधिक चीनी अरबपति चीन छोडकर भाग रहे हैं । खतरे की घंटी चीनी अमीरोंने पहचान ली थी, वो सही थे, चीन के प्रमुख को आजीवन प्रमुखपद मिल गया, अब वो चीन में कितनी भी लूटमार चलाए कोइ उसे पद से उतार नही सकता ।
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अमीर आम नागरिक से अधिक बुध्धिमान होते हैं, तभी तो अरबपति बन जाते हैं । सरकार बदलते ही खतरेकी घंटी उन्होंने सुन ली थी, जब कि आम नागरिक घर घर मोदी और हिन्दुत्व के नारे बोलने सुनने में व्यस्त था । भारत से भाग रहे अमीरों की आशंका सही सिध्ध हुई है । मोदी जेटली ने भारतके अर्थतंत्र का कबाडा कर दिया है । और आनेवाले सालों में से मोदी का विकल्प मिटा दिया गया है । चाहे कितनी भी लूट मचा दे मोदी ही मोदी होगा...मोदी जैसे सनकी राजनेता का राजपाट ही खतरे की घंटी बन गया है तो अमीरों का डर जाना स्वाभाविक है । अमीरों में देशभावना या देश का मोह नही होता । जहां उनका धन सलामत रहे, धंधे में एक का दो हो सके ऐसे देश में जान उनको ठीक लगता है । भारत में धंधे की कोइ गेरंटी ही नही रही हो तो वो करे भी क्या ..एक ओर बात भी है ...चीन और भारत जैसे देशों में जो सरकारों के पिठ्ठु नही है ऐसे धनवानों के धनकी कोइ सलामति नही रही है, क्योंकि न्यु वर्ड ऑर्डर का नया साम्यवाद अजगर की तरह देशों को निगालने के लिए तैयार हो गया है ।

शुक्रवार, 23 मार्च 2018



वीरशैव लिंगायत प्राचीन शिवभक्त थे ।
इस सम्प्रदाय को विदेशियों ने मूर्ख बनाया और ये अपने मृतकों को दफ़नाने लगे ।
विदेशियों ने सिखों को भी बहकाना चाहा ( कि वे भी अपने मुर्दों को दफनाएं ) , पर जमीन से जुड़ा सिख समुदाय उनके झांसे में नहीं आया !!
आज वीरशैव लिंगायत नाम का ये सम्प्रदाय अपने मृतकों के शरीर दफ़नाता है , अतएव ये हिन्दू नहीं है।
कडप्पा का कलेक्टर चार्ल्स फिलिप ब्राउन जायोनिस्टों का वह एजेंट था, जिसकी वजह से लिंगायत अपने मृतकों का दाह-संस्कार नहीं कराते -- वे मृतकों को दफ़नाते हैं -- अतएव हिन्दू नहीं हैं।
(हिन्दू होने की एकमात्र शर्त है -- मृतकों का दाह-संस्कार करना)
धूर्त CP ब्राउन ने #वेमना के नकली #बासव_पुराण का अनुवाद किया और इसका इतना प्रचार करवाया कि आज तेलुगु की स्कूली किताबों में वेमना के नकली पद पढ़ाए जाते हैं ।
जैसे महाराष्ट्र में चितपावन यहूदियों को सत्ता की मलाई खाने को मिली -- कर्नाटक/ आंध्र में लिंगायतों को दी गई । इनमें से अधिकतर देशद्रोही थे ।
1832 - 1833 का कुख्यात गुंटूर- अकाल ( जो जान बूझकर उत्पन्न किया गया, ताकि वहाँ से लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर विदेश भेजा जा सके) , जिसके बाद किसानों पर अत्यधिक टैक्स लगाया गया -- उस समय गुंटूर का कलक्टर कौन था -- वही CP ब्राउन, रोथ्सचिल्ड का एजेंट … पर कमाल देखिये, तेलुगू लोग इसे अपना सबसे बड़ा हमदर्द मित्र मानते हैं ...
और बनाओ - मूर्तियाँ , यूनिवर्सिटी , पोस्टेज स्टाम्प -- पूजा भी करो साले की !
बोलो कर्नाटक वालो -- CP ब्राउन की . . . जै !

गुरुवार, 15 मार्च 2018




भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति में योग और संगीत का समावेश भी प्राचीन काल से है। स्‍वर साधना स्‍वयं एक यौगिक क्रिया है जिसमें मन, शरीर व प्राण तीनों में शुद्धता एवं चैतन्‍यता आती है। भारतीय संस्‍कृति में योग के साथ संगीत का गहरा रिश्‍ता रहा है। योग के सिद्धान्‍त के अनुसार श्‍वासों से जुड़ना अर्न्‍तमन से जुड़ना है और व्‍यक्‍ति जब अन्‍तर्मन से जुड़ जाता है तो ऋणात्‍मक संवेग कम हो जाता है और धनात्‍मक संवेग स्‍थायी होने लगते हैं। ये धनात्‍मक संवेग मनोविकारों से व्‍यक्‍ति को दूर रखते हैं।
किंवदन्‍ती है कि समुद्र गुप्‍त जब वीणा वादन करता था तो उसके उपवन में बसंत ऋतु का आभास होता था। संगीत द्वारा पेड़ पौधों को रोग-ग्रस्‍त होने से बचाया जा सकता है। पं0 ओम्‌कार नाथ ठाकुर जी ने भैरवी के प्रभाव को पौधों पर महसूस किया। विद्वानों के मत से चारूकेशी राग से धान का उत्‍पादन बढ़ता है। भरतनाट्‌यम्‌ नृत्‍य फूलों के बढ़ने में सहायक है। अन्‍नामलाई विश्‍वविद्यालय के वनस्‍पति शास्‍त्र के विशेषज्ञ डा0 टी0सी0एन0 सिंह ने ध्‍वनि तरंगों के प्रयोग द्वारा पौधों की उत्‍पादन क्षमता में वृद्धि की बात स्‍वीकार की है। संगीत के मधुर स्‍वर से पौधों में प्रोटोप्‍लाज़्‍म कोष में उपस्‍थित क्‍लोरोप्‍लास्‍ट विचलित व गतिमान हो जाता है।
बहेलियों के बीन तथा सपेरे के बीन बजाने पर मृग व सर्प मोहित हो जाते हैं। कनाडा में संगीत सुनाकर अधिक दूध गायों से प्राप्‍त किया जाता है। पं0 ओमकार नाथ ठाकुर जी ने नाद की महत्ता को स्‍वीकार करते हुये कहा है कि- ‘‘मैंने नाद की मधुरता से हिंसक जानवर शेर, चीतों आदि की आँखों में कुत्ते सी मोहब्‍बत पलते देखी है।''
स्‍पष्‍ट है कि संगीत कला ऐसी कला है जो मन की गहराईयों को छूकर परमानन्‍द की प्राप्‍ति कराती है। यह रोगी को निरोगी और संवेदनाशून्‍य को संवेदनशील बनाती है। भारतीय संगीत प्रेरणा व प्राण शक्‍ति को पहचान कर पाश्‍चात्‍य विद्वानों की मान्‍यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्‍टि करने लगी हैं। संगीत के माध्‍यम से विभिन्‍न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किये जा रहे हैं वे अत्‍यन्‍त चमत्‍कारिक एवं सम्‍भावनाओं से परिपूर्ण हैं।
भारतीय संगीत की प्रमुख विशिष्‍टता ‘रागदारी संगीत' है। राग भारतीय संगीत की आधारशिला है। इसके अर्न्‍तनिहित स्‍वर-लय, रस-भाव अपने विशिष्‍ट प्रभाव से व्‍यक्‍ति के मन-मस्‍तिष्‍क को प्रभावित करता है। स्‍वर तथा लय की भिन्‍न-भिन्न प्रक्रिया उसकी शारीरिक क्रियाओं, रक्‍त संचार, मान्‍सपेशियों, कंठ ध्‍वनियों आदि में स्‍फूर्ति उर्जा उत्‍पन्‍न करते हैं तथा व्‍याधियों को दूर करते हैं।
विभिन्‍न रोगों के लिये संगीतज्ञों एवं संगीत चिकित्‍सकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने कुछ राग निश्‍चित किये हैं, जो उन रोगों को दूर करने में सहायक सिद्ध हुये हैं, हो रहे हैं।

सकल जगतमें हमारी सनातनकी धरोहरोंका उदगम कालसे परे है जो आप हुकुमने बताया । काल गणनाकी इतनी बारीकाईया किसीभी विज्ञान या संस्कृतिके...